Monday, October 3, 2022

रावण ऐं तो राम ही मार सकें

 सफ़र जारी है...1083

05.10.2022

 रावण ऐं तो राम ही मार सकें........

आम जन के बस की बात नहीं है दशशीष धारी रावण का सर्वनाश करना, वे तो बस मरे हुए रावण का सालाना पुतला ही फूंक सकते हैं, उसे तो त्रेता के राम ही मार पाते हैं। विभीषण जैसे घर के भेदी साथ हों जो बता सकें कि नाभि में अमृत कुंड है सो उसे सोखने को तीर चलाओ, फिर लंका का ढहना निश्चित होता है और बाकायदा मुहावरा गढ़ जाता है घर का भेदी लंका ढाए। होंगे राम जी परम शक्तिमान पर  विभीषण के सहयोग के बिना वे दशानन के अहम का सर्वनाश तो नही ही कर पाते। अकेले विभीषण ही क्यों, रीछराज जांबवान, कपि श्रेष्ठ हनुमान, सुग्रीव, अंगद, जटायु, नल, नील जैसे सहयोगियों का साथ उन्हें नहीं मिलता, तो राम विजय के संदर्भ अलग ही होते । वे विजयी हुए क्योंकि लक्ष्मण जैसा भाई और सीता जैसी भार्या कठोर विपत्ति के समय उनके साथ थे, भरत शत्रुघ्न जैसे एकनिष्ठ सहयोगी भाई उनके पास थे।  सदा उनके मंगल की कामना चाहने वाली, उन्हें सत्य असत्य, अच्छाई बुराई, उचित अनुचित, अच्छे बुरे का ज्ञान कराने वाली कौशल्या, सुमित्रा जैसी मातृ शक्ति उनके साथ थी। रघुकुल रीति प्राण जाएं पर वचन न जाए का अक्षरश: पालन करने वाले दशरथ जैसे पिता का वरद हस्त उनके ऊपर था । उनके पास विकल्प था कि वे राम के ऐन राजतिलक के अवसर पर चौदह वर्ष के वनवास और कैकई सुत भरत को राजगद्दी सौंपने के वचन देने के बाद भी  मुकर सकते थे, अपने प्राणप्रिय बेटे राम को रोक सकते थे पर नहीं पुत्र वियोग में उन्हें प्राण त्याग देना अधिक सही लगा बनसपत पुत्र मोह में अपने वचन भंग के। लोकमंगल के लिए परिवार का हर सदस्य उनके साथ बना रहा, परिवारी जनों को तो छोड़िए, सुमंत्र जब राम लक्ष्मण सीता को नदी तट तक छोड़ने गए होंगे तो कलेजा तो उनका भी खूब कांपा होगा कि ये सुकुमार वन में कहां कहां भटकते फिरेंगे पर इस भाव के ऊपर राजाज्ञा प्रभावी रही। चाहते तो अयोध्या वासी भी थे कि उनके प्रिय राम ही गद्दी पर बैठें पर राजा का जो निर्णय हो गया, हो गया फिर सबने उसका सम्मान ही किया। मन में भले ही कैकई को इस कृत्य के लिए दोषी मानते रहे हों पर किसी ने राजा के आदेश की अवहेलना नहीं की। दशरथ ने प्राण देना अधिक उचित समझा पर अपने दिए वचनों की रक्षा की फिर भले ही कैकई को लेकर उनके मन में आक्रोश और विवशता चाहे जो रही हो।

राम राम हो पाते हैं तो उसके पीछे ये सारे सकारात्मक सहयोगियों की लंबी कतार ही नहीं हैं ,आसुरी शक्तियों ने भी अपना दमखम खूब दिखाया। मंथरा यदि कैकई के कान नहीं भरती, उन्हें कोख जाये भरत के हित के लिए नहीं चेताती कि भरत को राजगद्दी मिले, इसके लिए राम के कांटे को अयोध्या से दूर भेजना ही उचित होगा तो कैकई कैसे इन दो वरदानों को मांगने के लिए तैयार हो जाती कि राम को चौदह वर्ष का बनवास और भरत को राजगद्दी मिले। अब पुत्र तो पुत्र होता है, छोटा हो बड़ा हो, अधिक प्यारा हो कम प्यारा हो पर पिता किसी के साथ भी अन्याय तो नहीं कर सकता। कैकई जानती थी कि राजा दशरथ भले ही कितने धर्म संकट में क्यों न पड़ जाएं पर अपने पिता धर्म को तो नहीं ही छोड़ पाएंगे फिर भले ही उन्हें प्राण ही क्यों न छोड़ने पड़े। कैकई ने ये जो सब किया अपने पुत्र भरत के लिए ही न, पर भरत को जब सत्य पता चला तो उन्होंने अपनी माता को ही धिक्कारा... भरत से सुत पर भी संदेह, बुलाया तक न उसको गेह। कैकई यदि अपने वचनों पर दृढ़ रही तो भरत ने भी अपने वचन की रक्षा की। वे राजगद्दी पर नहीं बैठे, राम की चरण पादुका रख राजकाज करते रहे। कैकई और मंथरा ही क्यों, सूपनखा, ताड़का, सुबाहु,मारीच जैसी सभी आसुरी शक्तियां उनके शक्ति परीक्षण के लिए दल बल के साथ जुटी रहीं। स्वर्ण मृग के ब्याज से राम को उसका शिकार करने के लिए भेज साधु वेश धर रावण ने राम की भार्या सीता का अपहरण कर लिया, भाई लक्ष्मण को मेघनाथ ने शक्ति प्रहार कर मूर्छित कर दिया, राम रावण से युद्ध करने के लिए शक्ति संग्रहण के लिए देवी आराधना  पर बैठे तो नील कमल देवी ने ही चुरा लिया, पूजा बीच में छोड़ कर नहीं जाया जा सकता था तो तीर से अपने नेत्र निकाल कर चढ़ाने को उद्यत हो गए क्योंकि उन्हे स्मरण हो आया था कि मां उन्हें राजीव लोचन पुकारती थी। अब ये अलग बात है कि वाण से नेत्र निकालने को तैयार राम का हाथ स्वयं शक्ति मां आकर रोक लेती हैं कि जय जय होगी नवीन का आशीष रघुवर को मिल जाता है। राम के जितने सहयोगी हैं उतने ही विरोधी भी, पर वे विरोधियों की आलोचना से न तो प्रभावित होते हैं और न उनके आगे हथियार डालते हैं। अपने बुद्धि कौशल से, चातुर्य से या तो उन्हे अपना बना लेते हैं या उन्हें दंडित कर देते हैं। सूपनखा जब सीता को अपने डरावने रूप से भयभीत करती है तो लखन उसके नाक कान काट लेते हैं। ऋषि मुनियों के यज्ञ में व्यवधान डालती आसुरी शक्तियों ताड़का सुबाहु का राम सर्वनाश कर देते हैं। समुद्र से पहले रास्ता मांगने की अनुनय विनय करते हैं लेकिन जब जड़ समुद्र नहीं मानता तो वाण उठा लेते हैं सोषो वारिधि बिशिख क्रशानु , बोले राम सकोप तब भय बिनु होय न प्रीत।और समुद्र रत्नों से भरा थाल लेके उपस्थित हो जाता है। राम शत्रुओं से निपटना जानते हैं, शरणागत की रक्षा करना जानते हैं, उन्हे मान देना जानते हैं तभी जो संपदा शिव रावनहि दीन्ह दिए दस माथ, सोई संपदा विभीषनहि सकुच दीन्ह रघुनाथ का संकल्प ले पाते हैं।

अहंकार और दुर्गुणों के रावण को तो राम जैसा बनकर ही जीता जा सकता है। ये दस दिन शक्ति की आराधना के साथ साथ राम चरित्र मंचन, रामलीला के भी हैं, राम चरित मानस के वाचन के भी हैं, जो जिस रूप में भजना चाहे, उन्हें जानना पहचानना चाहे, उन जैसा बनना चाहे तो उसे राम चरित सागर में अवगाहन अवश्य करना चाहिए । राम तुम्हारा चरित स्वयं काव्य है, कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है। रटो राम, जपो राम बस राम ही राम, बनाते सबरे काम।

कहो मगर सबूर से

 सफ़र जारी है ........1082

04.10.2022

कहो मगर सबूर से.....

अब हुड़क तो हुड़क है,कभी भी उठ सकती है, उसका कोई सेट टाइम थोड़े ही होता है। किसी को अपने लोगों से मिलने की हुड़क उठती है तो किसी को घूमने की और किसी किसी को तो खूब जली कटी,तीखी, कड़वी, तीती सुनाने की हुड़क उठ आती है फिर तो लगता है जितना मन का कलुश है सब अभी का अभी कह डालो, फिर जाने समय मिले न मिले, वैसे भी उठी पैंठ आठवें दिन लगा करती है तो मत चूके चौहान। अरे भाई, कहो और जरुर कहो नहीं कहोगे तो पेट में गुडगुड़ होती रहेगी, पाचन शक्ति तो वैसे ही कमजोर है तुम्हारी, मंदाग्नि रोग के शिकार हो, वैसे ही भोजन नहीं पचता तो मर्जी जितना खा लो, शरीर को तो लगता नहीं, बस सावन सूखे न भादों हरे की तरह सुई का कांटा एक ही जगह अटक गया है, सो कहो और जरुर कहो  पर इतना तो निश्चित करना ज़रूरी है कि कहना किससे है, किस मंच पर कहना है और सबसे बड़ी बात कैसे कहना है।

          ये तीन बातें तो संप्रेषण का पाठ पढ़ाते बहुत पहले ही सिखा दी जाती हैं। जो कहना है ,उसे शब्दों में अच्छी तरह बांध लो, बार बार बिखरो मत, एक ही बात की पुनरावृत्ति मत करो। फिर ये भी देखो यदि बात न्याय की है तो उसे लक्षणा और व्यंजना में क्यों कहना, सीधे सीधे अभिधा में कहो न, जिससे शिकायत है उससे कहो न, औरों के आगे कह कर किसकी कमी बता रहे हो, किसकी गलतियों को इंगित कर रहे हो, तुम भी तो इसी व्यवस्था के अनिवार्य अंग हो तो अपने को कैसे विलग कर सकते हो। ध्यान रखना बंधु, जब एक अंगुली किसी की ओर उठती हैं तो बाकी की तीन हमारी ओर ही संकेत कर रही होती हैं। अरे आगे बढ कर व्यवस्था संभालो न, दूर बैठे बैठे पानी में कंकड़ मारना , पानी की तरंगों को आलोचित करना, उसकी गंदगी के वीडियो बना इधर उधर वायरल करना बाहरी व्यक्तियो का काम है, अपनों को ये सब शोभा देता भी नहीं, बस अपनो से तो सहयोग की अपेक्षा होती है। जो छोटा सा बेमालूम सा खौंता, छेद तुम्हें नज़र आ रहा है उसे वहीं की वहीं रफू कर देना ज़रूरी है बनस्पत अंगुली डाल डाल के उसे और बड़ा करते जाना। अपने लोग तो सहायक हुआ करते हैं, वे चीथड़े नहीं बिखेरा करते।

         बात कहने का तरीका भी होता है कोई, शब्द बड़े कीमती और मूल्यवान हुआ करते हैं, उन्हें यूं ही जाया नहीं किया जाता। तो कहने सुनने के तरीके, तमीज, सबूर सीखना भी ज़रूरी ही नहीं, बहुत ज़रूरी होता है। हर व्यक्ति     अपने मतलब का अर्थ ग्रहण कर ही लेता है पर जो अभ्यागत होते हैं, अतिथि होते हैं, कुछ समय विशेष के लिए हमारे मेहमान होते हैं, उनका भला इन सब से क्या लेना देना। आपसी मतभेद आपस में ही सुलझाने उचित होते हैं। और साथ काम करते किस की जागीरें बंटा करती है भला, कुछ दिनों का साथ है, कुछ दूर साथ चले चलना है फिर सब के मोड़ अलग अलग हो जाते हैं। तो संस्थाएं प्रमुख हुआ करती हैं, व्यक्ति और पद तो आते जाते रहते हैं तो ये अहंकार तो बिलकुल लाओ ही मत कि मैं ये मैं वो। कल सबका अंत एक सा ही होना है।

         कहना सुनना तो लगा रहेगा पर जो शब्दों के गहरे तीर चला दिए गए हैं, वे वापिस लौटने से रहे। अब तो तीर म्यान से निकल चुका है। बस अब तो उन शब्दों के प्रभाव देखो बैठे बैठे। बोलते समय इंसान इतना भी याद नहीं रख पाता कि शब्द संभाल के बोलिए शब्द के हाथ न पांव, एक शब्द औषध बने एक शब्द करे घाब रे। तो कहो सुनो जरुर , जब बात पेट में नहीं पच रही हो उगलो जरुर,कहने सुनाने की हुड़क उठे तो कहो जरुर, चार नहीं दस सुनाओ, बस कहने की तमीज और सबूर सीखना बहुत ज़रूरी है नहीं तो जो रायता फैल जाता है, बिखर जाता है, हाल ही  सिमटने में नहीं आता। सो कहते रहिए सुनते रहिए, कम से कम सूमसाम तो नहीं है, चहल पहल जारी है और इसलिए सफर जारी है जनाब।

जरा ध्यान से

 सफर जारी है....1081

03.10.2022d

 जरा ध्यान से.....

जिसे देखो वही अक्ल बताता चला आ रहा है, बचपन से सुनते ही आ रहे है ध्यान से पढ़ो, ध्यान से सुनो, ध्यान से सीखो, ध्यान से उठो,बैठो, चलो, खाओ, पीओ मतलब सब काम ध्यान से करो। ध्यान से ध्यान से तो सब चिल्लाते रहे फिर चाहे घर हो, स्कूल हो या बाहर हो पर आज तक किसी ने ये बता के नही दिया कि आख़िर ध्यान कहते किसे हैं? ये है किस चिड़िया का नाम। आंख बंद किए साधु संत की तस्वीर देख के पूछते कि इन्होंने आंखें बंद क्यों की है तो कहा जाता ये बड़े ज्ञानी ध्यानी हैं, ध्यान लगा कर बैठे है। किसके ध्यान में बैठे हैं तो ज़बाब मिला भगवान जी के।तो सीखा आंख बंद कर चुपचाप बैठने को ध्यान लगाना कहते हैं। जब खुद आंख बंद कर ध्यान में बैठे तो आंख मुंदती गई और ध्यानावस्था की जगह निद्रावस्था में चले गए। आंख बंद की तो मन जाने कहां कहां नहीं डोल आया, विचार कल्पना लोक में यात्रा करते रहे और तो और जो स्थान आंख खुली होने पर भी नहीं दिखते थे, जिन्हें देखने पर बैन लगा था, वे सब भी इधर उधर से आकर आस पास ही मंडराने लगे । सो समझ आया कि केवल आंखो के पलक बंद कर लेने से तो ध्यान कम से कम नहीं ही लगा करता।

             ध्यान तो जब लगता तब लगता, अभी तो किसी काम में मन भी लगना नहीं शुरू हुआ था। जिस जिस बात को मना किया जाता, मन सबसे अधिक दौड़ वहीं की लगाता और जो जो काम करने को सौंपे जाते, उनमें दीदा बिल्कुल नहीं लगता। मतलब पाठ्यक्रम की किताबें छोड़ किस्से कहानी में बहुत मन रुचता और जैसे ही पढाई करने को कहा जाता,दादी नानी सब याद आ  जाती। बेबात की बात खूब करवा लो पर जैसे ही काम की बात होती, मन लाख लगाओ, लगता ही नहीं, दौड़ा छूटा खेल में भागता। अब मन ही मनमानी करे तो ध्यान बेचारे की क्या बिसात जो घड़ी दो घड़ी लग जाए। एक बार प्यार से समझाया भी गया जब कोई बात कान खोलकर सुनी जाती है और कोई वस्तु  आंख खोलकर, बड़ी बड़ी भट्टा सी आंख फाड़कर पलक झपकाए बिना देखी जाती है तब उसे ध्यान से सुनना और देखना कहते हैं ।अब हम तो किताब खोल कर खूब आंखें गड़ाए रहते फिर भी परीक्षा में गोल गोल बड़ा सा अंडा ही मिलता यानी खूब कान के पर्दे खोलकर बात सुनो फिर भी बात अनसुनी रह जाती है और खूब आंख खोल खोल कर देखो फिर भी बहुत सा अनदेखा रह जाता है।

तो फिर कैसे ध्यान से सुना, पढा और देखा जाता है, कैसे काम में ध्यान लगाया जाता है, कैसे ध्यान से बात सुनी जाती है,प्रश्न तो वहीं का वहीं अटका रह गया। स्नातक में मनोविज्ञान और शिक्षा विषय में रूचि और ध्यान का पाठ पढ़ते जाना कि जब आपकी चेतना किसी व्यक्ति, वस्तु, भाव या स्थान में केंद्रित हो जाती है, उसे ध्यान कहा जाता है। ध्यान और रूचि एक सिक्के के दो पहलू हैं। जिस काम को ध्यान से किया जाता है उसमें रूचि पैदा होती है और जिन कामों में रूचि होती है उनमें खूब ध्यान लगता है। ध्यान को अवधान भी कहा जाता है। किसी वस्तु व्यक्ति भाव और स्थान में चेतना का केंद्रित होना ही ध्यान है। अभी तक तो ध्यान  में ही उलझे पड़े थे, अब एक नया शिगूफा और छोड़ दिया चेतना।अब चेतना को पढ़ने समझने बैठे तो अचेतन और अवचेतन दो शब्दो का झुनझुना और पकड़ा दिया। यानी ध्यान की ढेर सारी परिभाषा तो रटने को दे दी, रूचि का छौंका लगा दिया, चेतन अवचेतन में उलझा दिया पर दो टूक शब्दों में ध्यान का अर्थ ही नहीं समझा सके।

        तो हमें कौन ध्यान में पीएच डी करनी है, हम भी ध्यान को ध्यान से सुनकर समझने की कोशिश करते रहेंगे। तुम कहते रहना ध्यान से सुनो ,ध्यान से करो, हमें जो ध्यान समझ आ गया तो भली नहीं तो काक चेष्टा वको ध्यानम, श्वान निद्रा तथैव च, अल्पाहारी गृहत्यागी बने विद्यार्थी के पांच लक्षणों को पकड़े बैठे रहेंगे, तुम कान पे खूब किल्लाते रहना ए भाई तेरा ध्यान किधर है, ए भाई जरा देख के चलो आगे भी नहीं पीछे भी ऊपर ही नहीं नीचे भी और हम कानो में तेल दिए बैठे रहेंगे कि कान पे  हो के टाल जायेंगे, कान ही नहीं देंगे। तू डाल डाल मैं पात पात।

थे ताकत के पुतले बापू

 सफर जारी है.....1080

02.10.2022

थे ताकत के पुतले बापू......

कौन होते हैं वे लोग जो मर कर भी अमर हो जाते हैं, प्रशंसा या आलोचना के बहाने सब के दिलों में बने रहते हैं। जन्मते तो किसी एक परिवार में हैं पर चहेते लाखों करोड़ों परिवारों के हो जाते हैं। ऐसों के लिए रचनाकारों को लिखना पड़ता है चल पड़े जिधर दो डग मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर। जिधर उनकी दृष्टि उठ जाती है, सब लोग वहीं देखनेलगते हैं। अपने कर्मों से वे बापू और महात्मा बन जाते हैं, देश में चरखा, तकली और स्वदेशी वस्तुओं के प्रचार में लग जाते हैं, वे व्यक्ति कब रह जाते हैं, वे तो मिथक बन जाते जाते हैं, पूज्य हो जाते हैं, गांधीगीरी से अभिहित किए जाते हैं। उनके चरित्र पर डोकूमेंट्री और फिल्में बनती हैं, मार्गों का नामकरण उनके नाम पर होता है,  वे अपने देश में ही नहीं, विश्व भर में अपना लोहा मनवा लेते हैं।

हमने भी बापू को कक्षा दो में पढ़ी कविता से ही जाना था। दुबले पतले,धोती लपेटे, एक हाथ में लाठी लिए और चश्मा लगाए व्यक्ति गांधी थे। हम सबके थे प्यारे बापू, सारे जग से न्यारे बापू। लगते तो थे दुबले पतले पर ताकत के पुतले बापू। सबको गले लगाते बापू, सच की राह दिखाते बापू, कभी न हिम्मत हारे बापू। फिर गांधी जी के तीन बंदरों के बारे में जाना जिनमें एक आंख, दूसरा कानऔर तीसरा मुंह बंद किए होता था कि बुरा मत देखो बुरा मत सुनो बुरा मत बोलो, बुरी है बुराई मेरे दोस्तो। पन्द्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को झंडा फहराने के बाद जब जोशीले नारे लगते तो महात्मा गांधी अमर रहें के नारे लगते। बहुत उत्सुकता होती थी उस महापुरुष के विषय में, फिर उनकी आत्म कथा से उद्धृत छोटे छोटे पाठ पढ़ते जाना कि वे सत्यवादी हरिश्चंद्र और मातृ पितृ भक्त श्रवण कुमार का नाटक बायसकोप में देखकर बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने भी अपनी माता का मान सदैव बनाए रखा। उनका लेख खराब था इसलिए वह सबको सुन्दर लेख के लिए प्रेरित करते थे। कक्षा में निरीक्षण के लिए अधिकारी के आने पर उन्होंने मास्टर के कहने पर भी स्पेलिंग के गलत हिज्जे साथी की कापी से नहीं उतारे। वे सत्य के पालन में पूर्ण विश्वासी थे। वर्धा जाते उनका सेवाग्राम देखने और अहमदाबाद में बापू कुटीर और बा निवास देखते उनके जीवन के बहुत सारे पल सजीव हो उठते हैं। बापू मोहनदास कर्मचंद गांधी से बहुत ऊपर उठ एक किंवदंती बन चुके हैं। मुन्ना भाई एम बी बी एस और लगे रहो मुन्ना भाई में गांधीगीरी के सिद्धांत ही तो दिखाए गए हैं। वे साबरमती के संत कहे जाते हैं। सत्य, अहिंसा उनके मुख्य शस्त्र रहे हैं। नमक आंदोलन, पैदल यात्रा, सत्याग्रह के लिए वे जाने जाते हैं।

आज है दो अक्टूबर का दिन आज का दिन है बड़ा महान गीत ने ही जन जन को समझाया है कि यह तिथि अकेले बापू की ही जन्मतिथि नहीं, लाल बहादुर के जन्म का उत्सव भी है। आज के दिन दो फूल खिले थे जिनसे महका हिंदुस्तान, जय जवान जय किसान। एक का नाम था बापू गांधी और एक लाल जवाहर थे, एक का नारा अमन एक का , जय जवान जय किसान। नाटे कद के लेकिन संकल्प शक्ति के धनी पूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री किसी से हेठे थोड़े ठहरते हैं। नैतिक मूल्यों पर पूरा जीवन न्यौछावर कर देने वाले शास्त्री जी हम सबके आदर्श हैं। उनको पढ़ते हमने जाना जो मन में ठान लो,दृढ़ संकल्प ले लो तो तुम भी हिमालय की ऊंचाइयां छू सकते हो, देश के शीर्षस्थ नेतृत्व पर पहुंच सकते हो। अमीर या गरीब परिवार में जन्म लेना तुम्हारे हाथ नहीं हुआ करता, पर अपने परिश्रम से, अपने संकल्प से,धैर्य से तुम अपनी ही नहीं, अपने देश की तकदीर भी बदल सकते हो। होते होंगे गांधी जी शास्त्री के जीवन के कुछ आलोचनात्मक पक्ष पर हमारे मस्तिष्क पर तो बालपन से ऐसी ही छाप पड़ी है , वही स्थाई है। दोनों ही हमारे लिए समान रूप से वंदनीय है, अभिनंदनीय है। जयंती पर उनके चरणों में सादर वंदन। कोशिश रहेगी कि हम भी उनके जीवन से प्रेरणा ले अपने जीवन को उस ऊंचाइयों तक ले जा सके जहां तक वे पहुंचे। सत्य अहिंसा के पक्षधर गांधी जी और जय जवान जय किसान के पोषक शास्त्री जी को सादर नमन।

चले चलो बढे चलो

 सफर जारी है......1079

01.10.2022

चले चलो बढे चलो......

सांझ ढले सब घर लौटते हैं, रात्रि विश्राम करते हैं ओर फिर सुबह उठकर अपने अपने काम पर चल देते हैं। एक स्वस्थ व्यक्ति हमेशा काम करना चाहता ही है । उसे कुछ किए बिना चैन ही नहीं पड़ता, पड़ना भी नहीं चाहिए, जहां रुके, वहां सड़े। रुका हुआ तो पानी भी बदबू देने लगता है। बहता पानी और रमता जोगी की अवधारणा इसीलिए रही होगी। इन सबके मध्य आलसियों की एक लंबी फौज भी तैयार होती है जो अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए सबके दाता राम पंक्ति को कस कर पकड़ कर बैठे हैं, उन्होंने इसे ही मूल मंत्र बना लिया है। न वे काम करते हैं और न करने देते हैं। कभी दवाब में करना ही पड जाए तो बेमन से करते कम बिखेरते अधिक है। ऐसी स्थिति पैदा कर देते हैं कि अगला सोचे जितनी देर में इससे बार बार करने के लिए कहो, मार माथा पच्ची करो, उतनी देर में तो खुद नहीं कर लो। करने की अपेक्षा कराना, सीखने की अपेक्षा सिखाना, पढ़ने की अपेक्षा दूसरे को पढ़ने के लिए तैयार करना शुरू से ही अधिक श्रम की मांग करता है।

            विद्यार्थी बन कर जिज्ञासु भाव से कठिन से कठिन विषय को सीखा अवश्य जा सकता है पर उसे दूसरों तक उसी रूप में पहुंचा देना कैसा आपने ग्रहण किया, अतिरिक्त श्रम की मांग करता है। न करता होता तो अध्यापक बनने के लिए लंबे और कठिन शिक्षण प्रशिक्षण की व्यवस्था क्यों रखी होती। प्रशिक्षण केवल विषय भर जा ही नहीं होता, ये आपके पूरे व्यक्तित्व को बदल कर रख देता है। आपके अंदर धैर्य और सहन शक्ति विकसित करता है, गलत को सुधारने की आदत डाल देता है, आपको कक्षा में प्रवेश पूर्व की तैयारियों से अवगत कराता है। विद्यार्थियों के मानस को समझने योग्य बनाता है। यदि कक्षा में बैठा हर विद्यार्थी सीखने और पढ़ने के लिए आया है, बैठा है तो अध्यापक भी वहां कुछ नया सिखाने, पिछले सीखे ज्ञान को दोहरवाने, उनके अनुभव में कुछ नया जोड़ने ही जाता है। जिस दिन आप बिना तैयारी के कक्षा में जाते हैं, आप सच में पढ़ाते नहीं, इधर उधर की बात कर घंटा बजने की प्रतीक्षा करते हैं कि ये समय जल्दी ही बीते। सीखने को उत्सुक विद्यार्थी के चेहरे मायूस हो जाते हैं, उसकी रूचि कम हो जाती है और उसका उत्साह ठंडा पड़ जाता है। केवल एक दिन की शिथिलता का ये प्रभाव होता है तो सोचो जो अध्यापक रोज ही खाली हाथ खाली दिमाग़ कक्षा में जाते हों तो भला किस की रूचि पढ़ते में रहेगी।विद्यार्थी  का मानस तैयार करना भी एक कला है। इसीलिए कक्षा शिक्षण में प्रस्तावना ज़रूरी होती है जिसे पूर्व ज्ञान से जोड़ा जाता है। पढ़ाना ये थोड़े ही न है कि कक्षा में गए और धड़ धड़ धड़ ताबड़तोड़ गोलियां दाग दी, ख़ुद खाली हो गए और चल दिए। अरे जो परोसा उसे प्यार और भाव से परोसा या नहीं, दूसरे ने उसे ग्रहण किया या नहीं, पता चला उसके लिए तो सब इतना अधिक गरिष्ठ था कि उसे कुछ पचा ही नहीं, आपके प्रहार इतने धड़ाधड़ थे कि उसके कान में कुछ गया जी नहीं। आपकी दृष्टि से पाठ्यक्रम पूरा हो गया, पूरी रामायण समाप्त हो गईं और अगले को पता ही नहीं चला कि राम रावण द कौन। तो ऐसा शिक्षण आपको संतोष भले दे दे पर विद्यार्थियों के किसी काम का नहीं होता।

            आप भी हद करते हो।अरे भलेमानस,जब किसी को भोजन तक कराते हो तो कितने मन से उसकी रूचि कस भोजन बनाते हो रूचि के साथ साथ ये भी ध्यान रखते हो कि उसके लिए क्या पौष्टिक है, उसे क्या हजम हो जायेगा, फिर थाली परोसते खाद्य पदार्थ ही नहीं परोसते उसके साथ प्रेम का दुलार का छौंक भी लगा देते हो, फिर अगला जब तक भोजन समाप्त नहीं कर लेता, उसके आसपास ही बने रहते हो, ज्याड़ा भाव उमड़े तो पंखा झलते रहते हो, थाली में कुछ कम हो तो तुरंत परोस देते हो और जब वह भरपेट खा प्रसन्न भाव से चला जाता है तब चैन की सांस लेते हो। पढ़ाना सिखाना भी कुछ कुछ ऐसा ही है। पात्र के अनुकूल विषय की तैयारी फिर उसे उतनी ही संजीदगी से प्रस्तुत करना, जब तक सामने वाले के चेहरे पर समझ आने का संतोष का भाव न दिख जाए बार बार इस उस तरीके से सिखाते बताते रहना और जब अगले को सब कुछ समझ आ जाए तो सन्तोष की सांस लेना सही और सच्चा शिक्षण है।

            तो मित्रो सिखाया ताभी जा सकता है जब स्वयं को सब क्रिस्टल क्लीयर हो, जो समझाना है उसमें पानी की तरह पारदर्शिता हो, खुद को विषय अच्छी तरह स्पष्ट हो, और उसके लिए रटना नहीं, समझना होता है। लगातार पढ़ना होता है, जानकारी को अद्यतन करना होता हेयर। विद्यार्थी तो पका पकाया चाहते ही हैं, उन्हें तो स्पून फीडिंग की आदत होती है, वे आपसे यही चाहेंगे कि बस आप नोट्स डिक्टेट करा दें, संभव हो तो वही उनको उपलब्ध करा दें, वे फोटो कापी कर आपस में बांट लेंगे, उसे रट रटा कर उत्तर पुस्तिका में लिख परीक्षा भी पास कर लेंगे फिर कक्षा में पढ़ाने की डिग्री भी ले लेंगे पर जो खुद ही नहीं समझे वे दूसरों को क्या दे पाएंगे। तो सिखाने वाली पंक्ति में शामिल हो तो लगातार चलो, चलते चलो, थके हो तो विश्राम करो और आगे बढ जाओ। यही तुम्हारी तपस्या है। भविष्य के निर्माण की जिम्मेदारी तो तुम्हारे कंधों पर है, तुम शिथिल कैसे हो सकते हो भला, गफलत में पड़े रहना तुम्हें शोभा नहीं देता। कैसी बे ते की भाषा बोलते हो। सुधारो अपने को, कर्मठ बनो, तुम्हारी छोटी सी छोटी बात पर सबकी दृष्टि केंद्रित है, तुम ही भटक जाओगे तो भटके भविष्य को क्या राह दिखाओगे। तो तुम्हारा सुधरना ज्यादा ज़रूरी है, अपने को रोज मांजना तराशना ज़रूरी है। तुम तो दुनिया को सिखाने वाले हो, ज्ञान देने वाले हो, तुम्हें ढीले पीले होना शोभा नहीं देता। तुम कमर कसे रहो, चलते चलो, बढ़ते चलो। चलना ही ज़िंदगी है रुकना है मौत तेरी, ए ज़िंदगी के राही किस बात की है देरी।

सफलता के मायने

 सफर जारी है.....1078

30.09.2022

सफलता के मायने.......

आख़िर इतनी भागादौड़ी है किसलिए, चाहिए क्या, मंजिल कहां है हमारी, कौन सा स्थाई सुख है जिसके पीछे भाग भाग के बेहाल हुए जा रहे हैं? जब सब के सुख की परिभाषा अलग है तो सबकी मंजिल भी अलग अलग होगी तो दूसरों की देखा दाखी ये हबड़ तबड किस लिए। जानते तो है कि कोई भी खुशी, कोई भी सुख सदैव रहने वाला नहीं है, जब तक वस्तु हाथ नहीं आ जाती, तब तक की बैचेनी भर है, और जैसे ही वह हस्तगत हो जाती है, मन कुछ और चाहने लगता है। मन की क्या, इसकी चाह तो कभी पूरी नहीं होती। जब सुख मिले तो उसके सदा बने रहने के लिए चिंता करता है और जो दुख में हो तो उससे छुटकारे के लिए बैचेन रहता है। दोनों ही स्थितियों में समत्व का भाव अभी तक विकसित ही नहीं हुआ। बस एक अजब सी बैचेनी में जी रहे हैं हम सब।

याद आती है पुन: मूषक भव: की कथा जिसमें मुनि अपने योग बल से चूहे को शेर बना देते हैं पर उसकी लगातार बढ़ती कामनाओं के कारण उसे पुन: मूल रुप में ले आते हैं। उस मछुआरिन का प्रसंग भी ताजा हो जाता है जो देवी मछली से लगातार वरदान मांगते प्रकृति को भी अपनी इच्छा से चलाने की मांग रख देती है और देवी मछली  उसे ये वरदान नहीं दे पाती और उसे पहले रूप में रहने का शाप दे देती है। देवी देवता भी क्या करें उनके पास देने के लिए वरदान और शाप ही हुआ करते हैं। हम भी तो उतने उतावले हैं कि अपनी जिद में आ के कबीर को याद नहीं रख पाते कि साई इतना दीजिए जामें कूटुम समाय, मैं भी भूखा न रहूं साधु न भूखा जाय। अपने और अपने परिवार का पेट भर जाए और अतिथि अभ्यागत का भी पान फूल से स्वागत कर सकें, इतना मिले तो बहुत है। पर सुरसा की तरह मुंह फैलाती असीमित इच्छाएं इतने से कहां तृप्त होती हैं भला। उन्हें तो और और का रोग जो लगा हुआ है। जो पास है उसका उपभोग कर पाए अथवा न कर पाए, पर और भरने और लादने का शौक कभी पूरा नहीं होता।

              जो ईश्वर ने दिया, वह काफी है, उसने तो वह सब भी दिया जिसके संभवत हम पात्र भी नहीं थे फिर भी बराबर असंतोषी बने रहते हैं। रहने के लिए सिर पर पक्की छत है, पांवों के नीचे ठोस जमीन है, दो टाइम पेट भरने का जुगाड है, परिवार है, बोलने बतराने को आत्मीय स्वजन हैं, मित्र हैं, बैंक खाते में शून्य की बढ़ती संख्याएं हैं, स्वस्थ शरीर की नेमत भगवान् ने दी है। छोटी मोटी सीजनल बीमारियों को छोड़ दें, तनाव और दवाब से मुक्त हो लें, दिनचर्या ठीक कर लें, आलस को छोड़ दें तो ये शुगर बीपी भी नियमित हो जाएं। पर नहीं हम तो इतने कृतघ्न हैं कि ईश्वर ने जो दिया उसका अहसान मान शुक्रगुजार नहीं होते, बस शिकायतों का पुछल्ला लगाए रहते हैं। आंख से ठीक ठीक दिखता है, कान सुनते हैं, बोल सकते हो, चल फिर सकते हो, हाथ काम करने के योग्य है, कोई अंग भंग नहीं , किसी के आगे हाथ पसारने की नौबत नहीं आती तो इससे बड़ा सुख और भला और क्या होगा पर नहीं, हमें तो झींकने रोने बिसूरने की आदत है, अपनी थाली का भात नहीं रूचता, बस दूसरे की थाली का भात मीठा लगता है। हममें संतोष रहा ही कहां, हमारे मन इतने अशांत और बैचेन हैं कि जो पास है, ईश्वर ने जो सौगात हमें दीहै, वह नज़र तर आती ही नहीं। बस मार हाय तौबा में लगे रहते हैं।

              दो घड़ी शान्त बैठ कर सोचो तो सही कि आख़िर चाहिए क्या, इच्छाएं और कामनाएं तो असीमित हुआ करती हैं, इनकी पूर्ति कभी नहीं हुआ करती है। ये तो पेट भर जाने के बाद भी स्वाद के कारण कुछ और खाने की बलबती इच्छा है जिसके पूरा होने से नुकसान ही नुकसान है। तो जो पास है, जितना मिला है उसमें सुख तलाशना सीखो, बहुत दिया है भगवान् ने, उसका सुकाराना मनाओ। जीवन को और बेहतर बनाने की खूब कोशिश करो। साधनों से ही सब कुछ नहीं हुआ करता, जो पास है उसके सही उपयोग से भी ज़िंदगी बेहतर होती है। जरा अपने पास इकठ्ठे किए ढेर को कभी देखो तो सही, कितनी कितनी वस्तुएं ऐसी हैं जिनका कभी उपयोग ही नहीं हुआ फिर भी क्या कभी जरूरत पड़ जाए तो रख लेते हैं के भाव से जोड़ी वस्तुएं केबल जगह घेरती हैं, अस्त व्यस्त रखती हैं, तो उस कबाड़े को निकाल फेंको न। जितने अल्प साधनों और सुविधाओं में जीना आ जाएं , जीवन जितना सरल और सादा हो आप उतने ही सुलझे हुए होते हैं। बिना बात का बोझ क्यों लादे भला। खान पान पहनावे, आचार विचार के साथ मन से भी सरल और पवित्र बने रहिए, जलेबी की तरह गोल गोल उलझने की जरूरत नहीं। जितना लादोगे उतना उलझोगे। तो यथा संभव ज़िंदगी को सरल भाव से जीएं। अपनी मंजिल तय करें, आपको चाहिए क्या इसे स्पष्ट समझ लें, बस ज़िंदगी बहुत आसान हो जाएगी।

उपासी हो क्या सबरी

 सफ़र जारी है.....1077

29.09.2022

उपासी हो क्या सबरी.....

आश्विन अमावस्या यानी श्राद्ध पक्ष के समाप्त होते ही त्योहारी सीजन शुरू हो जाता है। शारदीय नवरात्रि से प्रारंभ होकर दशहरा, कार्तिक माह लगते ही करवा चौथ, अहोई अष्टमी, पंच दिवसीय दीपावली त्यौहार, देवोत्थान एकादशी से लेकर देवशयनी एकादशी तक कितने कितने त्योहार हैं जिनके ब्याज से ईश पूजा और व्रत उपवास संभव होते हैं । चातुर्मास को छोड़ लगभग हर माह में कोई न कोई त्यौहार अवश्य होता है जिसमें कथा कहानी, पूजन और उपवास की स्थिति होती है। और तो और सप्ताह के सातों दिन भी किसी न किसी देव इष्ट को समर्पित हैं। सोम शिवजी, मंगल हनुमान जी, बुध गणेश, गुरुवार साई, शुक्र देवी, शनि शनि देवता और रवि सूर्य भगवान को। यूं तो पूजा पाठ किसी एक वर्ग के हिस्से नहीं आते, इस पर छोटे से लेकर बड़े और गरीब से लेकर अमीर सभी का साझा अधिकार है पर आधी आबादी इसमें अधिक विश्वासी है। शायद उसकी आस्था अधिक प्रबल है या उसे अपने आराध्य पर अधिक विश्वास है कि इनकी शरण में जाओ, सब ठीक ठाक हो जायेगा, इन्हें ही दिनरात भजो, रटो, ध्याओ तो मन कहीं भटकेगा ही नहीं। सहज विश्वासी होती है इसलिए भगवान् पर अखंड विश्वास रखती हैं, उसी की पूजा उपासना में जीवन बिता लेती हैं।

आख़िर क्यों करते हैं हम पूजा, भजन, ध्यान, व्रत उपवास, क्या इसका भी कोई मनोविज्ञान है, क्या मिलता है व्यक्ति को यह सब करके, उपवास का अर्थ कया है, पूजा कैसे की जानी चाहिए। इस विषय पर सोचा कम जाता है, किया अधिक जाता है। जो जो बचपन से होते है, घर परिवार में अपने बड़ों को करते देखा है, सहज भाव से वैसा ही हम सब करना सीख जाते हैं। एक आले में भगवान् जी की मूर्ति और तस्वीर रख उन्हें नहलाते धुलाते पोशाक बदलते पुष्प हार चढ़ाते भोग लगाते टन टन घंटी बजा आरती करते, हाथ जोड ध्यान मग्न होते भजन श्लोक स्तुति गाते रामायण गीता शिव चालीसा हनुमान चालीसा दुर्गा चालीसा सुंदरकांड पढ़ते, अड़ोस पड़ोस के घरों में आए दिन सत्यनारायण कथा, भजन कीर्तन का आयोजन होते बचपन से देखा है, तो ये सब आदत में शामिल हो गया है, मंदिर देख हाथ अपने आप जुड जाते हैं, सिर श्रद्धा से झुक जाता है, प्रसाद पाने को हाथ बढ़ जाते हैं, इसके लिए प्रयास नहीं करना पड़ता। मंदिर में प्रवेश करें और घंटा न बजाएं, उस शांत और दैवीय ऊर्जा से भरे स्थान पर जाकर मन कैसी अजब शान्ति से भर जाता है। देव प्रतिमाएं आशीष देती प्रतीत होती हैं। बचपन से इन्हीं के आगे तो सिर नवाते रहे हैं फिर चाहे शक्ति सुशील मंदिर हो, सनातन धर्म मंदिर, बलकेश्वर महादेव मंदिर अथवा लंगड़ा चौकी का हनुमान मंदिर। मंदिरों के साथ पूजा और प्रसाद का सदा से नाता रहा है तो बचपन में मंदिर जाने का एक बड़ा कारण प्रसाद में मिले बरफी, लडडू, बूंदी और गुलदाने भी रहे हैं। पूजा कैसे की जाती है, इसके लिए कोई अलग से कक्षा थोड़े ही लगती है, घर में परिवारी जनों को और स्कूल में हाथ जोड़कर आंखें बंद कर प्रार्थना करते यह भाव तो दृढ़ हो ही जाता है कि दिन की शुरुआत भगवद भजन, सबको प्रणाम करने, पैर छूने से होती है। भगवान् में अटूट आस्था आपको टूटने बिखरने भटकने से और व्रत उपवास आपको स्वस्थ बनाने में बड़ा योगदान देते हैं बशर्ते इन्हें सही रुप में ग्रहण किया जाए।

सप्ताह में एक दिन उपवास का विधान शरीर को पाचन क्रिया से अवकाश देने के लिए है न कि गरिष्ठ भोज्य पदार्थों को पचाने की अतिरिक्त शक्ति व्यय के लिए। सच तो यह है कि हमने व्रत और उपवास का सही अर्थ ग्रहण किया ही नहीं है। व्रत संकल्प का सूचक है कि आज मैं दुर्गुणों यथा झूठ चोरी चकोरी अपशब्द प्रयोग से अपने को दूर रखूंगा, ईश ध्यान में रहूंगा, भोजन से विरत रहूंगाया उसमें परिवर्तन कर अपने पाचन यंत्र को विश्राम दूंगा। पर ऐसा कहां हो पाता है, रोजमर्रा के भोजन से हटकर इन दिनों के आहार में गरिष्ठता और कैलोरी अधिक पहुंचती है और मन बार बार दोहराता है आज तो व्रत है, कुछ ज्यादा ही कमजोरी महसूस हो रही है। ये संकेत मन ही दिमाग़ को भेजता है और हम उसी भाव में जीने लगते हैं। उपासी रहना बहुत अच्छी बात है फिर चाहे वह भोजन पानी का हो या मौन रहने का, हमें शक्ति संपन्न ही बनाता है। उप का अर्थ समीप, पास और वास का अर्थ रहना बैठना है अर्थात उपवास के दिनों में हम परम पिता सर्व शक्तिमान ईश्वर के पास, उसके चरणों में उसकी दया कृपा पाने को बैठे रहते हैं।

जब हर क्षण प्रभू के ध्यान में बने रहते हैं, उसके नाम की रटन लग जाती है, राधे कृष्ण हरे कृष्ण राम राम का अजपा जप चलता है तो मन में किसी के प्रति दुर्भाव पैदा नहीं होता, किसी से बदला लेने की भावना नहीं होती। आप भगवान् से इस उस की शिकायत नहीं करते बल्कि सबके कल्याण की सबको सद्बुद्धि देने की प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना से चित्त निर्मल होता हैबशर्ते उसे भाव से किया जाए। माला तो कर में फिरे जीभ फिरे मुख माहि, मनवा तो चहुं दिश फिरे ये तो सुमरिन नाही।मुंह में राम बगल में छुरी से तो बात नहीं बनती। कांकर पत्थर जोड़ के मस्जिद लई बनाय, ता चढ़ी मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय भी ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता नहीं है। उसे तो सच्चे भाव से भज कर ही पाया जा सकता है। जब उसके शरणागत हो जाते हैं, सच्चे ह्रदय से उसे पुकारते है तो उसके कानों तक पुकार जाती है, वह हमें विप्पत्ति से उबारता भी है और कष्टों से बचाता भी है तो सच्चे मन से उसके पास उसके चरणों में बैठते हैंड, उप वास करते जीने, उसकी शरण में चलते हैं, उसे बजते हैं हे प्रभू मैं तेरी शरण में हूं, मेरी रक्षा करो प्रभू, मेरा कल्याण करो, सबका कल्याण करो प्रभू। सच्चे दिल से की प्रार्थना उस तक जरुर पहुंचती है, हमारी भी पहुंचेगी। शरणागत हैं प्रभू रख माम, पाहि माम, त्राहि माने। उपासी रहो तो ऐसी, हर क्षण भजे तो ऐसे। जापे कृपा राम की होई, ताले कृपा करें सब कोई

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...