Tuesday, June 18, 2024

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533

18.06.2024

इत्ते उलायती हू मत बनो....

बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडबे बिठालो तो एक साल में दो दओ क्लास लांघ मारी.सबरी बी ए एम ए बीएड एमएड चुटकी बजाते कर डाली.मौको लग गयो तो पी एच डी हू कर डाली.इनके उलायतीपन की कछु मत पूछो बस में सबसे पहले बैठिंगे और उतरबे के बिरिया हू सबन ते पहले गेट पे ठाढे हे जांगे.कहूं गीतन सीतन में जानो होय तो ढोलक के ढिंग बैंठिंगे.सबके ध्यान में आ जाने चहिये कि हम हतें.पढबे कू गये तो सबते आगे की सीट पे बैठनो है बस रेल में खिडकी की सीट चहिएजे समझ लेयो कि जहां जानो वहां नंबर एक पे ही रहनो. उलायती ऐसे कि मुंह ते बात बाद में निकरे काम पहले हे जायगो.

अब तीसरो पन आ गयो पर उलायत से पीछो नाय छूट रहो.सुबह पैर पसारे तब तक तो सब रजको तज करके धर देनो.जे वही ना सल पडे कि ऐसे उलायती सोबे कौन से खन करे.दस से पांच की सरकारी चाकरी हंसी खेल नाय होय करे कि गये और देहरी छू के भाज आये.मगज मारनो पडे.ऐसे ऐसेन ते झड्ड लेनी पडे कि कछु पूछो ही मत .पहले  वहां मगज खप्पी करो और फिर आ के सपेरा समेटो.सबन ने मालूम है करेगी अपे आप.वाहे तो करबे को शौक है.करे बिना निठे नाय बाकी.बाय चहिये सबरो रज की तज,सब काम टैम ते हे जानो चहिये.पेंडिंग  रखबो पसंद नाय.और काहे कू कल कू छोडे,निबटानो तो हमें ही है.तो नेक देर सबेर जग के कर लिंगे.सोएंगे तो चैन ते.धुकुर धुकुर तो नाय लगी रहेगी कि अब का होयेगो.सो भैय्या चाहे कछु कह लेयो जो मज्जी नाम धरो हम तो ऐसी ही हैं.इतनी बीत गई सो थोडी और बची होयगी वो हू बीत जायेगी.जानो तो हती है हम कौन अमर मूल खाके आये हैं.

   उलायत को तो जे हाल है कि जो काम महीना भर बाद होनो है बाको लेसन प्लान आज ही बन जानो चहिये.एक काम पूरो होय तब तक दूसरे की रुपरेखा दिमाग में गोल गोल चक्कर काटबे लगेगी.जे नाय कि एक काम हे गयो तो नेक देर लोट पीट लेयो,मूड फ्रेश कर लेयो.सो नाय कुचुर कुचुर कछु न कछु काम में जुटे रहो लगे रहो.जा उलायती के दिमाग में इत्ती सी बात नाय भर रही कि उलायत करके कछु मैडल नाय मिल रहो.कछु बढाई नाय मिल रही ,कहुं ऊंचो ओहदा नाय मिल रहो.ऐसे ही सिर्री से लगे रहो काम में.जुटे रहो.यहां तो उरद पे सफेदी हू नाने.काहू ए फर्क नाय पड रह्यो.सब धक्का दे दे के आगे बढे जा रहे हैं और जे उलायती मैया इंच भर हू नाय सरक रहीं.ऐसो ठस्स दिमाग पायो है कि काम तो सबरे कर दिंगी पर अपने मुंहद मियां मिठ्ठू बननो नाय आबे.अपने बारे  में आप ही कहते फिरो कि हमने जे करो वो करो तो जामे कौन बढाई है.अरे तिहारो काम ऐसो होनो चहिये कि दुनिया बाकी चर्चा करे.

काम करबे में उलायती होनो ठीक.होगो पर परिणाम के काजे नेक धैर्य राखिबो चहिये.चक्की थोडे ही है कि इधर से अनाज डालो और उधर से पिस के बाहर निकल आयो.कर्म करिबो तुम्हआरे हाथ है फिर उलआयती करो चाहे सीरे धीरे बने रहो.परफल तो अपने निश्चित समय पर ही मिलेगो.बीज बोओ तो पौधा बनबे में समय लगो करे .दही जमाओ तो नेक देर लगे .जे नाय कि बार बार उघाड के देखबे लग जो कि जमो कि न जबो कि रोज मिट्टी खोद खोद के देख रहे हैं कि जड  जमी   के नहीं ,अंकुर फूटो के नाय.सब होयगो पर समय लगेगो.माली सींचे सौ घडा फल तो रितु पे होय.सो उलायती मैया काम में खूब  उलायत बरतो पर रिजल्ट। तो अपने टैम पे ही निकलेगो.

Sunday, June 16, 2024

क्या मिलिए ऐसे लोगों से

 सफर जारी है....1533

17.06.2024

क्या मिलिए ऐसे लोगों से....

रहते इस दुनिया में हैं तो दुनियादारी तो निभाई जानी जरुरी है.भांति भांति के लोग हैं .परस्पर व्यवहार से ही पता लगता है कि कौन कितने पानी में है.किसके कितने चेहरे हैं,कितने दलबदलू हैं,हां हां सब हो जायेगा कहते कहते कब भितरघात पर उतर आते हैं पता ही नहीं चलता.आस्तीन का सांप होते हैं और आप हैं कि उन्हें पहचान ही नहीं पाते.बस बैठे बैठे सांपों को दूध पिलाते रहते हैं.आप लाख मर्जी दूध पिलाते रहिये पर वे डंसने से बाज नहीं आया करते.क्या करें स्वभाव है उनका और स्वभाव जल्दी ही थोडे छूटता है .अब ऐसों से तो वैर और प्रीति दोनों ही खतरनाक है .काटे चाटे स्वान के दुहुं भांति विपरीत .तो बचे रहिये ऐसों से ,इसी में भलाई है.उदासीन हो जाइये बस.रहिमन ओछे नरन से वैर भली न प्रीत.उन्हें छेडना समझाना ,उपदेश देना आफत मोल लेना है .सीख न दीजे वानरा बया का घर जाये.मालूम चला निकले थे किसी का भला करने और अपना घर ही उजाड बैठे.

      हाईस्कूल इंटर पास करते जो बीजगणित रेखागणित और साइन कोस थीटा सीखा उसका तो पता नहीं ,पर कबीर रहीम सूर तुलसी पंचतंत्र और नीतिकथाएं बहुत काम आई.कभी कभी तो लगता है पैसा कमाने के लिए वह सब पढाई भले जरुरी हो पर जीवन जीने के लिए तो साहित्य ही काम आता है.जीवन के संध्या काल में वापिसी कहानी कैसी स्मृति में उतर आती है.सच.ही ये सब अंक पाने  भर के लिए पढा  भी नहीं जाता.ये जीवन की वह सच्चाई  है जो समय आने पर ही समझ आती है.जिन विषयों को कम महत्वपूर्ण मान कर हल्के फुल्के  ढंग से ले  लिया जाता है ,कम स्कोरिंग स्कोरिंग समझ कर छोड दिया जाता है और सारी की सारी शक्ति अंक बटोरने और उच्च प्रतिशत लाने में लगा दी जाती है उससे बैंक वेलेंस के शून्य भले बढ जाते हों ,घर आधुनिक सुख सविधा संपन्न हो जाते हों पर जीने का सलीका तो कम से कम नहीं ही आता.जीवन भर कमियों का रोना रोते रहते हैं.जो पास है प्राप्य है उस पर कभी दृष्टि जाती नहीं.बस और और का राग अलापते रहते हैं.

औपचारिक शिक्षा लेते कितने कितने महापुरुषों की जीवनी पढी होंगी,पर उनके जीवन से कुछ भी सीख  न लेने की जैसे कसम सी खा रखी थी,बस पढो रटो, परीक्षा की कापी में टीप आओ ,जैसे तैसे पास हो जाओ और सब भूल भुला दो.कक्षा पास तो उस कक्षा की बात बिसरा दो.बस यही सब करते करते पन्द्रह सोलह साल बीत जाते हैं,स्नातक स्नातकोत्तर की उपाधि मिल जाती है.और ऊंची नौकरी करनी हो तो रिसर्च में दोतीन साल और लगा दो.बस जी अब पढाई पूरी हो गई, क्या जिंदगी भर पढते ही रहेंगे.न जी पढ़ाई सढ़ाई तो पूरी हुई. अब पढाई को गुनने का समय है,उसे व्यवहार में लाने का समय है. नौकरी व्यापार करते आप प्राप्त ज्ञान को प्रयोग में ही तो लाते हो.तो बस जिंदगी।  जीते भी नैतिक और सामाजिक   संदर्भों को याद कर लिया करो कि किसके साथ कैसा व्यवहार करना है.जिंदगी को तरीके से जीना आना चाहिये न कि हर समय रोते झींकते  शिकायती स्वर ही बनाए रखो.दुष्टों से फासला बनाए रखिये और सज्जनों से मित्रता कीजिये.उनके साथ उठिये बैठिये,उनसे बातें कीजिये.भाषा की तमीज सीखिये कुशल संप्रेषण के दो चार गुण  सीख लीजिये.उनकी संगत में लाभ ही लाभ है.रुठ जायें तो मना भी लीजिये.रहिमन फिर फिर पोईए टूटे मुक्ताहार. बस ऐसे लोगों से दूरी बनाये रखिये जो गिरगिट सा रंग बदलते हैंऔर अनेक चेहरे रखते हैं.क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी सूरत छिपी रहे,नकली चेहरा सामने आये,असली चेहरा छिपा रहे.दोहरे चेहरे वाले बडे फितरती होते हैं जनाब.

लो कल्लो बात

 [14:18, 16/06/2024] Bina Ji Agra Hindi: सफर जारी है....1532

15.06.2024

लो कल्लो बात ....

 काफी अरसा हो गया कि आभासी पटल से ही पता लगता है कि आज कौन सा दिवस है.आज की  नई खबर क्या  है मौसम का हाल क्या है कहां बारिश होगी और कहां लू चलेगी.कहां कौन जीता है कौन हारा है.कहां बस रेल दुर्घटना हुई और देकान रिहायशी इमारत में आग लग गई, तूफान आया ओलावृष्टि हुई.सारी सूचनाएं  मोबाइल कहे जाने वाली   इस छोटी सी चमकदार डिबिया में आकर केंद्रित हो गई हैं.

.आपके हाथ में मोबाइल हो लैपटॉप या टैब फिर आपको न अखबार न  रेडियो न टेलीविजन न कैमरा न घडी कैलकुलेटर   और  न कलेंडर की  जरूरत रह जाती है. अब सब कुछ एक छोटी सी डिब्बी में समा चुका है.भूत वर्तमान भविष्य बताने में इसका कोई सानी नहीं है.समाचार पत्र की खबरें पुरानी पड जाती हैं इसके आगे.पहले तो सिनेमा हाॅल ही बंद हुए अब तो बाजार भी इसकी हद में आ चुके हैं.आपको कहीं जाने और कुछ करने की कोई जरुरत नहीं,बस फोन के सारे फंक्शंस समझ लीजिये और दो चार एप डाउनलोड कर लीजिये.जिंदगी बहुत आसान हो जायेगी.

पर ये आधा अधूरा सच है .भर भर झोली सामान भले हो प मन बहुत खाली हैं.पिता दिवस पर शुभकामना संदेशों की बाढ तो निश्चित है पर बहुत से पिता घर से बाहर कर  धकिया दिये गये है . यदि उन्हें वृद्धाश्रम में नहीं धकेला गया है तो ज्यादा इतराइयेगा मत ,घर पर ही उन्हें अजनबीपन अनुभव कराया जा रहा है कि अब तुम्हारे दिन लद गये.एक कोने में चुपचाप पडे रहो.दोटाइम की रोटी दे दी जायेगी.वह व्यक्तित्व जिसकी धमक से घर गुंजार रहता था जिसने एक एक ईंट जोड खाली प्लाॅट को अपनी मेहनत मजदूरी से घर बनाया था आज अपने ही घर में वह फालतू आइटम सा हो गया है.बडे किस्मत वाले होते हैं वे पिता जिनकी संतान पिता का अदब करना जानती है,जो पिता का सम्मान करना जानते हैं ,उनके साथ बेअदबी नहीं करते,बात।             ष बात में झल्लाहट नहीें  झूटती.घर से बाहर निकलते जो पिता को प्रणाम कर पैर छू उनका आशीर्वाद लेना नहीं भूलते.पिता स्वर्ग है पिता प्रीति है.हमारा अस्तित्व पिता से है ,पिता है तो हम हैं.वही हमारा पालक है.मां का लाड दुलार दिखता है पिता कहता भी कम है और जतताता भी कम है.ऊपर से नारियल सा कठोर क्यों न हो पर अंदर से गिरी सा मुलायम और मीठा होता है.

ये सब खुद पिता होते अनुभव होता है .हमारे अपने पिता के साथ जो भी आचरण रहे हों  हमें रत्ती भर  फर्क नहीं पडता .पर वही सब कुछ हमारे साथ दोहराया जाता  है तब बड़ी पीडा होती है.ये तो परिवार के संस्कार हैं जो एक.पीढी से दूसरी में ट्रान्सफर होते हैं.आज का सच ये है कि परिवार के साथ साथ आसपड़ोस और मित्र मंडली और उस सबसे अधिक जैसे परिवेश में वे चौबीस घंटे रहते हैं जैसा दिन भर देखते सुनते हैं वही वाक्य सांचे उनके मन मस्तिष्क में फीड हो जाते हैं.पिता केवल.सुविधा प्रदाता.भर नहीं होता .वह आपको संस्कारित भी करता है.दुनिया का हर पिता अपनी परिस्थिति में बेस्ट करता है पर हर पीढी को पिता से कुछ न कुछ शिकायतें रह ही जाती हैं और वह प्रण लेता है कि मैं अपनी संतान को किसी भी  बात की कोई कमी नहीं रहने दूंगा .सामर्थ्य भर सब करते हुए भी कुछ न कुछ छूट ही जाता है और बच्चों के मन में असंतोष पनपता है कोई न कोई गांठ रह ही जाती है.शायद यही चक्र है संसार का..अपनी बात करें तो सीमित साधनों में पिता ने हम बच्चियों के लिया सच में उनकी सामर्थ्य से कहीं बहुत अधिक था.बस एक ही कसक रह गई कि जिंदगी भर झोली फैलाए लेते और लेते रहे.पिता जो थे वे और वह भी उस पीढी के जिसमें बेटी के घर का पानी पीने में भी गुरेज था.संतति पिताओं को भला क्या दे पायेंगी उनके लिए तो इतना ही बहुत है कि वह उनका आदर  मान बनाये रख सकें.लो और कल्लो बात  शुभकामनाएं दो मत दो पर  उनके प्रति सम्मान आदर भाव हमेशा बनाओ रखो.उनके साथ तमीज से पेश आओ,संयत और मर्यादित भाषा का प्रयोग करो.चीखो चिल्लाओ मत .आखिर वे आपके पिता हैं.

मुक्ति के मायने

 सफर जारी है....1531

11 06.2024

मुक्ति के मायने....

सा  विद्या या विमुक्तये से प्रारम्भ होकर वित्त से मुक्ति नहीं होती पढते समझ में भरता है कि हम सभी जीवन में कभी न कभी मुक्ति के अभिलाषी होते हैं.अब ये अलग बात है कि हम जीवन मुक्ति की कल्पना न कर कभी दायित्वों से मुक्ति चाहते हैं तो कभी   पद विशेष और रिश्तों से.यानी जो जो मन मुताबिक न हो,हमारे कंफर्ट जोन में न आता हो,काम करते नानी मरती हो,छठी का दूध याद आता हो ,दायित्व निभाने में श्रम लगता हो वहां से हम कन्नी काटते हैं और उससे मुक्त होना चाहते हैं. यह जानते हुए भी कि जब तकजीवन है हमें कुछ न कुछ करते रहना चाहिए, हाथ पैर चलते रहने चाहिए.ठाली बैठे दिमाग  को जंग लग जाती है,हाथ पैर जाम हो जाते हैं  और खाली मस्तिष्क शैतान का घर हो जाता है.खाली पडे खेत में कुछ बोया न जाये तो खर पतवार उग आती है. 

रोजी रोटी और आजीविका कमाने  के लिए हर व्यक्ति  कुछ न कुछ तो करता ही है.वृद्धावस्था के लिए  कुछ जोड बचाकर भी रखता है कि जब हाथ पैर नहीं चलेंगे तब भी पेट की आग तो शांत करनी होगी.हारी बीमारी में औषधि पथ्य भी जरुरी होगा.इस सबकी भरपूर व्यवस्था हो  तो भी दिमाग को व्यस्त रखने के लि दिमागी खुराक बहुत जरुरी होती है.सेवा मुक्ति जीवन का आवश्यक पडाव है पर इसके आगे भी यात्रा चलती रहती है.आप अपने को केवल एक कार्य से दूसरे में स्विच ओवर करते हैं.आपकी प्राथमिकताएं बदल जाती हैं.अब आप किसी सरकारी ,गैर सरकारी तंत्र के बाशिंदे नहीं होते.आपको किसी बाॅस को  हर शाम रिपोर्ट नहीं करना होता .भले ही आप स्वतंत्र हो किसी कार्य दायित्व के सीमा घेरे में न आते  हों पर जिस घर के आप स्वामी हैं  जहां आपके जीवन का चौथापन बीतना है उसकी  प्रतिबद्धता से मुक्त नहीं हो सकते.आपको और सजग होकर जीवन बिताना होता है.अपने को सहेजना होता है.अब किसी दूसरे को स्पष्टीकरण  नहीं देना होता पर अपने मन को दिल को जबाब देने के दायित्व से आपको मुक्ति कभी नहीं मिला करती.सेवाकाल में आपका अपने सहयोगियों के साथ किया गया व्यवहार और आचरण ही आपकी साख बनता है.

मास्टरी का प्रशिक्षण लेते बार बार रेखांकित किया गया कि कक्षा में  पढाने जाने से पूर्व  पाठ योजना का न केवल निर्माण आवश्यक है बल्कि उसका अक्षरश:पालन भी आवश्यक है.इसके बिना शिक्षण पूर्ण नहीं होता.बिना ब्लू प्रिन्ट के कच्चे खाके के नक्शे के कोई इमारत खडी नहीं होती .आप दुकान जमीन प्लाॅट खरीदते और उस पर भवन ,आवास या काम्प्लेक्स बनबाते अपनी जमा पूंजी और अपनी भविष्य गत आवश्यकताओ का ध्यान रखते हैं .तो सेवा निवृति के बाद की  योजना का खाका बनाने में क्यों चूक जाते। हैं.दिन भर के भोजन तक की व्यवस्था के मीनू। और। सामान्य से दिन के कार्यों की रुपरेखा तय  करने  तक में जिसका।  दिमाग कंप्यूटर की गति सा तेज चलता हो जो अपने सहयोगियों और अधीनस्थों को अल्सुबह ही दिन भर के कार्यक्रम का ब्यौरा व्हाट्सएप कर देता हो क्या उसने अपने  जीवन के तीसरे प्रहर की कोई योजना परिकल्पित नहीं की होगी.हां अक्सर ऐसा होता है कि व्यक्ति बाहर दीपक जलाता घर  की देहरी ही भूल बैठता है.उसे याद ही नहीं रहता कि घर की देहरी रोशन कर ही बाहर दीया जलाया जाता है. 

मुक्ति की चाह सबको होती है पर जब तक जीवन है उसके दायित्वों से मुक्त नहीं हुआ जा सकता.हां दायित्व निभाते निस्पृह  और निर्लिप्त रहने की कला को सीखा जा सकता है,जल में कमलवत रहने की विद्या  सीखी जा सकती है.रहो संसार में ऐसे कमल रहता है पानी में.काम सब करो पर निर्लिप्त भाव से.छोडने में  एक क्षण  भी न लगे.बस तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा कहते ही मुक्त हो जावे.मुक्ति की चाह सबको भले हो पर  सब  मुक्त होने की कला में प्रवीण नहीं हुआ करते.अब यदि मुक्त ही होते तो  किसी से बात  पद नाम का पुछल्ला बात बात में क्यों लगाते.इतना ही क्यों,  आवास के मुख्य द्वार पर टंगी नाम पट्टिका में उस सबका बाकायदा उल्लेख होता है.एक तरह से वही परिचय होता है हम सबका.

सच तो यह है कि मुक्त होने के मायने ही बदल गये हैं.विद्या की जो परिभाषा हमें सौंपी गई थी सा विद्या या विमुक्तये उसके गहरे निहितार्थों की घोर उपेक्षा की गई।जैसे जैसे उपाधियों के अंबार बढे हम और बंधनों में जकडते चले गये.डिग्री डिप्लोमा केवल आजीविका के साधन बन कर रह गये.वित्त से मुक्त नहीें होती, जानते हुए भी जीवन भर धन संचय के प्रयास ही तो किये जाते हैं.बडी जल्दी चिपक पैदा हो जाती है और उससे उबरते पूरा जीवन ही बीत जाता है.बस मुक्ति के जो मापने ही समझ आ जाएं तो काहे का झंझट..हाथ हिलाते आएं,अपना काम करें और फिर मुक्त भाव से अपने अपने स्थान लौट लें. आ अब लौट चले

बोलते बतराते रहिये जनाब

सफर जारी है......1530

09.06.2024

बोलते बतराते  रहिये जनाब....

डिजिटल साधनों के चलते फिर चाहे स्मार्ट फोन हो टेबलेट  हो लैपटॉप हो कंप्यूटर हो या अन्य कोई और साधन ,सोशल मीडिया पर उपस्थिति बहुत जता ली,दिन भर मोबाइल पर दुनिया जहान की राजी खुशी लेते रहे,देश की राजनीति पर दंड पेलते रहे ,फेसबुक व्हाटस इन्स्टाग्राम पर अपने को जताते बताते रहे ,पुराने मित्रों को खोज खोज कर खैर खबर लेते रहे पर इस सब के बीच बिलकुल पास बैठे व्यक्ति को बिल्कुल भुला दिया गया .गूगल से पुरानी रिश्तेदारियां तो खोजी जाती रहीं पर जीते जागते इन्सानों  और  आपसदारी के रिश्तों से  गुफ्तगू तक के समय का टोटा पड गया.सफर पर निकलते रास्ते भर दुनिया भर के लोगों से लंबी  बातचीत तो होती रही पर साथ में बैठे व्यक्ति उपेक्षित होते चले गये. ढेरों दृश्य कैमरे में कैद होते रहे पर प्रकृति के सुंदर नजारे देखने उन्हें आंखों में कैद कर लेने के सौभाग्य से वंचित रह गये.बस यही सोचते रह गये कि तसल्ली से बैठकर देखेंगे. पर जीवन की आपाधापी और व्यस्तता के  चलते कभी सुकून के दो पल नसीब न हो पाये या हम ही बेहद बिजी होने का   बाना ओढे उन फुरसत के पलों को धकियाते रहे. अपने को फोन के स्क्रीन में ऐसा कर लिया  किया कि बस पूछो ही मत.सोशल मीडिया  और देश की राजनीति में ऐसे खो गये कि संबंधियों और इष्ट मित्रों का कोई ख्याल ही नहीं रहा.नतीजन चार अपनों को छोडकर पूरी दुनिया जेब में लिये घूमते हैं.फेसबुक पर पांच हजार  से ऊपर की मित्रता सूची देख फूले नहीं समाते.मार इतराते डोलते हैं और भाई भाई के मध्य ,भाई बहिन, माता पिता संतानों के मध्य इतनी दूरी  इतनी बढ गई है कि एक दूसरे को जन्म दिन और वैवाहिक वर्षगांठ की बधाई भी पटल पर समूह में देते हैं.

 संवाद हीनता इतनी अधिक बढ चुकी है कि एक ही घर परिवार के चार सदस्य चार अलग अलग कमरों में बैठे चैट बाक्स में या संदेश में बधाई लिख कर भेजते हैं.सुप्रभात और शुभ रात्रि के मैसेज भेजते रहते हैं.अकर्मण्यता का आलम यह है कि अपने सुविधा जोन को छोड कर दूसरे कमरे तक जाते प्रणाम करते नानी मरती है.अरे चार कदम चलकर बडे बुजुर्गों को प्रणाम कर लोगे तो आशीर्वाद ही पाओगे.ज्ञान गंगा में ही नहाओगे.

    मोबाइल का नशा सिर चढ कर बोलता है कि यदि घंटे दो घंटे मोबाइल न मिले तो लगने लगता है दुनिया ही समाप्त हो गई.अब क्या करें.करने के लिए कुछ बचा ही नही.मार बैचेनी होने लगती है लगता है कुछ बहुत जरुरी छूट गया है..ब्लू टिक आंखों के आगे घूमते रहते हैं .पैर हिलना शुरु हो जाता है.दस मिनट में ही लगने लगता है कुछ खो गया है हमारा.उस मध्य बैचेनी का ऐसा आलम होता है कि दुनिया ही ठहर गई हो हमारी.किसी से बात करने का मन ही नहीं होता हमारा.बस जैसे खुशियों की सारी चाबीं इस मुए मोबाइल में बंद हो.हवा के बिहना सांस लेना संभव भले हो पर मोबाइल के बिना जिंदगी बेकार हो जाती है.हमने अपने चारों और तंत्र का ऐसा वितान तान रखा है कि उसके बिना जीने की कल्पना ही नहीं कर पाते.यंत्र की सुविधा आपसी संबंधों को मजबूत करने के लिए थी उनसे दूरी बढाने और उन्हें भुला देने बिसारने के लिए नहीं.पाया बहुत कुछ निश्चित ही होगा पर जो महत्वपूर्ण खोया है उसका अंदाजा भी नहीं है हमें.हमारी श्रवण दक्षता कुशलता का रेट भले बढा हो पर हमें बतराने बोलने की आदत ही नहीं रही.दिन दिन भर बस कानों में लीड लगाये उल्टा सीधा सुनते  ही तो रहते हैं. कोई  कुछ पूछे तो जबाब देने के लिए  समय नहीं होता.अगला बात करने बैठे तो हम कह देते हैं कि क्या बात करें.निजी संबंधों में बातों का खजाना चुक जाये और आपको बात करने के लिए विषय खोजना पडे इससे अधिक लाज की बात और क्या होगी भला.

बोलने बतराने के अपने सुख हैं.आप रिलीज होते हैं अपने को बांटते है शेयर करना सीखते हैं.बात तो किसी भी विषय पर की जा सकती है.याद आता हैहऔर जब महीने पन्द्रह दिन में पडोसियों से मिलने बात करने जाया जाता था और परिवार के सदस्यों से तो किसी भी समय बात की जा सकती थी.मां बाकायदा शाम के समय बच्चों के साथ बात करने बैठती.कितने किस्से कहानी बुन सुन गुन लिए जाते.परिवार के किस्से साझा होते.पिता के साथ यात्रा में बातों के खजाने खुलते.उनके बचपन की कहानी सुनते.स्थानों के विवरण साझा किये जाते.बात बात में जरुरी सीख हम बच्चों को दे दी जाती.उस समय की बात बात में बताई गई सीख जीवन का पाथेय बन गई हैं.बिजली चले जाने पर चारपाई घेर हम भाई बहिनों की बातें उस समय तक चलती रहतीं जब तक बिजली रानी का पुनरागमन न हो जाता या किसी जरुरी काम के लिए उठने की आवाज न लग जाती.आज जिस बतराने को हद दर्जे की बेबकूफी कहा जाता है वह व्यक्तित्व विकास का जरुरी सोपान था.आपके बात करने के तरीके से आपके विषय  ज्ञान और संप्रेषण  योग्यता की पहचान होती थी.आप अपने को मांजते थे.बहुत कुछ सीखते थे.जब से बातों का सिलसिला खत्म हुआ बहुत कुछ पीछे छूट गया है.सब कुछ बस एक मोबाइल के बंद  डिब्बे में कैद होकर रह गया है.

आप खूब खूब एडवांस बनें, खूब यंत्र तंत्र का प्रयोग करें पर उसकी अति खतरनाक है.अति का बोलना ठीक नहीं तो चुप्पी भी खतरनाक है.बोलते बतराते रहिये.कुछ अपनी कहिये कुछ दूसरों।  की सुनिये .बस मोबाइल में सिर दिये मत बैठे रहिये.इससे इतर भी जीवन है.बतरस लाली लाल की.

जमाना हुनरमंदो का है

सफर जारी है....1529

08.06.2024

जमाना हुनरमंदो का है....

जीवन में आगे बढना है तो कोई न कोई हुनर तो होना ही चाहिए आपके पास मसलन खाना बनाना ,गाना बजाना, अभिनय ,नृत्य, हंसना  हंसाना, वक्तृत्व कौशल  ,पढना पढाना ,सुलेख ,लेखन दक्षता,दौडना भागना ,मिमिक्री करना.ये सब सकारात्मक कुशलताएं हैं .यदि इनमें से किसी पर भी दखल नहीं तो फिर चोरी चकारी , कटु आलोचना, दूसरों को परेशान करना, कमी निकालना ,हमेशा अगले को दोषी ठहराना, बात बात पर  सबकी खिल्ली उडाना, इसकी टोपी उसके सिर रखना जैसी बातों में भी आपकी निपुणता  और दक्षता हो सकती है.जो भी हो, कुछ न कुछ तो  ऐसा आप में  होना ही चाहिये जो दूसरों से हटकर हो और आपको विशिष्ट बनाता हो.कुछ अपनी बेबकूफी, सिधाई और भोलेपन के कारण चर्चा में होते हैं तो कुछ अपनी धूर्तता, चालाकी और बदमाशी के कारण बाजी मार ले जाते हैं.कुछ धन के घमंड में इतने चूर होते हैं कि उनका सब काम पैसों के जोर पर हो जाता है  और कुछ सिफारिश के बल पर अपनी नैया खे ले जाते हैं.

    पैसों की माया बहुत जादुई है.जो काम हुनर से एक बार को भले से न हो पर पैसों और सिफारिश के बल पर सब सध जाता है.तो आपके पास पैसा हो या सिफारिशी हथकंडे हों तभी जीवन की नैया पार लगती है.अब न पैसा न सिफारिश तो ऐसे व्यक्तियों को तो अपने हुनर से ही जग जीतना होता है.जग जीते न जीतें पर जीवन तो बिताना होता है.और जीवन का  क्या है वह तो लस्टम पस्टम बीत ही जाता है.बीतती  तो सीधे सादों की भी है और तेज तर्रारों की भी है.रोना झींकना तो उनका है जो घोर अभावों में ही  बडे सपने देख लेते हैं.विपरीत परिस्थिति और हवा में काम करने के आदी होते हैं.हवा के साथ रुख नहीं बदलते बल्कि विपरीतता को धकियाते आगे बढते हैं.आप समझ सकते हैं कि हवा का रुख अनुकूल न हो तो पतवार खेने में बल अधिक लगता है.पांच मिनट

की दूरी पचास मिनट में तय होती है.बेकार के झंझटों से निबटने में समय लग जाता है.

तीसरे पडाव पर जाकर ये सब समझ में भरता है पर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.जीवन का स्वर्णिम काल जब मन और तन जोश से भरे होते हैं,भूडोल को गोल गोल घुमाने का साहस होता है,आग अंतर में लिए पागल जवानी और लाल चेहरे हैं नहीं फिर लाल किसके पंक्तियों को जीने और कुछ कर गुजरने का समय होता है वह सारा का सारा चुरकुट कामों में निकल जाता है.तेरे मेरे के झंझटों की भेंट चढ जाता है.जिन बेकार के कामों के लिए ये बेशकीमती  और गोल्डन  समय  बरबाद किया जाता है उसकी कीमत  बाद में पता चलती है पर तब तक सब बीत चुका होता है.केवल हाथ मलना भर  शेष रह जाता  है.तो जीवन के लक्ष्य तीसरे पन में निर्धारित नहीं किये जाते .उन्हें तो जीवन प्रारम्भ होते ही तय कर लिया जाता है कि करना क्या है। .तरह तरह के हुनर बचपन और युवावस्था में ही सीख लिये जाते हैं.बाद का समय तो उनमें निखारने के लिए होता है.अब समझ आता है मां जो बचपन में जरा खाली समय मिलते ही सुई डोरा, ऊन सलाई , क्रोशिया, टाट पे कढ़ाई  और  कुछ नहीं तो ढोलक बाजा हाथ में पकडा देती या बेकार  पडे सामान से कुछ नया और सार्थक बनाने को पकडा देती  मसलन कपडे से गुडिया बनाओ या मोजे से खरगोश.रूई से बतख ,तार से कुत्ता बिल्ली,मैक्रम से वाल हैंगिग या सुतली से  छींका स्टेंड.गर्मियों भर अचार मुरब्बे चटनी पापड बडी की रेसेपी सिखाई जाती रही.तब हाॅबी क्लासेज और समर कैम्प भले से न लगते हों पर परिवार में माताएं ताई चाची भाभी जीजी मौसी ये सब हुनर सिखा देती थीं.ऐसा नहीं था कि तब पढ़ाई  का स्तर निम्न था या  पढाई सरल थी .बस पढाई अपनी जगह थी और जीवन जीने के हुनर अपनी जगह.दोनों का साथ चलना जरुरी था.छोटे मोटे काम तो हर व्यक्ति की पहुंच में थे और छोटी मोटी बीमारियों के लिए घरेलू नुस्खे कारगर थे.बात बात पर डॉक्टर दर्जी बढई  इलेक्ट्रिशियन प्लम्बर को बुलाना जरुरी नहीं था.खाट की अदवायन कसनी हो या पाये सीधे करने हो ,पाटी  के बीच खपच्ची ठोकनी हो.कपडो की मरम्मत हो सब घर के लोग ही कर लेते थे..जिस कौशल विकास, योग्यता संवर्धन, क्षमता विकास और मूल्यपरक शिक्षा के पाठ्यक्रम में समावेश की  माथापच्ची की जा रही है वह नये कवर में पुराना ही माल पैक कर थमा दिया गया है.वह स्टाम्पड है इसलिए स्वीकार है.हमारे पूर्वज पुस्तक को पाठ्यक्रम से देश निकाला देकर अब भारतीय ज्ञानपरंपरा और कला संस्कृति में स्नातक स्नातकोत्तर पीजी डिप्लोमा की शुरुआत  जारी है.

तो जरुरत हुनरमंद बनाने की है न कि किताबी कीडा और सूचनाओं के बोझ से लादने की.बने रहिये हुनरमंद और अपने आसपास भी निखट्टुओं की बजाय हुनरमंदों की फौज तैयार कीजिये.

प्रेरणास्पद व्यक्तित्व....

01.06.2024

प्रेरणास्पद व्यक्तित्व....

लोकमाता पुण्य श्लोक देवी अहिल्याबाई होलकर का तीन सौवां जयंती वर्तमान कई धूम है.दो दिन पूर्व जुलाई 31को देश भर में उनके जयंती समारोह बहुत धूमधाम से बनाये गये हैं.वे  समाज के किसी एक वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करती अपितु भारत की हर  उस महिला वर्ग की प्रतिबिंब है जो ग्रामीण परिवेश में पली बढी होकर पिता के द्वारा पोषित संस्कारों की धरोहर को सहेजे किसी कुलीन वंश की बहु बनती हैं और पुत्री पवित्र किये कुल दोऊ की उक्ति को साकार करती हैं.पाटिल परिवार के संस्कारों की धरोहर को सहेजती संभालती हैं और श्वसुर कुल की कीर्तमें भी चार चांद लगाती हैं.महाराष्ट्र और मालवा के मध्य सेतु बनती है.पिता उस काल में भी उन्हें शिक्षा दिलाने का साहस रखते हैं जब महिलाओं के लिए शिक्षा के रास्ते खुले नहीं थे और श्वसुर मल्हार राव होल्कर चार हाथ आगे बढ कुलवधू को राजकाज में दीक्षित करते हैं.होलकर परिवार की पुत्रवधू  न केवल  कुशल तीरंदाज है बल्कि हाथी पर बैठ कर दुश्मनों के छक्के छुडवाती है विरोधियों के बीच  अपना लोहा मनवाती है.

दूरदर्शी है.विरोधियों को पटखनी देना जानती है.पति और श्वसुर के मृत्यु दुख से व्यथित   जरुर है पर जब उसे पता चलता है कि पेशवा उसके राज्य पर आक्रमण करने की योजना में है तो अबला स्त्री की तरह विलाप करने नहीं बैठ जाती वरन उन्हें पत्र ख ये अहसास करा देती है कि आप युद्ध करने पर आमादा हैं तो आइये मेरी स्त्री सेना आपका डटकर  मुकाबला करेगी पर आप विचार कर लें कि आप जीतें या हारें दोनों तरफ से आपको अपयश ही मिलना है.बात पेशवा को समझ आ जाती है और इस तरह कुशल प्रशासिका बिना लडे ही युद्ध जीत जाती है.संतान को प्यार करना और उसके मोहाविष्ट हो धृतराष्ट्र जैसा आचरण करना बात है.माता अहिल्याबाई अपने पुत्र मालेराव और पुत्री से अपार स्नेह करती है पर राजमाता होने के गौरव को भी नहीं भूलती.पुत्र के रथ से एक बछडे के मर जाने और उसकी माता गाय के अश्रुपूरित नयनों को देखकर इतनी विचलित हो जाती हैं कि पुत्र के लिए मृत्युदंड की घोषणा करते विचलित नहीं होतीं.ये अलग बात है कि गाय के बार बार रास्ता रोकने पर और प्रजा के आग्रह पर वे उसे क्षमादान दे देती हैं.

उनके जीवन के प्रसंगों को पढते लगता है कि  बिना सेवाभावी हुए कोई  मंदिरों  धर्मशालाओ का निर्माण पुनर्निर्माण नहीं करवा सकता.परम शिव भक्त कि उनकी पूजा अर्चना किये जल की बूंद गले से नीचे नहीं उतारतीं.राजाज्ञा के नीचे श्री शंकर ही लिखा जाता रहा.मुद्रा पर नंदी और बेलपत्र उकेरे गये.आध्यात्मिक इतनी कि हमेशा भरोसा बना रहता कि प्रभु का हाथ हमारे ऊपर है.उनकी छत्रछाया में हम महफूज  हैं.धर्म के जिन दस  लक्षणों की चर्चा मनुस्मृति में वर्णित है  धैर्य ,क्षमा ,दम ,अस्तेय, शौच, इन्द्रिय निग्रह, धी ,विद्या ,सत्य और अक्रोध उनका समवेशित रुप रूप लोकमाता अहिल्याबाई के चरित्र मे देखने को मिलता है.महिला सशक्तिकरण के जिन संदर्भो को आज हवा दी जारही है कि कामकाज और आगे बढने में साडी परिधान  बाधक है और सिर पर पल्लू लेना पिछडे पन का  सूचक है उसी साढे पांच गज की सडी को पहन सिर पर पल्लू डाले वे कुशल प्रशासिका का खिताब पाती हैं और तीन सौ वर्ष बाद भी अपनी उपस्थिति जोरदार तरीके से दर्ज कराती हैं.आज की युवा होती बच्चियों कोज उनके जीवन के प्रसंगों को पढना और उनके आदर्शों को जीवन में उतारना बहुत जरुरी है.इन प्रेरणास्पद चरित्रों की जीवनी साल में एक बार  जयंती समारोहों में बताया जाना ही काफी नहीं है .इन्हें पाठ्यक्रम  के रुप में रखा  जाना और  सत्साहित्य के रुप में पढा जाना बहुत जरुरी है.देश को आगे बढाना है तो ऐसे सेवाभावी नागरिक गढने बहुत जरुरी हैं जो स्व का बलिदान कर भी राष्ट्र रक्षा के लिए समर्पित हों.घर पास पडोस  समाज जिला राज्य प्रदेश अगली इकाई के रुप में राष्ट्र आता है.जो राष्ट्रवादी हैं वे वसुधैव कुटुम्बकम का स्वप्न देखते हैं और विश्व में मानव धर्म के पोषक होते हैं.घर की नस्लों को सुधारिये.देश तो स्वत: मजबूत हो जायेगा.

पहले तपो तो सही...

सफर जारी है...1527

29.05.2024 

पहले तपो तो सही...

जिन्हें आराम की जिदगी रास आ जाती है वे तपना नहीं जानते.बस पशु जैसी वृत्ति अपना कर अजगर से मस्त पडे रहते हैं.ज्यादा ही गुनगुनाने का मन  हुआ तो मलूक दास  को दोहरा लेते हैं  अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम .काम धाम तो सब होता रहेगा.पहले आराम जरूरी है. काम तो कोई न कोई कर ही देगा .काम भला कब पडा रहता है और  एक किसी के न करने पर रुकता भी नहीं .जिन्हें घोडे बेचकर सोना हो,  शौक से सोते रहें.बस ये ध्यान बराबर बना रहे कि सफलता उन्हीं के कदम चूमती है जो हाड तोड परिश्रम करते हैं.एक छोटे शहर की नैन्सी  त्यागी अपनी मेहनत के बल पर कान फेस्टिवल  जा पहुंचती है और रेड कारपेट पर स्वयम का डिजाइन किया और सिला हुआ गाउन पहन कर  चलती है .लोगों के संज्ञान में आती है और सिलेब्रिटीज की श्रेणी में गिनी जाने लगती है.कल उसके कुछ  साक्षात्कार देखते पुन:यह धारणा दृढ हुई कि बडे बनने के लिए बडे सपने देखने होते हैं और उन्हें पूरा करने के लिए एडी चोटी का जोर लगाना होता है.निरंतर काम करना होता है.विपत्तियों और कठिनाईयों से घबरा कर बैठ जाना नहीं होता बल्कि उसी के बीच रास्ते निकालने होते हैं.थक हार कर बैठ जाना नहीं होता,हाथ पैर नहीं छोड देने होते .अपनी कमजोरियों और विशेषताओं को समझना होता है.कमजोरियों को दूर करना होता है और विशेषताओं हथियार बना कर जीवन संघर्ष में सफल होना होता है. जो कोशिश करते हैं उन्हें सफलता भी मिलती ही है भले पहले प्रयास में न मिले और कई कई   प्रयास क्यों  न  करने पडें.

      गर्मी के बाद बरसात और फिर जाडे की रुत आती है.जेठ मास के नौतपा खूब तपते हैं तब जाकर कहीं मानसून  की आहट होती है .अब बैशाख जेठ न तपे तो सावन भादों की झडी कैसे लगेगी.आदमी का क्या उसे तो गरमी में गरमी, सर्दी में सरदी लगेगी  ही और बारिश में चाय पकौडे की तलब लगेगी .उसकी तो आदत में है  कि तापमान घटते बढते  स्वर  शिकायती बनाये रखो. अपने लिए कैसे भी सुख के साधन जुटा लो.अपने घर की गरमी को यंत्र लगाकर बाहर फैंको.पर पेड लगाने का यत्न मत करो.अब पेड ऐसे ही थोडे लग जाते हैं .उनकी बच्चों सी नीठ करनी होती है.समय समय पर खाद पानी देना होता है .धूप ताप से बचाना होता है .उनकी प्रकृति देखकर कभी छये में तो कभी प्रकाश में रखना होता है.पिता के हाथों रोपे पीपल सरिस  की विशालता उसकी ठंडी छांव का आनंद तो खूब लिया जी भर सावन के झूलों का आनंद लिया पर एक पौधा भी ऐसा नहीं रोप पाये जो आगे की पीढी को विशाल वट सी शीतल छांव दे पाता.

      फ्लैट कल्चर के चलते अब पेड का स्थान कमरे में  रखे सजे गमलों के सजावटी पौधों और बोनसाई ने ले लिया है.उसी में सब अगन मगन हैं.करें भी क्या.पेड तो पेड ,अब तो आदमी की फसल भी बोनसाई होती जा रही है.कहां रही विशालता मनों में .बस अपना अपना देख लें वही बहुत है.बिजली का जितना मर्जी संकट हो पर सबको अपने अलग अलग अलग कमरे पूरी सुख सुविधा के सक चाहिए ही चाहिए. पर्सनल स्पेस जैसी भी कोई चीज होती है.शेयर करने की वृत्ति का सर्वथा ह्रास होता जा रहा है.अब वे दिन  हवा हुए जब कहलाने एकत बसत अहि मयूर मृग बाघ.जगत तपोवन सो कियो दीरघ दाघ निदाघ लिखा जाता था.जेठ की तपती दुपहरी को देख पंक्तियां याद आ रही हैं देख दुपहरी जेठ की छांह चाहत छांह.अब जेठ तो जेठ हैं बडे हैं आखिर तो जीवन सहचर  के बडे भाई ठहरे.तो कितने भी फैशनेबल हो जाओ धूप ताप से बचने को सिर और चेहरा दोनों  ढके रहते हो.

ये तपने का समय है तपोगे तो बारिश का भी आनंद लोगे और सरसोगे भी. सूरज देवता अब नौतपा में प्रखर नहीं होंगे तो कब होंगे. तो सूरज देवता तुमहु तपो और सबन ने खूब तपाओ.तप कआ अर्थ ही कष्ट सहना है जो सह जाता है वह बन जाता है.तपोगे तो सरसोगे भी और खूब बरसोगे भी.

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...