Tuesday, June 18, 2024

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533

18.06.2024

इत्ते उलायती हू मत बनो....

बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडबे बिठालो तो एक साल में दो दओ क्लास लांघ मारी.सबरी बी ए एम ए बीएड एमएड चुटकी बजाते कर डाली.मौको लग गयो तो पी एच डी हू कर डाली.इनके उलायतीपन की कछु मत पूछो बस में सबसे पहले बैठिंगे और उतरबे के बिरिया हू सबन ते पहले गेट पे ठाढे हे जांगे.कहूं गीतन सीतन में जानो होय तो ढोलक के ढिंग बैंठिंगे.सबके ध्यान में आ जाने चहिये कि हम हतें.पढबे कू गये तो सबते आगे की सीट पे बैठनो है बस रेल में खिडकी की सीट चहिएजे समझ लेयो कि जहां जानो वहां नंबर एक पे ही रहनो. उलायती ऐसे कि मुंह ते बात बाद में निकरे काम पहले हे जायगो.

अब तीसरो पन आ गयो पर उलायत से पीछो नाय छूट रहो.सुबह पैर पसारे तब तक तो सब रजको तज करके धर देनो.जे वही ना सल पडे कि ऐसे उलायती सोबे कौन से खन करे.दस से पांच की सरकारी चाकरी हंसी खेल नाय होय करे कि गये और देहरी छू के भाज आये.मगज मारनो पडे.ऐसे ऐसेन ते झड्ड लेनी पडे कि कछु पूछो ही मत .पहले  वहां मगज खप्पी करो और फिर आ के सपेरा समेटो.सबन ने मालूम है करेगी अपे आप.वाहे तो करबे को शौक है.करे बिना निठे नाय बाकी.बाय चहिये सबरो रज की तज,सब काम टैम ते हे जानो चहिये.पेंडिंग  रखबो पसंद नाय.और काहे कू कल कू छोडे,निबटानो तो हमें ही है.तो नेक देर सबेर जग के कर लिंगे.सोएंगे तो चैन ते.धुकुर धुकुर तो नाय लगी रहेगी कि अब का होयेगो.सो भैय्या चाहे कछु कह लेयो जो मज्जी नाम धरो हम तो ऐसी ही हैं.इतनी बीत गई सो थोडी और बची होयगी वो हू बीत जायेगी.जानो तो हती है हम कौन अमर मूल खाके आये हैं.

   उलायत को तो जे हाल है कि जो काम महीना भर बाद होनो है बाको लेसन प्लान आज ही बन जानो चहिये.एक काम पूरो होय तब तक दूसरे की रुपरेखा दिमाग में गोल गोल चक्कर काटबे लगेगी.जे नाय कि एक काम हे गयो तो नेक देर लोट पीट लेयो,मूड फ्रेश कर लेयो.सो नाय कुचुर कुचुर कछु न कछु काम में जुटे रहो लगे रहो.जा उलायती के दिमाग में इत्ती सी बात नाय भर रही कि उलायत करके कछु मैडल नाय मिल रहो.कछु बढाई नाय मिल रही ,कहुं ऊंचो ओहदा नाय मिल रहो.ऐसे ही सिर्री से लगे रहो काम में.जुटे रहो.यहां तो उरद पे सफेदी हू नाने.काहू ए फर्क नाय पड रह्यो.सब धक्का दे दे के आगे बढे जा रहे हैं और जे उलायती मैया इंच भर हू नाय सरक रहीं.ऐसो ठस्स दिमाग पायो है कि काम तो सबरे कर दिंगी पर अपने मुंहद मियां मिठ्ठू बननो नाय आबे.अपने बारे  में आप ही कहते फिरो कि हमने जे करो वो करो तो जामे कौन बढाई है.अरे तिहारो काम ऐसो होनो चहिये कि दुनिया बाकी चर्चा करे.

काम करबे में उलायती होनो ठीक.होगो पर परिणाम के काजे नेक धैर्य राखिबो चहिये.चक्की थोडे ही है कि इधर से अनाज डालो और उधर से पिस के बाहर निकल आयो.कर्म करिबो तुम्हआरे हाथ है फिर उलआयती करो चाहे सीरे धीरे बने रहो.परफल तो अपने निश्चित समय पर ही मिलेगो.बीज बोओ तो पौधा बनबे में समय लगो करे .दही जमाओ तो नेक देर लगे .जे नाय कि बार बार उघाड के देखबे लग जो कि जमो कि न जबो कि रोज मिट्टी खोद खोद के देख रहे हैं कि जड  जमी   के नहीं ,अंकुर फूटो के नाय.सब होयगो पर समय लगेगो.माली सींचे सौ घडा फल तो रितु पे होय.सो उलायती मैया काम में खूब  उलायत बरतो पर रिजल्ट। तो अपने टैम पे ही निकलेगो.

Sunday, June 16, 2024

क्या मिलिए ऐसे लोगों से

 सफर जारी है....1533

17.06.2024

क्या मिलिए ऐसे लोगों से....

रहते इस दुनिया में हैं तो दुनियादारी तो निभाई जानी जरुरी है.भांति भांति के लोग हैं .परस्पर व्यवहार से ही पता लगता है कि कौन कितने पानी में है.किसके कितने चेहरे हैं,कितने दलबदलू हैं,हां हां सब हो जायेगा कहते कहते कब भितरघात पर उतर आते हैं पता ही नहीं चलता.आस्तीन का सांप होते हैं और आप हैं कि उन्हें पहचान ही नहीं पाते.बस बैठे बैठे सांपों को दूध पिलाते रहते हैं.आप लाख मर्जी दूध पिलाते रहिये पर वे डंसने से बाज नहीं आया करते.क्या करें स्वभाव है उनका और स्वभाव जल्दी ही थोडे छूटता है .अब ऐसों से तो वैर और प्रीति दोनों ही खतरनाक है .काटे चाटे स्वान के दुहुं भांति विपरीत .तो बचे रहिये ऐसों से ,इसी में भलाई है.उदासीन हो जाइये बस.रहिमन ओछे नरन से वैर भली न प्रीत.उन्हें छेडना समझाना ,उपदेश देना आफत मोल लेना है .सीख न दीजे वानरा बया का घर जाये.मालूम चला निकले थे किसी का भला करने और अपना घर ही उजाड बैठे.

      हाईस्कूल इंटर पास करते जो बीजगणित रेखागणित और साइन कोस थीटा सीखा उसका तो पता नहीं ,पर कबीर रहीम सूर तुलसी पंचतंत्र और नीतिकथाएं बहुत काम आई.कभी कभी तो लगता है पैसा कमाने के लिए वह सब पढाई भले जरुरी हो पर जीवन जीने के लिए तो साहित्य ही काम आता है.जीवन के संध्या काल में वापिसी कहानी कैसी स्मृति में उतर आती है.सच.ही ये सब अंक पाने  भर के लिए पढा  भी नहीं जाता.ये जीवन की वह सच्चाई  है जो समय आने पर ही समझ आती है.जिन विषयों को कम महत्वपूर्ण मान कर हल्के फुल्के  ढंग से ले  लिया जाता है ,कम स्कोरिंग स्कोरिंग समझ कर छोड दिया जाता है और सारी की सारी शक्ति अंक बटोरने और उच्च प्रतिशत लाने में लगा दी जाती है उससे बैंक वेलेंस के शून्य भले बढ जाते हों ,घर आधुनिक सुख सविधा संपन्न हो जाते हों पर जीने का सलीका तो कम से कम नहीं ही आता.जीवन भर कमियों का रोना रोते रहते हैं.जो पास है प्राप्य है उस पर कभी दृष्टि जाती नहीं.बस और और का राग अलापते रहते हैं.

औपचारिक शिक्षा लेते कितने कितने महापुरुषों की जीवनी पढी होंगी,पर उनके जीवन से कुछ भी सीख  न लेने की जैसे कसम सी खा रखी थी,बस पढो रटो, परीक्षा की कापी में टीप आओ ,जैसे तैसे पास हो जाओ और सब भूल भुला दो.कक्षा पास तो उस कक्षा की बात बिसरा दो.बस यही सब करते करते पन्द्रह सोलह साल बीत जाते हैं,स्नातक स्नातकोत्तर की उपाधि मिल जाती है.और ऊंची नौकरी करनी हो तो रिसर्च में दोतीन साल और लगा दो.बस जी अब पढाई पूरी हो गई, क्या जिंदगी भर पढते ही रहेंगे.न जी पढ़ाई सढ़ाई तो पूरी हुई. अब पढाई को गुनने का समय है,उसे व्यवहार में लाने का समय है. नौकरी व्यापार करते आप प्राप्त ज्ञान को प्रयोग में ही तो लाते हो.तो बस जिंदगी।  जीते भी नैतिक और सामाजिक   संदर्भों को याद कर लिया करो कि किसके साथ कैसा व्यवहार करना है.जिंदगी को तरीके से जीना आना चाहिये न कि हर समय रोते झींकते  शिकायती स्वर ही बनाए रखो.दुष्टों से फासला बनाए रखिये और सज्जनों से मित्रता कीजिये.उनके साथ उठिये बैठिये,उनसे बातें कीजिये.भाषा की तमीज सीखिये कुशल संप्रेषण के दो चार गुण  सीख लीजिये.उनकी संगत में लाभ ही लाभ है.रुठ जायें तो मना भी लीजिये.रहिमन फिर फिर पोईए टूटे मुक्ताहार. बस ऐसे लोगों से दूरी बनाये रखिये जो गिरगिट सा रंग बदलते हैंऔर अनेक चेहरे रखते हैं.क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी सूरत छिपी रहे,नकली चेहरा सामने आये,असली चेहरा छिपा रहे.दोहरे चेहरे वाले बडे फितरती होते हैं जनाब.

लो कल्लो बात

 [14:18, 16/06/2024] Bina Ji Agra Hindi: सफर जारी है....1532

15.06.2024

लो कल्लो बात ....

 काफी अरसा हो गया कि आभासी पटल से ही पता लगता है कि आज कौन सा दिवस है.आज की  नई खबर क्या  है मौसम का हाल क्या है कहां बारिश होगी और कहां लू चलेगी.कहां कौन जीता है कौन हारा है.कहां बस रेल दुर्घटना हुई और देकान रिहायशी इमारत में आग लग गई, तूफान आया ओलावृष्टि हुई.सारी सूचनाएं  मोबाइल कहे जाने वाली   इस छोटी सी चमकदार डिबिया में आकर केंद्रित हो गई हैं.

.आपके हाथ में मोबाइल हो लैपटॉप या टैब फिर आपको न अखबार न  रेडियो न टेलीविजन न कैमरा न घडी कैलकुलेटर   और  न कलेंडर की  जरूरत रह जाती है. अब सब कुछ एक छोटी सी डिब्बी में समा चुका है.भूत वर्तमान भविष्य बताने में इसका कोई सानी नहीं है.समाचार पत्र की खबरें पुरानी पड जाती हैं इसके आगे.पहले तो सिनेमा हाॅल ही बंद हुए अब तो बाजार भी इसकी हद में आ चुके हैं.आपको कहीं जाने और कुछ करने की कोई जरुरत नहीं,बस फोन के सारे फंक्शंस समझ लीजिये और दो चार एप डाउनलोड कर लीजिये.जिंदगी बहुत आसान हो जायेगी.

पर ये आधा अधूरा सच है .भर भर झोली सामान भले हो प मन बहुत खाली हैं.पिता दिवस पर शुभकामना संदेशों की बाढ तो निश्चित है पर बहुत से पिता घर से बाहर कर  धकिया दिये गये है . यदि उन्हें वृद्धाश्रम में नहीं धकेला गया है तो ज्यादा इतराइयेगा मत ,घर पर ही उन्हें अजनबीपन अनुभव कराया जा रहा है कि अब तुम्हारे दिन लद गये.एक कोने में चुपचाप पडे रहो.दोटाइम की रोटी दे दी जायेगी.वह व्यक्तित्व जिसकी धमक से घर गुंजार रहता था जिसने एक एक ईंट जोड खाली प्लाॅट को अपनी मेहनत मजदूरी से घर बनाया था आज अपने ही घर में वह फालतू आइटम सा हो गया है.बडे किस्मत वाले होते हैं वे पिता जिनकी संतान पिता का अदब करना जानती है,जो पिता का सम्मान करना जानते हैं ,उनके साथ बेअदबी नहीं करते,बात।             ष बात में झल्लाहट नहीें  झूटती.घर से बाहर निकलते जो पिता को प्रणाम कर पैर छू उनका आशीर्वाद लेना नहीं भूलते.पिता स्वर्ग है पिता प्रीति है.हमारा अस्तित्व पिता से है ,पिता है तो हम हैं.वही हमारा पालक है.मां का लाड दुलार दिखता है पिता कहता भी कम है और जतताता भी कम है.ऊपर से नारियल सा कठोर क्यों न हो पर अंदर से गिरी सा मुलायम और मीठा होता है.

ये सब खुद पिता होते अनुभव होता है .हमारे अपने पिता के साथ जो भी आचरण रहे हों  हमें रत्ती भर  फर्क नहीं पडता .पर वही सब कुछ हमारे साथ दोहराया जाता  है तब बड़ी पीडा होती है.ये तो परिवार के संस्कार हैं जो एक.पीढी से दूसरी में ट्रान्सफर होते हैं.आज का सच ये है कि परिवार के साथ साथ आसपड़ोस और मित्र मंडली और उस सबसे अधिक जैसे परिवेश में वे चौबीस घंटे रहते हैं जैसा दिन भर देखते सुनते हैं वही वाक्य सांचे उनके मन मस्तिष्क में फीड हो जाते हैं.पिता केवल.सुविधा प्रदाता.भर नहीं होता .वह आपको संस्कारित भी करता है.दुनिया का हर पिता अपनी परिस्थिति में बेस्ट करता है पर हर पीढी को पिता से कुछ न कुछ शिकायतें रह ही जाती हैं और वह प्रण लेता है कि मैं अपनी संतान को किसी भी  बात की कोई कमी नहीं रहने दूंगा .सामर्थ्य भर सब करते हुए भी कुछ न कुछ छूट ही जाता है और बच्चों के मन में असंतोष पनपता है कोई न कोई गांठ रह ही जाती है.शायद यही चक्र है संसार का..अपनी बात करें तो सीमित साधनों में पिता ने हम बच्चियों के लिया सच में उनकी सामर्थ्य से कहीं बहुत अधिक था.बस एक ही कसक रह गई कि जिंदगी भर झोली फैलाए लेते और लेते रहे.पिता जो थे वे और वह भी उस पीढी के जिसमें बेटी के घर का पानी पीने में भी गुरेज था.संतति पिताओं को भला क्या दे पायेंगी उनके लिए तो इतना ही बहुत है कि वह उनका आदर  मान बनाये रख सकें.लो और कल्लो बात  शुभकामनाएं दो मत दो पर  उनके प्रति सम्मान आदर भाव हमेशा बनाओ रखो.उनके साथ तमीज से पेश आओ,संयत और मर्यादित भाषा का प्रयोग करो.चीखो चिल्लाओ मत .आखिर वे आपके पिता हैं.

मुक्ति के मायने

 सफर जारी है....1531

11 06.2024

मुक्ति के मायने....

सा  विद्या या विमुक्तये से प्रारम्भ होकर वित्त से मुक्ति नहीं होती पढते समझ में भरता है कि हम सभी जीवन में कभी न कभी मुक्ति के अभिलाषी होते हैं.अब ये अलग बात है कि हम जीवन मुक्ति की कल्पना न कर कभी दायित्वों से मुक्ति चाहते हैं तो कभी   पद विशेष और रिश्तों से.यानी जो जो मन मुताबिक न हो,हमारे कंफर्ट जोन में न आता हो,काम करते नानी मरती हो,छठी का दूध याद आता हो ,दायित्व निभाने में श्रम लगता हो वहां से हम कन्नी काटते हैं और उससे मुक्त होना चाहते हैं. यह जानते हुए भी कि जब तकजीवन है हमें कुछ न कुछ करते रहना चाहिए, हाथ पैर चलते रहने चाहिए.ठाली बैठे दिमाग  को जंग लग जाती है,हाथ पैर जाम हो जाते हैं  और खाली मस्तिष्क शैतान का घर हो जाता है.खाली पडे खेत में कुछ बोया न जाये तो खर पतवार उग आती है. 

रोजी रोटी और आजीविका कमाने  के लिए हर व्यक्ति  कुछ न कुछ तो करता ही है.वृद्धावस्था के लिए  कुछ जोड बचाकर भी रखता है कि जब हाथ पैर नहीं चलेंगे तब भी पेट की आग तो शांत करनी होगी.हारी बीमारी में औषधि पथ्य भी जरुरी होगा.इस सबकी भरपूर व्यवस्था हो  तो भी दिमाग को व्यस्त रखने के लि दिमागी खुराक बहुत जरुरी होती है.सेवा मुक्ति जीवन का आवश्यक पडाव है पर इसके आगे भी यात्रा चलती रहती है.आप अपने को केवल एक कार्य से दूसरे में स्विच ओवर करते हैं.आपकी प्राथमिकताएं बदल जाती हैं.अब आप किसी सरकारी ,गैर सरकारी तंत्र के बाशिंदे नहीं होते.आपको किसी बाॅस को  हर शाम रिपोर्ट नहीं करना होता .भले ही आप स्वतंत्र हो किसी कार्य दायित्व के सीमा घेरे में न आते  हों पर जिस घर के आप स्वामी हैं  जहां आपके जीवन का चौथापन बीतना है उसकी  प्रतिबद्धता से मुक्त नहीं हो सकते.आपको और सजग होकर जीवन बिताना होता है.अपने को सहेजना होता है.अब किसी दूसरे को स्पष्टीकरण  नहीं देना होता पर अपने मन को दिल को जबाब देने के दायित्व से आपको मुक्ति कभी नहीं मिला करती.सेवाकाल में आपका अपने सहयोगियों के साथ किया गया व्यवहार और आचरण ही आपकी साख बनता है.

मास्टरी का प्रशिक्षण लेते बार बार रेखांकित किया गया कि कक्षा में  पढाने जाने से पूर्व  पाठ योजना का न केवल निर्माण आवश्यक है बल्कि उसका अक्षरश:पालन भी आवश्यक है.इसके बिना शिक्षण पूर्ण नहीं होता.बिना ब्लू प्रिन्ट के कच्चे खाके के नक्शे के कोई इमारत खडी नहीं होती .आप दुकान जमीन प्लाॅट खरीदते और उस पर भवन ,आवास या काम्प्लेक्स बनबाते अपनी जमा पूंजी और अपनी भविष्य गत आवश्यकताओ का ध्यान रखते हैं .तो सेवा निवृति के बाद की  योजना का खाका बनाने में क्यों चूक जाते। हैं.दिन भर के भोजन तक की व्यवस्था के मीनू। और। सामान्य से दिन के कार्यों की रुपरेखा तय  करने  तक में जिसका।  दिमाग कंप्यूटर की गति सा तेज चलता हो जो अपने सहयोगियों और अधीनस्थों को अल्सुबह ही दिन भर के कार्यक्रम का ब्यौरा व्हाट्सएप कर देता हो क्या उसने अपने  जीवन के तीसरे प्रहर की कोई योजना परिकल्पित नहीं की होगी.हां अक्सर ऐसा होता है कि व्यक्ति बाहर दीपक जलाता घर  की देहरी ही भूल बैठता है.उसे याद ही नहीं रहता कि घर की देहरी रोशन कर ही बाहर दीया जलाया जाता है. 

मुक्ति की चाह सबको होती है पर जब तक जीवन है उसके दायित्वों से मुक्त नहीं हुआ जा सकता.हां दायित्व निभाते निस्पृह  और निर्लिप्त रहने की कला को सीखा जा सकता है,जल में कमलवत रहने की विद्या  सीखी जा सकती है.रहो संसार में ऐसे कमल रहता है पानी में.काम सब करो पर निर्लिप्त भाव से.छोडने में  एक क्षण  भी न लगे.बस तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा कहते ही मुक्त हो जावे.मुक्ति की चाह सबको भले हो पर  सब  मुक्त होने की कला में प्रवीण नहीं हुआ करते.अब यदि मुक्त ही होते तो  किसी से बात  पद नाम का पुछल्ला बात बात में क्यों लगाते.इतना ही क्यों,  आवास के मुख्य द्वार पर टंगी नाम पट्टिका में उस सबका बाकायदा उल्लेख होता है.एक तरह से वही परिचय होता है हम सबका.

सच तो यह है कि मुक्त होने के मायने ही बदल गये हैं.विद्या की जो परिभाषा हमें सौंपी गई थी सा विद्या या विमुक्तये उसके गहरे निहितार्थों की घोर उपेक्षा की गई।जैसे जैसे उपाधियों के अंबार बढे हम और बंधनों में जकडते चले गये.डिग्री डिप्लोमा केवल आजीविका के साधन बन कर रह गये.वित्त से मुक्त नहीें होती, जानते हुए भी जीवन भर धन संचय के प्रयास ही तो किये जाते हैं.बडी जल्दी चिपक पैदा हो जाती है और उससे उबरते पूरा जीवन ही बीत जाता है.बस मुक्ति के जो मापने ही समझ आ जाएं तो काहे का झंझट..हाथ हिलाते आएं,अपना काम करें और फिर मुक्त भाव से अपने अपने स्थान लौट लें. आ अब लौट चले

बोलते बतराते रहिये जनाब

सफर जारी है......1530

09.06.2024

बोलते बतराते  रहिये जनाब....

डिजिटल साधनों के चलते फिर चाहे स्मार्ट फोन हो टेबलेट  हो लैपटॉप हो कंप्यूटर हो या अन्य कोई और साधन ,सोशल मीडिया पर उपस्थिति बहुत जता ली,दिन भर मोबाइल पर दुनिया जहान की राजी खुशी लेते रहे,देश की राजनीति पर दंड पेलते रहे ,फेसबुक व्हाटस इन्स्टाग्राम पर अपने को जताते बताते रहे ,पुराने मित्रों को खोज खोज कर खैर खबर लेते रहे पर इस सब के बीच बिलकुल पास बैठे व्यक्ति को बिल्कुल भुला दिया गया .गूगल से पुरानी रिश्तेदारियां तो खोजी जाती रहीं पर जीते जागते इन्सानों  और  आपसदारी के रिश्तों से  गुफ्तगू तक के समय का टोटा पड गया.सफर पर निकलते रास्ते भर दुनिया भर के लोगों से लंबी  बातचीत तो होती रही पर साथ में बैठे व्यक्ति उपेक्षित होते चले गये. ढेरों दृश्य कैमरे में कैद होते रहे पर प्रकृति के सुंदर नजारे देखने उन्हें आंखों में कैद कर लेने के सौभाग्य से वंचित रह गये.बस यही सोचते रह गये कि तसल्ली से बैठकर देखेंगे. पर जीवन की आपाधापी और व्यस्तता के  चलते कभी सुकून के दो पल नसीब न हो पाये या हम ही बेहद बिजी होने का   बाना ओढे उन फुरसत के पलों को धकियाते रहे. अपने को फोन के स्क्रीन में ऐसा कर लिया  किया कि बस पूछो ही मत.सोशल मीडिया  और देश की राजनीति में ऐसे खो गये कि संबंधियों और इष्ट मित्रों का कोई ख्याल ही नहीं रहा.नतीजन चार अपनों को छोडकर पूरी दुनिया जेब में लिये घूमते हैं.फेसबुक पर पांच हजार  से ऊपर की मित्रता सूची देख फूले नहीं समाते.मार इतराते डोलते हैं और भाई भाई के मध्य ,भाई बहिन, माता पिता संतानों के मध्य इतनी दूरी  इतनी बढ गई है कि एक दूसरे को जन्म दिन और वैवाहिक वर्षगांठ की बधाई भी पटल पर समूह में देते हैं.

 संवाद हीनता इतनी अधिक बढ चुकी है कि एक ही घर परिवार के चार सदस्य चार अलग अलग कमरों में बैठे चैट बाक्स में या संदेश में बधाई लिख कर भेजते हैं.सुप्रभात और शुभ रात्रि के मैसेज भेजते रहते हैं.अकर्मण्यता का आलम यह है कि अपने सुविधा जोन को छोड कर दूसरे कमरे तक जाते प्रणाम करते नानी मरती है.अरे चार कदम चलकर बडे बुजुर्गों को प्रणाम कर लोगे तो आशीर्वाद ही पाओगे.ज्ञान गंगा में ही नहाओगे.

    मोबाइल का नशा सिर चढ कर बोलता है कि यदि घंटे दो घंटे मोबाइल न मिले तो लगने लगता है दुनिया ही समाप्त हो गई.अब क्या करें.करने के लिए कुछ बचा ही नही.मार बैचेनी होने लगती है लगता है कुछ बहुत जरुरी छूट गया है..ब्लू टिक आंखों के आगे घूमते रहते हैं .पैर हिलना शुरु हो जाता है.दस मिनट में ही लगने लगता है कुछ खो गया है हमारा.उस मध्य बैचेनी का ऐसा आलम होता है कि दुनिया ही ठहर गई हो हमारी.किसी से बात करने का मन ही नहीं होता हमारा.बस जैसे खुशियों की सारी चाबीं इस मुए मोबाइल में बंद हो.हवा के बिहना सांस लेना संभव भले हो पर मोबाइल के बिना जिंदगी बेकार हो जाती है.हमने अपने चारों और तंत्र का ऐसा वितान तान रखा है कि उसके बिना जीने की कल्पना ही नहीं कर पाते.यंत्र की सुविधा आपसी संबंधों को मजबूत करने के लिए थी उनसे दूरी बढाने और उन्हें भुला देने बिसारने के लिए नहीं.पाया बहुत कुछ निश्चित ही होगा पर जो महत्वपूर्ण खोया है उसका अंदाजा भी नहीं है हमें.हमारी श्रवण दक्षता कुशलता का रेट भले बढा हो पर हमें बतराने बोलने की आदत ही नहीं रही.दिन दिन भर बस कानों में लीड लगाये उल्टा सीधा सुनते  ही तो रहते हैं. कोई  कुछ पूछे तो जबाब देने के लिए  समय नहीं होता.अगला बात करने बैठे तो हम कह देते हैं कि क्या बात करें.निजी संबंधों में बातों का खजाना चुक जाये और आपको बात करने के लिए विषय खोजना पडे इससे अधिक लाज की बात और क्या होगी भला.

बोलने बतराने के अपने सुख हैं.आप रिलीज होते हैं अपने को बांटते है शेयर करना सीखते हैं.बात तो किसी भी विषय पर की जा सकती है.याद आता हैहऔर जब महीने पन्द्रह दिन में पडोसियों से मिलने बात करने जाया जाता था और परिवार के सदस्यों से तो किसी भी समय बात की जा सकती थी.मां बाकायदा शाम के समय बच्चों के साथ बात करने बैठती.कितने किस्से कहानी बुन सुन गुन लिए जाते.परिवार के किस्से साझा होते.पिता के साथ यात्रा में बातों के खजाने खुलते.उनके बचपन की कहानी सुनते.स्थानों के विवरण साझा किये जाते.बात बात में जरुरी सीख हम बच्चों को दे दी जाती.उस समय की बात बात में बताई गई सीख जीवन का पाथेय बन गई हैं.बिजली चले जाने पर चारपाई घेर हम भाई बहिनों की बातें उस समय तक चलती रहतीं जब तक बिजली रानी का पुनरागमन न हो जाता या किसी जरुरी काम के लिए उठने की आवाज न लग जाती.आज जिस बतराने को हद दर्जे की बेबकूफी कहा जाता है वह व्यक्तित्व विकास का जरुरी सोपान था.आपके बात करने के तरीके से आपके विषय  ज्ञान और संप्रेषण  योग्यता की पहचान होती थी.आप अपने को मांजते थे.बहुत कुछ सीखते थे.जब से बातों का सिलसिला खत्म हुआ बहुत कुछ पीछे छूट गया है.सब कुछ बस एक मोबाइल के बंद  डिब्बे में कैद होकर रह गया है.

आप खूब खूब एडवांस बनें, खूब यंत्र तंत्र का प्रयोग करें पर उसकी अति खतरनाक है.अति का बोलना ठीक नहीं तो चुप्पी भी खतरनाक है.बोलते बतराते रहिये.कुछ अपनी कहिये कुछ दूसरों।  की सुनिये .बस मोबाइल में सिर दिये मत बैठे रहिये.इससे इतर भी जीवन है.बतरस लाली लाल की.

जमाना हुनरमंदो का है

सफर जारी है....1529

08.06.2024

जमाना हुनरमंदो का है....

जीवन में आगे बढना है तो कोई न कोई हुनर तो होना ही चाहिए आपके पास मसलन खाना बनाना ,गाना बजाना, अभिनय ,नृत्य, हंसना  हंसाना, वक्तृत्व कौशल  ,पढना पढाना ,सुलेख ,लेखन दक्षता,दौडना भागना ,मिमिक्री करना.ये सब सकारात्मक कुशलताएं हैं .यदि इनमें से किसी पर भी दखल नहीं तो फिर चोरी चकारी , कटु आलोचना, दूसरों को परेशान करना, कमी निकालना ,हमेशा अगले को दोषी ठहराना, बात बात पर  सबकी खिल्ली उडाना, इसकी टोपी उसके सिर रखना जैसी बातों में भी आपकी निपुणता  और दक्षता हो सकती है.जो भी हो, कुछ न कुछ तो  ऐसा आप में  होना ही चाहिये जो दूसरों से हटकर हो और आपको विशिष्ट बनाता हो.कुछ अपनी बेबकूफी, सिधाई और भोलेपन के कारण चर्चा में होते हैं तो कुछ अपनी धूर्तता, चालाकी और बदमाशी के कारण बाजी मार ले जाते हैं.कुछ धन के घमंड में इतने चूर होते हैं कि उनका सब काम पैसों के जोर पर हो जाता है  और कुछ सिफारिश के बल पर अपनी नैया खे ले जाते हैं.

    पैसों की माया बहुत जादुई है.जो काम हुनर से एक बार को भले से न हो पर पैसों और सिफारिश के बल पर सब सध जाता है.तो आपके पास पैसा हो या सिफारिशी हथकंडे हों तभी जीवन की नैया पार लगती है.अब न पैसा न सिफारिश तो ऐसे व्यक्तियों को तो अपने हुनर से ही जग जीतना होता है.जग जीते न जीतें पर जीवन तो बिताना होता है.और जीवन का  क्या है वह तो लस्टम पस्टम बीत ही जाता है.बीतती  तो सीधे सादों की भी है और तेज तर्रारों की भी है.रोना झींकना तो उनका है जो घोर अभावों में ही  बडे सपने देख लेते हैं.विपरीत परिस्थिति और हवा में काम करने के आदी होते हैं.हवा के साथ रुख नहीं बदलते बल्कि विपरीतता को धकियाते आगे बढते हैं.आप समझ सकते हैं कि हवा का रुख अनुकूल न हो तो पतवार खेने में बल अधिक लगता है.पांच मिनट

की दूरी पचास मिनट में तय होती है.बेकार के झंझटों से निबटने में समय लग जाता है.

तीसरे पडाव पर जाकर ये सब समझ में भरता है पर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.जीवन का स्वर्णिम काल जब मन और तन जोश से भरे होते हैं,भूडोल को गोल गोल घुमाने का साहस होता है,आग अंतर में लिए पागल जवानी और लाल चेहरे हैं नहीं फिर लाल किसके पंक्तियों को जीने और कुछ कर गुजरने का समय होता है वह सारा का सारा चुरकुट कामों में निकल जाता है.तेरे मेरे के झंझटों की भेंट चढ जाता है.जिन बेकार के कामों के लिए ये बेशकीमती  और गोल्डन  समय  बरबाद किया जाता है उसकी कीमत  बाद में पता चलती है पर तब तक सब बीत चुका होता है.केवल हाथ मलना भर  शेष रह जाता  है.तो जीवन के लक्ष्य तीसरे पन में निर्धारित नहीं किये जाते .उन्हें तो जीवन प्रारम्भ होते ही तय कर लिया जाता है कि करना क्या है। .तरह तरह के हुनर बचपन और युवावस्था में ही सीख लिये जाते हैं.बाद का समय तो उनमें निखारने के लिए होता है.अब समझ आता है मां जो बचपन में जरा खाली समय मिलते ही सुई डोरा, ऊन सलाई , क्रोशिया, टाट पे कढ़ाई  और  कुछ नहीं तो ढोलक बाजा हाथ में पकडा देती या बेकार  पडे सामान से कुछ नया और सार्थक बनाने को पकडा देती  मसलन कपडे से गुडिया बनाओ या मोजे से खरगोश.रूई से बतख ,तार से कुत्ता बिल्ली,मैक्रम से वाल हैंगिग या सुतली से  छींका स्टेंड.गर्मियों भर अचार मुरब्बे चटनी पापड बडी की रेसेपी सिखाई जाती रही.तब हाॅबी क्लासेज और समर कैम्प भले से न लगते हों पर परिवार में माताएं ताई चाची भाभी जीजी मौसी ये सब हुनर सिखा देती थीं.ऐसा नहीं था कि तब पढ़ाई  का स्तर निम्न था या  पढाई सरल थी .बस पढाई अपनी जगह थी और जीवन जीने के हुनर अपनी जगह.दोनों का साथ चलना जरुरी था.छोटे मोटे काम तो हर व्यक्ति की पहुंच में थे और छोटी मोटी बीमारियों के लिए घरेलू नुस्खे कारगर थे.बात बात पर डॉक्टर दर्जी बढई  इलेक्ट्रिशियन प्लम्बर को बुलाना जरुरी नहीं था.खाट की अदवायन कसनी हो या पाये सीधे करने हो ,पाटी  के बीच खपच्ची ठोकनी हो.कपडो की मरम्मत हो सब घर के लोग ही कर लेते थे..जिस कौशल विकास, योग्यता संवर्धन, क्षमता विकास और मूल्यपरक शिक्षा के पाठ्यक्रम में समावेश की  माथापच्ची की जा रही है वह नये कवर में पुराना ही माल पैक कर थमा दिया गया है.वह स्टाम्पड है इसलिए स्वीकार है.हमारे पूर्वज पुस्तक को पाठ्यक्रम से देश निकाला देकर अब भारतीय ज्ञानपरंपरा और कला संस्कृति में स्नातक स्नातकोत्तर पीजी डिप्लोमा की शुरुआत  जारी है.

तो जरुरत हुनरमंद बनाने की है न कि किताबी कीडा और सूचनाओं के बोझ से लादने की.बने रहिये हुनरमंद और अपने आसपास भी निखट्टुओं की बजाय हुनरमंदों की फौज तैयार कीजिये.

प्रेरणास्पद व्यक्तित्व....

01.06.2024

प्रेरणास्पद व्यक्तित्व....

लोकमाता पुण्य श्लोक देवी अहिल्याबाई होलकर का तीन सौवां जयंती वर्तमान कई धूम है.दो दिन पूर्व जुलाई 31को देश भर में उनके जयंती समारोह बहुत धूमधाम से बनाये गये हैं.वे  समाज के किसी एक वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करती अपितु भारत की हर  उस महिला वर्ग की प्रतिबिंब है जो ग्रामीण परिवेश में पली बढी होकर पिता के द्वारा पोषित संस्कारों की धरोहर को सहेजे किसी कुलीन वंश की बहु बनती हैं और पुत्री पवित्र किये कुल दोऊ की उक्ति को साकार करती हैं.पाटिल परिवार के संस्कारों की धरोहर को सहेजती संभालती हैं और श्वसुर कुल की कीर्तमें भी चार चांद लगाती हैं.महाराष्ट्र और मालवा के मध्य सेतु बनती है.पिता उस काल में भी उन्हें शिक्षा दिलाने का साहस रखते हैं जब महिलाओं के लिए शिक्षा के रास्ते खुले नहीं थे और श्वसुर मल्हार राव होल्कर चार हाथ आगे बढ कुलवधू को राजकाज में दीक्षित करते हैं.होलकर परिवार की पुत्रवधू  न केवल  कुशल तीरंदाज है बल्कि हाथी पर बैठ कर दुश्मनों के छक्के छुडवाती है विरोधियों के बीच  अपना लोहा मनवाती है.

दूरदर्शी है.विरोधियों को पटखनी देना जानती है.पति और श्वसुर के मृत्यु दुख से व्यथित   जरुर है पर जब उसे पता चलता है कि पेशवा उसके राज्य पर आक्रमण करने की योजना में है तो अबला स्त्री की तरह विलाप करने नहीं बैठ जाती वरन उन्हें पत्र ख ये अहसास करा देती है कि आप युद्ध करने पर आमादा हैं तो आइये मेरी स्त्री सेना आपका डटकर  मुकाबला करेगी पर आप विचार कर लें कि आप जीतें या हारें दोनों तरफ से आपको अपयश ही मिलना है.बात पेशवा को समझ आ जाती है और इस तरह कुशल प्रशासिका बिना लडे ही युद्ध जीत जाती है.संतान को प्यार करना और उसके मोहाविष्ट हो धृतराष्ट्र जैसा आचरण करना बात है.माता अहिल्याबाई अपने पुत्र मालेराव और पुत्री से अपार स्नेह करती है पर राजमाता होने के गौरव को भी नहीं भूलती.पुत्र के रथ से एक बछडे के मर जाने और उसकी माता गाय के अश्रुपूरित नयनों को देखकर इतनी विचलित हो जाती हैं कि पुत्र के लिए मृत्युदंड की घोषणा करते विचलित नहीं होतीं.ये अलग बात है कि गाय के बार बार रास्ता रोकने पर और प्रजा के आग्रह पर वे उसे क्षमादान दे देती हैं.

उनके जीवन के प्रसंगों को पढते लगता है कि  बिना सेवाभावी हुए कोई  मंदिरों  धर्मशालाओ का निर्माण पुनर्निर्माण नहीं करवा सकता.परम शिव भक्त कि उनकी पूजा अर्चना किये जल की बूंद गले से नीचे नहीं उतारतीं.राजाज्ञा के नीचे श्री शंकर ही लिखा जाता रहा.मुद्रा पर नंदी और बेलपत्र उकेरे गये.आध्यात्मिक इतनी कि हमेशा भरोसा बना रहता कि प्रभु का हाथ हमारे ऊपर है.उनकी छत्रछाया में हम महफूज  हैं.धर्म के जिन दस  लक्षणों की चर्चा मनुस्मृति में वर्णित है  धैर्य ,क्षमा ,दम ,अस्तेय, शौच, इन्द्रिय निग्रह, धी ,विद्या ,सत्य और अक्रोध उनका समवेशित रुप रूप लोकमाता अहिल्याबाई के चरित्र मे देखने को मिलता है.महिला सशक्तिकरण के जिन संदर्भो को आज हवा दी जारही है कि कामकाज और आगे बढने में साडी परिधान  बाधक है और सिर पर पल्लू लेना पिछडे पन का  सूचक है उसी साढे पांच गज की सडी को पहन सिर पर पल्लू डाले वे कुशल प्रशासिका का खिताब पाती हैं और तीन सौ वर्ष बाद भी अपनी उपस्थिति जोरदार तरीके से दर्ज कराती हैं.आज की युवा होती बच्चियों कोज उनके जीवन के प्रसंगों को पढना और उनके आदर्शों को जीवन में उतारना बहुत जरुरी है.इन प्रेरणास्पद चरित्रों की जीवनी साल में एक बार  जयंती समारोहों में बताया जाना ही काफी नहीं है .इन्हें पाठ्यक्रम  के रुप में रखा  जाना और  सत्साहित्य के रुप में पढा जाना बहुत जरुरी है.देश को आगे बढाना है तो ऐसे सेवाभावी नागरिक गढने बहुत जरुरी हैं जो स्व का बलिदान कर भी राष्ट्र रक्षा के लिए समर्पित हों.घर पास पडोस  समाज जिला राज्य प्रदेश अगली इकाई के रुप में राष्ट्र आता है.जो राष्ट्रवादी हैं वे वसुधैव कुटुम्बकम का स्वप्न देखते हैं और विश्व में मानव धर्म के पोषक होते हैं.घर की नस्लों को सुधारिये.देश तो स्वत: मजबूत हो जायेगा.

पहले तपो तो सही...

सफर जारी है...1527

29.05.2024 

पहले तपो तो सही...

जिन्हें आराम की जिदगी रास आ जाती है वे तपना नहीं जानते.बस पशु जैसी वृत्ति अपना कर अजगर से मस्त पडे रहते हैं.ज्यादा ही गुनगुनाने का मन  हुआ तो मलूक दास  को दोहरा लेते हैं  अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम .काम धाम तो सब होता रहेगा.पहले आराम जरूरी है. काम तो कोई न कोई कर ही देगा .काम भला कब पडा रहता है और  एक किसी के न करने पर रुकता भी नहीं .जिन्हें घोडे बेचकर सोना हो,  शौक से सोते रहें.बस ये ध्यान बराबर बना रहे कि सफलता उन्हीं के कदम चूमती है जो हाड तोड परिश्रम करते हैं.एक छोटे शहर की नैन्सी  त्यागी अपनी मेहनत के बल पर कान फेस्टिवल  जा पहुंचती है और रेड कारपेट पर स्वयम का डिजाइन किया और सिला हुआ गाउन पहन कर  चलती है .लोगों के संज्ञान में आती है और सिलेब्रिटीज की श्रेणी में गिनी जाने लगती है.कल उसके कुछ  साक्षात्कार देखते पुन:यह धारणा दृढ हुई कि बडे बनने के लिए बडे सपने देखने होते हैं और उन्हें पूरा करने के लिए एडी चोटी का जोर लगाना होता है.निरंतर काम करना होता है.विपत्तियों और कठिनाईयों से घबरा कर बैठ जाना नहीं होता बल्कि उसी के बीच रास्ते निकालने होते हैं.थक हार कर बैठ जाना नहीं होता,हाथ पैर नहीं छोड देने होते .अपनी कमजोरियों और विशेषताओं को समझना होता है.कमजोरियों को दूर करना होता है और विशेषताओं हथियार बना कर जीवन संघर्ष में सफल होना होता है. जो कोशिश करते हैं उन्हें सफलता भी मिलती ही है भले पहले प्रयास में न मिले और कई कई   प्रयास क्यों  न  करने पडें.

      गर्मी के बाद बरसात और फिर जाडे की रुत आती है.जेठ मास के नौतपा खूब तपते हैं तब जाकर कहीं मानसून  की आहट होती है .अब बैशाख जेठ न तपे तो सावन भादों की झडी कैसे लगेगी.आदमी का क्या उसे तो गरमी में गरमी, सर्दी में सरदी लगेगी  ही और बारिश में चाय पकौडे की तलब लगेगी .उसकी तो आदत में है  कि तापमान घटते बढते  स्वर  शिकायती बनाये रखो. अपने लिए कैसे भी सुख के साधन जुटा लो.अपने घर की गरमी को यंत्र लगाकर बाहर फैंको.पर पेड लगाने का यत्न मत करो.अब पेड ऐसे ही थोडे लग जाते हैं .उनकी बच्चों सी नीठ करनी होती है.समय समय पर खाद पानी देना होता है .धूप ताप से बचाना होता है .उनकी प्रकृति देखकर कभी छये में तो कभी प्रकाश में रखना होता है.पिता के हाथों रोपे पीपल सरिस  की विशालता उसकी ठंडी छांव का आनंद तो खूब लिया जी भर सावन के झूलों का आनंद लिया पर एक पौधा भी ऐसा नहीं रोप पाये जो आगे की पीढी को विशाल वट सी शीतल छांव दे पाता.

      फ्लैट कल्चर के चलते अब पेड का स्थान कमरे में  रखे सजे गमलों के सजावटी पौधों और बोनसाई ने ले लिया है.उसी में सब अगन मगन हैं.करें भी क्या.पेड तो पेड ,अब तो आदमी की फसल भी बोनसाई होती जा रही है.कहां रही विशालता मनों में .बस अपना अपना देख लें वही बहुत है.बिजली का जितना मर्जी संकट हो पर सबको अपने अलग अलग अलग कमरे पूरी सुख सुविधा के सक चाहिए ही चाहिए. पर्सनल स्पेस जैसी भी कोई चीज होती है.शेयर करने की वृत्ति का सर्वथा ह्रास होता जा रहा है.अब वे दिन  हवा हुए जब कहलाने एकत बसत अहि मयूर मृग बाघ.जगत तपोवन सो कियो दीरघ दाघ निदाघ लिखा जाता था.जेठ की तपती दुपहरी को देख पंक्तियां याद आ रही हैं देख दुपहरी जेठ की छांह चाहत छांह.अब जेठ तो जेठ हैं बडे हैं आखिर तो जीवन सहचर  के बडे भाई ठहरे.तो कितने भी फैशनेबल हो जाओ धूप ताप से बचने को सिर और चेहरा दोनों  ढके रहते हो.

ये तपने का समय है तपोगे तो बारिश का भी आनंद लोगे और सरसोगे भी. सूरज देवता अब नौतपा में प्रखर नहीं होंगे तो कब होंगे. तो सूरज देवता तुमहु तपो और सबन ने खूब तपाओ.तप कआ अर्थ ही कष्ट सहना है जो सह जाता है वह बन जाता है.तपोगे तो सरसोगे भी और खूब बरसोगे भी.

Monday, October 3, 2022

रावण ऐं तो राम ही मार सकें

 सफ़र जारी है...1083

05.10.2022

 रावण ऐं तो राम ही मार सकें........

आम जन के बस की बात नहीं है दशशीष धारी रावण का सर्वनाश करना, वे तो बस मरे हुए रावण का सालाना पुतला ही फूंक सकते हैं, उसे तो त्रेता के राम ही मार पाते हैं। विभीषण जैसे घर के भेदी साथ हों जो बता सकें कि नाभि में अमृत कुंड है सो उसे सोखने को तीर चलाओ, फिर लंका का ढहना निश्चित होता है और बाकायदा मुहावरा गढ़ जाता है घर का भेदी लंका ढाए। होंगे राम जी परम शक्तिमान पर  विभीषण के सहयोग के बिना वे दशानन के अहम का सर्वनाश तो नही ही कर पाते। अकेले विभीषण ही क्यों, रीछराज जांबवान, कपि श्रेष्ठ हनुमान, सुग्रीव, अंगद, जटायु, नल, नील जैसे सहयोगियों का साथ उन्हें नहीं मिलता, तो राम विजय के संदर्भ अलग ही होते । वे विजयी हुए क्योंकि लक्ष्मण जैसा भाई और सीता जैसी भार्या कठोर विपत्ति के समय उनके साथ थे, भरत शत्रुघ्न जैसे एकनिष्ठ सहयोगी भाई उनके पास थे।  सदा उनके मंगल की कामना चाहने वाली, उन्हें सत्य असत्य, अच्छाई बुराई, उचित अनुचित, अच्छे बुरे का ज्ञान कराने वाली कौशल्या, सुमित्रा जैसी मातृ शक्ति उनके साथ थी। रघुकुल रीति प्राण जाएं पर वचन न जाए का अक्षरश: पालन करने वाले दशरथ जैसे पिता का वरद हस्त उनके ऊपर था । उनके पास विकल्प था कि वे राम के ऐन राजतिलक के अवसर पर चौदह वर्ष के वनवास और कैकई सुत भरत को राजगद्दी सौंपने के वचन देने के बाद भी  मुकर सकते थे, अपने प्राणप्रिय बेटे राम को रोक सकते थे पर नहीं पुत्र वियोग में उन्हें प्राण त्याग देना अधिक सही लगा बनसपत पुत्र मोह में अपने वचन भंग के। लोकमंगल के लिए परिवार का हर सदस्य उनके साथ बना रहा, परिवारी जनों को तो छोड़िए, सुमंत्र जब राम लक्ष्मण सीता को नदी तट तक छोड़ने गए होंगे तो कलेजा तो उनका भी खूब कांपा होगा कि ये सुकुमार वन में कहां कहां भटकते फिरेंगे पर इस भाव के ऊपर राजाज्ञा प्रभावी रही। चाहते तो अयोध्या वासी भी थे कि उनके प्रिय राम ही गद्दी पर बैठें पर राजा का जो निर्णय हो गया, हो गया फिर सबने उसका सम्मान ही किया। मन में भले ही कैकई को इस कृत्य के लिए दोषी मानते रहे हों पर किसी ने राजा के आदेश की अवहेलना नहीं की। दशरथ ने प्राण देना अधिक उचित समझा पर अपने दिए वचनों की रक्षा की फिर भले ही कैकई को लेकर उनके मन में आक्रोश और विवशता चाहे जो रही हो।

राम राम हो पाते हैं तो उसके पीछे ये सारे सकारात्मक सहयोगियों की लंबी कतार ही नहीं हैं ,आसुरी शक्तियों ने भी अपना दमखम खूब दिखाया। मंथरा यदि कैकई के कान नहीं भरती, उन्हें कोख जाये भरत के हित के लिए नहीं चेताती कि भरत को राजगद्दी मिले, इसके लिए राम के कांटे को अयोध्या से दूर भेजना ही उचित होगा तो कैकई कैसे इन दो वरदानों को मांगने के लिए तैयार हो जाती कि राम को चौदह वर्ष का बनवास और भरत को राजगद्दी मिले। अब पुत्र तो पुत्र होता है, छोटा हो बड़ा हो, अधिक प्यारा हो कम प्यारा हो पर पिता किसी के साथ भी अन्याय तो नहीं कर सकता। कैकई जानती थी कि राजा दशरथ भले ही कितने धर्म संकट में क्यों न पड़ जाएं पर अपने पिता धर्म को तो नहीं ही छोड़ पाएंगे फिर भले ही उन्हें प्राण ही क्यों न छोड़ने पड़े। कैकई ने ये जो सब किया अपने पुत्र भरत के लिए ही न, पर भरत को जब सत्य पता चला तो उन्होंने अपनी माता को ही धिक्कारा... भरत से सुत पर भी संदेह, बुलाया तक न उसको गेह। कैकई यदि अपने वचनों पर दृढ़ रही तो भरत ने भी अपने वचन की रक्षा की। वे राजगद्दी पर नहीं बैठे, राम की चरण पादुका रख राजकाज करते रहे। कैकई और मंथरा ही क्यों, सूपनखा, ताड़का, सुबाहु,मारीच जैसी सभी आसुरी शक्तियां उनके शक्ति परीक्षण के लिए दल बल के साथ जुटी रहीं। स्वर्ण मृग के ब्याज से राम को उसका शिकार करने के लिए भेज साधु वेश धर रावण ने राम की भार्या सीता का अपहरण कर लिया, भाई लक्ष्मण को मेघनाथ ने शक्ति प्रहार कर मूर्छित कर दिया, राम रावण से युद्ध करने के लिए शक्ति संग्रहण के लिए देवी आराधना  पर बैठे तो नील कमल देवी ने ही चुरा लिया, पूजा बीच में छोड़ कर नहीं जाया जा सकता था तो तीर से अपने नेत्र निकाल कर चढ़ाने को उद्यत हो गए क्योंकि उन्हे स्मरण हो आया था कि मां उन्हें राजीव लोचन पुकारती थी। अब ये अलग बात है कि वाण से नेत्र निकालने को तैयार राम का हाथ स्वयं शक्ति मां आकर रोक लेती हैं कि जय जय होगी नवीन का आशीष रघुवर को मिल जाता है। राम के जितने सहयोगी हैं उतने ही विरोधी भी, पर वे विरोधियों की आलोचना से न तो प्रभावित होते हैं और न उनके आगे हथियार डालते हैं। अपने बुद्धि कौशल से, चातुर्य से या तो उन्हे अपना बना लेते हैं या उन्हें दंडित कर देते हैं। सूपनखा जब सीता को अपने डरावने रूप से भयभीत करती है तो लखन उसके नाक कान काट लेते हैं। ऋषि मुनियों के यज्ञ में व्यवधान डालती आसुरी शक्तियों ताड़का सुबाहु का राम सर्वनाश कर देते हैं। समुद्र से पहले रास्ता मांगने की अनुनय विनय करते हैं लेकिन जब जड़ समुद्र नहीं मानता तो वाण उठा लेते हैं सोषो वारिधि बिशिख क्रशानु , बोले राम सकोप तब भय बिनु होय न प्रीत।और समुद्र रत्नों से भरा थाल लेके उपस्थित हो जाता है। राम शत्रुओं से निपटना जानते हैं, शरणागत की रक्षा करना जानते हैं, उन्हे मान देना जानते हैं तभी जो संपदा शिव रावनहि दीन्ह दिए दस माथ, सोई संपदा विभीषनहि सकुच दीन्ह रघुनाथ का संकल्प ले पाते हैं।

अहंकार और दुर्गुणों के रावण को तो राम जैसा बनकर ही जीता जा सकता है। ये दस दिन शक्ति की आराधना के साथ साथ राम चरित्र मंचन, रामलीला के भी हैं, राम चरित मानस के वाचन के भी हैं, जो जिस रूप में भजना चाहे, उन्हें जानना पहचानना चाहे, उन जैसा बनना चाहे तो उसे राम चरित सागर में अवगाहन अवश्य करना चाहिए । राम तुम्हारा चरित स्वयं काव्य है, कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है। रटो राम, जपो राम बस राम ही राम, बनाते सबरे काम।

कहो मगर सबूर से

 सफ़र जारी है ........1082

04.10.2022

कहो मगर सबूर से.....

अब हुड़क तो हुड़क है,कभी भी उठ सकती है, उसका कोई सेट टाइम थोड़े ही होता है। किसी को अपने लोगों से मिलने की हुड़क उठती है तो किसी को घूमने की और किसी किसी को तो खूब जली कटी,तीखी, कड़वी, तीती सुनाने की हुड़क उठ आती है फिर तो लगता है जितना मन का कलुश है सब अभी का अभी कह डालो, फिर जाने समय मिले न मिले, वैसे भी उठी पैंठ आठवें दिन लगा करती है तो मत चूके चौहान। अरे भाई, कहो और जरुर कहो नहीं कहोगे तो पेट में गुडगुड़ होती रहेगी, पाचन शक्ति तो वैसे ही कमजोर है तुम्हारी, मंदाग्नि रोग के शिकार हो, वैसे ही भोजन नहीं पचता तो मर्जी जितना खा लो, शरीर को तो लगता नहीं, बस सावन सूखे न भादों हरे की तरह सुई का कांटा एक ही जगह अटक गया है, सो कहो और जरुर कहो  पर इतना तो निश्चित करना ज़रूरी है कि कहना किससे है, किस मंच पर कहना है और सबसे बड़ी बात कैसे कहना है।

          ये तीन बातें तो संप्रेषण का पाठ पढ़ाते बहुत पहले ही सिखा दी जाती हैं। जो कहना है ,उसे शब्दों में अच्छी तरह बांध लो, बार बार बिखरो मत, एक ही बात की पुनरावृत्ति मत करो। फिर ये भी देखो यदि बात न्याय की है तो उसे लक्षणा और व्यंजना में क्यों कहना, सीधे सीधे अभिधा में कहो न, जिससे शिकायत है उससे कहो न, औरों के आगे कह कर किसकी कमी बता रहे हो, किसकी गलतियों को इंगित कर रहे हो, तुम भी तो इसी व्यवस्था के अनिवार्य अंग हो तो अपने को कैसे विलग कर सकते हो। ध्यान रखना बंधु, जब एक अंगुली किसी की ओर उठती हैं तो बाकी की तीन हमारी ओर ही संकेत कर रही होती हैं। अरे आगे बढ कर व्यवस्था संभालो न, दूर बैठे बैठे पानी में कंकड़ मारना , पानी की तरंगों को आलोचित करना, उसकी गंदगी के वीडियो बना इधर उधर वायरल करना बाहरी व्यक्तियो का काम है, अपनों को ये सब शोभा देता भी नहीं, बस अपनो से तो सहयोग की अपेक्षा होती है। जो छोटा सा बेमालूम सा खौंता, छेद तुम्हें नज़र आ रहा है उसे वहीं की वहीं रफू कर देना ज़रूरी है बनस्पत अंगुली डाल डाल के उसे और बड़ा करते जाना। अपने लोग तो सहायक हुआ करते हैं, वे चीथड़े नहीं बिखेरा करते।

         बात कहने का तरीका भी होता है कोई, शब्द बड़े कीमती और मूल्यवान हुआ करते हैं, उन्हें यूं ही जाया नहीं किया जाता। तो कहने सुनने के तरीके, तमीज, सबूर सीखना भी ज़रूरी ही नहीं, बहुत ज़रूरी होता है। हर व्यक्ति     अपने मतलब का अर्थ ग्रहण कर ही लेता है पर जो अभ्यागत होते हैं, अतिथि होते हैं, कुछ समय विशेष के लिए हमारे मेहमान होते हैं, उनका भला इन सब से क्या लेना देना। आपसी मतभेद आपस में ही सुलझाने उचित होते हैं। और साथ काम करते किस की जागीरें बंटा करती है भला, कुछ दिनों का साथ है, कुछ दूर साथ चले चलना है फिर सब के मोड़ अलग अलग हो जाते हैं। तो संस्थाएं प्रमुख हुआ करती हैं, व्यक्ति और पद तो आते जाते रहते हैं तो ये अहंकार तो बिलकुल लाओ ही मत कि मैं ये मैं वो। कल सबका अंत एक सा ही होना है।

         कहना सुनना तो लगा रहेगा पर जो शब्दों के गहरे तीर चला दिए गए हैं, वे वापिस लौटने से रहे। अब तो तीर म्यान से निकल चुका है। बस अब तो उन शब्दों के प्रभाव देखो बैठे बैठे। बोलते समय इंसान इतना भी याद नहीं रख पाता कि शब्द संभाल के बोलिए शब्द के हाथ न पांव, एक शब्द औषध बने एक शब्द करे घाब रे। तो कहो सुनो जरुर , जब बात पेट में नहीं पच रही हो उगलो जरुर,कहने सुनाने की हुड़क उठे तो कहो जरुर, चार नहीं दस सुनाओ, बस कहने की तमीज और सबूर सीखना बहुत ज़रूरी है नहीं तो जो रायता फैल जाता है, बिखर जाता है, हाल ही  सिमटने में नहीं आता। सो कहते रहिए सुनते रहिए, कम से कम सूमसाम तो नहीं है, चहल पहल जारी है और इसलिए सफर जारी है जनाब।

जरा ध्यान से

 सफर जारी है....1081

03.10.2022d

 जरा ध्यान से.....

जिसे देखो वही अक्ल बताता चला आ रहा है, बचपन से सुनते ही आ रहे है ध्यान से पढ़ो, ध्यान से सुनो, ध्यान से सीखो, ध्यान से उठो,बैठो, चलो, खाओ, पीओ मतलब सब काम ध्यान से करो। ध्यान से ध्यान से तो सब चिल्लाते रहे फिर चाहे घर हो, स्कूल हो या बाहर हो पर आज तक किसी ने ये बता के नही दिया कि आख़िर ध्यान कहते किसे हैं? ये है किस चिड़िया का नाम। आंख बंद किए साधु संत की तस्वीर देख के पूछते कि इन्होंने आंखें बंद क्यों की है तो कहा जाता ये बड़े ज्ञानी ध्यानी हैं, ध्यान लगा कर बैठे है। किसके ध्यान में बैठे हैं तो ज़बाब मिला भगवान जी के।तो सीखा आंख बंद कर चुपचाप बैठने को ध्यान लगाना कहते हैं। जब खुद आंख बंद कर ध्यान में बैठे तो आंख मुंदती गई और ध्यानावस्था की जगह निद्रावस्था में चले गए। आंख बंद की तो मन जाने कहां कहां नहीं डोल आया, विचार कल्पना लोक में यात्रा करते रहे और तो और जो स्थान आंख खुली होने पर भी नहीं दिखते थे, जिन्हें देखने पर बैन लगा था, वे सब भी इधर उधर से आकर आस पास ही मंडराने लगे । सो समझ आया कि केवल आंखो के पलक बंद कर लेने से तो ध्यान कम से कम नहीं ही लगा करता।

             ध्यान तो जब लगता तब लगता, अभी तो किसी काम में मन भी लगना नहीं शुरू हुआ था। जिस जिस बात को मना किया जाता, मन सबसे अधिक दौड़ वहीं की लगाता और जो जो काम करने को सौंपे जाते, उनमें दीदा बिल्कुल नहीं लगता। मतलब पाठ्यक्रम की किताबें छोड़ किस्से कहानी में बहुत मन रुचता और जैसे ही पढाई करने को कहा जाता,दादी नानी सब याद आ  जाती। बेबात की बात खूब करवा लो पर जैसे ही काम की बात होती, मन लाख लगाओ, लगता ही नहीं, दौड़ा छूटा खेल में भागता। अब मन ही मनमानी करे तो ध्यान बेचारे की क्या बिसात जो घड़ी दो घड़ी लग जाए। एक बार प्यार से समझाया भी गया जब कोई बात कान खोलकर सुनी जाती है और कोई वस्तु  आंख खोलकर, बड़ी बड़ी भट्टा सी आंख फाड़कर पलक झपकाए बिना देखी जाती है तब उसे ध्यान से सुनना और देखना कहते हैं ।अब हम तो किताब खोल कर खूब आंखें गड़ाए रहते फिर भी परीक्षा में गोल गोल बड़ा सा अंडा ही मिलता यानी खूब कान के पर्दे खोलकर बात सुनो फिर भी बात अनसुनी रह जाती है और खूब आंख खोल खोल कर देखो फिर भी बहुत सा अनदेखा रह जाता है।

तो फिर कैसे ध्यान से सुना, पढा और देखा जाता है, कैसे काम में ध्यान लगाया जाता है, कैसे ध्यान से बात सुनी जाती है,प्रश्न तो वहीं का वहीं अटका रह गया। स्नातक में मनोविज्ञान और शिक्षा विषय में रूचि और ध्यान का पाठ पढ़ते जाना कि जब आपकी चेतना किसी व्यक्ति, वस्तु, भाव या स्थान में केंद्रित हो जाती है, उसे ध्यान कहा जाता है। ध्यान और रूचि एक सिक्के के दो पहलू हैं। जिस काम को ध्यान से किया जाता है उसमें रूचि पैदा होती है और जिन कामों में रूचि होती है उनमें खूब ध्यान लगता है। ध्यान को अवधान भी कहा जाता है। किसी वस्तु व्यक्ति भाव और स्थान में चेतना का केंद्रित होना ही ध्यान है। अभी तक तो ध्यान  में ही उलझे पड़े थे, अब एक नया शिगूफा और छोड़ दिया चेतना।अब चेतना को पढ़ने समझने बैठे तो अचेतन और अवचेतन दो शब्दो का झुनझुना और पकड़ा दिया। यानी ध्यान की ढेर सारी परिभाषा तो रटने को दे दी, रूचि का छौंका लगा दिया, चेतन अवचेतन में उलझा दिया पर दो टूक शब्दों में ध्यान का अर्थ ही नहीं समझा सके।

        तो हमें कौन ध्यान में पीएच डी करनी है, हम भी ध्यान को ध्यान से सुनकर समझने की कोशिश करते रहेंगे। तुम कहते रहना ध्यान से सुनो ,ध्यान से करो, हमें जो ध्यान समझ आ गया तो भली नहीं तो काक चेष्टा वको ध्यानम, श्वान निद्रा तथैव च, अल्पाहारी गृहत्यागी बने विद्यार्थी के पांच लक्षणों को पकड़े बैठे रहेंगे, तुम कान पे खूब किल्लाते रहना ए भाई तेरा ध्यान किधर है, ए भाई जरा देख के चलो आगे भी नहीं पीछे भी ऊपर ही नहीं नीचे भी और हम कानो में तेल दिए बैठे रहेंगे कि कान पे  हो के टाल जायेंगे, कान ही नहीं देंगे। तू डाल डाल मैं पात पात।

थे ताकत के पुतले बापू

 सफर जारी है.....1080

02.10.2022

थे ताकत के पुतले बापू......

कौन होते हैं वे लोग जो मर कर भी अमर हो जाते हैं, प्रशंसा या आलोचना के बहाने सब के दिलों में बने रहते हैं। जन्मते तो किसी एक परिवार में हैं पर चहेते लाखों करोड़ों परिवारों के हो जाते हैं। ऐसों के लिए रचनाकारों को लिखना पड़ता है चल पड़े जिधर दो डग मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर। जिधर उनकी दृष्टि उठ जाती है, सब लोग वहीं देखनेलगते हैं। अपने कर्मों से वे बापू और महात्मा बन जाते हैं, देश में चरखा, तकली और स्वदेशी वस्तुओं के प्रचार में लग जाते हैं, वे व्यक्ति कब रह जाते हैं, वे तो मिथक बन जाते जाते हैं, पूज्य हो जाते हैं, गांधीगीरी से अभिहित किए जाते हैं। उनके चरित्र पर डोकूमेंट्री और फिल्में बनती हैं, मार्गों का नामकरण उनके नाम पर होता है,  वे अपने देश में ही नहीं, विश्व भर में अपना लोहा मनवा लेते हैं।

हमने भी बापू को कक्षा दो में पढ़ी कविता से ही जाना था। दुबले पतले,धोती लपेटे, एक हाथ में लाठी लिए और चश्मा लगाए व्यक्ति गांधी थे। हम सबके थे प्यारे बापू, सारे जग से न्यारे बापू। लगते तो थे दुबले पतले पर ताकत के पुतले बापू। सबको गले लगाते बापू, सच की राह दिखाते बापू, कभी न हिम्मत हारे बापू। फिर गांधी जी के तीन बंदरों के बारे में जाना जिनमें एक आंख, दूसरा कानऔर तीसरा मुंह बंद किए होता था कि बुरा मत देखो बुरा मत सुनो बुरा मत बोलो, बुरी है बुराई मेरे दोस्तो। पन्द्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को झंडा फहराने के बाद जब जोशीले नारे लगते तो महात्मा गांधी अमर रहें के नारे लगते। बहुत उत्सुकता होती थी उस महापुरुष के विषय में, फिर उनकी आत्म कथा से उद्धृत छोटे छोटे पाठ पढ़ते जाना कि वे सत्यवादी हरिश्चंद्र और मातृ पितृ भक्त श्रवण कुमार का नाटक बायसकोप में देखकर बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने भी अपनी माता का मान सदैव बनाए रखा। उनका लेख खराब था इसलिए वह सबको सुन्दर लेख के लिए प्रेरित करते थे। कक्षा में निरीक्षण के लिए अधिकारी के आने पर उन्होंने मास्टर के कहने पर भी स्पेलिंग के गलत हिज्जे साथी की कापी से नहीं उतारे। वे सत्य के पालन में पूर्ण विश्वासी थे। वर्धा जाते उनका सेवाग्राम देखने और अहमदाबाद में बापू कुटीर और बा निवास देखते उनके जीवन के बहुत सारे पल सजीव हो उठते हैं। बापू मोहनदास कर्मचंद गांधी से बहुत ऊपर उठ एक किंवदंती बन चुके हैं। मुन्ना भाई एम बी बी एस और लगे रहो मुन्ना भाई में गांधीगीरी के सिद्धांत ही तो दिखाए गए हैं। वे साबरमती के संत कहे जाते हैं। सत्य, अहिंसा उनके मुख्य शस्त्र रहे हैं। नमक आंदोलन, पैदल यात्रा, सत्याग्रह के लिए वे जाने जाते हैं।

आज है दो अक्टूबर का दिन आज का दिन है बड़ा महान गीत ने ही जन जन को समझाया है कि यह तिथि अकेले बापू की ही जन्मतिथि नहीं, लाल बहादुर के जन्म का उत्सव भी है। आज के दिन दो फूल खिले थे जिनसे महका हिंदुस्तान, जय जवान जय किसान। एक का नाम था बापू गांधी और एक लाल जवाहर थे, एक का नारा अमन एक का , जय जवान जय किसान। नाटे कद के लेकिन संकल्प शक्ति के धनी पूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री किसी से हेठे थोड़े ठहरते हैं। नैतिक मूल्यों पर पूरा जीवन न्यौछावर कर देने वाले शास्त्री जी हम सबके आदर्श हैं। उनको पढ़ते हमने जाना जो मन में ठान लो,दृढ़ संकल्प ले लो तो तुम भी हिमालय की ऊंचाइयां छू सकते हो, देश के शीर्षस्थ नेतृत्व पर पहुंच सकते हो। अमीर या गरीब परिवार में जन्म लेना तुम्हारे हाथ नहीं हुआ करता, पर अपने परिश्रम से, अपने संकल्प से,धैर्य से तुम अपनी ही नहीं, अपने देश की तकदीर भी बदल सकते हो। होते होंगे गांधी जी शास्त्री के जीवन के कुछ आलोचनात्मक पक्ष पर हमारे मस्तिष्क पर तो बालपन से ऐसी ही छाप पड़ी है , वही स्थाई है। दोनों ही हमारे लिए समान रूप से वंदनीय है, अभिनंदनीय है। जयंती पर उनके चरणों में सादर वंदन। कोशिश रहेगी कि हम भी उनके जीवन से प्रेरणा ले अपने जीवन को उस ऊंचाइयों तक ले जा सके जहां तक वे पहुंचे। सत्य अहिंसा के पक्षधर गांधी जी और जय जवान जय किसान के पोषक शास्त्री जी को सादर नमन।

चले चलो बढे चलो

 सफर जारी है......1079

01.10.2022

चले चलो बढे चलो......

सांझ ढले सब घर लौटते हैं, रात्रि विश्राम करते हैं ओर फिर सुबह उठकर अपने अपने काम पर चल देते हैं। एक स्वस्थ व्यक्ति हमेशा काम करना चाहता ही है । उसे कुछ किए बिना चैन ही नहीं पड़ता, पड़ना भी नहीं चाहिए, जहां रुके, वहां सड़े। रुका हुआ तो पानी भी बदबू देने लगता है। बहता पानी और रमता जोगी की अवधारणा इसीलिए रही होगी। इन सबके मध्य आलसियों की एक लंबी फौज भी तैयार होती है जो अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए सबके दाता राम पंक्ति को कस कर पकड़ कर बैठे हैं, उन्होंने इसे ही मूल मंत्र बना लिया है। न वे काम करते हैं और न करने देते हैं। कभी दवाब में करना ही पड जाए तो बेमन से करते कम बिखेरते अधिक है। ऐसी स्थिति पैदा कर देते हैं कि अगला सोचे जितनी देर में इससे बार बार करने के लिए कहो, मार माथा पच्ची करो, उतनी देर में तो खुद नहीं कर लो। करने की अपेक्षा कराना, सीखने की अपेक्षा सिखाना, पढ़ने की अपेक्षा दूसरे को पढ़ने के लिए तैयार करना शुरू से ही अधिक श्रम की मांग करता है।

            विद्यार्थी बन कर जिज्ञासु भाव से कठिन से कठिन विषय को सीखा अवश्य जा सकता है पर उसे दूसरों तक उसी रूप में पहुंचा देना कैसा आपने ग्रहण किया, अतिरिक्त श्रम की मांग करता है। न करता होता तो अध्यापक बनने के लिए लंबे और कठिन शिक्षण प्रशिक्षण की व्यवस्था क्यों रखी होती। प्रशिक्षण केवल विषय भर जा ही नहीं होता, ये आपके पूरे व्यक्तित्व को बदल कर रख देता है। आपके अंदर धैर्य और सहन शक्ति विकसित करता है, गलत को सुधारने की आदत डाल देता है, आपको कक्षा में प्रवेश पूर्व की तैयारियों से अवगत कराता है। विद्यार्थियों के मानस को समझने योग्य बनाता है। यदि कक्षा में बैठा हर विद्यार्थी सीखने और पढ़ने के लिए आया है, बैठा है तो अध्यापक भी वहां कुछ नया सिखाने, पिछले सीखे ज्ञान को दोहरवाने, उनके अनुभव में कुछ नया जोड़ने ही जाता है। जिस दिन आप बिना तैयारी के कक्षा में जाते हैं, आप सच में पढ़ाते नहीं, इधर उधर की बात कर घंटा बजने की प्रतीक्षा करते हैं कि ये समय जल्दी ही बीते। सीखने को उत्सुक विद्यार्थी के चेहरे मायूस हो जाते हैं, उसकी रूचि कम हो जाती है और उसका उत्साह ठंडा पड़ जाता है। केवल एक दिन की शिथिलता का ये प्रभाव होता है तो सोचो जो अध्यापक रोज ही खाली हाथ खाली दिमाग़ कक्षा में जाते हों तो भला किस की रूचि पढ़ते में रहेगी।विद्यार्थी  का मानस तैयार करना भी एक कला है। इसीलिए कक्षा शिक्षण में प्रस्तावना ज़रूरी होती है जिसे पूर्व ज्ञान से जोड़ा जाता है। पढ़ाना ये थोड़े ही न है कि कक्षा में गए और धड़ धड़ धड़ ताबड़तोड़ गोलियां दाग दी, ख़ुद खाली हो गए और चल दिए। अरे जो परोसा उसे प्यार और भाव से परोसा या नहीं, दूसरे ने उसे ग्रहण किया या नहीं, पता चला उसके लिए तो सब इतना अधिक गरिष्ठ था कि उसे कुछ पचा ही नहीं, आपके प्रहार इतने धड़ाधड़ थे कि उसके कान में कुछ गया जी नहीं। आपकी दृष्टि से पाठ्यक्रम पूरा हो गया, पूरी रामायण समाप्त हो गईं और अगले को पता ही नहीं चला कि राम रावण द कौन। तो ऐसा शिक्षण आपको संतोष भले दे दे पर विद्यार्थियों के किसी काम का नहीं होता।

            आप भी हद करते हो।अरे भलेमानस,जब किसी को भोजन तक कराते हो तो कितने मन से उसकी रूचि कस भोजन बनाते हो रूचि के साथ साथ ये भी ध्यान रखते हो कि उसके लिए क्या पौष्टिक है, उसे क्या हजम हो जायेगा, फिर थाली परोसते खाद्य पदार्थ ही नहीं परोसते उसके साथ प्रेम का दुलार का छौंक भी लगा देते हो, फिर अगला जब तक भोजन समाप्त नहीं कर लेता, उसके आसपास ही बने रहते हो, ज्याड़ा भाव उमड़े तो पंखा झलते रहते हो, थाली में कुछ कम हो तो तुरंत परोस देते हो और जब वह भरपेट खा प्रसन्न भाव से चला जाता है तब चैन की सांस लेते हो। पढ़ाना सिखाना भी कुछ कुछ ऐसा ही है। पात्र के अनुकूल विषय की तैयारी फिर उसे उतनी ही संजीदगी से प्रस्तुत करना, जब तक सामने वाले के चेहरे पर समझ आने का संतोष का भाव न दिख जाए बार बार इस उस तरीके से सिखाते बताते रहना और जब अगले को सब कुछ समझ आ जाए तो सन्तोष की सांस लेना सही और सच्चा शिक्षण है।

            तो मित्रो सिखाया ताभी जा सकता है जब स्वयं को सब क्रिस्टल क्लीयर हो, जो समझाना है उसमें पानी की तरह पारदर्शिता हो, खुद को विषय अच्छी तरह स्पष्ट हो, और उसके लिए रटना नहीं, समझना होता है। लगातार पढ़ना होता है, जानकारी को अद्यतन करना होता हेयर। विद्यार्थी तो पका पकाया चाहते ही हैं, उन्हें तो स्पून फीडिंग की आदत होती है, वे आपसे यही चाहेंगे कि बस आप नोट्स डिक्टेट करा दें, संभव हो तो वही उनको उपलब्ध करा दें, वे फोटो कापी कर आपस में बांट लेंगे, उसे रट रटा कर उत्तर पुस्तिका में लिख परीक्षा भी पास कर लेंगे फिर कक्षा में पढ़ाने की डिग्री भी ले लेंगे पर जो खुद ही नहीं समझे वे दूसरों को क्या दे पाएंगे। तो सिखाने वाली पंक्ति में शामिल हो तो लगातार चलो, चलते चलो, थके हो तो विश्राम करो और आगे बढ जाओ। यही तुम्हारी तपस्या है। भविष्य के निर्माण की जिम्मेदारी तो तुम्हारे कंधों पर है, तुम शिथिल कैसे हो सकते हो भला, गफलत में पड़े रहना तुम्हें शोभा नहीं देता। कैसी बे ते की भाषा बोलते हो। सुधारो अपने को, कर्मठ बनो, तुम्हारी छोटी सी छोटी बात पर सबकी दृष्टि केंद्रित है, तुम ही भटक जाओगे तो भटके भविष्य को क्या राह दिखाओगे। तो तुम्हारा सुधरना ज्यादा ज़रूरी है, अपने को रोज मांजना तराशना ज़रूरी है। तुम तो दुनिया को सिखाने वाले हो, ज्ञान देने वाले हो, तुम्हें ढीले पीले होना शोभा नहीं देता। तुम कमर कसे रहो, चलते चलो, बढ़ते चलो। चलना ही ज़िंदगी है रुकना है मौत तेरी, ए ज़िंदगी के राही किस बात की है देरी।

सफलता के मायने

 सफर जारी है.....1078

30.09.2022

सफलता के मायने.......

आख़िर इतनी भागादौड़ी है किसलिए, चाहिए क्या, मंजिल कहां है हमारी, कौन सा स्थाई सुख है जिसके पीछे भाग भाग के बेहाल हुए जा रहे हैं? जब सब के सुख की परिभाषा अलग है तो सबकी मंजिल भी अलग अलग होगी तो दूसरों की देखा दाखी ये हबड़ तबड किस लिए। जानते तो है कि कोई भी खुशी, कोई भी सुख सदैव रहने वाला नहीं है, जब तक वस्तु हाथ नहीं आ जाती, तब तक की बैचेनी भर है, और जैसे ही वह हस्तगत हो जाती है, मन कुछ और चाहने लगता है। मन की क्या, इसकी चाह तो कभी पूरी नहीं होती। जब सुख मिले तो उसके सदा बने रहने के लिए चिंता करता है और जो दुख में हो तो उससे छुटकारे के लिए बैचेन रहता है। दोनों ही स्थितियों में समत्व का भाव अभी तक विकसित ही नहीं हुआ। बस एक अजब सी बैचेनी में जी रहे हैं हम सब।

याद आती है पुन: मूषक भव: की कथा जिसमें मुनि अपने योग बल से चूहे को शेर बना देते हैं पर उसकी लगातार बढ़ती कामनाओं के कारण उसे पुन: मूल रुप में ले आते हैं। उस मछुआरिन का प्रसंग भी ताजा हो जाता है जो देवी मछली से लगातार वरदान मांगते प्रकृति को भी अपनी इच्छा से चलाने की मांग रख देती है और देवी मछली  उसे ये वरदान नहीं दे पाती और उसे पहले रूप में रहने का शाप दे देती है। देवी देवता भी क्या करें उनके पास देने के लिए वरदान और शाप ही हुआ करते हैं। हम भी तो उतने उतावले हैं कि अपनी जिद में आ के कबीर को याद नहीं रख पाते कि साई इतना दीजिए जामें कूटुम समाय, मैं भी भूखा न रहूं साधु न भूखा जाय। अपने और अपने परिवार का पेट भर जाए और अतिथि अभ्यागत का भी पान फूल से स्वागत कर सकें, इतना मिले तो बहुत है। पर सुरसा की तरह मुंह फैलाती असीमित इच्छाएं इतने से कहां तृप्त होती हैं भला। उन्हें तो और और का रोग जो लगा हुआ है। जो पास है उसका उपभोग कर पाए अथवा न कर पाए, पर और भरने और लादने का शौक कभी पूरा नहीं होता।

              जो ईश्वर ने दिया, वह काफी है, उसने तो वह सब भी दिया जिसके संभवत हम पात्र भी नहीं थे फिर भी बराबर असंतोषी बने रहते हैं। रहने के लिए सिर पर पक्की छत है, पांवों के नीचे ठोस जमीन है, दो टाइम पेट भरने का जुगाड है, परिवार है, बोलने बतराने को आत्मीय स्वजन हैं, मित्र हैं, बैंक खाते में शून्य की बढ़ती संख्याएं हैं, स्वस्थ शरीर की नेमत भगवान् ने दी है। छोटी मोटी सीजनल बीमारियों को छोड़ दें, तनाव और दवाब से मुक्त हो लें, दिनचर्या ठीक कर लें, आलस को छोड़ दें तो ये शुगर बीपी भी नियमित हो जाएं। पर नहीं हम तो इतने कृतघ्न हैं कि ईश्वर ने जो दिया उसका अहसान मान शुक्रगुजार नहीं होते, बस शिकायतों का पुछल्ला लगाए रहते हैं। आंख से ठीक ठीक दिखता है, कान सुनते हैं, बोल सकते हो, चल फिर सकते हो, हाथ काम करने के योग्य है, कोई अंग भंग नहीं , किसी के आगे हाथ पसारने की नौबत नहीं आती तो इससे बड़ा सुख और भला और क्या होगा पर नहीं, हमें तो झींकने रोने बिसूरने की आदत है, अपनी थाली का भात नहीं रूचता, बस दूसरे की थाली का भात मीठा लगता है। हममें संतोष रहा ही कहां, हमारे मन इतने अशांत और बैचेन हैं कि जो पास है, ईश्वर ने जो सौगात हमें दीहै, वह नज़र तर आती ही नहीं। बस मार हाय तौबा में लगे रहते हैं।

              दो घड़ी शान्त बैठ कर सोचो तो सही कि आख़िर चाहिए क्या, इच्छाएं और कामनाएं तो असीमित हुआ करती हैं, इनकी पूर्ति कभी नहीं हुआ करती है। ये तो पेट भर जाने के बाद भी स्वाद के कारण कुछ और खाने की बलबती इच्छा है जिसके पूरा होने से नुकसान ही नुकसान है। तो जो पास है, जितना मिला है उसमें सुख तलाशना सीखो, बहुत दिया है भगवान् ने, उसका सुकाराना मनाओ। जीवन को और बेहतर बनाने की खूब कोशिश करो। साधनों से ही सब कुछ नहीं हुआ करता, जो पास है उसके सही उपयोग से भी ज़िंदगी बेहतर होती है। जरा अपने पास इकठ्ठे किए ढेर को कभी देखो तो सही, कितनी कितनी वस्तुएं ऐसी हैं जिनका कभी उपयोग ही नहीं हुआ फिर भी क्या कभी जरूरत पड़ जाए तो रख लेते हैं के भाव से जोड़ी वस्तुएं केबल जगह घेरती हैं, अस्त व्यस्त रखती हैं, तो उस कबाड़े को निकाल फेंको न। जितने अल्प साधनों और सुविधाओं में जीना आ जाएं , जीवन जितना सरल और सादा हो आप उतने ही सुलझे हुए होते हैं। बिना बात का बोझ क्यों लादे भला। खान पान पहनावे, आचार विचार के साथ मन से भी सरल और पवित्र बने रहिए, जलेबी की तरह गोल गोल उलझने की जरूरत नहीं। जितना लादोगे उतना उलझोगे। तो यथा संभव ज़िंदगी को सरल भाव से जीएं। अपनी मंजिल तय करें, आपको चाहिए क्या इसे स्पष्ट समझ लें, बस ज़िंदगी बहुत आसान हो जाएगी।

उपासी हो क्या सबरी

 सफ़र जारी है.....1077

29.09.2022

उपासी हो क्या सबरी.....

आश्विन अमावस्या यानी श्राद्ध पक्ष के समाप्त होते ही त्योहारी सीजन शुरू हो जाता है। शारदीय नवरात्रि से प्रारंभ होकर दशहरा, कार्तिक माह लगते ही करवा चौथ, अहोई अष्टमी, पंच दिवसीय दीपावली त्यौहार, देवोत्थान एकादशी से लेकर देवशयनी एकादशी तक कितने कितने त्योहार हैं जिनके ब्याज से ईश पूजा और व्रत उपवास संभव होते हैं । चातुर्मास को छोड़ लगभग हर माह में कोई न कोई त्यौहार अवश्य होता है जिसमें कथा कहानी, पूजन और उपवास की स्थिति होती है। और तो और सप्ताह के सातों दिन भी किसी न किसी देव इष्ट को समर्पित हैं। सोम शिवजी, मंगल हनुमान जी, बुध गणेश, गुरुवार साई, शुक्र देवी, शनि शनि देवता और रवि सूर्य भगवान को। यूं तो पूजा पाठ किसी एक वर्ग के हिस्से नहीं आते, इस पर छोटे से लेकर बड़े और गरीब से लेकर अमीर सभी का साझा अधिकार है पर आधी आबादी इसमें अधिक विश्वासी है। शायद उसकी आस्था अधिक प्रबल है या उसे अपने आराध्य पर अधिक विश्वास है कि इनकी शरण में जाओ, सब ठीक ठाक हो जायेगा, इन्हें ही दिनरात भजो, रटो, ध्याओ तो मन कहीं भटकेगा ही नहीं। सहज विश्वासी होती है इसलिए भगवान् पर अखंड विश्वास रखती हैं, उसी की पूजा उपासना में जीवन बिता लेती हैं।

आख़िर क्यों करते हैं हम पूजा, भजन, ध्यान, व्रत उपवास, क्या इसका भी कोई मनोविज्ञान है, क्या मिलता है व्यक्ति को यह सब करके, उपवास का अर्थ कया है, पूजा कैसे की जानी चाहिए। इस विषय पर सोचा कम जाता है, किया अधिक जाता है। जो जो बचपन से होते है, घर परिवार में अपने बड़ों को करते देखा है, सहज भाव से वैसा ही हम सब करना सीख जाते हैं। एक आले में भगवान् जी की मूर्ति और तस्वीर रख उन्हें नहलाते धुलाते पोशाक बदलते पुष्प हार चढ़ाते भोग लगाते टन टन घंटी बजा आरती करते, हाथ जोड ध्यान मग्न होते भजन श्लोक स्तुति गाते रामायण गीता शिव चालीसा हनुमान चालीसा दुर्गा चालीसा सुंदरकांड पढ़ते, अड़ोस पड़ोस के घरों में आए दिन सत्यनारायण कथा, भजन कीर्तन का आयोजन होते बचपन से देखा है, तो ये सब आदत में शामिल हो गया है, मंदिर देख हाथ अपने आप जुड जाते हैं, सिर श्रद्धा से झुक जाता है, प्रसाद पाने को हाथ बढ़ जाते हैं, इसके लिए प्रयास नहीं करना पड़ता। मंदिर में प्रवेश करें और घंटा न बजाएं, उस शांत और दैवीय ऊर्जा से भरे स्थान पर जाकर मन कैसी अजब शान्ति से भर जाता है। देव प्रतिमाएं आशीष देती प्रतीत होती हैं। बचपन से इन्हीं के आगे तो सिर नवाते रहे हैं फिर चाहे शक्ति सुशील मंदिर हो, सनातन धर्म मंदिर, बलकेश्वर महादेव मंदिर अथवा लंगड़ा चौकी का हनुमान मंदिर। मंदिरों के साथ पूजा और प्रसाद का सदा से नाता रहा है तो बचपन में मंदिर जाने का एक बड़ा कारण प्रसाद में मिले बरफी, लडडू, बूंदी और गुलदाने भी रहे हैं। पूजा कैसे की जाती है, इसके लिए कोई अलग से कक्षा थोड़े ही लगती है, घर में परिवारी जनों को और स्कूल में हाथ जोड़कर आंखें बंद कर प्रार्थना करते यह भाव तो दृढ़ हो ही जाता है कि दिन की शुरुआत भगवद भजन, सबको प्रणाम करने, पैर छूने से होती है। भगवान् में अटूट आस्था आपको टूटने बिखरने भटकने से और व्रत उपवास आपको स्वस्थ बनाने में बड़ा योगदान देते हैं बशर्ते इन्हें सही रुप में ग्रहण किया जाए।

सप्ताह में एक दिन उपवास का विधान शरीर को पाचन क्रिया से अवकाश देने के लिए है न कि गरिष्ठ भोज्य पदार्थों को पचाने की अतिरिक्त शक्ति व्यय के लिए। सच तो यह है कि हमने व्रत और उपवास का सही अर्थ ग्रहण किया ही नहीं है। व्रत संकल्प का सूचक है कि आज मैं दुर्गुणों यथा झूठ चोरी चकोरी अपशब्द प्रयोग से अपने को दूर रखूंगा, ईश ध्यान में रहूंगा, भोजन से विरत रहूंगाया उसमें परिवर्तन कर अपने पाचन यंत्र को विश्राम दूंगा। पर ऐसा कहां हो पाता है, रोजमर्रा के भोजन से हटकर इन दिनों के आहार में गरिष्ठता और कैलोरी अधिक पहुंचती है और मन बार बार दोहराता है आज तो व्रत है, कुछ ज्यादा ही कमजोरी महसूस हो रही है। ये संकेत मन ही दिमाग़ को भेजता है और हम उसी भाव में जीने लगते हैं। उपासी रहना बहुत अच्छी बात है फिर चाहे वह भोजन पानी का हो या मौन रहने का, हमें शक्ति संपन्न ही बनाता है। उप का अर्थ समीप, पास और वास का अर्थ रहना बैठना है अर्थात उपवास के दिनों में हम परम पिता सर्व शक्तिमान ईश्वर के पास, उसके चरणों में उसकी दया कृपा पाने को बैठे रहते हैं।

जब हर क्षण प्रभू के ध्यान में बने रहते हैं, उसके नाम की रटन लग जाती है, राधे कृष्ण हरे कृष्ण राम राम का अजपा जप चलता है तो मन में किसी के प्रति दुर्भाव पैदा नहीं होता, किसी से बदला लेने की भावना नहीं होती। आप भगवान् से इस उस की शिकायत नहीं करते बल्कि सबके कल्याण की सबको सद्बुद्धि देने की प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना से चित्त निर्मल होता हैबशर्ते उसे भाव से किया जाए। माला तो कर में फिरे जीभ फिरे मुख माहि, मनवा तो चहुं दिश फिरे ये तो सुमरिन नाही।मुंह में राम बगल में छुरी से तो बात नहीं बनती। कांकर पत्थर जोड़ के मस्जिद लई बनाय, ता चढ़ी मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय भी ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता नहीं है। उसे तो सच्चे भाव से भज कर ही पाया जा सकता है। जब उसके शरणागत हो जाते हैं, सच्चे ह्रदय से उसे पुकारते है तो उसके कानों तक पुकार जाती है, वह हमें विप्पत्ति से उबारता भी है और कष्टों से बचाता भी है तो सच्चे मन से उसके पास उसके चरणों में बैठते हैंड, उप वास करते जीने, उसकी शरण में चलते हैं, उसे बजते हैं हे प्रभू मैं तेरी शरण में हूं, मेरी रक्षा करो प्रभू, मेरा कल्याण करो, सबका कल्याण करो प्रभू। सच्चे दिल से की प्रार्थना उस तक जरुर पहुंचती है, हमारी भी पहुंचेगी। शरणागत हैं प्रभू रख माम, पाहि माम, त्राहि माने। उपासी रहो तो ऐसी, हर क्षण भजे तो ऐसे। जापे कृपा राम की होई, ताले कृपा करें सब कोई

Monday, September 26, 2022

पाती प्यारी बिटिया कू

 सफ़र जारी है.....1070

28.09.2022

पाती प्यारी बिटिया कू.......

प्यारी लाडो,

सदा सुखी रहो।

तुम्हारे जन्म पर कितने कितने खुश थे परिवारी जन कि उनके घर लक्ष्मी आई है, जैसे जैसे शिक्षित और संस्कारित होती गई, वैदुष्य से परिपूर्ण सरस्वती की छवि तुम्हारे चेहरे से झलकती थी। कब सिखाया गया था तुम्हें कि अन्याय और अत्याचार के आगे सर झुका कर रहना, अगले की कहनी अनकहनी को मौन भाव से सुन लेना,परिवार के सदस्यों के साथ असभ्य और अभद्र व्यवहार,अशिष्ट आचरण और दुर्वचनों के प्रयोग पर मौन साध लेना पर तुमने सब सहा। मुंह सिले बैठी रहीं, चूं तक नहीं की और जब पानी सिर से ऊपर गुजर गया तब भी चबाते स्वर में अपना मुंह खोला। मुंह खोलने के नतीजे ये हुए कि अगला सुधरना तो दूर, और अधिक बिफर गया क्योंकि उसकी पोल पट्टी जो खुल गई। फलस्वरूप जो घर के अन्दर घटता था, वह अब सार्वजनिक हो गया। तुम्हारी घर बचाने की हर कोशिश असफल हो गई। जानते हैं कि तुम जीवन से निराश हो गई हो, तुम्हारा ह्रदय विदीर्ण हैं, जो पिघले शीशे से कटु और तीखे शब्द तुम्हारे कानों में डाले गए हैं, उससे बहुत पीड़ित हो, तुम्हारे जीवन में दूर दूर तक आशा की कोई किरण दिखाई नहीं देती। तुम्हें अपना जीवन बोझ लगने लगा है। सामाजिक आक्षेपों से तुम बहुत विचलित हो। इतनी अधिक परेशान हो कि कभी कभी इस सबसे मुक्ति पाने को जीवन से ही मुक्त होने की सोच लेती हो। तुम कुछ कहो या न कहो, पर माता पिता को सब दिखता है, समझ आता है। बेचारगी और लाचारगी में भले मौन हों, कुछ नहीं कर पा रहे हों पर अपनी लाडली, अपनी परी के दुख से विचलित जरुर हैं। आज तुमसे कुछ बात करनी है बिटिया।

सुनो, तुम्हें पढा लिखा कर, आत्म निर्भर बना, तुम्हें जीवन साथी के साथ घर से विदा किया था इस आशा के साथ तुम सदा सुखी रहोगी, जीवन में थोड़े बहुत संघर्ष हर के जीवन में आते ही हैं, उन्हें झेलना ही होता है समझदारी और बहादुरी से इनका सामना करना ही होता है। जीवन में धूप छांव होती ही है, जब धूप से खूब तपते हैं तो छांव और सुखद लगती है। तुम्हारा भविष्य उज्ज्वल हो, ऐसी ही कामना की थी, सदा सौभाग्यवती का आशीष सबसे पाया था तुमने पर भाग्य तो हमसे दो हाथ आगे चला करता है न, नियति के खेलों को भला कौन समझ पाया है आज तक। सोचते कुछ हैं लेकिन होता कुछ और है। ये सच है कि जीवन में एक अदद साथी बहुत ज़रूरी होता है पर यदि वह हमारे अनुकूल न हो या हम उसके अनुकूल न हों, 

 उसके जीवन में हमारी कोई जगह न हो, हम बात बात पे दुत्कारे, लतियाये जाते हों, सामने वाला अपने अहम में इतना अधिक आत्म मुग्ध हो कि अशिष्टता की सारी सीमाएं लांघ जाएं, स्वयं भू बन जाए, किसी का आदर सम्मान न कर सके, सबको भरे बाजार नंगा कर सकने की सामर्थ्य रखता हो, बात बात पर मुंह से अपशब्द झरते हों, जो चार लोगों के बीच तुम्हें और तुम्हारे परिवार को अपमानित और जलील करें, उससे दूरी बनाना ही उचित है। तुम लक्ष्मी सरस्वती ही क्यों बनी रहीं, नारी का एक रुप दुर्गा का भी है, पहले गलत व्यवहार पर ही रणचंडी बन जाना चाहिए था, अगले की हिम्मत तो देखो कि वह किसी का भी लिहाज़ नहीं करता। पर अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है, जब जागो तब सबेरा। पत्थरों से मूड मारने से कोई फायदा नहीं, उल्टे खुद को ही चोट लगती है। विनती कर कर के खूब देख लिया, हाथ पैर खूब जोड़ लिए, क्षमा याचना खूब कर ली पर पत्थर नहीं पिघला तो नहीं पिघला। अब सुनो बेटी, पत्थर दिल कभी पिघला नहीं करते। अब अपना बचा खुचा साहस बटोर कर खड़ी हो जाओ, शिखर तक अकेले ही जाया जाता है, उसमें कोई साथ नहीं चला करता। अपने लक्ष्य खुद ही पूरे करने होते हैं। अपनी शक्ति को बटोरो, जीवन के विविध आयाम होते हैं, कुछ पन्ने काले होते है और कुछ ख़ाली भी छूट जाते हैं, उनकी क्षति पूर्ति अपने अन्य कामों में विस्तार लाकर करनी होती है। तो जो छूटा, उसका अफसोस मत करो, जो सामने है उस पर सारा फोकस रखो। कभी कभी चयन गलत भी हो जाते हैं, उनका ज़िंदगी भर अफसोस ही नहीं मनाया जाता, उन्हें छोड़ आगे बढ लिया जाता है। रास्ते में बहुत से लोग मिलते हैं, सब अपने तो नहीं हो जाते न। तो उन्हे उनके हाल पर छोड़ आगे बढ़ो। जीवन कभी रुका नहीं करता। एक साथ नहीं तो क्या, सच की इस लड़ाई में पूरी कायनात तुम्हारे साथ है, आगे बढ़ो, लक्ष्मी और सरस्वती तो जरुर बनो पर जहां जरूरी हो दुर्गा रुप धरो। यह भी उतना ही ज़रुरी है।

तो सदा खुश रहो बिटिया, स्वस्थ रहो और अपना लक्ष्य प्राप्त करो। माता पिता का आशीष तुम्हारे साथ सदैव है।

ध्यान रखना तुम बेचारी नहीं हो, तुम में संभावनाओं का अथाह सागर हिलोरें मार रहा है। सो अपने को सहेजो, समेटो और आगे बढ़ो, जो छूटा उसका दुख मनाने में ही ज़िंदगी मत बिता दो।

तुम्हारे जन्मदाता और पालक।

Sunday, September 25, 2022

मान को तो पान ही भौत होत ए

 सफर जारी है....1069

27.09.2022

मान को तो पान ही भौत होत ए......

सबरे कह रए हैं तो होयगो ई बिटिया को दिना आज। उत्तर प्रदेश लेखिका मंच ने तो आगरा की रचनाकार बिटिया को बहुत्तेरो मान करो , शाल पिन्हायो, माला डारी गरे में और बाय का कैत हैं सम्मान पत्र हू पढ़ो। हती बिटिया जा लाइक, खूब सी तो किताब लिखी और निरे मेडल जीते। बोलबे ठाढी भई तो जे समझो कि मुंह ते फूल से झर रए, कहानी कविता कैसे लिखी जात है, सब ब्योरेबार बताओ। बोल रई काई तो सबरेन की आंख बाके मोडे पे ही चिपक रई । मन खुश है गयो बा बिटिया ए सुन के तो। अब ऐसे फंक्शन में जाबे को तो खूब मन करे। देखो भैया जहां मान होय महां तो जरूल ते जानो चहिए। हम तो रहीम बाबा ए याद कर लेत ऐं...... रहिमन रहिला की भली जो परसे चित लाय, परसत मन मैलो करे सो मैदा जरि जाय। खूब प्यार ते मान ते बुलाओगे तो दौड़े चले आंगे नाय तो हमें ना जानो काहू के। चो जाएं, अपने घर भले। मान को तो पान हू भौत होत ए भईया और आज तो गेंहू के संग हम बथुआ ऊ ए पानी लग गयो। नाय झूठ नाय बोलिंगे साब , खूब दिल ते स्वागत करो, हम तो पहले पहल गए आज, काऊ ए जानते ऊ नाय, बस सुन राखी कि उत्तर प्रदेश को कोई लेखिका मंच हते।

             का का नाम हते बिनके वो का कैते शशी, प्रीति, अपर्णा, प्रगति, कल्पना, गीता, शिखा, जे नाम तो याद है गए और एक और हती ज्योति। निरी सी हती, सब ऐसी धा पा के मिली कि मन खुश है गयो। बिलकुल बाहेली सी लगी मोय तो। कैसी जेठ भर भर के मिल रई। भाई हू हते थोड़े बहुत से।अब सबने कई तो हमने ऊ एक कविता चैंप दई कि छोरियो, सबन ते पैले अपनी इज्जत करिबो सीखो, खुद ए जानो, अपनो मान पहचानो ता पीछे दूसरे की शिकायत करो। मोय तो ऐसी लग रई कि इन छोरी छापरी ने आधे अधूरे नाटक नाय पढ़ो दीखे मोहन राकेश को। जो पढ़ो और गुनो होतो तो समझती कि कोई पूरम पट्ट नाए होय करे, कोई में एक कमी तो दूसरे में दूसरी। घर गृहस्थी तो ऐसे ई चलो करे। एक ने कई दूसरे ने मानी। जे बात बात पे रूठबो मटकबो ठीक नाय होय करे। दो बिन ने कहीं तो चार तुम कह लेयो, कह कबा के छुट्टी करो। बात ए दिल में फांस सी चुबो के मत बैठ जाओ।

                हम चाहे कोई बन जाए पर सबसे पहले तो बिटिया ही होय करें, फिर काहू की बहिन, काऊ की पत्नी काहू की बहू काऊ की मईया होए। हमाई मां ने हमें एक कविता रटाई ,शायद से कल्याण में ते बताई होगी, अब सल नाये। हमने बी एड में हू पहले दिना सुनाई। चलो अब बात चली है तो तुम्हें हू सुनाए देत ऐं नाय तो बाद में बात बनाओगे, कछु से तो इतराबे को इल्जाम लगा देंगे तो जाते तो बढ़िया है सुना ही देत हैं, कछु भूल जाए तो किल्ल मत करियो ,भली... मां जब मुझको कहा पुरुष ने तुच्छ हो गए देव सभी, इतनी ममता इतना आदर इतनी श्रद्धा कहां कभी, उमड़ा स्नेह सिंधु अंतर में डूब गई आसक्ति अपार, देह गेह अपमान क्लेश छि विजयी मेरा शाश्वत प्यार। बहन पुरुष ने मुझे पुकारा कितनी ममता कितना नेह। बेटी कह कर मुझे पुरुष ने दिया स्नेह अन्तर सर्वस्व, मेरे सुख सुविधा की चिन्ता उसके सब सुख हृस्व, अपने को भी विक्रय करके मुझे देख पाए निर्बाध, मेरे पूज्य पिता की होती एक मात्र यह जीवन साध। प्रिये पुरुष अर्धांग दे चुका लेकर के हाथों में हाथ, यही नहीं उस परमेश्वर के निकट हमारा शास्वत साथ। तन मन जीवन एक हो गए मेरा घर उसका संसार, दोनों ही उत्सर्ग परस्पर दोनों पर दोनों का भार। 

                ये सारे के सारे रिश्ते बेहद पवित्र और महनीय थे पर जब पण्या दस्यु आज कहता है पुरुष हो गया आज पिशाच, पुत्र पिता भाई स्वामी तुम क्या इतने निरुपाय, स्थिति तो तब बिगड़ी। हम तो सबरे रिश्तन कू मान देबे पर जब अगलो अपनी सीमा रेखा पार करेगो तो हम काहू ते कमती थोड़े ई हैं, मुंह तोड़ के धर देंगे। ऐसे पोच और दब्बू नाय। सो भैया मान देयोगे तो खूब पूजिन्गे और जो ऐंठ के मारे पैंठ कू जाओ तो तिहाई मज्जी। हम तो रिश्ता बचाबे की अपनी जान खूब कोशिश करिंगे और जो तिहाई समझ में नाय भर रई तो बैठे रहियो अपनी अटरिया पे अपने घमंड में, हम पे बेटी, बहन, मईया बन के हू रहनो आत है। एक रिश्ता टूटबे ते सारे रिश्ता खत्म थोड़े ही हे जाबे। तुम अपनी गैल हम अपनी गैल। और नेकऊ समझदार भए तो जे नौबत आयेगी ही नाय। सोच लीयो तिहाये घर  में हू बहन बेटी हते, राम जी को न्याय में कोई झोल नाने। तो मान देयोगे, मान पाओगे। मान को तो पान हू भौत होत ए।

उल्टे बास बरेली के

 सफर जारी है...1068

26.09.2022

उल्टे बास बरेली के.....

गिरा होगा कभी किसी का झुमका बरेली के बाजार में और होते होंगे उल्टे बास बरेली के, इस बरेली यात्रा ने तो अनेक नाम परिचय श्रृंखला में जोड़ दिए , साहित्यिक उपलब्धि खाते में आई सो अलग।गंगशील महाविद्यालय का विस्तृत प्रांगण, रंगोली से अंकित सभागार का फर्श, भेंट में मिला रुद्राक्ष का पौधा, भाव पुष्पों से स्नेहिल भीना स्वागत, हिंदी के भविष्य और भविष्य की हिंदी पर चिंतन विमर्श। विद्वत जनों का सान्निध्य, कुल मिलाकर ज्ञान के कोश में वृद्धि।विद्वानों के अपनी बात रखने की अलग अलग शैलियां, वक्तव्यों के नित नए ढंग कुछ ऊर्जा से लबरेज तो कुछ सूचनाओं को क्रमबद्ध तरीके से परोसने वाले , कुछ अपने अनुभवों को सबका विषय बनाने वाले तो कुछ बासी उबाऊ थकाऊ झिलाऊ नुमा। सब जानती है ये पालिक सब जानती है ये पब्लिक है सो कभी तालियां बजाकर तो कभी उबासियां ले लेकर या चेहरे के इंप्रेशन से विषय के प्रति अपनी समझ खूब खूब व्यक्त कर देती है । और इन लगातार बजती तालियों से धोखे में मत आ जाईएगा। जरा से भेद से इन तालियां के अर्थ और तेवर बदल जाते हैं कहीं ये सब कुछ समझ आने की प्रसन्नता जताती हैं तो कहीं विषय की बोरियत से हूटिंग और वहीं बात को समाप्त करने की सूचक भी होती हैं। तो मंच पर चढ़ पोडियम पर जा हाथ फैंक फैंक कर बोलने से पहले अपने आप को दुरुस्त करना बहुत ज़रूरी होता है कि विषय की मांग क्या है और क्या हमने अपनी जानकारी को अद्यतन कर लिया है, बोली जाने वाली सामग्री को क्रम से संजो लिया है, उसे मन ही मन दोहरा लिया है। सिद्ध से सिद्ध वक्ता भी अपने आप को इस रुप में तैयार अवश्य करता ही है। वह कुछ भी यूं ही प्रस्तुत नहीं कर देता है। वह भली भांति जानता है कि आज अपनी बात को एक बड़े समूह तक पहुंचाने का अवसर मिला है तो उसका पूरा पूरा लाभ ले लेना चाहिए। जब आप पूरे मन से, गंभीरता, दिल से साफ और स्पष्ट बुलंद स्वर में अपनी बात रखते हैं तो उसका असर होता ही है, सुनने वाला सोचने पर बाध्य होता ही है , कहे गए शब्दों के प्रभाव में होता अवश्य है फिर भले ही उसकी समयावधि अल्प ही क्यों न हो। तो हर बार बोलते सुनते कुछ नए तथ्य संज्ञान में ले लिए जाते हैं।

बरेली और मेरे शहर आगरा में एक समानता और है दोनों ही अपनी अन्य अन्य विशेषताओं के साथ मानसिक रोगियों के इलाज के लिए विख्यात हैं मतलब कुछ दिमागी लोचा हो तो उसे भी दूर कर दिया जाता है। लंबे समय तक को बरेली को लेकर यही धारणा बनी रही कि यहां के बाजार बड़े व्यस्त और आकर्षक रहे होंगे कि झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में जैसे प्रसिद्ध गीत की रचना हुई होगी। और तब झूमके का बहुत प्रचलन रहा होगा। पर मिश्र जी से बात करते पता चला कि यहां महाभारत काल से जुड़े, उससे संदर्भित कुछ स्थल भी हैं और राय बरैली से इतर करने के लिए बास बरेली के प्रसंग है। हर शहर अपने में कुछ विशिष्टताओं को समेटे रहता है, पर आप अपने व्यस्त प्रवास में से क्या क्या खोज पाते हो, यह आप और जिनके संपर्क में आप आए, उस पर और उससे भी अधिक आपके दृष्टिकोण पर निर्भर करता है कि अमुक अमुक शहर के विषय में आपकी जानकारी कितनी पुख्ता है।

यात्राएं तो ज्ञान ,नई नई सूचनाओ और अनुभवो का पिटारा है, बस आंख कान खुले रखिए, दृष्टिकोण सकारात्मक बनाए रखिए, हर क्षण का उपयोग कीजिए तो आपकी झोली ख़ाली नहीं रहती हैं, उल्टे हर बार कुछ नया जुड़ जाता है, अनुभव में इजाफा ही होता है बशर्ते वैसा मानस भी बना कर जाएं। अब हर छोटे बड़े कष्ट पर भुनभुनाते ही रहोगे तो कुछ नहीं हाथ लगने का। ऐसे ही थोड़े घुमक्कड़ अथातो जिज्ञासा लिखा गया होगा, कहा गया होगा सैर कर दुनिया की गाफिल जिंदगानी है कहां। तो जब जब जो जो समय मिले, जिनसे मिलने और जहां जानें का सुयोग मिले खूब जिंदादिली से उन क्षणों को जीने की कोशिश कीजिए, अच्छा बुरा जैसा भी हो, अनुभव आपको कुछ सिखा ही जाता है, आपको समृद्ध ही करता है तो जब समय हो लोगों से मिलते जुलते रहिए और अपने दायरे को विस्तृत करते रहिए।

शिल्पी तू जीभ बिठाता चल

 सफर जारी है .........1067

25.09.2022

शिल्पी तू जीभ बिठाता चल....... 

रामधारी सिंह दिनकर राष्ट्रीय चेतना के रचनाकार हैं । संस्कृति के चार अध्याय, कुरुक्षेत्र , रश्मि रथी, हुंकार, परशुराम की प्रतीक्षा, लोहे के पेड़ हरे होंगे, शक्ति और क्षमा और अन्य अन्य रचनाकर्मों से गुजरते, उनका अध्ययन करते यह धारणा पुष्ट होती गई कि पाठक किसी रचनाकार को पढ़ते पढ़ाते, उन्हें कंठस्थ करते उनके व्यक्तित्व के कई कई आयामों से परिचित होता जाता है। जो पूरे मन से लिखा जाता है, यदि पाठक भी उतने ही मन से उसे पढ़े, समझे, उसके भावों को ग्रहण करें तो लिखा सार्थक हो जाता है।

क्षमा सोहती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो पंक्ति को  मां के मुख से कई कई बार बहुत से संदर्भों में सुना कि क्षमा का अधिकार केवल शक्तिशाली को है। विष दंत हीन सर्प की सारी शक्ति नष्ट हो जाती है, इसलिए शक्तिशाली बनो और दूसरों को क्षमा करना सीखो। बाद में दिनकर की रचना को पढ़ाते इसे संदर्भ सहित ग्रहण किया। कर्ण के जीवन के विविध पक्षों विविध आयामों को जानना हो तो रश्मि रथी का घोटा लगाए जाना आवश्यक और अनिवार्य दोनों है। स्नातकोत्तर में दिनकर की कविताओं को जानने समझने का भरपूर मिला। शिक्षक प्रशिक्षण की वार्षिक परीक्षा के दौरान लोहे के पेड़ हरे होंगे तू गीत प्रेम के गाता चल, नम होगी ये मिट्टी ज़रूर आंसू के काम बरसाता चल को पढ़ाते पूरा मानस ही बदल गया। जब भी मौका मिलता है, इस कविता को कई कई बार दोहरा लेती हूं।कैसे एक रचना आपके जीवन में आश्चर्यजनक रुप से बदलाब ले आती है। इतनी लंबी कविता के सभी अनुच्छेद तो आज तक भी कंठस्थ नहीं हो पाए, हर बार पृष्ठों को पलटना होता है पर भाव बहुत अच्छे से समझ आ गए कि प्रेम से लोहे जैसी कठोर जमीन भी नम हो जाती है और उसमें हरे भरे पेड़ अपना विस्तार पाते हैं। इस जगत में चाहे जितनी कटुता और विषमता क्यों न हो, प्यार उन सब पर भारी पड़ता है। तब से सबको प्यार से ही गुनने और समझने में लगे हैं पर अक्सर हार जी जाए हैं। सामने वाला विनम्रता और प्यार से बोलने को कमजोरी मान लेता है और बड़े तो बड़े, छोटे और अधकचरे भी हावी होने की कोशिश में लगे रहते हैं, कोशिश में क्या लगे रहते हैं, पूरी तरह हावी हो जाते हैं,पीठ पर लद जाते हैं ओर सिर पर सवार बने रहते हैं।

फिर बार बार सोचती हूं कि इतने बड़े और स्थापित कवि ने झूठ थोड़े ही लिखा होगा कि आशा के स्वर का भार पवन को लेकिन लेना ही होगा, जीवित सपनों के लिए मार्ग मुर्दों को देना ही होगा, रंगों के सातों घट उड़ेल ये अंधियारी रंग जाएगी, जीवन को सत्य बनाने को जावक नभ पर बिखराता चल। सो इस कलुषता कुटिलता को जाबक से ही जीता जा सकता है। पढ़ लिख तो बहुत लिए पर उसे गुनना अभी बाकी है। जब जब मस्तिष्क जये होता, संसार ज्ञान से चलता है, शीतलता की है राह हृदय तू यह संवाद सुनाता चल। जैसे जैसे कविता आगे बढ़ती जाती है, जीवन का सत्य उद्घाटित होता जाता है दीपक के जलते प्राण दिवाली तभी सुहावन होती है। रोशनी जगत को देने को अपनी अस्थियां जलाता चल। सो दीपक को तो जलना ही होगा तभी रोशनी बिखरेगी। सौरभ है केवल सार उसे, तू सबके लिए जुगाता चल। आधी मनुष्यता वालो पर जैसे मुस्काता आया है वैसे अब भी मुस्काता चल। ऐसों से अटकने से क्या लाभ, उनकी नादानी पर मुस्करा कर आगे बढ़ने में ही भलाई है। जो उठे राम जो उठे कृष्ण भारत की मिट्टी रोती है तलवार मारती उन्हें बांसुरी नया जीवन देती, जीवन शक्ति के अभिमानी, यह भी कमाल दिखलाता चल।

और अंतिम पंक्तियां तो जैसे कविता का प्राण है.... धरती के भाग हरे होंगे भारती अमृत बरसाएगी दिन कि कराल दाहकता पर चांदनी सुशीतल छाएगी।ज्वालामुखियों के कंठो में कलकंठी का आसन होगा, जलदो से लदा गगन होगा, फूलो से भरा भुवन होगा। बेजान यंत्र विरचित गूंगी मूर्तियां एक दिन बोलेगी, मुंह खोल खोल सबके भीतर शिल्पी तू जीभ बिठाता चल।

तो हम सब ऐसी शिल्पी बनें , गूंगे बहरों के मुख में जीभ बिठाते चलें, सबकी आवाज बनें, सबके सहयोगी बनें। रामधारी सिंह दिनकर को याद करते उनकी स्मृति में श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।

बातें हैं बातों का क्या

 सफर जारी है .......1066

24.09.2022

बातें हैं बातों का क्या.......

तो आज श्री गणेश करते हैं बारहवें सूक्त का। जीवन में बातों का कितना महत्व है, यह तो उससे पूछिए जिसे बातें करने का कभी सौभाग्य ही नहीं मिला हो, जो बेचारा मन ही मन अपने आप से बतियाता रहा हो, जिसके पास एक अदद मित्र तक न हो जिसके आगे वह अपना मन खोल सके। सोचो कितनी घुटन होती होगी उसे। बातें इतनी जरुरी न होती तो बाल कृष्ण भट्ट को क्या पड़ी थी कि वे बात पर लेख ही लिख मारते। ये बातें बड़ा शस्त्र हैं समस्याओं को हल करने का, इनका समाधान खोजने का। पिताजी हम बच्चों के तुनक फुनक कर रूठ जाने और आपस में कुट्टी कर बातचीत बंद कर देने पर अक्सर कहा करते थे दो देशों के बड़े से बड़े मुद्दे भी बातों से सुलझा लिए जाते हैं तो कोई बात है तो उसे कह कबा कर रफा दफा करो। मन में घोटते मत रहो। जो दिल में रखे रहोगे तो छोटी सी बात कल को सुरसा का रुप ले लेगी। उसके सारे एंगिल ही बदल जायेंगे। तो छोटी छोटी बातों को वहीं का वहीं कह सुन कर निपटारा करना ज्यादा उचित है वनस्पत उसका तिल का ताड़ बनाने के।

सच बताएं तो बातों का जीवन में बहुत अधिक महत्व है। बचपन में दोस्तों से बातें करने के चक्कर में घर से डांट भी खाई हैं, कभी कभी तो बातों के तार इतनी लंबे हो जाते कि समय का अतिक्रमण हो जाता और देर से आने के चक्कर में पिटाई ठुकाई होती सो अलग। अब बात करना तो नहीं छोड़ा जा सकता था तो बात करने के घंटे निश्चित कर दिए गए, अपनी घर की देहरी, बाउंड्री, आंगन, बगीचे में बात करने की छूट दे दी गई। सावधानी की दृष्टि से कभी कभी उस ओर कोई बड़ा चक्कर भी काट जाता कि देखें क्या गुफ्तगू हो रही है। हम बाल सखाओं और स्कूली मित्रो के पास बातों का अक्षय भंडार था। इसकी उसकी सबकी बातें, घर की स्कूल की बाहर की रिश्तेदारी की बातें। बातें थीं कि उनका कोई ओर छोर ही नहीं था। कहीं से भी कोई सिरा पकड़ा कर शुरू हो जाते। पहले पहल तो घर में ही बहनें सिर से सिर मिला बातें करते, फिर शाम होते मां खूब खूब बातें बताया करती। नानी दादी की बातें, गांव की बातें, अपने बचपन की बातें। जब पिताजी के साथ बस में बैठ कर रिश्तेदारी में जाना होता, तो पिताजी से तरह तरह के प्रश्न पूछते और बातों में ऐसे खो जाते कि न खाने की सुध रहती न पीने की। बातों ही बातों में कितनी कितनी ज्ञान की बातें मां पिताजी हमारे अंदर ट्रांसफर कर देते।

स्कूल में ख़ाली घंटे या खाने की छुट्टी में या पूरी छुट्टी में खरामा खरामा चलते बातों का पिटारा खुलता। कुछ  बातें करने में इतने उस्ताद थे कि दूसरे का नम्बर ही नहीं आने देते थे, बस वे ऐसे चटर पटर बोलते थे कि बाकी के सब ध्यान लगा के उन्हें सुनने में मशगूल हो जाते। बड़े होते गए और बातों के भंडार भी भरते गए। जैसे जैसे बड़े होते गए, बातें कम और काम ज़्यादा के निर्देश प्रभावी होते गए। बातों बातों में यही समझाया गया कि बातें कितनी मर्जी ज़रूरी हों पर सबसे जरुरी काम होता है। हां ,ये बात अलग है कि उस काम से संबंधित ज़रूरी बातें अवश्य की जानी चाहिए। घर परिवार बसाते भी बाते बहुत ज़रूरी उपादान रहीं। कभी गंभीर मसलो के हल बातों से निकालें जाते रहे तो कभी ख़ाली समय को बातों के उल्लास से भर लिया गया। ये मुआ मोबाइल, टीवी तो अब अधिक प्रचलन में हैं कि घर में दो लोग हैं और दोनों ही अपने अपने मोबाइल से किसी तीसरे से लिखित या मौखिक वार्ता में मशगूल हैं। एक समय था कि रेल में यात्रा करते बेचारा टिकट चैकर यात्रियों को बातों में मशगूल पाकर झकझोरता था। कितनी कितनी बातें होती थीं, सबके पास। अब तो परिवार में भी सदस्यों के मध्य बात नहीं होती। सब बहुत अधिक व्यस्त वाकई में हैं या उन्होंने अपने को बातों से दूर कर लिया है या जानबूझ कर व्यस्तता का चोगा ओढ़ लिया है। राम जाने। पर ये जिनके पास बातों के पिटारे हैं, उन्हें बड़ी अपच हो गई है। बेचारे अपनी बात को पुराने पेड़ के किसी कोटर में ख़ाली कर आते हैं। बातें लिखी जाती हैं, कही जाती हैं, की जाते हैं पर अब बातों में वह बात कहां। कुछ बात करने वालों को , बतकही करने वालों को बातूनी करार दे देते हैं तो कुछ उसे बेबात की बात कह कूड़े की टोकरी में डाल देते हैं। कुछ कह देते हैं बातें हैं बातों का क्या। ये बातें ही आपकी बात बना देती हैं, आपको मशहूर कर देती हैं। तो बातें करते कराते रहिए, लोग मिले तो ठीक नहीं तो खुद से ही बतराते रहिए। बतराना बहुत ज़रूरी है। याद कीजिए और दोहरा लीजिए .... बतरस लाली लाल की मुरली धरी लुकाय, सोंह करें भोंहन हंसे देन कहें नट जाय। तो बातें का रस लीजिए साहब, इन बातों में क्या रखा है।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...