Thursday, April 28, 2022

नाथ न कछु मोरी प्रभुताई

 सफर जारी है...855

23.02.2022

प्रभु को भजो सच्चे मन से तो प्रभु भी सुनें।पर लोग करते तो अपने मन की हैं और जब सब गुड़ गोबर हो जाता है, नैया बीच भंवर में डूबने लगती है अपने सारे हाथ पैर मारने के बाद भी हाथो के तोते उड़ जाते हैं कुछ हाथ नहीं आता तब उसे प्रभु याद आते हैं कि कि ऐसे में उसकी नैया प्रभु ही पार लगा सकते हैं,तब जाकर कहीं उनका नाम सिमरन होता है और वह भी केवल तब तक के लिए जब तक उसका काम बन जाये जैसे ही बात बनी अपनी फुल फोरम में आ जाता है और सारा सेहरा अपने सिर बांध लेता है कि उसने ये किया उसने वो किया।जब वह प्रभु को ही नकार देता है तो भला आदमी की उसके सामने कटा औकात, उसका तो धर्म ही है अपना काम बनता भाड़ में जाये जनता, उनका अपना पेट हाऊ होता है दूसरा भूख से मरे तो मरता रहे, उनकी थाली में छप्पन भोग चाहिए चाहे अगले की प्लेट में सूखी रोटी भी न हो।दुनिया भरी पड़ी हैं ऐसे बेंपैदी के लोटो से, जिनका कोई धर्म ईमान नहीं होता, ये थाली के लुढ़कने बैंगन होते है जहां लाभ मिले वहीं के हो जाते हैं।गिरगिट की तरह कभी भी रंग बदल लेते हैं गंगा गए गंगादास जमुना गए जमुनादास।इनका अपना कोई स्टैंड पॉइंट नहीं होता,सिवाय स्वार्थ के।बस जहां से ये पूरा होता हो वहां गधे को भी बाप बना लेते हैं, वैसे खाने में बड़े नखरे हैं पर मुफ्त का मिले तो सब उदरस्थ कर लेते हैं डकार तक नहीं लेते।

अब क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी नीयत छिपी रहे, नकली चेहरा सामने आए असली चेहरा छिपा रहे।वे कुछ करें या नहीं करें पर बात बनाने में नम्बर वन होते हैं, ऐसा समा बांधते है कि सबको लगता है कि भाई ये बड़े तीसमारखां है।और जो दिन भर खटते हैं, अपना भरपूर देते हैं वे चुपचाप बैठे रहते हैं कि कर दिया काम हो गया अब उसे बखानने की क्या जरूरत।आता था तो कर दिया, कर्तव्य और दायित्व के दायरे में आता था, करना ही था सो कर दिया, इसमें हल्ला गुल्ला मचाने,ढिंढोरा पीटने की क्या सबको बताने की क्या जरूरत है?वैसे भी खाली बर्तन ज्यादा आवाज करते हैं थोथा चना घना बजता है और अधजल गगरी बहुत छलकती है।भरे पूरे तो लबालब होते हैं अपने खोल में रहते हैं,उन्हें जताने की जरूरत ही नहीं होती।वे खजूर के पेड़ की तरह ऊंचे नहीं होते कि न किसी को छाया मिले और फल अति दूरी पर लगें कि कोई तोड़ ही न पाए।वे तो फलों से लदी डाली से सबके लिए सुलभ होते हैं कि छोटा बालक भी हाथ बड़ा कर तोड़ ले।

विनम्रता उनकी खास पहचान होती है, बड़े बड़े कार्य पलक झपकते कर जाते हैं पर बिल्कुल सामान्य बने रहते हैं।सारा प्रताप रघुराई का बता देते हैं प्रभु मैं क्या करने योग्य हूँ ये तो सब तुम्हारी कृपा थी तुम्हारा अनुग्रह था।याद आता है रामचरित मानस का प्रसंग कि हनुमान लंका दहन कर आते हैं, भगवान राम उनसे सारा प्रसंग पूछ रहे हैं हनुमान चाहते तो एक एक प्रसंग को रच पच कर विस्तार के साथ बता सकते थे, भगवान राम की नजरों में हीरो बन सकते थे, इस अवसर को पकड़ सकते थे, कुछ भी मांग सकते थे पर वे अपनी प्रसंशा आप नहीं करते, अपने मुंह मिया मिठ्ठू नहीं बनते, बहुत ही सहज भाव से राम के प्रश्नों का उनकी जिज्ञासा का जबाब देते हैं।प्रभु पूछ रहे हैं कहु कपि पालित रावण लंका ,केहि विधि दहेउ दुर्ग अति बंका।यह सब तव प्रताप भगवाना,बोला वचन विगत हनुमाना।शाखामृग के बड मनुसाई साखा ते साखा पर जाई,नाघि सिंधु हाटकपुर जारा,निसिचर गन विधि विपिन उजारा।सो तव सब प्रताप रघुराई,नाथ न कछु मोरी प्रभुताई।ता कहु प्रभु कछु अगम नहिं जापर तुम अनुकूल,प्रभु प्रताप बड़वालनहि जारि सकई खलु तूल।

सब प्रभु का प्रताप बता दिया अपने ऊपर कोई श्रेय नहीं लिया ।नाथ न कछु मोरी प्रभुताई, मेरा कुछ नहीं, मैं तो अधम हूँ, प्रात लेई जो नाम हमारा, ताहि दिन मिले नहि आहारा,ऐसे दरिद्री पर आपने कृपा की प्रभु, हम तो साखामृग हैं एक साखा से दूसरी पर उछलते रहते हैं, इसमें हमारा क्या।बस आपकी कृपा से सब हो गया नाथ न कछु मोरी प्रभुताई, सो तव सब प्रताप रघुराई।हनुमान चाहते तो समुद्र लांघने से लेकर लंका दहन के प्रसंग को खूब नमक मिर्च लगा अतिशयोक्ति पूर्ण तरीके से वर्णन कर सकते थे, उनका कार्य वाकई बड़ा था पर उन्होंने इतने बड़े कार्य को केवल दो पंक्ति में बयान कर दिया । नाघि सिंधु हाटकपुर जारा, निसिचरगन विधि विपिन उजारा बस इसके आगे कुछ नहीं, बात ही समाप्त कर दी और फिर प्रभु का प्रताप बखानने लगे सो सब तव प्रताप रघुराई, नाथ न कछु मोरी प्रभुताई।प्रभु तुम जिस पर दयालु हो जाओ जिस पर अपनी कृपा बरसा दो जिसके अनुकूल हो जाओ वहां सब सम्भव हो जाता है, कुछ भी अगम नहीं रहता।

जब जब येप्रसंग पढा और दोहराया जाता है सोचने पर विवश कर ढ़ेता है कि हम हनुमान सी भक्ति क्यों नहीं रख पाते, करते दस है तो बखानते हजार हैं, हमेशा अपने को हाइलाइट करने की कोशिश में लगे रहते हैं, सारा सेहरा अपने माथे बांधना चाहते हैं कि कलगी मेरे सिर ही सजे, सारा क्रेडिट मुझे ही मिले।बिल्कुल भूल जाते हैं कि बिना ईश कृपा के तो आप एक पग भी नहीं चल सकते।और उसकी कृपा बरस जाए तो बिनु पग चले सुने बिनु काना, कर बिन कर्म करे विधि नाना।तो बनी रहे उसकी कृपा,कहते दुहराते रहें... नाथ न कछु मोरी प्रभुताई, तव सब प्रताप रघुराई।प्रभु आपकी दया से सब काम हो रहा है, करते हो तुम प्रभुजी मेरा नाम हो रहा है।

स्वर्गादपि गरीयसी

 सफर जारी है......854

22.02.2022

जननी जन्मभूमि के आगे सब बौना है।माता जो अपनी कोख में बालक का नौ माह सर्जन करती है, माता जिससे नाल का सम्बंध जुड़ा होता है, जो हमें पालती है पोसती है, खुद गीले में सो बच्चे को सूखे में सुलाती है,चलना बोलना सिखाती है, पढ़ाती लिखाती है, अपने स्नेह से सराबोर रखती है।खुद भले ही भूखी रहे पर बच्चे के पेट भरने का जुगाड़ जरूर कर लेती है।कितनी कितनी बार देखा कि कटोरदान में मां के लिए रोटी भले ही न बची हो पर बालकों को रच पच कर खिलाती है और खुद उपवास का बहाना बना कर भूखी रह जाती है पर बच्चों को कभी नहीं जताती।बस सारे दिन काम में जुती रहती है कि बालक चार अक्षर पढ़ लिख जाएं, अपने पैरों पर खड़े हो जाएं, ब्याह हो जाये,अपनी घर गृहस्थी में मगन हो जाएं। इसके अतिरिक्त उसे कुछ और नहीं चाहिए, इतने में ही भरपाई हो जाती है उसकी।वह बच्चे की पहली शिक्षिका ऐसे ही थोड़े कही गई।

मां का एक रूप थोड़े ही है।गौ ,गायत्री और गंगा भी मैया ही हैं।

अपनी जन्मभूमि सब को प्रिय होती है। हो भी क्यों न, आखिर उसका नाल जो गड़ा होता है वहां।जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है, इसके वास्ते ये तन ये मन और प्राण हैं।याद तो होंगी ये पंक्तियाँ विषुवत रेखा का वासी जो जी लेता नित हांफ हांफ कर रखता है अनुराग अलौकिक वह भी अपनी मातृभूमि पर, हिम वासी जो हिम में तम में जीता है नित कांप कांप कर कर देता है प्राण न्योछावर वह भी अपनी मातृभूमि पर।कहीं चले जाएं पर लौटते तो अपने देश ही हैं।भारतमाता का गौरव हमें खींच ही लाता है।जैसे उड़ि जहाज को पंछी पुनि जहाज पे आबे, मेरो मन कहां अनत सुख पाबे।रसखान तो ब्रज भूमि के सौंदर्य पर तीनों लोक को बार देते हैं बस एक ही कामना है मानुस हो तो वही रसखानि बसों ब्रज गोकुल गांव की ग्वारिन,पाहन हो तो वही गिरि को जो कियो छत्र पुरन्दर धारन,जो पशु हो तो कहा बस मेरो चरों नित नंद की धेनु मँझारन, जो खग हो तो बसेरो करो मिलि कालिंदी कूल कदम्ब की डारन। रसखान तो कौटिक हू कलधौत के धाम करीन के कुंजन ऊपर वारो में विश्वास रखते हैं।तो क्या अब मातृ भूमि से प्रेम कम होता जा रहा है।जिसे देखो सब बाहर बास भागे जा रहे हैं।कोई नौकरी की खोज में है तो कोई वहां के रंगीन नजारे देखने को लालायित है।कुछ को तो बाहरी चमक दमक देखने के बाद मातृभूमि से ही विरक्ति हो जाती है, उनका सोच बन जाता है क्या फायदा लौटने से, वहां रखा ही क्या है, कुछ विवशता में तो कुछ स्वेच्छा से वहीं डेरा जमा लेते हैं।फिर वही भूमि रास आ जाती है।उनके लिए मातृभूमि में ऐसा कुछ विशेष नहीं रखा होता जिसके लिए ऐसा सुंदर देश छोड़ कर जाया जाए।प्रसाद लिखते हैं तो भले लिखते रहें अरुन यह मधुमय देश हमारा, जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।अरे कुछ का अपना सुख इतना बड़ा हो जाता है कि देशभक्ति गई तेल लेने।डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा, वह भारत देश है मेरा गाने सुनने कहने के लिए ही अच्छा लगता है।अब अपनी सुख सुविधा देखें कि इसे ले के बैठे रहें। उनकी तो आंखें चुंधिया जाती है चमाचम सड़के देख कर।इतनी सफाई और व्यवस्था पसन्द हो तो बनी बनाई व्यवस्था में क्यों जा घुसे, पकी पकाई क्यों खा रहे हो।यहां बनाओ ऐसी व्यवस्था।न जी हम क्यों करें वो तो सरकार का काम है।बस हम तो वहां रह लेंगे जहां सारी सुविधाएं हों सम्पन्नता हो।सब अपना ही है, सारी वसुधा कुटुंब वत ही तो है तो फिर जहां मन चाहे वहां रहेंगे।मर्जी कहीं रहो हमें क्या जित तेरे सींग समाए बित कू ही चलो जा।तू जाने तेरो काम जाने।हमाओ तो कहबे को काम है कि अपनो देस अपनो ही होत है, खूब घूम लेओ पर लौट के अपने थान पे ही आ जानो चहिये।जई ते कहो गयो कि जननी जन्मभूमि के आगे स्वर्ग हू फीको लगे भैया।

अब मातृभाषा की बात और कर लें,अपनी बोली अपना देश अपनी माँ और अपना भेष सबको बहुत प्यारा होता है ।होना भी चाहिए ।भजन, भोजन ,भेष और भाषा ही तो व्यक्ति की पहचान है।सारी रचनात्मकता अपनी बोली भासा में ही प्रकट होती है।धारा प्रवाह कहीं अटक नहीं, विचारों की मौलिकता, प्रखर तीखी धारदार अभिव्यक्ति, शब्द अपने से दौड़े चले जाते हैं उन्हें खोजना नहीं पड़ता, लोक बात बात में घुस जाता है, मुहावरे लोकोक्ति सब साथ साथ चलते हैं कुछ खोजना नहीं होता।रोज के से तो प्रसंग हैं।उन्हें कौन रटना पड़ता है, अपनी भाषा की तो बात ही और है।सब समझ आ जाता है।और जैसे ही माध्यम बदला सब बदल जाता है।अब विषय पर ध्यान किसका रहता है सारा समय तो उस गिटर पिटर की भाषा को सीखने में चला जाता है, सोचें कब और लिखें कब।अब रट कर भले ही चेंप दो पर सच में दस वाक्य भी नहीं बनते तो अनुच्छेद ,पृष्ठ और कॉपी भरने की तो बात ही छोड़ दो।जबरदस्ती सी करते रहो और पल्ले कुछ न पड़े तो ऐसी पढाई से भला क्या फायदा। बस तीन म को पकड़े रहो.....माता, मातृ भूमि और मातृ भाषा।तो अंतरराष्ट्रीय मातृ भाषा दिवसपर संकल्प लेते हैं कि हम अपनी माता का सम्मान करेंगे, मातृभूमि को नहीं छोड़ेंगे और अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करेंगे।

एक प्रशिक्षण यह भी

 सफर जारी है...854

21.02.2022

बच्चे मन के सच्चे होते हैं,सारी जग के आंख के तारे होते हैं, ये नन्हे फूल हैं जो भगवान को बहुत प्यार लगते हैं। कभी रूठते हैं कभी मन जाते हैं,साथियों से झगड़ते हैं कुट्टी कर लेते हैं तो अगले पल इनका एका हो जाता है पुच्ची हो जाती है।गुस्सा आई तो गुस्सा हो लिये फिर मन गये, बस पल में तोला पल में माशा।मिट्टी के लोंदे से होते हैं, गढ़ना होता है इन्हें, कभी प्यार से कभी दुलार से तो कभी गुस्सा कर डाँट कर समझा कर, हर पल ध्यान रखना होता है।कभी बंदिश का घेरा लगाकर तो कभी थोड़ी थोड़ी स्वतंत्रता देकर।उन्हें पुचकारा जाता है तो गलती के लिए मारा डाँटा समझाया भी जाता है।कभी पुरस्कार दिया जाता है तो कभी हल्का फुल्का दण्ड भी,जिससे वह दुनिया में रहने लायक तैयार हो सके।खूब खूब समझदार हो सके।किसी के दो बोल कह देने पर रूठ मटक कर घर न भाग आये और इसकी उसकी शिकायतें न लगाने लगे,कोई बिना बात पीटे तो उसका विरोध कर सके।चुपचाप पिटता ही न रहे।न इतना उद्दंड हो कि अपनी दादागीरी दिखाता फिरे और इस उस को मार धुन कर घर में आकर छिप जाए और अगला जब शिकायत लेकर आये तो घर भर अपने लाडले का ही पक्ष लेने लगे कि यह तो मार ही नहीं सकता, जरूर तुमने ही कुछ किया होगा।

याद आता है बच्चों की गलत जिद को पहले तो लाड़ प्यार में स्वीकार लिया जाता है, गलत बात पर भी कभी टोका नहीं जाता बल्कि प्रकारान्तर से उसी का पक्ष लिया जाता है और जब उसकी ये आदतें पक्की हो जाती है तब रोना रोया जाता है कि क्या करें समझा समझा कर हार गये, ये तो मानता ही नहीं है।दूसरों को मारता पीटता था और आप उसकी उद्दंडता पर कैसे खुश होते थे, कैसे ताली बजा बजा के हंसते थे, अपने लाडले के पराक्रम पर निहाल होते थे, ये उसी का नतीजा है कि आज वह आप पर भी हाथ उठा सकता है, उल्टा सीधा बोल सकता है क्योंकि उसकी इस आदत को पक्का करने के जिम्मेदार तो आप स्वयम है।बचपन में जब दूसरों की पेंसिल रबड़ चुरा कर ले आता था और आप उसे डांटने समझने के बजाय पीठ ठोकते थे, जब वह बड़ों को दुर्वचन कहता, उनका अपमान करता2तब आप कैसे सिहाते थे आज उसी का नतीजा है कि उसे अपनी जिद गलत या सही पूरी कर चैन आता है और मजे की बात उसे इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता।सच तो यह है कि इस सबके लिए जितना दोषी वह है उतने ही आप भी हैं।वो तो बच्चा था, जिद करना उसका अधिकार था, उसे अच्छे बुरे की समझ कब थी, वह नादान था, दुनियादारी का ज्ञान नहीं था उसे, पर आप तो बड़े थे, समझदार थे, दुनियादार थे आप तो जानते थे कि उसके भविष्य के लिए क्या अच्छा है क्या बुरा।आप कैसे बच्चा बन गए अनसमझ बन गए क्यों भूल गए कि कच्ची डाली ही नमनीय होती है उसे जैसे चाहे शेप दे सकते हैं।आप तो कुम्हार की भूमिका में थे, चाक तो आप ही घुमा रहे थे फिर बर्तन कैसे टेढ़े मेढ़े हो गए ,अवा में पकाने का काम भी आपका ही था न तो क्यों कोई कच्चा रह गया और कोई क्यों जल गया।आंच का ताप तो आपको बराबर रखना था, आपका ध्यान कहां था तब।आपको ईश्वर ने कच्ची मिट्टी का लोंदा दे दिया पर गढ़ना पकाना तो आपको ही था न।तो एक बार सोचिएगा जरूर कि चूक कहाँ हो गई, जो भी परिस्थिति रही हो आप उचित निर्णय तो नहीं ले पाए न,कभी इस कारण कभी उस कारण अपने दायित्व को इस उस पर ट्रांसफर तो नहीं करते रहे, अपनी जिम्मेदारियों से बचते बचाते तो नहीं रहे।पिता माता बनने का भी प्रशिक्षण होता है ये अलग बात है कि उसकी पढ़ाई अलग से नहीं होती, कक्षाएं अलग से नहीं होती, अपने माता पिता को देखकर ही सीख जाते हैं।जैसा हमारे साथ हुआ कमोवेश वैसा ही करने लगते हैं1और जो आचरण हमें पसन्द नहीं आये उससे दूरी बरतते हैं, जो हमें नहीं मिल पाया वह अपने बच्चों को देने की कोशिश करते हैं,जो हम नहीं बन पाए वह बच्चों को बनाने का प्रयत्न करते हैं।जिसे आजकल इस रूप में व्याख्यायित किया जाने लगा है कि माता पिता अपनी दमित इच्छाओं को बच्चों के माध्यम से पूरी करने में लगे पड़े हैं ।

वह छोटा गुदगुदा सा पालने में लेटा बालक क्या जानता है कि उसके लिए क्या अच्छा है क्या बुरा,उसे तो जो अच्छा लगे सब चाहिए होता है, बच्चा जो है अनसमझ है पर आप तो दायित्ववान है, आप तो जानते हैं उसे क्या खिलाना पिलाना है आपको तो पता है कि फास्ट फूड चाकलेट और अटरम सटरम उसके स्वास्थ्य के लिए जहर हैं, वह तो हर चमकती चीज लपकता है उसका बाल स्वभाव है पर आपको तो अनुभव है न कि चमकने वाली सब चीजें सोना नहीं होती।उसे सिखाना आपको है गुरुजी को है हम बड़ों को है पर हम तो उसके रोने रूठनेमटकने घर छोड़ देने की धमकी से घबरा जाते हैं घबराना भी चाहिए आखिर वे घर के चिराग हैं पर बात उठती है हमारे ही जायों में ये विरोध कब से कुलबुलाने लगता है बागी बनने की प्रक्रिया कब से शुरू हो जाती है असंतोष के बीज कहां से पड़ जाते हैं क्रोध का अंकुर कहां से फूट पड़ता है, क्या ये सब वह साथ लेकर आता है जिसे कह दिया जाता है पूत के पांब पालन में ही दिख जाते हैं या वह माहौल से ग्रहण करता है या हम बड़ों की देखादाखी करता है।कहीं से तो शुरुआत होती होगी इस सबकी।

तो मुद्दा बड़ा है, समस्या गहरी है,इसे इस उस पर डाल कर हाथ नहीं झाड़े जा सकते, यह कह कर बचा नहीं जा सकता कि हमने तो सब किया अब सफल नहीं हुए तो किया करें।व्यक्ति अपना सा सब करता ही है जो नहीं आता उसे दूसरों से सीखता भी है क्योंकि उसके ऊपर अपने बालकों के लालन पालन का दायित्व जो है।वह माता पिता की श्रेणी में आ गया है अब वे मात्र पति पत्नी प्रेमी प्रेमिका नहीं रहे, जिस गोलू मोलू को जीवन दिया है उसका पूरा पूरा दायित्व उनका ही होता है।और ये दायित्व केवल धन जोड़ने से पूरे नहीं होते ,जिद पूरी करने मात्र से नहीं निभ जाते, उन्हें मनचाहा छूट देने से नहीं निभते, उनकी गलतियों पर पर्दा डालने से उनके सही गलत का पक्ष लेने से नहीं निभा करते।ये तो प्रारम्भिक समय में डाले जाने वाले मूल्य होते हैं।तो अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा जो हम नहीं कर सके तो दूसरों के लिए तो रास्ता खोल सकते हैं उन्हें तो अपने अनुभव का लाभ दे सकते हैं भले ही लोग कहते रहें कि पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरहिंते नर न घनेरे।

सबेरे जाना है

 सफर जारी है....853

20.02.2022

जिंदगी एक सफर है सुहाना, यहां कल क्या हो किसने जाना।सच सब आज की बात ही कर सकते हैं ,कल भला किसने देखा है।पर आज के काम को कल पर छोड़ अवश्य देते हैं कि कल देखा जाएगा।कल भला कब आता है, आता होता तो कबीर को क्या पड़ी थी लिखने की कि काल्हि करे सो आज कर आज करे सो अब्ब, पल में परलै होयगी बहुरि करैगो कब्ब।कहते रहें कबीर, दुनिया भर के उदाहरण खोज खोज के सामने रखते रहें, पत्ता टूटा डाल से ले गई पवन उड़ाय, अब के बिछड़े कब मिलें दूर पड़ेंगे जाय या चलती चाकी देख के दिया कबीरा रोय, दो पाटन के बीच में साबित बचा न कोय या जग है सराय एक आये एक जाए ।खूब सुनते सुनाते रहें पर इसका असर कितनी देर रहता है भला।ये संसार काठ की बाड़ी आग लगे जल जाना है।पानी के बुलबुले सी है जिंदगी, सेमल के फूल सी है, कोई भरोसा नहीं कौन सा पल आखिरी होगा, अभी बैठे हैं और मालूम चले दस मिनट में ही प्राण पखेरू उड़ गए, बस अभी जिंदा थे और अभी खबर बन गए,फोटो पर माला चढ़ गई, शोक संदेश आने लगे, कुछ दिन बीते, सब भूल भाल अपने अपने काम में लग गये ।

हां,ऐसे ही तो चले जाते हैं सब, जीते जी जिनसे मिलने जाने में झूठा अहम, जिद,व्यस्तता सब आड़े आ जाती थी ,आज जाना रवायत हो जाती है।कहाँ से तो समय निकल आता है और कैसे आंसू ढुलकाते इतनी जल्दी चले गए, हम तो मिल भी नहीं सके, जैसे संवाद सरलता से बयान हो जाते हैं।फिर जाने चले जाते हैं कहाँ दुनिया से जाने वाले जैसे गीत की पंक्तियाँ जुबान पर आ जाती हैं।जाने क्या बात है कि सब जानते बूझते भी हम सब ऐसा करते हैं।जब तक अगले का जीवन था, सांसे थी,अकड़ में तने रहे कि हम क्यों जाएं, हम किसी से कम हैं क्या, अपने आगे किसी को कुछ न  समझने की जिद जो पाले बैठे थे, अहम जो सातवें आसमान पर कुदक रहा था, जिसके  चलते सच को जानते भी उसे स्वीकारने में नानी मर रही थी ,अरे मान लेते तो छोटे नहीं हो जाते और छोटा होना हमें बिल्कुल मंजूर नहीं,हमारे सिर पर कलगी कैसे बंधती,हम आम जन नहीं हो जाते फिर हम विशेष की श्रेणी में कैसे फिट होते। कितना कितना पढ़ते हैं, कितनी कितनी बार पढ़ते हैं कि अगले पल का कोई भरोसा नहीं पर इस विषय से बचे रहते हैं, इस पर कोई चर्चा नहीं करते,सूम से मौन साध लेते हैं।बड़ी बेफिक्री से कह देते हैं जब मरेंगे तब मरेंगे, अभी से क्यों सोच सोच के अपना दिमाग क्यों खराब करें।यावत जीवेत ऋणम कृत्वा घृतं पिबैत, चार्वाक दर्शन के अनुयायी बन जाते हैं।दो दिन का मेला अकेले जाना है जैसा सब जानते तो हैं पर सबसे मिल कर कहां रह पाते हैं।अपने पराये से बाहर निकलें तो कुछ सोचा जावे।उपदेश तो दुनिया भर के दिलवा लो कि वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नैनम छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनम दहति पावक, न चैनम क्लेदयन्ति आपो न शोषयति मारुत: पर जब व्यवहार में लाना हो तो सब भूल भुला दिया जाता है।इन छह दशकों  में कितनों कितनों को मरते देखा,आत्मीयों के साथ श्मशान भी हो आये, सब खुली आँखों से देखा कि सब जल जाता है बस एक मुट्ठी राख शेष बचती है जिसे भी गंगा में बहा दिया जाता है, सब अतीत बन जाते हैं, कोई लौट कर नहीं आता, बस यादों में शेष रह जाते हैं।सब जानते समझते भी  चिपक तो नहीं छूटती न।दुहराते भले ही दस बार रहें कि रहो संसार में ऐसे कमल रहता है पानी में।पर कहां रह पाते हैं कमल की तरह निर्लिप्त।नाक तक इसी संसार में माया मोह में धंसे रहते हैं अपने परायों की गिनती करते रहते हैं, अंधों की तरह अपनों को अपने वालों को चुन चुन के रेवड़ी बांटते रहते हैं।क्या करें मन ही नहीं मानता।अब मन की सुनें या दार्शनिक की तरह पढ़े लिखे को गुनने में समय बर्बाद करें।

दो दिन का है मेला, सवेरे जाना है भजन जब जब सुना जाता है बड़ा वैराग्य जगता है।बड़े बड़े विचार आते हैं जब कुछ साथ लेके जाना नहीं यहीं रह जाना है तो इतनी उठा पटक किसलिए।शांति से भी तो जीया जा सकता है।जो काम अपने हिस्से का है उसे हंस के करो या रोके, करना तो तुम्हें ही पड़ेगा।फिर खीझते क्यों हो।प्रसन्नता के साथ कर लो।और जो हंसी खुशी करोगे तो काम भी जल्दी निबटेगा और खुद भी प्रसन्न रहोगे।प्रसन्नता जो जीवन की कुंजी है उसी का टोटा सब ओर है।सब निराश से अप्रसन्न से झुनझुनाते हुए ,एक दूसरे की शिकायत लिए चले आते हैं।वे खुद करें न करें पर दूसरों पर गिद्ध दृष्टि अवश्य लगाए  रहते हैं कि उसने किया या नहीं।ये आपका काम नहीं, जिसकी ड्यूटी है वह देखेगा।हजार आंख वाला चुपचाप सब देखता रहता है, सी सी टी वी से भी तेज निगाहें है उसकी, स्टोर क्षमता भी बहुत है, कुछ भी डिलीट नहीं होता।सारे कर्मों का हिसाब यहीं चुकता हो जाता है।इस हाथ ले उस हाथ दे की नीति है उस ऊपर वाले की।कुछ भी पेंडिंग नहीं रहता उसके खाते में।खैर ये सब समझ तो तब आये जब अक्कल दाढ़ तो निकले पहले।

सो भैय्या, अपन राम तो सोते सबको राम राम कर लेते हैं पता नहीं कौन सी सुबह जाना पड़ जाए, बरसों रात रात जग तैयारी की है हर यात्रा की पर इस यात्रा के विषय में सोचते तक नहीं कि जग है सराय एक आये एक जाये पता नहीं अपना नम्बर कब लग जाये तो रोज की रोज राम राम कर लेते हैं, पल का क्या भरोसा भला।

माता शत्रु पिता वैरी

 सफर जारी है.....851

19.02.2022

कितना अजीब लगता है न पढ़कर  इसे, दुनिया के कोई भी माता पिता अपने बालक के शत्रु और वैरी कैसे हो सकते हैं भला।वे तो स्वयम उसे बहुत प्यार से इस दुनिया में लाते हैं।बच्चे तो उनके प्यार का प्रस्फुटन हैं।उसे पाने के लिए वे क्या क्या मनौती नहीं मानते, किस किस देवी देवता की चौखट पर माथा नहीं रगड़ते,कितने व्रत उपवास, पूजा पाठ,कितने तीर्थ दान करते हैं।कुछ को तो मांगने के कारण मांगे याऐसे ही किसी अनकटोटे नाम से पुकारने लगते हैं और वही उनका स्थाई नाम हो जाता है।इतिहास गवाह है कि दशरथ ने सन्तान प्राप्ति के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ किया और बाबा नन्द भीअपने ठोटा को पा कैसे निहाल हो गए थे, माता जशोदा तो उसे पा इतनी उत्साहित और मगन हो गई कि उनके बूढ़े शशरीर में गजब का दम आ गया।बच्चे तो माता पिता की आंख के तारे होते हैं, बुढापे की लाठी होते हैं उनकी जीवन बगिया के फूल होते हैं, उनके जीवन निर्माण में अपना सर्वस्व लगा देते हैं।उनका चेहरा जरा सा कुम्हला जाए तो माता पिता के प्राण हलक में आ जाते हैं।वे उसके स्वास्थ्य के लिए ईश्वर से भीख सी मांगते हैं, पैरों में सिर रख देते हैं, उनके लिए किसी पीर मजार देवी देवता की चौखट पर जाने से गुरेज नहीं करते, बच्चे तो उनका जीवन धन है फिर वे भला क्योंकर शत्रु और वैरी लिखे गये।

इसे समझने के लिए इसका अगला पद पढा जाना अनिवार्य है येन बालो न पाठित: अर्थात जो माता पिता अपने बालक को पढ़ाते नहीं हैं, उन्हें शिक्षा दीक्षा नहीं दिलवाते, उन्हें विद्यालय नहीं भेजते, उन्हें ऊंच नीच का गणित नहीं समझाते, उनमें संस्कार और नैतिकता रोपित नहीं करते, उन्हें मानव बनाने के यत्न नहीं करते ,उनके सुंदर भविष्य के निर्माण की योजना नहीं बनाते, उन्हें नीति और मूल्य का पाठ नहीं पढ़ाते, वे जन्मदाता की श्रेणी में भले रखे जाते हों पर वे अपने बालक के शत्रु और वैरी तुल्य ही कहे जाते हैं।हाड़ मास के पुतले को तो जन्म पशु पक्षी भी दे लेते हैं, उससे क्या,ये तो केवल उन्हें इस जग में लाने की प्रक्रिया भर है।पर उसे जीवन जीने का प्रशिक्षण देना भी जन्मदाताओं का काम है जरूरी दायित्व है उसे इस उस के कंधे पर डाल निश्चिन्त नहीं हुआ जा सकता।

गरीब से गरीब माता पिता की शिक्षा के लिए सचेतन होते हैं, खुद भले ही अनपढ़ हों पर बच्चे को विद्यालय भेजने को आतुर रहते हैं कि वह कैसे भी चार अक्षर लिख पढ़ जाए, अपने पैरों पर खड़े होने लायक हो जाए, दुनिया की ऊंच नीच समझ ले, दुनियादारी सीख जाए, अपना जीवन तो आसानी से बिता सकेगा।अपना पेट काट कर मेहनत मजदूरी कर विद्यालय भेजने के सारे उपक्रम करता है, फीस जुटाता है, कॉपी किताब बस्ता यूनीफार्म जूते मोजे बोतल लन्च बॉक्स सभी की व्यवस्था करता है कि उसके बालक को कोई असुविधा न हो।बारह चौदह वर्ष बाद जब बालक पढ़ कर तैयार होता है तो माता पिता का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है कि देखो मेरा बालक भी पढ़े लिखों की जमात में आ गया, मेरा सिर गर्व से ऊंचा हो गया कि फलाने फलाने का छोरा छोरी बी ए एम ए हो गया।उसकी प्रसन्नता की सीमा नहीं रहती।पर वह पढाई लिखाई जब ढकोसला सिद्ध होती है, केवल डिग्री और अंकतालिकाओं का पुलिंदा भर बन जाती है, उसके जीवन में कोई बदलाब नहीं ला पाती, चिकने घड़े पर सारा पानी फिसल कर इधर उधर बह जाता है तो माता पिता के हाथों के तोते उड़ जाते हैं कि अरे ये क्या हो गया।ये तो कोरा का कोरा ही रहा, मूरख का मूरख ही रह गया।

बड़े चाब से जिन गुरु जी को अपना पाल्य सौंपा था, जिस पढाई के लिए अपना पेट काटा था, माँ हर क्षण ये सपना देखती थी कि कब उसकी संतान ज्ञान के आलोक से स्नात होकर आएगी पर उसके हाथ स्नातक की डिग्री तो आई पर जीवन वैसा कोरा ही रह गया।अब गुरुजी भी क्या करें वही तो पढ़ाएंगे सिखाएंगे जो सिलेवस में होगा, जो इम्तहान में आएगा, तभी तो परीक्षा पास कर पाएंगे तभी तो पास की अंकतालिका मिल पाएगी और डिग्री धारी हो पायेगा।उसी डिग्री के आधार पर ही पैकेज वाली नौकरी मिल पाएगी,पेट भरने को चार पैसों का जुगाड़ हो पायेगा।समाज में चार लोगों के बीच उठ बैठने लायक हो पायेगा।बाकी सब बातें आचार व्यवहार गए तेल लेने, उन्हें आज के जमाने में कोई कूड़े के मोल भीनहीं खरीदता।तो माता शत्रु पिता वैरी न कहे जाएं तो बालको को पढ़ने भेजा और इसी में अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली

बात कहीं इससे बहुत आगे की है।पढाना कुछ विषयों को रटा देना मात्र नहीं था, उनमें जीवन की समझ विकसित करना था, मानवीय गुणों का विकास करना था, उनमें धीरज भरना था, उन्हें बड़ों का सम्मान करना सिखाना था, उन्हें   छोटों को स्नेह देना सिखाना था, उसके मन में परिवार समाज देश के लिए जज्बा जगाना था, उसे सिखाना बताना था कि घर पारस्परिक सहयोग और सौहार्द से बसते हैं झूठी जिद और अहम से नहीं, त्याग सेवा सहायता परोपकार जैसे मूल्य सार्वजनीन होते हैं बेकार और बकबास की श्रेणी में नहीं आते, जीवन के लिए धन उतना ही जरूरी है जिससे पेट भरा रहे, उसे भंडारित करने पासबुक में आंकड़े के आगे शून्य की बढ़त सुख सौभाग्य की गारंटी नहीं है।सब यहीं रह जाना है पर जीवन में सेवा सदाचार परोपकार स्नेह का मूल्य विकसित हो गया तो सब भंडार भरे रहेंगे ,सब सुख झोली में सिमट आएगा, इतना छलकेगा कि आप दोनों हाथों से भी उसे संभाल नहीं पाओगे।पर शिक्षा का ये अर्थ लिया ही कब गया।न इसे गुरुजी जान पाए जिनके पास बड़ी आस से अपने बालक को भेजा था कि चार अक्षर लिख पढ़ लेगा तो जीवन जीने का सलीका आ जायेगा।हां,निश्चित ही वह पढ़े लिखों की कैटेगरी में तो आ गया पर अभी उस पढाई को गुनना शेष है।कोई जरूरी नहीं कि सब विद्यालय में ही सीखा सिखाया जाए, ध्रुव प्रह्लाद शिवाजी कौन सी पाठशाला में गये थे,उन्हें तो माता पिता ने ही जीवन मूल्यों कीशिक्षा दे दी।तो अभी भी समय शेष है कि अपने अपने बालकों को जीवन की सही दिशा दें और माता शत्रु पिता वैरी येन बालो न पाठित:के भाव को संजीदगी से ग्रहण करें नहीं तो सब करते धरते भी शत्रु और वैरी की श्रेणी में वर्गीकृत हो जाएंगे।

मोहे न आबे लाज

 सफर जारी है....850

18.02.2022

लज्जा नारी का पहला आभूषण कहा गया है।बड़ों का सम्मान करने हेतु सिर पर पल्ला रखना ,दुपट्टा लेना,अवगुंठन और इन सबसे भी जरूरी आंखों की शर्म की बात कही गयी।लाज संकोच है ,लाज शर्म है ,इसमें  गाल गुलाबी हो जाते हैं, आंखें नत हो जाती हैं, वदन सिकुड़ सिमट जाता है।प्रसाद ने तो कामायनी में इस लज्जा के उपलक्ष्य में पूरा का पूरा सर्ग ही रच डाला।नारी को श्रद्धा के रूप में परिभाषित कर दिया नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास रजत नग पग तल में, पीयूष स्रोत सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में।लाज की जिस स्मित रेखा की बात प्रसाद करते हैं, वह आज आउटडेटेड हो चुकी है।सब खुले खजाने हैं।प्रथम मिलन रात्रि में जो लाज की गठरी बनी रहती थी, अब वह चटर पटर में करती नजर आती है।लाज जो दुलहिन का पहला श्रंगार था ,वह आज ऐसे गायब हो चुका है जैसे गधे के सिर से सींग।

    अब कपड़ों की लाज की बात तो छोड़ो,गलत काम करने में ही लाज नहीं आती।अब अधिकांशतः तो ढीठनुमा सांचे ही बनते हैं जिसके मॉडल निर्द्वन्द हैं, वे स्वयम्भू हैं, किसी को स्वीकारते नहीं।अब लाज के मायने ही बदल गए।पल्ले कंधे से भी नीचे उतर गए, आंखों की लाज न जाने कहाँ बिला गई।उसे तो टोर्च लेकर खोजो फिर भी नहीं मिलेगी।खैर जो हुआ सो हुआ ।पहले मांगने में लाज आती थी।सुदामा की तिरिया से पूछो पड़ोसन से थोड़े से तन्दुल मांगने के लिए उसने अपने को कैसे तैयार किया होगा कितनी लाज लगी होगी उसे।मांगने में सबको लाज लगती ही है।कोई बात करो,रहीम पता नहीं हर प्रसंग में चुपके से कैसे घुसे चले आते हैं, दोहा रच देते हैं...रहिमन वे नर मर चुके जो कहूँ माँगन जाए, उनसे पहले वे मुए जिन मुंह निकसत नाहि।जो मांगते हैं वे तो छोटे हो जाते हैं, उन्हें लाज लगती है,  पर उनसे भी गए बीते वे हैं जो किसी के मांगने पर मना कर देते हैं।मांगने वाले तो भिखमंगो की श्रेणी में आते ही हैं पर मांगने पर न देने वाले उनसे भी अधिक निकृष्ट कहे जाते हैं।माँगना भी कई प्रकार का होता है एक वे जो अपनी जरूरत के लिए ,अपना पेट भरने के लिए मांगते है जैसे वह आता दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता दूसरे वे जो  अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के लिए मांगते है।फिर कबीर यादों में चले आते हैं ।वे साईं से मांगते है, किसी व्यक्ति से नहीं।साईं इतना दीजिये जामे कुटुम समाय, मैं भी भूखा न रहूं साधु भी न भूखा जाए।वे ईश्वर से ही मांगते हैं,उनसे मांगने में कैसी शर्म।वे दाता हैं सबको ही देते हैं।दाता एक राम भिखारी सारी दुनिया।

    अपने लिए मांगने में भले ही लाज लगे पर बड़े कार्य के लिए, देश समाज के लिए मांगने में भला कैसी शर्म।विनोबा जी ने तो भूदान के लिए घर घर जाकर जमीन मांगी, काशी विश्व विद्यालय के लिए मालवीय जी ने सबके आगे झोली फैला दी।उन्होंने तो सोच लिया .....मर जाऊ मांगू नहीं,अपने तन के काज ,परमारथ के कारने मोहे न आबत लाज।सच में यदि सब ऐसा सोच लें तो सब की मांग पूरी हो जाये।जहां

    लाज जहां आनी चाहिए, वहां नहीं आती और जहां बोलना, कहना, करना होता है वहां हमें सकुच और शर्म लगती  है।जिन कार्यो को करने में आगे आना चाहिए ,वहां हम बैक बेचर्स होते है।तो ये सीखना बहुत जरूरी है कि कहां लाज का पर्दा चाहिए और कहां खुलापन जरूरी है।तो मुझे भी सत्कार्य के लिए, अपने प्रयास के जरूरतमंद बच्चों के लिए समाज से सहयोग लेने में बिल्कुल लाज नहीं आती।बिडंबना है सबके पास देने के लिए भौतिक वस्तुए हैं, पैसों की कमी नहीं है पर सहयोग समन्वय के लिए बहुत कम हाथ उठते हैं, लोग आगे ही नहीं आते।और जब विरले ऐसे सहयोग के लिए अपनी सेवा देने का प्रस्ताव देते हैं तो मेरी बांछे खिल जाती है, मन बाग बाग हो जाता है।जब कैप्टन प्रवीर भारती,सुधीर,श्री निरंजन लाल सारस्वत,श्री मखीजा, डाक्टर अनुपम ,डाक्टर जसमीन और मेरे बहुत से विद्यार्थी जब बिना मांगे अपना अमूल्य समय देते हैं तो मुझे लगता है बिन मांगे मोती मिल गए। यदि स्वयम जाके मांगती तो आज तस्वीर कुछ अलग ही होती।तो मुझे बिल्कुल भी लाज नहीं आएगी कि मैं घर घर जाकर मांगू और बार बार दुहराऊं कि परमारथ के कारने मोहे न आबत लाज।

जो मन चंगा

 सफर जारी है...850

17.02.2022

आज माघ पूनो है संत रविदास की जयंती, रैदास का जन्मोत्सव।रैदास जो अपने दैनन्दिन कार्य में मगन रहते 

 हैं,जाओ जिसको तीरथ जाना हो, गंगा स्नान करना हो, रैदास जी तो अपने घर ही भले।उन्होंने सूत्र वाक्य जो पकड़ लिया है... जो मन चंगा तो कठौती बीच गंगा।सच ही तो मन की पवित्रता बड़ी बात है।कबीर भी तो यही समझाते रहे मूंड मुड़ाये हरि मिले तो सब कोई लेय मुड़ाये, बार बार के मूड़ते भेड़ न बैकुंठ जाए।मनुष्य बार बार जपता तो रहा... जप माला छापा तिलक सरे न एको काम,माला तो कर में फिरे जीभ फिरे मुख माहि, मनवा तो चहुं दिशि फिरे यह तो सुमिरन नाहि पर उस पर अमल करने में नानी मरती रही, छठी का दूध याद आता रहा।कोई अमल में लाये या न लाये  पर रैदास ने तो कस के गांठ बांध ली कि कर्म ही पूजा है।मन ही मंदिर है।मोको कहाँ ढूंढे बन्दे मैं तो तेरे पास में, ज्यों  पुहुपन में बास है और चकमक में आगि,तेरा साईं तुज्झ में जागि सके तो जाग।ये जगना ही तो नहीं हो पाता।मार गोरख धंधों में लगे रहते हैं, पाहन पूजे हरि को मिलने की आस रखते हैं पर घर की चाकी पूजने की याद किसी को नहीं रहती जिसके पीसे से पेट की आग शांत होती है।अरे एक बार उस सांबले से नैन तो मिले, झूम झूम कर गाओगे छाप तिलक सब छीना कि तोसे नैना मिलाय के।

       सब कर लेते है पर वही नहीं सध पाता जिसकी सबसे अधिक जरूरत है।रैदास अपने पैतृक व्यवसाय में लगे जूते गांठते भी सब साध लेते हैं।अड़ोसी पड़ोसी गंगा स्नान को जा रहे हैं ।शिष्टाचार वश उनसे भी पूछ लेते हैं चलो रैदास तुम भी चले चलो, पर रैदास काम का हर्जा कर कैसे जाएं भला तो ताँबे का एक सिक्का उठा मित्रों को देते हैं कि मेरी तरफ से गंगा मैया को चढ़ा देना।सच्चे भाव से चढ़ाने के लिए दिया सिक्का गंगा मैया स्वीकार करती है और बदले में अपने भक्त के लिए सोने के कंगन प्रसाद स्वरूप देती है।सोना देख मित्र का मन डोल जाता है।कंगन पत्नी को पहना देता है, लेकिन कंगन ढीले हैं सो एक  गंगा जी की भेंट चढ़ जाता है और शेष बचे दूसरे पर  रानी की दृष्टि पड़ जाती है।हैं ही ऐसे मोहक, और हों भी क्यों न,दैवीय प्रसाद जो है।रानी कंगन ले लेती है पर एक से क्या होगा, दूसरा हाथ नंगा क्यों रहे।अब विशाल गंगा जी में कड़ा खोजे कौन पर रानी को तो दूसरा चाहिये ही।राजा के सेवको को पता चलता है कि कोई रैदास हैं जो खोया पाया सब बता देते हैं, सेवक उनके पास पहुंच जाते हैं ,कंगन दिखाते हैं कि इसके साथ का कंगन नहीं मिल रहा, खो गया है, आप तो सब जानते हैं बता दीजिए। रैदास पूछते हैं आखिर कंगन गिरा कहां था।जबाब मिलता है गंगा जी में।रैदास कठौती में गंगा का आवाहन करते हैं । कठौती में हाथ घुमाते है और कंगन मिल जाता है, सेवक को दे देते हैं।सेवक हैरान हैं कि कंगन गिरा तो गंगाजी में था लेकिन रैदास की कठौती में कैसे आ गया।हां,गंगाजी कठौती में ही उतर आई क्योकि रैदास का मन सच्चा था।जन सामान्य के हाथ एक किंवदन्ती लग गई जो मन चंगा तो कठौती बीच गंगा।

       उनके भजन जन जन की जुबान पर हैं प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी, जाकी अंग अंग बास समानी।उनके दोहों में जो सन्देश है बस उन्हें मथ कर ह्रदयंगम कर लिया जाए तो सब दुखों से मुक्ति मिल जाए, आवागमन के चक्र से ही छुटकारा मिल जाये।बानगी तो देखिए....ऐसा चाहूं राज मैं जहां मिले सभी को अन्न,छोट बड़ो सब सम बसै रहे रैदास प्रसन्न।रविदास जन्म के कारने होत न कोई नीच,नर कू नीच करी डारि है ओछे कर्मन की कीच।हरि सा हीरा छाड़ि के करे और की आस,ते नर जमपुर जाएंगे भाषे सन्त रैदास।

       सन्त तो बहुत कुछ कहते हैं पर हमारे कानों में तो ठेक पड़ी हुई है, सो अंदर जाता कब है कुछ भी।दो चार बात ही समझ आ जाये तो जिंदगी ही बदल जाये।ऐसे संतों को बारम्बार प्रणाम जो जनहित में अपना जीवन लगा देते हैं।बड़े भाग तब जानिए जब मिलने आबे सन्त, और सन्तन को मिलनो करे सब दुक्खन को अंत।

नवन नीच की अति दुखदायी

 सफर जारी है...849

16.02.2022

नवना नम्रता का प्रतीक है।कहा भी गया कि विद्या विनयी बनाती है।विद्या ददाति विनयम ,विनयात याति पात्रत्वतां, पात्रत्वाताम धनम आप्नोति ,धनात धर्म: तत: सुखम।फिर ये भी पढ़ा कि जो जितना अधिक बड़ा होता है वह उतना ही अधिक विनयी होता है।रहीम ने लिखा नल की अरु नल नीर की गति एकहि कर जोई, ज्यों ज्यों नीचे ह्वे चले त्यों त्यों ऊंचो होई।ये भी सिखाया गया कि फलों से लदी डाली ही नवती है।कुल मिलाकर लब्बोलुआब ये निकलता है कि व्यक्ति को विनम्र होना चाहिए, बड़ों के आगे झुक कर चलना चाहिए।नमस्ते, प्रणाम, नमस्कार करते, चरण स्पर्श करते सिर झुकाने की परंपरा तो भारतीय संस्कृति में 

 है ही।अभिवादन शीलस्य नित्य वृद्धोपसेविनः, चत्वारि तस्य वर्द्धन्ते आयु विद्या यशो बलम।कोई लठ्ठमार भाषा में नमस्ते करे तो उसे टोका जाता है समझाया जाता है कि भाई थोड़े विनम्र बनो।अकड़ते तो सूखे लोग है।देखा है हरी टहनी कैसे लचक जाती है।फिर घास का उदाहरण भी दिया गया कि भयंकर तूफान आने पर बड़े बड़े पेड़ उखड़ जाते हैं, जमींदोज हो जाते हैं लेकिन मुलायम हरी घास कैसे जमीन पर बिछ जाती है और जैसे ही तूफान गुजर जाता है फिर सिर उठा कर खड़ी हो जाती है।तो इतनी पढाई से यह ही समझ आया था कि विनम्रता व्यक्ति का बड़ा गुण है।

          रामचन्द्र जी समुद्र से रास्ता मांगने के लिए पहले विनय ही करते हैं, तीन दिन तक निवेदन करते हैं ,पूजा अभ्यर्थना करते हैं और जब समुद्र बिल्कुल ही ढीठता दिखाता है,बात ही नहीं सुनता, तब धनुष पर वाण चढ़ाते हैं।विनय न मानत जलधि जड़ गये तीन दिन बीति, बोले राम सकोप तब भय बिनु होय न प्रीत।

  अर्थात विनय का रास्ता पहला रास्ता है।पर अरण्य कांड में मारीच रावण के प्रसंग की जब जब ये चौपाई पढ़ी जाती है कि नवन नीच की अति दुखदायी, अंकुस धनु उरग बिलाई।भयदायक खल के प्रिय बानी, जिमि अकाल के कुसुम भवानी। तो  विनम्रता के सारे पाठ तेल बेचने चले जाते हैं भले ही सन्दर्भ पात्र अपात्र का हो।नीच जब झुके तो समझ लो कोई बड़ा संकट आने वाला है, उसका झुकना उसी तरह दुखदायी है जैसे अंकुस, धनुष, सांप और बिल्ली का झुकना।रावण मामा मारीच के पास जाते हैं ,सादर अभिवादन करते हैं, कोमल स्वर में बात करते हैं तो मारीच उनकी विनम्रता से प्रभावित होना तो दूर, उल्टे धर्म संकट में पड़ जाता है।दरअसल वह अपने भांजे रावण की दुष्टता को भली भांति जानता है।उसे मालूम है कि रावण यूं ही नहीं आया होगा, उसकी प्रकृति ऐसी नहीं है कि वह बिना मतलब के बिना किसी स्वार्थ के ऐसा विनम्र आचरण करे।ऐसे लोग यदि आपको नमस्ते करें, स्वयम से आगे बढ़कर बात करें तो सजग हो जाइए।नीच लोग जब भी हमारे सामने झुकते हैं ,किसी स्वार्थ की वजह से झुकते हैं।ऐसे लोगों की इच्छा पूरा करने के बाद केवल आपको ही नहीं, बल्कि कई लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है।रावण जो बिना वजह किसी के आगे नहीं झुकता, वह भला मारीच के आगे क्यों झुकेगा।अंकुश झुके तो हाथी को वश में करे, धनुष झुकता है तो किसी की मौत का कारण बनता है, कोई सांप झुकता है तो डसने के लिए और बिल्ली झुकती है तो शिकार पर हमला करने के लिए।ऐसे ही रावण मारीच के आगे झुका था उनसे अपनी लक्ष्य सिद्धि के लिए।दुष्ट व्यक्ति यदि मीठी बोली बोले,नव नव के बात करे तो तुरंत सतर्क हो जाओ।

  फिर मन प्रश्न करता है कि जब मारीच जानता था  नवन नीच की अति दुखदायी होती है तो भी उसने रावण की बात क्यों मान ली।सीधे सीधे स्वर्ण मृग का भेष रचने से मना  क्यों नहीं कर दिया।ये गुत्थी मन को बहुत उलझाती है पर गोस्वामी तुलसीदास इसका भी समाधान कर देते हैं....तब मारीच ह्रदय अनुमाना, नवहि विरोधे नहि कल्याना।सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी,वैद बन्दि कवि भानस गुनी।शस्त्र धारी,मर्म को समझने वाला, समर्थ स्वामी, दुष्ट, धनवान, वैद्य, चारण/भाट, कवि और रसोइया की बात सदैव मान लेनी चाहिए।अन्यथा प्राण संकट में आ जाते हैं।इनसे विरोध का कोई फायदा नहीं।यदि मारीच रावण की बात नहीं मानता तो उसका मरण  निश्चित है पर कम से कम प्रभु राम के हाथ मरेगा तो उसकी मुक्ति जरूर हो जाएगी। 

           ये केवल रामचरित मानस के ही प्रसंग भर नहीं हैं, हम सबके जीवन के प्रसंग है।दैनिक जीवन में कमोवेश यही सब तो घटता है।नीच का नवना दुखदायी होता है,यह सब जानते बूझते समझते हैं लेकिन कई कई बार मारीच की सी मनस्थिति में होते हैं, नवहि विरोधे नहि कल्याना।तो पढ़ते गुनते रहिये इन प्रसंगों को, बड़ी बड़ी मुसीबतों से बाहर निकाल लेते हैं, लाइट हाउस का काम करते हैं।ये धार्मिक ग्रन्थ और पोथी केवल लाल कपड़े में बांध पूजा घर की शोभा बढाने के लिए नहीं, पढ़ने गुनने और कंठस्थ करने के लिए हैं।जीवन जीने के गहरे सूत्र छिपे हैं इनमें, तो बिना समझे केवल इसका अखंड पाठ ही मत करते रहिये, इसके दोहे चौपाई सोरठे के मर्म को भी समझिए, निहित गूढ़ अर्थ को पकड़े रखिये,जीवन जीना आसान हो जाएगा।

कौन काजर से कारी,

 सफर जारी है....848

15.02.2022

पांचों पांडवो के साथ यक्ष संवाद की कथा से तो आप सब परिचित होंगे ही किस प्रकार एक एक कर चारों भाई सरोवर से पानी लेने जाते हैं और उस सरोवर के स्वामी यक्ष के प्रश्नों की उपेक्षा कर पानी पीने लगते हैं क्योंकि उन्हें तेज प्यास लगी है।एक को खोजते दूसरा आता है और प्रश्नों का जबाब न देने के कारण चारों बेहोश होकर वहीं गिर जाते हैं।अंत में युधिष्ठिर आते हैं, सभी प्रश्नों का समुचित जबाब देते हैं, प्रसन्न होकर जब यक्ष उन्हें किसी एक भाई को जीवित करने का वरदान देता है तब भी नकुल का नाम लेते हैं जिससे माद्री और कुंती दोनों की गोद भरी रहे।यक्ष उनके प्रश्नों से प्रसन्न होते हैं और सभी भाइयों को जीवित कर देते हैं।यक्ष जिन प्रश्नों को पांडव भाइयों से पूछते हैं,उन्हीं प्रश्नों को अनूप जलोटा भी अपने भजन में सम्मिलित करते हैं.... जल से पतला कौन है और कौन भूमि से भारी, कौन अगिन से तेज है और कौन काजल से कारी।

और फिर इन प्रश्नों के उत्तर में तो पूरा जीवन दर्शन ही समाहित हो जाता है। जल से पतला ज्ञान है और पाप भूमि से भारी, क्रोध अगिन से तेज है और कलंक काजर से कारी।हां,निश्चित ही ज्ञान का विस्तार और इसकी सूक्ष्मता जल से भी पतली है।भला जल की पारदर्शिता और उसके पतलेपन में ज्ञान के अलावा और कौन हो सकता था।जल चाहे जहां रास्ता बना लेता है, इतना पतला है कि जरा सी सन्द भर मिल जाये अपना रास्ता बना लेता है।ज्ञानी ध्यानी तो कैसी भी विकट विषम परिस्थिति रही हो, वह समायोजन करना जानता है।अधिक चीखता चिल्लाता नहीं, मौन रहकर बहुत कुछ कह और कर जाता है।वाणी का प्रयोग बहुत सोच समझ करता है कि किसी को कुछ बुरा न लग जाये।बख्शता किसी को नहीं पर ऐसे कहता है कि सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे।काम भी हो जाये और झिकझिक भी न करनी पड़े।सबसे प्रेम और सौहार्द का व्यवहार करता है, अटक दुश्मनी मोल नहीं लेता।पर अपने स्वाभिमान पर आंच भी नहीं आने देता।ऐसे ज्ञानी ध्यानी को ही जल के समकक्ष रखा गया है।जल जिसे जीवन कहा गया, जल जिसके बिना मोती मानुख चून सब बेकार हैं।इसीलिए रहीम लिख देते हैं रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून, पानी गए न ऊबरे मोती मानुख चून।नर और नल की गति भी एक सी कही गई... नर की अरु नल नीर की गति एकही कर जोय, ज्यों ज्यों नीचो ह्वे चले त्यों त्यों उज्ज्वल होय।तो जल से पतला ज्ञान है।

पाप भूमि से भारी।है न आश्चर्य कि पृथ्वी जो पूरे संसार का भार धारण करती है, जिसे शेषनाग अपने फन पर धारण किये रहते हैं, पृथ्वी जिसे माता का गुरुत्व मिला है,धरती कहती धैर्य न छोड़ो कितना भी हो सिर पर भार, नभ कहता है फैलो इतना ढक लो तुम सारा संसार।उस भूमि से भी अधिक भार पाप का है।पाप जो पुण्य का विलोम है, पाप जिसे करने वाला पापी कहलाता है।पापी जिसे नष्ट करने के लिए ईश्वर को अवतार लेना पड़ता है,पाप जिससे बचने के लिए इतनी इतनी शिक्षा दी जाती है, पाप जिससे बचने के लिए बचपन से हिदायत दी जाती है,जिसके लिए कहा जाता है पाप से डरो पापी से नहीं।व्यक्ति हर क्षण सतर्क रहता है कि कहीं भूल कर भी उससे पाप न हो जाये, पाप जिसे परपीड़ा का पर्याय माना गया, अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनम द्वयम,परोपकार पुणयाय पापाय परपीड़नम।वह पाप  सच में भूमि से भारी है। पाप पुण्य की परिभाषा चाहे जो हो पर इतना तो निश्चित है कि सारी बुराई पाप ही है।लोग इन पापो को धोने बहाने ही तो गंगा जमुना जाते हैं, मंदिर तीर्थ जाते हैं, इससे बचने को ही तो धर्म ग्रंथ पढ़ते गुनते हैं।जीवहत्या पाप है इसलिए चींटी तक को बचाकर चलते हैं चिड़िया कबूतर को दाना पशुओं को चारा देते हैं।पाप से सबको डर ही लगता है, सब उससे बचना ही चाहते हैं।सच में पाप भूमि से भारी ठहरता है।

क्रोध अगिन से तेज है.…हां क्रोध की अगिन दूसरे को तो बाद में जलाती है पर सबसे पहले उस स्थान को काला कर देती है जहां पर लगती है।लपटें दूसरों को झुलसाती अवश्य हैं पर खुद को भस्म पहल पत्त कर देती है।दुर्वासा और परशुराम दोनो क्रोध के साकार रूप है।सो तजो क्रोध को ये अग्नि से सौ गुना तेज है।

और अंतिम बात...कलंक काजर से कारी।काजर की कोठरी में कैसो हू सयानो जाय एक लीक काजल की लागिगे पे लागिहे और कोयले की दलाली में हाथ काले होते ही हैं ,उससे बचा नहीं जा सकता।पर काजर और कोयले से भी काला यदि कुछ और  हो सकता है तो वह कलंक है।लाख धोलो सर्फ एक्सेल से, इसका दाग नहीं मिटता।जिसके माथे ये कलंक का टीका लग जाये वह न जिंदा में गिना जाता है न मुर्दों में। सो कलंक से बच कर रहो।और जो कहीं भक्क सफेद चादर हो तो जरा सा नेक सा धब्बा भी बहुत चमकता है, दूर से ही नजर आ जाता है तभी कबीर चादर को बहुत संभाल कर रखते हैं ,उसे बड़े जतन से ओढ़ते हैं दास कबीर जतन से ओढ़ी ज्यों की त्यों धर दीनी चंदरिया भीनी रे भीनी चंदरिया। 

बस ये चार बात जीवन का सार हैं, ज्ञानी बनो, पाप से बचो, क्रोध से दूर रहो और कलंक से सौ हाथ की दूरी बरतो।

कभी धूप कभी छांह

 सफर जारी है....847

14.02.2022

जीवन सुख दुख, हानि लाभ, धूप छांह, खुशी गम, प्रसन्नता उदग्विनता की मिली जुली खिचड़ी है।समझदार लोग इसमें समत्व बनाना जानते हैं और अनसमझ इससे विचलित हो जाते हैं।और कहें तो प्रसन्नता में फूल जाते हैं दमक जाते हैं और दुख कष्ट विप्पति में पिचक जाते हैं, सुन्न काले पड़ जाते हैं।उन्हें सुख दुख दोनों प्रभावित करते हैं, एक उन्हें उछालता है तो दूसरा सालता है।ये जानते हुए भी गहरी अंधेरी रात के बाद पौ फटती है, सवेरा होता है, सूरज अपना प्रकाश फैलाता ही है।पर जब तक घुप्प अंधेरा रहता है तब तक मन चिंताग्रस्त बना रहता है।ये सब दिनन का फेर है।सब दिन जात न एक समाना।रहीम समझाते हैं रहिमन चुप ह्वे बैठिए देख दिनन को फिर, फिर नीके दिन आइहे तनिक न लगिहैं देर।हां,जब अच्छा समय ही नहीं रहा तो भला बुरा क्यों टिका रहेगा, वह भी बीत ही जायेगा पर जब तक बीतेगा तब तक व्यक्ति कई कई बार मर चुकेगा।

        ये गाते गुनगुनाते भजन और लोक सन्दर्भ भी मन को बहुत बल देते है। सुख दुख दोनों रहते जिसमें जीवन है वह गांव, कभी धूप कभी छांव।ऊपर वाला पासा फैंके नीचे चलते दांव, कभी धूप तो कभी छांव।सच ही कभी कभी डोर आपके हाथ नहीं हुआ करती, आप बस नाचते भर हैं और नचाता कोई और है।सबहिं नचावत राम गुसाईं।अब जग में आये हैं तो भला बुरा कडबा मीठा सब चखना ही पड़ता है।भले भी दिन आते जगत में बुरे भी दिन आते,कड़बे मीठे फल करम के सभी यहां पाते,कभी उल्टे कभी सीधे पड़ते अजब समय के पांव, कभी धूप तो कभी छांव।सच कभी कभी सही दांव भी उल्टे पड़ जाते हैं और आप समझ ही नहीं पाते आखिर गलती कहां हुई।बस सोच सोच कर परेशान होते रहते, विकल्प नहीं खोज पाते।बिल्कुल याद ही नहीं रहता कि क्या खुशियां क्या गम सभी मिलते बारी बारी,मालिक की दुनिया पे चलती यह दुनिया सारी,ध्यान से खेना जग नदियां में बन्दे अपनी नाव, कभी धूप कभी छांव।सच यह दुनिया तो हमने आपने बनाई नहीं, सब ऊपर वाले की करामात है, उसी की चलती है, हम तो प्यादे हैं उसके, चाहे जहां फिट कर दे,मर्जी तो एक मात्र उस की ही चलती है।होता तो वही है जो निर्धारित होता है, सारी गोट भी वही फिट करता है, हमें तो जग नदिया में अपनी नाव खेने में सावधानी रखनी होती है, चप्पू ध्यान से चलाना होता है, पानी की गहराई और अपनी लम्बाई देख कर उतरना होता है नहीं तो डूबने की आशंका बनी रहती है।यही जीवन है जो सुख दुख दोनों से मिलकर बना है पर कभी कभी इसका अनुपात बिगड़ जाता है तो जीवन की धज भी बिगड़ जाती है।

        दिन तो दिन हैं समय समय है,उसमें अच्छे बुरे विशेषण जुड़ते ही रहते है।ऐसा न होता तो राजा नल पर विपत्ति क्यों आती, क्यों मरे पक्षी उड़ जाते, मछलियां पानी में बह जाती, खूंटी हार निगल जाती और क्यों उन्हें नलुआ बन किसी तेली की चाकरी करनी पड़ती।ऐसा न होता तो राम को चौदह वर्ष का वनवास क्यों मिलता, सीता का अपहरण क्यों होता, राम वन वन क्यों भटकते, कृष्ण के जन्म से पूर्व ही शत्रु क्यों पैदा हो जाते, उन्हें यहां वहां क्यों भटकना पड़ता, उनका नाम रणछोड़ क्यों पड़ता, पांडव कौन से गलत थे पर कौरव उन्हें सुईं की नोंक के बराबर भी जमीन देने के लिए कब तैयार हुए, द्रोपदी दुर्योधन को अंधे के अंधे होते हैं न कहती तो महाभारत की नींव क्यों पड़ती।पांडव बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास क्यों भोगते, क्यों वन में भटके भटके डोलते।ये अलग बात है कि अंत में जीते पांडव ही, पर भोगा तो उन्होंने सबसे अधिक ही न।कंस और रावण भले ही मारे गए हों पर भटकना तो  राम और कृष्ण को भी पड़ा न।वक्त की मार से वे भी नहीं बच सके।

        द्रौपदी तो के सखा तो साक्षात कृष्ण भगवान थे पर दुशासन ने भरी सभा में उनकी लाज खींचने का प्रयास तो किया ही न ये अलग बात है कि उनकी करुण पुकार पर कृष्ण दौड़े चले आये, पल्लू को इतना इतना बढ़ा दिया कि उसका ओर छोर दुशासन नहीं पा सका और थक कर चकनाचूर होकर गिर पड़ा।गज ग्राह की लड़ाई में एक बार तो ग्राह ने गज को अपनी चपेट में ले ही लिया, वह तो भला हो भगवान का जो पुकार सुनते ही नंगे पैर दौड़े चले आये और गज की रक्षा की।सुदामा तो कृष्ण के बाल्यकाल के परम मित्र थे पर उन्होंने दरिद्रता का दुख तो भोगा ही, ये अलग बात है कि भामिनी के बार बार टोकने पर कि जा घर से कबहू ना गयो पति टूटो तवा और फूटी कठौती, और द्वारिका जाहु जी द्वारिका जाहु जी आठों याम पुकारने पर सुदामा को जबरन पड़ोसन से मांगे हुए तन्दुल की पोटरी लेकर दीनदयाल के धाम जाना पड़ा और प्रभु ने तीन मुट्ठी तन्दुल खाने के ब्याज से उन्हें त्रिलोक के सारे सुख दे दिए।भगवान तो प्रेम के भूखे हैं ।न होते तो दुर्योधन की मेवा छोड़ विदुर का शाक पात खाने क्यों पहुंच जाते, शबरी के झूठे बेर क्यों चाव से खा लेते।

        समय तो बदलता रहता है, ये घटाटोप हमेशा रहने वाला नहीं है, दिन का उजास फैलेगा ही पर तब तक सकारात्मक बने रहना जरूरी है।सब आपके हाथ होता भी नहीं तो जैसे वक्त का पहिया घूमे घूमते जाओ, दुनिया के सब रंग देख लो, ये भी जरूरी है।गाते गवाते रहो सब दिन जात न एक समाना, सुख दुख जिसमें दोनो रहते जीवन है एक गांव, कभी धूप तो कभी छांव।बीत ही जायेंगे ये दिन भी और आप गा उठेंगे दुख भरे दिन बीते रे भैया अब सुख आयो रे, रंग जीवन में नया छायो रे।

सच्चे का बोलबाला

 सफर जारी है....846

12.02.2022

सुनते तो यही आ रहे हैं कि सत्य की सदा जीत होती है, सत्य को कितने भी आवरण में क्यों न रखो ,एक न एक दिन सारे अन्धकार को चीर कर अपने पूरे प्रकाश के साथ सबके समक्ष उपस्थित हो जाता है, बादल कुछ देर के लिए उसे ढक भले ही लें पर घोर घटाटोप भी उसे अधिक लम्बे समय तक नहीं छिपा पाता।सत्य उद्घाटित होता ही है सारी कालिमा को काई सा फाड़ता हुआ।बचपन से यही तो इमला और सुलेख में लिखते चले आ रहे हैं कि सदा सच बोलो।बड़ों का आदर करो।उन्हें सम्मान दो, छोटो को प्यार करो, चोरी मत करो,न वस्तु की न व्यवहार की ।किसी की चुगली मत करो आदि आदि।फिर घर में बडे बूढों से सुना कि सूधे का सदा भला।पूजा अग्निहोत्र करते देखा कि भूल चूक के लिए अंत में क्षमा याचना कर ली जाती है कि भगवान जी हम तो अज्ञानी है, जैसे भी बस तेरे हैं, जो गलती बनी हो उसके लिए साष्टांग दण्डवत प्रणाम कर लिया जाता है और बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध लेय कह कर आगे बढ़ लिया जाता है।आगे भले ही बढ़ जाओ पर किये का फल तो भोगना ही पड़ता है ,इसी जन्म में भोग लो तो ठीक नहीं तो फिर दुनिया में आना पड़ेगा,भोगे बिना मुक्ति तो नहीं है। 

जैसी करनी वैसी भरनी ऐसे ही थोड़े कहा गया।सच की लड़ाई लंबी होती हैIउसके फैसले तुरत फुरत नहीं हुआ करते।कभी कभी तो यह युगों तक चलती है बस पात्र बदलते रहते हैं।सतयुग में प्रह्लाद की रक्षा के लिए नृसिंह रूप धर कर आये तो द्वापर में आततायी कंस के लिए कृष्ण बन अवतार लिया और त्रेता में रावण के लिए राम को प्रकट होना पड़ा।गीता उद्घोष करती है यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थान अधर्मस्य संभवामि युगे युगे तो तुलसी बाबा लिख देते हैं जब जब होहिं धर्म की हानि, बाढहि असुर महाअभिमानी ,तब तब धरि प्रभु मनुज शरीरा, हरहि दयानिधि सज्जन पीरा। राम जन्मते हैं ....भये प्रकट कृपाला दीन दयाला कौशल्या हितकारी ,हर्षित महतारी मुनिमन हारी अद्भुत रूप बिचारी, लोचन अभिरामा तनु घनश्यामा निज आयुध भुज चारी, भूषण वन माला नयन विशाला शोभा सिंधु खरारी।और जब भादों की आधी रात कान्हा जन्मते हैं तब पहरेदार गहरी नींद सो जाते हैं, जेल के ताले स्वत: खुल जाते हैं, वसुदेव नवजात को सूप में रखकर जमुना पार करते हैं, मूसलाधार बारिश है शेषनाग स्वयम छत्र बन जाते हैं, जमुना मैया अपने आराध्य के चरण छूकर उतर जाती हैं ।वसुदेव गोकुल पहुंचते हैं जशोदा के पार्श्व में लेती कन्या को उठा उसके स्थान पर कान्हा को लिटाते हैं और कन्या को ले उल्टे पैर लौट जाते हैं।इतने पल के लिए पूरी सृष्टि थम जाती है ।कन्या का रोदन सुनकर कंस को और लाला की किलकारी सुन जशोदा को पता लगता है कि कान्हा जन्म ले चुके हैं, कान्हा जन्म सुन आई जशोदा तुम्हें लाखों बधाई।

ये तो इतिहास प्रसिद्ध साक्ष्य हैं कि जब जब अन्याय बढ़ता है तब तब ईश्वर या तो स्वयम दुष्टों के संहार के लिए अवतार धारण कर लेते हैं या किसी को सहायता के लिए भेज देते हैं।अब कलियुग में वे स्वयम नहीं आते पर सच की रक्षा के लिए किसी को अपना प्रतिनिधि अवश्य नियुक्त कर देते हैं।उसे आपकी सहायता के लिए भेज देते हैं।सच की लड़ाई लंबी तो चलती ही है ,सत्यधारी को इतना तोड़ती है कि अक्सर उसका विश्वास डोल जाता है।करे भी क्या जब झूठ फलता फूलता दिखे और सत्य दबा कुचला फाइलों के ढेर में नीचे दबा दिया जाए तो अच्छे से धैर्यवान का धैर्य भी जबाब दे जाता है।उसका विश्वास डगमगाने लगता है।मन पर निराशा हावी होती जाती है।साहस चुकता प्रतीत होता है।जो ऊर्जा किसी सद्कार्य में लगनी चाहिए थी वह बेकार के झंझटों में चुक जाती है।आस्था कमजोर पड़ती है, भय सिर उठाने लगता है।प्रभु, आप सच धारी को इतने कष्ट क्यों देते हो, उसकी इतनी परीक्षा क्यों लेते हो।हर युग में यही करते आये हो।आते तो जरूर हो पर तब जब व्यक्ति निराशा के चरम पर पहुंच जाता है।अपना करतब भी दिखाते हो पर तब तक बहुत पानी बह गया होता है।प्रभु इतनी कठिन परीक्षा मत लिया करो।एक तो खूब सताते हो उस पर डायलॉग और मारते हो कि जितने कष्ट कंटको में जिनका जीवन सुमन खिला, गौरव गन्ध उन्हें उतना ही यत्र तत्र सर्वत्र मिला, मेंहदी रंग लाती है पिसने के बाद और देखो कुंती भी भगवान से दुख ही मांगती है जबकि वह कृष्ण की बुआ है,जो चाहे मांग सकती है पर जानती है कि सुख के माथे सिल पड़े जो भगवद नाम भुलाये, बलिहारी वा दुक्ख कू जो पल पल नाम रटाय।फिर कबीर वाणी सुना देते हो दुख में सुमिरन सब करें दुख में करे न कोई, जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे होय।हम तो दुख सुख नें तुम्हें ही सुमिरते हैं, कहाँ जाएंगे भला।

प्रभु लाज राखो अपने वचन की सांचे का बोलबाला, झूठे का मुंह काला कर दो।नहीं तो डर है कि कहीं झूठ अपने पैर लम्बे न पसार दे और सत्य को मुंह छिपाना पड़े।

जो जीता वही सिकन्दर........

 सफर जारी है.....845

12.02.2022

बात प्रेम की हो, युद्ध की हो या दोस्ती की हो जो विजयी हो जाते हैं ,वही श्रेष्ठ ठहरते हैं,दुनिया में वही मान पाते हैं,उन्हीं का नाम होता है,वही नम्बर वन कहे जाते हैं,वही पुरस्कृत और सम्मानित होते हैं, उन्हें ही संसार पूजता है।शेष वक्त की धूल में खो जाते हैं।कहते भले अवश्य हो कि जिंदगी में सुख दुख अंधेरे उजाले की तरह जीत हार लगी रहती है पर व्यक्ति हार को आसानी से पचा नहीं पाता।जबकि कई कई मामलों में ये हार और असफलता आपको जीवन के महत्वपूर्ण पाठ पढ़ा जाती है, जरूरी सबक दे जाती है।जो खेल की भावना से नहीं खेलते उन्हें हार बहुत सालती है, तोड़ कर रख देती है, जीवन के प्रति उनका नजरिया ही बदल जाता है।कुछ तो जो भी करते हों पढाई लिखाई ,खेल या परीक्षा, सब जीत के लिए ही करते हैं।कर्तव्य समझ कर कर के छोड़ नहीं देते कि जो भी परिणाम होगा स्वीकार होगा।उन्होंने सम्भवतः यह सीखा ही नहीं होता कि जब किसी मार्ग पर आगे बढ़ते हैं तो गिरते भी हैं ठोकर भी लगती हैं कांटे भी चुभते हैं पैर लहूलुहान हो जाते हैं,अंधेरा हो जाता है मार्ग सूझता नहीं ,मंजिल तक पहुंच नहीं पाते लेकिन हार कर बैठ नहीं जाते, उसे पकड़े नहीं रहते,रोते झींकते नहीं रहते ,दिन रात भाग्य को कोसते नहीं रहते कि हमारे भाग्य में यही लिखा है, वे उस हार से सबक लेते हैं नया सीखते हैं और पूरी ताकत और जोश से आगे बढ़ते हैं।

         किसी को एक ही प्रयास में सफलता मिल जाती है और किसी को बार बार लगातार प्रयास करना होता है।यह कार्य की प्रकृति और आपकी क्षमता योग्यता कार्यशैली पर भी निर्भर करता है।निश्चित ही बड़े लक्ष्य अधिक मेहनत और धैर्य मांगते हैं।तो जो कार्य हाथ में लो उसे पूरे मन से करो।उसकी योजना बनाओ, अपनी शक्ति और संसाधन तौलो, यूं ही किसी के कहने मात्र से नहीं, दूसरों की देखा दाखी नहीं, दूसरों का मन रखने को नहीं।जो काम हम किसी दूसरे को खुश करने के लिए करते हैं उसमें स्वत: प्रेरणा नहीं होती।और जैसे ही दबाब कम होता है हम पुरानी स्थिति में लौट आते हैं।कभी कभी हार में भी जीत छिपी होती है।अपनो से हार जाने का आनन्द ही अलग है।झूठी जिद और खोखले अहम के चलते आत्मीय रिश्ते खो देने से तो हार जाना सौ बट अच्छा है।कम से कम घर परिवार तो बने रहते हैं, दो बात किसी ने ज्यादा कह भी लीं तो कौन हम नीचे हो जाते हैं पर दम्भ सामान्य कहां रहने देता है, वह तो हर समय सेहरा अपने ही सिर बांधना चाहता है।कुछ का मैँ पन इतना प्रधान होता है कि उसके आगे सब मक्खी मच्छर, भेड़ बकरी से नजर आते हैं जिनकी जान की कोई कीमत नहीं होती, उन्हें पैर तले मसल दिया जाता है।

         मुझे सुदर्शन की हार की जीत कहानी अक्सर याद आती है कि किस तरह बाबा भारती हार कर भी जीत जाते हैं।खड़गसिंह सुल्तान को प्राप्त करने के लिए चाल चलता है, बीमार रोगी बन मार्ग में पड़ जाता है, बाबा भारती उस पर दया कर घोड़े पर बिठा लेते हैं और वह चीते की फुर्ती से बाबा के हाथ से लगाम छुड़ा घोड़े को सरपट भगा ले जाता है।बाबा भौंचक्के से रह जाते हैं।खड़गसिंह को आवाज देते हैं सुनो भाई घोड़ा भले ही ले जाओ पर किसी से ये प्रसंग भूल कर भी मत कहना नहीं तो लोग गरीबों पर विश्वास करना छोड़ देंगे।खड़गसिंह के मन में बाबा की बात घर कर जाती है और वह नीम अंधेरे में सुल्तान को अस्तबल में बांध जाता है।बाबा भारती घोड़े सुल्तान को देख कर खुशी से फूले नहीं समाते, वह हार कर भी जीत जाते हैं ,उनकी सदाशयता खड़गसिंह जैसे क्रूर की मानसिकता बदल देती है।फिर बुद्ध याद आते हैं वे भी तो अंगुलिमाल डाकू का ह्र्दयपरिवर्तन कर देते हैं, साधु वाल्मीकि से केवल इतना ही कहते हैं न कि एक बार घर जाकर परिवारीजनों से पूछ तो लो कि पाप की कमाई में उनका कितना हिस्सा होगा और वाल्मीकि सच जानकर उनके पैरों में गिर जाते हैं उनके बन्धन खोल देते हैं मरा मरा जप राम को पा लेते हैं।सम्राट अशोक कलिंग युद्ध जीत जाते हैंपर युद्ध के बाद लोगों का करुण क्रंदन लाशों का ढेर उन्हें सहज कब रहने देता है, वे शस्त्र ही त्याग देते हैं ,हिंसा छोड़ देते हैं चन्ड अशोक से सर्वप्रिय अशोक बन जाते हैं।अशोक लाट आज भी याद दिलाती है कि सब कुछ हार कर भी मन जीत लिए जाए तो इससे बड़ी जीत और क्या होगी।

         सिकन्दर जिसे इतिहास विश्व विजेता कहता हैं उसने जीत कर कौन से तारे तोड़ लिये, जब दुनिया से गया तो सब यहीं छोड़ गया,उसे समझ आ गया कि चाहे जितना मर्जी जीत लो साथ में तो सुईं की नोंक तक नहीं जाती।इतिहास गवाह है असली जीत वही है जब आप लोगों का दिल जीत लेते हैं।तो सारी कोशिश दिलों को जीतने की होनी चाहिए, बाकी जीत तो दिखाबे की जीत है।जीत में जो भी जीतते हो सब यहीं छूट जाता है तो दूसरों को जीतने से पहले खुद को जीतना जरूरी होता है।दूसरों की जय से पहले खुद की जय करें, हमको मन की शक्ति देना जय विजय करे।सच स्वयम को जीतना ही कठिन होता है, इंद्रियों पर विजय प्राप्त करना कठिन है।दूसरों को तो छल बल से जीता जा सकता है पर जो स्वयम को नहीं जीत पाते, अपनी इच्छाओं का नियमन नहीं कर पाते, इंद्रियों के दास बने रहते हैं, मन रूपी घोड़े की बलगा नहीं थाम पाते, उस पर अंकुश नहीं लगा पाते वे जीत कर भी हार जाते हैं।सो जिंदगी में हार जीत तो लगी रहती है पर हार जीवन के कुछ जरूरी सबक सीखा जाए तो ये हार जीत से सौगुना अच्छी है।तो दूसरों को जीत जीत कर खुश मत होते रहिये, अपने को जीतने की कोशिश कीजिये, दूसरों को उनके हाल पर छोड़ दीजिए।

जमानो आयो कउअन को

 सफर जारी है....844

11.02.2022

ब्रज में एक लोकगीत बहुत प्रचलित है गयो गयो री सास तेरो राजु जमानो आयो बहुअन को।हर बहु यह गीत गाती है और सास की पदवी पाते नई बहुरिया इस परंपरा को हाथों 

हाथ ले लेती है। इस चक्र के बीच एक वर्ग ऐसा भी होता है जो सासु के राज में तो पिसता ही है, फिर जब नई पीढ़ी आती है तो उसका शासन चलता है अर्थात वे न तीन में होते हैं न तेरह में, उनकी पौ कभी बारह नहीं होती,उनके दोनों हाथों में लड्डू तो दूर की बात, चिनौरी का एक दाना तक नहीं होता।दरअसल उनका कोई आत्म सम्मान ही नहीं होता, पहले वे इसलिए दबती हैं कि सब उनसे बड़े हैं और बाद में जमाना बदल जाता है तो वे फिर से निचले पायदान पर आ जाती है ।अब उन्हें नए बॉस का हुक्म बजाना होता है नहीं तो घर में रोज चकल्लस होती है।यानी उनकी गद्दी मिलने से पहले ही छिन जाती है।

पर मुद्दे की बात तो  यह है ये राज करने की बात हो ही क्यों, सब अपने अपने परिवार में राज करें, कोई किसी पर शासन करे ही क्यों, तुमने अपने परिवार को एक और नेक बनाया तो अगला अपने परिवार को नेक और एक बनाएगा।तुम्हारे दखल की कोई जरूरत ही नहीं है।मुसीबत तो यहीं से शुरू होती है जब व्यक्ति सब जगह खुद को प्रत्यारोपित करता है।सब अपने अपने घर के राजा हो।किसी दूसरे पर अपना मत थोपो और दूसरे को अपने ऊपर मत थोपने दो।सब अपने अपने रास्ते चलते रह सकते हैं। टकराव तो तब होता है जब पगडंडी संकरी हो औऱ दो तीन लोग उस पर एक साथ चलने की जिद ठाने बैठे हों तो टकराब होगा ही। 

एक समय होता है जब आप मुखिया होते हैं। फिर समय बदलता है अगला अपने घर का मुखिया होता है तो वहां दखलंदाजी करना उचित नहीं।सबको अपने अपने समय का आनन्द लेने दीजिये और जो स्वतंत्रता आपको जिस किसी भी कारण से नहीं मिल सकी हो, उसे दूसरे के लिए प्रतिबंधित मत कीजिये कि अरे हमारे समय तो ऐसा होता था वैसा होता था।वह उस समय का सच था यह आज का सच हैIन कोई तब गलत था न अब सही है। 

कभी कभी समानांतर चलना भी सुखद होता है कोशिश करें कि दो लाइनें एक दूसरे को न काटें।न सास के राज को जाने की जरूरत है और न बहुओं के राज को आने की।इस गीत पर ही बैन लग जाना चाहिए ....गयो गयो री सास तेरो राजु जमानो आयो बहुअन को, गयो गयो रे बाप तेरो राज जमानो आयो बेटन को।अपने अपने समय में सब को राज करने का अधिकार है।समय सबका आता है।रामचन्द्र तो बहुत पहले ही सिया से कह गए थे कि ऐसा कलियुग आएगा, हंस चुगेगा दाना दुग का कौआ मोती खायेगा।तो ये बदलाब तो होते ही रहते हैं, कभी हंसों का राज होता है तो कभी कौओं का।कौओं के राज में हंसो को कौओं की अधीनता स्वीकार करनी होती है, उनकी खुराफातों को नजर अंदाज करना होता है, गलत पर भी सही का टिक लगाना होता है, सच कौड़ियों के मोल बिकता है और झूठों की पौ बारह होती है।समय का फेर है, सब सहना पड़ता है, मन मार कर रहना पड़ता है।रहीम ऐसे थोड़े ही लिख गये कि रहिमन चुप ह्वे बैठिए देख दिनन को फेर, जब नीके दिन आएं हैं बनत न लागे देर।तो मूर्खों की सभा में चुप बैठना ही श्रेयस्कर है।

जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये, राधे श्याम राधे श्याम राधे श्याम कहिये।तो जब कउअन को राज होय तो चन्दना ए चुप ई बैठ जानो चहिए तो चन्दना तो चुप ई है।

Wednesday, April 27, 2022

चेरि छाँड़ि भयहु का रानी

 सफर जारी है....843

10.02.2022

चौरीं, काम ते निच्चू नाय भई अबहि तक, आज नेक जन्दी जन्दी हाथ चला लेती,नेक कम कर लेती, बलाय देर है गई, फिर निरी देर लैंन में ठाडो होनो परेगो, कमर पिरा जात है ठाड़े ठाड़े।अब चली चलबेगि सीना।रामदेई हमेसा की नाई दरबज्जे ते ई बड़बड़ाती घुसी और निगुनिया को चौका में ते बाहर खींच लाई।अब निगुनिया के घर गिरिस्थी के काम ही नहीं निबटते, बलाय सबेरे बिस्तर छोड़ देती है पर घर के काम सिलटते ई नहीं।सिलटे भी कैसे, हाथ बंटाने वाला कोई नहीं, सब को अपनी जगह बिस्तर पर अपने ठीया पर सब कुछ चाहिए होता है।अब निगुनिया कोई अष्टभुजा तो है नहीं फिर भी अपनी सी बहुत जल्दी जल्दी काम निबटाती है पर काम है कि सुरसा की तरह मुंह बढ़ाता ही जाता है।तो निगुनिया वैसे ही बहुत चिढ़ी बैठी थी और रामदेई ने आकर मानो उसके गुस्से को हवा दे दी।फिर भी रामदेई को आसन दे पानी पत्ता दे कहने लगी.... अब जिज्जी पूरो घर वोट डारिबे गयो तो है ,हों न जा रई, बहुतेरों काम बिखरो पड़ो है जाय सिलटाऊ कि बेबात के वोट ए देबे जाओ, इतने दे रये है, एक हमाये वोट ते का है जायेगो।हम तो जही भले।हमें का मतबल कि को जीतेगो, हमाये जाने तो सब एक से ही है।चाए साइकिल वालो होय चाए फूल वालो।और तुमऊ कहू मत जाओ, बैठो चैन ते मन होय तो लोटपीट लेओ, अबहि खटिया डाल देत हू।

     निगुनिया ठहरी अपढ़, उसे क्या पता कि उसके एक वोट की क्या कीमत है।भला वह जानेगी भी कैसे, अपने घर में उसकी राय उसकी किसी बात का उसके मत को जब हवा में उड़ा दिया जाता है, उसकी बात को हवा में उड़ा दिया जाता है, गम्भीर से गम्भीर और गहरी से गहरी बात हंसी ठठ्ठे में उड़ा दी जाती है तो वह कैसे जानेगी कि उसके एक वोट से कमल या साइकिल जीत सकती है।रामदेई चार लोगों में उठती बैठती है, टीचर दीदी की बात ध्यान से सुनती है कि हर व्यक्ति को वोट देने जरूर जाना चाहिए, उसके एक वोट की बहुत कीमत होती है।टीचर दीदी ने समझाया था देखो यदि तुम्हारे पास निन्यानबे पैसे हैं और जो तुम्हें खरीदना है वह पूरे एक रूपये में आता है तो एक पैसे की कमी से आप अपनी मनचाही वस्तु नहीं खरीद सकते, आपका एक पैसा ही मिलकर सौ पैसा बनता है।तो आप में से हर व्यक्ति एक एक पैसे जैसा है जिसे मिलकर सौ की संख्या पूरी होती है।अब रामदे ई तो समझ गई पर निगुनिया की समझ में कैसे भरे कि उसके एक वोट की क्या कीमत है।उसकी दुनिया घर का चौखटा है उससे बाहर क्या होता है उसे जानने की जरूरत नहीं।

     पर रामदेई तो आज सोच के पक्का फैसला कर के निकली है जैसे भी हो निगुनिया को साथ लेकर चलना है।उसके कानों की ठेक हटाने का प्रण लेकर आई है रामदेई।जानती है यहां उसकी दाल गलने वाली नहीं, टीचर दीदी आई थी दो चार बार बात करने, घर की महिलाओं तक अपनी बात पहुंचाने पर द्वार पे बैठे चौधरी ने उन्हें बाहर से बाहर यह कह कर टरका दिया कि हमारे घर में दखल देने की जरूरत नहीं, अपना ज्ञान अपने तक रखो।टीचर दीदी हार मान कर लौट गईं पर रामदेई तो अड़ियल किस्म की औरत है।जो सोच लेती है उसे कर के ही दम लेती है।और आज तो वह प्रण लेकर निकली है कि निगुनिया का ब्रेन वाश करना ही है।आज उसके तरकस में हर काट का तीर है।आज तो वो निगुनिया को साथ लेकर ही टलेगी।आज चौधरी सहित सारे मर्द वोट डालने जो निकल गए हैं, बच्चों के लिए जे मेला तमाशा सा है सो वे अपने दोस्तों संग मगन है और बेचारी निगुनिया को अपने चौके चूल्हे से ही फुर्सत नहीं, उसकी तो वही दुनिया है कि सुबह कलेऊ में क्या बनेगा, दुपहरी में क्या खाया जाएगा, संझा को जब चौधरी के द्वार पर जमघट लगेगा तो गर्मागर्म चाय पकौड़े तलने होंगे, फिर रात के खाने का लग्गा लगाना होगा।फिर सब के लत्ते कपड़े धोएगी, साफ सफैयत करेगी और तो सब राजकुमार की माफिक आराम फरमाते रहेंगे, मनोरंजन करेंगे,उन्हें इन सब की आदत जोपड़ गई है।निगुनिया है न इस सबके लिए, उसकी फुलबारी है तो और कौन सींचेगा।खुद बेचारी तो मशीन बन कर रह गई है।आज रामदेई जीजी उसकी क्लास लेने वाली हैं, एक वही है जिसकी बातें हर बार उसके मन में तूफान सा मचा देती हैं।उसे सोचने को विवश कर देती हैं कि उसका अपना भी कोई अस्तित्व है, उसे अपने लिए भी आवाज बुलन्द करनी होगी।और आज तो मतदान का सवाल है।ये रामदेई जाने कहाँ देश समाज के चिठ्ठे खोल कर बैठ जाती हैं, अरे यहां तो रोज के काम ही नहीं सिलटते, अभी तो पास पड़ौस तक नहीं देखा समाज और देश दुनिया की बात निगुनिया क्या जाने, उसका संसार तो ghr की चारदीवारी के अंदर ही है।सो उसने साफ साफ शब्दों में रामदेई को जबाब दे दिया है जिज्जी हम का कारिंगे वोट सोट देके,  हमारये एक वोट से कछु नहीं होने का,हम तो मन्थरा की नाई दासी ही भली ,कोऊ जीते कोऊ हारे हमें कौन रानी बननो है, हमें तो ऐसेइ रोटी पोनी है, घर को काम सिलटानो है,सो हमें तो बख़्श देयो जिज्जी।पर रामदेई कौन कच्ची गोली खेली है।सो कहानी सुनाने लगती है कि एक कुआ ए दूध से भरनो हतो तब जाके गांव की बिपत दूर होती, साधु कह ग्यो कि सब एक एक लोटा दूध डाल दीयो पर सबन ने सोची की इतने लोग डालींगे ई तो हम तो एक लोटा पानी डाल आबिन्गे काऊ ए का पतो चलेगो सबरे तो दूध कुरे ई रये हैं, अब जेई बात सबरे गांव वाले सोच रये तो रात के नीम अंधेरा में जो जाए सो एक लोटा पानी कुरे आये, खैर भैया भोर भई साधु समेत सबरे आये तो देखी कि कुआ में निरो पानी ही पानी है, दूध को तो नामोनिशान ऊ नाय।

     सो निगुनिया जैसे तू सोच रई है ऐसे ई सबरे सोचिबे लगे कि हमाये वोट डालने से का होयगो तो तो चल ग्यो देस, बन गई सरकार, जित ग्यो कमल को फूल।सो बाबरी मत बने।सब काम बाम छोड़,और चली चल वोट देबे, कोऊ टैम नाय लगेगो, बस तू तो घर ते तो निकल, वहां बूथ पे टीचर दीदी खड़ी हैं पच्ची ले के, हाल आजागे डाल के, बस तू चली चल।लग रहा है निगुनिया पर वार सही बैठा है, वह नई धोती बदल रई है चलने कू।तो जब जड़बुद्धि निगुनिया समझ गई तो तुम नाय मानोगे का हमाई रामदेई की बात, सबरे जरूर ते जइयो वोट डारिबे कू।अपनो वोट बेकार मती करियो ,भली।

बिंदिया चमकेगी, चूड़ी खनकेगी

 सफर जारी है....842

08.02.2022

लगता है कलाई कलाई भर चूड़ी पहनने,उनके खनकने, पायल के छनकने के दिन लद गये।अब फैशन बदल गया है जो शृंगार पहले सुहाग चिह्नों में रखा गया था मसलन बिंदिया, चूड़ी,बिछुए,अनवट ,पायल,सेंदुर,मांग टीका, नथ, करधनी, गुच्छा, बाजूबन्द,मंगलसूत्र ,वह सब आउटडेटेड हो गया या उनका ब्याह से कोई लेना देना नहीं रह गया।अब बिछुए विवाह की अनिवार्यता नहीं रही।कुछ दिनों पूर्व एक नवयौवना को एक बिछुआ और एक पैर में पायल पहने देखा तो उत्सुकता वश पूछ बैठी बेटा एक पायल कहां गिर गई तो पता चला कि ये तो फैशन है और बिछुए वह तो अंगूठी की तरह पैर में भी पहना जा सकता है।इसमें क्या बुराई है। सोलह श्रंगार अर्थात नख से सिख तक आभूषण से लदे हुए।आज ये सब फैशन की सीमा में आता है।

       मनिहारिन का पेशा खतरे में चला गया, अब कौन चूड़ी पहनता है और पहनता भी है तो अपने आप पहन लेता है।न गलियों में रंग बिरंगी चूड़ियों की डलिया लेकर कोई बेचने आता है और न पहनाने वाले जिससे आशीष की दो चूड़ी मांग के पहन ली जाती है।कांच की रंगबिरंगी चूड़ियाँ जिनका कोई मोल भले ही न होता हो पर बड़ी अनमोल होती हैं ये चूड़ियां।ये चटकती हैं ,टूटती हैं पर इसे मौल जाना कहा जाता है ठीक वैसे ही जैसे दीपक बुझता नहीं बढ़ाया जाता हैं दुकान बंद नहीं की जाती,बढाई जाती है।टूटना बुझना अशुभ के प्रतीक हैं।उन्हें मुंह से उचारा तक नहीं जाता।विवाहिता चूड़िया मुहूर्त से पहनती हैं, नई कोरी चूड़िया पहनने से पूर्व किसी कन्या के हाथों में डाल उसका मुंह झुठार तब पहनती है। चूड़िया जब मर्जी उतारी और चढ़ाई नहीं जाती।उन्हें सौभाग्य सूचक माना जाता है इसलिए पहनते अवसर का विशेष ध्यान रखा जाता है,जब मर्जी चाहे उन्हें उतारा नहीं जातानहीं जाती, उन्हें बढाया जाता है।घर में मंगल अवसर पर घर भर की महिलाओं को चूड़ी पहनाने का रिवाज है।बड़े बूढों के पैर छूटे आशीर्वाद मिलता है सदा सुहागिन रहो, तेरे चूड़ी बिछिया सलामत रहें।जब साथी से बिछोह होता है तो सबसे पहले यही चूड़ी बिछुए उतार कर उसके शव पर रखे जाते हैं कि जब सुहाग  ही नहीं रहा तब ये सुहाग चिह्न किस काम के।

       तो चूड़ियां केवल आभूषण मात्र नहीं हैं, इनकी खनकती ध्वनि में आप का उल्लास है, किसी का साथ है, चूड़िया खनकती हैं माथे की बिंदिया दमकती है पैरों की पायल छनकती है कानों में झुमके लटकते हैं गर्दन मंगल सूत्र से सज जाती हैं, नथुनी अलग शोभा बढाती है, बिछुए आपका बन्धन नहीं साहस बनते हैं, करधनी और गुच्छा आपको जिम्मेदार बनाता है, मांग भरी सिंदूरी आभा आपके चेहरे पर अलग सुकून लाती हैं, अधरों की लालिमा, हथेली की मेंहदी और पांवों का आलता महावर आपके सौंदर्य की श्री वृद्धि करता है।ये सुहाग चिह्न केवल और केवल आभूषण और सजावट मात्र नहीं है।इनके सन्दर्भ बहुत गहरे हैं।आप किसी के साथ से भरी पूरी होती हैं।

       नखसिख सौंदर्य का वर्णन कवि जब करता है तो पूरी कायनात चमत्कृत हो जाती है।आप माने न माने, इससे भला क्या फर्क पड़ता है।ये तो गृहस्थ ही जानता है कि चूड़ियों की खनखनाहट क्या क्या कह जाती है, उसकी झनकार सारा दुख हर लेती है।ये रंग बिरंगी चूड़िया, लाल हरी पीली नीली मैरून चूड़ियां केवल कांच के बोल घेरे भर नहीं है,ये रंग जिजीविषा के प्रतीक है।ब्याह पर लड़की और उसकी मां हरी चूड़ी ही पहनती है।लाल चूड़ियों के साथ आगे पीछे हरी चूड़ी का बन्द आपके हाथ को शोभा से भर देता है।कंगन भले ही सब की हैसियत में न आते हों पर ये अनमोल चूड़ियां तो greeb के हाथ भी सज जाती हैं।कृष्ण स्वयम मनिहार बन जाते हैं राधा से मिलने को,श्याम चूड़ी बेचने आया,मनिहारी का रूप बनाया, चूड़ी हरी नहीं पहनूं चूड़ी लाल नहीं पहनूं मोहे श्याम रंग ही भाया, मनिहारिन का भेष बनाया।राधा से मिलने को कृष्ण कभी मनिहार बनते हैं तो कभी लिल्हार।आ गये कृष्ण चन्द्र लिल्हार कि लीला गुदवा लो प्यारी।इन्हीं चूड़ियों के लिए राधा रानी सेठ को स्वप्न में उलाहना दे देती हैं कि हमने तो जानी कि रोज बेटी बेटी कहते हो तो इसी ब्याज से हमने भी बहुओं के साथ हाथ भर चूड़ी क्या पहन ली कि तुम उसका मोल भी नहीं चुका सके, अपनी लाडली जू को भूल गएऔर बेचारे सेठ को बड़ा पश्चाताप होता है कि वे कैसे अपनी लाडली जू राधा रानी को भूल गए।

       फिल्मी गानों में तो पहले बिंदियाँ चमकती थी चूड़िया खनकती थी, अगले की नींद उड़े तो भले ही से उड़ जाए बिंदिया चमकेगी चूड़ी खनकेंगी तेरी नींद उड़े तो उड़ जाए कि गजरा महकेगा।या खनन खनन चूड़िया छनक गई हाथ में।पर अब किसको कहाँ फुर्सत रही इन चूड़ियों और बिछुओं में उलझने की।ये तो नए दौर ने सब दरकिनार कर दिये।अब लट उलझी सुलझा दो का जमाना नहीं रहा।झुल्फों के साये में तो तब डूबते जब घनी जुल्फें होती आज तो बाय कट का जमाना है।सब बीती बातें हैं,सुहाग चिह्नों की परिभाषा बदल गई है, सब नौकरी पेशा जो हो गये, अब किसके पास टाइम बचा है इन बेबकूफी भरी बातों के लिए।हां फैशन के नाम पर जो मर्जी करा लो, अब मांग ही कहाँ बची जो सिंदूर से दमके अब तो माथे पर लाल लकीर ही उसका अवशेष है, आंखों के काजल के साथ लाज शर्म सब आउटडेटेड हो गई है।अब तो इन बातों को करना बेमानी है पर दिल तो नहीं मानता न, मुहावरे तो अभी जस के तस हैं, चूड़ी बिछिया अमर होने का आशीष ही मिलता है न, सुहागन हो तो सुहाग चिह्न तुम्हारी पहचान हैं इनके धारण करने से आप पिछड़े कैसे हो सकते हैं पर साब जी अब तो ये ही सत्य है कि चूड़ियों की खनक और बिंदिया की दमक में पहले से बात नहीं रही।

रहें न रहें हम

 सफर जारी है....841

08.02.2022

सुर साम्राज्ञी लता जी का जाना सबको व्यथित कर गया।दिन भर उनके प्रशंसक शोक संवेदना प्रकट करते रहे, कुछ ने गीतों को दोहराया तो कुछ ने उनकी यादों को साझा किया।एक न एक दिन सबको जाना ही होता है, सब चले ही जाते हैं न लौटने के लिए पर कुछ दिलों में गहरे बस जाते हैं, अपनी छाप छोड़ जाते हैं और कुछ इतने चुपके से दुनिया छोड़ जाते हैं कि घर वालों को भी खबर नहीं होती।वे जीयें या मरे ,किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।कुछ की गिनती न मरों में होती है न जिंदो में, बस सांस चलने से पता लगता है कि वे हैं।कितने तो ऐसे हैं जिनके विषय में पता ही नहीं चलता कि वे कब आये और कब निकल लिये।मरना तो उनका है जो मरकर भी अमर हो जाते हैं।कुछ मर कर भी जी जाते हैं और कुछ जीते जी मर जाते हैं।जीना तो है उसी का जिसने ये राज जाना, है काम आदमी का दूजो के काम आना।जो ये राज जान लेते हैं वे जिंदगी जीना सीख जाते हैं।जो करते हैं पूरे मन से करते हैं,आत्मविश्वास से भरे होते है।उन्हें अपने पर भरोसा होता है।वे मन ही मन दोहराते रहते हैं आई कैन डू,आई विल डू।ऐसा नहीं कि वे हमेशा सफल ही होते हों, उन्हें भी कई कई बार असफलता का मुख देखना पड़ता है पर वे निराश होकर आत्महत्या का विकल्प नहीं चुनते, परिस्थितियों को हेंडिल करने का हुनर जानते हैं।शांत और गम्भीर रहकर लगातार अपने कार्य में लगे रहते हैं।बाधाएं आती हैं आती रहें,उनसे विचलित नहीं होते, हाथ पैर नहीं छोड़ देते, हिम्मत बनाये रखते हैं और आगे बढ़ते रहते हैं।

लीजेंडरी कोई एक दिन में नहीं बन जाता।वह लगातार बढ़ता रहता है।रोज अभ्यास करता है, अपनी कमियों को पहचानता है, उन्हें रेखांकित करता है, उनमें सुधार करता है, लगातार प्रतिदिन प्रतिपल और प्रतिक्षण सीखता और सीखता ही रहता है।अपनी उपलब्धियों पर गर्वित होता है लेकिन इतराता नहीं है।रोज तिल तिल जोड़ता है तब उपलब्धियों का पहाड़ बनता है।लगातार बांटता रहता है।खुशबू को कैद किया भी नहीं जा सकता, वह तो वातावरण में स्वत: बिखर जाती है, सबको सुगन्धित कर जाती है।लता जी की आवाज का जादू सिर चढ़ कर बोलता है।वे मन से गाती हैं, गीत में डूब कर गाती है, दिल की गहराइयों से गाती है और सुनने वाले के दिल पर अमिट छाप छोड़ जाती हैं।

जिनसे जिनसे मिली, मुलाकात यादगार बन गई।उनके ढेरो प्रशंसक अपनी अपनी मुलाकातों को शेयर कर रहे हैं।

           प्रतिभा किसी विशेष क्षेत्र की मोहताज नहीं हुआ करती।बस जिसमें जो है उसे निखारना होता है, परिमार्जित करना होता है, समय देना होता है, श्रम करना होता है, लगातार अभ्यास करना होता है, न दिन देखना होता है न रात।बस लग्न लग गई तो लग गई,सोते जागते उठते बैठते एक ही ख्याल एक ही विचार हावी रहता है।करना पड़ता है, अपने को झोंकना होता है, लगातार चलना होता है बिना रुके तब जाकर स्तम्भ खड़े होते है।तब जाकर लोगो के दिलों में प्रवेश मिलता है, तब जाकर लोग कंधे पर बिठाते हैं, आपको हाथोहाथ लेते हैं।प्रतिभाएं लगातार अभ्यास से निखरती हैं।लोगों के वजूद पर छा जाती हैं।वे भौतिक रूप से रहें न रहें पर सबके दिलों में महकती रहती हैं।वे स्वयम घोषणा कर देती हैं....रहें न रहें हम महका करेंगे बन के कली बन के सबा बाग-ए-वफ़ा में। सच वे महकते ही रहते हैं।लता जी आपके स्वर ने हम सबको बांध ही तो रखा है।आप करोड़ो दिलों में रहती हैं।कहते हैं कि कला देश की दीवारों के बंधन नहीं माना करती, खुशबू बिखरती है तो उसके लिए कोई बन्धन नहीं रहता।अयं निज परो वेति की गणना तो लघुचेतसाम किया करते हैं, आप जैसों के लिए तो वसुधा ही कुटुंब है।आपको खांचों में कहां सीमित किया जा सकता है।आप सबकी हैं और सब आपके।आपके गाये गीत अमर हैं।छब्बीस जनवरी पर सबने आपके गाये ए मेरे वतन के लोगों को दोहराया हैं।बच्चे बच्चे की जुबान पर आप गीत बनकर छाई हुई हैं।कहां भूली जा सकती हैं आप,आप तो हम सबके दिल में बसी हुई हैं।आपके गीत की पंक्तियों से ही आपको अश्रुपूरित विदा देते हैं रहें न रहें हम महका करेंगे बन के कली बन के सबा बाग -ए-वफ़ा में।

वहीं पे कहीं हम तुमसे मिलेंगे बन के कली बन के सबा बाग ए वफ़ा में।

जो बोले सो कुंडा खोले

 सफर जारी है...840

07.02.2022

 सब ने चूहे बिल्ली की कहानी अवश्य सुनी होगी कि बिल्ली से परेशान चूहे ये फैसला तो ले लेते हैं कि यदि बिल्ली के गले में घण्टी बांध दी जाए तो बिल्ली के आने पर टनटन की आवाज सुनकर सब चूहे सतर्क हो जाएंगे और भाग जाएंगे, सुरक्षित जगह छिप जाएंगे जिससे वे बिल्ली के हमले से बच सकेंगे ।बात सबको समझ भी आ गई पर एक बड़ा प्रश्न फिर सामने आ गया कि इस घण्टी को आखिर बांधे कौन, अब बेचारे चूहे तो चूहे हैं और जिन बुजुर्ग चूहे महाशय ने ये सुझाव दिया था वे तो अपनी अवस्था का बहाना कर कोने में छिप गये और छोटे बारे भी दुम दबाकर भाग खड़े हुए।तो समस्या का हल सबको चाहिये पर बताने मात्र से कार्य नहीं चला करता। उसे व्यावहारिक धरातल पर लाया जाना भी जरूरी होता  है।यदि सब उससे बचते रहे तो फिर समाधान खोजने से भी क्या होने वाला है। जानते तो सब है कि बिल्ली के गले में घण्टी बांध जान बचाई जा सकती है पर बांधे कौन।जब आग लगी हो तब मात्र सुझाव देने कि अरे पानी लाओ, इमारत पर डालो, कोई भागकर अंदर आग में फंसे सदस्यो को बाहर निकालो ,ऐसा कहने भर से ,शोर मचाने मात्र से काम नहीं चला करता, आग नहीं बुझ जाती ।किसी को आगे आना पड़ता है ,साहस जुटाना पड़ता है ,बिल्ली के गले में घण्टी बांधने का दुस्साहस करना पड़ता है फिर भले ही बिल्ली पंजे से खूब खोंसा मारे, सारा दूध लुढ़का झपट्टा दर झपट्टा मारती रहे। ये सब उसे करना ही चाहिए , ये उसकी त्वरित प्रतिक्रियाएं होंगी।

 आखिर आपने उसकी डाइट चूहा पर रोक लगाई है, उसकी सुचारू रूप से चलने वाली गतिविधियों पर विराम लगाने की जहमत उठाई है, उसके चक्क मलाई वाले दूध पर रोक लगा दी  है और फिर आप चाहते हैं कि वह रायता भी न फैलाये, आपको खोंसे भी नहीं, दूध भी न लुढ़काये और शांति से बैठी रहे। ये तो वही बात हुई कि ढींगरा मारे और रोबन भी न दे।यानी आप पहले मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालेंगे और फिर ये कोशिश भी करेंगे कि अगला सूमसाम बैठा रहे।ओखली में सिर दिया तो ओखल से डर कैसा।फिर तो झेलो, प्रतिक्रिया तो छोटी मोटी बात है अभी तो आरोप प्रत्यारोप लगाए जाएंगे, खोज खोज कर सबूत इकठ्ठे किये जायेंगे, पूरी कोशिश होगी कि सत्य सामने न आये इसलिए दबाब की परिस्थितियों पैदा की जाएंगी, तनाव और निराशा के गर्त में डालने की कोशिश भरपूर होगी देखना यह है सत्य कितने दबाब झेल पाता है, कितने कुहरे ,बादल और अंधकारों को झेल पाता है, रीढ़ की हड्डी सीधी रख पाता है,सत्य सदा से परेशान होता है पर अडिगता उसे बादलों के बीच से निकाल लाती है, वह घोर अंधेरे को चीर प्रखरता से बाहर भी आता है और अपनी चमक से सबकी आंखें चुंधिया भी देता है पर सत्य की लड़ाई लंबी चला करती है, अर्जुन को दूर ले जाकर अभिमन्यु को सात द्वार के चक्रव्यूह में फांस लिया जाता है और निहत्थे पर महारथी हमला कर उसे मार ही देते है।अभिमन्यु की बलिदान व्यर्थ नहीं जाता और अंततः महाभारत का युद्ध जीत लिया जाता है, सत्य की जय होती है और असत्य को घुटने टेकने पड़ते है।पर जितनी जनहानि होती है उसका क्या।

              तो सत्य जीतता तो अवश्य है फिर भले ही देर सबेर क्यों न हो, लाख क्षडयन्त्र क्यों न रचे जाएं,कुटिल चालें क्यों न चली जाएं, अनचाहे दबाब क्यों न बनाये जाएं,वातावरण में मनहूसियत क्यों न घोल दी जाए ।कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह है कि हो तो सब जाता है, स्थिति से निपट भी लिया जाता है पर सामने कोई नहीँ आना चाहता, आगे कौन पड़े।बस सब पहले आप पहले आप करते हैं अपना समय जस तस पूरा कर लेते हैं ।झेलना तो उसे पड़ता है जो फ्रंट पर आता है, समस्याओं के समाधान चाहता है और अपनी जान जोखिम में डाल देता है, नदी के तेज प्रवाह में छलांग लगा देता है ,तैरना न जानते भी पूरी शक्ति से हाथ पैर मारता है और अक्सर विवर से बाहर भी आ जाता है।ईश्वर उसके सहायक होते हैं।पर बात वही है कि जो बोले सो कुंडा खोले।तो आपके सामने हमेशा दो विकल्प होते हैं जैसा चल रहा है वैसा चलने दें और आपको लगता है गलत है तो दखल दें ,सही करने की कोशिश तो करें।परिणाम आपके हाथ हो न हो पर अपनी सी मेहनत करना तो आपके हाथ है, उसे अवश्य कीजिये, बाकी राम जी पर छोड़ दीजिए।होना तो वही है जो ऊपर वाले को मंजूर हो पर कोई न कोई आगे आने की हिम्मत तो जुटाता ही है और अपनी भूमिका का निर्वाह अवश्य करते हैं,फिर उसकी नैया पार जरूर लगती है।ईश्वर किसी भी रूप में अपनी सहायता जरूर भेजता है।तो राम को भजते रहिये , बोलते रहिये और कुंडा खोलते रहिये।

बागन में बगरयो बसन्त है

 सफर जारी है.......839

06.02.2022

सखि,बसन्त आयो है।सब ओर बासन्ती छटा बिखरी पड़ी है। गेंदा ,सरसों, कनेर के साथ प्रकृति तो पीताभ हो ही रही है ,लोगों के मन भी बासन्ती हो गए हैं।देशभक्त रंग दे बसंती चोला गाकर मन के उत्साह को प्रकट कर रहे हैं, मेरा रंग दे बसंती चोला माई रंग दे बसंती चोला, जिस चोले को पहन शिवाजी मिट गए अपनी शान पर, जिसे पहन झांसी की रानी मिट गई अपनी आन पर,आज उसी को पहन कर निकला हममस्तों का टोला।ये बसन्त क्या आता है सबके मन बासन्ती हो जाते हैं।हवा हवा हूँ बसन्ती हवा हूँ अपना राग अलग अलापती है।

सब बासन्ती हुए जा रहे हैं आखिर हो भी क्यों न, आज वीणा वादिनी मां सरस्वती का दिन जो है।विद्या की देवी सरस्वती ,धन की देवी लक्ष्मी और शक्ति की देवी दुर्गा इन तीन के बिना जीवन की संकल्पना ही नहीं है।जीवन ज्ञान, शक्ति और अर्थ के संतुलन पर ही चलता है।इनमें से एक भी कम हो तो जीवन की गाड़ी डगमगाने लगती है।कहते तो ऐसा भी हैं कि सरस्वती और लक्ष्मी का वैर है ।दोनों कभी साथ नहीं रहती पर विरले दोनों को साध लेते हैं।इन त्रिदेवियों से तीन बड़े त्योहार जुड़े हैं दीपावली लक्ष्मी गणेश के पूजन का पर्व है तो दुर्गा शक्ति की आराधना का और बसन्त पंचमी तो विद्या की देवी की उपासना है ही।ध्यान आता है विद्यारथी जीवन में किताब कॉपी लेखनी पट्टी स्लेट सब मां सरस्वती के आगे रख देते कि हम खूब विद्यावान बनें ,विद्वान बनें, मां सरस्वती का वरद हस्त हम पर बना रहे।अध्यापिका समझाती थी स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते, फिर मां सूक्ति याद करवाती थी विद्या धनम सर्व धनम प्रधानम, न इसे चोर चुरा सकता है न राजा छीन सकता है व्यय करने से बढ़ता है ले जाने में भारी नहीं है अतः इसकी प्राप्ति में ही जीवन लगा देना चाहिए।

तब से पढ़ ही तो रहे हैं पढ़ते पढ़ते कुछ कुछ पढ़ाते भी रहते हैं।इसी पढ़ने पढ़ाने के दरम्यान सरस्वती पुत्र निराला को पढ़ने का सौभाग्य मिला, आज उनका जन्मदिन है ।याद आ रही हैं पंक्तियाँ जिसे विद्यालय में क्या आज भी गाते गुनगुनाते हैं...वर दे वीणा वादिनी वर दे,प्रिय स्वतंत्र रव अमृत मन्त्र नव भारत में भर दे।काट अंध उर के बंधन सब, बहा जननी ज्योतिर्मय निर्झर,कलुष भेद तम हर प्रकाश भर जग मग जग कर दे ,वर दे वीणा वादिनी वर दे।नव गति नव लय ताल छंद नव, नवल कंठ नव जलद मन्द्र रव,नव नव के नव विहग वृन्द को नव पर नव स्वर दे, वर दे वीणा वादिनी वर दे।आज सबसे अधिक प्रचलित वंदना है।इसके रचयिता सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की रचना राम की शक्ति पूजा मन को साहस से भर देती है कि विपरीत परिस्थितियों से आहत होकर निराश नहीं बैठ जाना चाहिए, उद्यम करना चाहिए।राम आसुरी शक्तियों के भय से साहस नहीं छोड़ देते, वे उनसे लड़ने के लिए उनसे लोहा लेने के लिए शक्ति की उपासना करते हैं।रोज नील कमल लाकर चढ़ाते हैं एक दिन मां उनकी परीक्षा लेती है, वे हाथ बढाते हैं फूल लेने के लिए पर वहां फूल तो है नहीं, बीच पूजा में से उठ नहीं सकते क्या करें तभी ध्यान आता है माँ उन्हें राजीव नयन कहा करती थी, वाण के फलक से अपने नेत्र निकालने को उद्यत होते हैं तभी मां प्रकट होती है राम का हाथ पकड़ लेती है और उन्हें जयी होने का आशीर्वाद देती है जय हो राम पुरुषोत्तम नवीन।राम जयी होते हैं आततायी रावण का संहार करते हैं।संत समाज की प्रसन्नता का कारण बनते हैं।

           राम की शक्ति पूजा जन जन के लिए प्रमाण बन जाती है कि शक्ति अर्जित करो,शक्ति की उपासना करो।ये जग विद्या बुद्धि शक्ति और अर्थ से ही जीता जा सकता है।शक्तिहीन को कोई महत्व नहीं देता, उसे सब कुचल देते हैं।क्षमा सोहती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो।तो सब राम जैसे शक्ति की उपासना करो, अपनी शक्ति को संगठित करो।सच ही निराला हमें जगा जाते हैं, हम में बोध भर जाते हैं।वे सरस्वती पुत्र कहे जाते हैं, सरस्वती का उन पर वरद हस्त रहा पर वे सांसारिक धर्म का पालन अर्थ के अभाव में नहीं कर पाते।सरोज स्मृति में उनका दुख झलक ही जाता है... बेटी मैं पिता निरर्थक था, तेरे हित कुछ न कर सका।सच जब निराला जैसा व्यक्तित्व केवल सरस्वती की उपासना से अपने पिता होने के दायित्व को नहीं निभा पाया तो सामान्य पिता की वेदना सहज समझ आ जाती है कि धन के अभाव में बेटियां घर से विदा नहीं हुआ करती।वे पिता की छाती पर बोझ बनी रहती है।

           ये वसन्त भी न जाने क्या क्या याद दिला देता है।बसन्त का आगमन है तो कोयल अलग कूक रही है, आम पर बौर आ रहा है, ठंडी हवा हाड़ में चुभने के बजाय सुखद लग रही है।सब ओर बासन्ती रंग छाया हुआ है।कवि मन अलग फूट रहे हैं, सरस्वती का वरदान सब को मिलता रहे, माँ शारदे हमें तारती रहें, मन के अंधकार को अपने उजास से भरती रहें, सही रास्ता दिखाती रहें, जो गलत मार्ग पर चलें तो चेताती रहें।बस इतने से ही हमारा वसन्त मन जाएगा।वीरों का वसन्त अलग किस्म का होगा।वीरों का कैसा हो वसन्त रचना सुभद्राकुमारी चौहान की याद दिलाती है... आ रही हिमालय से पुकार,है उदधि गरजता बार बार,प्राची पश्चिम नभ भू अपार,सब पूछ रहे हैं दिग्दिगन्त, वीरों का कैसा हो वसन्त।हैं वीर देश में किंतु कन्त, मिलने को आये आदि अंत,अब यही समस्या है दुरंत,बतला अपने अनुभव वसन्त,दो जगा आज स्मृतियां ज्वलन्त,है कलम बंधी स्वछंद नहीं, फिर हमें बताये कौन हन्त,वीरों का कैसा हो वसन्त वीरों के वसन्त का स्मरण करा देती है।

           हम जैसे सामान्य जन तो वसन्त पंचमी पर मां सरस्वती के पूजन आराधन, पीले वस्त्र, पीले मीठे चावल, पीले फूल पाकर ही अपना बसन्त मना लेते हैं फिर बचपन याद आता है कि यदि पीला वसन्ती परिधान नहीं मिला तो रूमाल को ही पीला रंग उसे फ्राक में पिन से टांग और प्रसाद की बूंदी या सूजी का हलवा जिसे केसर डाल पीला कर लिया जाता था, खाकर ताली बजा खुश हो लेते थे कि हमारा भी वसन्त मन गया।कवि पद्माकर की पंक्तियों को दोहराते सभी को वसन्त पंचमी की मंगल कामनाएं.... कूलन में केलिन में,कछारन में कुंजन में ,वनन में बागन में बगरयो बसन्त है।

ऋणमुक्ति

 सफर जारी है........838

05.02.2022

कितने कितने ऋण है आम व्यक्ति पर परिवार, समाज, और देश के।बार बार याद दिलाया जाता रहा माता पिता, गुरु और समाज /देश ऋण से उऋण नहीं हुआ जा सकता।मातृभूमि के लिए तो स्पष्ट लिख दिया गया कि मां तुम्हारा ऋण बहुत है मैं अकिंचन,कर रहा फिर भी निवेदन थाल में लाऊं सजाकर भाल जब कर दया स्वीकार लेना यह समर्पण, प्राण अर्पित गान अर्पित और यह जीवन समर्पित, चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं।प्रकृति हमें देती है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखें, सूरज हमें रोशनी देता हवा नया जीवन देती है, भूख मिटाने को हम सबकी धरती पर खेती होती है, जो पिछड़े हैं उन्हें बढ़ाएं जो चुप है उनको वाणी दें सूखी धरती को पानी दें, प्रकृति हमें देती है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें।हम देना सीखें तो ऋण भी उतर जाएं पर हमें तो केवल लेना भर आता है देना तो सीखा ही नहीं, देते तो नानी मरती है आता अच्छा लगता है और कहीं छटांक भर भी देना पड़ जाए तो छठी का दूध याद आ जाता है, फूंक सरक जाती है।और कभी मजबूरी में देना भी पड़ जाए तो उसका खूब प्रचार प्रसार करते हैं, दो केले भी देंगे तो अखबार के पहले पेज पर बड़ा सा फोटो आना चाहिए उसमें बोल्ड अक्षरों में अंकित भी होना चाहिए।हम रहीम को बिल्कुल भूल जाते हैं जो देते समय सिर झुका कर देने की बात कहते हैं और गांठ बांधने की नसीहत देते हैं कि बाएं हाथ से दो तो दाएं हाथ को पता भी नहीं चलना चाहिए, नजर नीची रहनी चाहिए और जब उनसे पूछा गया कि कहां से सीखी साह जूं ऐसी देनी देन, ज्यों ज्यों कर ऊपर त्यों त्यों नीचे नैन। और फिर जबाब भी सुन लीजिए देनहार कोई और है भेजत है दिन रैन, लोग भरम हमरो करें ताते नीचे नैन।

सच दिया तो ऐसे ही  जाता है चुपचाप, किसी को पता भी नहीं चले, याद हो तो सैंटा क्लॉज देता है तो ढिंढोरा नहीं पीटता,किसी बच्चे के जुराब में तो किसी की टोपी में उपहार रख देता है।बचपन में परियां भी तकिए के नीचे न जाने क्या क्या रख जाती थीं कभी पता ही नहीं चला।बस सब से लेकर पाकर खुश हो लेते थे।जीवन भर लिया ही लिया, माता पिता से लाड़ प्यार पाया तो गुरुओं से शिक्षा दीक्षा, जीवन भर सबसे कुछ न कुछ लेते ही रहे चाहे फिर पड़ौसी हों मित्र या कार्यालयी सहयोगी या कोई अन्य।किसी के आगे हाथ फैला लिया तो किसी से धौंसा के लिया, कहीं झपट्टा मारा तो कहीं चरणों में लोट गए, खुशामद कर ली, हाथ पैर जोड़ लिए, रिरिया लिए ,घिघिया लिए, उसके देहरी की धूल ले ली, इतनी इतनी बार जा पहुंचे कि जूतों के तलवे घिस गए और जैसे ही झोली भर गई ,मनचाहा हाथ आ गया,आंखे नटेर ली ,पतली गली से निकल लिए, फिर पलट कर तक नहीं देखा।तो एक ही सिद्धांत को कस के पकड़े बैठे रहें कछु हमें  देबे की बात होय तो लाला कर ले, हम पे टैम नाने। ढीठ की तरह मेरा पेट हाऊ ,मैं न गिनू काऊ।बाकी सबको भाड़ में भेजते रहे।

कभी सोचा है कि किस किस का ऋण है आपके पास जिसे चुकता करना होगा।और नियत समय बीत गया तो ब्याज सहित चुकाना होगा।जितना मिला उसमें से अधिकांश को तो अपना अधिकार और अगले के दायित्व के रूप में परिभाषित करते हैं जिसे सामने वाले को करना ही था, नहीं करता तो और क्या करता।और कुछ को पैसों से चुकता करने की बात कह कर उड़ा देते हैं।गुरुजी शिक्षा देते हैं तो हम शुल्क देते हैं, माता दूध न उतरने की स्थिति में यदि डिब्बे का दूध पिलाती है तो उसका मूल्य पैसों से चुका देते हैं, लिखा पढा तो यह था कि जननी और जन्मभूमि का ऋण कभी उतारा नहीं जा सकता, हां,उनकी सेवा सुश्रूसा कर उनका आशीर्वाद लेकर अपनी जिंदगी को ख़ुशनुमा अवश्य बनाया जा सकता है।जैसे उन्होंने हमें जन्म दिया, हमें पाला पोसा, हमारा लालन पालन किया वैसे ही हम भी वंश बेल को बढाएंगे, भविष्य की जागरुक और समझदार पीढी तैयार करेंगे,जिनका कोई नहीं जो अनाथ हैं जो अकेले हैं जो असहाय हैं जिनके सिर पर छत नहीं पेट भरने को भोजन नहीं ,उनको आश्रय देंगे, उनके पैरों की जमीन और सिर की छत बनेंगे, उनके सिर पर हाथ फेरेंगे उनकी पीठ थपथपाएँगे,पर हमें अपने से मुक्ति तो मिले,स्वयम में ही इतने व्यस्त रहते हैं कि किसी दूसरे का ख्याल कहां से आये।अपना ही नहीं निबट के देता अगले की तो सब सोचें।

          भारतीय परंपरा तीन ऋण की बात करती है देव ऋण ,ऋषि ऋण और पित्र ऋण। हम घर के सामान को लोन पर लेते हैं,उनकी किश्तें भी चुकाते हैं पर जिन ऋनों को चुकाना जरूरी है उनकी बात तक नहीं करते।बिना ऋण चुकाए तो मुक्ति नहीं हुआ करती अर्थात फिर फिर आना होगा इसे चुकाने के लिए।बेहतर है थोड़ा थोड़ा रोज चुकता करते चले नहीं तो ये बोझ बढ़ता ही जायेगा।

आधे अधूरे ही भले ....

 सफर जारी है...837

04.02 2022

दुनिया में बिल्कुल परफेक्ट तो शायद ही कोई विरला होता होगा, सब में कुछ न कुछ मिसिंग रहता है और इसीलिए वह मनुष्य है।सबसे मिल जुल कर रहता है।जानता समझता है बहुत दौलत होने से कुछ नहीं होता,सब कुछ होते भी लोगों की ,नाते रिश्तों की जरूरत पड़ती है, आखिर मानुख सामाजिक प्राणी जो है।वह शून्य में परिवर्धित पल्लवित नहीं होता। अपने परायों के जनसमूह के बीच ही वह आकार लेता है, उसके व्यक्तित्व को शेप मिलती है।जितने कष्ट कंटको के मध्य जिनका जीवन सुमन खिला, गौरव गन्ध उन्हें उतना ही यत्र तत्र सर्वत्र मिला।विपरीत परिस्थितियों में ही आपके व्यक्तित्व की पहचान होती है।आप मुसीबतो से घबराकर रास्ते से हट जाते हैं या दृढ़ता से आने वाली परिस्थितियों का सामना करते हैं।आप धैर्य पूर्वक चिंतन करते हैं, चिंता नहीं।चिंता तो आपको भीतर ही भीतर सुलगाती है पर चिंतन से रास्ते खुलते हैं, समस्याओं के समाधान नजर आते हैं।आप अपने से हाथ पैर मारते हैं, जो सम्भव होता है उसे करते हैं और जो बस का नहीं होता उसे ईश्वर इच्छा पर छोड़ देते हैं।वैसे भी सब मानुष के हाथ होता कब है।वह तो अपनी सी कोशिश भर करता रहता है, नदी तालाब सरोवर में गिर पड़े तो तैरना न जानते भी पानी में हाथ पैर मारता रहता है,बचने के यत्न करता है।

      रचनाकार राकेश मोहन के आधे अधूरे पढ़ते लगा कि हम सबकी जिंदगी का सच यही तो है।परिवार बसाये ही इसलिए जाते हैं कि सबको सबके सहयोग की जरूरत होती है।किसी सदस्य में कोई विशेष योग्यता है तो दूसरे में कुछ दूसरी।कोई कुछ कर सकता है कोई कुछ।किसी में शारीरिक बल प्रधान होता है तो किसी की मानसिक योग्यता अधिक होती हैं, कोई मेधा सम्पन्न होता है तो कोई सीरा धीरा पर सब मिलकर सध जाता है।किसी की उपेक्षा नहीं होती, सबको साथ लेकर चला जाता है।चार पांच बालको में से एक आध तो बाबरा, लल्लूझप्पन सा निकल ही जाता है पर दिन भर उसकी आलोचना नहीं की जाती।उसकी क्षमता अनुसार उनसे काम लिया जाता है।

हम बहिनों में कोई घर के काम निबटाने में सिद्ध हस्त थी, ऐसी सुघड़ता से सब्जी काटती कि बस खाने में आनन्द आ जाये।दूसरी बाहर बास के काम में नम्बर वन, तीसरी पढाई लिखाई में ऐसी जोरदार कि हमेशा अब्बल आती।भाई मेल मिलाप करने में सिद्ध हस्त, पिता बहिर्मुखी और माँ इतनी शर्मीली संकोची कि किसी से बात करे तो चेहरा लाल पड़ जाए।पिता जी एकदम फक्कड़ स्वभाव के और माँ बहुत व्यवस्थित रहने वाली।अक्सर पिता से कहा करती कि समुद्र मंथन में सुघड़ सुंदर सुरुचिवान पीतांबर धारी विष्णु को लक्ष्मी और औघड़दानी भस्म रमाये महादेव बाबा को कालकूट विष पीने को दिया गया जिससे उनका नाम ही नीलकंठ पड़ गया ।आश्चर्य होता है कैसे बिल्कुल विपरीत स्वभाव के दो व्यक्ति लड़ते झगड़ते हंसते रोते, गपियाते, आलोचना करते एक दूसरे में मीन मेख निकालते कभी बहस करते कभी चुपाते वर्षों गुजार देते हैं ,जितना मर्जी लड़ भिड़ लें कह सुन लें पर बाद में सुलह हो ही जाती हैं। साथ रहते रहते एक दूसरे में कैसे रम जाते हैं, एक दूसरे की महत्वपूर्ण जरूरत बन जाते हैं, एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं।एक के बिना दूसरे को कल नहीं पड़ती।लड़ते झगड़ते खूब हैं, क्रोध में आ जाएं तो चीख चिल्लाहट करते हैं, एक दूसरे की कमियों को रेखांकित करते आलोचना के शिखर पर पहुंच जाते हैं ,एक दूसरे की सात पुश्तों को कोस लेते हैं, खोद खोद कर गढ़े मुर्दे उखाड़ते हैं और अगले ही क्षण मौन हो जाते हैं, बिल्कुल चुपा जाते हैं, सब जगह सन्नाटा पसर जाता है ।कह सुन कर मन की भाँय निकल जाती है फिर एका हो जाता है।जाएंगे भी कहाँ वे, तोकू ठौर न मोकू और।कहना कबाना सुनना सुनाना तो लगा रहता है पर रहना तो साथ ही है।लाख लड़ भिड़ लें पर रात बीतते अधिकतम दो एक दिन बीतते सब सामान्य हो जाता है।

           आधे अधूरे में रचनाकार एक मध्यवर्गीय परिवार का चित्र ही खींचता है न, दो बेटी एक बेटा, सेवानिवृत गृह स्वामी और नौकरी पेशा गृहिणी।सब अपने अपने में खीझे खीझे रहते हैं, सब जगह या तो तनाव पसरा रहता है या चुप्पी।जो बोलता है बोलता क्या है भुनभुनाता अधिक है।सबको निजी व्यक्ति से अधिक दूसरे में खूबियां अधिक दिखती हैं, जिसके साथ रह रहे हैं उसमें केवल दोष ही नजर आते हैं।जानते वे भी हैं कि जो आज आंखों में बसा हुआ है उसके साथ रहने की नौबत आ जाये तो हफ्ते दस दिन में ही सब चन्दा तारे नजर आ जाएं, सारी खूबियां कमियों में बदल जाए।दूर के ढोल सुहावने और पराई थाली का भात तभी तक मीठा है जब तक वह हमसे दूर है।दुनिया के श्रेष्ठतम स्त्री पुरुष दम्पत्ति बनते एक जैसे धरातल पर ही आ जाते हैं।फिर वही नुक्ताचीनी वही कड़वे मीठे बोल वही कहासुनी क्योंकि उन्हें बहुत सारे काम मिलजुल कर करने होते हैं, बच्चों की जिम्मेदारी दोनों की साझा है, उनकी पढाई लिखाई ब्याह शादी नौकरी चाकरी सब की चिंता साझी है, साझा चूल्हे हैं तो वे अपने में पूर्ण कैसे हो सकते हैं, एक दूसरे से कुछ कुछ लेते उनकी पूर्णता होती है।एक गिरता है तो दूसरा आगे बढ़ कर संभाल लेता है, एक चोटिल होता है तो दूसरा मरहम लगा देता है, एक बीमार होता है तो दूसरा सेवा करने तीमारदारी करने आगे आ जाता है एक डुगलाता है तो दूसरा सहारे को आगे आ जाता है।

           सच ही हम सब आधे अधूरे हैं, घर घर में मोहन राकेश के आधे अधूरे नाटक की कहानी दोहराई जाती है।तभी अर्ध नारीश्वर की कल्पना की गई कि दो मिलकर ही पूर्ण होते हैं।एक अपना कुछ छोड़ता है तो दूसरा कुछ, तभी एक होने की कल्पना पूरी होती है।

फिलर भी जरूरी है

 सफर जारी है......836

03.02.2022

ज्ञानार्जन जरूरी है तो उसका जीवन में प्रयोग भी उतना ही जरूरी है।केवल सिद्धांत मात्र रटने से कुछ नहीं होता।इसलिए परीक्षा में जहां आपके ज्ञान की जांच होती है वहीं आप सीखे हुए ज्ञान को अपने जीवन में किस तरह प्रयोग कर सकते हैं, इसकी जांच भी प्रायोगिक परीक्षा में कर ली जाती है।अर्थात जो भी सीखो उसे व्यवहार में लाना जरूरी है।जो नहीं ला पाते वे केवल कागजी शेर बने रहते हैं ,व्यवहार में ठनठन गोपाल रह जाते हैं।तो जो मर्जी सीखो उसे व्यवहार में लाने की कवायद जरूरी है नहीं तो सीखने का मतलब ही क्या।आश्चर्य की बात है जो बातें कहने में बहुत सरल लगती है उसे निभाना बहुत कठिन होता है।बड़े बड़े आदर्श वाक्यों को मोटे मोटे सुडौल अक्षरों में लिख कर कमरे में टांग लेना एक बात है और उसे जीवन में अमल करना बिल्कुल दूसरी।ये ही तो कथनी करनी का फर्क है जिसके लिए बार बार कहा जाता है कि पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरहिं ते नर न घनेरे।सच ही सब सीख लेना, याद कर लेना रट्टा मार कर इम्तहान में अधिक अंक ले आना एक बात है और सीखे गए ज्ञान को, पढाई को, जीवन में, रोजमर्रा में प्रयोग करना बिल्कुल दूसरी।दोनों में जमीन आसमान का अंतर है, दोनों में छत्तीस का आंकड़ा है।

परीक्षा देते निबंधात्मक और वस्तुनिष्ठ दोनों प्रकार के प्रश्न  हल करने होते हैं।जहां निबंधात्मक में लिखने की स्वतंत्रता होती है वहीं वस्तुनिष्ठ आपकी लेखनी को बहुत सीमित कर देते हैं।बस सही शब्द पर टिक लगाओ या खाली जगह में एक आध शब्द लिख देने भर से काम चल जाता है पर उस जरा से काम को करने के लिए दिमाग बहुत लगाना पड़ता है।खाली स्थान भरो जैसे प्रश्न हल करते करते कब खाली स्थान भरने की आदत स्थाई हो गई, पता भी नहीं चला।अब तो ये हाल है कि कहीं कुछ खाली सा लगता है तो उसे तुरन्त भर दिया जाता है।इस प्रक्रिया में प्राप्त सामग्री मतलब दिए गए शब्दों में से चयन की स्वतंत्रतता मिल जाती है तो कहीं सब कुछ अरेंज करना होता है। याददाश्त पर जोर डालने की नौबत आ जाती है।जो भी हो ये रिक्त स्थान जिंदगी के बहुत बड़े सबक है।इन्हें भरते रहो तो ठीक नहीं तो खाली स्थान बहुत मुंह चिढ़ाते हैं।

खाली पन तो कहीं भी अखरता है फिर चाहे वह भाव का हो वस्तु का आदमी का या अन्य किसी और का।भाव और देशभक्ति के भाव के लिए तो स्पष्ट उल्लेख ही कर दिया गया कि जो भरा नहीं है भावों से जिसमें बहती रसधार नहीं, वह ह्रदय नहीं वह पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।इस खालीपन को भरना बहुत जरूरी है।कभी कभी आप डॉट डॉट कर खाली स्थान छोड़ देते हैं तो उसके ही बहुत मतलब निकाल लिए जाते हैं।कपड़े में छेद हो जाये तो आप उसे रफू कर लेते हैं, उसकी सजावट कर उसे नया रूप दे देते हैं, दिन भर झींकते नहीं रहते कि पहले ऐसा था, ऐसा हुआ करता था, अब सब अतीत बन गया है, उसे गाने से क्या होगा, अब उस गड्ढे को भरना जरूरी है।यदि सब समतल हो जाता है तो फिर किसी का ध्यान नहीं जाता।नाटक नौटंकी रामलीला कृष्णलीला में मूल दृश्यों के बीच बीच में कुछ अन्य लीलाएं भी चलती रहती हैं।वे पूरी तरह से मुख्य कथानक का भाग न भी हों पर उसके आसपास की जरूर होती हैं और कार्यक्रम को पूर्णता देती हैं।

जीवन में कई लोग फिलर की भूमिका में भी बहुत जमते है ।वे जानते हैं कि  वे किसी का स्थान रिक्त होने पर उस खाली स्थान को भरने के लिए लाए गए हैं, चिपकाए गए हैं,।उन्हें यह गलत फहमी नहीं पाल लेनी चाहिए कि वे मुख्य भूमिका में हैं।ये सब चार्ज दायित्व अतिरिक्त और कभी कभी कार्यकारी होते हैं यानी आप फिलर होते हैं फिर चाहे वह कार्यालयीन कार्य हो या घर।तो फिलर ही बने रहिये, काम करते रहिये, जुए में जुते रहिये, कोल्हू के बैल की तरह पिरते रहिये, अरे तो काम था इसलिए तो आपको फिलर के रूप में रखा गया है।अब खुद को फिलर की भूमिका से हर बार बाहर मानकर मूल का सा आचरण करने लगोगे तो धुने ही जाओगे।अपने खोल में, सीमा में बने रहो, जितना आसानी से कर सको कर दो।किसी के ऊपर कोई अहसान नहीं है।सबसे पहले आप अपनी भूमिका को समझो, हर काम में हाथ डालना जरूरी है क्या।जो हो वही बने रहो, क्यों सब अपने ऊपर लाद लेते हो, जितना दिया जाए उतना करो।हर के ऊपर स्वयम को आच्छादित मत करो, अपनी भूमिका समझना जरूरी है और ये याद रखना भी कि फिलर हमेशा फिलर ही रहते हैं, वे मूल की भूमिका में फिट नहीं बैठा करते, जगह खाली है इसलिए आप है जैसे ही स्थान भर जाएगा आपको बैक टू पवेलियन होना होगा।तो फिलर जरूरी हैं पर उतने ही जितना उन्हें होना चाहिए।न उससे कम न उससे ज्यादा।अपनी रजाई देखकर पांव फैलाएं और दूसरे के पजामे में पांब न पोये।वस्तु स्थिति को बनाये रखना बहुत जरूरी है।

फिलर भी जरूरी है

 सफर जारी है......836

03.02.2022

ज्ञानार्जन जरूरी है तो उसका जीवन में प्रयोग भी उतना ही जरूरी है।केवल सिद्धांत मात्र रटने से कुछ नहीं होता।इसलिए परीक्षा में जहां आपके ज्ञान की जांच होती है वहीं आप सीखे हुए ज्ञान को अपने जीवन में किस तरह प्रयोग कर सकते हैं, इसकी जांच भी प्रायोगिक परीक्षा में कर ली जाती है।अर्थात जो भी सीखो उसे व्यवहार में लाना जरूरी है।जो नहीं ला पाते वे केवल कागजी शेर बने रहते हैं ,व्यवहार में ठनठन गोपाल रह जाते हैं।तो जो मर्जी सीखो उसे व्यवहार में लाने की कवायद जरूरी है नहीं तो सीखने का मतलब ही क्या।आश्चर्य की बात है जो बातें कहने में बहुत सरल लगती है उसे निभाना बहुत कठिन होता है।बड़े बड़े आदर्श वाक्यों को मोटे मोटे सुडौल अक्षरों में लिख कर कमरे में टांग लेना एक बात है और उसे जीवन में अमल करना बिल्कुल दूसरी।ये ही तो कथनी करनी का फर्क है जिसके लिए बार बार कहा जाता है कि पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरहिं ते नर न घनेरे।सच ही सब सीख लेना, याद कर लेना रट्टा मार कर इम्तहान में अधिक अंक ले आना एक बात है और सीखे गए ज्ञान को, पढाई को, जीवन में, रोजमर्रा में प्रयोग करना बिल्कुल दूसरी।दोनों में जमीन आसमान का अंतर है, दोनों में छत्तीस का आंकड़ा है।

परीक्षा देते निबंधात्मक और वस्तुनिष्ठ दोनों प्रकार के प्रश्न  हल करने होते हैं।जहां निबंधात्मक में लिखने की स्वतंत्रता होती है वहीं वस्तुनिष्ठ आपकी लेखनी को बहुत सीमित कर देते हैं।बस सही शब्द पर टिक लगाओ या खाली जगह में एक आध शब्द लिख देने भर से काम चल जाता है पर उस जरा से काम को करने के लिए दिमाग बहुत लगाना पड़ता है।खाली स्थान भरो जैसे प्रश्न हल करते करते कब खाली स्थान भरने की आदत स्थाई हो गई, पता भी नहीं चला।अब तो ये हाल है कि कहीं कुछ खाली सा लगता है तो उसे तुरन्त भर दिया जाता है।इस प्रक्रिया में प्राप्त सामग्री मतलब दिए गए शब्दों में से चयन की स्वतंत्रतता मिल जाती है तो कहीं सब कुछ अरेंज करना होता है। याददाश्त पर जोर डालने की नौबत आ जाती है।जो भी हो ये रिक्त स्थान जिंदगी के बहुत बड़े सबक है।इन्हें भरते रहो तो ठीक नहीं तो खाली स्थान बहुत मुंह चिढ़ाते हैं।

खाली पन तो कहीं भी अखरता है फिर चाहे वह भाव का हो वस्तु का आदमी का या अन्य किसी और का।भाव और देशभक्ति के भाव के लिए तो स्पष्ट उल्लेख ही कर दिया गया कि जो भरा नहीं है भावों से जिसमें बहती रसधार नहीं, वह ह्रदय नहीं वह पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।इस खालीपन को भरना बहुत जरूरी है।कभी कभी आप डॉट डॉट कर खाली स्थान छोड़ देते हैं तो उसके ही बहुत मतलब निकाल लिए जाते हैं।कपड़े में छेद हो जाये तो आप उसे रफू कर लेते हैं, उसकी सजावट कर उसे नया रूप दे देते हैं, दिन भर झींकते नहीं रहते कि पहले ऐसा था, ऐसा हुआ करता था, अब सब अतीत बन गया है, उसे गाने से क्या होगा, अब उस गड्ढे को भरना जरूरी है।यदि सब समतल हो जाता है तो फिर किसी का ध्यान नहीं जाता।नाटक नौटंकी रामलीला कृष्णलीला में मूल दृश्यों के बीच बीच में कुछ अन्य लीलाएं भी चलती रहती हैं।वे पूरी तरह से मुख्य कथानक का भाग न भी हों पर उसके आसपास की जरूर होती हैं और कार्यक्रम को पूर्णता देती हैं।

जीवन में कई लोग फिलर की भूमिका में भी बहुत जमते है ।वे जानते हैं कि  वे किसी का स्थान रिक्त होने पर उस खाली स्थान को भरने के लिए लाए गए हैं, चिपकाए गए हैं,।उन्हें यह गलत फहमी नहीं पाल लेनी चाहिए कि वे मुख्य भूमिका में हैं।ये सब चार्ज दायित्व अतिरिक्त और कभी कभी कार्यकारी होते हैं यानी आप फिलर होते हैं फिर चाहे वह कार्यालयीन कार्य हो या घर।तो फिलर ही बने रहिये, काम करते रहिये, जुए में जुते रहिये, कोल्हू के बैल की तरह पिरते रहिये, अरे तो काम था इसलिए तो आपको फिलर के रूप में रखा गया है।अब खुद को फिलर की भूमिका से हर बार बाहर मानकर मूल का सा आचरण करने लगोगे तो धुने ही जाओगे।अपने खोल में, सीमा में बने रहो, जितना आसानी से कर सको कर दो।किसी के ऊपर कोई अहसान नहीं है।सबसे पहले आप अपनी भूमिका को समझो, हर काम में हाथ डालना जरूरी है क्या।जो हो वही बने रहो, क्यों सब अपने ऊपर लाद लेते हो, जितना दिया जाए उतना करो।हर के ऊपर स्वयम को आच्छादित मत करो, अपनी भूमिका समझना जरूरी है और ये याद रखना भी कि फिलर हमेशा फिलर ही रहते हैं, वे मूल की भूमिका में फिट नहीं बैठा करते, जगह खाली है इसलिए आप है जैसे ही स्थान भर जाएगा आपको बैक टू पवेलियन होना होगा।तो फिलर जरूरी हैं पर उतने ही जितना उन्हें होना चाहिए।न उससे कम न उससे ज्यादा।अपनी रजाई देखकर पांव फैलाएं और दूसरे के पजामे में पांब न पोये।वस्तु स्थिति को बनाये रखना बहुत जरूरी है।

तू गीत प्रेम के गाता चल

 सफर जारी है....835

02.02.2022

जीवन में कितना कुछ पीछे छूट जाता है, सब भुला बिसरा दिया जाता है पर कुछ घटनाएं लम्बे समय बल्कि कहें अरसा बीत जाने के बाद ही ऐसी ताजा बनी रहती हैं जैसे कल परसों की बात हो।एक एक दृश्य ज्यों का त्यों पिक्चर की रील सा आंखों के आगे खुलता जाता है ।जीवन के कुछ प्रसंग लाइट हाउस बन जाते हैं, माइल स्टोन बन जाते हैं और ताजिंदगी आपकी दीर्घकालीन स्मृति में सुरक्षित हो जाते हैं।आपके जीवन में ऐसे ट्विस्ट ले आते हैं कि जीवन की धारा ही बदल जाती है।

  80 के दशक में बीएड प्रायोगिक परीक्षा के लिए हिंदी 

पाठ शिक्षण में रामधारी सिंह दिनकर की कविता लोहे के पेड़ हरे होंगे और संस्कृत पाठ शिक्षण के लिए भगवद गीता के दो श्लोक वासांसि जीर्णानि यथा विहाय  और नैनम छिन्दन्ति शस्त्राणि श्लोक का चयन किया।पूरी तैयारी और भावमुद्रा के साथ खूब मन पूर्वक पढाया बिल्कुल वैसे ही जैसा घर पर माताजी ने अभ्यास करवाया था और गुरुजी ने निर्देशित किया था।खूब खूब आत्मविश्वास से वाचन किया, प्रश्न पूछे ,विद्यार्थियों को संस्कृत कक्षा में संस्कृत में निर्देश दिये, शब्दों के अर्थ बताए ।कुल मिलाकर पाठ योजना में जैसा सिखाया गया था एक भी स्टेप छोड़े बिना उसे ज्यों का त्यों निभाया।पिताजी माताजी गुरुजनों से खूब शाबासी पाई।परीक्षा में अच्छे अंक मिलने ही थे, मिले भी।किस्सा वहीं खत्म हो जाना चाहिए था पर हुआ नहीं।वह कविता और श्लोक चालीस बयालीस साल तक साये की तरह पीछे लगे रहे। बार बार लोहे के पेड़ हरे होंगे की पंक्ति दिमाग में हथौड़े से ठक ठक करती रही।जब मर्जी चाहे ये पंक्तियां रात विरात गूंजती रही कि लोहे के पेड़ भला कैसे हरे हो सकते हैं, लोहे में तो पानी भर से जंग लग जाती है,फिर पौधों को पनपने के लिए पेड़ बनने के लिए खूब सींचना होगा, खाद पानी देना होगा,प्रकाश भी चाहियेगा और खूब गुड़ाई भी तब कहीं जाकर बीज अंकुरित होगा, धरती की छाती फाड़कर नवागत छोटी छोटी कोपलों के साथ सबकी निगाहों में आएगा, फिर घेरा लगाकर उसकी सुरक्षा की जाएगी, उसे काटा छांटा जाएगा तब जाकर कहीं तना मजबूत होगा, जड़ें मिट्टी पकड़ेंगी और वह पेड़ का रूप लेगा।ये तो सामान्य बीज की बात है और कहीं लोहे का बीज हुआ तो पता नहीं कितने साल और लग जाएं। फिर भी कोई गारंटी नहीं कि लोहे का पेड़ उगने की कोई संभावना होगी और मान लो कहीं जादू टोने से ऐसा हो भी गया तो वह हरा होगा, इस पर विश्वास करना तो बिल्कुल टेढी खीर है पर कवि कह रहा है तो मानना ही पड़ेगा।माने बिना कोई चारा भी तो नहीं।फिर कबीर याद आये कि वह भी कहते हैं कि पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोई, ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।तो भाई प्रेम का असर होता होगा तभी तो कहा गया लोहे के पेड़ हरे होंगे तू गीत प्रेम के गाता चल, नम होगी यह मिट्टी जरूर आंसू के कण बरसाता चल।तो समझ में आया कि प्रेम और करुणा से असम्भव भी सम्भव हो जाता है।

तब से सब पर खूब प्रेम और करुणा बरसा रहे हैं पर लोहे के पेड़ हरे तो दूर की बात, अभी तक वे काले से सांबरे भी नहीं हुए ।उनकी कठोरता ज्यों की त्यों है ,रेशा रत्ती कम नहीं हुई।बल्कि उन्हें लगने लगा कि प्रेम करूणा बरसाने वाले बेबकूफों से तो जितना लाभ ले लिया जाए उतना ही कम है।मुफ्त का चन्दन घिस मेरे नन्दन की तर्ज पर बस अपने लाभ पर चौबीस घण्टे गिद्ध दृष्टि लगाए रहते हैं।फिर याद आया कविता में तो ये भी लिखा था रंगों के सातों घट उड़ेल ये अंधियारी रंग जाएगी, ऊषा को सत्य बनाने को जावक नभ पर छितराता चल।ओह तो सातों रंग भी उड़ेलने थे तभी अंधेरा छंटता नजर आता और लाल लाल महावर भी तो नभ पर छिटकाने को बोला था।हां,तो पूरी कोशिश की थी, सारे रंग उड़ेल दिए थे पर अगला सूरदास की कारी कांबर चढ़े न दूजो रंग पहन कर बैठा था तो क्या करते, कहाँ जाते तो जब तब दिनकर को दुहराते रहते हैं...आंसू के कण बरसाता चल और  गीत प्रेम के गाता चल।फिर याद आया एक संवाद सुनाने की बात भी लिखी थी ...शीतलता की है राह ह्रदय तू यह संवाद सुनाता चल।समझाया था और खूब समझाया था कि अकेले मस्तिष्क से कुछ नहीं होता दिल की बात ध्यान से सुनो पर सुनते तो तब जब दिल होता, वह तो दिमाग के नीचे पहले ही दबा के कुचल दिया गया था।रोशनी जगत को देने को अपनी अस्थियां जलाता चल ठीक वैसे ही जैसे दधीचि ने दे दी थी।बिल्कुल ठीक ये भी मंजूर कर लिया कि जगत में प्रकाश बना रहे हम भले ही अंधेरे में रह लेंगे।रह क्या लेंगे अपने को बिल्कुल शून्य कर लिया लेकिन अगला चिकना घड़ा बना बैठा रहा, पूरा का पूरा पानी फिसल कर बह गया।ऐसों पर फर्क पड़ता भी नहीं, वे सामने वाले को टेकिन फार ग्रांटेड लेते हैं।

     बस अंतिम अनुच्छेद मन को ढाढस बंधाता है, आशा बनी रहती है कि सब बदलेगा।धरती के भाग हरे होंगे भारती अमृत बरसाएगी,दिन की कराल दाहकता पर चांदनी सुशीतल छाएगी,ज्वालामुखियों के कण्ठों में कलकंठी का आसन होगा, जलदो से लदा गगन होगा,फूलों से भरा भुवन होगा, बेजान यंत्रविरचित गूंगी मूर्तियां एक दिन बोलेंगी।मुंह खोल खोल सबके भीतर शिल्पी तू जीभ बिठाता चल, लोहे के पेड़ हरे होंगे तू गीत प्रेम के गाता चल, नम होगी ये मिट्टी जरूर आंसू के कण बरसाता चल।तो हम सबको शिल्पी बनना होगा, बेजान गूंगी यंत्र विरचित मूर्तियों के मुंह में जीभ बिठानी होगी।सच सब गूंगे बहरे जैसे ही तो हैं जिन्हें कुछ सुनाई नहीं देता।बस वे उतना भर सुन लेते हैं उतना भर बोलते हैं जितने से उनका काम बन जाये।तो कविता पढ़ने से कुछ नहीं होता, उसे जीना होता है, अनुभूति का विषय बनाना होता है, खुद शिल्पी बनना होता है, संवाद सुनाना होता है, जावक बिखराना होता है, अस्थियां जलानी होती हैं,तब जाकर जलदो से भरा गगन होता है, फूलों से भरा भुवन होता है, मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा होती है,प्रेम के गीत गाने होते हैं, आंसू के कण बरसाने होते हैं तब कहीं जाकर लोहे के पेड़ हरे होते हैंऔर यह मिट्टी नम हो पाती है।

प्रसादजी का प्रसाद

 सफर जारी है...834

01.02.2022

छायावाद के स्तम्भ जयशंकर प्रसाद को पढ़ना ही पर्याप्त नहीं, उन्हें गुनना, समझ लेना और मनस्थ कर लेना जरूरी है।उनके नाटक पढ़ें, कहानी पढ़ें, काव्य संसार का अवलोकन करें अथवा उनके उपन्यास पढ़ें, वे समन्वयवाद के पोषक हैं ।उनकी कामायनी, झरना आंसू,स्कंद गुप्त,अजातशत्रु, तितली, ध्रुव स्वामिनी,आकाशदीप,काव्य और कला,चन्द्रगुप्त जैसी रचनाओं से गुजरते छोटे छोटे क्लिप,अनमोल सूक्तियाँ दिमाग में ऐसे गहरी धंसी है कि जरा चोट लगी नहीं कि एक एककर सब बाहर आने लगती हैं।

मेरी सबसे पसंदीदा रचना कामायनी है और उसमें भी ये चार पंक्तियाँ जीवन को नए दिशा दे देती है... ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है इच्छा पूरी क्यों हो मन की, एक दूसरे से न मिल सके यही विडम्बना है जीवन की।सबरा सच तो यही है कि मानव जानता तो है पर मानता नहीं।जो सोया हो उसे झकझोर कर ढोल ताशे बजाकर जगाया जा सकता है पर सोने का बहाना कर जबरदस्ती आंख मूंद कर पड़े रहने वाले को नहीं।उसके जानने इच्छा करने और क्रिया करने में कोई समन्वय नहीं है।और जहां समन्वय नहीं होता वहां सब चौपट हो जाता है। सृष्टि के विद्युत कण जो व्यस्त विकल बिखरे हों निरुपाय समन्वय उनका करे समस्त विजयिनी मानवता हो जाये।हो तो खूब जाए और कोई समन्वय करना तो सीखे।दुख आता है तो उसी में बंध कर रह जाता है मानव, बिल्कुल भूल जाता है दुख की पिछली रजनी बीच विकसता सुख का नवल प्रभात।जब घनघोर अंधेरा हो तभी सुबह के होने की आहट होती है, प्रकाश की मद्धिम सी किरण फूटती है।पर हम मानुख तो अपने दुख में ऐसे डूब जाते हैं, उस सागर में ऊब चूभ करते रहते हैं कि सुख के नवल प्रभात की आहट को देख ही नहीं पाते।

नारी के जिस रूप की चर्चा प्रसाद जी करते हैं, वह अलौकिक है।नारी में श्रद्धा लज्जा जैसे गुणों का समावेश उसे निखार कर रख देता है तभी इन सूक्ष्म से दिखने वाले विषयों पर पूरे के पूरे सर्ग रच दिए जाते हैं।चिंता, आशा, श्रद्धा काम वासना लज्जा कर्म ईर्ष्या इड़ा स्वप्न संघर्ष निर्वेद दर्शन रहस्य और आनन्द पन्द्रह सर्गो में मानव जाति का इतिहास सिमट आता है।उनके तीन प्रमुख पात्र मनु श्रद्धा इड़ा मानव प्रेम और बुद्धि के प्रतीक हैं।वे लिखते हैं नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास रजत नग पगतल में, पीयूष स्रोत सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में।सच नारी श्रद्धा का जीता जागता रूप ही तो है।यदि साथी पर विश्वास बना रहे तो गाड़ी कैसे संतुलित सी चलती रहती है, पीयूश स्रोत प्राप्त हो जाये तो सब समतल हो जाए,सारा ऊबड़खाबड़ पन दूर हो जाये, दूर तो सब हो जाये पर श्रद्धा तो बनी रहे, विश्वास तो कायम रहे।

आज ये विश्वास ही तो कहीं खो गया है, श्रद्धा तेल लेने चली गई है ,लज्जा किसी अंधेरी कोठरी में जाकर छिप गई है।जीवन के वे सारे जरूरी भाव जिनसे पुरुष पुरुष और स्त्री स्त्री शोभित होती आज बचे ही कहाँ है।सब एक दूसरे जैसे होना चाहते हैं, अपने अपने कर्म और दायित्व क्षेत्रों की सीमाएं तो कब की लांघ ली गई, वह लक्ष्मण रेखा तो कब कीपार कर ली गई, अब श्रद्धा लज्जा आशा आनन्द जैसे जरूरी भावों की तो बाट लग गई है।हां,काम वासना ईर्ष्या कासाम्राज्य खूब फल फूल रहा है।तो मानवता कहां से विजयी हो जाये।चिंता का प्राधान्य है सब जगह उस पहली रेखा का विस्तार तो है पर उससे मुक्त होने का कोई सार्थक श्रम नहीं दीखता।लेखक तो लिखता है और पाठकों के बीच अपनी कृति रख देता है।अब आगे का काम तो पाठकों का है कि वह उसमें से क्या चयन करता है।न हम विकल बिखरे कणों को समेट पाते हैं और न ज्ञान इच्छा क्रिया में समन्वय बिठा पाते हैं बस कामायनी को परीक्षा पास करने के लिए थोड़ा बहुत पढ़ लेते हैं, कुछ मोस्ट इम्पोडेन्ट पंक्तियों का  भावार्थ याद कर लेते हैं, दो चार प्रश्नों के उत्तर कुंजी गाइड से रट लेते हैं घोटा लगा लेते हैं और बस पासिंग मार्क्स लाकर खुश हो लेते हैं।अरे प्रसाद जी का साहित्य परीक्षा में अंक लाने भर के लिए नहीं है, वह तो जीवन जीने के सूत्र हैं जिन्हें सबको बहुत कस के पकड़ना होता है।

नाटक चन्द्रगुप्त में जन सामान्य में चेतना का संचार करने वाली इन पँक्तियो से मैं अपनी बात समाप्त करना चाहूंगी... हिमाद्रि तुंग श्रंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती, स्वयम्प्रभा समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती, अमर्त्य वीर पुत्र हो दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो, प्रशस्त पुण्य पंथ है बढ़े चलो बढ़े चलो।अराती सैन्य सिंधु में सुवाड़वाग्नि से जलो, प्रवीर हो जयी बनो बढ़े चलो बढ़े चलो।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...