सफर जारी है...855
23.02.2022
प्रभु को भजो सच्चे मन से तो प्रभु भी सुनें।पर लोग करते तो अपने मन की हैं और जब सब गुड़ गोबर हो जाता है, नैया बीच भंवर में डूबने लगती है अपने सारे हाथ पैर मारने के बाद भी हाथो के तोते उड़ जाते हैं कुछ हाथ नहीं आता तब उसे प्रभु याद आते हैं कि कि ऐसे में उसकी नैया प्रभु ही पार लगा सकते हैं,तब जाकर कहीं उनका नाम सिमरन होता है और वह भी केवल तब तक के लिए जब तक उसका काम बन जाये जैसे ही बात बनी अपनी फुल फोरम में आ जाता है और सारा सेहरा अपने सिर बांध लेता है कि उसने ये किया उसने वो किया।जब वह प्रभु को ही नकार देता है तो भला आदमी की उसके सामने कटा औकात, उसका तो धर्म ही है अपना काम बनता भाड़ में जाये जनता, उनका अपना पेट हाऊ होता है दूसरा भूख से मरे तो मरता रहे, उनकी थाली में छप्पन भोग चाहिए चाहे अगले की प्लेट में सूखी रोटी भी न हो।दुनिया भरी पड़ी हैं ऐसे बेंपैदी के लोटो से, जिनका कोई धर्म ईमान नहीं होता, ये थाली के लुढ़कने बैंगन होते है जहां लाभ मिले वहीं के हो जाते हैं।गिरगिट की तरह कभी भी रंग बदल लेते हैं गंगा गए गंगादास जमुना गए जमुनादास।इनका अपना कोई स्टैंड पॉइंट नहीं होता,सिवाय स्वार्थ के।बस जहां से ये पूरा होता हो वहां गधे को भी बाप बना लेते हैं, वैसे खाने में बड़े नखरे हैं पर मुफ्त का मिले तो सब उदरस्थ कर लेते हैं डकार तक नहीं लेते।
अब क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी नीयत छिपी रहे, नकली चेहरा सामने आए असली चेहरा छिपा रहे।वे कुछ करें या नहीं करें पर बात बनाने में नम्बर वन होते हैं, ऐसा समा बांधते है कि सबको लगता है कि भाई ये बड़े तीसमारखां है।और जो दिन भर खटते हैं, अपना भरपूर देते हैं वे चुपचाप बैठे रहते हैं कि कर दिया काम हो गया अब उसे बखानने की क्या जरूरत।आता था तो कर दिया, कर्तव्य और दायित्व के दायरे में आता था, करना ही था सो कर दिया, इसमें हल्ला गुल्ला मचाने,ढिंढोरा पीटने की क्या सबको बताने की क्या जरूरत है?वैसे भी खाली बर्तन ज्यादा आवाज करते हैं थोथा चना घना बजता है और अधजल गगरी बहुत छलकती है।भरे पूरे तो लबालब होते हैं अपने खोल में रहते हैं,उन्हें जताने की जरूरत ही नहीं होती।वे खजूर के पेड़ की तरह ऊंचे नहीं होते कि न किसी को छाया मिले और फल अति दूरी पर लगें कि कोई तोड़ ही न पाए।वे तो फलों से लदी डाली से सबके लिए सुलभ होते हैं कि छोटा बालक भी हाथ बड़ा कर तोड़ ले।
विनम्रता उनकी खास पहचान होती है, बड़े बड़े कार्य पलक झपकते कर जाते हैं पर बिल्कुल सामान्य बने रहते हैं।सारा प्रताप रघुराई का बता देते हैं प्रभु मैं क्या करने योग्य हूँ ये तो सब तुम्हारी कृपा थी तुम्हारा अनुग्रह था।याद आता है रामचरित मानस का प्रसंग कि हनुमान लंका दहन कर आते हैं, भगवान राम उनसे सारा प्रसंग पूछ रहे हैं हनुमान चाहते तो एक एक प्रसंग को रच पच कर विस्तार के साथ बता सकते थे, भगवान राम की नजरों में हीरो बन सकते थे, इस अवसर को पकड़ सकते थे, कुछ भी मांग सकते थे पर वे अपनी प्रसंशा आप नहीं करते, अपने मुंह मिया मिठ्ठू नहीं बनते, बहुत ही सहज भाव से राम के प्रश्नों का उनकी जिज्ञासा का जबाब देते हैं।प्रभु पूछ रहे हैं कहु कपि पालित रावण लंका ,केहि विधि दहेउ दुर्ग अति बंका।यह सब तव प्रताप भगवाना,बोला वचन विगत हनुमाना।शाखामृग के बड मनुसाई साखा ते साखा पर जाई,नाघि सिंधु हाटकपुर जारा,निसिचर गन विधि विपिन उजारा।सो तव सब प्रताप रघुराई,नाथ न कछु मोरी प्रभुताई।ता कहु प्रभु कछु अगम नहिं जापर तुम अनुकूल,प्रभु प्रताप बड़वालनहि जारि सकई खलु तूल।
सब प्रभु का प्रताप बता दिया अपने ऊपर कोई श्रेय नहीं लिया ।नाथ न कछु मोरी प्रभुताई, मेरा कुछ नहीं, मैं तो अधम हूँ, प्रात लेई जो नाम हमारा, ताहि दिन मिले नहि आहारा,ऐसे दरिद्री पर आपने कृपा की प्रभु, हम तो साखामृग हैं एक साखा से दूसरी पर उछलते रहते हैं, इसमें हमारा क्या।बस आपकी कृपा से सब हो गया नाथ न कछु मोरी प्रभुताई, सो तव सब प्रताप रघुराई।हनुमान चाहते तो समुद्र लांघने से लेकर लंका दहन के प्रसंग को खूब नमक मिर्च लगा अतिशयोक्ति पूर्ण तरीके से वर्णन कर सकते थे, उनका कार्य वाकई बड़ा था पर उन्होंने इतने बड़े कार्य को केवल दो पंक्ति में बयान कर दिया । नाघि सिंधु हाटकपुर जारा, निसिचरगन विधि विपिन उजारा बस इसके आगे कुछ नहीं, बात ही समाप्त कर दी और फिर प्रभु का प्रताप बखानने लगे सो सब तव प्रताप रघुराई, नाथ न कछु मोरी प्रभुताई।प्रभु तुम जिस पर दयालु हो जाओ जिस पर अपनी कृपा बरसा दो जिसके अनुकूल हो जाओ वहां सब सम्भव हो जाता है, कुछ भी अगम नहीं रहता।
जब जब येप्रसंग पढा और दोहराया जाता है सोचने पर विवश कर ढ़ेता है कि हम हनुमान सी भक्ति क्यों नहीं रख पाते, करते दस है तो बखानते हजार हैं, हमेशा अपने को हाइलाइट करने की कोशिश में लगे रहते हैं, सारा सेहरा अपने माथे बांधना चाहते हैं कि कलगी मेरे सिर ही सजे, सारा क्रेडिट मुझे ही मिले।बिल्कुल भूल जाते हैं कि बिना ईश कृपा के तो आप एक पग भी नहीं चल सकते।और उसकी कृपा बरस जाए तो बिनु पग चले सुने बिनु काना, कर बिन कर्म करे विधि नाना।तो बनी रहे उसकी कृपा,कहते दुहराते रहें... नाथ न कछु मोरी प्रभुताई, तव सब प्रताप रघुराई।प्रभु आपकी दया से सब काम हो रहा है, करते हो तुम प्रभुजी मेरा नाम हो रहा है।