Saturday, September 3, 2022

जिन गोविंद दियो बताय......... दु

 सफर जारी है.....1046

04.09.2022

जिन गोविंद दियो बताय.........

दुनिया में सबको एक उसी गोविंद की आस है, उसे ही भजा जाता है हे कृष्ण हे गोविन्द हे मुरारी, ईश इच्छा सर्वोपरि है, उसकी मरजी के बिना तो एक पत्ता भी नहीं हिलता, वो जो चाहे तो मूक भी बोलने लगे और पंगु भी पर्वत लांघ जाए। अभी चार दिन पूर्व ही विघ्न विनाशक का जै गणेश जै गणेश जै गणेश देवा की स्तुति से आवाहन किया है, उन्हें विराजा है, उनसे रिद्धि सिद्धि, बल बुद्धि मांगी है। अंधन को आंख देत कोढ़ी को काया, बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया दोहराया है। पर उस परम पिता, सर्व शक्तिमान प्रभु का ठौर हमें कौन बताता है,  कौन हमें उससे मिलने की राह दिखाता है,कौन उस तक पहुंचने का मार्ग बताता है तो कबीर खंगालने होते हैं, उनके दोहे, सबद, रमैनी की व्याख्या करनी होती है, उसे समझना होता है जिसमें वह स्पष्ट रूप से कह देते हैं ....गुरु गोविंद दोउ खडे काके लागू पांय, बलिहारी गुरु आपने जिन गोविंद दियो बताय।

विचार का असली मुद्दा तो यहीं से शुरू होता है जब गुरु इतना बड़ा पथ प्रदर्शक है कि वह सामान्य समस्याओं उलझनों का तोड़ और समाधान तो बताता ही है, यह तो उसके लिए बाएं हाथ का खेल है। वह तो गोविंद तक पहुंचने का मार्ग भी बता देता है। यह सच ही होगा नहीं तो ज़रा मुसीबत पड़ने पर हम गुरुजी को क्यों तलाशते हैं, उनसे विनती प्रार्थना क्यों करते हैं, क्यों कहते हैं गुरू बिन ज्ञान नहीं।पर आज के गुरु क्या इस कसौटी पर खरे उतर रहे हैं, क्या वे दुनियावी झंझटों, मोह माया से छुटकारा दिलाने में वाकई समर्थ है। क्या ये गुरुजी शिवा के समर्थ रामदास, विवेकानंद के रामकृष्ण परमहंस, दयानंद के  विरजानंद, राम के वशिष्ठ और विश्वामित्र, कृष्ण के  सांदीपन , चंद्रगुप्त के चाणक्य जैसी सामर्थ्य रख पाते हैं, क्या उन्हें अन्तर हाथ सहार दे ठोक ठोक कर गढ़ पाते हैं गुरू कुम्हार शिष्य कुंभ है गढ़ गढ़ काढ़े खोट , अन्तर हाथ सहार दे बाहर बाहे चोट को जीवन में प्रयोग कर पाते हैं या काली कमरिया ओढ़े बैठे रहते हैं, चिकने घड़े से हो जाते है जिस पर कोई रंग नहीं चढ़ता और पानी फिसल जाता है। इतने उच्च गौरव बोध की तो बात भी मत करो, इसका तो जिकरा भी मत करो । वे लौकिक शिक्षा दे लें, वही बड़ी बात है। और अधिकांश तो इतना भी नहीं कर पाते। जो  इसे कमाई और आजीविका वृत्ति के रुप में ही लेते हों ,वे भी जितना कमाते हैं उसका दशांश भी नहीं देते। वे पढ़ते भी उतना ही हैं  जिससे अगली कक्षा में प्रमोट हो सकें। और जैसे तैसे डिग्री डिप्लोमा पाकर कहीं भैन जी या मास्टर जी बन चिपक सकें । जब पढा ही उतना खोंच भर जाता है तो रेज का कहां से पढा पाएंगे। पढ़ाने के लिए तो बहुत पढ़ना होता है, पढ़ने से अधिक गुनना होता है, समझना होता है, तथ्यों को उसी रूप में पहुंचाना होता है, दस बात याद करते हो तब जाकर क्लास तक पांच पहुंचा पाते हो। अपनी बात की पुष्टि के लिए जीवन जगत से लेकर उदाहरण और दृष्टांन देने होते हैं। ये सब तब संभव होता है जब विषय को अच्छी तरह समझा हो। अब रट्टा मार के परीक्षा में लिखने तक का ही श्रम करोगे तो कक्षा में पढ़ाने जाते डिब्बा गुल होगा ही। और जो कहीं किसी विद्यार्थी ने कोई प्रश्न पूछ लिया तो या तो उसे डांट के चुप करा दोगे या बगले झांकने लगोगे। हमारे प्राथमिक अध्यापको के  तो ४४१में चार का भाग देने में छक्के छूट जाते हैं और श्यामपट पर लिखते वर्तनी की ढेरो अशुद्धियां के बीच शुद्ध शब्द खोजने में द्रविड़ प्राणायाम करना पड़ता है। इंस्पेक्शन को आए बेचारे आधिकारी के सिर लाज से झुक जाते हैं कि क्या ये ही वे अध्यापक हैं जिनके हाथों हम भविष्य की पीढ़ी का निर्माण सुरक्षित सौंप निश्चिंत बैठे है। जरा भी लाज शर्म बाकी बची होती तो अध्यापक कहलाते लाज आती, दो चुल्लू पानी में डूब मरने का मन होता पर नहीं साब, हम तो निरे ढीठ और पक्के बेशरम हो गए हैं, कहता रहे लाख कोई, हम पर कोई फर्क नहीं पड़ता। क्यों पड़े , सब एक ही नाव पर सवार है, तू मेरी ढाक मैं तेरी ढाकता हूं। अब काम में दीदा नहीं लगता, काम चोरी की आदत पढ़ गई है तो काम चोर है और चोर चोर तो मौसेरे भाई होंगे ही। पूरे सिस्टम में भांग जो घुली हुई है। सिफारिश और रिश्वत खोरी का बाजार इतना गर्म है कि जिसकी जेब में पैसा है या बड़े ओहदे वालों को जेब में रखे घूमते हैं , वे सरेआम सिस्टम को चुनौती दे देते हैं। 

          बड़ी कोफ्त होती है आखिर सालाना शिक्षक दिवस मनाते हम कौन सी प्रतिज्ञा लेते हैं और उस पर कितने खरे उतरते हैं। शिक्षक होना अपने ज्ञान को, जानकारी को विद्यार्थी  में स्थांतरित करना है। उसे सजग समर्थ नागरिक बनाना है, उसे जीवन के उच्च आदर्शों से समन्वित करना है उसे सांच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप, जाके हिरदय सांच है ताके हिरदय आप का पाठ पढ़ाना है,ऐसी बानी बोलना सिखाना है जो मन का आपा खोय, औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय । उसे सत्पथ पर चलने की शिक्षा देनी है, उसे मुसीबतों से लड़ना, उनसे जूझना सिखाना है, मुसीबतों के आगे हार जाना, घुटने टेक देना और पीठ दिखाकर भाग जाना नहीं। उसके विवेक को जाग्रत करना है। उसे बोध कराना है कि उसके अन्दर अपार शक्तियों का भंडार है, वह शक्ति पुंज है। उसे अपनी सामर्थ को तौलना है, वह भूला और भटका हुआ है, उसे चेताना है का चुप साध रहे बलबाना।उसे सही मार्ग दिखाना है, समझाना ज़रूरी है, सूचना तो वह गूगल बाबा की शरण में जाके भी ले सकता है।

          अब जो ये सब कर सको तब उस श्रेणी के अध्यापक बनने की पंक्ति में खड़े होने का साहस कर सकोगे  जिसके लिए कबीरा लिख गए सात समुद्र की मसि करूं लेखनी सब वनराय, सब धरती कागद करूं गुरू गुन लिखा न जाए। तो लगे रहिए लाइन में, कोशिश करते रहिए क्योंकि कोषिश करने वालो की हार नहीं होती और लहरों से डर कर ये नौका पार नहीं होती, कुछ किए बिना जय जय कार नहीं होती।

Friday, September 2, 2022

दुविधा में दोऊ गए

सफर जारी है.....1045

03.09.2022

दुविधा में दोऊ गए........

जीवन संकल्प विकल्प से भरा है। न जाने कितनी कितनी बार ऐसे क्षण आते हैं जब हमें दो में से एक चुनना होता है पर हम निश्चय नहीं कर पाते, दोनों के बीच झूलते रहते हैं,। एक तरह से कहें तो दोनों हाथ में लडडू की चाहना होती है, अम्मा भी प्यारी और बबुआ भी प्यारो, किसी एक को भी छोड़ना नहीं चाहते। यदि दोनों ही नुकसान दायक हों, इधर कुआ उधर खाई की स्थिति हो तो भी कम नुकसान वाले को चुनना चाहेंगे। पर जिनमें चयन के निर्णय की योग्यता नहीं होती, वे बीच में झूलते रहते हैं। बहुत मन पक्का कर होय सो राम कर भी लें तो भी जो नहीं चुना होता, उसी में पूरी चेतना केंद्रित रहती है और जो कच्चे पक्के मन से चुन भी लिया और वह अधिक लाभ का सौदा नहीं रहा तो दिन रात मार खिझियाते खिसियाते रहते हैं कि इससे अच्छा तो उसे ही चुन लेते।

दो या दो से अधिक में से एक चुनने के निर्णय की दृढ़ता अचानक नहीं सीखी जाती। इसे तो बचपन से ही सिखाना होता है। पर हम माता पिता अपने ही विकल्पों को बहुत जल्दी समाप्त कर लेते हैं और बच्चे की जिद के आगे हथियार डाल देते हैं कि तुझे नहीं समझ आ रहा तो ले, दोनों ले ले । बस यहीं से चूक प्रारंभ होती है। उसे जितना मर्जी समय दीजिए पर उसे अपना मन समझने दीजिए कि उसे चाहिए क्या, उसे निर्णय करने दीजिए, उसे उसके संकल्प विकल्पों पर विजय पाने दीजिए, उसे सिखाएं कि सोच समझ के चुनो और जो चुनो उस पर दृढ़ रहो, उसके लाभ हानि समझ लो। यह ही नहीं निश्चित कर पा रहे कि तुम्हारी पसंद क्या है, मीठा चाहिए या नमकीन या खट्टा, गर्म, ठंडा या गुनगुना, हल्का या भारी, उसे चुनने की आदत डालो, उसे समझाना ज़रूरी है कि दो में से एक चुनना होता है, अपने मन को जानना होता है, अपनी रूचि पता होनी चाहिए। इधर उधर फैली पसरी वस्तुएं हमारा ध्यान जरूर बंटाती हैं पर हमें अपने को अपनी रूचि पर केंद्रित करना आना ही चाहिए। हमेशा मन पर ही सब नहीं छोड़ देना चाहिए। मन की क्या, वह तो खूब भटकाता है। उसे तो सब चाहिए होता है, वह तो अपने को कभी एक जगह केंद्रित कर ही नहीं पाता ,बस इच्छाओं के आकाश में उड़ता घूमता भटकता ही रहता है। उसे नियमित और अनुशासित तो आप करते हैं, डांट डपट के रखते हैं, वर्जित स्थानों पर जाने से रोकते हैं। मन की क्या, वह तो निरंकुश होता है, जब चाहे ,जहां चाहे, मुंह उठा के चल देता है। हम मन को नियंत्रित करें न कि मन हमारे ऊपर शासन करे।

         आप एक होटल में खाना खाने जाते हैं ,आप चार प्राणी है, उनमें से तीन अपनी अपनी पसंद का खाना आर्डर कर देते हैं पर चौथा सदस्य बड़ी देर तक यह तय नहीं कर पाता कि उसे पिज्जा चाहिए या बर्गर या कुछ और। कभी बहन की प्लेट का पिज्जा देखता है तो कभी मां की प्लेट का पिज्जा या पिता की प्लेट का आलू परांठा। मां विकल्प देती है तुम कुछ भी मंगा लो, सबमें में शेयर कर लेना पर पिता अड़े रहते हैं कि नहीं, तुम अपनी पसंद का चुनो, उसे मंगाओ और खाओ लेकिन तब दीदी की प्लेट पर नजरें नहीं गडी होनी चाहिए। ऐसा नहीं है कि पिता कंजूस है कि उसके पास इतना पैसा नहीं कि वह अपने बालक को इतने ऑप्शन खरीद के न दे सके कि जो खाया जाय खा लो, बाकी पैक करा के ले चलेंगे। वह ये सब कर सकता है लेकिन नहीं करता क्योंकि उसे बच्चे को यह अभ्यास डालना है कि वह अपनी रूचि पहचान सके, वह उस पर ध्यान केंद्रित कर सके और उसे एंजॉय कर सके। हम में से आधों की समस्या तो यह है कि हमें ये ही मालूम नहीं होता कि हमें आखिर चाहिए क्या, कभी उसे चुन लेते हैं जो अधिकांश लोग चुन रहे होते हैं या हम उस के निर्णय से प्रभावित हो जाते हैं जिसे जीवन में अधिक मानते हैं, जिसके प्रभाव में होते हैं और फिर जिंदगी भर गाते रोते हैं कि भाई क्या करें, हम ने तो इसके उसके कहने से ऐसा कर लिया, हमारा तो मन ही नहीं था। अरे मन नहीं था तो क्यों किया और किसी के कहने से ही निर्णय लिया, किसी के दवाब में ही लिया तो उसे डिट्टो करो, लाभ हानि भुगतने के लिए तैयार रहो। ऐसे थोड़े ही होता है कि जो लाभ हुआ तो शुरू हो गए कि हमने तो पहले ही कही थी और जो कहीं नुकसान हुआ तो अगले को पानी पी पी के कोसेंगे कि हमारा काम तो इसने बिगाड़ दिया। यानि चित्त भी मेरी पट्ट भी मेरी। तुम ही सबसे अधिक समझदार हो सो तुम्हारे दोनों हाथों में लडुआ होने चाहिए।

अपने पाल्य में चयन करने, निर्णय करने और उस निर्णय पर अडिग होने की आदत बचपन से ही डालिए, पहले तो झुनझुने से उसके हाथो बजते रहते हो और फिर जब उसकी आदतें सीमेंट सी पक्की हो जाएं, वह किसी भी बात में निर्णय न ले पाए, हमेशा दूसरे के नाम की पर्ची फाड़ता रहे, उसका आत्मविश्वास डूगलाता रहे तब मार परेशान होते हो। सोच सोच के बहुत सोचो पर संकल्प विकल्प में ही मत उलझे रह जाओ, चयन का निर्णय करो और अपने उस चयनित फैसले के साथ आगे बढ जाओ। नहीं तो दुविधा में दोऊ गए माया मिली न राम या आधी छोड़ पूरी को धाबे, आधी मिले न पूरी पाबे का हाल हो जाएगा। 

Thursday, September 1, 2022

तो हरे भरे बने रहिए न

 सफर जारी है....10432

..09.2022

तो हरे भरे बने रहिए न......

कहावत है पेड़ सूखा तो परिंदों ने ठिकाना बदला । जो उजाड़ हो जाते हैं, जो खाली हो जाते हैं, जिनके पास दूसरे को देने के लिए कुछ नहीं बचता, जो भाव शून्य होते हैं, लोग उनसे धीरे..धीरे किनारा कर लेते हैं। जिनमें देश और संस्था प्रेम तो छोड़ो , किसी के लिए भी कोई प्रेम भाव शेष नहीं रहता, उन जैसों के लिए ही लिखा गया होगा जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं, वह ह्रदय नहीं वह पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। ऐसों के लिए देश गया तेल लेने, वे तो अपने इसके उसके लोगों को ही भाव नहीं देते, फिर समाज की कौन कहे।

सूखे ठूंठ पर भला कौन बसेरा बनाना चाहता है, पक्षी तक उसकी फुनगी पर बैठना पसंद नहीं करते, उड़ कर कहीं दूसरा ठिकाना खोज लेते हैं। सूखे पेड़ की दुर्दशा पर दुख तो प्रकट किया जा सकता है लेकिन उसके साथ बने रहना सबके बस का नहीं होता। पर यदि उस ठूंठ में जिजीविषा बाकी हो, कोई हरापन कहीं शेष रह गया हो तो फिर से सूखे तने पर छोटे छोटे पत्ते फूटने लगते हैं , सब हरा भरा हो जाता है। तो अपने अंदर कुछ सपने बचा कर रखिए जरूर कि जब सब छुट जाए तो ये बचा कुचा साहस बहुत काम आता है। जब तक शरीर में ताकत होती है, व्यक्ति अंधाधुंध  दौडता है, सब अपने पेट में भरना चाहता है लेकिन ऐसा कर नहीं पाता, कर भी नहीं सकता। हर की अपनी सीमाएं होती हैं। जो बिना सोचे समझे , बिना लक्ष्य निर्धारण किए दौड़ते हैं उनके हाथ कुछ नहीं आता, और शक्ति भी समाप्त प्राय हो जाती है। वे बिल्कुल शून्य हो जाते हैं। जो हाथ हमेशा देने के लिए उठते थे, उन्हें आज पसारने की नौबत आ जाती है। इष्ट मित्र साथ छोड़ने लगते हैं और आप बिल्कुल खाली खाली से हो जाते हैं, दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं। खाली हाथ तो भला अपने भी नहीं पूछते ,फिर दूसरों के विषय में तो सोचना ही फिजूल है।

ये खाली पन केवल धन दौलत का ही नहीं हुआ करता, शक्ति हीन होने का भी होता है। खाली कुए को भला कौन पूछता है, पतझड़ हो चुके वृक्षों पर किसकी दृष्टि जाती है भला, खाली डब्बा खाली बोतल किसके होते हैं भला। हुनर हीनों को कोई क्यों पूछे भला। उनसे भला किसी का क्या फायदा। दुधारू पशु की तो लात भी सही जाती है पर जैसे ही वह दूध देने योग्य नहीं रहतीं, उसे किनारे कर दिया जाता है। बैल तभी तक उपयोगी रहते हैं जब तक वे गाड़ी में जुते रहते हैं, उनकी खातिर दारी भी तभी तक होती है, बाद में तो उनके लिए सूखे भूसे के भी लाले पड़ जाते हैं, अंकोर की कौन कहे j तो खुद आगे बढ़कर स्वयं को सहेजिए। अपनी शक्ति को बचा कर रखिए, अपने हुनर को जिन्दा रखिए, सबके लिए उपयोगी बने रहिए लेकिन दूसरों के हाथ का खिलौना बन कर मत रह जाइए। समझ लीजिए बकत आदमी के काम की होती है, उसके हुनर की होती है। काम ही सबको पसंद होता है, चाम नहीं, कोरी लंबी चौड़ी बातें नहीं। आपकी चिकनी चुपड़ी बातों का राज बहुत जल्दी खुल जाता है। तो बातों के भरोसे ही मत बैठे रहिए जनाब, काम कीजिए काम। जब कुछ भी शेष नहीं होगा तब काम ही आपके काम आयेगा। आपकी मेहनत ही रंग लायेगी। काम ही आपको इज्जत दिलाता है। काम ही से वाह वाही मिलती है, शाबासी मिलती है, पीठ ठोकी जाती है, सराहना मिलती है। लोग आपके काम को सराहते हैं, आपको सिर आंखों पर बिठाते हैं, आपको पूजने की हद तक मान देते हैं।

ये कमाई एक दिन में नहीं हुआ करती, वर्षो की मेहनत का परिणाम होती है। अपने को भरापूरा बनाए रखना बहुत बहुत ज़रूरी होता है। कुछ ऐसा हुनर, कोई ऐसी जिजीविषा जरूर बचाए रखिए जिससे आप सदाबहार बने रहें। जो पूरी तरह खाली हो जाते हैं, टूटे सामान हो जाते हैं, वे कबाड़ में फेंक दिए जाते हैं। जीते तो वे भी हैं पर हर क्षण मर मर कर। उनके मन में कोई उत्साह ही नहीं बचता। जिंदगी को इतना नीरस भी मत बनाइए साहब। जिंदगी बार बार नहीं मिला करती तो उसे भरपूर जीना ज़रूरी है, सब ख़त्म होने पर भी जो कुछ बचा रहता है, वह बड़े काम का होता है। तो उस महत्वपूर्ण को जरूर पकड़े रहिए, उसे हाथ से खिसकने मत दीजिए। सूखे ठूंठ मत बन जाइए, अपने हरेपन को जिन्दा बनाएं रखिए, मनोबल को ऊंचा रखिए, सब सध जाता है। आप ही साधते हैं, दूसरा कोई हथेली लगाने नहीं आता। याद होगा स्वर्ग अपने मरे ही दिखता है। तो बने रहते हैं हरे भरे, संवेदनाओं से भरे पूरे।


Wednesday, August 31, 2022

मेरी मईया

 सफर जारी है....1043

02.09.2022

 मेरी मईया......

 लो जी सितम्बर आ गया और याद आने लगे  हिंदी दिवस, शिक्षक दिवस, श्राद्ध पक्ष ,और फिर शारदीय नवरात्र। पिछले चौदह पन्द्रह सालों से इनमें मां को याद करने का दिन और जुड गया है। पहले मां आंखों के सामने थी जीती जागती, अब तो बस यादों में शेष है। सुख में हो दूर बैठी निहारती होगी पर जरा परेशानी आई नहीं तो ढाढस बंधाने, सांत्वना देने ,सिर पर अपना वात्सल्य भरा हाथ रखने चली आती है। मेरी ही नहीं, दुनिया भर की मांऐं ऐसी ही होती हैं अपनी संतानों को नेक कष्ट में नहीं देख पाती। बच्चे मर्जी चाहे जितने बड़े हो जाएं, दादी नानी का पद ही क्यों न पा जाएं, मां के लिए तो दुलारे बच्चे ही बने रहते हैं। बच्चों को अपनी मां की शिकायत करनी हो तो वे दादी नानी की ही धौंस देते है।जब तक मां होती है, कभी लगता ही नहीं कि मां के बिना भी  जीवन हो सकता है। जब तक ब्याहे नहीं जातें तो  घर  पूरा पूरा हम बेटियों का ही होता है । पर  हाथ पीले होते ही अपने उस घर के सन्दर्भ बदल जाते हैं, नाम बदल जाता है, उसे पीहर, मायके , नैहर कहा जाने लगता है। जहां जन्मे, पले, बड़े हुए, खेले कूदे, पढ़े लिखे, जीवन जीने के जरूरी  सूत्र सीखे, वही घर अचानक से पराया हो गया और एक बिलकुल नए अजनबी माहौल को हमारा नया घर कहा जाने लगा। हम बेटियां अचानक से पराई हो गईं। कहा सुना तो जाता था कि बेटियां पराई अमानत होती हैं, उन्हें दूसरे घर जाना होता है, ये घर तो प्रशिक्षण शाला है, सीखो और दूसरी जगह जाकर बरतना, मत बनाओ खाना पर आंखों में जरूर भर लो कि सब किया कैसे जाता है। केबल आंखों में ही मत भरो, करके भी देख लो जिससे तुम्हारी आदत में आ जाए और हमें भरोसा हो जाए कि तुम सब कर लोगी, सब निभा ले जाओगी। सुनते तो थे कि बेटियों को ये घर छोड़कर एक दिन अपने घर जाना ही होता है, इनकी आगे की जिंदगी की डोर उस नए घर से बंधी होती है पर मन में बड़ा भरोसा था कि जैसे रोने मचलने रूठने मटकने पर पिताजी मां को कह देते..... क्यों रुला रही हो गुड़िया लाडो को, जो मांग रही है दे क्यों नहीं देती। हमारे मजे हो जाते कि हमारे मन की सी हो गई। पर हमें कहां पता था कि ये इतना लाड प्यार  इसलिए था कि वे जानते थे कल को ये बच्चियां अपने अपने घर चली जाएंगी तो आना जाना भी दूसरे की मर्जी से होगा। विदा होते खूब हिचकी ले ले के रोए पर मां पिताजी रोकने के बजाय उल्टा हमें ही पाठ पढ़ाने लगे कि लाली ,खूब अच्छी तरह रहना, वह घर भी तुम्हारा है, वहां भी माता पिता भाई बहिन हैं, बस उन रिश्तो के नाम बदल जायेंगे, वहां जेठ देवर ननद होंगे। पुत्री दो कुलो को पवित्र करती है टाइप और भी बहुत कुछ समझाया गया। जीवन भर कोशिश तो पूरी की कि मातृ और श्वसुर कुल कलंकित न हो। गलती से भी कुछ ऐसा हो जाता तो उनकी आत्मा को कितना कष्ट होता।

          जब जब आना होता मां, सोचते खूब बतराएंगे, कितनी कितनी बातें इकठ्ठी हो जाती तुम्हें बताने के लिए, पर तुम हमारे बिना कहे ही सब समझ जाती। तुम्हारे आगे मन खोलने की जरूरत ही नहीं पड़ी, तुम तो अंतर्यामी थीं। चेहरा देखकर तो छोड़ो, आवाज के सुर से ही सब समझ जाती कि उनकी लाडो कैसी है। धीरे धीरे समझ आ गया कि लड़कियों के दो घर हुआ करते हैं एक वह जिसमें जन्म लेते हैं, पलते हैं, बड़े होते हैं, शिक्षित दीक्षित होते हैं और जब फसल तैयार हो जाती है तो अधिकार क्षेत्र बदल जाते हैं। ये ही दुनिया की रीत है, इसमें नया क्या है। जब बेटियां ब्याही जाएंगी तभी घर में वधुएं आएंगी न। मां का सारा लाड प्यार तो उनके जानें के बाद ही याद आता है। जब तक मां  है तब तक उसे हम बच्चे टेकिन फार ग्रांटेड लेते हैं। वह कुछ भी करें हमें लगता है ये तो करना ही था , मां जो हो। मां यानि दुनिया की सबसे शक्तिशाली औरत जो अपने बच्चे की जीवन रक्षा के लिए किसी भी चौखट को पूज सकती है तो उस पर कुदृष्टि रखने वाले के लिए रणचंडी बन उसका संहार भी कर सकती है। बच्चे के लिए तो मां अनमोल और सबसे जरुरी होती है। कितने नादान और कभी कभी इतने स्वार्थी हो जाते हैं हम बच्चे कि जब मां को हमारी सबसे अधिक जरूरत होती है हम अपनी गृहस्थी में उलझे होते हैं, हमारे पास बीमार मां को देखने जानें उसकी सेवा सुश्रुषा करने के लिए समय का टोटा होता है, जरा सा करना पड़ जाए तो कितना भुनकते तुनकते हैं, झींकते है। मां तो वैसे ही बहुत संकोच में होती है सौ जरूरतों को मार लेती है बहुत ज़रूरी होने पर धीमे और कमजोर स्वर में बहुत ज़रूरी कुछ कहती भी है तो उसे हम कान पर होकर टाल देते हैं। पता नहीं वाकई व्यस्त होते हैं या अपनी परिस्थितियों पर परदा डालने हेतु मार व्यस्तता ओढ़े रहते हैं। मां, तुम मां हो, सब गलतियों को नज़र अंदाज़ कर देती हो, उन पर धूल डाल देती हो पर जब अपना ही अंतर धिक्कारता है कि मां के लिए इतना भी नहीं कर सके और जो किया, उसका भी अहसान सा थोपते रहे तो सिर शर्म से झुक जाता है।

          मां तो सब जानती है अपने बालक की रग रग पहचानती है,उसने ही तो गढ़ा है अपनी संतति को। वह कभी नाराज होती ही नहीं, बस अपने बालक को सुधारने, रास्ते पर लाने को नाराजगी का चोगा जरूर ओढ़ लेती है और बच्चे के द्वारा गुदगुदी करने पर हाल मान भी जाती है। मन में रेशा नहीं पाले रखती। मां, आप तो हमेशा यादों में हो, आपको अलग से याद नहीं करना पड़ता। आपकी आवाज, आपके निर्देश कि बेटा ऐसे कर लेना दिमाग में गूंजते रहते हैं। आप ही ने सिखाया था माता पिता गुरु का ऋण चुकाने का सबसे अच्छा उपाय अच्छे माता पिता बनना है, अपने बालक की भली भांति परवरिश करना है, उसे न केबल शिक्षित करना है बल्कि संस्कारों से दीक्षित भी करना है कि वह आप पर गर्व कर सके। कोशिश तो की है मां, पर शायद आप जितना सफल नहीं हो सके। गुरु ऋण उतारने के सन्दर्भ में आपका निर्देष था जो सीखा उसे सब में बांट दो, विद्या बांटने से बढ़ती है व्यय कृते वर्धते एव नित्यम विद्या धनम सर्व धनं प्रधानम। हां, थोडा थोडा रोज बांट ही तो रहे हैं। बस मां , तुम हम बच्चो को दिशा निर्देशित किए रखना, आयु में भले ही छह सात दशक पार कर लिए हों पर अकल के तो कच्चे ही बने रहे, समझदार और व्यवहार कुशल बनना नहीं आया, अभी भी कोई बिना गलती के बिना बात के ऊंचे स्वर में चिल्ला दे तो झट आंखें बरस जाती हैं कि हमारा क्या कसूर था, बिना बात ही लतियाए धकियाए गए। अब नहीं सुधर पाए तो नहीं सुधर पाए, कांच का सा मन है सो हाल किरच जाता है। हम भी क्या राम कहानी ले के बैठ गए मां तेरे आगे। बस ख्यालों में आती रहना, ढाढस बंधाती रहना, सब कर लेंगे, सब निबट जाएगा, बस तुम्हारा आशीर्वाद बना रहे। सो जा मां, बहुत देर हुई, तुम याद आती हो, तो पिटारा खोल के बैठ जाती हूं।

 सादर नमन और भाव पूर्ण स्मरण मां।

Tuesday, August 30, 2022

नगर ढिंढोरा पीटती,

 सफर जारी है......1048

01.09.2022

नगर ढिंढोरा पीटती.......

शुद्ध ,सात्विक, एकनिष्ठ प्रेम का प्रतीक हरतालिका तीज का पर्व अभी अभी बीता है, सुहागिनों ने अपने जीवनसाथी की लंबी आयु की प्रार्थना की है,अर्द्धनारीश्वर जैसे प्रेम की आकांक्षी हैं वे, सदा समाधि में रहने वाले महादेव की प्रतीक्षा में रत है पार्वती और जब शिव में मोह जागता है तो सती के शव को कंधे पर डाल तांडव करते हैं, जहां जहां देह के अंश गिरते हैं, वह स्थान तीर्थ हो जाता है। कन्याएं भक्ति भाव से शिव जैसे वर प्राप्ति के लिए व्रत उपवास करती हैं और विवाहिता अपने दांपत्य के साफल्य और सौभाग्य के लिए शिव पार्वती की पूजा उपासना करती हैं। गौरी पुत्र गणेश घर घर विराजे जाते हैं, गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ के तुमूलभेदी शोर से वातावरण गूंजने लगता है और फिर ऋषि पंचमी पैर पसार लेती है। भादों बीते कवार में पितरों को याद करते हैं और फिर शारदीय नवरात्र, दशहरा दीवाली, और देव उठने का समय आ जाता है यानि हम उत्सव जीवी वर्ष भर किसी न किसी ब्याज से प्रेम,उत्साह और जिजीविषा को बनाए बढ़ाए रखने हेतु  पर्व त्योहार मनाने में मस्त और व्यस्त बने रहते हैं। जीवन है तो धूप छांव की माफिक सुख दुख आते जाते रहते हैं पर ढेर दुख पर भी ये आस्था भारी पड़ती है। प्रभु का नाम लो सब ठीक हो जाएगा का भाव बड़ी आश्वस्ति देता है, जिलाए रखता है, आपसे कोई प्रेम करे या आप किसी के प्रेम में पागल बने रहे, नतीजन प्रेम तो बना ही रहता है। सृष्टि ही प्रेम पर टिकी है। सिखाया समझाया भी यही जाता है कि मिलजुल कर रहो, प्रेम भाव से रहो, आपस में सौहार्द बना रहे, लड़ो झगड़ो मत, एक दूसरे के साथ को महसूस करो, उसे जीओ, तुम्हें बहुत मिला है। उनको देखो जिनके पास मार दौलत भले हो पर प्रेम लुटाने को पात्र नहीं तो अपने अपने प्रेमास्पद में लिप्त रहो। प्रेम ही तो जीना सिखाता है, वह अंधकार भरे रास्ते में रोशनी  किरण है।

    जब प्रेम इतना पावन है कि मानव को जीने की ताकत देता है तो वह कौन सा प्रेम है जिसे न करने के लिए, प्रेम में न पड़ने के लिए नगर भर में मुनादी पिटवा दी गईं कि ... जो मैं ऐसा जानती प्रेम किए दुख होय , नगर ढिंढोरा पीटती प्रेम न करियो कोय। प्रेम किए बिना कैसे रहा जा सकता है भला और फिर प्रेम किया कहां जाता है, वह तो हो जाता है। प्रेम किया नहीं जाता हो जाता है, दिल दिया नहीं जाता चोरी हो जाता है। जिससे एक बार लगन लग जाए तो जीवन भर के लिए उसी के हो के रह जाते हैं। मीरा को ही देख लो ऐसी लागी लगन मीरा हो गईं मगन, वो तो गली गली हरी गुन गाने लगी, महलों में पली, बन के जोगन चली मीरा रानी दीवानी कहाने लगी। विष राणा ने दिया प्याला मीरा ने पिया वो तो गली गली हरी गुन गाने लगी। ऐसी लगन लगी कि सब भूल भाल गई बस मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई, जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई और पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे, इतनी प्रेम दीवानी हुई कि गोविंद को ही मोल खरीद लिया माई री मैंने लीनो गोविंदो मोल, कोई कहे सस्तो कोई कहे मंहगो, लियो री तराजू तौल, माई री मैंने लीनो गोविंदो मोल। जो प्रेम किया तो किया, पूरी दुनिया विरोध में, सास ससुर पति विरोध में पर लगन लगी तो लगी और मीरा प्रभु में जोत बन कर समा गईं।

    आखिर कौन सा प्रेम है जिसके लिए लिखा गया प्रेम किए दुख होय। प्रेम करते तो दुनिया बदल जाती है सब जगह हरा ही हरा दिखता है, हर पल सुहाना होता है, एक एक पल को कैद कर के रखा जाता है फिर भले ही दुनिया कहती रहे अरे प्यार का खुमार नशा उतरने दो, पेट की आग प्रेम की आग से बड़ी होती है, चार दिन की चांदनी के बाद फिर अंधेरी रात आती है। प्यार का नशा जब उतरता है और व्यक्ति ठोस कठोर खुरदरे धरातल पर आता है तो खाली यार से भूख नहीं बुझती, जीवन कोरे प्यार से नहीं चला करता, उसके लिए व्यावहारिक होना पड़ता है, दो दूनी चार का गणित लगाना पड़ता है, केलकुलेशन बिठाने पड़ते हैं, प्यार व्यार को बेवकूफी कह घता बतानी पड़ती है। फिर प्रेमासपद की चिन्ता नहीं, उससे मिलने वाले लाभ हानि की बात अधिक प्रभावी हो जाती है। मेरा तेरा शुरू हो जाता है, प्रेम के स्नेहिल वृक्ष में कैक्टस उग आते हैं, मार उठा पटक शुरू हो जाती है, रूठा मटकी होती है, अपने अपने पक्ष में आग्रही हुआ जाता है और लागी लगन टूट जाती है बिलकुल दो टूक हो जाती है, तू अपने घर मैं अपने घर का फैसला हो जाता है और जिस जमीन पर प्यार की फसल लहलहानी थीं, वह सूख कर बंजर हो जाती है। लो और कर लो प्रेम, यही नियति होती है प्रेम कि इसीलिए ढिंढोरा पीटा गया होगा प्रेम किए दुख होय तो प्रेम न करियो कोय।

         पर साहब, ढिंढोरा पीटने से कुछ नहीं होता, प्रेम तो दुख कष्ट सह कर भी होता है बशर्ते किसी एक में प्रेम जिंदा रहे। सच तो यह है कि प्रेम के लिए कोई शर्ते निर्धारित नहीं की जाती कि ऐसा होगा तो प्रेम है और वैसा होगा तो प्रेम नहीं करेंगे। ये प्रेम नहीं ,अनुबंध है, एक साझा समझौता पत्र है। पर प्रेम तो आज की दुनिया में भी सांसे ले रहा है। दो में से एक को भी सच्चा प्रेम हो जाए तो दीवानापन खत्म कहां होता है, भले ही प्यार की जड़ में खूब मट्ठा डालते रहो, वह पनपता भी है और वट वृक्ष भी बनता है। कल नासिक के एक साहित्य प्रेमी दंपत्ति  मिलने आए , मेरा प्रश्न बार बार उनकी रोजी रोटी को लेकर होता कि जीवन चलाने के लिए कुछ ठोस जमीन चाहिए होती है तो बताओं परिवार चलाने, बालक अजिश की शिक्षा दीक्षा के लिए कुछ तो सोचा होगा, उन दंपत्ति ने जो कहा ,कहीं दिल को गहरे छू गया ...दीदी जिंदगी चलाने के लिए भौतिक वस्तुएं उतनी प्रभावी नहीं होती जितना आपसी सौहार्द भाव होता है, हम दोनो के दिल मिले हुए हैं, और हम सोचते हैं जीवन की छोटी छोटी खुशियों को झोली में समेट लें, जहां जाना होता है बालक को भी साथ ले जाते हैं, इसे भी तो साहित्य के संस्कार देने है, बस दीदी जैसे भी हो, हमारा हो जाता है, मैं लिखती हूं, ये मनोवैज्ञानिक काउंसलर है , जो मिल जाता है उसी में जीवन चल जाता है। पचास के पेटे में पहुंचे उस दंपति से बातें करते लगा कि प्रेम ही तो आगे बढ़ने की शक्ति देता है, कम में गुजारा करना सिखाता है, जब दो प्रेम भाव में साथ हों तो सब निभ जाता है, पैसे की कमी नहीं अखरती। बस ये साथ  साथ का भाव बना रहे तो प्रेम जिंदा भी रहता है, खूब हरियाता, लहलहाता और पनपता भी है फिर संसार में ढिंढोरा नहीं पीटना पड़ता कि प्रेम किए दुख होय और प्रेम न करियो कोय।

दर्शक दीर्घा

 सफर जारी है....1041

31.08.2022

दर्शक दीर्घा........

आप जब मंच पर माइक के सामने होते हैं तब आपकी निगाहें दर्शक और श्रोता के चेहरे पर बराबर बनीं रहती है। और नहीं बनीं रहतीं तो बनी रहनी चाहिए। आखिर आप उनके लिए ही तो बोल रहे होते हैं। वे ही तो आपका लक्ष्य होते हैं। इसलिए किसी भी कार्यक्रम को संबोधित करने से पहले यह जानकारी लेना बहुत जरुरी होता है कि आखिर दर्शक दीर्घा में बैठने और  सुनने वाले कौन होंगे, किस स्तर के होंगे। वे बुद्धिजीवी हैं, सहृदय श्रोता हैं, विषय में रूचि रखते हैं या सभागार भरने को भीड इकठ्ठी की गई है।तदनुसार ही आप अपनी बात को रखते हैं। बात जिनको संबोधित की जा रही है, उन्हें अच्छे से समझ में आ जाए इसलिए आप अपनी आवाज को स्पष्ट रखते हैं, उच्चारण शुद्ध रखते हैं, वाणी प्रखर होती है। आप बोलते हैं, दहाड़ते या मिमियाते नहीं। पिच कई बार बढाते घटाते हैं, कुछ शब्दों को रेखांकित करते  श्रोताओं का ध्यान आकर्षित करते हुए दोहराते हैं, भावाभिव्यक्ति के लिए हाथ भी चलाते फिराते हैं, जो कह रहे हों उसे प्रभावी बनाने के लिए चेहरे पर भी भाव लाने की भरसक कोशिश करते है। आप ये सब करते हैं कि बात सही तरह से समझाई जा सके, श्रोता उसे ग्रहण कर सकें।

और जो आपकी बात आपका कथन सामने वाले के दिल में गहरा उतर जाता है, तो उसकी स्वीकारोक्ति नकार उसके चेहरे पर आ जाते हैं। दोनों हाथ अनायास ताली बजाने को उठ जाते हैं और जब तक आप बोलते हैं तालियों की गड़गड़ाहट आपके उत्साह को बनाएं रखती है। आप मंचस्थ और दर्शक दीर्घा में बैठे चेहरों पर आते जाते भाव से अपना मूल्यांकन कर सकते है कि आप उन्हें बांधे रखने में कितने सफल हुए हैं। निश्चित ही दर्शक दीर्घा में बजती तालियां आपके उत्साह को हवा देती है।  पर यहीं सबसे अधिक सावधानी अपेक्षित  है। इन तालियों के भेद को समझा जाना जरुरी है। जहां करतल ध्वनि आपके बोलने से सहमति होती है, वहीं विषय समझ न आने पर ये हूटिंग का रुप भी ले लेती है तो तालियों के प्रभाव में मत खो जाइए, उसकी गूंज से इस अंतर को समझते रहिए। जहां विषय की गहरी समझ जरुरी है वहीं उसे आप रख कैस रहे हैं, इस पर भी ध्यान जरुरी है। अच्छे से अच्छा वक्तव्य अच्छी प्रस्तुति के अभाव में अप्रभावी हो जाता है। आप विषय को किस रुप में रख रहे हैं ...सूचना दे रहे हैं, समझा रहे हैं, उद्धरणों से पुष्ट कर रहे हैं, व्याख्यायित कर रहे हैं, अपनी टिप्पणी जोड़ रहे हैं, किसी के कथन को कोट कर रहे हैं या उस विषय की परते खोल श्रोताओं के लिए सरल और सुगम बना रहे हैं। कई कई बार व्याख्यान विषय पर नहीं, मैं पर आधारित हो जाता है। मैंने ये किया मैंने वो किया सी आगे बढ़ता ही नहीं है। सूचनात्मक रुप में कोई जानकारी देते हुए आगे बढ़ जाना एक बात है और स्वयं को केंद्र में रख बातें करना दूसरी।

आपके बोलने से पूर्व आपका परिचय दे ही दिया जाता है कि अब अमुक अमुक बोलेंगे। इसके बाद तो आपके शब्द, आपकी बातें, आपकी भाषा शैली, विषय की रोचक प्रस्तुति ही दर्शक दीर्घा को बांधे रखती हैं। पिन ड्रॉप साइलेंस का अर्थ ही होता है कि अगला आपको सुन रहा है, सुन ही नहीं रहा , बड़े ध्यान से सुन रहा है। कितनी कितनी जोड़ी आंखें आपके चेहरे को गौर से देखती हैं, आप पर चस्पा हो जाती हैं, कान आपको सुनने के लिए प्रतीक्षारत होते हैं तभी आपकी गुरु गंभीर वाणी, खनकती आवाज गूंजने लगती है। आपकी आवाज में वह दम होना चाहिए कि जब तक आप बोलें , कान आपकी तरफ ही लगे रहें, आंखें भले ही बंद हो साधारणीकरण करवा रही हो। ये सब तब घटित होता है जब आप पूरी तैयारी के साथ पोडियम पर होते हैं, माइक संभालते हैं और श्रोता को बांध लेते हैं। ये भी ध्यान रखना जरुरी है कि सामने बैठे श्रोता सुनने ही आए हैं। तो आपको भी सुनाने में दक्ष होना जरुरी है।

          साथियो, अपनी बात रखने का जब जब अवसर मिले, उसे पकड़ो। कहने की पूरी तैयारी रखो। विषय की अच्छी तैयारी रखो। इस गुमान में मत रहो कि हमें सब आता है, इसके लिए क्या पढ़ना पढ़ाना, सब ठीक है, क्या है दो चार भारी भरकम बात कह देंगे, इधर उधर की सूचना चैंप देंगे, बस हो गया काम। हमारा तो नाम ही इतने रौब दाब वाला है कि सब लोहा मानते हैं। इस गलत फहमी में मत रहिएगा जनाब। लोग आपको सुनने आते हैं न कि आपके नाम और पद को। तो जब जब लोगो से संवाद का अवसर मिले उसे व्यर्थ मत जानें दीजिए। अपने पास  रूपरेखा तैयार रखिए, कहने वाली बातों को रेखांकित कर लीजिए। संबोधन में अधिक समय व्यर्थ मत कीजिए, वातावरण को खुशनुमा बनाए। रखिए। अपने श्रोताओं को उस कालखंड में ले जाइए जिसकी बात आप रख रहे हैं। आपके शब्द यह कमाल कर सकते हैं आपके चेहरे पर आते जाते भाव ये प्रभाव पैदा कर सकते हैं, आपकी आवाज की पिच, उसका सुरीलापन, उसकी दहाड़, उसकी करुणा संवेदना सब मिल मिलाकर संयुक्त प्रभाव छोड़ती है और जब आप अंतिम सोपान पर आते हैं तो लगता है आप एक नए लोक में श्रोताओं को घुमाकर एक्जिट पर छोड़ रहे हों। आप वाणी को विराम देते हैं तब श्रोता उस काल खंड से जैसे बाहर निकलता है और तालियां बजने लगती हैं, श्रोता आपको और सुनना चाहते हैं।

          तो अपनी वाणी में ये प्रभाव पैदा कीजिए, सुर को तराशिये, विषय की पूरी तैयारी रखिए और पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने श्रोताओं के मध्य उपस्थित होइए, मंच पर चढ़िए, माइक संभालिए और अपने को अभिव्यक्त करना प्रारंभ कर दीजिए। सारी शुभकामनाएं और शुभेच्छाएं आपके साथ हैं।

Monday, August 29, 2022

जैसे पेड़ खजूर

 सफर जारी है....1040

30.08.2022

जैसे पेड़ खजूर .......

ये लो कल्लो बात, हम तो जे समझे बैठे थे कि सारी मुसीबत नाटे कद वालों की होती है, आलोचना के शिकार वे बनें और कहीं आस पास में छह फुटिया खड़ा हो जाए तो कद और छोटा लगने लगे और मन में धुकुर धुकुर अलग लगी रहे कि जे बांस से हटें तो नेक सहज हो पाएं। लंबे कद की शान में तो बड़े बड़े कसीदें पढ़े गए कि जिसकी बीबी लम्बी उसका भी बडा नाम है और जिसने अच्छा खासा कद पाया हो वह तो दूर से ही अलग चमकता रहता है। फिर हमारे कबीर जी को क्या हो गया कि लिख मारा बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर। अब खजूर के पेड़ के अपने आनंद हैं। कन्या लांगुर गाते दुहराते हैं न मईया तेरी गेल में एक लंबो पेड़ खजूर, बापे चढ़ के देखियो मेरी मईया कितनी दूर कि लांगुर तुम लुटिया हम डोर सरक चले जई वन में कि चक्की चल रई बड़ के नीचे रस पी जा लांगुरिया। और कबीरा यों कह रए कि बडा भया तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर और जैसे ही आगे की लाइन पढ़ी कि पंछी को छाया नहीं फल लागे अति दूर सो ज्ञान चक्षु खुल गए कि ताड़ जैसे लंबे लंबे होने का कोई अर्थ नहीं जो किसी के काम न आ सको। अब खजूर और ताड़ के पेड़ भले से लंबे हो पर आम आदमी के बस का न तो उस खजूर को तोड़ पाना सहज है और न राहगीर को उन चार पत्तों की छाया नसीब हो पाती है जो शीर्ष पर टिके बस अपने में ही आनंदित होते रहते हैं पर किसी के काम नहीं आते।

फिर पड़ा विद्या विनयम ददाति कि पढ़े लिखें गुने व्यक्ति तो नम्र होते हैं, ऐंठ के मारे पैंठ को नहीं जाते। अब देखो फलों से फलों से लदा वृक्ष कैसे झुका झुका सा रहता है कि छोटा बालक भी हाथ बढ़ा के डाली झुका कर फल तोड़ ले नहीं तो पेड़ को झकझोर कर हिला दें तो पके आम कैसे टप्प सीना जमीन पर गिर पड़ते हैं। फिर बताया गया नर की अरु नल नीर की गति एकही कर जोय, ज्यों ज्यों नीचो हे चले त्यों त्यों ऊंचे होय। जो भरे होते हैं वह अधजल गगरी से छलकते नहीं और थोथे चने से बजते नहीं। के अधजल गगरी छलकत जाए और थोथा चना बाजे घनात। जो शारीरिक कद से छोटे हो तो उसे बढ़ाने के ढेर विकल्प बता दिए गए और सबसे आसान तो ऊंची एड़ी के उपानह पहन लो कि पटरे पर खडे होकर ऊंचे पे रखी वस्तु भी उतार लो। मतलब कद को लेकर कोई सोचने विचारने की बाट नहीं, उसके विकल्प खुले हैं।

पर छोटे न हों हम बुद्धि से हों ईश मय से विश्व मय, हों राम मय और कृष्ण मय जगदीश मय जगदेव मय प्रार्थना सुनी तो लगा कि छोटे कद जा होना उतना हानिकारक नहीं जितना बुद्धि से सोच से छोटा होना। जो छोटा सोचते हैं वे कभी बड़े बन ही नहीं पाते, वे क्षुद्र बुद्धि के मालिक होते हैं। पहले तो सोचते विचारते ही नहीं हैं और जो कहीं सोचना पड़ भी जाए तो केबल स्व केंद्रित सोचते हैं एमआ बांटे रेवड़ी फिर फिर अपने को देय। उनका घेरा बहुत आत्म केंद्रित और छोटा होता है। उससे इतर उनकी दृष्टि ही नहीं जाती। और जो कभी किसी के लिए कुछ करने की नौबत आ पढ़े, कि किसी मजबूरी में करना ही पड जाय तो किए हुए को इतनी इतनी बार गायेंगे सुनाएंगे कोट करेंगे कि लेने वाले को अपराध बोध होने लगे कि किस मुहूर्त में मैं सहायता लेने चला गया। सुनते तो यह भी हैं कि यदि के लिए कुछ करना ही पड जाए, किसी भी भाव से करो तो करके उसे भूल जाओ। उसका हिसाब किताब ऊपर वाला कर लेगा। तुम एक कैसा दोगे वह दस लाख देगा, गरीबों की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा। बनो ऐसे कि एक हाथ से दो तो दूसरे को पता भी न चले और देते समय नीचे नेत्र कर लो। मत देखो कि किसे दिया है, बस जो जरूरत मंद था, इसकी थोड़ी सी सहायता की है।दो तो उसे मैगनीफाई मत करो, दे के भूल जाओ क्योंकि आदमी की भला क्या बिसात कि वह  किसी को कुछ दे सके। असली सच तो यह है कि देनहार कोई और है भेजत है दिन रैन, लोग भरम हमरो करें ताते नीचे नैन।

सो छोटा नाटा कद उतनी नहीं बिगाड़ता जितनी छोटी बुद्धि और छोटे सोच से हानि होती है। क्यों सोचो छोटा भला, सोचने में क्या जाता है, बड़ा सोचोगे तो एक दिन कुछ बडा कर भी जाओगे। आखिर जो बड़े सपने देखते हैं वे एक न एक दिन बड़े बनते भी हैं। बस करना होता है। कोरे सपने देखना तो शेख चिल्ली का काम है। तोजैसे पेड़ खजूर न बने, बड़ा सोचें, बड़ा करें छोटे न हों हम बुद्धि से।

Sunday, August 28, 2022

चेहरे ऊपर चेहरा

 सफर जारी है....1039

29.08.2022

चेहरे ऊपर चेहरा ....

कुछ लोगों से मिलते जुलते ये पंक्ति बार बार दिमाग में गूंजती हैं ... एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं लोग। उनके चहरे के नित नए बदलते चेहरे को देख ये निश्चित करना बहुत मुश्किल हो जाता है कि आखिर असली चेहरा है कौन सा। मिलते हर रोज़ हैं पर एक बदले चेहरे के साथ । मन होता हैं इनके चहरे के सारे नकाब नोंच कर अलग फैंक दिए जाएं और असली चेहरे का सच सबके सामने ले आया जाए। पता तो लगे लोगों को कि ऐसे सीधे सादे दिखने वाले चेहरे के पीछे का सच क्या है। अंदर कुछ बाहर कुछ होते हैं। जैसे ही सामाजिकता का दबाब हटा, अपने मूल रुप में आ जाते हैं। लोगों से मिलते ही मेकअप किए चेहरे के साथ हैं इसलिए ऐसों की सोशल इमेज कहीं अलग होती है। वे जमाने भर के लिए भले ओर दयालु होते हैं वही जिसके होते हैं उसके लिए खौफ बने रहते हैं। एक झूठ पर पर्दा डालने को अनेक नए झूठ खडे कर लेते हैं। जो कहते हैं वह करते नहीं और जो करते हैं उसका कोई जिकरा नहीं होता। बस हाथी की तरह के खाने और दिखाने के दो सेट रखते हैं। मन में कुछ और चलता रहता है पर वाणी कुछ और कहती है इसलिए अक्सर शब्द हावभाव के साथ संतुलन नहीं बिठा पाते। यदि वे इन मामलों के उस्ताद न हों तो,बहुत शातिर न हों तो चोरी हाल पकड़ में आ जाती है। चोर की दाढ़ी में तिनका ऐसे ही थोड़े कहा गया होगा। वे चोर को चोरी के लिए उकसाते हैं और पहरेदार के साथ मिलकर जागते रहो की आवाज भी लगाते रहते हैं। वे अपने बेहद निजी लोगों को पहले से ही समझाए होते हैं कि समाज में इज्जत बनी रहे तो सबके सामने झूठ मूठ डाटूगा भी और दो चार थाप भी लगाऊंगा , पर तुम बुरा मत मानना। ये तो लोगों को दिखाने के लिए हैं। करना वही जो चाहते हो, मेरी पूरी सहमति है पर दुनियां दिखाने के लिए तो ये छद्म व्यवहार किए ही जाते हैं।

अब इतने ही समझदार होते, दुनिया की असलियत जानते तो लोगों को समझने में बार बार  गच्चा क्यो खा जाते। अब कोई बड़ी बड़ी बातें कर रहा है तो वैसा आचरण भी होता होगा। हमें क्या पता कि नौ सौ चूहे खा के बिल्लियां हज करने को जाया करती हैं, ये धर्म की आड़ में खेल खेला जा रहा है, कभी डिग्रीधारी के नाम पर कभी खानदान के नाम पर लोगो को बेवकूफ बनाने की मुहिम छिड़ी हुई है।मेकअप की आड़ में काले कारनामों को अंजाम दिया जा रहा है। अब तो ये खेल खुल्लम खुल्ला और खेला जा रहा है। लो उखाड़ लो हमारी मूछ पूंछ जो तुम पे उखाडी जाय। अरे हमारी ऊपर तक पहुंच है, सब काला पीला काले पीले को सफेद बुर्राक में बदलने की ताकत रखते हैं। और जो बार बार दंडाधिकारी से सजा दिलाने का सपना पाले बैठे हो, कभी पूरा नहीं होने का। ऐसों को तो हम अपनी जेब में रखते हैं, ऐसे तो हमारे तलवे चाटते हैं, ज्याड़ बक बक करे तो रुपयों की गड्डी से उसका मुंह बंद कर दिया जाता है। पैसे में तो बड़ी ताकत है साब, पैसा फेंको तमाशा देखो। धन तो अच्छों अच्छों के ऐब ढक देता है। काले किसट्ट उल्टे तवे को भी पैसों का मुलम्मा चढ़ा कर दूध सा उजला और एकदम भक्क सफेद दिखाया जा सकता है।

क्यों इतना नाटक करते हो, छद्म ओढ़े रहते हो, अरे जो हो वही बने रहो, जो यथार्थ में हो वैसे ही दिखने चाहिएं। ये ओढ़े गए मोटे बोरे से लबादे बहुत भरमाते हैं। असल को साफ छिपा जाते हैं। बस नकली मुखौटे की आड़ में सब चलता रहता है। लाख गलत और झूठे सही, सबकी निगाहों में पाक साफ बने रहते हो। गलत सलत करते हो और कह सुन कर, सिफारिश का दबाब डलवा कर सब रफा दफा करवा देते।अधिकारी की सही का ठप्पा लगाकर झूठ को ही सच प्रमाणित करवा लिया। अब तुम चाहे जैसे मरजी बने रहो, फाइल में तो अच्छा अच्छा रिकार्ड हो ही गया है। आधिकारी कौन दूध के धुले हैं, सो वे न कहने की हिम्मत जुटा ही नहीं पाते। और छोटे बड़े सब मिलकर घाल मेल करते रहे हैं। जब जब निबू की चूक खट्टी बूंद इन जैसों के सफेद उजले दूध की कढ़ाई में पड़ जाती है, दूध फट जाता है और सब दूध का दुध पाणी का पानी हो जाता है। ऐसे दस बीस सब सिस्टम में होते हैं जो उखाड़ पछाड़ में लगे रहते हैं और सात तहों में से भी सच खोज कर ले आते हैं। उन्हें सच को सच कहने और सही करने का ऐसा भूत चढ़ा हुआ है कि गलत के लिए अंतरात्मा गवाही नही देती और सच सामने आते ही सालों से बुने और बने  ढांचे टूट जाते हैं, एक सच कहते इसके उसके सबके बुरे बन जाते हैं। कोई विकल्प है क्या। हां हां क्यों नहीं, तुम भी चेहरे ऊपर चेहरा चस्पा कर लो और सब ऐसे ही चलने दो पर तुम्हारी अंतरात्मा इसके लिए कभी गवाही देगी नहीं। तुम तो लगातार सत्य की खोज में लगे रहोगे। लगे रहो, रोका किसने है पर इस सब के लिए बहुत सशक्त बनना होगा, संकल्प शील और दृढ़ प्रतिज्ञ रहना होगा, बार बार की चोट से टूटना नहीं, और मज़बूत बनना होगा। कर पाओगे ये सब तो नोच डालो सारे लबादों और नकाब पोशों को, उनके चेहरे नंगे कर दो, वे तिलमिलाएंगे, घोड़े से हिनहिनाएंगे, मक्खी से भिनभिनाएंगे जरूर पर तुम चुप बने रहना, करो अधिक पर कहो कुछ नहीं, मौन में बड़ी शक्ति होती है। और जो तुमसे ये सब न निठ पाए तो जैसा चल रहा है चलने दो, यथास्थिति बनी रहने दो।चलने दो वैसा ही जैसों सदियों से चला आ रहा है। बस अपना अपना देखो, मेरा तो हो गया कह कर तान चद्दर सोते रहो। अब तुम सोचो कि दोनों में से  करना क्या है। हम तो कल भी सच के साथ थे, आज भी हैं और भविष्य में भी ऐसे बने रह की उम्मीद है। नेक इरादे वाले के साथ भी कारवां जुड़ जाता है फिर देर भले हो। तो चेहरे पे चेहरे मत लगाते रहिए नहीं तो एक दिन असली चेहरा ही गायब हो जाएगा, अंतरात्मा की आवाज कानों तक नहीं पहुंचेगी। सब बिखर जाएगा, कुछ भी नही सिमटेगा तो नोच फैंकिए इन लबादे और झूठे मुखौटों को।

Friday, August 26, 2022

फल तो रितु पर होय

 सफर जारी है ......1038

28.08.2022

फल तो रितु पर होय.......

पता नहीं कितनी कितनी पंक्तियां है जो सालों के अनुभवों का निचोड़ है, देखने में मात्र दो लाइन का छोटा सा दोहा लगता है पर अपने अंदर अर्थ विस्तार की ढेरों छटाएं समाए रहता है। छोटा बालक जब प्रश्न का उत्तर लिखता है तो वह जो जो जानता है सब लिख मारता है। उसे इस बात का बिल्कुल भी बोध नहीं होता कि क्या क्या पूछा गया है, उसे तो जो आता है लिखना सिद्ध। और जिन्हें कुछ नहीं आता, वे पूरी वर्णमाला ही लिख डालते हैं कि हमने तो सब आखर लिख दिए, जो पसंद हो उस शब्द, पदबंध,वाक्य, अनुच्छेद की रचना करते जाओ, जितना मर्ज़ी पेज रंगने हो रंगते जाओ, मना किसने की है। वे तो बालक हैं अबोध हैं पर हम बड़े भी तो बिना सोचे समझे यही सब करते हैं। कह तो अंधाधुंध अंट संट कुछ भी बकते जाते हैं नहीं तो मुंह सिल के बैठ जाते हैं कि लो कर लो, जो करना हो, हम कुछ बोलेंगे ही नहीं। दोनों ही अति के छोर है के तो उल्टा सीधा करना और नहीं तो करना ही नहीं।

कुछ ऐसे हैं जो मगते की तरह चौबीस घंटे हाथ ही फैलाए रहते हैं, उन्हें तो बस मिलना चाहिए। उन्होंने पढा ही नहीं होता कि सहज मिले सो दूध सम, मांग मिले सो पान, कह कबीर वह रक्त सम जामे खींचा तान। ऐसा तो समझदार सोचता है। वह पहले तो मांगेगा ही नहीं और यदि मांगने की नौबत आ ही गई तो अपने लिए नहीं सर्व जन हिताय मांगता है। मर जाऊ मांगू नहीं अपने तन के काज, परमारथ के कारने मोहि न आबे लाज। महामना ने सर्वजन हिताय मांगा और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय बन गया। प्रकृति तक देने में विश्वास करती है लेने में नहीं। प्रकृति हमें देती है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखें। न बाबन न, हमसे देने की नहीं, बात ही करनी है तो लेने की करो। देने के हमारे अपने नियम धरम है। देंगे तो अपनो को देंगे। अंधा बांटे रेवड़ी फिर फिर अपनो को देय। जब घुटने तक पेट को नवते हैं तो हम क्यों नहीं नवेंगे। हमें नहीं बनना सूरज और हवा कि मार सुना सुना के मारे डालते हो... सूरज हमें रोशनी देता हवा नया जीवन देती है, भूख मिटाने को हम सबकी धरती पर खेती होती है। दूजों का भी हित हो जिसमें हम कुछ ऐसा करना सीखें, हम भी तो कुछ देना सीखें। क्यों सीखें हम देना। हम तो लेने में विश्वास रखते हैं

हमें नहीं बनना वृक्ष, नदी और साधु जैसा। मार सुना सुना के आती किए देते हो कि वृक्ष कबहू नही फल भखै, नदी न संचे नीर, परमाथ के कारने साधून धरा शरीर। हां तो वृक्ष के दांत ही नहीं थे कहां से फल खा लेता, नदी पे कौन भंडार धरे थे जो जल इकठ्ठा कर लेती और साधुओं की तो पूछो ही मत, वे तो जन्मते ही ऐसे हैं। हम तो असाधु ही भले। कम से कम अपने भंडार तो भरे रहते हैं। अरे दूसरों को तो जब बांटे जब अपने से बचे, यहां तो अपने के ही लाले पड़ रहे हैं। अरे हमपे से बचेगा तो अपने बाल बच्चों के लिए नहीं भर  लेंगे। फिर सात पीढ़ियां बैठ कर खा सकें, इतना तो करना बनता ही है। हमें क्या मूरख समझ रखा है कि दोऊ हाथ उलीच उलीच कर खुद ठनठन गोपाल बन जाएं और फिर दूसरों के आगे हाथ फैलाने की नौबत आ जाएं। न बाबा न। हम तो पहले अपने घर में दीया जलाएंगे ता पीछे सोचिंगे बाहर की। ऐसे तो कबीर ही थे कि जो बीच बाजार में लुकाठी लेकर खडे हो गए और आने जाने बालो को और बुला रहे हैं कि जो घर फूंके आपनो चले हमारे साथ। खुद तो डूबे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे।

एक और हैं जो पहले तो हाथ नहीं हिलाएंगे कि अपनी पे आ गए तो एक ही दिन में सौ दिन का पानी पिला देंगे और फिर लम्बी डुबकी मार जायेंगे। इन्हें तो इतनी भी समझ नहीं कि धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा फल तो रितु पे होय। के तो हिल के नहीं देंगे कि बिना स्पीड ब्रेकर के दौड़ते ही चले जायेंगे और कहीं टीचरी में गलती से घुस गए तो साल भर के ग्यारह महीने तान के लंबी सोएंगे और इम्तिहान बिलकुल सिर पर आ गए तो दस दिन में तीन सौ पचपन दिन की कसर पूरी करेंगे। ऐसे थोड़े ही होता है। रोज पढ़ाओ थोडा थोडा तो बालकों के भेजे में भी भरे कुछ, उन्हें कुछ समझ आए, तुम तो के सौ की स्पीड में चलते हो कि बिलकुल थम जाते हो। रोज रोज करो तो काम का पहाड़ ऊंचा नहीं होगा। उसे देख के भय भी नहीं लगेगा। रोज का रोज करना आसान भी होता है।

तो भाई मत बनो कबीर, सबके बूते का होता भी नहीं कबीर जैसा हो पाना। तुम तो उनका लिखा समझ लो उतना ही बहुत है। और समझ में न भरे तो रट ही लो। मोंठ का पानी गुन नहीं करेगा तो औगुन भी नहीं करेगा। मत सोचो दूसरों के लिए, अपना तो देखो, तुम तो खुद के लिए ही सावधान नहीं हो दूसरे का क्या कर पाओगे। तो बहुत फूली फूली चर ली, अब भी चेत जाओ। रोज रोज करोगे  तभी सफलता मिलेगी। फल रितु आने पर ही आयेगा

 सो धैर्य बनाए रखो। माली सींचे सौ घड़ा फल तो रितु पर होय। धैर्य।

Thursday, August 25, 2022

हम रहें न रहें, संस्था ये रहनी चाहिए

 सफर जारी है........1037

26.08.2022

हम रहें न रहें, संस्था ये रहनी चाहिए......

 मजबूत राष्ट्र के लिए जरुरी हैं ऐसी संस्थाएँ जो राष्ट्र के लिए देशभक्त नागरिकों का निर्माण ही नहीं करती, बल्कि उन्हें स्वतंत्र चेता भी बनाती हैं। उनमें राष्ट्र भक्ति के भाव को कूट कूट कर भरती हैं। वे केवल पढ़ लिख कर शिक्षित ही नहीं होते, बल्कि संस्कारित और दीक्षित भी होते हैं। देश के लिए मर मिटने बलिदान होने का सपना केवल सैनिक ही नहीं पालते, विभिन्न संस्थाओं में कार्यरत कार्मिक भी संजोए रहते हैं। जरुरी नहीं कि सीमा पर सिर कटा कर आने या दुश्मन के सीने में दस बीस गोली मारना ही वीरता हो, मेडल पाना ही शौर्य की निशानी हो। देश से पहले संस्था जिसमें आप अपनी रोजी रोटी कमाते हैं, समाज जिसमें आपका अधिकांश समय गुजरता है, पड़ोस जिसके साथ आप की रोज की उठा बैठक होती है , घर जो आपको दिन भर की थकान के बाद विश्राम देता है, जिसके आप अनिवार्य सदस्य होते हैं, में आपकी भूमिका बहुत निर्णायक होती है।

              सच पूछें तो सारी शुरुआत घर से ही होती हैं, बोलने चालने, खाने पीने, ओढ़ने पहनने और छोटो बड़ो के साथ व्यवहार करने का सबूर तो घर से ही ग्रहण किया जाता है, अच्छी बुरी आदतों का बीज तो वहीं रोपा जाता है, मूल्य तो वहीं विकसित किए जाते हैं। जी कारे या तू तड़ाक से बोलना भी वहीं से सीखते हैं, बड़ो के साथ दुर्व्यवहार, असभ्य और अशालीन भाषा भी वहीं सीखी जाती है और स्त्री जाति के सम्मान या बात बात पर उन्हें लताड़ने, उन पर अपना पौरुष आजमाने की सीख भी वहीं से मिलती है। ये आदतें जिन्हें हम बचपना या लड़कपन या बाल हठ कह सिरे से नकार देते हैं ,जिन पर लाड प्यार  लुटाते यह बिलकुल भूल जाते हैं कि हम समाज के लिए ऐसे नासूर तैयार कर रहे हैं जो समय पाते लाइलाज हो जायेंगे।

             बिजली पानी की बचत की आदत घर से ही पड़ती है न। जिन्हें इनके प्रति असावधान होने का चस्का लग जाता है ,वे छोटी बड़ी जिस मरजी संस्था में पहुंच जाए, मरजी चाहे जिस बड़े से बड़े पद पर पहुंच जाए , जीवन भर उन्हीं आदतों का शिकार बने रहते है। एक बार अपने से बड़ो की अवज्ञा की जो आदत पड़ी, वह जिंदगी भर नहीं छूटा करती। क्रोध को नियंत्रित करना नहीं आता , उसका सही स्थान और सही तरीके से अभिव्यक्ति नहीं आती तो हर छोटी बड़ी बात पर आक्रोश ऐसे फूटता है कि सब गुड गोबर हो जाता है, इतने जोर जोर से चिल्लाते हैं कि डर के मारे सब एक कोने में छिप जाते हैं। घर परिवार से निकल संस्थाओं में सेवा देने जाते ये बाशिंदे लाज शर्म सब को ताक पर उठा कर रख देते हैं। जरा सा काम का दबाब क्या बढ़ जाए, बस फूट पड़ते हैं। धीरज तो नाम मात्र का नहीं, बस उतावले हैं कि एक ही सांस में सारी सीढ़िया चढ़ ली जाएं, और अब तो सीढ़ियों की भी जरूरत नहीं रही, लिफ्ट जो हैं जो बटन दबाते ही उन्हें निर्धारित स्थान पर ले जाती हैं। इससे उनका समय और श्रम दोनों बचता है फिर भले ही जॉगिंग और एक्सरसाइज के लिए जिम में जाने और साइकिल चलाने की कवायद क्यों न करनी पड़ जाए।

 जल्दबाजी में कुछ भी कच्चा पक्का पेट में डाल लेना या बिना भूख खूब ठूंस ठूंस के खा लेना और फिर डाक्टर की शरण लेना यानि पहले बीमारी को आमंत्रण देना और फिर उसका इलाज करने में एडी चोटी का जोर लगा देना। पहले समय से न सोना न उठना और फिर नौकरी पर जाते हड़कंप मचाना, घर भर को हिला कर रख देना। इन सिपाहियों को किस फ्रंट पर लड़ने भेजा जा सकता है जो स्वयं में ही समस्या के रुप में तैयार हो रहे हैं।

         कोई भी संस्था ईंट मिट्टी गारे सीमेंट से ही नहीं बना करती, उस पर महंगे रंग रोगन करने से ही नहीं चमका करती। उसमें काम करने वाले सद्स्यों की कर्मठता उसके  सबसे बड़े आभूषण होते हैं, सद्व्यवहार और पारस्पिक सौहार्द, नियमों का पालन, कठिन श्रम, अधिकारी के निर्देशों का यथोचित पालन , छोटे बड़ों से बोलने के यथायोग्य तरीके उस में जड़े वे नगीने होते हैं जिससे संस्था चमकती हैं। सदस्यों का भरपूर आत्मविश्वास और कार्य को सीखने की ललक उन्हें कार्य दक्ष बनाती है। और ये कार्यकुशल सदस्य संस्था के प्राण कहे जाते हैं। संस्था के कार्यो के उत्तरदायित्व को निजी भाव से ग्रहण करते ये सैनिक खुद तो ऊंचे उठते ही है, साथ ही अपनी संस्था को भी यथोचित गौरव दिलाते हैं। कार्मिक ही तो संस्था की आत्मा है। उसकी धुरी हैं, जहां वे जरा सा चूके, सब सिस्टम गड़बड़ा जाता है।

         तो बने रहें ये सैनिक मुस्तैद, लगे रहें अपने अपने कार्यों में, बढ़ते रहें प्रगति पथ पर निरंतर। व्यक्ति के सम्मान से बढ़ कर संस्था का मान होता है। व्यक्ति आते जाते हैं, पर संस्थाऐं बनी रहती हैं। घर का मुखिया अपने मान अपमान को भूल भुला घर की नींव को मज़बूत करता है, उसमें सेंध लगाती, उसकी जड़ खोदती ताकतों से बचाब में लगा रहता है और संस्था का शीर्षस्थ स्वयं को भुला बिसरा संस्था के मान की रक्षा में लग जाता है। व्यक्ति तो  आते जाते रहेंगे  पर संस्थाऐं बची रहनी चहिए, इनकी कार्य संस्कृति का क्षरण नहीं होना चाहिए, हर छोटे बड़े सदस्य को  अपने निजी स्वार्थों को परे रख इसके मान की रक्षा में लग और जुट जाना चाहिए। तो बनी रहें ये राष्ट्र भाव को पोषित करती ये संस्थाए, हम रहें न रहें।

Wednesday, August 24, 2022

सूधे का सदा भलो

 सफर जारी है...1036

26.08.2022

सूधे का सदा भलो........

कहन तो यही है कि जो मन के निर्मल होते हैं, जिनमें कोई छल कपट नहीं होता, जो सबके कार्य के लिए सामर्थ्य अनुसार प्रस्तुत रहते हैं, उन्हें दुनियां में भले से धोखा मिले, उनकी नामबरी न हो, उन्हें लोग बेवकूफ और अव्यावहारिक भले मानते रहें, उनकी खिल्ली खोचड़ी उड़ाते रहें, उन्हें लप्पू झंझन बताते रहें, उन्हे हलके में लें, उन्हे मूर्ख बना मन ही मन खुश हो लें, उनके किसी आदेश को गंभीरता से न लें, उन्हें बेमतलब आरोपित करते रहें पर ऐसों की रक्षा सदैव ईश्वर करता है, हर पल उनके साथ होता है। बड़े बूढ़े अक्सर दोहराते हैं सूधे को सदा भलो।

सीधा सादा होना ,मन का साफ होना, छल छंद से दूर होना यदि पाप होता तो तुलसी क्यो लिख जाते निर्मल मन जन सो मोहि पाबा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा। जब ईश्वर को ऐसे बंदे पसंद हैं तो हमें सात्विक भाव से ही पोषित होना चाहिए। उसे ही सच्चे मन से भजना चाहिए, उसी की उपासना करनी चाहिए, उसे ही साक्षी मानकर सारे काम करने चाहिए और सारे कामों को उसी को अर्पित कर देना चाहिए। तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा। सच में हमारा है भी क्या, जन्म उसके हाथ, जीवन उसके हाथ, मरण उसके हाथ। हम तो उस परम पिता के हाथो की कठपुतली मात्र हैं। जैसे नचाता है नाच लेते हैं। सबहिं नचावत राम गुसाईं। सुख दुःख, मान अपमान, यश अपयश सब उसी के आधीन है। वह ही तो हमें प्रेरणा देता है। हम किसी मनुष्य के गुलाम हों न हों पर राम जी के चाकर तो हैं हीं। जैसे नचाओगे, नाच लेंगे। सुख दोगे, उसे  सिर माथे लगा लेंगे और जो दुःख दोगे तो उसे भी सहना तो होगा, राजी राजी नहीं गैर राजी। आपके पास उससे बचने का कोई उपाय तो भी नहीं।

       सीधे होने के अपने नुकसान और तिर्यक होने के बहुत से लाभ भले से हों पर व्यक्ति अपनी वृत्ति तो नहीं बदल पाता। सबके लिए सहज रुप से उपलब्धता यदि अवगुण की श्रेणी में आती हो तो भले से आती रहे, पर मन में कम से कम ये बोझा तो नहीं रहता कि हमने कुछ गलत किया। जो बन पड़ा जितना बन पड़ा, सम्बाई भर खुब किया। अब अगले की आंख तर नहीं आता तो न आये करे, यहाँ कौन परवाह करता है। अरे रानी रूठेगी तो अपना सुहाग ले लेगी, इससे अधिक भला और क्या होगा। और जो होगा, उसमें निश्चित प्रभु की मरजी होगी। उसकी मरजी के बिना तो पत्ता भी नहीं हिलता। सारे बानक वैसे ही बनते जाते हैं। उन पर आपका कोई बस नहीं रहता।

       तो जो मिलना है मिले, जो छिनना हो छिन जाए। भाग्य के हेठे ही पैदा हुए तो क्या किया जा सकता है। फिर तुलसी ही ढाढस बंधाते हैं हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ। तो काहे सोच सोच के हलकान हों, जो होगा सो देखा जाएगा। वैसे सोच सोच के ही कौन से काम बने जा रहे हैं। अव्यावहारिक हैं तो हैं, राजनीति कूटनीति तो बिल्कुल नहीं आती, अब लोग ठगते रहें तो ठगते रहें। हम यहीं कह कर तसल्ली कर लेंगे कि कबीरा आप ठगाइए। दूसरों को ठगने से तो स्वयं ठगा जाना ज्यादा श्रेष्ठ है। कम से कम किसी के काम में रोड़ा तो नहीं अटकाते न। आज भले ही उनकी समझ में न भरे, किसी तीसरे के प्रभाव में आकर उल्टी सीधी हरकतें करें पर जब बोध जागेगा, बड़े पछताएंगे, उन्हें पछताना ही पड़ेगा क्योंकि उन्होंने बगल में छुरी उनके घोंपी है जो उनके शुभचिंतक और शुभेच्छु थे।

       बीतने देते हैं समय को, देखते हैं बाजी पलटती है या नहीं। जो सूधे को सदा भला इस वाक्य को पकड़ कर चले चलते हैं, उनका भला होता है या नहीं। देखते हैं ईश्वर की लीला कि वह अपने प्रण का निर्वाह करते या नहीं , उसे ढाढस बंधाते हैं या नहीं। सिखाया तो उन्होंने ही था जो रामनाम का सहारा लेते हैं, उनका  बालबांका भी नहीं होता। बस बना रहे ये विश्वास, बने रहें हम सहज और सरल, दुनियादारी सीखें न सीखें पर प्रभु में लगन लगी रहे। सब नैया ठिकाने लग जायेगी।

लालच बुरी बलाय

 सफर जारी है...1035

25.08.2022

लालच बुरी बलाय.....

कबीर का ये दोहा तो सबको रटा हुआ होगा ही….. रूखी सूखी खाय के ठंडा पानी पीब, देखि पराई चूपरी मत ललचाबे जीभ। व्यक्ति को ललचाना तो नहीं चाहिए पर क्या करें जीभ के आगे भला किसका बस चलता है। कहीं अच्छा खाना देखा तो ऐसी लपलपाती है कि बस कुछ पूछो ही मत। मुंह में पानी आ जाता है, मन अलग ललचाता है। स्वाद स्वाद में ज़्यादा खा लिया जाता है और भुगतता पेट है। जीभ तो बस स्वाद देखती है, उसे इसके परिणाम से भला क्या लेना देना।अब ये जीभ ही बस में हो जाए तो काहे को परेशानी में पड़े आदमी। इसके दो ही मुख्य काम हैं अच्छा अच्छा खाना और जो मर्ज़ी कह कबा कर झटाक सीना मुंह में घुस जाना। तभी तो इसे बाबरी कहा गया... जिव्हा ऐसी बाबरी कह गईं सुरग पताल, आप तो अंदर गई जूती खाय कपाल। अब पड़ते रहें सिर पर बेभाव के जूते, जुबान को भला क्या परवाह, वह तो मुख गुहा के अंदर मजे से घुस कर बैठ जाती है फिर चाहे जो मर्ज़ी होता रहे उसकी बला से, उसे कोई लेना देना नहीं। इस जीभ को गोस्वामी तुलसीदास ने बेचारी कहा...जिमि दसननि महूँ जीभ बेचारी. बुरे और दुष्ट लोगों के मध्य सज्जन लोगों का रहना जीभ के समान ही है ,जरा चूके तो तीखे पैने दांत चिकौटी सी काट लेते हैं। 

लालच का मुख्य कारण जीभ के साथ साथ आंख, कान, हाथ भी हैं। ये भी उतने ही दोषी हैं जितनी जीभ, जुबान या जिव्हा। आखिर हम लालची क्यों हो जाते हैं, जो है सब हमें ही क्यों चाहिए, बांट कर खाने में विश्वास क्यों नहीं करते। एक का पेट जरूरत से अधिक भरा होता है तो एक के पास दैनिक जरूरतें पूरी करने को भी नहीं जुटता। तमाम कहानियां किस्से पाठ्यक्रम में रख दिए जाते हैं कि इन्हें पढ़ते कहीं कुछ समझ विकसित होगी कि मैं मैं से छुटकारा मिलेगा, अपने साथ दूसरों का भी सोच सकेंगे। सोने के अंडे देने वाली मुर्गी की कथा सबके जेहन में ताजा होगी कि रोज एक सोने का अंडा देने वाली मुर्गी का पेट इस लालच में चीर दिया जाता है कि सारे अंडे एक साथ निकाल कर, उन्हें बेच कर एक दिन में ही अमीर बना जा सकता है और परिणाम हम सबको पता है कि क्या होता है।आखिर व्यक्ति लालच करता ही क्यों है, क्या भविष्य की असुरक्षितता उसे ऐसा करने को प्रेरित करती है कि कल को मिला नहीं मिला तो सब आज ही ले लिया जाए, बटोर लिया जाए, कई पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रख लिया जाए या हम सभी में संग्रह की मूल प्रवृत्ति होती है कि खूब सारा जमा कर लिया जाए। जो जीवन का सत्य समझ जाते हैं, वे संतोषी हो जाते हैं, जितना आवश्यक है, जितने से काम चल जाए, उतना ही लेते हैं। संतोषी सदा सुखी में विश्वास करने वाले के लिए गो धन गज धन बाजि धन धूर समान हो जाता है। वे जो पास है उसी में संतोष पा लेते हैं और इस में विश्वास रखते हैं कि जिसने चोंच दी वह चुग्गा भी देगा, जिसने पेट दिया वह भोजन भी देगा। वैसे लोग भूख से उतना नहीं मरते, जितना भरे पेट होने पर भी ठूंस ठूंस कर भरने से मरते हैं।

लालच के लाभ हानि सब जानते हुए उससे विलग नहीं हुआ जाता। यह एक दिन का काम है भी नहीं, यह तो लंबी साधना है जो वर्षो के अभ्यास से प्राप्त होती है। यह सबके बस का है भी नहीं। ये व्रत तो उनसे ही सध पाता है जो जीवन का सत्य समझ जाते हैं कि जितना मर्जी इकठ्ठा कर लो, पेट से ज्यादा खा नहीं सकते और साथ ले के कुछ जा नहीं सकते। कहते हैं सिकंदर जिंदगी भर बेशुमार दौलत इकठ्ठी करता रहा, मृत्यू से पूर्व उसने तीन इच्छाएं रखी कि मेरे शव को ले जानेंके रास्ते में सारी दौलत बिखेर दी जाय, सारे वैद्य हकीम चिकित्सक को दोनों मार्ग के दोनों ओर खड़ा कर दिया जाए और मेरे दोनो हाथ अर्थी से बाहर निकाल दिए जाए जिससे जनता देख सके कि मरजी चाहे जितना मरजी इकठ्ठा कर लो, साथ में कुछ नहीं जाता, कोई वैद्य, हकीम चिकित्सक आपको मृत्यु से बचा नहीं सकता, वे केवल बीमारी का इलाज कर सकते हैं। और सभी व्यक्ति चाहें राजा हो या फकीर, मुठ्ठी बांधे आते हैं और हाथ पसारे जाते हैं।

पर इन कथाओं को लिखने पढ़ने से ही  सब कुछ बदल जाता तो सब अब तक बदल गया होता। पढ़ने को तो ईशावास्यमिदम सर्वम, यतकिंचित जगत्याम जगत, तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृद्ध कस्यस्विधनम खूब पढा जाता जाता है, मंत्र जपा जाता हैं पर पढ़ने रटने से कोई दूसरे के धन पर लगी दृष्टि कोई कम थोड़े ही हो जाती है। इस सब के लिए तो मन की शुचिता और दृढ़ संकल्प जरुरी है। ये दोनों काम तब तक नहीं होते जब तक यह समझ न आ जाए कि लालच बुरी बला है। इसे तो वही जान सकता है जो अन्य किसी के धन को मिट्टी मानता है और पर नारी को चौथ के चंदा की तरह तज देता है, जो पर नारी लिलार गुसाई, तजो चौथ के चंद की नाई। हमारी श्रुति परंपरा, हमारे वेद, हमारी संस्कृति त्याग पूर्वक भोग की है। जितना मरजी सामने पड़ा हो, व्यक्ति अपनी आवश्यकता अनुसार ही लेता है, कल की चिन्ता में संग्रह में नहीं लग जाता। साई से उतना ही मांगता है जिसमें उसकी और परिवार की गुजर हो जाए और अतिथि भी भूखा न जाए। साई उतना दीजिए जामे कूटुंब समाय, मैं भी भूखा न रहूं साधु न भूखा जाए। हमारी मनोवृत्ति बदल रही है। हम आज का अभी का नहीं, कल और आने वाले समय का सोच कर मार संग्रह करने में जुटे हुए हैं जबकि भली भांति जानते हैं कि जिस कल की परवाह में दुबले हुए जा रहे हैं, वह कल कभी आता ही नहीं। बस जो आता है वह आज बन जाता है। और जिनके लिए इकठ्ठा करने की भूख है वे भी उसका भोग कर सकेंगे, इसकी कोई निश्चितता नहीं है क्योंकि पूत कपूत तो का धन संचय और पूत सपूत तो का धन संचय।

सो संचय संग्रह की वृत्ति से मुक्ति पाना जरुरी है, लालच बुरी बलाय याद रखना जरुरी है, त्याग पूर्वक भोग जरुरी है, साधु संत की सी त्याग वृत्ति रखना जरुरी है, सबके साथ मिलकर बांट कर खाना जरुरी है। यदि कुछ गैर जरुरी है तो वह है लालच, सीता जी को सोने के मृग की छाला नहीं चाहिए होती तो उनको रावण हर कर क्यों ले जाता। लालच सबसे पहले स्वजनों से दूर करता है, उनसे दूरी बढ़ाता है बुद्धि विवेक को हरता है , संग्रह की प्रवृति को उकसाता है, दूसरे के धन पर गिद्ध दृष्टि बनाए रखता है, आपको रसातल में ले जाता है तो बचे रहिए इस लालच से, इससे तो दूर की राम राम ही भली। सो याद रखो साथियो लालच बुरी बलाय।

Monday, August 22, 2022

ओल्ड गोल्ड बोल्ड

 सफर जारी है...1034

24.08.2022

ओल्ड गोल्ड बोल्ड.....

क्यों हमेशा बुढ़ापे को कोसते रहते हो, यह भी तो आयु का एक पड़ाव ही है फिर भले अंतिम ही क्यो न रह। बार बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी कहते कभी बचपने में खो जाते हो तो कभी किशोरावस्था को आंधी और तूफान का काल बताते हो। फिर इठलाता बलखाता यौवन आया जिसे आग अन्तर में लिए पागल ज़वानी कहा गया, ये बाल ऐसे ही सफेद नहीं हुए हैं और जीवन के अनुभवों का बांट बखरा करते प्रौढ़ावस्था का आनंद। षष्ठी पूर्ति मनाते सीनियर सिटीजन की केटेगरी में आ गए और आठ दशक पार करते करते वृद्धावस्था की ओर कदम बढ़ा दिए। जीवन के और पड़ावो का आनंद लिया और जैसे ही अंतिम चरण पर पहुंचे, अपने को बिल्कुल निष्क्रिय घोषित कर दिया। क्यों दोस्त जब सुख का समय तुम्हारा था तो इस बुढ़ापे को कहीं और थोड़े ही जाना था। कहते हैं न, बुढ़ापा कुछ नहीं, महज उम्र का एक आंकड़ा है।

अभिवादन शीलस्य नित्य व्रद्धोपसेविन, चतवारि तस्य वरधनते आयु विद्या यशो बलम याद करते वृद्धों की सेवा ही याद रह गई क्या कि अरे हमने तो बहुत कर लिया, अब क्या करते ही रहेंगे। अब तो बस बाल बच्चों से सेवा लेने का समय है। शिथिल होती इंद्रियां मन की दास हो गई। कछु मियां बाबरे कछु पी लई भंग को चरितार्थ करने लगे। अब हमसे कुछ नहीं होता, बहुत कर लिया, क्या करते ही रहेंगे। अब हमारा आराम करने और सेवा कराने का समय है। और किस दिन के लिए बाल बच्चे पाल पोस कर बड़े किए थे, सेवा करना तो उनका धर्म है, बार बार श्रवन कुमार का पाठ इसीलिए तो पढ़ाया था कि जैसे उसने अपने अंधे माता पिता को बंहगी/कांवर में बिठा कर तीर्थ यात्रा कराई, ऐसे ही हमारे बालक करें। अरे जब ईश्वर ने तुम्हें अभी तक स्वस्थ बनाए रखा है, आंखें हाथ पैर दुरुस्त है तो भले मानुष ये इच्छा पाल बैठना और उसे रोज रोज रेखांकित करना जरुरी है क्या। जब तक अपने हाथ पैरों को चलाते रहोगे, स्वस्थ बने रहोगे और जो मन ने ही ठान लिया कि हम तो बड़े बूढ़े हो गए हैं, अब हमसे कुछ नहीं होगा, बस अब तो यही चिन्ता लगी रहती है बुढ़ापा कैसे कटेगा। सच बताएं तो ये मानसिकता और दुर्बल सोच ही आदमी को ही बूढ़ा बनाता है।

जीवेम शरद शतम का आशीर्वाद पाते तो खूब हरसाते हो और ईश्वर जब उतनी उम्र देता है तो फिर हाय हाय चिल्लाते हो कि अब कैसे होएगी। हाथ पैर चलते रहें, कम से कम अपने से संबंधित काम खुद करते रहे और संभव हो तो अगले के भी चार काम निबटा दें, हाथ पैरों की सामर्थ्य चुक गई हो तो मुंह से बोल बतिया कर, अपने अनुभवों के आधार पर सलाह मशविरा दे लें बशर्ते कोई मांगे। कहीं खुद से देने बैठ गए तो याद रखिएगा वही हाल होगा जो सुंदर घोंसला बनाने वाली बया का हुआ था। सीख दीजे बाय जाहे सीख सुहाए, सीख न दीजे बानरा बया का घर जाए। तो जिन किस्से कहानियों को जीवन भर सुनते सुनाते पढ़ते पढ़ाते रहे, उन्हें याद करने का सही समय तो यही है। जीवन का सारा सत्व तो इसी काल में है, अनुभवों का निचोड़ यहीं है, परिपक्वता संतुलन यहीं है, गांभीर्य और कार्य कुशलता यहीं है। अब तक तो खेलते खाते, भोग करते, इधर से उधर भटकते, मटरगस्ती करते, परिवार पालते, कमाई करते समय बीत गया। बचपन खेल में खोया, ज़वानी नींद में सोया, बुढ़ापा देख के रोया इसीलिए तो कहा गया। क्यों रोये भाई बुढ़ापे को देखकर, पूरी जिंदगी फूली फूली चरते रहे, मेरा मेरा करते रहे, मैं और मेरा में उलझे रहे, बस जब सब तुम्हारा था तो बचा कुचा भी तुम्हारा हैं। उसे शान से जीओ। जो भी जैसा भी है, अपना ही किया धरा है, दूसरों की सेवा में ही लगे रहे, कभी अपने शरीर की परवाह नहीं की तो बैठ कर भुगतो अब। सबसे बडा सुख निरोगी काया पढ़ा तो था पर उसे व्यवहार में कब ला पाए। अंट संट खाते रहे, ऊलजलूल बकते रहे, न भोजन में व्यवस्थित रह पाए न भजन में, न व्यावहारिकता सीखी न स्वास्थ्य  के नियमों का पालन कर पाए। बस तब तो धा पा के काम निबटाने की पड़ी रहती, भूखे प्यासे या समय बेसमय कुछ भी ठूंस लिया जाता। अब भुगतो, अरे मशीनरी की देखभाल भी तो उतनी ही ज़रूरी थी जितने और काम। उसे समय समय पर तेल पानी देना धूप दिखाना था न, पर या तो धकापेल लगे रहे या बिलकुल आराम फरमाते रहे, शरीर को जंग लग गई, हाथ पैरों के जोड़ जाम हो गए तो हाय हाय चिल्लाते हो। इंद्रियों के शिथिल होते ये सब तो होगा ही, उसे स्वीकार पूर्वक ग्रहण कर लो तो ज़्यादा अच्छा है।

और जो  वृद्धाश्रमो की बढ़ती संख्या से चिंतित हो तो उसे भी भूल जाओ, ज़वानी भर कमाया , कुछ तो बुढापे के लिए भी जोड़ा होगा तो उससे अपना संतोष पूर्वक जीवन बिताओ, जैसी टूटी फूटी झोंपड़ी है, जैसा रूखा सूखा अपने पास है उसमें मस्त रहो। अब खाने पीने और स्वास्थ्य पर पैनी निगाह रखो। बालकों को तो खूब समर्थ बना दिया, अब उनकी चिन्ता में मत घुलो, वे तुम्हारी चिन्ता करने लायक हुए। सबके भले के लिए ईश्वर से प्रार्थना करो, लोकमंगल की कामना करो पर न किसी के व्यक्तिगत जीवन में दखलंदाजी करो और न अपने में करने दो। मन करे साथ रहो, ज्यादा चकल्ल्स हो तो अपने अपने में सिमट जाओ। न किसी पर बोझा बनो न किसी को अपने ऊपर लदने दो। बुढ़ापे को रोते झींकते ही नहीं काटा जाता, उसे सुखद भी बनाया सकता है। बस दूसरों से अपेक्षाएं कम करनी होती हैं, जहां तक संभव हो अपना काम स्वयं करने की आदत डाल लेनी चाहिए। ये परनिर्भरता बहुत परेशान करती है स्वयं को भी और दूसरों को भी। अपने अकेले के बल पर इतनी दूरी तक नाव खींच लाए, अब तो बिलकुल मंजिल के नजदीक हैं सो धैर्य बनाए रखो, ये भी पार लग ही जाएगी। बस हाय तौबा मत मचाओ कि कैसे होगा, सब होगा अच्छे से होगा।

देखो जिसे झींकाने की आदत है वह तीस चालीस की उम्र में ही अपने को बीता मान लेता है शरीर से कम मन से दुर्बल अधिक होता है। जो समय दिन रात काम कर भविष्य बनाने का है उसे यूं ही ये कह कर बरबाद कर देता है कि बस अब मेरा समय आ गया, अरे तुम कब से चित्रगुप्त बन गए जो अपनी मृत्यू की तिथि की भविष्यवाणी करने लग पड़े, यह काम तो यमराजा को सौंपा गया है। ये तुम्हारे चाहने न चाहने से नहीं होगा,जब समय पूरा हो जाएगा तो न चाह कर भी जाना पड़ेगा। इसे हम मानुष तय नहीं करते। ये हमारा काम है भी नहीं। हमारा काम तो बस इतना है कि जितना जीवन मिला है, जितनी सांसें मिली हैं उन्हें ठीक तरह से जी लें। रोज रोज कहने से कोई मरा तो नहीं करता, हां, वातावरण को बोझिल नकारात्मक और अपने मन को कमजोर जरूर कर लेता है। तो इस तरह के प्रलाप जीवन के किसी भी पड़ाव पर उचित नहीं, जीवन जैसा भी है उसे सुख पूर्वक जीना मन को प्रफुल्लित रखता है। सो ओल्ड इज गोल्ड के साथ ओल्ड इज बोल्ड को भी जीवन में समाहित कर लीजिए, जिंदगी चैन से बीतेगी।

Sunday, August 21, 2022

नौ दिन चले अढ़ाई कोस

 सफर जारी है...1033

23.08.2022

नौ दिन चले अढ़ाई कोस......

बिन्हेें नाय इंच भर सरकनो, नेकऊ नाय हिलनो अपने ठीया ते, अब नाय हिलनो तो नाय हिलनो साब, तुम कह कह के भले ही से आंती हे जाओ, बिनकी बला ते।पर बिनपे नेकऊ फरक नाय परि रयो। वे बैठे हैं कारो कम्बर ओढ़ के, मुंह हाथ सब ढाप के , कोई बिन्हे देख ना लेय।सारे कामचोर एक लंग ते पंगत में बैठे हैं, कछु काम की कहो तो ऐसे मिचमिचाएगे कि जाने कहा कटाह परि रई है, ऐसो मोड़ो सिकोड़ लिंगे कि जने का आफत आ गई है। सबरे एक ही थैली के चट्टा बट्टा हैं, तबही तो एक खोल में सिमटे बैठे हैं । सूप बोले तो बोले ,अब तो छलनी ऊ ही खूब बकर बकर करो करे, हां हां बा ही छलनी की बात कर रए हैं जामे बहत्तर छेद होय करें। एक ते कहो काम की तो सबरे एक संग से किल्लाबिंगे.... हम पे तो पहरे से ही निरे काम हैं, बिन्हेे करबो ही भारी पर रयो है और जे दो मन को बोझा और डाल दयो। चो भईया काम नाय करोगे तो का तुम्हें बिठा के पूजिंगे, आरती उतारंगे। हां नई तो, जब देखो तब अनक टोटी बात करिंगे।

काम करवे को ई तो आबत हों जां, बाही के धेला पइसा मिलते  तो काम करो तो करो नाय तो खूब घर बैठो आराम ते। कोई नाय कर रयो खुशामद। नखरा तो ऐसे दिखाएंगे कि हमारो निजी काम कर रए दीखें। अपनो कछु नाय करवा रए। नौकरी कर रए हो तो खूब करोगे, करनो पड़ेगो, बिना करे काऊ की नाय निठ रई, राजी राजी करो के गैर राजी करो।जायज़ बात  पे हू रायतो सो फैलात रैत हैं। अरे एक आध दिना की होय तो सबर हू कर लयो जाय, छूट हू दे दई जाए, नरमी बरत लई जाए। रोज रोज की को सुनेगो, कौन पे टाइम धरो है। सब काम बारे ई हते। इत्तो सारो काम बिखरो परो है बाय समेटे कि रोज रोज इन बाबरेन ने ई समझायो करें, इनते अटकबे में निरो टैम खराब हे जाबे। गुस्सा तो बहुत आबे पर छोटे बारे को खयाल कर चुप लगा जाबे। जो कहत नाय क्षमा बड़ेन को चहिए छोटन कू उत्पात। तो भईया छोटे बारे तो उत्पात ई मचाएंगे, तुम बनो बड़े , बिनकी गलती पर परदा डालत रयो। सो हम पे नाय होएगी साब, हम पे ना डालो जायगो परदा हमें तो सांच सांच सबरी बात कहबे की बीमारी है। हमपे सामने बारे ए धोखे में रखबो नाय आबे , हमाए तो खाबे और दिखाबे के दांत एक ई हते।गलती करोगे तो खूब ताल ठोक के कही जायेगी, अब तुम सबन ने बुरी लगे तो लगबो करे।

       अरे तो समझा समझा के आती हे गए, इनके भेजे में ई नाय बैठ  रई। सौ पोत कह दई होएगी कि लल्लू, लाली ध्यान ते काम करो करें, काम के बखत सबरो दिमाग काम में ई राखो। उधर उधर की बात मत सुनो। तिहायो ही काम बिगड़ेगो, हमें काय, हम कोई रोज रोज कहबे कू बैठे ई थोड़े रहिंगे। ए हम तो मर मरा  मुल्तान जानगे । हम कौन अमर मूल खाके आए हैं सो तुम्हें बैठ के समझात ई रिंगे। हम पे निरे काम डरे हैं, बिन्हेँ सिमटाबे के तुम से मगज खप्पी करें। जे रोज रोज की चिखचिख हमें पसंद नाय। करो तो करो नाय तो अपनो रस्तो देखो। बहुतेरे मिल जांगे। जैसो करोगे वैसो भरोगे। 

       हां नई तो, जब देखो तो कोई ना कोई बहानो ले के  बैठ जाएंगे कि आज जे हे गयो आज वो हे गयो। काम ते बचिबे कू कोई न कोई मूडो लगानो सिद्ध। बहुत चर लई हरी हरी, अब सूखी हू नाय मिल रई। काऊ धोखा में मत रहियो।  गुमान में फूले फूले डोल रए दीखो, खूब हवा भर रई दीखे, एक पिन चुबोबे की देर है, सब फुस्स है जाएगो गुब्बारो ।फिर तो रायतो अच्छी तरियां फैलेगो, हाल सिमट में नाय आ रयो ,समझ में भरी कि नाय कछु।

भौत है गई, ऊपर तक भर पाए, पानी सिर पे आ गयो,अब नाय चुप रहो जा रयो। के तो सीधी तरियां लेन पे आ जाओ नाय तो अब नाय पिल रई तिहाई। अपनी पे आ गए तो सब अक्क्ल ठिकाने ते लग जाएगी। भौत सियाहू सियाहु कर के देख लई  पर तुम नौ दिना में अढ़ाई कोस हू नाय चल पाए तो अब तुम पड़ो अगार पे और हम पीछे ही ठाढे हैं, देखे तो कितकू बच के जाओगे। अब खुल गए स्कूल, बालकन को एडमिशन वेडमीसन सब है हा गयो, अब लग जाओ पढ़ाबे ते। ऐसी  तरियां पढ़इयो कि सब समझ आ जाबे। तुम तो सबरे खूब काम करतो, तब ही तो जा स्कूल को खूब नाम हेबे। सो सुनी, अब दिक मत करियो बिलकुल। हमें डाटबे को कोई शौक नाने। सब मिल के काम करिंगे, सो ई झट सीना है जायगो। भली, अब काहू ए मौका मत दीयों कि सुननी पड़े नौ दिन चले अढ़ाई कोस। भली।

Saturday, August 20, 2022

एक बालक प्यासा था

 सफ़र जारी है....1032

22.08.2022

एक  बालक प्यासा था...

प्यासा कौआ की कहानी तो सबने बचपन में पड़ी ही होगी। सबको याद भी होगी। कविता में कहें तो एक कौआ प्यासा था, घड़े में थोडा पानी था, कौए ने देखे कंकड़, घड़े में डाले कंकड़, पानी आया ऊपर, कौए ने पीया पानी, प्यास की मर गई नानी। कौए की प्यास की नानी तो मर गई यानि उसकी प्यास तो बुझ गई पर इसी तर्ज पर जब एक छोटे बच्चे ने बहुत प्यास लगने और प्यास के मारे गला सूखने पर साफ पानी से लबालब भरी एक साफ सुथरी गगरी /मटकी से एक गिलास पानी क्या पी लिया, तूफान मच गया। गगरी निकली  हेडमास्टर की, जिसे बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं था कि कोई उनकी पानी की गगरी को हाथ भी लगाए और यहां तो गगरी को छूने वाला एक निम्न जाति का था। कहां तो मटकी छूना ही अपराध था और बालक की हिम्मत तो देखो उसने जाति और पद से उच्च मास्टर जी हेड मास्टर जी की मटकी से पानी पी लिया। राम राम राम, बेचारे मास्टरजी जी का तो धर्म ही भ्रष्ट हो गया। उन्हें क्रोध आना स्वाभाविक था। कक्षा में समानता का पाठ पढ़ाना अलग बात है और उसे व्यवहार और आचरण में लाना बिल्कुल दूसरी। 

अब सब तो कैलाश सत्यार्थी नहीं होते न कि दलित महिलाओं द्वारा बनाए गए भोजन को स्वयं खा ले, फिर भले ही उन्हें जाति से बहिष्कृत किया जाय,शुद्धि के लिए हरिद्वार भेजा जाए या एक कमरे में अलग अछूत की तरह रख दिया जाए। कैलाश जी को यह सब स्वीकार नहीं था तो उन्होंने प्रण ले लिया कि तुम मुझे जाति से क्या बहिष्कृत करोगे, मैं ही जाति छोड़ देता हूं और शर्मा सरनेम छोड़ कर सत्यार्थी बन गये। पर हेडमास्टर जी का विजन उतना बडा नहीं था। उन्हें क्रोध आया, बालक को कनपटी पर डेढ़ सीना दो तमाचे लगाएं और अपना हिसाब बराबर कर लिया। बालक वह चोट और अपमान बर्दाश्त नहीं कर पाया और भगवान को प्यारा हो गया। कुछ दिन तक यह खबर सोशल मीडिया पर वायरल हुई, लोगों के ध्यान का विषय बनी, कुछ चर्चाएं गरम हुई और फिर सब समतल हो गया। बात आई गई हो गई।लोग भूलभाल गए।अभी श्रावस्ती में आठ अगस्त को २५०रुपए फीस बकाया जमा न करने पर छात्र को इतनी बुरी तरह पीटा गया कि उसकी जान ही चली गई।

        हम इतने असंवेदनशील क्यों हो गए हैं कि ये घटनाएं हम शिक्षकों को तनिक भी प्रभावित नहीं करती। किस शिक्षा नीति में लिखा है कि अध्यापक और विद्यार्थी के संबंध इतने असहिष्णु होते हैं कि विद्यार्थी को दंडित करने के नाम पर उसकी जान ही ले लें। बालक को सुधारने के साम दाम दण्ड भेद नीति जरूर बताई गई पर केवल दंड की ही प्रधानता नहीं रही और शारीरिक दण्ड को तो बिल्कुल ही प्रतिबंधित कर दिया गया फिर ये सब कैसे घटित हो गया। लिखा तो बहुत कुछ नियमों उपनियमों में भी रहता है पर उस सबके पालन न करने पर कौन सा विधान सक्रिय होता है। दरअसल हम सब इतने आक्रोश में भरे रहते हैं कि जरा मन का सा नहीं हुआ कि मुख से गालियों की बौछार निकलती है, सात पुश्ते कोसी जाती हैं, जो हाथ पड़ गया उसी से धुन और कूट दिया जाता है और कोई अस्त्र शस्त्र न मिले तो थप्पड़ तमाचे घूंसे लात को आजमा लिया जाता है। ये सब उतना सामान्य हो गया है कि पीड़ित इसके लिए कानूनी कार्यवाही तो छोड़ो, सगे संबंधियों को भी नहीं बताता। और बता भी दे तो कौन निपटारा हो जाता है। जब न्यायाधीश ही इसमें ये फैसला दे देता है कि दांपत्य संबंधों के बिखराव पर बेड रूम के अंदर तो पुलिस नहीं बिठा सकता तो व्यक्ति या तो सहता है और जो पानी सिर से ऊपर हो जाए तो मुक्ति पा लेता है । और कभी कभी ये मुक्ति जीवन मुक्ति में बदल जाती है।

        और जो हो सो हो पर जो बच्चे बड़ी आस से पढ़ने के लिए, अपने शिक्षित जीवन की शुरुआत के लिए विद्यालय आते हैं, उनके साथ हम मास्टर मास्टरनियो का ये क्रूर तम व्यवहार बिल्कुल निंदनीय और दंडनीय है। प्रेमचंद की कहानी ठाकुर का कुआं और सियाराम शरण गुप्त की कविता  देवी के प्रसाद का फूल पढ़ते लगता था कि ये सब रचनाकार की कल्पना होती होगी पर आज जब हम इक्कीसवीं सदी में हैं और बाल अधिकारों के बड़े बड़े नारे लगाते हैं, ऐसे समय घटती ये घटनाएं दिल को दहला देती हैं, सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। दोषी की नौकरी से निकाल देना फौरी समाधान भले ही हो पर ये इसका स्थाई हल तो कम से कम नहीं है। ऐसे रक्तबीज अध्यापकों की बढ़ती फौज की जड़ में मठा डाल देना ज़रूरी है। ऐसों की नियुक्ति जिस स्तर से भी होती हो, वहां कुछ गंभीर चूक अवश्य है। उसे समय रहते सुधारना जरुरी है। एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति का हाथ तक तब तक नहीं थमाया जाता जक तक कि उसकी पूरी जन्म कुंडली न पता कर ली जावे तो ऐसे अध्यापकों के हाथों बच्चो का भविष्य कैसे सौंपा जा सकता है जिनमें मानवियता ही शेष न हो। इन घटनाओं के संदर्भ तलाशे जाने बहुत जरुरी हैं। जो अपना घर नहीं संभाल पाते उन्हें संस्था की जिम्मेदारी भला कैसे दी जा सकती है। तो समय रहते चेतना जरुरी है नहीं तो बच्चों के सुरक्षित भविष्य की गारंटी नहीं दी जा सकती।

निखालिस सच, न बाबा न

 सफर जारी है.......1031

21.08.2022 

निखालिस सच, न बाबा न.........

पहले तो रटा और सौ बार लिखाया गया कि सदा सत्य बोलो, सत्य यानि सोलह आने सच। हमेशा न्याय का साथ दो। न गलत करो न गलत सहो। गलती से भी गलती हो जाए तो उसे तुरंत सुधारो, क्षमा मांगो और उसे दोहराने सी तोबा कर लो। बड़ी अच्छी अच्छी बातें पढ़ाई और सिखाई गईं लेकिन इन सब बड़ी बड़ी और अच्छी बातों को जब व्यवहार में लाना शुरू किया, तो मार हंगामा मच गया। फिर एक ओर पाठ पढ़ाया गया, सिद्धांत दूसरों के लिए हैं, अपनो के दायरे में आने वालो के लिए छूट का प्रावधान है। वहीं निखालीस सच बोलना बिलकुल मना है। ढेर सारी विवशताएं हैं कभी घर की गिरासू दीवार को बनाएं रखना होता है तो कभी ढहती छत को खुद बल्ली बन थामे रहना होता है। जानते सब भले हों पर कहना मना होता है। ये विवशताएं आपके घर के बाहरी ढपान को भले बचाए रखती हों पर आपके आत्म सम्मान को बुरी तरह तोड़ कर रख देती हैं। दूसरों की निगाह में भले आप महान बने रहते हों पर अपनी ही नजरों में आप गिर जाते हैं,अपने आप से नजरें नहीं मिला पाते।

     इतिहास गवाह है भीष्म पितामह कौरवों का सच जानते थे पर उनका नमक खा रहे थे, अपनी प्रतिज्ञा से बंधे थे तो भरी सभा में द्रौपदी का चीर हरण चुपचाप देखते रहे, भले ही दुख और पश्चाताप ने उनकी आंखें नीची कर दी हों पर उनके मुख से एक शब्द नहीं फूटा। उनमें इतना नैतिक बल शेष ही नहीं बचा था कि दुशासन को एक वस्त्रा द्रौपदी को खींच कर लाने और उसका चीर हरण करने से रोक सकें। लाज तो उस सभा में बैठे हर व्यक्ति को अवश्य आई होगी पर क्या करते, सबकी अपनी अपनी विवशताएं थीं। धृतराष्ट्र पुत्रमोह में अंधे न होते तो क्या सुयोधन सुयोधन नहीं बना रहता , धृतराष्ट्र तो दृष्टिहीन थे पर गांधारी ने तो जान बूझ कर अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली तब सुर्योधन के भविष्य के विषय में शकुनि की एंट्री उस घर में आवश्यक थी, सुयोधन को पढा लिखा कर उसके कान भरने, उसे दुर्योधन बनाने की जिम्मेदारी शकुनि को लेना लाजिमी था, आखिर तो मामा था उसका, भांजे के विषय में वह नहीं सोचता तो भला और कौन था। पुत्र मोह में अंधे धृतराष्ट्र कभी शकुनि से कड़ाई से मना नहीं कर सके क्योंकि मन ही मन तो उनकी इच्छा भी यही थी कि भले ही दुर्योधन गद्दी के लिए अपात्र हो पर सिंहासन उसे ही मिले। अपनी अक्षमताओं को वे पुत्र के माध्यम से सक्षमता में बदल देने का स्वप्न संजोए बैठे थे। दृष्टि हीनताके कारण उनके स्थान पर पांडु को गद्दी पर बैठा दिया पर उनका पुत्र तो आंखों वाला था भले ही दूरदृष्टि न रखता हो तो उसे गद्दी मिलनी ही मिलनी चाहिए, फिर भले ही उसके लिए सही गलत कोई भी जुगाड क्यों न भिड़ानी पड़े, कुछ भी सही गलत क्यों न करना पड़े, सब जायज़ है क्योंकि प्रेम और युद्ध में तो सब जायज़ ही होता है, नाजायज और अनुचित की कोई गुंजायस ही नहीं होती।

     विवशता नहीं होती तो आज भी सच कहने से व्यक्ति कन्नी क्यों काटता और किसी मजबूरी में उसे कहना ही पड़ जाता तो उसे युद्धिष्ठर की तरह अश्वात्मा हतो नरो वा कुंजरो कहता और वा कुंजरो के शब्द कृष्ण के पांचजन्य शंख की ध्वनि में डूब जाते। कितनी सरलता से सत्य की रक्षा भी हो जाती और द्रोणाचार्य नाम का कांटा भी रास्ते से सहजता से हट जाता। आज भी तो यही सब किया जा रहा है अपने कहे जाने वालों की रक्षा के लिए बात को ऐसे घुमा फिरा कर कह दिया जाता है कि सांप मरे न लाठी टूटे। बडा क्षोभ होता है कि हम कैसे समाज में रह रहे हैं जहां सच को सच कहना अपराध की श्रेणी में गिना जाता है, अपनो के घेरे में आने वाले को एक अपना ही सरे आम नंगा करता है, असम्मान जनक शब्दावली का प्रयोग करता है, असभ्यता और दुर्व्यवहार की सारी सीमाएं लांघ जाता है और हम बेबस से खडे देखते ही नहीं रह जाते बल्कि गलत को भी सही ठहराने की भरसक कोशिश करते हैं। भले ही अंदर अंदर सब जानते हों कि स्थिति आउट आव कंट्रोल है, कुछ नहीं किया जा सकता, बस यह कह कर पल्लू झाड़ा जा सकता है कि हमने तो बहुतेरी कही, बहुत समझाया बुझाया पर क्या करें मानता ही नहीं तो क्या किया जा सकता है। सच में ही कुछ नहीं किया जा सकता। सबको अपने किए कर्मों का फल स्वयं भुगतना होता है, दूसरा उसे चाहकर भी शेयर नहीं कर सकता, पर अपनों को अपनी आंखों के सामने तिल तिल टूटते देखना, उसको दुख दर्द झेलते देखना विवशता ही तो होती है। भले ही भाग्य में जो लिखा है भोगना ही होगा ,कह कर हम अपने मन को तसल्ली बंधाते रहें।

     सच को पढ़ सीख रट लेना और उसे व्यवहार में लाने के बीच इतनी महीन रेखा होती है कि अक्सर उसका उल्लंघन हो जाता है। निखालिश सोलह आने सच कहने का अब रिवाज नहीं रहा, हरिश्चंद्र की सत्यवादिता कटघरे में है, उस पर प्रश्नचिह्न लग गया है, सत्यम ब्रूयात प्रियम ब्रूयात में न ब्रूयात अप्रिय सत्य हावी है। जो सच कह दो तो लोग कैसी नज़र से देखने लगते हैं कि खुद को ग्लानि होने लगती है कि हाय राम ये क्या कह दिया, सीधा सीधा नहीं कहना था बल्कि सच तो कहना ही नहीं था और बहुत जरुरी था तो थोड़ा मक्खन मलाई लगाकर घुमा फिरा कर कहना था । पर अब क्या करें आदत में जो नहीं है तो उसका खामियाजा तो भोगना हर बार भोगना ही पड़ता है।तो घुमा फिरा के सच कहने की आदत डालो, निखालिस सोलह आने शत प्रतिशत सत्य कहने के जमाने लद गए, अब तो पूरे सिस्टम में ही भांग घुली हुई है तो इसका पार्ट बन जाओ नहीं तो किसी कोने में अकेले पड़े भुनभुनाते रहो। विकल्प आपको चुनना है, मरजी आपकी है जो चाहे चुनो।

कान्हा जन्म सुन आई

 सफ़र जारी है.....1030

20.08.2022

 कान्हा जन्म सुन आई.... 

घर घर लडडू गोपाल विराजे हैं, उनके श्रंगार की तैयारी पूरी है। हर बालक कान्हा का भेष धरने को आतुर है। स्कूलों में बालक बालिकाएं  कृष्ण राधा के रुप में सजे धजे सबको लुभा रहे हैं। आपस में बतिया रहे हैं वे....अरे कृष्ण बनना तो बहुत आसान है बस सिर पर मोर मुकुट धर लो, होठों पर बांसुरी रख हाथ से पकड़ लो, थोड़े तिरछे खडे हो जाओ, आंखों में बडा बडा कजरा लगा लो, मुस्कराते रहो, थोड़ा नटखट पन दिखा दो, मुख पर माखन मल लो, गोपियों की मटकी तोड़ दो, ग्वाल बालों के संग गेंद तड़ी खेल लो, जमुना में गेंद फैंक दो, फिर जमुना में कूद जाओ, काली नाग को नाथो, उसके सहस्त्र फन पर  ता था थैया करो, गईया चराओ, दूसरों के घर से माखन चुरा के खाओ, मां ऊखल से बांधे तो यमलार्जुन को मुक्ति दिला दो, पूतना वेश बदल कर आए तो स्तन पान कर उसके प्राण पखेरू उड़ा दो, उसे मुक्ति दे दो, कुब्जा का कूबड़ सीधा कर दो, ठुमक ठुमक नाच दो छोटी छोटी गइया छोटे छोटे ग्वाल, छोटो सो मेरो मदन गुपाल। सुदामा जैसे गरीब को दोस्त बना लो फिर उस दोस्ती को राजा बनकर अमीर बन कर निभा दो, बन गए कृष्ण। और क्या करना होता है कृष्ण बनने के लिए। राधा को तो बस सजना होता है, सुन्दर सी चुनरी ओढ़नी होती है, घाघरा चोली पहनना होता है, कृष्ण के साथ खड़ा होना होता है, बस बन गए झट से राधा।

        बच्चे इतना ही सोच समझ सकते हैं, इनकी बाल बुद्धि में इतनी ही बात समा सकती है। जन्माष्टमी है तो घरऔर मंदिरों में कृष्ण के जीवन की झांकियां सजेंगी, खूब सारे फल मिठाइयां खाने को मिलेंगी, रात बारह बजे कान्हा जी का जन्म होगा, टन टन घंटी बजाकर आरती होगी, धनिए की पंजीरी और चरणामृत का प्रसाद मिलेगा और बस मन गई जन्माष्टमी। कमोबेश जन्माष्टमी का यही अर्थ लिया जाता है। हम भी बचपन से यही सब देखते सुनते करते आ रहे हैं। खीरे को चीर उसमें सालिग्राम रख देना और फिर रात बारह बजे उन्हें सालिग्राम को दूध दही शहद बूरे से रगड़ कर नहलाना और मंदिर में सजे संवारे लडडू गोपाल के झूले में रख देना, झोटे दे देकर झुलाना, और प्रसाद पाना। दिन भर कृष्ण की बाल लीलाओं को मंचित होते देखना और भी सुखद अहसास देता। कितना मनमोहक लगते हैं कान्हा तभी तो उनके ढेरो ढेरो नाम हैं कन्हैया, मदन गोपाल, नटखट, सांवरा, सांबलिया, लाला,वासुदेव,जशोदानंदन, देवकी सुत और भी बहुत कुछ।

        पर कान्हा होना क्या इतना आसान है। मां देवकी के गर्भ में भी नहीं आए तभी आकाशवाणी हो गई कि हे कंस जिस बहन को तू इतने प्यार से विदा कर रहा है, उसी की आठवीं संतान द्वारा मारा जाएगा।आकाशवाणी ने सारा परिदृश्य ही बदल कर रख दिया। कंस तो केवल आठवीं संतान को ही मारता पर ऐसे पाप का घड़ा भला कैसे भरता तो नारद ने कान भर दिए कि एक से लेकर आठ में तो कोई भी संतान आठवीं हो सकती है तो संदेह की गुंजायस ही क्यों छोड़ी जाए, खतरा क्यों मोल लिया जाय तो कंस ने देवकी वसुदेव को कारागार में डाल दिया गया, उनकी सात संतानों को क्रूर मामा कंस ने पत्थर की शिला पर पटक पटक कर मार दिया। भादों की अंधेरी रात जब कान्हा जन्मे तो कारागार के ताले अपने आप टूट गए, पहरेदार गहरी निद्रा में सो गए , वसुदेव नवजात को सूप में रखकर निकले तो जमुना जी कान्हा के चरण चूमने को बेताब हो उठी, मेघ लगातार बरसते रहे, गोकुल में जशोदा की बगल में कान्हा को लिटा और कन्या को लेकर मथुरा लौटे उस पल तक सृष्टि थम गई। शिशु के रोने की आवाज सुनकर कंस को सूचित किया गया, ये आठवीं संतान थी तो कंस का भय चरम पर था। जैसे ही उसे पत्थर पर पटकने जा रहा था कंस, वह बालिका योगमाया उस दुष्ट के हाथ से छिटक गई और कंस को चेतावनी दे डाली कि तुझे मारने वाला तो पैदा हो चुका है कंस। कंस को काटो तो खून नहीं। आसपास के गांवों मे ढिंढोरा पिटवा दिया, सभी नवजात को खोजने और मारने के लिए पूतना भेजी गई, कृष्ण ने स्तन पान करते उसके प्राण हर लिए और उसे गति दे दी। जितने भी राक्षस भेजे गए, सबको मार दिया, जो जग का रखवाला है उसे भला कौन मार सकता है। ग्वाल बालों के साथ गैया चराते रहे, उनके साथ धमा चौकड़ी मचाते रहे, गेंद तड़ी खेलते गेंद को जानबूझकर जमुना में फेंक दिया, वह जमुना जिसका जल कालिया के प्रभाव से पीने लायक नहीं रहा, गेंद फैंकना और उसे लेने जाना तो बहाना था, सहस्त्र फन वाले कालिया नाग को नाथना जरुरी था माखन चोरी के ब्याज से सभी का दिल चुरा लिया, कर के रुप में सारा दूध दही मथुरा चला जाता था, उसे अपने हमजोली बालकों को बांटा, सदियों से चली आ रही इंद्र की पूजा बंद करवा कर गिरिराज की पूजा शुरू करवाई और जब कुपित इंद्र ने सात दिन तक लगातार मूसलाधार बारिश का जोर दिखाया तो ग्वाल बालों के साथ मिलकर कन्नी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया, कछु माखन को बल बढ़ो कछु गोपिन करी सहाय, श्री राधे जू की कृपा से गोबरधन लियो उठाय।

        वे कृष्ण हैं कृष्ण, मां जशोदा को मान देते हैं तो जन्मदात्री देवकी को सभी कष्टों को मुक्त कर देते हैं। कंस का बध कर नाना उग्रसेन को राज गद्दी पर बैठा देते है। शिक्षा दीक्षा के लिए सांदीपन गुरु के पास जाते हैं तो अन्य बालकों की तरह साधारण बन कर ही रहते हैं, गुरुमाता के आदेश पर जंगल से लकड़ी चुन कर लाते है, सुदामा उनके हिस्से के भुने चने खा लेते हैं तो उसकी शिकायत नहीं करते पर सुदामा के द्वारिका पहुंचने पर हाथों धरती छोड़, आंसुओं से उनके पैर धोते.. पानी परात को हाथ छुओ नहीं नैनन के जल सो पग धोए, गले लगाते मित्रता निभाते उपालंभ जरूर दे देते हैं पहले चना गुरुमात दए तुम चाब लए, हमें नहीं दीने और आज भी भाभी के भेजे स्नेहिल तंडुल की पोटरी को बगल में छिपा लिए हो, चोरी की बान में हो जो प्रबीने। तीन मुठ्ठी तंदुल के ब्याज से तीनों लोक की संपदा देते हैं पर सुदामा को पता भी नहीं चलने देते।

            उनके जीवन का हर प्रसंग बांध लेता है फिर चाहे महाभारत के युद्ध में अर्जुन के सारथी बनते गीता का ज्ञान हो या सखा भाव से द्रोपदी के चीर को बढ़ाना जिसे खींचते खींचते दुर्योधन पस्त हो जाता है पर उसे साड़ी का ओर छोर नहीं मिलता। कितनी कितनी कथाएं हैं, प्रसंग हैं, संदर्भ हैं उनकी भक्त वत्सलता के। उन्हें बस भाव से भजना होता है, श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेव। वे तो खिंचे चले आते हैं, सब दुख हर लेते हैं, बस उनके नाम की रट भर लग जाए। है कृष्ण हे मुरारी हमारी रक्षा करो, हमें अपनी शरण में लो, हम आपके आसरे हैं। प्रभु तुम तो अवतार लेते हो। आज अजन्मे का जन्म दिन है। माखन मिश्री का भोग लगेगा, हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की, कान्हा जन्म सुन आई, जशोदा तुम्हें ढेरो बधाई।

नलिनी तू कुम्हलानी

 सफर जारी है....1029

19.08.2022

 नलिनी तू कुम्हलानी.......

 हम सभी मानुष में परमात्मा का अंश है। उसके साथ अंश अंशी का संबंध है। तभी तो कहा जाता है मोको कहां ढूंढे बंदे मैं तो तेरे पास में। हिरण कस्तूरी की सुगंध के लिए भटकता डोलता है जबकि गंध का स्रोत वह स्वयं है। कस्तूरी कुंडल बसै मृग ढूंढे वन माहि, ऐसे घट घट राम हैं दुनिया देखे नाही। कबीर तो अपनी जान लिख लिख कर समझाते ही रहे ज्यों पुहुपन में वास है, ज्यों तिल माहि तेल है ज्यों चकमक में आग, तेरा साई तुज्झ में जागि सके तो जाग। पर हम कब जाग पाए। हम ईश को बाहर ही बाहर खोजते रहे।। उसे बहरा समझते रहे तभी इतनी जोर जोर से अजान देते रहे, उसे पुकारते रहे, कर माला जपते रहे, राम राम कहते रहे..... माला तो कर में फिरे जीभ फिरे मुख माहि, मनुआ तो चहुं दिश फिरे यह तो सिमरिन नाहि या कांकर पत्थर जोड़ के मस्जिद लई बनाए, ता चढ़ मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय।

 जो करना चाहिए ,उसे छोड़ बाकी सब कर लेते हैं। पत्थर को पूज लेंगे पर उसी पत्थर से बनी चाकी का ध्यान बिलकुल नहीं आता जिससे अनाज पीस कर रोज पेट भरा जाता है। घर की चाकी कोई न पूजे जाको पीस खाय संसार या पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजू पहाड़। कबीर को पढ़ते लगता है उन्होंने समझाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, दोहे सबद साखी रचते रहे और हम मूढ़ बने उन दोहों को पढ़ पढ़ कर अगली कक्षा में चढ़ते रहे या कुछ को सुनाने के लिए याद भर कर लिया। जप, छापा ,तिलक ,मूड मुड़ाना में ही उलझे रहे, उससे आगे बढ़ ही नहीं पाये। हमें समझाया तो गया कि मूड मुड़ाए हरि मिले सब कोई लेय मुड़ाए, बार बार के मूडते भेड़ न बैकुंठ जाए। फल साग सब्जियों के स्थान पर जीवों को खाना शुरू कर दिया। अरे जरा ठहर कर सोचते तो कि बकरी पाती खात है बाकी काड़ी खाल, जे नर बकरी खात हैं तिनको कौन हवाल। पढा तो सब लेकिन उसे हृदयंगम करने का ध्यान ही नहीं आया, नदी में गोते लगा लगा कर नहाते भले रहे पर चिकने घड़े की माफिक एक बूंद पानी अपने ऊपर ठहरने नहीं दिया। बस मूड के मूड ही बने रहे। भजन गाते गुनगुनाते तो रहे कि मानव तू क्यों उदास है, जल में रहकर भी मछली को प्यास है। हमें आत्म बोध नहीं हो पाया कि खुशी प्रसन्नता हर्ष जिसे हम वस्तुओं और व्यक्तियों में खोजते हैं, उसका स्रोत तो हमारे अन्दर ही है, आनंद स्रोत बह रहा तू क्यों उदास है, अचरज है जल में रहकर भी मछली को प्यास है। जो हमारे अंदर है, जिसमें हमें हर पल आकंठ डूबे रहना चाहिए, उसे हम दुनिया में खोज रहे हैं। कबीर झकझोरे बिना कहां मानते हैं काहे री नलिनी तू कुम्हलानी, तेरे ही नाल सरोवर पानी। बस यही चूक हम सब बार बार करते हैं कि कभी अपने को नहीं टटोलते। मुख से राम राम रटे भी तो बगल में छुरी रखते हैं जिसे मौका पाते ही दूसरे की पीठ में घोंप देते हैं।

 सब जानते हैं शरीर नश्वर है, उसे एक न एक दिन नष्ट होना ही है। गीता के श्लोक खूब झूम झूम के सुनाते हैं वासांसि जीर्णानि यथा विहाय और नैनम छिनदंति शस्त्राणि नैनम दहति पावक, न चैनम क्लेदांति  आपो न शोष्यति मारूत पर इसे व्यवहार में कब ला पाते हैं। स्वजन प्रियजन के शरीर छोड़ते कैसे बुक्का फाड़ फाड़ कर छाती पीट पीट कर रोते कलपते हैं जबकि सब जानते हैं हम सब की एक दिन यही गति होनी है, सबको जाना ही जाना है। आया है सो जायेगा राजा रंक फकीर, एक सिंहासन चढ़ चले एक बंधे जंजीर। बस कैसे जाते हैं, ये प्रमुख है। जितना मरजी बैंक में जीरो बढ़ते रहें, हजार लाख दस लाख करोड़ होते रहें, मर्जी जितना महल दुमहल बना लो, ऊंची ऊंची कोठियां बना लो, सब यहीं छूट जाना है, कुछ भी साथ नहीं जाता, ये जो मंहगे मंहगे कपडे पहने हो, उसकी तो छोड़ो, कफन भी उतार कर डोम रख लेता है। बिलकुल खाली वैसे ही जाते हो जैसे इस दुनियां में आए थे। मुठ्ठी बांधे आया था तू हाथ पसारे जाएगा, हे मन मूरख मानव यहां से कुछ नहीं ले जाएगा।बस आने और जाने के बीच जीवन के सारे सुख सारे आनंद ले लो और समझ में भर जाए तो अपने राम को प्रभु को भज लो। बस वही एक सांचा है। दाता एक राम भिखारी सारी दुनिया।

          तो मार दुखी होने, परेशान होने, इधर से उधर भागने से,पैसा धैला खर्च कर देने से स्थाई खुशी नहीं मिला करती । सुख का आनंद का ,शान्ति का जो अजस्त्र स्रोत अपने अंदर बह रहा है, उसमें डूबना है। जब आनंद की चाबी मिल गई तो नलिनी तू क्यों कुम्हलाए जा रही है तेरी ही नाल सरोवर पानी है। आनंद स्रोत बह रहा तू क्यों उदास है, आश्चर्य है जल में रह कर भी मछली को प्यास है। तो नलिनी जी कुम्हलाना बंद करो, खूब हंसी खुशी रहो। जीवन पानी का बुलबुला है पता नहीं कब फूट जाए। पानी केरा बुदबुदा यही मानस की जात, देखत ही छिप जाएंगे जो तारे परभात।

Wednesday, August 17, 2022

चले चलते हैं

 सफर जारी है....1028

18.08.2022

चले चलते हैं........

किसी भी नए रास्ते को चुनते, उस पर पहला कदम रखते  हिचक होती है, संकोच होता है, मन में ढेरों ऊहापोह होते हैं कि इस रास्ते चल भी पायेंगे या नहीं। साथ के अलग डराते हैं आसान नहीं है वहां तक जाना, सब छठी का दूध याद आ जाएगा, दादी नानी सब याद आ जायेंगे, इतनी लंबी यात्रा हलुआ का गप्पा समझ रखी है क्या जो ऐसे ही पूरी हो जाएगी। दिन में ही चंदा तारे नहीं दिखने लगे तो हमसे कहना। अरे भाई शर्त लगा हो इस रास्ते पे कदम कदम पर खतरे ही खतरे हैं, अच्छे अच्छों के छक्के छूट जाए, और ये चली हैं महारानी इतिहास रचना, न कद की न काठी की, न रूप की न रंग की, कोई गॉड फादर नहीं, सिर पर सिफारिशी हाथ नहीं और चुना रास्ता जो मार जोखिमों से भरा है, कदम कदम पर मार डांट फटकार और दंशनाएं हैं। बहुत साहस चाहिए इस सबको झेलने के लिए, अच्छों अच्छों की छुट्टी हो जाती है और ये निकली है झंडा गाड़ने, देख लेना दो दिन में चित्त हो जाएंगी, बैक टू पवेलियन लौटना होगा।

सच में साथियों ने इतना इतना डरा दिया है कि मन एक बारगी कच्चा हो जाता है,बार बार लगता है हाय दैया, इतना लम्बा रास्ता कैसे पार होगा, न जाने कैसी पथरीली कंकरीली सड़क होगी, धूप ताप से बचने को छाता है नहीं, पैरों में जूते तो छोड़ो, चप्पल का भी बूता नहीं, बिल्कुल अकेले, साथ कानी चिरैया भी नहीं और जाना है दूर बहुत दूर। दूर नगरी बड़ी दूर नगरी, कैसे आऊं रे कन्हैया तेरी गोकुल नगरी।साथ के कह देते हैं अरे तो चुना ही क्यों ऐसा लक्ष्य, सबसे अनौते बने ही क्यों। सब जैसे बने रहते और ठाठ से खूब खर्राटे मार के सोते, आराम से खाते पीते जिंदगी गुजरती, ढेरों दोस्त होते, सबसे मिलते जुलते, खूब आनंद की कटती। अब आ बैल मुझे मार की आदत पाल ली, तो भुगतो बैठ के। दिमाग में कीड़ा घुसा के बैठे हो, इल्लत पालने का शौक़ है तो भुगतो। रोज एक नई औगार लेके बैठ जाती हो तो कोई कहां तक बीच बिचाब करे। खुद बोया तो खुद काटो। अच्छा बनने का भूत भी तुम पे ही सवार था। सबसे अलग चलोगी तो भुगतो। पर कुछ मन के से साथी हमेशा हौसला बढ़ाते रहते हैं, दुनिया की मत सुनो, ये तो टांग खींचेगे ही, हर काम में टंगड़ी मारेंगे ही, उत्साह भंग करेंगे ही,जो तुम आगे बढ़ गए तो वे पीछे नहीं रह जाएंगे । तो अपने साथ मिलाए रखने के सारे उपाय करेंगे और जो तुम फिर भी आगे बढ़ गए तो मार आलोचना करेंगे। अरे जब लक्ष्य तुमने तय किया, मंजिल तुमने चुनी तो रास्ते भी तुम्हें ही पार करने होंगे। उत्साह को साहस को बनाएं रखना होगा। पढा है न महापुरुषों को कि वे चले तो अकेले थे लेकिन लोग जुड़ते चले गए और कारवां बनता चला गया। दशरथ पुत्र राम को जब वनवास हुआ, वन में सीता का अपहरण हो गया तो कौन सा सैन्य बल था उनके पास, अपने बुद्धि विवेक से उन्होंने बन्दर,भालू, रीछ वन्य जीवों के सहयोग से सेना तैयार की, समुद्र पर सेतु बनाया, रावण से युद्ध किया और अपनी भार्या को वापिस लेकर लौटे। बालगोपाल कृष्ण ने काली नाग नाथा, राक्षसो का संहार किया, अत्याचारी कंस का बध कर उग्रसेन को गद्दी पर बिठाया। महात्मा बुद्ध जब घर से निकले तो उनके साथ भीड नहीं थी लेकिन जब उन्होंने स्वयं को स्थापित कर लिलिया तब उनके अनेक अनुयाई बन गए। तो अकेले आगे आना होता है, हिम्मत जुटानी होती है,  साहस बटोरना होता है, मनोबल बनाए रखना होता है, लक्ष्य की तरफ अर्जुन सी दृष्टि रखनी होती है, लगातार बिना रुके बिना थके चलना होता है, टांग खींचने वालों और आलोचना चुगली करने वालों की उपेक्षा करनी होती है, तब जाकर कदम आगे बढ़ते हैं और जो इन सभी में उलझे रह जाओ कि फलाना ये कह रहा था, ढिकाना ये कह रहा था तो बढ़ चुके आगे, मिल गईं मंजिल। लोग तो कहते ही रहते हैं। कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना, छोड़ो संसार की बातों को कहीं बीत न जाए रैना। फिजूल की बातों में रैना ही तो बात जाती है और आप ठनठन गोलाल बने रह जाते हैं, लप्पू झननन कहलाते हैं। तो काम तुम्हारा, सपने तुम्हारे तो उसे तुम पूरा करोगे। सच तो यह है कि जो सपने देखते हैं और संकल्प और साहस से उसे पूरा करने की सामर्थ्य रखते हैं, वे मंजिल तक अवश्य पहुंचते हैं, अपने लक्ष्य को अवश्य प्राप्त करते हैं।

बाल अधिकार कार्यकर्ता, नोबेल शान्ति पुरस्कार समेत कई अन्य अन्य पुरस्कारों से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी को पढ़ते हुए लगा कि सपने अपनी आंखों में होने चाहिए, सपने आपका पीछा तब तक नहीं छोड़ते जब तक आप उन्हें पूरा न कर लें। जो लगन लग जाए तो सब सध जाता है। जब उनके संकल्पो को जाति स्वीकार नहीं करती तो वे जाति को ही छोड़ देते हैं और शर्मा सरनेम छोड़ सत्यार्थी बन जाते हैं। स्कूली शिक्षा प्रारंभ करते जूते सिलते बच्चे का चेहरा उनकी आंखों में ऐसा चस्पा हो जाता है कि वे बाल मजदूरी के खिलाफ आंदोलन खड़ा कर देते हैं, मीलों यात्रा करते वसुधैव कुटुंबकम् की धारणा को साकार कर देते हैं। इसी यात्रा में सहयोगी सुमेधा को जीवन संगिनी के रूप में पाते हैं और एक और मिलकर दो नहीं, ग्यारह हो जाते हैं। उनके स्वाट संकल्पना में जीवन का सूत्र छिपा है। एस यानि स्ट्रेंथ अपनी क्षमताओं, योग्यताओं और शक्तियों को जानना, डब्ल्यू यानि वीकनेस, अपनी कमाजोरियों को पहचानना, ओ यानि अपॉर्चिनिटी अवसर की तलाश और टी याने थ्रैट्स, खतरों की पहचानना, उनका सामना करना, उनसे घबरा कर कार्य को बीच में नहीं छोड़ देना। जो इस सूत्र को अपना लेते हैं, वे जीवन में कैलाश सत्यार्थी बन जाते हैं, सत्य पर चलने की ताकत रखते हैं, इसलिए सत्यार्थी कहे जाते हैं, नोबेल पीस पुरस्कार को राष्ट्रपति को राष्ट्र के लिए भेंट करते नहीं चूकते और सहज भाव से कह देते हैं मेरा मुझ में कुछ नहीं जो कुछ है सब तौर, तेरा तुझको सौंप के क्या लागे है मोर। वे अपने संकल्प साहस के बल पर अकेले 

ही इतिहास रच देते हैं। जीवन में आगे बढ़ना हो तो ऐसे महापुरुषों की जीवनी पढा जाना बहुत जरुरी है फिर चाहे वे विवेकानंद हों, तिलक हों या राष्ट्रपति अब्दुल कलाम हों।       उन्हे पढ़ना हमारे मनोबल को बढ़ाता है, शक्ति देता है कि जब वे कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं।

तो चले चलो, चलते रहो, एकला चलो और चरैवति चरैवति दोहराते रहो, मंजिल मिल ही जाएगी एक दिन

लोग लुगाई

 सफ़र जारी है....1027

17.08.2022

 लोग लुगाई.........

 चलो आज एक किस्सा सुनावे। बीच बीच में हूंकरा देते रहियो के पतो चलतो रए कि खर्राटे मार के सो रए हो कि और हम धकापेल बोले ई चले जा रए हैं।एक जे भरतार हते जैसे ई कछु बताबो शुरू करो, हां हूं करते हाल खर्राटे लेन लग जाएंगे और जो तुम चुप है जाओ तो जब उठिंगे के नींद बीद बिछुट जाएगी सोई किंगे का कह रई तुम, हां तो फिर का भयो, भयो तिहाओ सिर,  हम का बेवकूफ हैं कि ऐसे ही बके जा रए हैं। नाय सुननी तो मत सुनो। काऊ और ए सुना लिंगे। तुमई नाय रए अनोते जो तुमसे सिर मारबो करें। अब बताओ जे कोई बात भई कि एक की तो कहानी खत्म होबे पे आई और सुनबैया जे पूछ रयो है का कह रई तुम। कह रए भाड़। हां नई तो।

 हां तो तुम सुनो लल्लू, एक लोग लुगाई हते। लुगाई हती नेक तेज सो लोग ए अक्ल सिखाती रेती। अब कछु दिना तो लोग चुप रहयो कि कोऊ बात नाने, जे तो कहत रैत है, कह कबा के आपही चुप हे जाएगी। को मूड मारे जाते। बैयर बानी ऐसी ई होत हैं, इनकी बात पे का ध्यान देनो।मईया ई तो कहो कत्ती बाबन ते। सो लोग चुप लगा जातो।पर एक दिना तो हद्द है गई साब। लुगाई ने नेक ज्यादा लगाम कस दई ,कछु ज्यादा ही रिस हती तो करारी करारी दो चार बात सुना दई। लोग कू लग गईं बुरी सो द्वारी में खटिया डाल के पर गयो चुप्प, चद्दर से मोह ढाक लयो। काम बाम पे ना गयो ।अब लुगाई कैसे करे। बोलचाल बंद हती सो कैसे कहती। अब ज्यादा ई देर हे गई तो बाकी खटिया के लंग ई चक्कर काटे, कभू अंदर जाबे कभू बहार और कहे ...लोग गए लाई कू लोग चो न जाय। लाई कैत हैं रवी की फसल की कटाई कू। सो सबरे गांव के लोग चल दए अपने अपने काम पे और जे लोग रूठो मटको सो रिस है के परो है। और काम पे न जाएगो तो खायो का जाएगो। सो जा कड़ी खाए बजमाये ए कैसे हू उठानो तो परेगो ही परेगो। सो बार बार एक ही बात कहबे कि लोग गए लाई को लोग चो न जाए। सो रिसिया के लोग बोलो.... 

....लोग गए खाए के लोग का खाय। लुगाई रोटी पानी बना के  निच्चू हती पर बोलचाल बंद है तो कैसे कहे सीधी सीधी कि आ जाओ खानो परसो धरो है, खा लेयो ।सो सुनाके बोली ....छींके ऊपर पई धरी है खाय चो न जाए। मतबल हमने तो बना के छींके पे धर दई है, ले ओ और खाओ और काम पे जाओ। दलिद्री सो चद्दर से मोड़ो ढापे परो है कि जा की खुशामद करो, लाट साहब तब खांगे। अब दोनों की रिस तो कम हेती जा रई सो लोग बोलो ...जो बोला चाली है ही गई तो दे ई चो न जाए । जब बोल चाल शुरू हे गई, मेल मिलाप है गयो तो तू ही चो न दे देती। सो फिर दोनो लोग लुगाई ने मिल के रोटी खाई, लोग चलो गयो काम पे और लुगाई लग गईं चौका बासन निपटाने में। है गयो किस्सा खतम। अब अपने अपने घर कू जाओ ,के जई बैठे हमाए प्रान पीओगे का।

दांपत्य जीवन में नोंक झोंक चलती रहती है, एक कह लेता है दूसरा सुन लेता है और कभी दूसरा गुस्से में होता है तो पहला चुप्पी साध लेता है। बस ये नोंकझोंक बनी  रहे, सिर फुटबल्ल का रुप न ले कि दो पाट हो जाएं। यही जीवन है और ऐसे ही चलता है ।कभी एक शेर होता है तो कभी दूसरा बिल्ली, जब जिसका जैसा दांव पड़ लग जाए। तो चलते रहो, कहते सुनते रहो पर साथ बने रहो, जिंदगी ऐसे ही चलती है।

हो गए पूरमपट्ट पिचहत्तर

 सफर जारी है......1026

16.08.2022

हो गए पूरमपट्ट पिचहत्तर......

जी हां ,देश को आजाद हुए हो गए पिचहत्तर वर्ष तभी तो देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। उन वीरों को नमन करने, उन्हें याद करने, उनसे प्रेरणा लेने का अवसर है जिन्होंने देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिया। कलम आज उनकी जय बोल। कुछ सिपाही देश की सीमा पर लड़ रहे थे तो कुछ कलम के सिपाही ओज भरे गीत लिखकर देशवासियों में उत्साह का संचार कर रहे थे। सोए हुओं को जगा रहे थे। सबकी भूमिका तय थी। छोटे छोटे बालक नन्हा मुन्ना राही हूं देश का सिपाही हूं बोलो मेरे संग जयहिंद जयहिंद गा रहे थे। युवा आग अंतर में लिए पागल जवानी के प्रतीक थे। कितने कितने शीश कटे, कितनों ने बलिदान दिए, तब जाकर लम्बे समय बाद आजादी मिली। वंदे मातरम और भारतमाता के जयघोष से भारत गूंज उठा। हम आजाद हो गए, हमारी प्रसन्नता का पारावार न था। मार मगन हुए जा रहे थे। बाल कृष्ण शर्मा नवीन लिख रहे थे कोटि कोटि कंठों से निकली आज यही स्वर धारा है, भारतवर्ष हमारा है यह हिंदुस्तान हमारा है।

भारत कोई स्थान का टुकड़ा नहीं है, यह वह भाव है जिसके लिए लिखा गया भारत नहीं सस्थान का वाचक गुण विषेष नर का है, एक देश का नहीं शील यह भूमंडल भर का है, जहां कहीं एकता अखंडित जहां प्रेम का स्वर है, देश देश में वहीं खड़ा भारत जीवित भासवर है, निखिल विश्व की l भारत को नमन करूं मैं, तुझको या तेरे नदीश गिरिवर को नमन करूं मैं, किसको नमन करूं मैं भारत किसको नमन करूं मैं।मैथलीशरण गुप्त लिख रहे थे जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है , वह नर नहीं नर पशु निरा और मृतक के समान है। जननी और जन्मभूमि को स्वर्ग से भी बढ़कर दर्जा दिया गया। समझाया बताया गया कि जिस देश में तुमने जन्म लिया है, उसके प्रति तुम्हारे कुछ कर्तव्य हैं, इनका पालन करना तुम्हारा धर्म है। जिसकी रज में लोट लोट कर बढे हुए हैं, घुटनों के बल सरक सरक कर बड़े हुए हैं, उस भूमि के लिए अपने कर्तव्य तो याद रखें। ध्रुववासी जो हिम में तम में जी लेता नित हांफ हांफ कर, रखता है अनुराग अलौकिक वह भी अपनी मातृभूमि पर। देश के लिए जीओ देश के लिए मरो। गलत मत कदम उठाओ, सोच कर चलो, विचार कर चलो राह की मुसीबतों को पार कर चलो।

न जाने कितने कितने गीत हैं, कहानी हैं, किस्से हैं जिन्हें रेखांकित किया जाना जरुरी है, याद किया जाना जरुरी है। देश की आजादी पिचहत्रवा वर्ष मना रही है। पिचहत्तर वर्ष का इतिहास दोहराते यह भी याद रखना है कि हम बहुत सौभाग्यशाली हैं जिन्हें अमृत वर्ष उत्सव मनाने का सौभाग्य मिला। हमारी पीढ़ी को तो सब कुछ हस्तामलक हो गया, उसके लिए कुछ सहना और करना नहीं पड़ा, गुलआमी कका दर्द नहीं सहा हमने, नंगे वदन लाठियां नहीं झेली हमने, जेलों में हमें नहीं ठूंसा गया। हमें लगता है ये आजादी हमें घर बैठे मिल गई है तभी इसकी कदर नहीं जानते। धन्य है हमारे स्वतंत्रता सेनानी जिन्होंने सब सहा, उफ तक नहीं की, वंदे मातरम गाते भारत माता की जय बोलते फांसी के फंदे पर झूल गए। कर चले हम विदा जा वतन साथिया, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों।

जो वतन हमारे हवाले किया गया, उसके प्रति हमने क्या भूमिका निभाई। अरे हमें कौन सीमा पर लड़ने के लिए कहा जा रहा था। हमें तो बस अपने अपने हिस्से के कामों को लगन, धैर्य, निष्ठा से करना भर था, पर हम तो छल द्वंद में फंस कर रह गए, इसकी उसकी चुगली चकोरी आलोचना में लग गए, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाते अपने को दादा मानने लगे। सच न बोलने की तो जैसे हमने कसम खा ली। दूसरे की बहिन बेटी का सम्मान करना तो दूर की बात रही, अपनी ही जन्मदात्री का मान नहीं रख पाए। एक बार सोचे विचारे अवश्य कि हम अपनी अपनी भूमिका में कहां तक सफल हुए हैं।

आजादी अमृत महोत्सव मनाते हम स्वयं को चुस्त दुरुस्त कर लें, अपने कर्तव्यों को सजगता से निभा ले जाएं, जो पढ़ें उसे आचरण में ढाल लें तो हमारा महोत्सव मनाना सार्थक हो सकेगा। जय भारत, जय भारती।

भारत की है शान तिरंगा

 सफर जारी है...1025

15.08.2022

भारत की है शान तिरंगा......

आजादी के अमृत महोत्सव पर हर घर तिरंगा के उद्घोष ने पूरे देश के साथ साथ आभासी जगत को भी तिरंगा कर दिया है। लोगों ने बड़े चाब से तिरंगे के साथ अपनी फोटो चस्पा कर ली है। घर, इमारत, कार्यालय, विद्यालय, सरकारी, गैर सरकारी संस्थाएं तिरंगे से ओतप्रोत हैं। जगह जगह जुलूस, नुक्कड़ सभाएं और देशभक्ति गीतों का आयोजन हो रहा है। स्वतंत्रता दिवस के दो दिन पूर्व से उत्साह का जो माहौल तैयार हुआ है, वह देखते ही बनता है। भारत की है शान तिरंगा तभी तो आज घर घर तिरंगा फहर रहा है। उन देश भक्तो, सेनानियों और कलमकारों को याद करने का दौर जारी है जिन्होंने अपनी कलम से ओज के गीत रचकर जन जन में वीरता का संचार किया, जो सोए हुए थे, उन्हें झकझोर कर जगाया।

 झंडा केवल एक निश्चित आकार प्रकार का रंगीन कपड़े का टुकड़ा भर नहीं, यह हमारे देश की अस्मिता का प्रतीक है। इसे फहराते हम गौरव से भर उठते हैं। विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। इसकी शान न जाने पाए, चाहे जान भले ही जाए, विश्व विजय करके दिख लाएं, तब होवे प्रण पूर्ण हमारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। ये झंडा ऊंचा बना रहे, लहर लहर लहराता रहे, इसके लिए न जाने कितने वीरों ने अपनी जान गंवा दी, मातृभूमि पर बलिदान हो गए, खुद नंगे वदन लाठियां खा ली पर झंडे को धरती पर नहीं गिरने दिया। लहर लहर लहराए, भारत की शान तिरंगा है। हमें तिरंगा थमा दिया गया, इसकी रक्षा का वचन हमें निभाना है। जिस शौक और उत्साह के साथ इसे लहराया है, पन्द्रह अगस्त के बाद उतने ही सम्मान से इसे उतार कर तहा कर रख देना है। प्रधानमंत्री ने घर घर तिरंगा लहराने का जो जज्बा हममें भरा है, वह केवल तीन दिनों के लिए नहीं है। ये तीन दिन तो प्रतीकात्मक हैं। इसकी रक्षा का, इसके रंगों को धुंधला न पड़ने का संकल्प हम सब का साझा संकल्प है। जितने उत्साह से इसे हमने हर छोटे बड़े स्थान पर लहराया है, उसे उतने ही सम्मान से उतार कर रखने का दायित्व भी जन जन का है।

 केसरिया वीरता के भाव को पुष्ट करता है,सफेद शान्ति और हरा समृद्धि और खुशहाली को। ये तीन रंग हमारे जीवन का ओजस है और चौबीस अरियों वाला चक्र हमें लगातार चलने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। ये तिरंगा हम सबके मन की शक्ति है जिसे बार बार परमात्मा से मांगा जाता है हमको मन की शक्ति देना हे दयानिदे, दूसरो से पहले हम अपनी जय करें या इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमजोर हो ना, हम चले नेक रस्ते पर हमसे भूल कर भी कोई भूल हो न। झंडे का सम्मान हमारे देश का सम्मान है। झंडे को फहराते हम जन गण मन गाते हैं, सावधान की मुद्रा में खडे हो जाते हैं, उसे सम्मान से सेल्यूट करते हैं, कोई वीर जवान सीमा पर लड़ते लड़ते शहीद हो जाता है तो उसका शव इसी तिरंगे में लिपट कर आता है। प्रभात फेरी और जुलूस में इसी झंडे को लेकर चलते हैं। हमारी पहचान है तिरंगा। भूखंड को जीतते तो झंडा गाड़ते ही हैं पर अपने सद्व्यवहार और सतत कार्यशीलता से भी सामने वाले के मन में अपना झंडा गाड़ आते हैं। जीते हों किसी ने देश तो क्या हमने तो दिलों को जीता है, जहां राम अभी तक हैं नर में, नारी में अभी तक सीता है। इतने पावन है लोग यहां मैं नित नित शीश झुकाता हूं, भारत का रहने वाला हूं, भारत की बात बताता हूं, है प्रीत जहां की रीत सदा।

 इस झंडे के सम्मान में कितने कितने गीत लिखे गए, वह सब तो हमें कंठस्थ होने ही चाहिए, राष्ट्रीय पर्वों पर उन्हें बार बार गाया गुनगुना जाना चाहिए, इससे भी हम बूस्ट अप होते हैं ।न होते तो अभी तक नन्हें मुन्ने क्यों सपना पाले रहते... नन्हा मुन्ना राही हूं देश का सिपाही हूं बोलो मेरे संग जय हिंद जय हिंद जय हिंद। बड़ा होके देश का सिपाही बनूंगा, दुनिया की आंखों का तारा बनूंगा, आगे ही आगे बढ़ाऊंगा कदम।, मंजिल से पहले न लूंगा कहीं दम। गाते गाते देश के लिए कुछ करने का उत्साह जगता है। हिंद देश का प्यारा झंडा आगे सदा रहेगा, ये घर घर लहरेगा। क्योंकि हम इसे जान से भी अधिक प्यार करते हैं तभी तो गाते हैं इसकी शान न जाने पाए चाहे जान भले ही जाए, विश्व विजय करके दिखलाएं, तब होवे प्रण पूर्ण हमारा। वसुधा को कुटुम्ब मानने का भाव जो पैदा हो जाए तो दुनिया के झगड़े न निबट जाएं पर कैसे निबटेंगे ये झगड़े अभी तक तो परिवार ही कुटुम्ब में तब्दील नहीं हो पाए।

 बना और बचा रहे झंडे का सम्मान, इसे लहराते हम गर्वित और गौरवान्वित होते रहें, इसके मान की रक्षा में अपना सर्वस्व अर्पित कर दें। हिमालय से शिक्षा लें खड़ा हिमालय बता रहा है डरो न आंधी पानी से, खडे रहो तुम अविचल होकर हर संकट तूफानी में। व्योम की विशालता अपने अंदर लाएं और धरती से सहनशील हो सकें। पृथ्वी कहती धैर्य न छोड़ो कितना भी हो सिर पर भार, नभ कहता है फैलो इतना ढक लो तुम सारा संसार। सूरज से रोशनी बांटना सीखें, हवा से नया जीवन देना, औरों का भी हित हों जिसमें हम कुछ ऐसा करना सीखें, हम भी तो कुछ देना सीखें। देने का भाव सीखना बहुत जरुरी है, अभी तो सामने वाले को यथायोग्य सम्मान भी नहीं दे पाते, और क्या दे पाएंगे भला। तो बचा रहे ये गौरव, बना रहे ये भाव, करते रहे मातृ भूमि का वंदन, वंदे मातरम से गूंजता रहे गगन, फहराता रहे हमारा तिरंगा और हम गाते रहें लहर लहर लहराए भारत की शान तिरंगा । मान तिरंगा शान तिरंगा, भारत की पहचान तिरंगा, हम सबकी है जान तिरंगा।

रे मन, काहे को हुआ

 सफर जारी है..... 1024

14.08.2022

रे मन, काहे को हुआ......

हमाए ब्रज की हर बात निराली , खाने पीने के इतने शौकीन कि त्योहार वार व्रत उपवास और पर्व विशेष के ब्याज से मीठा खाने के बहाने तलाश ही लेते हैं । बस त्योहार का नाम भर हो, पकवान तो बनना ही बनना है। पकवान का एक विषेष मीनू तय है यानी पूरी कचौरी रसेदार और सूखी सब्जी रायता दही बूरा खीर तो मस्ट है बाकी जितने मर्जी व्यंजन बनाओ तिहाई मज्ज़ी। मीठे के इतने चींटे कि सावन भादों के लिए कहाबत ही गढ़ ली सावन खाई न खीर, भादों खाए न पुआ, रे, मन काहे को हुआ। सावन में मेहमान बूरा खाने विषेष रुप से बुलाए जाते हैं कि तीज से नैहर आईं बहन बेटी राखी पर फिर अपने घर विदा हो जाती है। नई ब्याहता के सासरे से तो बाकायदा सोहगी यानी साज श्रंगार की पोटली आती है और मेहमान की दही बूरा से खूब खातिरदारी होती है सावन में खीर का शगुन न हो और भादों में गर्मागर्म पुए न खाये जाए तो जीवन बिलकुल निरर्थक हो जाता है।

जब कभी बहुत नखरे दिखाकर रूठे बादल अहसान दिखाते थोड़े से बरस लिए, दो चार छींटे पड़ गए तो उसे ही सावन मान लेना मजबूरी थी। अरे मूसलाधार की औकात नहीं थी तो लगातार रिमझिम ही होती रहती, कम से कम सावन का अहसास तो होता रहता। पर ना जी, बादलों का इससे क्या मतलब, वे तो लदे खड़े रहेंगे, मार उमस मचाए रहेंगे पर बरसेंगे नहीं, यूं ही ललचा ललचा कर चले जाते हैं। भूरे काले बादलों को देखकर गुनगुनाते भले रहो कि कालो बादर जी डरपाबे, भूरो बादर पानी लाबे पर इन बादरन पर कोई असर नाने। निरे ढीठ के दीठ है। खूब खुशामद सी करते रहो, कविता दोहराते रहो कि अम्मा जरा देख तो ऊपर चले आ रहे हैं बादल, गरज रहे हैं बरस रहे हैं दीख रहा है जल ही जल, हवा चल रही क्या पुरवाई भीग रही डाली डाली, ऊपर काली घटा घिरी है नीचे फैली हरियाली, भीग रहे हैं खेत बाग बन भीग रहे हैं घर आंगन, बाहर जाऊ मैं भी भीगू चाह रहा है मेरा मन। पर मन के चाहने भर से भला किया होता है। बादलों के मन में भी तो दया भाव होना चाहिए। पर वे तो ऐंठ के मारे पैठ को जा रहे हैं। सावन पूरा सूखा बीत गया, अब तो बरसो महाराज। भादों लग गई, गरजो गड़गड़ाओ तो कम से कम गाज तो बांध लें। हां हां वही गाज जिसके लिए कहा जाता है ऐसी क्या गाज पड़ गई तेरे ऊपर या ऐसी गाज पड़ी है फलाने पर कि क्या बताएं। बादल फटना, बिजली गिरना अच्छे मानसून के लक्षण हैं। अब गाज बंधेगी तभी तो दस दिन बाद खोली जाएगी। भादों की गरजती बरसती रात और उसमें बिजली की कड़कड़ , घर के पुरुष बाहर बास हों तो उनकी रखा कुशल के लिए कलाई में बहन बेटी पत्नी मां धागा बांध लेती है और दस दिन बांध उसे खोल खूब मीठा चूठा बनाती है खासकर गजरोटा जिस पर इनका ही अधिकार होता है, शायद जब कभी घर की बैयर बानी को मीठा खाने को मिलता हो तो कहन बन गई गाज का गजरौटा, बाप खाए न बेटा पर ऐसा भला कैसे हो सकता है कि घर में मीठा बने और घर के प्रमुख मर्द को ही उससे वंचित रखा जाए तो एक कहन उसमें और चस्पा कर दी गई सुन पनिहारिन जुआ, बैयर खाए न पुआ। यानी तुम हमें छेकोगी तो हम क्या पीछे रह जाएंगे। तुम खाओ मोटा सोटा गजरोट , हम तो खाएंगे गर्मागर्म लजीज पुआ और तुम बनाओगी, घुसी रहो रसोई में, चढ़ी रहो कढ़ाही पर, हमें मानसून का आनन्द लेने दो गरमागरम पकोड़े चाय, पुए और भुट्टो की बात ही निराली है। वाह बरसात का पूरा आनन्द तो इसी में है।

      भादों की अष्टमी अंधियारी काली रात में ही कान्हा जन्मते हैं। कान्हा जन्म सुन आई, जशोदा तुम्हें लख लख बधाई। कहने को तो कान्हा के जन्मोत्सव पर दिन भर व्रत उपवास की बात करते हैं पर फलाहार के नाम पर इतने इतने व्यंजन बना कर उदारस्थ कर लिए जाते हैं कि अगले कई दिनों की कैलोरी एक साथ ठूंस ली जाती है। फिर रात को कान्हा जन्मेंगे तो भोग तो बनेगा हीर,  पंजीरी चरणामृत और मेवा पाग की धूम मची रहती है। भादों उतरे क्वार फिर कार्तिक बस त्योहारों की धूमही घूम। आधा क्वार श्राद्ध में और आधा नवरातों की भेंट में चढ़ जाता है बस फिर दशहरा दीवाली भागे चले आते हैं।

      हम भारतीय इतने उत्सवप्रिय हैं कि खुशी बांटने और मीठा खाने का कोई न कोई मौका खोज ही लेते हैं। घर घर तिरंगा का स्वाधीनता दिवस आजादी का अमृत महोत्सव है, तो इस दिन तो ध्वजारोहण के बाद बूंदी के चार चार लडडू खाना तो बनता ही है और जब यह राष्ट्रीय पर्व है तो अवकाश तो होगा ही। यानी हम ब्रज के बसैया ही नहीं पूरे भारतवासी हर मौसम में रंगीनी खोज ही लेते हैं और उसे उल्लास और प्रसन्नता से मनाते पारण मिष्ठान से ही करते हैं। भोजनांते मिष्ठान की परंपरा के वाहक हम कुछ मीठा हो जाए के नाम पर चाकलेट नहीं, छप्पन भोग के आदी हैं और संकेत रुप में गुड़ की डली और बताशे से मुंह मीठा कराते हैं, तेरे मुंह में घी शक्कर कहते हैं, दोनों हाथो में लडडू भर देते हैं, दही बूरा खिलाकर शगुन मनाते हैं। आखिर एक ही तो मन है, उसे भी खिला पिला कर संतुष्ट नहीं कर सके तो रे मन काहे को हुआ कहना ही पड़ता है। फिर दोहरा लो सावन खाई न खीर भादों खाए न पुआ, रे मन काहे को हुआ।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...