Monday, September 26, 2022

पाती प्यारी बिटिया कू

 सफ़र जारी है.....1070

28.09.2022

पाती प्यारी बिटिया कू.......

प्यारी लाडो,

सदा सुखी रहो।

तुम्हारे जन्म पर कितने कितने खुश थे परिवारी जन कि उनके घर लक्ष्मी आई है, जैसे जैसे शिक्षित और संस्कारित होती गई, वैदुष्य से परिपूर्ण सरस्वती की छवि तुम्हारे चेहरे से झलकती थी। कब सिखाया गया था तुम्हें कि अन्याय और अत्याचार के आगे सर झुका कर रहना, अगले की कहनी अनकहनी को मौन भाव से सुन लेना,परिवार के सदस्यों के साथ असभ्य और अभद्र व्यवहार,अशिष्ट आचरण और दुर्वचनों के प्रयोग पर मौन साध लेना पर तुमने सब सहा। मुंह सिले बैठी रहीं, चूं तक नहीं की और जब पानी सिर से ऊपर गुजर गया तब भी चबाते स्वर में अपना मुंह खोला। मुंह खोलने के नतीजे ये हुए कि अगला सुधरना तो दूर, और अधिक बिफर गया क्योंकि उसकी पोल पट्टी जो खुल गई। फलस्वरूप जो घर के अन्दर घटता था, वह अब सार्वजनिक हो गया। तुम्हारी घर बचाने की हर कोशिश असफल हो गई। जानते हैं कि तुम जीवन से निराश हो गई हो, तुम्हारा ह्रदय विदीर्ण हैं, जो पिघले शीशे से कटु और तीखे शब्द तुम्हारे कानों में डाले गए हैं, उससे बहुत पीड़ित हो, तुम्हारे जीवन में दूर दूर तक आशा की कोई किरण दिखाई नहीं देती। तुम्हें अपना जीवन बोझ लगने लगा है। सामाजिक आक्षेपों से तुम बहुत विचलित हो। इतनी अधिक परेशान हो कि कभी कभी इस सबसे मुक्ति पाने को जीवन से ही मुक्त होने की सोच लेती हो। तुम कुछ कहो या न कहो, पर माता पिता को सब दिखता है, समझ आता है। बेचारगी और लाचारगी में भले मौन हों, कुछ नहीं कर पा रहे हों पर अपनी लाडली, अपनी परी के दुख से विचलित जरुर हैं। आज तुमसे कुछ बात करनी है बिटिया।

सुनो, तुम्हें पढा लिखा कर, आत्म निर्भर बना, तुम्हें जीवन साथी के साथ घर से विदा किया था इस आशा के साथ तुम सदा सुखी रहोगी, जीवन में थोड़े बहुत संघर्ष हर के जीवन में आते ही हैं, उन्हें झेलना ही होता है समझदारी और बहादुरी से इनका सामना करना ही होता है। जीवन में धूप छांव होती ही है, जब धूप से खूब तपते हैं तो छांव और सुखद लगती है। तुम्हारा भविष्य उज्ज्वल हो, ऐसी ही कामना की थी, सदा सौभाग्यवती का आशीष सबसे पाया था तुमने पर भाग्य तो हमसे दो हाथ आगे चला करता है न, नियति के खेलों को भला कौन समझ पाया है आज तक। सोचते कुछ हैं लेकिन होता कुछ और है। ये सच है कि जीवन में एक अदद साथी बहुत ज़रूरी होता है पर यदि वह हमारे अनुकूल न हो या हम उसके अनुकूल न हों, 

 उसके जीवन में हमारी कोई जगह न हो, हम बात बात पे दुत्कारे, लतियाये जाते हों, सामने वाला अपने अहम में इतना अधिक आत्म मुग्ध हो कि अशिष्टता की सारी सीमाएं लांघ जाएं, स्वयं भू बन जाए, किसी का आदर सम्मान न कर सके, सबको भरे बाजार नंगा कर सकने की सामर्थ्य रखता हो, बात बात पर मुंह से अपशब्द झरते हों, जो चार लोगों के बीच तुम्हें और तुम्हारे परिवार को अपमानित और जलील करें, उससे दूरी बनाना ही उचित है। तुम लक्ष्मी सरस्वती ही क्यों बनी रहीं, नारी का एक रुप दुर्गा का भी है, पहले गलत व्यवहार पर ही रणचंडी बन जाना चाहिए था, अगले की हिम्मत तो देखो कि वह किसी का भी लिहाज़ नहीं करता। पर अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है, जब जागो तब सबेरा। पत्थरों से मूड मारने से कोई फायदा नहीं, उल्टे खुद को ही चोट लगती है। विनती कर कर के खूब देख लिया, हाथ पैर खूब जोड़ लिए, क्षमा याचना खूब कर ली पर पत्थर नहीं पिघला तो नहीं पिघला। अब सुनो बेटी, पत्थर दिल कभी पिघला नहीं करते। अब अपना बचा खुचा साहस बटोर कर खड़ी हो जाओ, शिखर तक अकेले ही जाया जाता है, उसमें कोई साथ नहीं चला करता। अपने लक्ष्य खुद ही पूरे करने होते हैं। अपनी शक्ति को बटोरो, जीवन के विविध आयाम होते हैं, कुछ पन्ने काले होते है और कुछ ख़ाली भी छूट जाते हैं, उनकी क्षति पूर्ति अपने अन्य कामों में विस्तार लाकर करनी होती है। तो जो छूटा, उसका अफसोस मत करो, जो सामने है उस पर सारा फोकस रखो। कभी कभी चयन गलत भी हो जाते हैं, उनका ज़िंदगी भर अफसोस ही नहीं मनाया जाता, उन्हें छोड़ आगे बढ लिया जाता है। रास्ते में बहुत से लोग मिलते हैं, सब अपने तो नहीं हो जाते न। तो उन्हे उनके हाल पर छोड़ आगे बढ़ो। जीवन कभी रुका नहीं करता। एक साथ नहीं तो क्या, सच की इस लड़ाई में पूरी कायनात तुम्हारे साथ है, आगे बढ़ो, लक्ष्मी और सरस्वती तो जरुर बनो पर जहां जरूरी हो दुर्गा रुप धरो। यह भी उतना ही ज़रुरी है।

तो सदा खुश रहो बिटिया, स्वस्थ रहो और अपना लक्ष्य प्राप्त करो। माता पिता का आशीष तुम्हारे साथ सदैव है।

ध्यान रखना तुम बेचारी नहीं हो, तुम में संभावनाओं का अथाह सागर हिलोरें मार रहा है। सो अपने को सहेजो, समेटो और आगे बढ़ो, जो छूटा उसका दुख मनाने में ही ज़िंदगी मत बिता दो।

तुम्हारे जन्मदाता और पालक।

Sunday, September 25, 2022

मान को तो पान ही भौत होत ए

 सफर जारी है....1069

27.09.2022

मान को तो पान ही भौत होत ए......

सबरे कह रए हैं तो होयगो ई बिटिया को दिना आज। उत्तर प्रदेश लेखिका मंच ने तो आगरा की रचनाकार बिटिया को बहुत्तेरो मान करो , शाल पिन्हायो, माला डारी गरे में और बाय का कैत हैं सम्मान पत्र हू पढ़ो। हती बिटिया जा लाइक, खूब सी तो किताब लिखी और निरे मेडल जीते। बोलबे ठाढी भई तो जे समझो कि मुंह ते फूल से झर रए, कहानी कविता कैसे लिखी जात है, सब ब्योरेबार बताओ। बोल रई काई तो सबरेन की आंख बाके मोडे पे ही चिपक रई । मन खुश है गयो बा बिटिया ए सुन के तो। अब ऐसे फंक्शन में जाबे को तो खूब मन करे। देखो भैया जहां मान होय महां तो जरूल ते जानो चहिए। हम तो रहीम बाबा ए याद कर लेत ऐं...... रहिमन रहिला की भली जो परसे चित लाय, परसत मन मैलो करे सो मैदा जरि जाय। खूब प्यार ते मान ते बुलाओगे तो दौड़े चले आंगे नाय तो हमें ना जानो काहू के। चो जाएं, अपने घर भले। मान को तो पान हू भौत होत ए भईया और आज तो गेंहू के संग हम बथुआ ऊ ए पानी लग गयो। नाय झूठ नाय बोलिंगे साब , खूब दिल ते स्वागत करो, हम तो पहले पहल गए आज, काऊ ए जानते ऊ नाय, बस सुन राखी कि उत्तर प्रदेश को कोई लेखिका मंच हते।

             का का नाम हते बिनके वो का कैते शशी, प्रीति, अपर्णा, प्रगति, कल्पना, गीता, शिखा, जे नाम तो याद है गए और एक और हती ज्योति। निरी सी हती, सब ऐसी धा पा के मिली कि मन खुश है गयो। बिलकुल बाहेली सी लगी मोय तो। कैसी जेठ भर भर के मिल रई। भाई हू हते थोड़े बहुत से।अब सबने कई तो हमने ऊ एक कविता चैंप दई कि छोरियो, सबन ते पैले अपनी इज्जत करिबो सीखो, खुद ए जानो, अपनो मान पहचानो ता पीछे दूसरे की शिकायत करो। मोय तो ऐसी लग रई कि इन छोरी छापरी ने आधे अधूरे नाटक नाय पढ़ो दीखे मोहन राकेश को। जो पढ़ो और गुनो होतो तो समझती कि कोई पूरम पट्ट नाए होय करे, कोई में एक कमी तो दूसरे में दूसरी। घर गृहस्थी तो ऐसे ई चलो करे। एक ने कई दूसरे ने मानी। जे बात बात पे रूठबो मटकबो ठीक नाय होय करे। दो बिन ने कहीं तो चार तुम कह लेयो, कह कबा के छुट्टी करो। बात ए दिल में फांस सी चुबो के मत बैठ जाओ।

                हम चाहे कोई बन जाए पर सबसे पहले तो बिटिया ही होय करें, फिर काहू की बहिन, काऊ की पत्नी काहू की बहू काऊ की मईया होए। हमाई मां ने हमें एक कविता रटाई ,शायद से कल्याण में ते बताई होगी, अब सल नाये। हमने बी एड में हू पहले दिना सुनाई। चलो अब बात चली है तो तुम्हें हू सुनाए देत ऐं नाय तो बाद में बात बनाओगे, कछु से तो इतराबे को इल्जाम लगा देंगे तो जाते तो बढ़िया है सुना ही देत हैं, कछु भूल जाए तो किल्ल मत करियो ,भली... मां जब मुझको कहा पुरुष ने तुच्छ हो गए देव सभी, इतनी ममता इतना आदर इतनी श्रद्धा कहां कभी, उमड़ा स्नेह सिंधु अंतर में डूब गई आसक्ति अपार, देह गेह अपमान क्लेश छि विजयी मेरा शाश्वत प्यार। बहन पुरुष ने मुझे पुकारा कितनी ममता कितना नेह। बेटी कह कर मुझे पुरुष ने दिया स्नेह अन्तर सर्वस्व, मेरे सुख सुविधा की चिन्ता उसके सब सुख हृस्व, अपने को भी विक्रय करके मुझे देख पाए निर्बाध, मेरे पूज्य पिता की होती एक मात्र यह जीवन साध। प्रिये पुरुष अर्धांग दे चुका लेकर के हाथों में हाथ, यही नहीं उस परमेश्वर के निकट हमारा शास्वत साथ। तन मन जीवन एक हो गए मेरा घर उसका संसार, दोनों ही उत्सर्ग परस्पर दोनों पर दोनों का भार। 

                ये सारे के सारे रिश्ते बेहद पवित्र और महनीय थे पर जब पण्या दस्यु आज कहता है पुरुष हो गया आज पिशाच, पुत्र पिता भाई स्वामी तुम क्या इतने निरुपाय, स्थिति तो तब बिगड़ी। हम तो सबरे रिश्तन कू मान देबे पर जब अगलो अपनी सीमा रेखा पार करेगो तो हम काहू ते कमती थोड़े ई हैं, मुंह तोड़ के धर देंगे। ऐसे पोच और दब्बू नाय। सो भैया मान देयोगे तो खूब पूजिन्गे और जो ऐंठ के मारे पैंठ कू जाओ तो तिहाई मज्जी। हम तो रिश्ता बचाबे की अपनी जान खूब कोशिश करिंगे और जो तिहाई समझ में नाय भर रई तो बैठे रहियो अपनी अटरिया पे अपने घमंड में, हम पे बेटी, बहन, मईया बन के हू रहनो आत है। एक रिश्ता टूटबे ते सारे रिश्ता खत्म थोड़े ही हे जाबे। तुम अपनी गैल हम अपनी गैल। और नेकऊ समझदार भए तो जे नौबत आयेगी ही नाय। सोच लीयो तिहाये घर  में हू बहन बेटी हते, राम जी को न्याय में कोई झोल नाने। तो मान देयोगे, मान पाओगे। मान को तो पान हू भौत होत ए।

उल्टे बास बरेली के

 सफर जारी है...1068

26.09.2022

उल्टे बास बरेली के.....

गिरा होगा कभी किसी का झुमका बरेली के बाजार में और होते होंगे उल्टे बास बरेली के, इस बरेली यात्रा ने तो अनेक नाम परिचय श्रृंखला में जोड़ दिए , साहित्यिक उपलब्धि खाते में आई सो अलग।गंगशील महाविद्यालय का विस्तृत प्रांगण, रंगोली से अंकित सभागार का फर्श, भेंट में मिला रुद्राक्ष का पौधा, भाव पुष्पों से स्नेहिल भीना स्वागत, हिंदी के भविष्य और भविष्य की हिंदी पर चिंतन विमर्श। विद्वत जनों का सान्निध्य, कुल मिलाकर ज्ञान के कोश में वृद्धि।विद्वानों के अपनी बात रखने की अलग अलग शैलियां, वक्तव्यों के नित नए ढंग कुछ ऊर्जा से लबरेज तो कुछ सूचनाओं को क्रमबद्ध तरीके से परोसने वाले , कुछ अपने अनुभवों को सबका विषय बनाने वाले तो कुछ बासी उबाऊ थकाऊ झिलाऊ नुमा। सब जानती है ये पालिक सब जानती है ये पब्लिक है सो कभी तालियां बजाकर तो कभी उबासियां ले लेकर या चेहरे के इंप्रेशन से विषय के प्रति अपनी समझ खूब खूब व्यक्त कर देती है । और इन लगातार बजती तालियों से धोखे में मत आ जाईएगा। जरा से भेद से इन तालियां के अर्थ और तेवर बदल जाते हैं कहीं ये सब कुछ समझ आने की प्रसन्नता जताती हैं तो कहीं विषय की बोरियत से हूटिंग और वहीं बात को समाप्त करने की सूचक भी होती हैं। तो मंच पर चढ़ पोडियम पर जा हाथ फैंक फैंक कर बोलने से पहले अपने आप को दुरुस्त करना बहुत ज़रूरी होता है कि विषय की मांग क्या है और क्या हमने अपनी जानकारी को अद्यतन कर लिया है, बोली जाने वाली सामग्री को क्रम से संजो लिया है, उसे मन ही मन दोहरा लिया है। सिद्ध से सिद्ध वक्ता भी अपने आप को इस रुप में तैयार अवश्य करता ही है। वह कुछ भी यूं ही प्रस्तुत नहीं कर देता है। वह भली भांति जानता है कि आज अपनी बात को एक बड़े समूह तक पहुंचाने का अवसर मिला है तो उसका पूरा पूरा लाभ ले लेना चाहिए। जब आप पूरे मन से, गंभीरता, दिल से साफ और स्पष्ट बुलंद स्वर में अपनी बात रखते हैं तो उसका असर होता ही है, सुनने वाला सोचने पर बाध्य होता ही है , कहे गए शब्दों के प्रभाव में होता अवश्य है फिर भले ही उसकी समयावधि अल्प ही क्यों न हो। तो हर बार बोलते सुनते कुछ नए तथ्य संज्ञान में ले लिए जाते हैं।

बरेली और मेरे शहर आगरा में एक समानता और है दोनों ही अपनी अन्य अन्य विशेषताओं के साथ मानसिक रोगियों के इलाज के लिए विख्यात हैं मतलब कुछ दिमागी लोचा हो तो उसे भी दूर कर दिया जाता है। लंबे समय तक को बरेली को लेकर यही धारणा बनी रही कि यहां के बाजार बड़े व्यस्त और आकर्षक रहे होंगे कि झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में जैसे प्रसिद्ध गीत की रचना हुई होगी। और तब झूमके का बहुत प्रचलन रहा होगा। पर मिश्र जी से बात करते पता चला कि यहां महाभारत काल से जुड़े, उससे संदर्भित कुछ स्थल भी हैं और राय बरैली से इतर करने के लिए बास बरेली के प्रसंग है। हर शहर अपने में कुछ विशिष्टताओं को समेटे रहता है, पर आप अपने व्यस्त प्रवास में से क्या क्या खोज पाते हो, यह आप और जिनके संपर्क में आप आए, उस पर और उससे भी अधिक आपके दृष्टिकोण पर निर्भर करता है कि अमुक अमुक शहर के विषय में आपकी जानकारी कितनी पुख्ता है।

यात्राएं तो ज्ञान ,नई नई सूचनाओ और अनुभवो का पिटारा है, बस आंख कान खुले रखिए, दृष्टिकोण सकारात्मक बनाए रखिए, हर क्षण का उपयोग कीजिए तो आपकी झोली ख़ाली नहीं रहती हैं, उल्टे हर बार कुछ नया जुड़ जाता है, अनुभव में इजाफा ही होता है बशर्ते वैसा मानस भी बना कर जाएं। अब हर छोटे बड़े कष्ट पर भुनभुनाते ही रहोगे तो कुछ नहीं हाथ लगने का। ऐसे ही थोड़े घुमक्कड़ अथातो जिज्ञासा लिखा गया होगा, कहा गया होगा सैर कर दुनिया की गाफिल जिंदगानी है कहां। तो जब जब जो जो समय मिले, जिनसे मिलने और जहां जानें का सुयोग मिले खूब जिंदादिली से उन क्षणों को जीने की कोशिश कीजिए, अच्छा बुरा जैसा भी हो, अनुभव आपको कुछ सिखा ही जाता है, आपको समृद्ध ही करता है तो जब समय हो लोगों से मिलते जुलते रहिए और अपने दायरे को विस्तृत करते रहिए।

शिल्पी तू जीभ बिठाता चल

 सफर जारी है .........1067

25.09.2022

शिल्पी तू जीभ बिठाता चल....... 

रामधारी सिंह दिनकर राष्ट्रीय चेतना के रचनाकार हैं । संस्कृति के चार अध्याय, कुरुक्षेत्र , रश्मि रथी, हुंकार, परशुराम की प्रतीक्षा, लोहे के पेड़ हरे होंगे, शक्ति और क्षमा और अन्य अन्य रचनाकर्मों से गुजरते, उनका अध्ययन करते यह धारणा पुष्ट होती गई कि पाठक किसी रचनाकार को पढ़ते पढ़ाते, उन्हें कंठस्थ करते उनके व्यक्तित्व के कई कई आयामों से परिचित होता जाता है। जो पूरे मन से लिखा जाता है, यदि पाठक भी उतने ही मन से उसे पढ़े, समझे, उसके भावों को ग्रहण करें तो लिखा सार्थक हो जाता है।

क्षमा सोहती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो पंक्ति को  मां के मुख से कई कई बार बहुत से संदर्भों में सुना कि क्षमा का अधिकार केवल शक्तिशाली को है। विष दंत हीन सर्प की सारी शक्ति नष्ट हो जाती है, इसलिए शक्तिशाली बनो और दूसरों को क्षमा करना सीखो। बाद में दिनकर की रचना को पढ़ाते इसे संदर्भ सहित ग्रहण किया। कर्ण के जीवन के विविध पक्षों विविध आयामों को जानना हो तो रश्मि रथी का घोटा लगाए जाना आवश्यक और अनिवार्य दोनों है। स्नातकोत्तर में दिनकर की कविताओं को जानने समझने का भरपूर मिला। शिक्षक प्रशिक्षण की वार्षिक परीक्षा के दौरान लोहे के पेड़ हरे होंगे तू गीत प्रेम के गाता चल, नम होगी ये मिट्टी ज़रूर आंसू के काम बरसाता चल को पढ़ाते पूरा मानस ही बदल गया। जब भी मौका मिलता है, इस कविता को कई कई बार दोहरा लेती हूं।कैसे एक रचना आपके जीवन में आश्चर्यजनक रुप से बदलाब ले आती है। इतनी लंबी कविता के सभी अनुच्छेद तो आज तक भी कंठस्थ नहीं हो पाए, हर बार पृष्ठों को पलटना होता है पर भाव बहुत अच्छे से समझ आ गए कि प्रेम से लोहे जैसी कठोर जमीन भी नम हो जाती है और उसमें हरे भरे पेड़ अपना विस्तार पाते हैं। इस जगत में चाहे जितनी कटुता और विषमता क्यों न हो, प्यार उन सब पर भारी पड़ता है। तब से सबको प्यार से ही गुनने और समझने में लगे हैं पर अक्सर हार जी जाए हैं। सामने वाला विनम्रता और प्यार से बोलने को कमजोरी मान लेता है और बड़े तो बड़े, छोटे और अधकचरे भी हावी होने की कोशिश में लगे रहते हैं, कोशिश में क्या लगे रहते हैं, पूरी तरह हावी हो जाते हैं,पीठ पर लद जाते हैं ओर सिर पर सवार बने रहते हैं।

फिर बार बार सोचती हूं कि इतने बड़े और स्थापित कवि ने झूठ थोड़े ही लिखा होगा कि आशा के स्वर का भार पवन को लेकिन लेना ही होगा, जीवित सपनों के लिए मार्ग मुर्दों को देना ही होगा, रंगों के सातों घट उड़ेल ये अंधियारी रंग जाएगी, जीवन को सत्य बनाने को जावक नभ पर बिखराता चल। सो इस कलुषता कुटिलता को जाबक से ही जीता जा सकता है। पढ़ लिख तो बहुत लिए पर उसे गुनना अभी बाकी है। जब जब मस्तिष्क जये होता, संसार ज्ञान से चलता है, शीतलता की है राह हृदय तू यह संवाद सुनाता चल। जैसे जैसे कविता आगे बढ़ती जाती है, जीवन का सत्य उद्घाटित होता जाता है दीपक के जलते प्राण दिवाली तभी सुहावन होती है। रोशनी जगत को देने को अपनी अस्थियां जलाता चल। सो दीपक को तो जलना ही होगा तभी रोशनी बिखरेगी। सौरभ है केवल सार उसे, तू सबके लिए जुगाता चल। आधी मनुष्यता वालो पर जैसे मुस्काता आया है वैसे अब भी मुस्काता चल। ऐसों से अटकने से क्या लाभ, उनकी नादानी पर मुस्करा कर आगे बढ़ने में ही भलाई है। जो उठे राम जो उठे कृष्ण भारत की मिट्टी रोती है तलवार मारती उन्हें बांसुरी नया जीवन देती, जीवन शक्ति के अभिमानी, यह भी कमाल दिखलाता चल।

और अंतिम पंक्तियां तो जैसे कविता का प्राण है.... धरती के भाग हरे होंगे भारती अमृत बरसाएगी दिन कि कराल दाहकता पर चांदनी सुशीतल छाएगी।ज्वालामुखियों के कंठो में कलकंठी का आसन होगा, जलदो से लदा गगन होगा, फूलो से भरा भुवन होगा। बेजान यंत्र विरचित गूंगी मूर्तियां एक दिन बोलेगी, मुंह खोल खोल सबके भीतर शिल्पी तू जीभ बिठाता चल।

तो हम सब ऐसी शिल्पी बनें , गूंगे बहरों के मुख में जीभ बिठाते चलें, सबकी आवाज बनें, सबके सहयोगी बनें। रामधारी सिंह दिनकर को याद करते उनकी स्मृति में श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।

बातें हैं बातों का क्या

 सफर जारी है .......1066

24.09.2022

बातें हैं बातों का क्या.......

तो आज श्री गणेश करते हैं बारहवें सूक्त का। जीवन में बातों का कितना महत्व है, यह तो उससे पूछिए जिसे बातें करने का कभी सौभाग्य ही नहीं मिला हो, जो बेचारा मन ही मन अपने आप से बतियाता रहा हो, जिसके पास एक अदद मित्र तक न हो जिसके आगे वह अपना मन खोल सके। सोचो कितनी घुटन होती होगी उसे। बातें इतनी जरुरी न होती तो बाल कृष्ण भट्ट को क्या पड़ी थी कि वे बात पर लेख ही लिख मारते। ये बातें बड़ा शस्त्र हैं समस्याओं को हल करने का, इनका समाधान खोजने का। पिताजी हम बच्चों के तुनक फुनक कर रूठ जाने और आपस में कुट्टी कर बातचीत बंद कर देने पर अक्सर कहा करते थे दो देशों के बड़े से बड़े मुद्दे भी बातों से सुलझा लिए जाते हैं तो कोई बात है तो उसे कह कबा कर रफा दफा करो। मन में घोटते मत रहो। जो दिल में रखे रहोगे तो छोटी सी बात कल को सुरसा का रुप ले लेगी। उसके सारे एंगिल ही बदल जायेंगे। तो छोटी छोटी बातों को वहीं का वहीं कह सुन कर निपटारा करना ज्यादा उचित है वनस्पत उसका तिल का ताड़ बनाने के।

सच बताएं तो बातों का जीवन में बहुत अधिक महत्व है। बचपन में दोस्तों से बातें करने के चक्कर में घर से डांट भी खाई हैं, कभी कभी तो बातों के तार इतनी लंबे हो जाते कि समय का अतिक्रमण हो जाता और देर से आने के चक्कर में पिटाई ठुकाई होती सो अलग। अब बात करना तो नहीं छोड़ा जा सकता था तो बात करने के घंटे निश्चित कर दिए गए, अपनी घर की देहरी, बाउंड्री, आंगन, बगीचे में बात करने की छूट दे दी गई। सावधानी की दृष्टि से कभी कभी उस ओर कोई बड़ा चक्कर भी काट जाता कि देखें क्या गुफ्तगू हो रही है। हम बाल सखाओं और स्कूली मित्रो के पास बातों का अक्षय भंडार था। इसकी उसकी सबकी बातें, घर की स्कूल की बाहर की रिश्तेदारी की बातें। बातें थीं कि उनका कोई ओर छोर ही नहीं था। कहीं से भी कोई सिरा पकड़ा कर शुरू हो जाते। पहले पहल तो घर में ही बहनें सिर से सिर मिला बातें करते, फिर शाम होते मां खूब खूब बातें बताया करती। नानी दादी की बातें, गांव की बातें, अपने बचपन की बातें। जब पिताजी के साथ बस में बैठ कर रिश्तेदारी में जाना होता, तो पिताजी से तरह तरह के प्रश्न पूछते और बातों में ऐसे खो जाते कि न खाने की सुध रहती न पीने की। बातों ही बातों में कितनी कितनी ज्ञान की बातें मां पिताजी हमारे अंदर ट्रांसफर कर देते।

स्कूल में ख़ाली घंटे या खाने की छुट्टी में या पूरी छुट्टी में खरामा खरामा चलते बातों का पिटारा खुलता। कुछ  बातें करने में इतने उस्ताद थे कि दूसरे का नम्बर ही नहीं आने देते थे, बस वे ऐसे चटर पटर बोलते थे कि बाकी के सब ध्यान लगा के उन्हें सुनने में मशगूल हो जाते। बड़े होते गए और बातों के भंडार भी भरते गए। जैसे जैसे बड़े होते गए, बातें कम और काम ज़्यादा के निर्देश प्रभावी होते गए। बातों बातों में यही समझाया गया कि बातें कितनी मर्जी ज़रूरी हों पर सबसे जरुरी काम होता है। हां ,ये बात अलग है कि उस काम से संबंधित ज़रूरी बातें अवश्य की जानी चाहिए। घर परिवार बसाते भी बाते बहुत ज़रूरी उपादान रहीं। कभी गंभीर मसलो के हल बातों से निकालें जाते रहे तो कभी ख़ाली समय को बातों के उल्लास से भर लिया गया। ये मुआ मोबाइल, टीवी तो अब अधिक प्रचलन में हैं कि घर में दो लोग हैं और दोनों ही अपने अपने मोबाइल से किसी तीसरे से लिखित या मौखिक वार्ता में मशगूल हैं। एक समय था कि रेल में यात्रा करते बेचारा टिकट चैकर यात्रियों को बातों में मशगूल पाकर झकझोरता था। कितनी कितनी बातें होती थीं, सबके पास। अब तो परिवार में भी सदस्यों के मध्य बात नहीं होती। सब बहुत अधिक व्यस्त वाकई में हैं या उन्होंने अपने को बातों से दूर कर लिया है या जानबूझ कर व्यस्तता का चोगा ओढ़ लिया है। राम जाने। पर ये जिनके पास बातों के पिटारे हैं, उन्हें बड़ी अपच हो गई है। बेचारे अपनी बात को पुराने पेड़ के किसी कोटर में ख़ाली कर आते हैं। बातें लिखी जाती हैं, कही जाती हैं, की जाते हैं पर अब बातों में वह बात कहां। कुछ बात करने वालों को , बतकही करने वालों को बातूनी करार दे देते हैं तो कुछ उसे बेबात की बात कह कूड़े की टोकरी में डाल देते हैं। कुछ कह देते हैं बातें हैं बातों का क्या। ये बातें ही आपकी बात बना देती हैं, आपको मशहूर कर देती हैं। तो बातें करते कराते रहिए, लोग मिले तो ठीक नहीं तो खुद से ही बतराते रहिए। बतराना बहुत ज़रूरी है। याद कीजिए और दोहरा लीजिए .... बतरस लाली लाल की मुरली धरी लुकाय, सोंह करें भोंहन हंसे देन कहें नट जाय। तो बातें का रस लीजिए साहब, इन बातों में क्या रखा है।

राम जी की निकली सवारी

 23.09.2022

राम जी की निकली सवारी.......

जब जब ये पैंसठ संख्या आती है, सफ़र की माला में एक सुमेरू और टंग जाता है। 365 की पूर्ति के बाद चार सौ, पांच सौ, छः सौ, सात सौ, आठ सौ, नौ सौ और अब एक हजार पैंसठ का क्रम आ पहुंचा है। ये क्रम तो जब तक जीवन तब तक है फिर भी एक और अध्याय की समाप्ति बड़ा सुकून देती है। मन में संतोष उपजता है कि चलो जो व्रत लिया, वह अब तक तो निभ गया। आगे की राम जाने। राम जी की मर्जी, जब तक चाहें लिखाएं। हम तो लिखवैया हैं, जो लिखाएंगे सो ही लिखेंगे। मानस रचनाकार की भांति हम भी उनके दरबार में अपनी पोथी रख देंगे चाहे सही का निशान लगाओ या सब काट पीट के रख दो। हमारा अपना क्या है,प्रसंग और संदर्भ आप रच देते हो, वीणा पाणी स्वयं अंगुलियों के पोरों पे आ विराजती है, वरना हम जैसे दलिद्रियों का साहस कहां जो दो हरूफ भी ढंग से लिख सकें। सब राम जी की माया है।

उत्तर भारत में आगरा की राम बारात बड़ी मशहूर है। सालाना आश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी को श्री राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के स्वरूपों की झांकी नगर भ्रमण करती भोर में जनकपुरी पहुंचती है। जनकपुरी सजने का सौभाग्य सालाना एक विशेष क्षेत्र को मिलता है । अयोध्या भी तैयार की जाती है। जनक महल की शोभा बहुत दर्शनीय होती है। पूरा शहर राम जानकी मय हो जाता है। भगवान राम और जगतजननी के विवाह का उल्लास हर छोटे बड़े के चेहरे पर परिलक्षित होता है। तुलसी और सालिग्राम का विवाह संपन्न होता है। तीन दिन तक पूरे शहर में स्थान स्थान पर भक्तिमय आयोजन होते हैं। राम विवाह के माध्यम से कितने सार्थक सन्देश समाज में पहुंच जाते हैं। जनक और सुनयना के साक्षात स्वरूप धारण किए  व्यक्तित्व मां सीता की विदाई पर भाव विह्वल हो जाते हैं। राम सिया के चरित्र तो सदैव अनुकरणीय थे, हैं और रहेंगे।  

              राम जी के ब्याह का शुभ मुहूर्त आ गया है, बड़े बड़े पराकमी राजा पधारे सीता स्वयंवर में पर शिव जी के धनुष को तोड़ना तो दूर, कोई हिला तक नहीं सका , किसी से  धनुष सरका तक नहीं  और हमारे राम जी ने हाल ही धनुष तोड़ डाला,  प्रत्यंचा चढ़ा दी और सब जगह राम के ब्याह की धूम मच गई। अयोध्या में घर घर बधाई बजने लगी, लगन आई हरे हरे का शोर मच गया, बाबा ताऊ चाचा पिता सब सज गए, सबरी बारात सज गई और रघुनंदन तो ऐसे सज गए जैसे श्री भगवान, लगन आई हरे हरे मेरे अंगना। जनक नंदिनी गौरा पूजन को चली। उनके मन में भारी उछाह है। जनक दुलारी विदा हो रही है, विदा करते विदेह जनक भी मोहग्रस्त हो गए हैं। बेटी को बहुत सी सीख दी पर एक बात बार बार समझाते रहे "पुत्री पवित्र किए कुल दोऊ और जगत जननी सीता ने इसे आंचल के छोर में कस के बांध लिया। कैसी भी विपत्ति कठिनाइयां आई पर यह सूत्र हाथ से छूटा नहीं, जो वचन पिता को दिया, उसे  जीवन भर निभाया।

 माता कैकई ने राजा दशरथ से राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास मांगा था, उसमें सीता का कहीं प्रावधान नहीं था, सीता की कोई विवशता भी नहीं थी कि वे राम के संग वनवास जाएं। उन्हें किसी ने बलपूर्वक भेजा भी नहीं। सभी माताओं ने उन्हें रोकने का भरसक प्रयत्न किया, राजा दशरथ ने भी सुमंत्र से यही अपेक्षा की थी कि बस कुछ देर घुमा कर ले आना, स्वयं राम ने समझाया कि सुकुमारी ,वन में हिंसक जानवर होंगे तुम यही रहो और माताओं की सेवा करो पर सीता ने स्पष्ट कह दिया जहां मेरे पति हैं वहीं मेरा स्थान है, वहीं मेरा सुख है। वे विवाह का अर्थ समझती हैं, सप्त पदी और अग्नि के इर्द गिर्द लिए फेरों का अर्थ बखूबी समझती हैं । राजा जनक जैसा संपन्न भला कौन था, वे राम के वन जाने पर अपनी लाडली को अपने राज महल में सुख पूर्वक रख सकते थे, वे उसे अयोध्या से ले जा सकते थे पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। उल्टे सीता को ही सीख दी बेटी सुख हो दुख हो, अब तुम्हारा निभाव वहीं है। पर नहीं उन्होंने बेटी के घर में कोई दखल नहीं दिया।उल्टा ये ही समझाया कि बेटी तुम्हारा सुख वहीं है, जहां तुम्हारे पति हैं। सीता दोनों कुलो की लाज रखती हैं, वे कुलवधु हैं, अपने से बड़ों से लाज करती हैं। वन पथ पर चलते ग्रामवासियों के पूछने पर अपने पति और देवर का नाम नहीं लेती, संकेत से आंखो के संकेत से ही बता देती हैं। गंगा पार करते केवट को देने के लिए मुंदरी स्वयं उतार लेती हैं, राम को कहने की जरूरत नहीं पड़ती। वे अपने धर्म को जानती हैं। देवर कौशल्या से पुत्रवत स्नेह करती हैं। सासु कौशल्या, सुमित्रा और कैकई को माता का सा मान देती हैं।

 रावण साधु का वेश धर अपहरण कर लेता है तो मार्ग में अपने गहने डालती जाती हैं कि जब मेरे स्वामी खोजते हुए आऐंगे तो उन्हे इनके ब्याज से कुछ ज्ञात हो सकेगा। रावण की लंका में रहते अपने सतीत्व को सुरक्षित रखती हैं, तिनके की ओट से रावण को जता देती हैं कि मेरे स्वामी के आगे तेरी सारी शक्तियां क्षीण हैं। प्रजा के सामान्य जन के कहने पर अग्नि परीक्षा देने को तैयार हो जाती है। गर्भवती सीता वन में रहते लव कुश को समर्थ बनाती हैं, उनका चरित्र सदैव अनुकरणीय है, रहेगा। आज भी बेटियों को सीता सावित्री बनने का ही आशीष दिया जाता है।

 आज जब तेजी से विवाह जैसी पवित्र संस्था टूटने के कगार पर है, उसे समझौता मान लिया गया है कि जब चाहे उसे तोड़ा जोड़ा जा सकता है, विवाह विच्छेद का प्रतिशत बढ़ रहा है, विवाह दो व्यक्तियों के मध्य सिमट कर रह गया है। अब विवाह में दो कुल दो परिवार के बीच रिश्ते नहीं जुड़ते, बस जैसे भी हो बस लड़की वाले केवल लड़के को देखते हैं। वे मान कर चलते हैं कि हमें औरों से क्या लेना देना, बस जमाई से मतलब है। ऐसी विकट स्थितियों में फिर विवाह जैसे पवित्र बंधन के संदर्भ राम सिया विवाह के ब्याज से दोहराए जाने जरुरी है। ये केवल राम और सीता का ब्याह ही नहीं है, अयोध्या और जनकपुरी का संबंध है। हम पुत्रियां दोनों कुल की लाज बनाए रखें, इसी में सब की भलाई है। ये विवाह है विवाह, गुड्डे गुड़िया का खेल नहीं कि आज संबंध जोड़ा और कल पसंद न आया तो ग्रंथि बंधन  तोड़ अलग हो गए, अपनी अपनी राह चल दिए। बहुत हुआ, अब भी सुधर जाओ। नहीं तो पतन की खाई बहुत गहरी है, उसमें से निकलना आसान नहीं होगा। जय श्री राम, बना दो बिगड़े काम। राम जी की निकली सवारी, राम जी की महिमा है न्यारी।

गर्व से कहो हम बुजुर्ग हैं

 22.09.2022

गर्व से कहो हम बुजुर्ग हैं......

प्रौढ़ता और बुजर्गियत आयु के ठीक वैसे ही पड़ाव हैं जैसे बचपन, कैशोर्य और युवावस्था। उम्र तो एक नम्बर भर है उसका जीवन के प्रति दृष्टिकोण से भला क्या लेना देना। पर नहीं, बार बार कह कर ये अहसास दिलाना जरुरी होता है कि अब आप बूढ़े हो गए हैं, आपकी ओल्ड एज है, इसलिए आप हमेशा मरे गिरों की श्रेणी में रखे जाने के लिए बाध्य हैं, आपको हर पल ये अहसास दिलाया जाता है कि तुमने अपनी जिंदगी जी ली, अब दूसरों के जीवन में दखल मत दो। एक कोने में पड़े रहो, जो मिल जाए या जो अहसान सा पटकते दे दिया जाए, उसे दया समझ के पेट में डाल लो । अपने जीवन अनुभवों को अपने पास सीमित रखो, ज़्यादा टोका टाकी करने की जरूरत नहीं है, एक कोने में कबाड़ की तरह डाल दिए जाओगे, दिन भर मौन , कौन, नोन के उपदेश सुनते रहो, मरीजी फीका और उबला खाना ही अब तुम्हारी नियति है। जो कभी अच्छा खाने को मन करे तो सुनो कि बुढ़ापे में जबान कैसी चटखारे ले रही है, चार मित्रो के साथ हंस बोल लो तो कहा जाएगा दिन भर कुछ काम धाम नहीं, बस सारे दिन पंचायत लगा के बैठे रहते हैं, कुछ नया, चटख पहन लो तो सुनने को मिलेगा बूढ़ी घोड़े लाल लगाम, थोडा गुनगुना लिए और ठुमके लगाने का मन हो गया तो फिर प्रलाप शुरू हो जाएगा.. अपनी उम्र का ख्याल करो, बूढ़ी हड्डियां कहीं चटख टूट गईं तो हमारी जान को खाट पकड़ कर बैठ जाओगे। कहीं जीवनसाथी के साथ चुहल कर ली तो आक्षेप लग जाएगा इन बूढ़ों को देखो, बुढ़ापे में रंगीनियां सूझ रही हैं। तो आयु के इस पड़ाव पर आपको बार बार ये अहसास कराया जाता है कि आपकी पारी समाप्त हुई, बस एक कोने में बैठ कर दिन काटो, नीरस से पड़े रहो और उम्र के इस आंकड़े पर आकर स्थिर हो जाओ, बार बार बेचारगी का आपको अहसास इस कदर कराया जायेगा कि एक दिन आप भी सोचने लगेंगे कि बस अब बहुत जी लिए, अब तो ईश्वर ले ले।

ईश्वर ले आपके दुश्मनों को, उम्र के इस पड़ाव का ये मतलब कब से हो गया कि आप बेचारगी से जीएं, कट रहे हैं दिना नुमा वाक्यों से जिंदगी के प्रति नीरसता उदासीनता प्रकट करें, जैसे तैसे जीएं, दूसरों पर बोझ से बने रहें, अगला आपको ये अहसास दिलाता रहे कि बस आपकी पारी ख़त्म, चुपचाप बैठो। बिलकुल नहीं, कदापि नहीं, बुजुर्ग और बूढ़े जरुर हुए हैं पर लाचार और बेचारगी का चोगा ओढ़े नहीं बैठे हैं। हमें सम्मान से जीने का पूरा हक है। जीवन के महत्वपूर्ण साल इस घर परिवार को दिए हैं, मेहनत से सींचा है इस फुलवारी को, कतरा कतरा जोड़ के ये इज्जत पाई है। अनुभवों की भट्टी में पके हैं, तप कर सोना बने हैं, निखर कर आए हैं। असली जिंदगी तो अब शुरू हुई है। अब तक तो परिवार को आकार ही देते रहे, आस औलाद को वक्त के सांचे में ढाल समाज उपयोगी बनाते रहे, उनके पैर मजबूत करते रहे, तमाम मारा मारी और व्यस्तता में लगे रहे। अब फुरसत के कुछ क्षण मिले हैं, उन्हें हम शान्ति और अपने तरीके से जीना चाहते हैं, बेचारगी के तमगे के साथ नहीं। तो बार बार ये अहसास दिलाना बंद करो कि हम बूढ़े हो गए हैं, हमारी ओल्ड एज है, हमसे अब कुछ नहीं होगा । अरे बढ़े बूढ़े हुए है, बुजुर्ग हुए हैं, लाचार नहीं, असहाय नहीं। इंद्रियां थोडा असहयोग अवश्य कर रही हों पर दिल दिमाग अभी बिलकुल दुरुस्त है। जीवन की दूसरी पारी को बिंदास जीने का जज्बा है। तो ये बेचारगी का चोगा तो हमें मत ओढ़ा ओ  कि हमसे कुछ नहीं होगा, हमें कदम कदम पे सहायता चाहिए। अरे शरीर अशक्त भले हुआ हो पर जिंदादिली बाकी है। मुर्दादिल क्या खाक जिया करते हैं। अब जाकर तो जीवन का अर्थ समझ आया है, साथ के असली संदर्भ समझ में भरे हैं और आप सब मिलकर, बुढ़ापे का माहौल रचाकर हमें नर्वस करने पर तुले हो। पूछ पूछ कर कह कह कर बार बार यही अहसास दिलाते रहते हो कि उम्र हो गई है, बुढापे में प्रवेश कर गए हो।

अब तुम्हें चांदी से सफेद बाल, कदमों की डुगलाहट तो दीख जाती है पर मन का उछाह नज़र नहीं आता। पचपन की संख्या समझ आती है पर बचपन का सा दिल नहीं दिखता। क्या हुआ जो बुजुर्ग, सीनियर सिटीजन हुए, अभी तो बहुत दमखम बाकी है, जमाने को बदलने का दम रखते हैं। सेकंड इनिंग के लिए, दूसरी पारी के लिए खूब तैयारी है। जीवन को अपने तरीके से जीने का समय तो अब है। ज़वानी में लिए गए संकल्पों को असली जामा पहनाने का असली मौका तो अब मिला है ।अभी तो बहुत कुछ करना बाकी है और तुम रोज बूढ़े बूढ़े की रट लगाए हो। जो जो जीवन की भगदड़ में छूट गया, उस सबको पूरा करने का सही समय तो अब है। तो तुम अपनी जिंदगी में मस्त रहो, हमें अपने हिसाब से जीने दो। हम तुम्हारी जिंदगी में दखलंदाजी से दूर रहें और तुम अपनी टोकाटाकी से। सब को इज्जत सम्मान से जीने का अधिकार है। सब जीओ और सबको जीने दो। होते होंगे वृद्धाश्रम, लोग भेज दिए जाते होंगे, मजबूरी लाचारी होती होगी उनकी। हम बरगे बुजुर्ग तो घर को ही आश्रम बनाने में यकीन रखते हैं , अपने जैसों को एक छत के नीचे लाने में विश्वास रखते हैं। बुजुर्ग होना सम्मान का सूचक है, बेचारगी और लाचारगी का नहीं।

बुड्ढा होगा तेरा......अभी मन जिंदा है, कुछ कर गुजरने का साहस उछाल मारता है, तो क्यों पिन पिन करते, रोते झींकते ज़िंदगी बिताई जाए। खुद जीओ शान से और दूसरों को जीने दो। ज़िंदगी बार बार नहीं मिला करती मेरे दोस्त, तो जब तक हो खूब जिंदादिली से जीओ, जाना तो निश्चित है पर जो पल तुम्हारे पास है उन्हें तो खुशी से जी लो।

गर्व से कहो हां, हम बुजुर्ग हैं, वृद्ध हैं, जीवन में खूब पके हैं, अनुभव समृद्ध हैं, तुम्हें हम से कुछ चाहिए तो लेने आ सकते हो, अवश्य देंगे, भरपूर देंगे पर हमें कोसना बंद करो, बुजुर्ग और बूढ़े बूढ़े का आलाप बंद करो। हम अकेलो को भी सम्मान से जीना आता है। तो गर्व से कहो हां हम बुजुर्ग हैं, वृद्ध हैं।

दिल ही तो है

 21.09.2022

दिल ही तो है ......

अब दिल तो दिल है, कब किससे लग जाए, इसका भला क्या भरोसा,दिल लगा गधी से तो परी क्या चीज है । ये दिल बड़ा बाबरा है। कभी आपके काबू में नहीं रहता। मर्जी चाहे जहां डोलता विचरता रहता है। फिर आपका दिल कहीं खो जाता है और आपको ही पता नहीं रहता। आप गाते डोलते हो .....जाने कहां मेरा जिगर गया जी, अभी अभी यहीं था किधर गया जी। ये दिल कभी आपको दिलदार बना देता है तो कभी दिलफैंक का तमगा दिला देता है और कभी इतना मायूस कर देता है कि आप रोते बिसूरते गाते हो "दिल के अरमान आंसुओं में बह गए, हम वफा करके भी तनहा रह गए" तो कभी हवा में उड़े उड़े डोलते हो "आज मैं ऊपर जमाना है नीचे" । दिल कभी उदास होता है तो कभी बल्लियों उछलता है  "दिल दीवाना बिन सजना के माने ना, ये पगला है समझाने से माने ना।दिल के कारनामे भी बड़े विचित्र है, किसी नकचढ़ी से लग जाए तो घुटी चांद पर जूते लगवा दें और जो किसी दिलवाले के हाथों चोरी हो जाए तो वह  दिल में आपकी मूरत बिठा आपको पूजने की हद तक प्यार करता रहे, बाकायदा आपको पूजती रहे, मनाती रहे, गुनगुनाता रहे..दिल में तुझे बिठा के, कर लूंगी मैं बंद आंखें, पूजा करूंगी तेरी, हो के रहूंगी तेरी। और जो कोई दिल लगा दिल्लगी कर जाए तो ठगे से बैठे रहिए। दिल तो दिल है जनाब, इसके कारनामे कहां तक बखानिएगा। पल में तोला पल में माशा है। कभी कहता है "दिल में बसा के प्यार का तूफान ले चले, हम आज अपनी मौत का सामान ले चले" तो कभी कह उठता है "दिल में किसी के प्यार का जलता हुआ दीया, दुनिया की आंधियों से भला ये बुझेगा क्या"। कभी दिल्ली दिलवालों की हो जाती है तो कभी दिल्ली से दिल वाले खदेड़ दिए जाते हैं। कभी "दिल ही दिल में तुम्हीं से प्यार किया , "परादेशिया ये सच है पिया सब कहते हैं मैंने तुझको दिल दे दिया, मैं कहती हूं तूने मेरा दिल ले लिया" जैसे नगमे गुनगुनाते हो तो कभी "दिल है छोटा सा छोटी सी आशा, मस्ती भरे दिल की छोटी सी आशा का" राग छेड़ देते हो।

           नाप में दिल भले छोटा सा हो इतना छोटा सा कि मुठ्ठी में समा जाए पर इसके कारनामे बड़े विचित्र है। जब तक धक धक धडकता है तभी तक जिंदा कहे जाते है, किसी के प्यार में पड़ जाए तो दिल धक धक करने लग पड़ता है और चित्रपट की नायिका "धक धक करने लगा कि मेरा जियरा डरने लगा" पे ठुमके लगाने लगती है। "दिल वाले ही दुल्हनिया ले जाने" का साहस रखते हैं। मुर्दा दिल क्या खाक जिया करते हैं। दिलदारों के क्या कहने, "चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो कि हम हैं तैयार चलो"। झुमका ही नहीं गिरता बरेली के बाजार में, आपका दिल भी चोरी हो जाता है। इस चोरी की कोई एफ आई आर भी नहीं लिखी जाती। बस फिर गाते रहिए "चुरा लिया है दिल को सनम" कोई वापिस नहीं देता। कुछ लोग का दिल दूसरों की खुशियां देख जलता रहता है। ये दिल जले कहे जाते हैं। खुद ख़ाली हाथ होते हैं तो किसी के हाथो में लडडू देख ही नहीं सकते। बस इधर की उधर लगाते रहते हैं। बहुत संभाल के रखना होता है इस दिल को, बड़ा नाजुक सा होता है, जरा से धक्के से टूट जाता है, कांच सा बिखर जाता है और फिर रोना पेंपना शुरू हो जाता है "दिल के टुकड़े टुकड़े कर के मुस्करा के चल दिए, जाते जाते ये तो बता जा हम जिएंगे किस के लिए" । और जो दिल किसी के प्यार में पड़ जाए तो आवारा पागल दीवाना कहाता है। बड़े बड़े किस्से हैं इस दिल के, संभाल के रखिएगा जनाब इसे। ये होता तो तुम्हारे शरीर के बाएं हिस्से में है पर कभी खो जाता है, किसी के हाथो बिक जाता है, गिरवी रख दिया जाता है। कभी दिल में कुछ कुछ होता है पर उसे कोई नाम नहीं दे पाते। बस "कुछ कुछ "होता है तो होता है घबराहटनुमा जैसा, डर जैसा, खुशी से उछलता हुआ। और कहीं जो दो दिल मिल जाएं तो धड़कन तेज हो जाती है और नेपथ्य में गाना बज उठता है "दो दिल मिल रहे हैं मगर चुपके चुपके, सबको हो रही है खबर चुपके चुपके" प्यार इतना गहरा जाता है कि दिल की गहराइयों से आवाज निकलती है"हां हम तुम्हें यूं भुला ना पाएंगे, दिल ही दिल में तुम्हीं से प्यार किया"  टाइप गाने कानों में बजने लगते हैं।तो दिल को धड़कने दीजिए साहब, धमा चौकड़ी मचाने दीजिए, खूब दिलदार बने रहिए, जिससे दिल लगे फिर दिल्लगी मत कीजिएगा, उसके दिल को चोट मत पहुंचाईएगा। बड़ा दुखता है साब जी। दिल की बात दिल वाले ही जानें। "दिल की बात बता देता है असली नकली चेहरा*।

            हमें तो गोपियों के हिय की बात अच्छी लगती है, ये हिया ही उनका दिल है, जिगर है, मन है। वे कृष्ण से बेबाकी से कह देती हैं "तुम कौन धो पाटी पढ़े हो लला मन लेत हो देहु छटांक नहीं" या "ऊधो मन नाही दस बीस, एक हूतो सो गयो श्याम संग को आराधे ईश" । ये  दिल धड़कता रहे , सलामत रहे तभी तक आप जिंदो की केटेगरी में गिने जाते हो । जहां इसकी धक धक बंद हुई, बस राम नाम सत्य हो जाता है। फिर दबाते रहिए दिल को, मुंह से फूंक फूंक कर हवा भरते रहिए, कुछ नहीं होता। रुक गया तो रुक गया। तो चौबीस घण्टे घड़ी की टिकटिक सी उसकी आवाज सुनते रहिए, धक धक धक मतलब आप जिंदा है। खूब शिद्दत से धड़कने दीजिए उसे, आख़िर दिल ही तो है।

Sunday, September 18, 2022

बस तेरा सहारा सच्चा है

 सफर जारी है.......1061

20.09.2022

बस तेरा सहारा सच्चा है........

मर्जी जितने सहयोगी हों, हाथ हों, मित्र हों, नाते रिश्तेदार हों पर मुसीबत में अपना आत्मविश्वास और बुद्धि ही काम आती है और वह बुद्धि, वह आत्मविश्वास, वह दृढ़ता, वह संकल्प शक्ति, वह निश्चयात्मकता, जो हाथ में लिया उसे पूरा करने का साहस, आत्मबल अपने अंदर से आता है चाहे कोई कितना भी समझाता क्यों न रहे। कभी कभी व्यक्ति पर अहंकार हावी हो जाता है कि मैं इतना बड़ा, मैं इतना प्रतिभाशाली, मैं ये भी कर सकता हूं, वह भी कर सकता हूं, सब मेरी मुठ्ठी में है, मैं ये करूं चाहे वो करूं, मेरी मर्जी। सब मुझसे गवर्न हों, मेरे कहे अनुसार चलें, और तो और प्रकृति भी मेरी अंगुली पर नाचे, सूरज तारे चंदा हवा पानी सब मेरे गुलाम हो जाएं। जब अहम का घेरा इतना बढ़ जाए तो भगवान जी बहुत जोर की पटखनी देते हैं, सारी अक्कल ठिकाने लग जाती है। हम मूर्खों को पता चल जाता है कि इस सृष्टि का नियामक तो कोई और है, नियंत्रित तो कहीं और से होते है, चाबी किसी और के हाथों में है। बस आप उतना ही चल सकते हैं जितनी चाबी राम जी भर देते हैं। याद तो होगा.... जितनी चाबी भरी राम ने, उतना ही चले खिलौना । बस जितनी हवा वह भर देता है, हम उतना ही उड़ पाते हैं और जैसे ही गुब्बारा फुस्स हुआ, धड़ाम से नीचे आ गिरते हैं।

मानुष की जात कितनी बेवकूफ और हठधर्मी है कि सब जानते बूझते भी स्वयं को स्वयंभू मानने लगती है। उसे बिलकुल याद नहीं रहता कि उसकी मर्जी के बिना तो पत्ता भी नहीं हिलता और वह ये माने बैठा है कि मैं ही सब कर रहा हूं। उसकी भृकुटि जरा टेढ़ी हो जाए तो भूचाल आ जाए, पृथ्वी डोलने लगे, सब उलट पलट हो जाए और तुम ये गुमान पाले बैठे हो कि जो हो रहा है, सब मैं ही तो कर रहा हूं। जो ये बात समझ आ जाए कि करने वाला तो कोई और है, हम तो उसके हाथों की कठपुतली मात्र हैं,वैसा ही नाचते हैं जैसा वह नचाता है। जनम हमार सफल वा आजु, प्रभू की कृपा भयहु सब काजू। प्रभु आपकी कृपा से सब काम हो रहा है, करते हो तुम प्रभुजी मेरा नाम हो रहा है। पतवार के बिना भी मेरी नाव चल रही है , हैरान हूं कन्हैया मंजिल भी मिल रही है। हां, प्रभू की कृपा हो तो मंजिल भी मिल जाती है। पर प्रभू कृपा करते हैं निर्मल ह्रदय वालों पर। निर्मल मन जन सोई मोहे भावा, मोहे कपट छल छिद्र न भावा। उसे ऐसे लोग बिल्कुल नहीं भाते जो मार कलुष से भरे हैं, जो कभी किसी का भला नहीं सोच पाते। चौबीस घण्टे ऐंठ में भरे रहते हैं। दूसरों को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। वे केवल अपने सगे होते हैं और उनका अपनो का घेरा बहुत संकुचित होता है। उन्हें तो इतना भी भान नहीं कि ये मेरा है ये पराया है ,ऐसा तो छोटे चित्त वाले सोचते हैं। उदार चरित वालो के लिए तो पूरी दुनिया कुटुम्बवत होती है, सब अपने होते है।

जब जब जीवन में पटखनी मिले तो समझ लो ईश्वर हमें सचेत कर रहे हैं कि हे मन मूरख अब भी चेत जा, बहुत बावला हो लिया, अब तो भज प्रभू को। राम राम रट, हरे कृष्ण हरे कृष्ण का जाप कर, ईश्वर चिंतन में ध्यान लगा। जब चेतना वहां केंद्रित होगी तो बुरा करेगा ही नहीं, सब अपने से लगने लगेंगे। पाप कर्म में अरुचि होगी। सत्संग में मन लगेगा। और जो ऐसा हो जाए तो दुनिया कितनी मनभावन हो जाती है। दूसरों के दोष मत देख, दृष्टि स्वयं पर रख, स्वयं को सुधार। कबीर को याद रख बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजा आपना मुझ सा बुरा न कोय। वो ऐसा है वो वैसा है बहुत कर लिया, अब अपने अंदर झांकने की बारी है कि मैं कैसा हूं, मेरा दूसरों के साथ व्यवहार कैसा है। जो दोगे वही पाओगे। बोया पेड़ बबूल का आम कहां से होय। सब अपना ही किया धरा है, उसी का फल भोग रहे हैं। भोगना तो होगा ही, उससे बचा नहीं जा सकता। बस जो प्रभू कृपा हो जाएं तो इसे सरलता से भोग लेंगे। कहते हैं प्रभु का निरंतर जाप आपको पाप और दुष्कर्म से दूर रखता है, आपके मन को निर्मल बनाता है, मन की कटुता और द्वेष को हर लेता है। फिर सीधा जपो या उल्टा, वाल्मीकि तो मरा मरा से ही तर गए। राम कहो कृष्ण कहो, किसी भी रुप को भजो, सब एक ही है। चाहे राम कहो या कृष्ण कहो दोनों का मतलब एक ही है।

और सहारे झूठे हैं बस एक सहारा सच्चा है। और वह सहारा ईश्वर का है। सब ओर से टूटकर हार कर व्यक्ति अंत में उसका शरणागत ही होता है। उसे सच्चे भाव से पुकारता है, उसकी पुकार जरुर सुनी जाती है। प्रभु आते हैं, उन्हें आना ही होता है, नंगे पैरों दौड़े आते हैं, भक्त की पुकार सुन रुक ही नहीं सकते। ध्रुव प्रहलाद जैसे भक्त के कठिन तप से उनका सिंहासन डोलने लगता है। वे तो भाव देखते हैं, वस्तु नहीं इसलिए तो दुर्योधन की मेवा छाड़ी साग विदुर घर खायो। झूठे सकरे का भेद मानते तो शबरी के झूठे बेर इतने प्रेम से कैसे खा लेते। प्रभू बहुत दयालु हैं। बस उन्हें ध्याना होता है, उनमें मन लगाना होता है। उसे साधने से सब सध जाता है। एकही साधे सब सधे सब साधे सब जाय, रहिमन सींचे मूल को फूलही फलहि अघाय। तो फुलक फुलक को मत सींचो, उससे कुछ नहीं होगा।

प्रभू दुख में रखो, सुख में रखो बस साथ बने रहो, सब निभ जाएगा, सब बंधन कट जायेंगे। इतनी कृपा बनाए रखना भगवन। इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले, गोविंद नाम लेके मेरे प्राण तन से निकले। श्री जमुना जी का तट हो, मेरा सांवरा निकट हो, मेरे मुख में गंगाजल हो उसमें भी तुलसी दल हो, बस प्रभू आपकी बांसुरी की तान सुनाई दे और ये प्राण छूटे। हम तो पापी हैं, हमें ये सौभाग्य जाने

 कब मिलेगा। यमुना तट के वासी है और पूजाघर में गंगाजल रखते हैं पर जो तेरी कृपा न हो तो सब ऐसे ही धरा रह जाता है। तो प्रभू जी, दया करो कृपानिधान, तेरी शरण है। तेरे द्वार खड़ा भगवान भगत घर तेरे डोले, तेरा होगा बड़ा अहसान, कि तेरी जुग जुग रहेगी शान भगत घर तेरे डोले। प्रभू बहुत भटक लिए बस अब अपनी शरण में लो भगवन। सारे सहारे झूठे है बस तेरा सहारा सच्चा है।

Friday, September 16, 2022

जो न समझे, वह अनाड़ी है

 सफर जारी है....... 1059

18.09.2022

जो न समझे, वह अनाड़ी है ........

जैसा कहा जाता है, सुना जाता है, वह सभी सच भी हो, ऐसा आवश्यक नहीं। पर जिसे श्रव्य और दृश्य दोनों इंद्रियों से सचेत होकर ग्रहण किया जाता है, उसे झुठलाना मुश्किल होता है। कहते सुना है न कि मैंने खुली आंखो से देखा है, दिन के उजाले में देखा है,यह बात झूठ हो ही नहीं सकती।कहन सुनन से अधिक विश्वास आंखों देखी पर किया ही जाता है। अब ये अलग बात है कि व्यक्ति ने इतना छद्म ओढ़ लिया है कि कभी कभी आंखे जो देखती है या जहां तक देख पाती हैं, वह पूर्ण सत्य नहीं हुआ करता। मानव व्यवहार इतना जटिल है कि उसे समझ पाना सबके बूते का नहीं हुआ करता। फिर सामने वाला भी अब इतना पारदर्शी कहां रहा कि जैसा है वैसा दिख सके। उसके मस्तिष्क, ह्रदय और कर्मेंद्रीय में समन्वय रहा ही कहां, सोचता कुछ है, दिल में कुछ और होता है और करता कुछ और है। यानि तीन एच में संतुलन नहीं बिठा पाता। ये तीन एच हैड, हार्ट और हैंड हैं। प्रसाद जी ने भी कामायनी में संकेतित किया ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है, इच्छा पूरी क्यों हो मन की, एक दूसरे से न मिल सके यही विडंबना है जीवन की।

जो अपने जीवन में पारदर्शी रहे, जिन्होंने जैसा सोचा वैसा कहा और जैसा कहा वैसा जीया, वे इतिहास के पन्नो में अमर हो गए। वे आज भी याद किए जाते हैं क्योंकि वे एक व्यक्ति नहीं जीवन पद्धति हैं, वे आदर्श हैं। उनके बताए रास्ते पर चलकर मंजिल को प्राप्त किया जा सकता है। राष्ट्रीयता के सजग प्रहरी काका कालेलकर के जीवन के उन प्रसंगों और संदर्भों को रेखांकित किया जाना बहुत महत्वपूर्ण हैं जिसने उन्हें बालकृष्ण दत्तात्रेय से काका बनाया। सत्य को लेकर उनकी बड़ी स्पष्ट धारणा थी। सत्य को कहना बहुत आसान है, सारा श्रम तो असत्य को गढ़ने, बात को गोल गोल घुमाने में लगता है, अपनी कमियों को, अक्षमता को छिपाने में लगता है। सत्य सहज स्वाभाविक है इसलिए सरल भी है उसे दो टूक कहा जा सकता है। सारी समस्या तो झूठ को गढ़ने में आती है। एक सत्य को छिपाने के लिए सौ झूठ गढ़ने पड़ते हैं और झूठ की पोलपट्टी न जानें कब खुल जाए, इसके लिए बहुत सतर्क रहना पड़ता है। तो किसी भी वस्तु व्यक्ति को देखने का अपना नजरिया बदलना होता है। हम तो किसी के विषय में सोचने से पहले अपना लाभ हानि देखना शुरू कर देते हैं। हम तटस्थ हैं कब, जिस डाल पर बैठे हैं उसे ही काटने में लगे हैं। जिस बर्तन में खाते हैं, उसी में छेद करते हैं। जिस संस्था से आजीविका ले अपना और बच्चे का पेट पालते हैं, उसी के प्रति निष्ठावान नहीं हैं। उसके प्रति हमारी कोई प्रतिबद्धता नहीं है। पशुपालक तक अपने पशुओं के प्रति संवेदन शील होते हैं और एक वर्ग वह है जो कालीदास की तरह मूर्खता कर उसी डाल को काटता है जिस पर बैठा है। पता नहीं, उसे बोध नहीं या वह खुट सयाना है।

अपने अपने कार्य दायित्वों को यदि प्रत्येक अपना धर्म मानकर पालन करे, पद को दायित्व मानकर अपने को कार्यकर्ता मानकर कार्य करे तो आधी से अधिक समस्याएं हल हो जाएं। संस्थाएं मजबूत तब हुआ करती हैं जब उससे जुड़ी हर एक इकाई अपने कार्य दायित्व का निष्ठा से निर्वहन करें। एक तो यह करो मत और जब कोई पूछे तो समस्याओं को गिनाना शुरू कर दो कि हमने तो पूरी फाइल तैयार कर रखी है। फाइलों का पेटा भरने से ही कार्य हुआ करते तो अब तक संस्थानों की सूरत बदल हो गई होती। अब एक व्यक्ति केबल इसलिए तैनात किया जाए कि वह एक एक को डिक्टेशन ही देता रहे, यही बताता रहे कि कया करणीय है और क्या अकरनीय तो फिर तुम्हें क्यों बिठाया गया है, तुम्हारे कार्य दायित्व क्या हैं। जिन्हें करना होता है वे रास्ता तलाश ही लेते हैं, सैकड़ों मरुभूमि में बेड़े चला देते हैं, पर्वतों को काटकर नदियां बहा देते हैं। जो कर्मवीर होते हैं उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं हुआ करता।

तो बड़े लोगो को पढा इसलिए जाता है, उन पर सेमिनार, संगोष्ठी, संवाद इसलिए ही आयोजित किए जाते हैं कि उन्हें गुना जाए, उनकी कार्य प्रकृति को समझा जाए, उनसे कुछ सीखा जाए। इन गोष्ठीयों का उद्देश्य मात्र पेपर पढ़ देना और प्रमाणपत्र वितरित कर देना ही नहीं हुआ करता। उन विशेष बिंदुओं को रेखांकित करना होता है जिनको कार्य व्यवहार में लाने से कुछ सुखद और सार्थक परिणाम मिल सके। बोलना मात्र बोलना नहीं हुआ करता, उसके पीछे आपका लंबा अनुभव हुआ करता है और उससे संस्थाएं लाभान्वित ही हुआ करती है। यात्राओं का उद्देश्य भी अपने लोगो से मिलना और उन्हें प्रेरित करना होता है जिससे आगे बढ़ा जा सके। जो पानी रुक जाता है, वह सड़ जाता है, उसमें से बदबू आने लगती है। तो निरंतर बहते रहिए, चलते रहिए, बाधाएं तो आती ही हैं, उनसे भी निपटा जाता है पर उनके भय से काम करना बंदऔर ठप्प नहीं कर दिया जाता ।

कभी समझा बुझा कर कभी निर्देशित कर तो कभी दंड का विधान कर काम करवाए जाते हैं पर ये सब स्वेच्छा से हो, भाव से हो, निष्ठा से हो, प्रतिबद्धता से हो तो अधिक सुखद होता है। तो हमने भी कबीर की तरह आंखो देखी लिख दी है। समझने वाले समझ गए जो न समझे वो अनाड़ी हैं।

Thursday, September 15, 2022

ये अविस्मरणीय यात्राएं

 सफ़र जारी है....1058

17.09.2022

ये अविस्मरणीय यात्राएं......

यात्राएं बहुत अनुभव संपन्न बनाती हैं बशर्ते आप आंख कान खुले रखें।गुजरात से गुजरात यानि सूरत से अहमदाबाद की यात्रा ने समझाया कि खाखड़ा, फाफड़ा,थेपला, गांठिया, खारे में भी मीठा, सींगदाना, कपडे , गरबा और हीरे का पर्याय ही  नहीं है गुजरात, बल्कि इससे इतर भी बहुत कुछ है जो गुजरात को गुजरात बनाता है। यहां की मिटटी में कुछ तो खास है जो इसे औरों से अलग करता है। नर्मदा, गोदावरी और कावेरी की त्रिवेणी है यहां, साबरमती है, यह गांधी और कालेलकर की जन्मभूमि है, लोग मिलनसार है, उनकी बोली में मिठास में है और सबसे बड़ी बात है कि अगले को ठगने का भाव नहीं। साबरमती के संत का आश्रम है, बा कुटीर 

 है, उसे देखते देखते वर्धा का सेवाग्राम  याद आ जाता  है।

               सच तो यह है कि कोई भी शहर आपके दिल और दिमाग़ में जगह बनाता है कि आपका संपर्क कैसे लोगों से हुआ, कौन कौन मिला, किस किस से मुलाकात हुई, किस किस को सुना आदि आदि। ये सारे के सारे प्रभाव आपकी यात्रा को सुखद अथवा कष्टकारी बनाते हैं। फिर आपके स्वभाव पर भी निर्भर करता है कि आप स्थितियों को किस तरह ग्रहण करते हैं, खुशमिजाज हैं या रोतडे हैं, छोटी छोटी बातों को दिल से लगा लेते हैं या हर फिक्र को धुंए में उड़ाते चलते हैं। आज सभा को संबोधित करते माननीय शास्त्री जी ने जब पुण्य का अंग्रेजी वर्जन पूछा तो सब बिलकुल मौन हो गए। उसका अंग्रेजीकरण हो ही नहीं सकता क्योंकि उस भाषा में पुण्य की कल्पना है ही नहीं ।विभिन्न क्षेत्रों में हिंदी के कार्यान्वयन में जुटे लोगों से मिलकर लगा कि विद्यालय, महाविद्यालयों, संस्थानों के अतिरिक्त भी हिंदी खूब फल फूल रही है। सब खूब खूब काम कर रहे हैं। बहुत जागरूक और समर्थ है। सबके पास सपने हैं, मंजिल की ऊंचाइयां है, साधन भले से कम हों लेकिन जज्बा कमजोर नहीं है। कुंए के मेढक बने बैठे रहो और उसी पानी को जगत समझते रहो तो तुम्हारी मर्जी, काम की अधिकता का रोना रोते रहो, उसे ही घोटते पीसते रहो तो कोई क्या कर सकता है। बाहर बास निकल कर समझ आता है कि हम कितने पानी में हैं, हमें क्या क्या और सीखना है, हम पिछड़ क्यों रहे हैं, अपने को अपडेट क्यों नहीं कर पा रहे हैं। असली मूल्यांकन तो बराबर वाले लोगों में बैठकर ही होता है नहीं तो घर में ही अपुन तुपन कर के तीसमारखा बनते रहो, मैं ये मैं वो करते रहो, जंगल में मोर नाचा किसने देखा।

      कितना कितना काम करते हैं लोग, केरल के संतोष अलेक्स ने जब बताया कि अनुवाद पर इनकी इतनी इतनी किताबें प्रकाषित हैं और तीन विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में लगी हैं तब लगा हम तो यूं ही रह गए। लोगों से मिलिए तो ,तब अपना आंकलन होता है, तब ऊंट पहाड़ के नीचे आता है। इस हवाई यात्रा में छोटी सी मुलाकात में ही गहरी छाप छोड़ गई पंजाब नेशनल बैंक, देहरादून की राजभाषा अधिकारी अरुणा ज्योति , जो पत्रिका भी निकालती हैं, खूब लिखती पढ़ती हैं, खूब व्यवहार कुशल और खुशमिजाज है, जल्दी ही सबके दिलों में जगह बना लेती हैं, बिंदास जीती हैं। अभी भी उसका मुक्त हास्य कानों में गूंज रहा है। प्रिय विशेष, अनामिका सिन्हा, परमेश्वर पाठक, डाक्टर अर्चना दुबे और भी न जाने कितने कितने परिचित चेहरे गड्डमद्द हुए जा रहे हैं, कुछ की शक्लें दिमाग में चस्पा हैं लेकिन नाम याद नहीं आ रहे हैं। और जो आज की यात्रा के वाहन चालक थे, रवी व्यास उनके शिष्ट व्यवहार ने  बहुत प्रभावित किया। वे जब अपने परिवार के विषय में जानकारी दे रहे थे तो लग रहा था लोग वैसे ही संस्कार हीनता की बात करते हैं, संस्कारी पिता अपने बच्चो में कूट कूट कर संस्कार भर देता है। दरअसल वह निर्देश देकर या उपदेश देकर नहीं सिखाता, अपने आचरण और व्यवहार से कथन को पुष्ट कर देता है, कहने की तो जरूरत ही नहीं पड़ती।

      यात्राएं मुझे अनुभव की दृष्टि से बहुत संपन्न करती हैं। हर बार कुछ नए पाठ जुड़ जाते हैं। अभी कल के प्रसंग और शेष है और फिर परसो सुबह जैसे उड़ जहाज को पंछी फिर जहाज पे आबे, की तर्ज पर अपने कार्यस्थल पहुंचे जाते हैं। सूरत यात्रा से जुड़े सभी सहयोगियों का आभार कि यात्रा को सुखद और अनुभव संपन्न बनाया।

सूरत का हिंदी मेला

 सफ़र जारी है....1057

15.09.2022

सूरत का हिंदी मेला......

हिंदी दिवस का पुण्य पर्व दो दिवसीय द्वितीय राजभाषा सम्मेलन के आयोजन के ब्याज से हिंदी की त्रिवेणी बही सूरत में। हां हां, वहीं सूरत जो गुजरात में है और जिस गुजरात ने शीर्षस्थ  नेतृत्व सहित सरदार बल्लभ भाई पटेल काका कालेलकर, महात्मा गांधी , दयानंद सरस्वती सदृश महापुरुष भारत को दिए हैं। लोग तो ये मुंह और मसूर की दाल पर कहने में जुटे थे कि ये सूरत और सूरत जाने का सपना पाले बैठे हैं जनाब। पर हिंदी के सम्मेलन किसी की सूरत पर थोड़े ही टिके होते हैं। वे तो सबके लिए सहृदय होते हैं, संवेदन शील होते हैं।हिंदी जन जन की भाषा है तो फिर आपकी सूरत ऐंचक बैंचक कैसी भी हो, वे आपकी सीरत देखते हैं और आपको आयोजन का हिस्सा बना ही लेते हैं फिर चाहें वक्ता हो ,श्रोता हो या दर्शक। मुख्य भूमिका में हों या सहायक, आप सम्मेलन के अनिवार्य हिस्से बन ही जाते हैं, अरे जब माननीय विद्वान बोलेंगे तो सुनने वाले भी तो चाहिए जो सुनकर जरुरी बातों को नोट कर उसे प्रसारित प्रचारित करें और अपने आचरण और व्यवहार में लाएं, उसे अपनी कार्य पद्धति में शामिल करें।

            हिंदी वालों के भाग से इस बार छींका सूरत में फूटा और हर तरह की सूरत वाले बन ठन कर सूरत पहुंच ही गए , उन्हें पहुंचना ही था क्योंकि हिंदी तुलसी की भवितव्यता की माफिक अपने चाहने वालों को, प्रेमियों को अपने पास बुला ही लेती है ... ताहि तहां ले जाए । फिर जो हिंदी के लिए दृढ़ संकल्पित होते हैं, वे तो किसी भी सूरत में सूरत पहुंच ही जाते हैं।ये जो हिंदी का मेला है, शिष्ट भाषा में इसे सम्मेलन कहा जाता है क्योंकि इस स्थल पर एक से सोच वालॉ और हिंदी के प्रचार प्रसार में लगे, उसके लिए पूर्णत समर्पित साधकों का सम्मिलन जो होता है। आयोजक मंडल तो अपने पूरे लाव लश्कर,सामान असबाब के साथ हफ्तों पहले से वहीं डेरा डाल देते हैं तब न आयोजन की इतनी दुरुस्त और चाक चौबंद व्यवस्था हम सब के लिए जुटा पाते हैं। और हम जैसे प्रतिभागी इलेवंथ आवर पहले भाग्मभाग करते ही सही,उड़नखटोला से  उतर सूरत मेले में सम्मिलित हो जाते हैं और सूरत की सूरत देख कर ही दम लेते हैं।

देखा तो सूरत बीस पच्चीस साल पहले भी था पर तब संदर्भ बाल गोपालों की पढ़ाई को लेकर था। इस बार हिंदी रंग में रंगे पगे और हिंदी भाव से भरे पूरे थे। तो और हिंदी इतनी गहरा रही थी, मन उछाह से बाबला हुआ जा रहा था कि अपने दल बल के साथ आ पहुंचे सूरत शहर में। 

 शहर सूरत की सूरत देखने में हमारी सूरत से क्या लेना देना था, वैसे भी कहन है नेक कामों में सूरत से कुछ नहीं होता, सीरत अच्छी होनी चाहिए। तो कुछ से सूरत यानि विशेष प्रभाव के साथ और कुछ अपनी सीरत के सर्टिफिकेट शो कर सूरत पहुंच गए। सभागार के मीलों आसपास विशाल जन समूह बिखरा था। सभी रंग बिरंगे परिधानों में अपने गले में परिचय पत्र लटकाए और प्रवेश पर्ची हाथ में पकड़े पंक्ति बद्ध खडे थे, बिल्कुल अनुशासित सिपाही की तरह। आख़िर ये सब हिंदी के योद्धा हैं जिन्हें शांति और गंभीरता के साथ पुरजोर तरीके से अपनी बात रखनी आती है। वे कहते कम करते अधिक हैं । उनका मानना है बात नहीं काम बोलता है। कितने कितने नए परिचय खाते में जुड़ गए, पटर पटर बोलने वाले, अपने को कुछ विशेष दिखाने वाले, बड़बोले टाइप और मौन हिंदी साधक जो स्वयं में ज्ञान आगार हैं, चलते फिरते पुस्तकालय हैं , सूचनाओं के अधिकृत स्रोत हैं।तो ऐसे हिंदी साधकों और हिंदी प्रेमियों से मिलना स्वाभाविक रुप से सुखद होता है। ऐसे मेले ठेलो में हिंदी प्रेमियों का जमावड़ा होता है, परिचय बढ़ता है, नई नई सूचनाएं मिलती है और आप भरे पूरे हो जाते हैं। आपस में हिंदी का सुख दुख बतरा लेते हैं, मन की कह सुन लेते हैं और हिंदी को शिखर पर ले जाने के रास्ते खोज लेते हैं। चिंतन मनन, आपसी वार्तालाप, और कहने सुनने से ही तो रास्ते निकलते हैं।

 पुस्तक प्रदर्शनी के ब्याज से अन्य प्रकाशनों, हिंदी के क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न अनुशासनो की कार्य प्रकृति को दिखने का अवसर मिला। नया सीखने के मौके हर जगह होते हैं बस सीखने जानने का मानस बना रहे। माननीय राज्य शिक्षा मंत्री, राज्य गृह मंत्री और केन्द्रीय गृह मंत्री का केन्द्रीय हिंदी संस्थान के प्रकाशन स्टाल पर आना और हमारा उन्हें गुजराती, सौराष्ट्री , चरोत्तरी भाषा के अध्येता कोष भेंट कर पाना संस्थान को गौरव भाव से भर देता है। जहां हिन्दी है, हिंदी की बातें हैं, हिंदी के विषय में विचार विमर्श है, हिंदी की पड़ताल है, हिंदी के उज्ज्वल भविष्य के सपने हैं, हिंदी का गौरवशाली इतिहास और परंपरा है, वह स्थान हम हिंदी साधकों के लिए पुण्य भूमि ही है। सादर नमन वदन करते दूसरे दिन के कार्यक्रमों में भागीदार बनते हैं। जय हिंदी जय भारत के उद्घोष के साथ कामना है कि ये हिंदी मेले लगते रहें और हम आप सभी से पुन: पुन: मिलते रहें, सीखते सिखाते रहें।

Tuesday, September 13, 2022

घूरे पे गुलाल, न बाबा न

 सफ़र जारी है....1056

15.09.2022

घूरे पे गुलाल, न बाबा न.......

सबके लिए करो जरुर ,मरो ज़रूर पर जब लोग आपको यूज करने लगें तो सावधान होना बनता है। सीधे सादा होना और बेवकूफ , सिंपल और सिंपलटन होना दो अलग अलग बातें हैं। प्राणि मात्र के लिए संवेदन शील होना,सबकी सहायता के लिए सदैव तत्पर रहना, सबका हित साधना तो अच्छी बात है पर यदि अगला आपको बेवकूफ समझ आपका दुरुपयोग ही करने लग पड़े तो न केवल सावधान हो जाएं बल्कि सतर्क भी हो जाइए। जानते समझते तो आप सब है कि जो अति का सीधा होता है वह जीवन भर कष्ट उठाता है, देखो तो मीठे गन्ने को कोल्हू में पेला जाता है और कड़वी तीखी चीजों को थू थू थूका जाता है। वन में भी सट्ट सीधे पेड़ ही पहले काटे जाते हैं ,टेडे मेडे तो वैसे ही अनुपयोगी मान छोड़ दिए जाते हैं। उनके सीधे करने में, छील खुरचने में कौन वक्त बेकार करें, इन अड़ियलो के संग जितना दिमाग और समय लगाएगा, उससे आधे में तो खुद ही कर लेगा। तो दुष्टों और खलो से सब दूर रहना ही पसंद करते हैं। गोस्वामी तुलसीदास तो मानस के प्रारंभ में ही ऐसे खलो की वंदना कर लेते हैं और आगे कह भी देते हैं दुष्ट संग नहि देय विधाता, ताते भलो नरक कर बासा। कुछ उन्हें दूर से ही प्रणाम कर लेते हैं कि इनसे तो दूर की राम राम भली, कौन अटके ऐसों से, बिना बात ही दिमाग खराब करो, ऐसों की तो सुन के उका जाओ, ज़बाब ही मत दो, कान ही मत दो, अनसुना कर दो, आवाज घूंट जाओ, उनके सामने ही मत पड़ो, रास्ता बदल लो, क्या फायदा ऐसों के मुंह लगने से, चुप ही भली। तो कुछ उनके प्रति उदासीन हो जाते हैं और कुछ उन्हें ऐसे काम सौंप देते हैं जो देर सबेर पूरे हों भी तो कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता।

           जिन्हें केवल अपना स्वार्थ ही दिखता हो, जिनकी आंख में सुअर का बाल हो, उन्हें भला किसी की सज्जनता,सहृदयता,दयालुता, कर्तव्य परायणता, निष्ठा से भला क्या लेना देना। जैसे भी हो बस इनका काम बनना चाहिए, उनका स्वार्थ सिद्ध होना चाहिए फिर वे आपको दूध में से मक्खी की तरह निकाल फेंकेंगे, उनके जाने आप भाड़ में जाओ, चूल्हे में जाओ, उन्हें आपसे क्या लेना देना। लेना देना तो केवल तब तक था जब तक आपसे उनका काम सध रहा था, मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं, अब यूं जा रहे हैं कि हमें जानते नहीं। इन जैसों का तो वही डौर है कि अपना काम बनता, फिर भाड़ में जाए जनता। अब आपको यदि ऐसों कृतघ्नो पर बहुत लाड आ रहा है तो आप अपने को प्रस्तुत करते रहिए, उनकी बला से। वहां उड़द पे सफेदी भी नहीं आयेगी चाहे आप कर कर के मर ही क्यों न जाओ। वो तो मरने की खबर सुन ये और कह देंगे कि अरे ये काम और निबटा जाता तभी मर लेता यानी उनके काम पूरे होने से पहले आप मर भी नहीं सकते।आप को ज्यादा ही पिदने का शौक है तो धा पा के लगे रहो, चला नहीं जा रहा हो तो भी लंगड़ाते लंगड़ाते गर्म नर्म रोटी परस के खूब खिलाए जाओ, कोई मना भला क्यों करेगा। शरीर तुम्हारा, तुम्हें ही चिन्ता नहीं है, तुम्हें ही अपनी परवाह नहीं तो दूसरा क्या करेगा। देखो भाई जब तुम नहीं रहोगे तो भी सब काम होंगे, सब वैसी आदत डाल लेंगे तो तुम्हारे करने से सब बदला नहीं जा रहा और हट जाने से आसमान गिरा नहीं जा रहा। तो जितना बस का हो, जितना कर सको खूब कर दो। मन भा रहा है तो करो। किसी दवाब में मत करो। और  मुफ़्त की सेवा भला किसे बुरी लगती है। मुफ्त का चंदन, घिस मेरे नंदन। सो आपके पास जरूरत से ज्यादा है, और भरपूर है तो खूब बांटो, तुम्हारे हाथ पैर में दम हो तो खूब करो।दोनों हाथ उलीचिए यही सयानो काम। 

           करने की दिली इच्छा हो और भलेमानस बनने का रोग लगा हो तो आदमी स्वेच्छा से जान हथेली पर रखकर  सेवा के क्षेत्र में निकल जाता है, फिर किनने क्या कही, उसे परवाह नहीं होती। आप सोच लेते हो  उनका किया उनके साथ है और मेरा मेरे साथ। जैसी करनी वैसी भरनी , बोया पेड़ बबूल का आम कहां से हो, जो जैसा करेगा वैसा भरेगा, जैसा बोओगे वैसा काटोगे,सूधे का सदा भला बरगी बातें बोल बोल कर अपने को तसल्ली देते रहते हो। ये बातें कहने  सुनने में बहुत अच्छी लगती है पर व्यवहार में लाने में बड़ा कठिन होता है । आखिर तो आप मनुष्य ही हैं, आप में भी भावनाओ का अथाह सागर हिलोर लेता है , बुरा भला आपको भी लगता होगा, ठगे जाने का दुख भी मनाते होंगे, उन क्षणों को कोसते भी होंगे कि जब आप ऐसों के चंगुल में पड़ गए। तो जब महसूस होने लगे कि आपके करने का कोई मतलब नहीं है, यहां सब धान बाईस पसेरी गिने जाते हैं तो घूरे पर गुलाल डालना बंद करो। भरे पेटो में ठूंसने का कोई फायदा नहीं। अपात्र को देना देने का अपमान है। जिसके लिए दिन रात मगज मारी कर रहे हो, उस पर कोई असर नहीं, घर की मुर्गी दाल बराबर है। तुम तो लुटा लुटा के खाली हुए जाओ और उनकी आंखों के तर ही न आबे तो कया जरूरत है खुद को खोखला करने की। किसी को उतना ही देना चाहिए जितने की उसे जरूरत है। जरूरत से अधिक तो वैसे भी इधर उधर लुढ़क जाता है। तो करो ज़रूर पर घूरे पे गुलाल डालने की कोई जरूरत नाय। हमने तो कान में ऐंठा दे लयो, न बाबा न , हमें तो कर्रे वाले हाथ लग गए , तिहाई मज्जी डालो तो खूब डालबो करो।

हिंदी हूं हिंदी

 सफर जारी है ....1055

13.09.2022

हिंदी हूं हिंदी....... 

हां, मैं हिंदी हूं हिंदी ,हिंद की हिंदी, हिंदुस्तान की हिंदी। सितम्बर की चौदह तारीख मेरे नाम है सो आज का दिन मेरा है, दिन ही क्या, सप्ताह, पखवारा, माह सब मेरा ही है। देखा नहीं क्या, हर स्कूल , कालेज, संस्था में इस महीने तो मैं ही मैं छाई रहूंगी। मेरे नाम पर गुजरात के सूरत में एक बड़ा मेला लगा है, क्या कहते हैं उसे राजभाषा सम्मेलन, हां, तो राजभाषा हूं तो मुझे खूब मान मिलता है, बड़े बड़े लोग मंच पर बैठ मेरा गुणगान करेंगे, मेरे विकास, मेरे प्रचार प्रसार के लिए योजना बनाएंगे, विद्वान भाषण देंगे , कुछ से लेख लिखेंगे, कुछ प्रपत्र का वाचन करेंगे, स्कूली स्तर पर गीत संगीत, अंत्याक्षरी, नाटक, कविता प्रतियोगिता होगी। कुल मिलाकर मेरे खूब चर्चे होंगे, जगत हिंदीमय हो जाएगा, मैं फूली नहीं समाऊंगी, मेरी खुशी की कोई सीमा नहीं होगी।

पर ये दिन बीतते, सप्ताह बीतते, माह बीतते मेरी खुशी काफूर हो जाएगी, मेरे मस्तिष्क पर चिंता की लकीरें गहरा जायेंगी, मैं फाइलों और दस्तावेज में बंद कर दी जाऊंगी, जो आज मुझे केंद्र में रख ताली बजा गोल गोल घूम और नाच रहे हैं, वे सब मुझे अकेला छोड़ अन्य अन्य कार्यों में व्यस्त हो जाएंगे। मेरी ओर मुंह उठा के देखेंगे भी नहीं, मैं अपनी दुर्दशा पर अकेली ही रोती और सुबकती रहूंगी। जो आज मेरे नाम का जप सा कर रहे हैं ,हिंदी हिंदी जप रहे हैं, मैं उनके ह्रदय में बसी होती तो वे एक माह बाद मुझे भुला थोड़े ही देते। वे आडंबरी ज्यादा है, करते कम गाते अधिक हैं, उनका हिंदी जप ठीक वैसा ही है जैसा माला तो कर में फिरे जीभ फिरे मुख माहि, मनवा तो चहुं दिश फिरे यह तो सुमिरन नाहि। ये बड़बोले मेरे कार्यक्रमों के नाम पर ही एक बड़ी राशि फूंक देते हैं और मेरे हाथ कुछ नहीं आता।

तो सुनो मेरा निवास स्थान कहां है, मैं रहती कहां हूं, पनपती कहां हूं। लक्ष्मी धन की देवी के आगमन के लिए आप घर में खूब सफाई रखते हो न, कोना कोना साफ करते हो न तो मेरे लिए भी अपने मन के कोनो में स्थान बनाओ, मुझे मन से सीखो, मेरा रोज प्रयोग करो, मुझे व्यवहार में लाओ। मैं तो रोज़ रोज़ सीखते तुम्हारे अनुभव की विषय वस्तु बनती हूं। तो जो सीखो उसे रोज रोज दोहराओ, लिखो, सुनाओ, बोलो तब तो मुझे सीख पाओगे।

हां, मैं बहुत सरल हूं, जलेबी जैसी गोल गोल घुमावदार और उलझी हुई नहीं। जैसी बोली जाती हूं वैसी ही लिखी जाती हूं। पी यू टी पुट और सी यू टी कट जैसा मेरा उच्चारण नहीं हूं, जो हूं जैसी हूं वैसा ही बोले जाने में यकीन रखती हूं। मुझे सीखना जानना बहुत सरल हैं, मुझे ही क्या सारी भारतीय भाषाओं को सीखना आसान है। जो अपना होता है उसे जानने समझने में भला कहां समय लगता है। तो पहले वर्णमाला लिखना और उच्चरित करना सीखो, फिर वर्तनी को सीखने को हर व्यंजन का मात्रा सहित अभ्यास करो, बारह खड़ी की प्रेक्टिस ज्ञान में बहुत इजाफा करती है। जानते तो होगे बारहखड़ी है क्या, क का कि की कु कू के कै को कौ कं क:, गिनो कितने हो गए बारह ही न, तो हर व्यंजन के साथ इस क्रम को बार बार दोहरा लो, खूब लिख लिख के देख लो, बोलने की खूब प्रेक्टिस कर लो। फिर संयुक्त अक्षर लिखने सीख लो कि खड़ी पाई अंत में हो तो उसे हटाकर दूसरा व्यंजन जोड़ दो म्यामार, म की खड़ी पाई हटा दी न और या लिख दिया। बिल्कुल ठीक। अब मध्य में खड़ी पाई हो तो घुमावदार हिस्से, हुक को हटाकर अगला व्यंजन जोड़ दो, उदाहरण भी दें क्या, लो इस क्या को देख लो। आ गया न समझ। जो व्यंजन गोलाकार आकृति के हैं उनके नीचे हलांत लगा दो, मतलब दो व्यंजनों को जोड़ते एक में से कुछ मायनस करके ही दूसरा जोड़ा जाता है । र के रेफ को विशेष रुप से जान लो। ये कभी ऊपर उड़ाया जाता है तो कभी व्यंजन के साथ अपनी दोस्ती कर लेता है। जो संयुक्त व्यंजन लिखना सीख गए तो अनुस्वार अनुनासिकता का अभ्यास कर लो। बस अब तो विरामादि चिह्न सीखना शेष है। कहां अल्प विराम लगेगा और कहां पूर्ण विराम, कहां प्रश्नवाचक चिह्न लगेगा और कहां संबोधन चिह्न। अब  दो व्यंजनों को मिलाकर शब्द गढ़ना शुरू करो धीरे धीरे तीन चार पांच छह तक के अभ्यास में भी निपुण हो जाओगे। सरल सरल वाक्य लिखो, ये लिखना आ जाए तो संयुक्त वाक्य बनाओ, अनुच्छेद लिखो, पृष्ठ दर पृष्ठ लिखते जाओ। पहले देख कर लिखो, टीपो, उतारो फिर खुद सोच सोच के लिखो। जो मन में है सब लिख डालो, गुरुजी को दिखा दो, जो गलत हो उसे दुबारा सीख लो, बहुत होगा तो डांटेंगे, हो सकता है दो थाप लगा दें पर सीख तो जाओगे न ।बस तो सीखना जरुरी होता है। जो एक बार लिखना बोलना पढ़ना सुनना समझ आ गया तो दूसरे को भी सिखा सकोगे। बस दूसरा तीसरे को तीसरा चौथे को और ये क्रम बढ़ता ही जाएगा, मैं विस्तृत होती जाऊंगी, मेरा प्रसार क्षेत्र बढ़ता ही जाएगा, पूरे हिन्द में क्या पूरे विश्व में मेरा परचम लहरेगा। बस तुम कर्मयोगी से लगे रहना। नित साधना करना। लोगों तक मुझे पहुंचाना। मुझे मौन साधक बहुत पसंद है जो अनवरत मेरे प्रचार प्रसार में लगे रहते हैं।

     तो तुम भी बनो मौन साधक, करो खूब गाओ कम, मुझे पालो पोसो,दुलराओ, अंक में भरो, मैं तो भाव की भूखी हूं जो मुझे भाव से भजता है, मुझे ध्यान से सीखता है, परिश्रम से पोसता है, उसके पास तो मैं दौड़ी दौड़ी आती हूं। मैं हिंदी हूं हिंदी, करोड़ों की कंठहार, अपनी सहोदराओं के साथ प्रेम से रहती हूं, मेरा किसी से विद्वेष, वैर भाव नहीं, मैं तो सबसे लेकर अपने में समाहित कर लेती हूं। तो बोलो जय हिंद जय हिंदी।

पितर गया भेज दिए गए हैं

 सफर जारी है.....1054

12.09.2022

पितर गया भेज दिए गए हैं.......

श्राद्ध पक्ष में पितर धरती पर आते हैं अपने प्रियजनों को आशीर्वाद देने, उनकी कुशल मनाने और उनका लोकमंगल चाहने। स्वजन भी पितृपक्ष में अपने अपने पितरों का जल में काले तिल डाल कुशा से तर्पण करते हैं, अग्नि प्रज्वलित कर पितरों का आवाहन करते हैं, घी,लौंग, परसी थाली में से मीठा और पूरी के टूक से उन्हें जिमाते हैं, जलती अग्नि पर जल छिड़कते हैं, कौए, गाय, कुत्ते, भिखारी का भाग निकालते हैं और फिर ब्राह्मण के ब्याज से उन्हें भोजन खिला तृप्त कर दक्षिणा दे विदा करते हैं और मन ही मन संतुष्ट हो लेते हैं। जब से होश संभाला है, घर में बाबा दादी का श्राद्ध ऐसे ही होते देखा है। ससुराल में भी कमोवेश यही प्रक्रिया दोहराई जाती रही है। कुछ ज्यादा पढ़े लिखे लोग जो इस सबमें विश्वास नहीं करते, इसे ढकोसला मानते हैं, वे गाय को घास खिला, किसी अनाथ या वृद्ध आश्रम में जा दान दे आते हैं, किसी भूखे को भोजन करा आते हैं। जिसको जिसमें सन्तोष मिले, वह वही कर लेता है पर पितरों को खूब मान देता है। जीते जी भले उन्हें सूखी रोटी के दो टुक्कड़ मिले न मिले पर स्वर्गस्थ होते ही, दूसरे लोक का प्राणी होते ही उनके लिए देशी घी की पूरी, इमरती, दही बूरे और भी उस बहुत कुछ का प्रावधान भी हो जाता है जो भले से उनके बजट में नहीं समाता। इस पक्ष में सोलह दिन तक किसी न किसी रिश्तेदार का श्राद्ध अवश्य रहता है। पूर्णिमा से प्रारंभ होकर अमावस तक की तिथियां पूर्वजों के नाम कर दी गईं हैं, इन्हीं तिथियों में से ही किसी दिन उनके प्राण छूटते हैं।

छह दशकों में पहली बार ऐसा हुआ है कि पूर्णिमा, पड़वा, दौज़ सूने रहे हो, दादी सास, ददिया ससुर, बड़ी बहू और माताजी किसी को जिमाया तक न हो। अभी तो श्वसुर, सास, पिता की तिथि आनी शेष है। इस बार  चूल्हे पर न कढ़ाही चढ़ी है और न इमरती का भोग लगा है, न खीर बनी न दहीबड़े और न अदरक डाल के मूली कस और न मूली की भुजिया। न जिजमान जिमाए गए हैं, न दक्षिणा न दानदिया गया है। नहीं नहीं ऐसा बिलकुल नहीं है कि हम अति आधुनिक हो गए या अपने संस्कार भूल गए हों, हमारी श्रद्धा समाप्त हो गई हो, कदापि नहीं बिल्कुल नहीं, अरे उन्हें कैसे भुलाया जा सकता है भला, वे तो अब भूत हो गए हैं और मनों में गहरे जम गए हैं। लोकश्रुति के अनुसार जिनका पिंड दान गया में जाकर भर आते हैं, उन्हें वहां प्रतिष्ठित कर आते हैं, उन्हें उनके परम धाम पहुंचा आते हैं तो फिर उनका श्राद्ध वर्जित है। श्राद्ध भले से ही न किया जाए पर श्रद्धा का भाव अधिक से अधिक गहराता जाता है। कुछ माह पूर्व पटना की यात्रा के सुयोग बनने पर हम भी गया जाकर अपनी तीन पीढ़ियों के पिंड भर आए हैं। अब सालाना परंपरा गत विधि से श्राद्घ करने की औपचारिकता भले से न हो, पर श्रद्धा भाव से उन्हें याद करने पर तो कोई प्रतिबंध नहीं है। आश्चर्य है जो पितर अपनी तिथि वाले दिन स्वप्न में साकार हो जाते थे, उन्हें देख कर समझ आ जाता था कि अरे, आज तो इनकी तिथि है। पर इस बार तीन दिन बीते जा रहे हैं पर न तो बूढ़ी दादी सास जिन्हें प्रत्यक्ष देखने का सौभाग्य ही नहीं मिला, बड़ी बहू और माताजी आज रात सपने में भी नहीं आए तो मान लें कि पितर अपने अपने स्थान पर सचमुच चले गए हैं। वे इस पितर पक्ष में घर भले न पधारे हों पर अपने गोलोक धाम से दोनों हाथ उठा हमें आशीर्वाद अवश्य दे रहे होंगे। हमारी कुशल मंगल अवश्य मना रहे होंगे। वे हमारे बड़े हैं, पूज्य हैं, श्रद्धास्पद हैं, हमारे मन में गहरे धंसे हुए हैं। उन्हें किसी ब्याज से याद थोड़े ही करना पड़ता है। वे हैं जरुर फिर चाहें वे किसी भी जगत में क्यों न हों। कुछ माह पूर्व ही उन्हें अपने हाथों से विष्णु लोक के परम धाम भेज कर आए हैं। अब वे आवागमन से मुक्त हो गए हैं। वे भले से मुक्त हो गए हों पर हम जीवधारी तो अभी तक माया मोह में फंसे हुए हैं, कहां विमुक्त हो पाए हैं। सब तो यादों में बसा हुआ है। रोज एक एक चैप्टर अपने आप आंखो के आगे खुलता चला जाता है और तिथि विशेष पर ज्याड़ा गहराता जाता है। साथ बिताए क्षण मन पर हावी होने लगते हैं, उन क्षणों को खूब भाव मग्न हो कर जी लिया जाता है।

       जो हैं और जो शेष हो चुके हैं, सब अपने ही हैं। वे अपने ही बने रहें, बस इसी में सारा सन्तोष है। हम श्रद्धा से उनके साथ बने रहे, उतना ही पर्याप्त है। कभी हमें भी इतिहास ही बन जाना है, इन्हीं सोलह तिथियों में ही हमारे जन्म मरण की तिथि निहित है। इन्हीं में से किसी को हमें गोलोकवासी होना है, जीवन मरण से, आवागमन के बंधनों से मुक्ति पानी है , भूत हो जाना है, अपने आत्मजो के हाथो तर्पित होना है,श्राद्ध का भोजन पाना है, काक के ब्याज से पुकारे जाना है, सूक्ष्म हो जाना है। हम सबको देख सकेंगे पर हमारे आत्मीय हमें स्थूल रुप में नहीं देख पाएंगे इसलिए वे किसी ब्राहमण रुप में हमें खोजेंगे, हम तक भोजन पानी पहुंचाएंगे, कभी पीपल पर घड़ा बांध आऐंगे तो कभी किसी प्यासे को भरपेट जल पिला हमें तृप्त कर देंगे। हम सब की गति और नियति यही है। एक दिन हम सबको भूत हो जाना है, श्राद्ध के निमित्त अपनों की कुशल मंगल लेने आना है, उन्हें फलने फूलने का आशीष देना है, अपनी लगाई बेल को हरहराते देखना है। बस तो जो आज है वह भी हमारा है और जो कल होगा, वह भी हमारे नाम होगा। रहें न रहें हम महका करेंगे, श्रद्धा भाव से याद किए जाते रहेंगे, श्राद्ध के ब्याज से पकवान पाते रहेंगे और एक दिन गया में स्थापित कर दिए जाएंगे।

पाठशाला जीवन की

 सफर जारी है....1053

11.09.2022

पाठशाला जीवन की........

विद्यालय महाविद्यालयों  की कक्षाओं में बहुत पढ़ लिख लिये, खूब डिग्री डिप्लोमा प्रमाणपत्र बटोर लिये, प्रथम द्वितीय तृतीय आते रहे और अपने को खूब फन्ने खां समझते रहे, अपनी उपलब्धियों पर मार इतराते रहे कि मैं ये मैं वो, मुझसा कोई नहीं, देखो मुझे मिले मैडलों और प्रशस्ति पत्रों से पूरा घर भरा पड़ा है, मेरे अध्यापक और सहपाठी मेरी खूब प्रशंसा करते हैं, स्वप्न लोक में विचरण करते रहे पर जब जीवन के कठोर और यथार्थ धरातल से सामना हुआ तब पता चला कि ये पढ़ाई लिखाई, ये मेडल, ये शील्ड ये पुरस्कार सब के सब एक कोने में धरे रह गए, जिन प्रश्नों और कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, उनके उत्तर और समाधान तो किसी भी कक्षा में किसी भी अध्यापक द्वारा बताए ही नहीं गए हैं, बताना तो दूर उनका जिकरा भी नहीं क्या गया। जाने किया क्या रटते रहे हम, रट्टा मार मार के खूब कापी भरते रहे हम, मास्टर जी ने सब सही सही बताया, कुछ भी नहीं काटा और न कापी पर कोई लाल लाल गोले बनाए, खूब झोली भर भर के अंक दिए। जब सब कुछ सही था तो उस सही को व्यवहार में लाते ही सब गड़बड़ कैसे हो गया। सब लिखा पड़ा बरबाद कैसे हो गया। जो जो सिद्धांतत सीखा सिखाया गया, उसे प्रयोग करते ही हम गलत कैसे ठहराए जाने लगे, सबके माथे पर लकीरें क्यों पड़ गई, सब नाराज क्यों हो गए। सब उसे झुठलाने में क्यों लग गए।

यदि सत्य का पाठ झूठा था तो तीसरी कक्षा की पुस्तक में सत्यवादी हरिश्चंद्र,सच्चा  बालक का पाठ क्यों पढ़ाया गया, श्रवण कुमार की मातृ पितृ भक्ति के प्रसंग क्यों बार बार दोहरवाए गए, गांधी की सत्य अहिंसा का पाठ क्यों पढ़वाया गया, राखी,नन्ही लाल चुन्नी, झूठा गडरिया, लालची और चालाक लोमड़ी, बंदर और मगर, सोने का अंडा देने वाली मुर्गी, आरुणि, एकलव्य, ध्रुव, प्रहलाद के प्रसंग बार बार क्यों सुनाए जाते रहे। इन्हें पढ़ते जो मानस तैयार हुए, जिस तरह के सुनहले स्वप्नो की दुनिया रची गई, जो सब्जबाग दिखाए गए, वे सब आज बिखरे क्यों जा रहे हैं, इतने इतने बिखर गए हैं कि समेट में ही नहीं आ रहे, सदा सच बोलो, झूठ बोलना पाप है, चोरी का माल मोरी में जाता है, सच्चे का बोलबाला, झूठे का मुंह काला जैसे वाक्यों की खुश्कत , इमला, इन्हें बीस बीस बार लिखने का निर्देष सब धुंधलाते जा रहे हैं, मंच पर वाद विवाद में अपना पक्ष दृढ़ता से रखते, भाषण वक्तव्य देते जो तालियों की गूंज से हाल गूंज उठता था, आज वही तालियां कानों में जहर बुझे स्वरों में क्यों बदलती जा रही हैं। सिखाया तो ये गया था कि न तो अन्याय करो और न अत्याचारी, अनाचारी, अन्याय करने वाले का साथ दो। यदि तुम ऐसों के साथ खड़े हो, कोई विरोध नहीं करते फिर चाहें चुप्पी का कोई भी कारण क्यों न हो, आप पाप और अपराध में लिप्त माने ही जते हैं, आपकी चुप्पी भी स्वीकृति ही है मौनम स्वीकृति लक्षणम।

पढ़ाया तो ये गया था कि प्रकृति की तरह देना सीखो, प्रकृति हमें देती है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखें, सूरज हमें रोशनी देता, हवा नया जीवन देती है, भूख मिटाने को हम सबकी धरती पर खेती होती है, औरों का हित हो जिसमें हम कुछ ऐसा करना सीखें, हम भी तो कुछ देना सीखें। हमें पढ़ाया गया परोपकारम सदा विभूतय कि नदियां अपना पानी स्वयं नहीं पीती, पेड़ अपने फल स्वयं नहीं खाते, संत पुरुष बिच्छू जैसे बार बार काटने डंक मारने वाले की भी रक्षा ही करते हैं, हमें दधीचि,कर्ण और शिवि की दानशीलता के प्रसंग रच पच कर सुनाए गए, सीता सावित्री लक्ष्मीबाई जीजाबाई की कहानी सुनाई जाती रही, बड़े बड़े महापुरुषों के जीवन की घटनाएं बताई जाती रहीं और जब ऐसा मानस तैयार हो गया तब बार बार सुनाया जा रहा है कि ये सब बातें परीक्षा पास करने कराने के लिए हुआ करती हैं। इनका जीवन की वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं हुआ करता। तो जो अब तक पूरी वसुधा ही  कुटुम्ब है जैसे सूत्र पढ़ते रटते रहे, उन्हें भूलो और जो जीवन का सच है उसे समझो।

जीवन की पाठशाला में प्रवेश करते ही सारे आदर्श बिला गए, सारे सूत्र गड़बड़ा गए, जो पढा जो सीखा जिसके बल पर उपाधिया बटोरी, मेडल और प्रशस्ति पत्र पाए, उस सबको भूलने के लिए कहा जा रहा है, जो गणित पढा, जिन फार्मूलो को रटा, सब आउटडेटेड हो गए, सारी की सारी कहावतें, मुहावरे, लोकोक्ति बेकार हो गईं। सांच को आंच कहां जैसी बातें गई तेल लेने। अब तो निकम्मो, कामचोरो, झूठे, बकबकियों, आलसी, बड़बोलो की फौज तैयार हो रही है। संवेदना और करुणा अलग थलग पड़ गईं हैं, उन्हें कोई कौदी के भाव भी नहीं पूछता, सत्य से सब आंख चुराने लगे हैं, जो कर सकते थे, उन्होंने गांधारी की तरह आंख पर पट्टी बांध ली है, पिता धृतराष्ट्र की तर्ज पर केवल और केवल अपने दुर्योधन को राजगद्दी दिलाने में लगे पड़े हैं। पुत्र मोह इतना अधिक गहरा गया है कि उन्हें सत्य असत्य, न्याय अन्याय में भेद करना भारी पड़ रहा है, द्रौपदी का चीर बढ़ाने अब कृष्ण नहीं आया करते, द्रौपदी को ही आगे आना पड़ता है। भीष्म पितामह भला मौन के अलावा क्या कर सकते हैं। वे दुर्योधन का नमक जो खा रहे हैं और अपनी प्रतिज्ञा से बंधे हुए हैं।

जीवन की पाठशाला  जो पाठ पढा रही है वह पहले पढ़े पाठों से बिलकुल भिन्न है। अब दुविधा में है कि सच कौन सा है जो किताबों में लिखा था वह या जिसे अब नंगी आंखो से देख रहे हैं वह। अब तो झूठ और अन्याय ही फलता देख रहे हैं, सत्य पर झूठ हावी है, जो कुछ नहीं करते, वे जोर जोर से बोलकर सही को धमकाते धकियाते रहते हैं। अब सारा समय तो इन कुत्सित लोगों की चालों से बचने और उनसे निपटने में ही चला जाता है। उनके पास पैसे और सिफ़ारिश का बल है, उनकी ऊंचे लोगों में पैठ है, वे कुछ भी कर सकते हैं , सफेद को काला करने की कुब्बत रखते हैं और सही लोग बेचारे एक कोने में उपेक्षित से पड़े रहते हैं। जो जीवन की पाठशाला सिखा रही है, सत्य तो वही है। पर फिर भी पिछले पढ़े पर, उन जीवन मूल्यों पर विश्वास गहरा है कि झूठ के पैर नहीं होते, उसे घुटने टेकने ही पड़ते हैं, सत्य जी विजयी होता है इसलिए सत्यमेव जयते कहा ही नहीं जाता, सब जगह लिखा भी जाता है। पढा तो यह भी है कि सत्य परेशान भले ही हो पर अन्तत जीतता अवश्य है। अभी तो संघर्ष के दिन हैं, झूठ पैर पसारे है, देखें सत्य कब जीतता है, उसका सूर्य अपने तेज से कब दीप्त होता है कि उसके तेज प्रकाश से सबकी आंखें चुंधिया जाए। बस प्रतीक्षा और प्रतीक्षा ही है।

Friday, September 9, 2022

कहन, लोकोक्ति, मुहावरे के ब्याज से......

 सफर जारी है ........1051

10.09.2022

कहन, लोकोक्ति, मुहावरे के ब्याज से......

घर घर चूल्हे माटी के हैं बहना , मैंने बातऊ पूरी नाय करी तब तक तो चमेली बोल उठी ..ए रहन दे, अब कोई के घर में माटी के चूल्हा ना होवे, अब तो सिगरे गैस के चूल्हा पे बनाबे और कोई कोई तो बाए का कहबे इंडक्शन पे बना लेत है। अब कोई के घर माटी न बची के चूल्हा बनाबे कि बालक मिट्टी खाबे। बे जमाने और हते जब बालकन की तो छोड़ो,कन्हैया हू खूब माटी खायो करते। बो कैत नाए का तेरे लाला ने माटी खाई, जशोदा सुन माई। बाकायदा बिनको मंदिर है, बामे परसाद में माटी के लडडू ही मिलो करें। पहले की बात और हती सबके घर कच्चे होते, गोबर माटी से लीपे जाते, चूल्हा अंगीठी ऊ लीपे जातो पोता ते। काऊ के नेक चोट लग जाए, खून बून निकल आबे , नकसीर फूट जाबे तो झट्ट सीना पीली माटी लगा दई, सुंघा दई। बात बात पे कोई दागधर के झोरे थोड़े ही भागो करते । बैयर बानी सब जानती कि छोटो बालक रो रयो है तो बाए घुट्टी पिला दई के टूंडी पे हींग को फोआ धर दयो के हींग मल दई के गोद में लले के डकार दिला दई। बड़े कू हींग अजवायन की फंकी दे दई। और तो और काऊ बालक की बात करते करते जीभ कट जाबे तो मोंह में चीनी भर देते। मतबल जे कि इन छोटी छोटी बातन को इलाज घर में ही हतो। तबही जे कहन बनी होएगी के रसोईघर में ही बहुतेरे रोगन को इलाज है। सारे रोगन की जड़ जे पेट है। पेट ठीक रहे तो जे समझो कि तिहाई आधी बीमारी दूर है गई। पर अब कोई न समझे इन बातन ने, दौड़े छूटे सब डागदर के ही भागो करें।

देखो हम का कह रए ओर बाहेली ने अर्थ को अनर्थ कर दयो बात को। पूरी बात तो सुनी नाय और माटी और चूल्हा पे हमें ई लंबो चौडो भाषण पिला दयो, पूरी बात सुने बिना ई लठ्ठ ले के पिल पड़ी। ऐसेई बा दिन करी। हमने कही सोबरन को तो वो ई डोर है कि ऊंची दुकान फीको पकवान। सुनत खेम ही शुरू है गई, बाकी रेलगाड़ी ती सौ की स्पीड पे दौड़बे लगे बिना रुके, जे दारी की एक बार शुरू हे जाबे तो अपनी पूरी बात कह के ही रुके, बीच में कोई कोमा अल्प विराम न , सीधो पूर्ण विराम ही लगो करे। अब कहन लागी ए जीजी बिना मीठे के ऊ कहीं पकवान होय करें। आजकल जे नए चोचले चले हैं कि फीकी मिठाई खाई जाएगी के कम चीनी की की फीकी चाय पी जाएगी के हमें शुगर हे गई है। शुगर हे गई है शुगर हे गई है, हाथ पैर नाय हिलाओगे, दिन भर गोबर के चोथ से एक जगह ही जमे बैठे रहोगे, बस सारे दिना मुंह चलाते रहोगे, पेट में अंट संट ठूंसते रहोगे तो शुगर नाय तो का नमक होयगो। अरे खूब काम धाम करो, टैम ते खाओ भरपेट, खूब घी खाओ, गुड खाओ देखो ठीक रहत हो कि नाय। दिन भर तो सफेद, लाल, पीली गोली कैप्सूल ठूंसते रैत हो, एसिडिटी के मारे कलेजा जलत रैत है सो अलग, हाय हाय चिल्लात हो। अरे जे ख़ाली पेट चाय काफी सुडकबो ठीक नाय। ढंग ते चबा चबा के दाल सब्जी चावल रोटी खाओ दो टैम और खूब स्वस्थ रहो। इतनी तो बीमारी पाल रखी हैं कि दवाई ते छुट्टी मिले तो खाने कू सोचे। और फिर जे कहावत कैत डोल तो कि ऊंची दुकान फीके पकवान। पकवान तो मीठे ही होय करें भैया।

           देखी इन गैर पढ़ी लिखीन की बात, कैसे बात को बतंगड़ बना दयो। इन जैसेन ते तो बात करबो ही फिजूल है। कोई कहावत, लोकोक्ति, मुहावरे की बात सुनाओ तो ऐसे खींच के रख देत है कि कछू पूछो ई मत, सब अक्ल घास चरने चली जाए। घर घर चूल्हे माटी के ही होय करें बहना जाको मतबल होत है कि सबके घरन में थोड़ी ऊंच नीच तो लगी ही रहत है। हम्माम में सब नंगे ही है, जा घर की मत उघाड़ो बोई अच्छो है। जो तुम्हें दूर ते बड़े सुखी लग रए हैं, दिन भर ठहाके से लगात रैत हैं, बिनकी हंसी के पीछे आंसू रैत है, वे सब बातन कू भुला के अपने कू सुखी दिखाबे की कोशिश में लगे हैं। तो तुमऊ खुश रहबो सीखो, दूसरे के कहबे की ज़्यादा परवाह मत करों। बिनको तो काम ही हे कहबो। वे जई के काजे बने हैं और हम सुनबे को।

           ऊंची दुकान फीके पकवान को अर्थ होय करे कि बात तो बड़ी बड़ी करें पर अन्दर ते खोखले है। नाम रख राखो है धन्ना सेठ और घर में भुंजी भांग हू नाय। जाई ए कह ते नाम बड़े और दर्शन छोटे। एक और है नेक सुई चुभो देयो तो गुब्बारे की सारी अकड़ फुस्स है जाबेगी। तो भईया ठोस बनो, फफ्फस मत बनो। न बातन ते और न कर्मन ते। ठाले बैठे फेंको मत बड़ी बड़ी, करो।करिबे को फल मिल ते। और एक जे हैं सरकाएंगे सींक हू नाय पर बात आकाश पाताल की करवा लेयो। टाइम टेबल तो रोज बनेगो पर अमल एक हू दिन नाय होयगो। ऐसेन ई कैत हैं शेख चिल्ली। सपने आकाश ते हू ऊंचे देखगे और काम रत्ती भर हू नाय करें। सो भैया, समय समय पे इन कहाबतन ने, कहन ए, लोकोक्तिन ने, मुहावरेन ने हू दोहराबो जरुरी है, इनते हू ज्ञान मिलो करे।

Thursday, September 8, 2022

घर कौन सा घर हमारा है,

 सफर जारी है...1051

09.09.2022

घर, कौन सा घर हमारा है.......

घर चारदीवारी से घिरा और कच्ची पक्की छत के साथ एक अहाता भर नहीं  है, यह एक प्यारा सा अहसास है कि हां मेरा भी घर है। यह खरीदा हुआ या उपहार में प्राप्त कोई प्लॉट या भूखंड भी नहीं जिसे मकान की संज्ञा दी जाती है। आप जिंदगी में पैसा कमा कमा के, पेट काट कर आधे पेट भूखे सो कर ,बचत कर करा के मकान भले खरीद लो, पर उसे घर बना पाना सबका सौभाग्य नहीं हुआ करता। घर को याद करते रमेश दिविक की कविता की पंक्तियां दिमाग में गोल गोल घूमने लगती हैं पापा कैसा लगता होगा उनको जिनका नहीं होता है घर। सच बड़े किस्मत वाले होते हैं वे जिनके पैरों के नीचे जमीन और सिर पर छत होती है। जब बाहर से थके हारे आते हैं तो घर बड़ी शिद्दत से आपका इंतजार करता है, आपको दुलराता है, आप पर स्नेह की वर्षा करता है, आप को थपकी दे दे सुलाता है, आप को विश्रांति देता है। घर यानि एक ऐसी जगह जो आपकी सारी थकान हर लेता है, आपको सुकून देता है, आप तरोताजा हो जाते हैं, आप चार्ज हो जाते हैं और अगले दिन फिर काम पर निकल पड़ते हैं। घर आपको भावनात्मक सहारा देता है। जब आप थके और परेशान होते हैं, आपकी सारी पीड़ा हर आपको ऊर्जा से भर देता है।

दुनिया में सबके पास एक घर होता है फिर चाहे वह कच्चा हो पक्का हो, एक कमरे का हो दस कमरे का हो, एक मंजिला हो या बहुमंजिला हो ,सारी सुविधाओं से लैस हो या जगह जगह थेगड़ी और पैबंद के साथ हो, फाइव स्टार जैसा हो या झोपड़ी हो , खाने को छप्पन भोग हो या दो टाइम की रोटी के भी लाले हों पर घर होना जरुरी है। हर बालक जन्म लेते घर में ही पलता बढ़ा होता है। उसके घर का एक स्थाई पता होता है जिसे वह स्कूल और कार्यस्थल पर रजिस्टर में चस्पा कर देता है। यह पता उसकी स्थाई पहचान है। इसी पर उसकी चिट्ठी पत्री, संदेश, सामान आता जाता रहता है। वह भले ही कितने घर बदले पर घर होना जरुरी है। इसके बिना नहीं चलता।

मित्रो, घर तो सबको चाहिए फिर चाहे पुरुष हो स्त्री हो मानव हो मानवेतर हो, हर जीवधारी के लिए घर आवश्यक है इसलिए पक्षियों का घोंसला, जानवरों का अस्तबल और बाड़ा, चींटी , केंचुआ और सांप के बिल और शेर की गुफा होती ही है। घर पर उनका एकाधिकार होता है। यदि कोई उनके घर में जबरदस्ती घुसने की कोशिश करे तो उसे लतिया धकिया के बाहर कर दिया जाता है। घर है, यह भाव ही सुरक्षा और आश्वासन देता है।

जब दुनिया में सबके घर होते हैं, घर पूरी तरह उनके न भी हों पर एक निश्चित कोना उनका जरुर होता है। पर आधी आबादी का सच ये नहीं है। वे एक घर में जन्म तो लेती अवश्य है पर जैसे जैसे बड़ी होती जाती है उन्हें कह कह के ये अहसास दिला दिया जाता है कि तुम्हें दूसरे घर जाना है। इस घर की देहरी से तुम्हारी विदाई होनी निश्चित है। तुम पराई अमानत हो। हम तुम्हें पाल पोस कर,पढा लिखा कर, संस्कारित कर इसलिए तैयार कर रहे हैं जिससे तुम किसी दूसरे घर को आबाद कर सको। तुम तो बाबुल के आंगन की चिड़िया हो जिसे उड़ना ही उड़ना है, किसी अन्य डाल पर बसेरा बनाना है फिर चाहे तुम जितना मर्जी रोती गिड़गिड़ाती रहो कि काहे को ब्याही विदेश रे सुन बाबुल मेरे, हम तो बबुल तेरे आंगन की चिड़िया चुगत चुगत उड़ जाएं रे सुन बाबुल मेरे। जितना मर्जी रोते गाते रहना कि मेरे जाने के बाद तेरा आंगन सूना हो जायेगा, बाग के झूले पर कौन झूलेगा, जब तुम बाजार से थके हारे आओगे तुम्हें पानी का गिलास कौन देगा, कौन तुम्हारे समान को तहा कर रखेगा, कौन तुम्हें लाड करेगा, उनके पास हर बात का ज़बाब होगा कि मेरे आंगन बहू छमछम पायल खनकाती आयेगी और बाग में नाती पोती झूलेगी, तू चिन्ता मत कर लाडो, लाडो घर जा अपने। और हम लाडो अपने उस बाबुल मइयो के घर की देहरी से विदा  कर एक नए घर भेज दी जाती हैं जिसे ससुराल कहा जाता है। बचपन से हमें इस घर का सपना दिखाया जाता है कि ये घर प्रशिक्षण शाला भले हो पर तुम्हारा असली घर वही है। यहां जिस जिस काम की रोक है, वहां सब कर सकोगी क्योंकि वही तुम्हारा असली घर होगा। इस घर में अपना बचपन, कैशोर्य छोड़ हम युवा होती बहन बेटियां पुत्रियां नए घर में प्रवेश करती हैं इस आशा और विश्वास के साथ कि अब हम अपने असली घर आ गईं। इसी घर में भेजने के लिए बबुल कितने परेशान होते थे कि बिटिया के लिए कब घर वर मिलेगा, कब उसे डोली में बिठा हम विदा कर निश्चिंत हो पाएंगे कि बेटी के हाथ पीले कर दिए, अब वह अपने घर की हुईं, हम गंगा स्नान कर मुक्त हुए। पर माता पिता कब मुक्त हो पाते हैं? बेटियों को लेकर इनकी चिंताएं असीमित होती हैं होनी भी चाहिए आखिर वे माता पिता जो हैं, उन्होंने अपना कलेजा, दिल का टुकड़ा निकाल के जो दिया है, ढेरो कर्ज में डूब कर भी वे अपनी बेटियों का सुख सकून चाहते हैं। पिता बहुत खुश होते हैं चलो बेटी अपने घर विदा हुई, हमारा दायित्व पूरा हुआ।

जिस घर के सपने बचपन से बेटियों के मन में बोये जाते हैं, उन्हें रोज रोज याद दिलाया जाता है कि तुम तो पराई अमानत हो, जिस दिन ब्याही जाओगी तुम्हारे कुल गोत्र सब बदल जायेंगे, तुम्हारा नया जन्म होगा, एक नई जिंदगी होगी, धीरे धीरे तुम्हारी जड़े इस घर से उखड़ कर वहीं जम जाएंगी, तब तुम यहां आते अपनी अनेक व्यस्तताएं गिनाओगी कि अभी नहीं आ सकती कि घर में मां अस्वस्थ है या इनको फुरसत नहीं है या बच्चों की परीक्षाएं चल रही हैं टाइप तुम्हारी बातें हमें सुकून ही पहुंचाएगी कि चलो बिटिया अपने घर परिवार में सेटल हो गई है।

पर बाबुल के घर को छोड़ जिस घर में हम बेटियां ब्याही जाती हैं, जिसे हमारा ससुराल कहा जाता है वहां भी तो हम पराई जाई ही कहलाती हैं, दूसरे घर से आई ही कहलाती हैं। सच ही एक घर में जिस दूसरे घर की अमानत कही जाती हैं, वहां भी उन्हें अपना घर कहां मिलता है। वह घर तो पहले से दूसरे का है जो वहां बरसों से रह रहा है, वो घर उसका ही है, वहां आप रहने गई है, एडजस्ट आपको होना है जो भी जैसा भी ठौर आपको मिले। किसी नई जगह जाकर अपना स्पेस बनाना, सबका दिल जीत लेना, सबको अपने सेवा भाव से खुश किए रखना, अपने पहले घर की इज्जत को बनाए रखना सब इतना आसान कहां होता है, चौबीस घंटे तो सिर पर तलवार लटकी रहती है कि कहीं कुछ गलत न हो जाए, अब लाख सावधानी बरतें, कुछ न कुछ चूक तो हो ही जाती है, उस छोटी सी भूल चूक को कैसे बड़ा करके धो धो के सुनाया जाता है, लपेटे में उस घर के लोग भी ले लिए जाते हैं, आखिर उपज तो उसी घर की हो, संस्कार तो वहीं से ले कर आई हो। तब मन हिचकी भर भर के रोता है कि बाबुल तुम तो कहते थे लाडो वो घर तेरा है पर यहां तो सब यही कहते हैं ये घर हमारा है। तो फिर आखिर मेरा घर है कौन सा। उस में पराई अमानत थे और इस घर में दूसरे घर से आई कहे जाते हैं। ये बेटियां बड़ी होशियार हो गईं हैं अब। दोनों घर को अपना बनाए रखती हैं बल्कि उन दोनों घर के साथ एक नया घर और बना लेती हैं, रच गढ़ लेती हैं जिसे वे हमारा और कभी कभी मेरा अपना घर कहती हैं जहां वे खुल के सांस ले पाती हैं। अब उन्हें एक कोने की दरकार नहीं, पूरा का पूरा घर उनका होता है। वे बराबरी का आधिकार मांगती है और बिना करे नहीं मांगती। खूब मेहनत करती हैं। दोनों कुलों को सार्थक करती हैं। उन्हें याद रहता है कि पुत्री पवित्र कुल दोऊ। वे बड़े से बड़े पद पर आसीन भले हो गई हों पर उनमें से कितना प्रतिशत ऐसा है जिनके पास कहने के लिए घर नहीं तो उस विशाल लम्बे चौड़े घर में एक सुविधा जनक स्पेस हो जिसमें वे स्वेच्छा से उठ बैठ सकती हों, अपने को सुरक्षित महसूसती हूं, अपने परिवारी जन और इष्ट मित्रो के साथ बैठ सकती हों, उस स्पेस में उन्हे अपनत्व मिलता हो।

बहुत जरुरी है ये बहस कि उनका घर कौन सा है। एक तरफ उन्हें होम मेकर कहा जाता है, गृह निर्मात्री कहा जाता है, बिन घरनी घर भूत का डेरा कहा जाता है, गृहिनी गृहम उच्चयते कहा जाता है, किसी पुरुष की सफलता के पीछे उसके महत्व को रेखांकित किया जाता है और दूसरी तरफ उसका कोई घर ही निश्चित नहीं होता। एक में पराई अमानत होती हैं तो दूसरे घर में दूसरे घर से आई कही जाती हैं, जिससे निकालने की धमकी ही नहीं दी जाती बल्कि उसे बाकायदा निकाल ही दिया जाता है कि यह घर मेरा है और इसमें रहना है तो मेरी शर्तो के अनुसार रहना होगा नहीं तो बाहर का रास्ता देखो, जिस घर से विदा की गई हो वहां अपना सामान सट्टा बांध के चली जाओ। अरे वहीं रहना जाना होतातो तुम्हारे तायने उलाहने क्यों सुनते भला। तो एक्स वाई जेड तुम जो भी हो, कान खोल के सुन लो कि ये घर तुम्हारा अकेले का नहीं है, इसमें सब कुछ साझा है। तो जितना तुम्हारा है उतना दूसरे का भी। तो निकलना ही होगा तो तुम निकलोगे क्योंकि मकान तुमने भले बना लिया हो, घर तो इसे हम स्त्रियों ने ही बनाया है, चूल्हा तो हमीं फूंकते हैं जब जठराग्नि शांत होती हैं, स्नेह हम भी बिखेरते हैं तभी स्निग्धता आती है, प्यार के बंधन से रिश्ते की दीवारों का फेविकोल हमीं बनते हैं तो तुम हमारे हो तो घर भी हमारा है। वो जमाने लद गए जब हम दूसरों के घर में अपना एक कोना तलाशते थे, आज ये पूरा जहां हमारा है और ये किसी ने भीख या दान में नहीं दिया, अपनी शक्ति से अर्जित किया है, हम स्वयं पर खुद ही गर्वित हो लेते हैं,कोई और हो न हो। अपने में भरे पूरे होना भी उपलब्धि होती है। साथ आओ मित्र स्वागत है, हमेशा हमेशा के लिए तुम्हारे हैं साथी भाव से, स्वामी बनोगे तो हम दासी ही रह जाएंगी न। तो आओ चलें साथी बनें, एक दूसरे के साथ बने रहें। घर साझा हुए करते हैं, किसी अकेले की संपत्ति नहीं। ये मेरा या तुम्हारा घर नहीं, ये हमारा घर है प्यारा सा घर।

Wednesday, September 7, 2022

या विमुक्तये,

 सफ़र जारी है.....1050

08.09.2022

या विमुक्तये.............

शिक्षा की विद्यार्थी होने के कारण अनेक शिक्षाविदों के विचारों को पढ़ते, उनके द्वारा दी गई  अनेकानेक परिभाषाओं को रटते, उसका संकुचित और व्यापक अर्थ समझते , शिक्षा और विद्या में अंतर करते जो बात गहरे पैठी, जिसने झकझोरा, वह थी सा विद्या या विमुक्तये। अर्थात विद्या वह है जो हमें विमुक्त करती हैअनेक अंधविश्वासों, अनेक गलत मान्यताओं और बंधनों सी, तेरे मेरे के भाव की जगह वयम का भाव पोषती है, वसुधैव कुटुंबकम् का भाव पैदा करती है। इसीलिए उसे कल्पलता कहा जाता है। उसे सर्व धनं प्रधानम कहा गया क्योंकि न उसे कोई चुरा सकता है, न बांट सकता है, न ये वहन करने में भारी है, व्यय करने पर प्रतिदिन बढ़ता है। है न आश्चर्य कि दुनिया में कोई ऐसी वस्तु नहीं जो खर्च करने पर भी कम न हो, बल्कि बढे। जी हां विद्या को जितना बांटोगे उतने ही अधिक ज्ञान से भरेपूरे हो जाओगे। विद्या विनय शील बनाती है। स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते। व्यक्ति खाली हाथ और साधारण सा भले दिखता हो पर जब अपना मुख खोलता है, बोलना शुरू करता है तब सबको हतप्रभ कर देता है, अपने ज्ञान का लोहा मनवा लेता है। पावस ऋतु में ही तो कौए और कोयल की पहचान होती है देखने में तो दोनों काले ही हैं पर एक अपने मधुर बोलों से सबकी प्रिय बन जाती है, सराही जाती है और दूसरा अपनी कांव कांव के कारण दुरदुराया जाता है, उसका कर्कश स्वर और कांव कांव किसी को पसंद नहीं। ये अलग बात है श्राद्ध पक्ष में वे समादारित हो जाते हैं। पर कोयल हर समय अपने मधुर स्वर के कारण लोगों के दिलो में स्थान बनाए रहती है। आप अपने पाल्यो को निर्देशित करते हो....बच्चो जब अपना मुंह खोलो, तब तुम मीठी बोली बोलो, इससे तुम यश पाओगे, सबके प्यारे बन जाओगे।

हम सभी बड़ी बड़ी उपाधियों, डिप्लोमा,प्रमाणपत्र के साथ उच्च शिक्षित अवश्य हो गए हों पर विद्यावान तो नहीं ही हुए हैं। हमारा ज्ञान सूचनात्मक दृष्टि से भले ही विस्तार पा गया हो पर अभी गहरी समझ तो कम से कम विकसित नहीं हुई है। हम अपने दुराग्रहों और पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं हो पाए हैं। विनयी होता तो दूर, हम तो जितने उच्च शिक्षित होते जाते हैं, उतने ही अहंकारी और दंभी होते जाते हैं मैं ये मैं वो का भाव प्रधान होता जाता है। और मजे की बात तो यह है कि जिस अकूत संपदा, बढ़ते बैंक बैलेंस और बहुमंजिली इमारतों, विदेश में बसे स्वजनों की उपलब्धियों पर हम गर्वित होते मुदित होते हैं, उनमें से कुछ भी साथ नहीं जाता। जिंदगी भर  ऊहापोहों में पड़े रहते हैं, कंदुक से इधर से उधर ठोकर खाते रहते हैं, इसके उसके भले बुरे बनते हैं, इस उस की आलोचना में जीवन का महत्वपूर्ण समय निकाल देते हैं । आयु के भले से छः सात आठ दशक पार कर लें पर दिमाग से तो बच्चों जैसी मूर्खता ही करते रहते हैं। शैशव, बचपन, कैशोर्य, यौवन जीते प्रौढावस्था तक भले आ पहुंचे हो, पर व्यवहार में बचपना ही कर जाते हैं, बेबात की बात को इश्यू बना लेते हैं, जो गलत सलत मन में ठान लिया, उसे ऐसे या वैसे कर ही लेते हैं, पोल खुल गई तो माफी का घिघियाया स्वर अपना लेते हैं कि आगे सेऐसा नहीं करेंगे पर हमेशा ही वैसा करते हैं क्योंकि आपने मन से ही वैसा सोच रखा है, अगले से केवल ठप्पा मुहर लगवाने की नीयत जो होती है। अपनी शर्तों को इतना बड़ा और महत्वपूर्ण कर देखते हैं कि साथ वाला या तो हमेशा स्वीकारोक्ति देता रहे, सही गलत पर मुंडी हिलाता रहे और कहीं अगला भी अड़ियल निकल गया, अपनी समझदारी का परिचय दे दिया, आपको आपकी भाषा में समझा दिया तब कितने तिलमिला जाते हैं आप और दूसरे हि क्षण ऐसों को इस या उस बहाने से दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फैंकते हैं। और अकेलेपन का सुख उठाते हैं। अब बैचेनी इसलिए भी बढ़ जाती है कि अब कमजोर तो सामने है नहीं तो जोर किस पर आजमाएं, जो मन हर मन कुढ़ते भुनते रहते हो, उसकी भड़ास किस पर निकाले। बैठे रहो अपने खोल में लिपटे, किसी के पास इतना समय नहीं कि तुम्हारे झूठे अहम को पोषित करने उसे थपथपाने और दबदबाने को अपने जीवन को होम कर दे और तुम खाली बैठे मूंछों पर ताव देते रहो। हो ही नहीं तुम इस लायक कि किसी को अपनी जीवन में शामिल कर सको। बैठे रहो अपनी झूठी अकड़ में। तुम जैसे किसी को क्या बरबाद करेंगे, खुद को ही संभाले रहो, वही बड़ा काम है।

       विद्या तो प्रकाश का दीप जलाती है, अंधकार को दूर करती है, सच कहने का साहस देती है, बड़ा बनाती है, व्यवहार करना सिखाती है, छोटो को प्यार और बड़ो को आदर देना सिखाती है तो हम ने कौन सी शिक्षा ग्रहण की कि अभी तक इस सब को आचरण का विषय ही नहीं बना सके,। स्पष्ट और दो टूक कहना ही नहीं सीख सके, मार जलेबी की तरह बात को गोल गोल घुमाते रहे। काका कालेलकर की एक बात कि सत्य बोलने के श्रम नहीं करना पड़ता है, वह तो सहज स्वाभाविक होता है उसे सरल से सरल वाक्य में कहा जा सकता है, मन को बहुत भाती है, दिल के बहुत समीप है। सारी मुसीबत तो सत्य को असत्य बना कर बोलने में लगती है, सोच विचार कर गढ़ गढ़ कर बोलना पड़ता है क्योंकि आप कुछ छिपाना चाहते हैं। सत्य कहीं उद्घाटित न हो जाए तो तौल तौल कर बना बना कर अलंकार से भूषित कर बोलते हैं। सत्य तो प्रकाश सा दीप्त है, स्वयं सिद्ध और प्रमाणित है उसे क्या सिद्ध करना। सिद्ध तो झूठ को करना होता है, तथ्य जुटाने होते हैं, प्रमाण देने होते हैं। सत्य को तुम सात तहो में छिपा कर रखो वह फिर भी नहीं छिपता, सूर्य के प्रकाश सा प्रखर और दीप्त होता है।

  तो शिक्षित बल्कि कहें उच्च शिक्षित तो बहुत हो लिये, उसके बल पर आजीविका भी खोज ली, जीवन का एक तिहाई हिस्सा भी बीत गया, अब अंतिम पड़ाव पर तो विद्या के सा विमुक्तये भाव को आत्मसात कर लें, अपने ही बनाए कटघरों के बंधन से मुक्त हो जाए, बहुत कर लिया मेरा तेरा, अब तो वसुधा को कुटुम्बवत मानने का समय है, अपनी सारी अकड़ और दंभ से, आग्रहों दुराग्रहों पूर्वाग्रहों से मुक्ति का क्षण है। अब भी नहीं चेते, सा विद्या या विमुक्तये के भाव से पोषित नहीं हो सके तो हाथ मलने और पछताने के सिवा और कुछ बाकी नहीं रहेगा। सो जागो जागो और जागो भाई। बीती जाती रैना है।

Tuesday, September 6, 2022

जो बीत गई सो बात गई,

 सफ़र जारी है .......1049

08.09.2022

जो बीत गई सो बात गई.....

जो बीता, वह कल में बदल जाता है और सब बीते हुए को भुलाने की बात कहने लगते हैं। सब आज में जीने की सीख देते हैं। जो हुआ सो हुआ, उसे भूल जाओ और आगे की सोचो। बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध लेय। जो जो घटा वह अच्छा था या बुरा, आपका एक अनुभव था और अनुभवों से हमेशा सीख ली जाती है, उसे भूला भुलाया नहीं जाता। अतीत की जमीन पर खडे होकर ही तो वर्तमान की नींव रखी जाती है, उसे खुशहाल बनाया जाता है, उससे सीख ली जाती है। यदि ऐसा नहीं होता तो सफलता का परचम लहरा चुके व्यक्तियों से उनके जीवन की मुख्य बातों को रेखांकित करने के लिए क्यों कहा जाता, उनके जीवन वृत्त पाठ्यक्रम में क्यों लगाए जाते, वे अपने जीवन के उन प्रसंगों को क्यों हाईलाइट करते जिनके चलते उनके जीवन में जबरदस्त बदलाब आया। बीत गईं सो बात गई के आधार पर तो उन्हें विगत की परेशानियों कठिनाइयों को जड़ से भुला देना चाहिए था और आज की सफलता पर इठलाना चाहिए था।

पर ऐसा नहीं है। अमीर बनता व्यक्ति अपनी गरीबी के दिनों को भूलता भुलाता नहीं, वह उसे अनमोल याद की तरह साथ लिए चलता है कि जब दंभ अहंकार पैदा होने लगे तो उस पोटरी को खोल थोडा झांक सके कि न न मुझे ऐसा बिलकुल नहीं करना है। मैंने दुख झेला है, हिम्मत नहीं हारी, तब जाकर यहां तक पहुंच पाया हूं। जो भी घटा अच्छा या बुरा, उसके अनुभव आपकी थाती हैं। उनसे सीख लेना जरुरी है। जब हम अपने जीवन की सुखद घटनाओं को प्रसंगों को बराबर याद करते हैं, सुभद्रा कुमारी को अपना बचपन इतना प्रिय है कि बार बार उसे याद करती कह उठती है, लिख कर ही संजो देती है बार बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी, गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी। जेम्स बाट जितना भी बड़ा भाप का इंजन क्यों न बना लें पर बचपन की वह घटना नहीं भूलते जब वे रसोई में बैठे आग पर चढ़े पतीले में खौलते पानी के ढक्कन पर दवाब रखकर भाप की शक्ति समझ पाते हैं। लिंकन राष्ट्रपति बनने के बाद भी कहां भूल पाते हैं कि उनका जीवन कितनी गरीबी में बीता है, न्यूटन गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत की खोज प्रयोगशाला में नहीं, बगीचे में आम को पेड़ से नीचे गिरता देख कर ही करते हैं जो मर्जी हवा में उछालो, वह आता जमीन पर ही है।

साहित्यकार लिखते रहे मेरो मन अनत कहां सुख पावे, जैसे उड़ जहाज को पंछी फिर जहाज पर आबे। सुख तो अपनी माटी अपनी जमीन से जुड़े रहने में ही है, मर्जी चाहे जहां जितना मर्जी घूम आओ, पर लौटना तो अपनी भूमि पर ही होता है। अपनी जमीन भला किसे प्यारी नहीं होती, कहते हो न ऐसे लगा कि जैसे पैरों तले जमीन खिसक रही हो। इस जमीन पर पांव जमाए रखना बहुत जरुरी है। अपनी माटी अपनी जमीन का कोई सानी नहीं। जिसकी रज में लोट लोट कर बड़े होते हैं, घुटनों के बल सरक सरक कर खडे होते हैं, उसे भला कैसे भुलाया जा सकता है। हिमवासी विषुवत रेखा का वासी भी मर्जी जितनी कठिनाइयों में क्यों न रहे, रखता है अनुराग अलौकिक वह भी अपनी मातृभूमि पर। तो कहां भूले जाते हैं अपने कच्चे पक्के घर, आंगन, दालान, बचपन की पाठशालाएं, अध्यापको की मार डांट, वह बेंच पर खड़ा कर देना, मुर्गा बना देना, पतली सी डंडी से सूंत देना, हथेली पर फुटे से चटाचट मारना, कक्षा से बाहर खड़ा कर देना, सब का सब याद है, उसी के कारण तो जो आज है बन पाए। अध्यापक ही क्यों, माता पिता से लेकर नाते रिश्तेदार, अड़ोसी पड़ोसी, समाज सब तो अपने अपने तरीके से ठोक ठोक कर हमारे खोट निकालने में लगे रहे, कह सुन कर हमें गढ़ते रहे तब तो आज इस रुप में हो पाए। और तुम रोज रोज कहते हो जो बीत गया उसे भूल जाओ, बस आज में रहो। ये आज आज ही थोड़े पैदा हो गया, इसमें कितना कितना कल समाया है तुम क्या जानो बाबू। तुम्हें तो फूली फूली चरने की लगी हुई है। अरे हर बात के पीछे बातों का लंबा इतिहास होता है, उसे जाने रहना होता है।

हां यह सच है कि अतीत को कंधे पर शव की तरह लादे रहे नहीं चला जा सकता, पर उससे सीख तो ली जा सकती है, उसको नींव में रखकर ऊपर की मंजिल तैयार की जा सकती है। हर का एक अतीत होता है उसे अच्छा बुरा नहीं कहा सकता, कुछ कटु यादें हैं तो उनसे सीख ली जाती है और जो सुखद प्रसंग हैं तो उन्हें गाहे बगाहे दोहरा लिया जाता है जिससे उसकी याद धूमिल न पड़ जाए। याद करना बुरी बात होती तो पढ़ते पढ़ाते  प्रश्नों के उत्तर याद करने के लिए क्यों कहा जाता। तो हमसे तो नहीं भूलता न अच्छा न बुरा, न सुखद न दुखद, न सुविधाएं न कष्ट। जीवन तो इस सबसे मिल कर ही बनता है मीठा मीठा हम खाएं तो आक थू जैसा कड़वा क्या कोई और खाएगा। सुख हमें बांधता है तो दुख भी खूब पाठ पढ़ाता है दुख की पिछली रजनी बीच विकसता सुख का नवल प्रभात। तो बीत गई सो बात गई ही सच नहीं है, इन्हीं बीते लम्हों के साथ बहुत कुछ जुड़ा होता है जो भूल कर भी नहीं भुलाया जा सकता। और उसे भूले भी क्यों कर, उससे सीख ले आगे बढ़ जाएं, उससे चिपके न रहें, बस बात इतनी सी है।

Monday, September 5, 2022

अगले जनम मोहे मास्टरनी ही कीजो

 सफर जारी है...1047

07.09.2022

अगले जनम मोहे मास्टरनी ही कीजो.......

हां, तो क्या बुराई है भई मास्टरनी बनने में, सबकी पसंद अलग अलग होती है। किसी को डाक्टर बनना पसंद है तो किसी को इंजीनियर, कोई समाज सेवा करना चाहता है तो कोई वकील कोई नेता कोई अभिनेता तो कोई राजनेता। कोई कुछ भी बने, ये उसकी मर्जी। और किसी के नाम पर तो नाक भोंह नहीं सिकोड़ते फिर मास्टरनी और वह भी हिंदी वाली के नाम इतना बुरा इंप्रेशन क्यों दिया, मुंह तो ऐसे बनाया जैसे मुंह में कड़वी गोली आ गईं हो या चबाते चबाते दांत तर कंकड़ आ गया हो। क्यो भाई पहले तो हमें ये बता दो कि मास्टर मास्टरनी के नाम से इतनी एलर्जी क्यों है। इन्हीं मास्टर मास्टरनी की बदौलत तुम और तुम्हारी औलाद चार आखर पढ़ के भले लोगों के बीच खड़ी हो पाती है। ये प्रजाति न हो तो सब के सब काले अक्षर भैंस बराबर बने रहते। बालक अभी चार कदम चलना भी नहीं सीख पाता, तब से उसे स्कूल जाने को लगातार उकसाते हो। अभी तो वह अपनी दैनिक आवश्यकताओं को कहने लायक भी नहीं होता तब तक उसे कंधों पर भारी भरकम बैग टांग, टिफिन और बोतल के साथ स्कूल रवाना कर देते हो, अभी छुटके तीन बरस के भी नहीं हो पाते तो उनके इम्तिहान शुरू हो जाते हैं। जो स्कूल में बच्चा खुशी खुशी जानें को तैयार हो जाता है तो इसकी वजह ये स्नेहिल मास्टरनियां ही होती हैं जो प्यार से सब सिखा  देती हैं। उनके पास पढ़ाई के अतिरिक्त भी बहुत कुछ है देने को, वे छोटी छोटी बातें जिन्हें सिखाने में आपके पसीने छूट जाते हैं, वहीं उसे वह ऐसी ट्रिक से सिखाती हैं कि आप भी दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं। ओर हद तो तब हो जाती है जब आप का बालक आपकी बात को तरजीह न देकर मास्टरनी, मैम, भैनजी की बात मानने लगता है, मैम ने जो कहा, वह ही सोलह आने सत्य है।

और तो किशोर होते वे बच्चे जो आप से नहीं संभलते, उन्हें भी ये मास्टरनियां उचित राह पर ले आती हैं, भाषा की शालीनता सिखाती हैं, उज्जड़ से उज्जड विद्यार्थी भी अपनी टीचर जी के आगे गऊ बनकर रहता है। वह जानता है ये घर नहीं है जो उसकी मनमर्जी चलेगी, ये कक्षा है, स्कूल है यहां सबको नियम से ही चलना पड़ता है, गुरुजी का आदेश मानना ही पड़ता है नहीं तो समाजिक निंदा होती है और बेभाब की पिटाई होती है। बालक की तो छोड़ो, बालक के माता पिता भी टीचर जी को बहुत मानते हैं। बिगड़े बालक को मास्टर मास्टरनी के हाथ सौंप आते हैं कुछ भी करो पर इसे सुधार दो और पैसे का ज्यादा ही घमंड हुआ तो एक वाक्य और चैंप आते हैं कि पैसे की बिलकुल चिन्ता मत करना, दो तीन चार जितने मरजी कहो, ट्यूशन लगा देंगे पर ये शर्तियां पास होना चाहिए। क्या जादू होता है इन मास्टर मास्टरनियों के हाथों में कि बिगड़ैल बैल को भी नाथ देते हैं, मस्त हाथी को भी अंकुश के जोर से काबू में कर लेते हैं।

                मास्टरनी बनने के ढेरों लाभ हैं बल्कि कहूं तो दोनों हाथ लडडू होते हैं। नमस्ते तो थोक के भाव मिलती है। पिछले पैंतीस वर्षो में अपने विद्यार्थियों से इतना स्नेह और सम्मान मिला है कि अभिभूत हूं। उनकी प्रतिदिन की टिप्पणियों ने जो इतने ऊंचे आसन पर बिठाया है उसके आगे ये बेस्ट टीचर अवार्ड कोई मायने नहीं रखते। यदि आप अपने विद्यार्थियों के दिल में गहरे उतर जाते हो, हर क्षण उनके लिए उपस्थित रहते हो, उनकी बड़ी से बड़ी परेशानियों को चुटकी बजाते सुलझा देते हो तो आप अपने विद्यार्थी के लिए किअलादीन के चिराग से कम नहीं। यदि आप अपने दायित्व को शिद्दत से निभाते हो तो जो सम्मान जो आदर उनकी आंखों में झलकता है, उसके आगे बहुत कुछ फीका हो जाता है। कितना कितना सम्मान मेरी झोली में आया है, उससे में भरी पूरी हूं। जब बहुत साल पहले पढ़े विद्यार्थी को नाम से पहचान जाती हूं तो उसके चेहरे पर जो खुशी झलकती है, उसके कोई सानी नहीं। जब उन्हें कौली भर उनकी राजी खुशी पूछती हूं तो वे जैसे धन्य हो जाते हैं। उनकी संख्या से मेरे परिवार में वृद्धि होती है। कितनी कितनी मानस संताने हैं मेरी जो विश्व पटल पर फैली हुई हैं। उनके स्नेह भाव से मैं खूब लदी फदी हूं। जिन्होंने डुगलाते कदमों से कक्षा की देहरी पार कर मुझ तक आना सीखा, अब वे कद्दावर हो गए हैं, अपने अपने क्षेत्र में रोशनी बिखेर रहे हैं। कई तो परामर्श दाता की भूमिका में है, तकनीक सिखाने में माहिर हैं। जिन तकनीकों  को समझने सुलझाने में हमें द्रविड़ प्राणायाम करना पड़ता है ,उसे वे चुटकी बजाते ही सुलझा देते हैं लो गुरुजी हो गया। 

                अपनी इन मानस संतानों से बहुत समृद्ध होती है ये मास्टरनी की प्रजाति। पूरी धरती कुटुम्ब सी लगने लगती है। जहां मर्जी चले जाओ आपने जिस फसल को बोया है जोता है सींचा हैं, संस्कारों की बुआई की हैं निराई की है खर पतवार को उखाड़ फैंका है, कठोर जमीन को गोड गोड कर मिटी को भुरभुरा बनाया है, उसे समतल किया है उस फसल के दस बारह तैयार फल हर जगह मिल जाते हैं, आपकी प्रतीक्षा करते हैं, आपसे मिलकर अपने को धन्य समझते हैं। पहले आपने उन्हें सहारा दिया आज वे आपका सहारा बन जाते हैं। इस टीचरी की नौकरी ने तो मुझे बहुत कुछ दिया है, मेरे संपर्क सूत्र विस्तृत किए हैं, मेरे ज्ञान में वृद्धि की है। विषय समझ आ जाने पर विद्यार्थी के चेहरे पर जो तृप्ति जो संतोष देखा है, उसे देख सारे श्रम की भरपाई हो गई है। और आप पूछते हो भला मास्टरनी बन के तुम्हें मिला ही क्या। बंधी हुई सेलरी, आदर्श की हद में बंधा जीवन, सादा रहन सहन, कोई फ़ैशन नहीं, बस दिन रात अनुशासन के कठोर दायरे मैं बंधा रहना, केश विन्यास में कोई बदलाब नहीं बस सारे बालो को कस कर बांध लेना, वाणी में संयमित रहना, आवरण में हर पल सावधान रहना, आपकी हर गतिविधि कई कई जोड़ी आंखों से लगातार निगरानी की जाती है, आप किसी के रोल माडल बन रहे होते हैं तो व्यवहार में इतनी सावधानी तो अपेक्षित है ही। जितना दिया, उससे कई गुना अधिक पाया है।

                पढ़ाना मेरा पैशन है, व्यवसाय नहीं। तो हर जनम में मास्टरनी और वो भी हिंदी की मास्टरनी ही बनना चाहूंगी । प्रभु जी अगले जनम मोहे मास्टरनी ही कीजो।

Sunday, September 4, 2022

मूरख ह्रदय न चेत

 सफर जारी है.......... 1047

05.09.2022

मूरख ह्रदय न चेत....

ज्ञान के अभाव में सभी मूरख ही हैं और ज्ञान मिलता है गुरूजी से। आजकल गुरुजी के अनेकों विकल्प मौजूद हैं मसलन नोट्स, कुंजी और सबसे महत्वपूर्ण गूगल बाबा जो एक क्लिक पर सारी सूचनाएं बिलकुल सही सही उपलब्ध करा देते हैं। अब सूचनाओं का संग्रह ही तो ज्ञान नहीं है न। जब तक समझ विकसित न हो , अक्क्ल में कोई बात पूरी तरह न घुस जाए, जब तक उसके प्रयोग की क्षमता न आ जाए तब तक मर्जी चाहे जितने डिग्री डिप्लोमा प्रमाणपत्र ले लो, सब रद्दी कागज के पुलिंदे बन कर रह जाते हैं। और जो जीवन में गुरू मिल जाए, और कहीं सदगुरु मिल जाए तो सब अंधकार छंट जाता है इसीलिए कहा गया मूरख ह्रदय न चेत, जो गुरू मिलहि विरचि सम।

                 गुरू वहीं नहीं है जो कक्षा में पढ़ाता है। श्रीमद भागवत की कथा में दत्तात्रेय जी ने जिन चौबीस गुरुओं का उल्लेख किया है, उनमें तो मक्खी चींटी से लेकर सर्प और कुत्ता भी सम्मिलित हैं। जो सिखाए वही गुरू। इसमें आयु की अधिकता का भी कोई प्रश्न नहीं। बोध जागे तो पांच साल के ध्रुव में जग जाए और न जागे तो सौ साल भी कम पड़ जाएं। सिद्धार्थ ने जो जो देखा, वह सब तो हम भी रोज रोज देखते हैं पर हमें तो बोध नहीं जगता। हम में से कितनों की हिम्मत होती है कि आधी रात को मनोरमा पत्नी और दुधमुंहे पुत्र राहुल को सोते लांघ कर ज्ञान की खोज में निकल जाएं। निकलना तो दूर, सोचें भी नहीं। अरे आराम से वातानुकूलित कक्ष में परिवार के साथ रह रहे हैं काहे को दर दर भटकते डोलें। ऐसी प्यास तो सिद्धार्थ को ही लगी सो पीपल वृक्ष के नीचे समाधि लगा के बैठ गए, बुद्धत्व प्राप्त हुआ और बुद्ध कहलाए। बौद्ध धर्म ही प्रचलित हो गया।

     गुरू तो कोई भी हो सकता है और जिसके कहे शब्द दिल में गढ़ जाएं वही गुरू हो जाता है। तीन संदर्भ तो सब्की स्मृति में खूब गहरे धंसे होंगे । रत्नाकर जो पेशे से डाकू थे (ऐसा लोक में प्रचलित है), परिवार के भरण पोषण के लिए लूटमार करते थे पर जब सप्त ऋषियों के संपर्क में आए और उनके कहने से परिवार के पास दौड़े दौड़े ये पूछने चले गए कि मेरे पाप में कौन कौन भागी होगा और जब पारिवारिक सदस्यों ने एक स्वर से कह दिया कि परिवार के मुखिया होने के कारण हमारा भरण पोषण तुम्हारा धर्म है, अब उसे तुम कैसे निभाते हो पाप करते हो या पुण्य, ये तुम जानो, हमारा उसमें कोई भाग नहीं। रतनाकर की आंखें खुल जाती है। दौड़ कर जाते हैं, इनका बंधन खोलते हैं, मरा मरा का गुरुमंत्र लेते हैं और उल्टा नाम जप कर ही महर्षि वाल्मीकि बन जाते हैं, रामायण रच देते हैं। ऋषि का दिया ज्ञान उन्हे महर्षि बना देता है।

     वरद राज की कथा भी याद होगी कि कैसे उसका ब्याह धोखे से विद्योत्तमा से करा दिया जाता है और जब मूर्ख कालीदास मुख खोलता है, उष्ट्र को उटर कहता है तो पोल खुल जाती है। विद्योत्तमा की डांट फटकार इतनी बुरी लग जाती है कि अभिज्ञान शाकुंतल, रघुवंश, किरातार्जुनीयम  जैसे काव्य रच देते हैं, कवि नहीं महाकवि बन कर ही दम लेते हैं।

     रामचारित मानस के रचियता तुलसी को भला कौन नहीं जानता। गोद लिए हुलसी फिरें तुलसी सो सुत होय। रत्नावली के प्रेम में ऐसे आसक्त कि सौंप को भी रस्सी समझ उसके सहारे चढ़ पत्नी के कक्ष तक पहुंच जाते हैं और रत्नावली की एक फटकार कि अस्थि चरम मय देह तामे ऐसी प्रीत, जो होती भगवान में तर जाति भवभीति। ग्रंथ के ग्रंथ लिख जाते हैं और राम चरित मानस लिख कर अमर हो जाते हैं।

     तीनों ही घटनाएं सिद्ध करती हैं कि गुरू कोई भी हो सकता है और जब बोध जगता है तब सारा का सारा अंधकार छंट जाता है, प्रकाश ही प्रकाश छा जाता है इतना प्रकाश कि आंखें चुधियाने लगती है।  ज्ञान का प्रकाश जब अन्दर जगाएगा, प्यारे श्री राम के तू दर्शन पाएगा, ज्योति से जिसकी है उजियारी सारी दुनिया, राम एक देवता। बस ज्ञान का प्रकाश हो जाए तो सब मूर्खता दूर हो जाती है। खूब समझदारी आ जाती है।ज्ञान गुरू देता है और कहीं गुरु विरंच सम हो तो सोने में सुहागा। गुरु को ब्रह्मा विष्णु महेश के साथ परम ब्रह्म की संज्ञा दी गई है पर ऐसे गुरु खोजने होते हैं ।कबीर को रामानंद, सूरदास को बल्लभाचार्य, विवेकानंद को राम कृष्ण परमहंस, दयानंद को विरजानंद चंद्रगुप्त को चाणक्य, शिवा को समर्थ गुरु रामदास, भगवान राम और कृष्ण को विश्वामित्र वशिष्ठ और सांदीपन जैसे गुरु न मिले होते तो वे वे न होते जो आज हैं। मुझको कहां खोजे बंदे मैं तो तेरे पास में की तर्ज पर गुरु भी हमारे आसपास ही होते हैं, माता को तो प्रथम गुरु कहा ही गया है। तो गुरुओं का वरद हस्त बना रहे, इनकी कृपा मिलती रहे, बस जीवन धन्य हो जाएगा। सदगुरु की खोज तो जारी रखें पर गुरु घंटालों से ज़रूर बच कर रहें।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...