सफ़र जारी है...1083
05.10.2022
रावण ऐं तो राम ही मार सकें........
आम जन के बस की बात नहीं है दशशीष धारी रावण का सर्वनाश करना, वे तो बस मरे हुए रावण का सालाना पुतला ही फूंक सकते हैं, उसे तो त्रेता के राम ही मार पाते हैं। विभीषण जैसे घर के भेदी साथ हों जो बता सकें कि नाभि में अमृत कुंड है सो उसे सोखने को तीर चलाओ, फिर लंका का ढहना निश्चित होता है और बाकायदा मुहावरा गढ़ जाता है घर का भेदी लंका ढाए। होंगे राम जी परम शक्तिमान पर विभीषण के सहयोग के बिना वे दशानन के अहम का सर्वनाश तो नही ही कर पाते। अकेले विभीषण ही क्यों, रीछराज जांबवान, कपि श्रेष्ठ हनुमान, सुग्रीव, अंगद, जटायु, नल, नील जैसे सहयोगियों का साथ उन्हें नहीं मिलता, तो राम विजय के संदर्भ अलग ही होते । वे विजयी हुए क्योंकि लक्ष्मण जैसा भाई और सीता जैसी भार्या कठोर विपत्ति के समय उनके साथ थे, भरत शत्रुघ्न जैसे एकनिष्ठ सहयोगी भाई उनके पास थे। सदा उनके मंगल की कामना चाहने वाली, उन्हें सत्य असत्य, अच्छाई बुराई, उचित अनुचित, अच्छे बुरे का ज्ञान कराने वाली कौशल्या, सुमित्रा जैसी मातृ शक्ति उनके साथ थी। रघुकुल रीति प्राण जाएं पर वचन न जाए का अक्षरश: पालन करने वाले दशरथ जैसे पिता का वरद हस्त उनके ऊपर था । उनके पास विकल्प था कि वे राम के ऐन राजतिलक के अवसर पर चौदह वर्ष के वनवास और कैकई सुत भरत को राजगद्दी सौंपने के वचन देने के बाद भी मुकर सकते थे, अपने प्राणप्रिय बेटे राम को रोक सकते थे पर नहीं पुत्र वियोग में उन्हें प्राण त्याग देना अधिक सही लगा बनसपत पुत्र मोह में अपने वचन भंग के। लोकमंगल के लिए परिवार का हर सदस्य उनके साथ बना रहा, परिवारी जनों को तो छोड़िए, सुमंत्र जब राम लक्ष्मण सीता को नदी तट तक छोड़ने गए होंगे तो कलेजा तो उनका भी खूब कांपा होगा कि ये सुकुमार वन में कहां कहां भटकते फिरेंगे पर इस भाव के ऊपर राजाज्ञा प्रभावी रही। चाहते तो अयोध्या वासी भी थे कि उनके प्रिय राम ही गद्दी पर बैठें पर राजा का जो निर्णय हो गया, हो गया फिर सबने उसका सम्मान ही किया। मन में भले ही कैकई को इस कृत्य के लिए दोषी मानते रहे हों पर किसी ने राजा के आदेश की अवहेलना नहीं की। दशरथ ने प्राण देना अधिक उचित समझा पर अपने दिए वचनों की रक्षा की फिर भले ही कैकई को लेकर उनके मन में आक्रोश और विवशता चाहे जो रही हो।
राम राम हो पाते हैं तो उसके पीछे ये सारे सकारात्मक सहयोगियों की लंबी कतार ही नहीं हैं ,आसुरी शक्तियों ने भी अपना दमखम खूब दिखाया। मंथरा यदि कैकई के कान नहीं भरती, उन्हें कोख जाये भरत के हित के लिए नहीं चेताती कि भरत को राजगद्दी मिले, इसके लिए राम के कांटे को अयोध्या से दूर भेजना ही उचित होगा तो कैकई कैसे इन दो वरदानों को मांगने के लिए तैयार हो जाती कि राम को चौदह वर्ष का बनवास और भरत को राजगद्दी मिले। अब पुत्र तो पुत्र होता है, छोटा हो बड़ा हो, अधिक प्यारा हो कम प्यारा हो पर पिता किसी के साथ भी अन्याय तो नहीं कर सकता। कैकई जानती थी कि राजा दशरथ भले ही कितने धर्म संकट में क्यों न पड़ जाएं पर अपने पिता धर्म को तो नहीं ही छोड़ पाएंगे फिर भले ही उन्हें प्राण ही क्यों न छोड़ने पड़े। कैकई ने ये जो सब किया अपने पुत्र भरत के लिए ही न, पर भरत को जब सत्य पता चला तो उन्होंने अपनी माता को ही धिक्कारा... भरत से सुत पर भी संदेह, बुलाया तक न उसको गेह। कैकई यदि अपने वचनों पर दृढ़ रही तो भरत ने भी अपने वचन की रक्षा की। वे राजगद्दी पर नहीं बैठे, राम की चरण पादुका रख राजकाज करते रहे। कैकई और मंथरा ही क्यों, सूपनखा, ताड़का, सुबाहु,मारीच जैसी सभी आसुरी शक्तियां उनके शक्ति परीक्षण के लिए दल बल के साथ जुटी रहीं। स्वर्ण मृग के ब्याज से राम को उसका शिकार करने के लिए भेज साधु वेश धर रावण ने राम की भार्या सीता का अपहरण कर लिया, भाई लक्ष्मण को मेघनाथ ने शक्ति प्रहार कर मूर्छित कर दिया, राम रावण से युद्ध करने के लिए शक्ति संग्रहण के लिए देवी आराधना पर बैठे तो नील कमल देवी ने ही चुरा लिया, पूजा बीच में छोड़ कर नहीं जाया जा सकता था तो तीर से अपने नेत्र निकाल कर चढ़ाने को उद्यत हो गए क्योंकि उन्हे स्मरण हो आया था कि मां उन्हें राजीव लोचन पुकारती थी। अब ये अलग बात है कि वाण से नेत्र निकालने को तैयार राम का हाथ स्वयं शक्ति मां आकर रोक लेती हैं कि जय जय होगी नवीन का आशीष रघुवर को मिल जाता है। राम के जितने सहयोगी हैं उतने ही विरोधी भी, पर वे विरोधियों की आलोचना से न तो प्रभावित होते हैं और न उनके आगे हथियार डालते हैं। अपने बुद्धि कौशल से, चातुर्य से या तो उन्हे अपना बना लेते हैं या उन्हें दंडित कर देते हैं। सूपनखा जब सीता को अपने डरावने रूप से भयभीत करती है तो लखन उसके नाक कान काट लेते हैं। ऋषि मुनियों के यज्ञ में व्यवधान डालती आसुरी शक्तियों ताड़का सुबाहु का राम सर्वनाश कर देते हैं। समुद्र से पहले रास्ता मांगने की अनुनय विनय करते हैं लेकिन जब जड़ समुद्र नहीं मानता तो वाण उठा लेते हैं सोषो वारिधि बिशिख क्रशानु , बोले राम सकोप तब भय बिनु होय न प्रीत।और समुद्र रत्नों से भरा थाल लेके उपस्थित हो जाता है। राम शत्रुओं से निपटना जानते हैं, शरणागत की रक्षा करना जानते हैं, उन्हे मान देना जानते हैं तभी जो संपदा शिव रावनहि दीन्ह दिए दस माथ, सोई संपदा विभीषनहि सकुच दीन्ह रघुनाथ का संकल्प ले पाते हैं।
अहंकार और दुर्गुणों के रावण को तो राम जैसा बनकर ही जीता जा सकता है। ये दस दिन शक्ति की आराधना के साथ साथ राम चरित्र मंचन, रामलीला के भी हैं, राम चरित मानस के वाचन के भी हैं, जो जिस रूप में भजना चाहे, उन्हें जानना पहचानना चाहे, उन जैसा बनना चाहे तो उसे राम चरित सागर में अवगाहन अवश्य करना चाहिए । राम तुम्हारा चरित स्वयं काव्य है, कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है। रटो राम, जपो राम बस राम ही राम, बनाते सबरे काम।