Wednesday, August 17, 2022

राम भरोसे एक

 सफर जारी है...1020

10.08.2022

राम भरोसे एक......

तुलसीदास एक ऐसे सशक्त हस्ताक्षर हैं कि जब जब जीवन में निराशा के बादल गहराते हैं , उनकी कोई न कोई रचना लाइट हाउस की माफिक घनघोर अंधकार में आशा की धुंधली सी किरण बन उपस्थित हो जाती है । जीवन में अनेकों ऐसे अवसर आते हैं जब आप समस्या को जानते समझते तो सब हैं लेकिन समाधान आपके हाथ नहीं होता। आप समस्या के मूल में हों न हों, लेकिन आपके चिंतन के मूल में समस्या अवश्य होती है। अंधेरे में तीर चलाते उपाय भले ही खोजते रहें पर सच तो यह है कि कुछ ऐंचक वैंचक समस्याओं का समाधान आपके पास होता ही नहीं है । तब आप राम भरोसे हो जाते हैं और राम ही आपको रास्ता दिखाता है, मारग सुझाता है। अब राम तो हम जैसे दरिद्री को क्या दर्शन देंगे पर अपने रामबोला को संकेत जरूर कर देते हैं कि जा, इस मूरख को समझा दे कि जब अपनी अक्ल काम न करे तो तुलसी साहित्य सागर में गोता लगा और जो हाथ लगे उसे चिंतामणी की तरह संभाल कर रख। पायो नाम चारू चिंतामणी उर कर ते न खसैहों।

 मुझे भी खोजते खोजते ये पंक्तियां हाथ लग गईं जो हम जैसों के लिए तो हारे को हरिनाम तुल्य संजीवनी माफिक है। तुलसी साथी विपत्ति के,विद्या विनय विवेक।साहस सुकृत सुसत्यव्रत,राम भरोसे एक।गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि किसी भी विपत्ति के समय निम्न सात गुण ही आपको आसन्न संकट से बचाएंगे-आपका ज्ञान,आपकी विनयशीलता,आपका बुद्धि विवेक,आपके अन्दर का साहस,आपके सत्कर्म,आपकी सत्यनिष्ठा तथा ईश्वर में अटल विश्वास। ज्ञान यानी जो आपने देख सुन कर पढ़ लिख कर प्राप्त किया है, महापुरुषों के आप्त वचन पढ़े हैं, सूक्ति याद की हैं, परंपरा से जो जानकारी प्राप्त की है। जैसे बचपन में सुनी रामू श्यामू की कहानी की ये सीख कभी नहीं भूलती कि वक्त पड़े पर काम न आबे, मित्र उसे मत जान। तो जो सीखा है उसे याद रखना और समय पर प्रयोग कर लेना ज्ञान है। विन्याशीलता के बिना तो एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता। विद्या का तो अर्थ ही बता दिया गया जो विनय शील बनाएं, वही सच्ची विद्या है। विद्या ददाति विनयम, विनयात याति पात्रत्त्वताम। जो विनय शील नहीं, वह सूखी डाल की तरह अकड़ा खड़ा रहता है और आंधी तूफान आने पर झट से टूट जाता है जबकि घास नमनीयता के कारण आंधी तूफान में झुक कर लेट जाती है और फिर गर्व से सिर उठा कर खड़ी हो जाती है। फल से लदा पेड़ हमेशा झुका होता है। नल की अरु नल नीर की गति एकही कर जोय, ज्यों ज्यों नीचो है चले त्यों त्यों ऊंचो होय।बुद्धि विवेक दोनों को एक साथ रखा गया यानि अकेले बुद्धिमत्ता से काम नहीं बना करते, साथ ही विवेकशील होना बहुत जरूरी है। बुद्धिमान हैं भी तो क्या, विवेक को तो सात कोठरी के अन्दर छिपा कर रखते हैं और चाबी कहीं रख कर भूल जाते हैं। साहसी होने का अर्थ केबल शारीरिक बल नहीं है। सत्साहस जिसकी बात सरदार पूर्णसिंह करते हैं। साहसी व्यक्ति हार के डर से चुप होकर नहीं बैठ जाता, वह अपना कार्य करता है, मुश्किलों से नहीं घबराता, विपत्तियां आती हैं तो आने दो। सूरमा नहीं विचलित होते, अपने आत्म बल को बनाए रखते हैं।

 आपके सत्कर्म, आपकी निष्ठा, आपकी सत्यवादिता आपके सबसे बड़े हथियार हैं। पर सत्य परेशान बहुत होता है पराजित हो न हो। कहने को झूठ के पैर नहीं होते पर लोग सफलता का रास्ता झूठ के सहारे ही तय कर लेते हैं और सब पर हावी बने रहते हैं। एक अंतिम बात, भले ही से आप ज्ञानी, बुद्धिमान, विवेक शील, विनम्र, सत्कर्म करने वाले,साहसी, आत्मबल के धनी और सत्यवादी क्यों न हो, जो आपकी ईश्वर में आस्था नहीं तो सारे के सारे गुण ऐसे ही धरे रह जाते हैं। जिन्हें ईश्वर में अटल विश्वास है, वे विचलित नहीं होते। उनकी नैया तो राम जी ही पार लगाते हैं। तेरा राम जी करेंगे बेड़ा पार, उदासी मन काहे को डरे। अब मन ही तो है, हो जाता है बाबरा, पागलों सा इधर से उधर डोलता है। कुछ समझ नही पाता। और जो राम जी की कृपा हो जाएं तो मन में शान्ति सी आ जाती है। निर्भय हो जाते हैं। राम के भरोसे कंबल लपेट के सो जाते है। तुलसी भरोसे राम के निर्भय होके सो को कस के पकड़ लेते हैं। तो बस ये विश्वास बना रहे कि हरि हमारे साथ हैं, किसी भंवर में डालेंगे तो देर सवेर निकाल भी लेंगे। राम भरोसे एक।

डबल जीरो

 सफर जारी है....1019

09.08.2022

डबल जीरो....

अब नहीं आता संबंधों का जोड़तोड़ गुणा भाग तो क्या करें। गणित में शुरू से ही कच्चे रहे , गणित ही तेज होता तो उसमें विज्ञान का छौंक लगाकर आज मास्टरनी की जगह डाक्टरनी बने नहीं बैठे होते। खूब पच्चीस तक पहाड़े और एक हजार तक गिनती याद की पर दो और दो पांच, न तीन में न तेरह में, एक और एक मिलकर ग्यारह होते हैं, तीन पांच करने और चौके छक्के की कला नहीं सीख पाए। जोड़ जोड़ के कितना भी भंडार में डाला पर हमेशा माइनस में ही रहे। न संबंधों के गुणनफल समझ आए और न रिश्तों के विभाजन। खूब ईमानदारी से पूरा सवाल हल करते पर अंत तक आते आते कुछ न गड़बड़ हो जाती और हमारा उत्तर किताब के उत्तर से मैच नहीं करता। टीचर जी अलग समझाती जब सब ब्लैक बोर्ड से टीप लेते हैं तो तुम अलग से अपनी अक्ल क्यों लगाती हो। अरे उत्तर का मिलान करो, प्रक्रिया में मत उलझो। बस उत्तर सही आ जाना चाहिए। नम्बर तो उसी में मिलते हैं। जीवन में सफलता जरुरी है, सब सफलता ही देखते हैं, बस एक बार पास हो जाओ तो कोई नहीं देखता कि कैसे पास हुए, नकल से या अक्ल से। यहां पूरी जिंदगी सही गलत के चक्कर में ही पड़े रहे। न बीजगणित के क की घात समझ आई, न वर्गमूल और न रेखागणित की तिर्यक रेखाएं और कोणों के विभाजन। अब किताबी गणित समझ आ जाता तो जीवन के गणित के कठिन सवाल हल करने की योग्यता आ जाती। अब तो सब करते धरते भी बुद्धू के बुद्धू कहे जाते हैं। थोड़ी सी सयानपताई मां घुट्टी में पिला देती तो आज हमारी गिनती भी सफल आदमियों में होती। पर अब क्या करें लोगों के दोनों हाथों में लडडू हैं और यहां लडडू तो दूर की बात, चाटने को गुड़ की डली भी मयस्सर नहीं। सब अपना ही किया धरा है और बनो सीधे सट, ऐसे ही काटे और निचोड़े जाओगे। और बनो भोले भंडारी, मत दौड़ाओ अपनी अक्ल के घोड़े, सबको पेट में भरो, कुछ मत छिपाओ सब उगल दो, और बन लो सच धारी। तब लगता था कि इमानदारी में बहुत ताकत है, सारे झूठ का पर्दाफाश होता है और अंत में निखालिस सच ही जीतता है। नहीं भाई नहीं, सोलह आने सच के दाम लद गए। अब तो जो कहो, उसे भी थोड़ा घुमा फिरा के कहो तब सच माना जाता है।

बड़ा अभिमान था कि हम तो सबके हैं, रिजल्ट सामने आया तो पता चला जो सबका है वह दरअसल किसी का भी नही होता। जैक आफ आल भले हो पर मास्टर ऑफ नन होता है। उसे कोई भी अपना नहीं मानता, सबको लगता है कि यह उसका इसका सबका है तो जरूर घालमेल है। कोई उतना बड़ा हो ही नहीं सकता कि सब पर समान वर्षा कर सके, ये तो आकाश और धरती के बस का ही है। तभी तो कहा जाता है इतने ऊंचे उठो जितना उठा गगन है,धरती कहती धैर्य न छोड़ो कितना भी हो सिर पर भार, नभ कहता है फैलो इतना ढक लो तुम सारा संसार। ये धरती आकाश, पर्वत, सागर सब सिखाते हैं पर हम जड़ बुद्धियों की समझ में कुछ आए तब न।

चलो अब गणित में कच्चे रह गए तो थोड़ी बहुत राजनीति ही सीख लेते। सीधी सीधी कहने के बजाय थोड़ा घुमा फिरा के कहने की ही क्लास नहीं तो कोचिंग ही ले लेते पर नहीं साब, हमें तो उस ओर रुख ही नहीं करना था। पॉलिटिक्स को तो गंदा तालाब समझते कि गलती से भी उस ओर निगाह चली गईं तो धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। तो बने रहो हरिश्चंद्र , जैसे उनका देश निकाला हुआ, विपत्ति पे विपत्ति आई, रोहिताश्व को सांप ने डस लिया, शैव्या के पास कफन खरीदने तक को पैसे नहीं थे, शमशान का कर कहां से चुकाती। राजा नल पर विपत्ति आई तो खूंटी हार निगल गई और मछली तालाब में चली गईं। जो सत्याग्रह करने निकले उन्हें जेल में ठूंस दिया गया। धर्मज्ञ युधिष्ठिर को कौन से सुख मिले। जो सच का रास्ता पकड़ेगा, सफलता उससे सौ कदम दूर ही चलती है और जिकजेक मार्ग पकड़ने  वाले जल्दी मंजिल पा लेते हैं।

काहे का रोना धोना,गणित और राजनीति की एबीसीडी न जानने वालों का ये ही हश्र होता है, वे चारों खाने चित्त गिरते हैं, किए कराए पर उनकी बेवकूफी और सिधाई पोता फेर देती है। उनके  भाग में यश का अल्पांश भी नहीं होता। पिछले कर्म इतने प्रभावी होते हैं कि अब के सारे सुकर्म एक तरह और सिधाई वर्सेस बेवकूफी के परिणाम दूसरे पलड़े में। तो मत सीखो गणित के फार्मूले, राजनीति का क ख ग, लिपटे रहो अपने दो पैसे के मारकीन के लिबास में, चुनौतियां ऐसे ही मुंह चिढ़ाती रहेंगी। रास्ते दोनों है, चुनना तुम्हें है कि कठिनाइयों से भरा सच का रास्ता चुनते हो या मक्खन मलाई सा कोमल झूठे आंकड़ों का गणित और जलेबी सी गोल गोल और उलझी राजनीति। बाकी शून्य बटा शून्य तो घोषित कर ही दिए गए हो।

झुकना /रुकना मना है

 सफर जारी है....1018

08.08.2022

झुकना /रुकना मना है  ......

 जहां गलती न हो वहां झुके क्यों और जहां इज्जत न हों वहां रुके क्यों, कहने में बड़ा अच्छा लगता है और बड़े बड़े अक्षरों में लिखकर पोस्टर बना कर लगा दो तो शोभा और बढ़ जाती है पर ये सब यदि जीवन में शामिल करते उठा पटक शुरू हो जाती है। सदियों से घर बनाए रखने के लिए यही सिखाबन दी जाती रही है कि जैसे भी हो, चार बात सुन लो, थोड़ा गम खाओ थोड़ा कम खाओ पर घर किसी भी कीमत पर बचना ही चाहिए। नानी दादी की पीढ़ियों को ये सब ही तो करते देखा है। गलती न होने पर भी पैर पूज लेना और खूब बेइज्जती होने और उल्टी सीधी सुनकर भी मुंह में कपड़ा ठूंस रो लेना, किसी बड़े के आवाज़ देने पर जल्दी से मुंह धो कर उपस्थित हो जाना, और आंख गीली क्यों है पूछने पर तिनका जाने का बहाना बना देना , किसी के बुरे व्यवहार के प्रति  में जितना भी गुस्सा क्यों न हो ,जी कारे के साथ बोलना जरुरी होता है नहीं तो समाजिक व्यवहार प्रतिमान टूटने का खतरा उपस्थित हो जाता है।

           क्षमा वीरस्य भूषणम कहा जाता जरूर है पर जब दिल का हर कोना वाणों से छिदा पड़ा हो तो चाह कर भी वीर नहीं बना जाता। सारा सारा दिन उस घटे हुए को याद कर के ही निकल जाता है, क्षमा के विषय में सोचने का समय ही नहीं मिलता। दिल निर्मल हो, सांसारिकता हावी न हो, दुनियां भर के छल छंद से दूरी हो तो कहीं क्षमा के विषय में सोचा जाए।जो शख्स स्वयं से ही सवाल जबाज कर रहा हो , जिसे अपने प्रश्नों के उत्तर न मिल रहे हों, जो स्वयं दबाब में जी रहा हो ,उसे क्षमा जैसे विशाल शब्द का अर्थ खोजने को सही सही डिक्शनरी भी नहीं मिलती। क्षमा बड़ेन को चाहिए छोटन को उत्पात रचने वाले खुद जानते होंगे कि बड़े बड़े अपराधों पर केवल क्षमा करने से ही काम चल जाता तो ये न्यायालय क्यों बने होते, अपराधी के लिए दंड की व्यवस्था क्यों होती , यदि सब कर करा कर एक सॉरी कह देना काफी होता तो दुनियां पूरी तरह से बदली बदली होती। फिर तो बच्चे जी भर के उत्पात करते , घर पड़ोस क्लास नाते रिश्तेदार से जैसा चाहे व्यवहार करते, किसी को चिढ़ाते खिझाते ,,किसी पर दो चार हाथ आजमाते और बाद में एक सॉरी बोलकर सारे अपराधों से मुक्ति पा जाते, उनकी हिम्मत बढ़ती जाती। बस एक सिद्धांत स्थापित हो जाता जो मर्ज़ी चाहे करो और बाद में सॉरी का लेवल चस्पा कर दो।

 दूसरी तरह वह प्रजाति है जो हर वक्त गुस्से से लैस रहती है, ऐंठ के मारे पैंठ को जाती है, किसी भी बात का सीधे मुंह ज़बाब नहीं देती । पता ही नहीं चल पाता कि ये चिर स्थाई गुस्सा आखिर है किस बात पर और है किस किस पर। घर परिवार समाज सभी तो इसके आये दिन शिकार बनते हैं।और गुस्सा है भी तो एक दिन तसल्ली से बैठकर उसे रिलीज कर दो लेकिन मन में पाले मत रहो। ये जमा हुआ आक्रोश जब कभी भी पिघलेगा तो गर्म लावा जैसे फूटेगा। और फूटेगा ही नहीं, बहुतों को अपनी चपेट में ले लेगा तो जिस किसी भी कारण से मन पर दबाब हो तो उसे रोज का रोज रिलीज कर देना ज्यादा अच्छा होता है वनस्पत उसे सालों पालने और उसका पहाड़ बना लेने के। बहुत अच्छी लगती हैं ये बडी बडी बातें पर तभी तक जब तक वे पढ़ने पढ़ाने और दूसरे को उपदेश देने के लिए होती हैं पर जैसे ही इन्हें रोजमर्रा के व्यवहार में लाना होता है ,सारी ठसक धरी रह जाती है। आल गिल्टर्स देट आर नॉट गोल्ड, ऐसे ही थोड़े रच दिया गया होगा। तो जो दूर से देखने में अच्छा लगता है, व्यवहार में लाते ही उसके प्रतिमान बदलने लगते हैं, मेरा तेरा शुरू हो जाता है। सारे फसाद की जड़ तो ये ही है। अपने अपने अंश को रोते बिलखते परेशान होते और निराशा में जकड़ते भी तो नहीं देखा जाता। तराजू के पलड़े में रखें तो दो पक्षों की गलतियों में आनुपातिक अंतर भले हो, गलतियों के वर्गीकरण में वैविध्य भले से हो पर सच तो यह भी है न कि ताली एक हाथ से नहीं बजा करती और जब पानी सिर के ऊपर बहने लगता है तभी बिखरता है, अपने बांध अपनी सीमाएं तोड़ बाहर आने को बेतरतीब मचलता है, किसी के रोके नहीं रुकता । 

 जब कुछ हाथ में है ही नहीं तो कोरी बातें करने का भी भला क्या लाभ, अब तो जो करेगा, ईश्वर ही करेगा। तो प्रभु जी तुम्हारे आसरे हैं, दंड सजा माफी जो देना हो दो । सब तुम्हारे ही आसरे हैं। जो जो जब जब हुआ, हुआ तो आपकी प्रेरणा से ही होगा तो भगवन दया बनाए रखना। बस हम बालक तो प्रार्थना ही कर सकते हैं। बहुत परीक्षाएं ले ली भगवन, अब धैर्य और हिम्मत का  साहस भी चुकने को है। मेरी लाज रखो गिरधारी, मैं आई शरण तिहारी।

भाषा बोल न जानहीं

 सफर जारी है...1017

07.08.2022

भाषा बोल न जानहीं.....

               कैसा भी कम पढा लिखा क्यों न हो, भाषिक संस्कारो की उम्मीद तो उससे की ही जा सकती है। और वैसे भी कक्षाओं में कौन बोलने चालने की शिक्षा दीक्षा दी जाती है कि पढ़े लिखे भाषाई संस्कारो की पोटली सिर पर लादे चलते हों। किसी भी विषय के पाठ्यक्रम में तो ऐसा कोई पाठ होता नहीं और नैतिक शिक्षा विषय के नाम पर जो मर्जी सिखाया जाता हो, उसे हमेशा से ग्रांटेड फॉर लिया जाता रहा कि ये सब किताबी बाते हैं, इनका भला दैनंदिन जीवन से क्या संबंध।कौन सीखता और सिखाता है भला बोलने चालने जेसी गैर जरुरी और हल्की फुल्की बात।ये सब तो परिवार, पास पड़ोस, नाते रिश्तेदार और इष्ट मित्रों से बतराते और दूसरो को बोलते चालते देख कर स्वत ही आ जाता है। शायद इसीलिए आस पास के परिवेश और मित्रों के चयन में बहुत सावधानी बरतने की बात कही जाती है। जैसा होगा संग, वैसे होंगे रंग ढंग। जैसी भाषा परिवार और आसपास के लोग बोलते है, कमोवेश वही संस्कार  बच्चा ग्रहण करता है।सारे सारे दिन जिस घर परिवार में चकल्लस होती रहती हो, हर व्यक्ति तीखी और चुभती आवाज़ में ह्रदय में सीधे गढ़ जाने वाले कड़वे बोल बोलने में दक्ष हो, ऐसे बोलने में अपनी शान समझता हो, जहां बड़ो को तू तड़ाक से संबोधित किया जाता रहा हो, उन्हें अपेक्षित आदर मान सम्मान देने में कंजूसी बरती जाती हो ,छोटो से प्यार से नहीं बोला जाता, बात बात अलंकार लगाने की रीतिबद्ध परंपरा हो, घर में शांति चुप्पी बनाए रखने के नाम पर किसी की झूठी अकड़ और घमंड को पोसा जाता हो फिर भले ही वह गलत क्यों न हो। अपनी ही सेर रखी जाती हो, अपना ही डंडा पुजवाया जाता हो, उस घर परिवार के किसी भी सदस्य से सभ्य भाषा की उम्मीद लगा बैठना  बेवकूफी के अलावा और क्या है भला। जो बेल ही कड़वी हो उस पर भला मीठे फल कहां से आऐंगे। बोया पेड़ बबूल का आम कहां ते होय।

        शिक्षा दीक्षा से व्यक्ति के व्यवहार में बदलाव आता है, यह सैद्धांतिक सच भले हो पर व्यवहार का सत्य तो कम से कम नहीं ही है। और कौन पढ़ाई में बोलना चालना सिखाया जाता है। बस मोटे मोटे पोथे पढ़ कर, परीक्षा में ढेर से नंबर ले आओ, पहले दूसरे नम्बर पर बने रहो, सारा का सारा ध्यान पैसा वैसा कमाने में लगाए रखो , बस व्यक्ति के सारे भाषाई ऐब  ढक जाते हैं। पैसा और बड़े नामी परिवार का होने का इतना लाभ तो मिल ही जाता है कि गलत को भी ढका जा सकता है, उसके पक्ष में भी तर्क और दलीलें परोसी जा सकती हैं। और फिर जहां पूरा घर और परिवेश मिलकर ऐसे ऐसे दबंग करेक्टर तैयार कर रहा हो तो सुलह कराने वाले मध्यस्थ की मिटी पलीद अलग होती है। एंट्री लेने वाले ऐसे गर्मागर्म माहौल में दूर से ही हाथ जोड़ लेते हैं। इसलिए नहीं कि उन्होंने इस भाषा में डिप्लोमा नहीं लिया होता और उन्हें गाली गलौज करना नहीं आता। सच तो यह है कि इतनी नीचता के स्तर पर उनसे उतरा नहीं जाता। क्या आपका साबका पड़ा है ऐसे भाषा प्रेमियों और ऐसे दक्ष नमूनो से। आप दो चार ट्रायल देख लें तो पूरा मामला जानने से पूर्व ही तौबा कर लेंगे।

         हर बदतमीजी को यह कह कर छोड़ दिया जाना कि अगला नहीं मानता तो हम क्या करें भला, अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है।सच ही जो अपनो की मर्यादा नहीं रख पाता, उससे दूसरे तीसरे के साथ उचित भाषाई व्यवहार की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। पर बात बड़ी है और इससे मुक्ति के उपायों पर सार्थक बहस जरुरी है , वरना तेजी से पनपती ये बेतरतीब खर पतवार सब कुछ मायने सब कुछ नष्ट कर देगी और सिवाय पछताने के कुछ और शेष नहीं रहेगा। तो शिक्षाविदो, समाज शास्त्रियों और कानूनविदों से अपील करना लाजमी है कि वे इस दिशा में सोचें कि भाषाई संस्कारो के बीज वपन की आखिर प्रक्रिया है क्या। ये जो नए मॉडल तैयार हो रहे है, उनमें लिंग और जाति विभेद नहीं हैं। ये कुकरमुत्तो की माफिक फैलते ही जा रहे हैं।वे अपने को तो बरबाद कर ही रहे हैं, साथ ही माहौल को भी इतना दूषित कर रहे हैं कि बस सांस घुटी जा रही है। तो सीखनी ही होगी भाषाई तमीज, देनी होगी नई पीढ़ी को ये विरासत और इसके लिए सबसे पहले हम बड़ों को अपने अपने को सुधारना होगा, अपने भाषाई आचरण पर लगाम कसनी होगी, बे ते की भाषा से मुक्ति पानी होगी तभी अगले को टोका और सुधारा जा सकेगा।

हुलसी के तुलसी

 सफर जारी है....1016

05.08.2022

हुलसी के तुलसी......

अमृतलाल नागर जी का मानस का हंस पढते प्रिय रचनाकार तुलसी को जानने की एक नई दृष्टि मिली जो इनकी जीवनी पढ़ते और परीक्षा के लिए रटते से भिन्न थी। कोई कालजयी रचनाकार कैसे बना, इसे जानने पहचानने के लिए उसकी बचपन से प्रारंभ हुई जीवन यात्रा के संदर्भ तलाशना बहुत जरुरी है।

 अभुक्त मूल नक्षत्र में जन्मे बालक की माता जन्म देते ही चल बसी , पिता आत्माराम को ज्योतिषियों ने समझा दिया था कि यह शिशु परिवार पर भारी है तो घर की दासी उसे लेकर चली गई। उसी ने पालन पोषण किया। जो बालक जन्मते ही मां के प्यार दुलार से वंचित हो गया हो, जिसके सिर पर माता पिता का स्नेहिल छांव न हो, जिसे एक दासी अपने पूरे ममत्व से पाल रही हो, वह सबसे अलग तो वैसे ही हो जाता है। उसे जीवन जीने के लिए अतिरिक्त शक्ति परम पिता सौंप देते हैं, उसे नरहरी गुरू की अहेतुकी कृपा मिलती है, वह समाज का पथ प्रदर्शक बन जाता है, समाज को ऐसा पाथेय दे जाता है कि कई कई पीढ़ियां उससे लाभान्वित होती है , वे अविस्मरणीय हो जाते हैं। आज श्रावण शुक्ला सप्तमी को उनकी जयंती है, उन्हें शत शत प्रणाम।

 घर में रामचरित मानस का पाठ फिर चाहे दसेक चौपाई ही क्यों न हो, जरुरी था। नहा धो कर पहले पूजा पाठ बाद में पेट पूजा की आदत डाल दी गई थी। नवरात्रि में नवाह्न परायण आवश्यक रूप से होता और विशेष दिनों में  सुंदर काण्ड। जरा सा डर लगने पर हम बच्चे जय हनुमान ज्ञान गुण सागर की पंक्तियां दोहराने लगते। मानस के हंस पढ़ते पता चला हमें ही नहीं, तुलसी भी को डर लगता था। वे हनुमान चालीसा रच सकते थे, हनुमान बाहुक लिख सकते थे और हम सबको भय पीड़ा से मुक्त करने के सूत्र भी दे सकते थे। रामचरित मानस का अखंड पाठ आस पड़ोस में हो रहा हो तो वहां हम अपनी हाजिरी लगाने पहुंच जाते। उन दिनों माइक पर बोलने का बड़ा चाव था। दोहे चौपाई और संपुट को कंठस्थ करने की होड़ लगती। तब तक रामचरित मानस को भी रामायण ही कहते थे। ये तो बाद में पता चला कि रामायण वाल्मीकि ने लिखी थी।

    एम ए में एक प्रश्न पत्र निबंध का था, परीक्षा में मेरे प्रिय रचनाकार तुलसी पर निबंध लिखते रामचरित मानस के संदर्भों के उल्लेख से ही उत्तर पुस्तिका भर गई। दरअसल तब जो पढा जाता था उसका अर्थ समझने की परंपरा भी थी, मुख से मात्र दोहे और चौपाई ही उच्चरित नहीं होते थे। तुलसी की विनय पत्रिका पढ़ते उसके भजन गुनगुनाते तुलसी को जानने समझने का विशेष अवसर मिला। अब लो नसानी अब न नसैहो, राम कृपा भव निशा सिरानी जागे फिर न डसैहो। राम रट राम रट राम रट बाबरे जैसे कितने कितने भजन हैं जो आपको भक्ति के सागर में डुबो देते हैं। तुलसी जनमानस के प्रिय कवि हैं। उनकी रचनाएं जनमानस की जुबान पर चढ़ी हुई हैं। मंगल भवन अमंगल हारी, द्रवऊ सुदशरथ अजर बिहारी के रचयिता तुलसी को सादर नमन। उनकी रचनाएं हमें आत्मिक बल देती है। एक भरोसे एक बल एक आस विश्वास, स्वाति सलिल रघुनाथ जल चातक तुलसीदास।

जो बोले सो कुंडा खोले

 सफर जारी है....1015

04.08.2022

जो बोले सो कुंडा खोले.....

प्राथमिक कक्षा में हिंदी की पुस्तक में एक कविता थी जिसका लब्बोलुआब यह था कि बिल्ली के दबे पांव चुपचाप आने से चूहों को कुछ पता नहीं चलता और वे बिल्ली का भोजन बन जाते हैं। इस पर  चूहों की सभा बैठती है, बुजुर्ग चूहा सभी चूहों से सुझाव मांगता है । एक उत्साही चूहा बिल्ली के गले में घंटी बांधने का प्रस्ताव देता है। सभी ताली बजाकर इसका समर्थन करते हैं लेकिन जैसे ही बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा पूछा जाता है, सभी चूहे एक एक कर दुम दबा कर भाग जाते हैं। सच भी है सुझाव देना एक बात है और उस सुझाव को अमल करने के लिए अपने को प्रस्तुत करना, उसे क्रियान्वित करना और अभिव्यक्ति के सारे खतरों को उठाते हुए पहले से तैयार गढ़ मठ को तोड़ नए प्रतिमान स्थापित करना बिलकुल दूसरी। हालांकि इतिहास वही रच पाते हैं जो इनिशियेटिव लेने का साहस रख पाते हैं और केवल आगे ही नहीं आते, प्रस्ताव और सुझाव ही प्रस्तुत नहीं करते बल्कि उसे अमली जामा पहनाना भी जानते हैं। वे कहते ही नहीं, उसे करते भी हैं।

     अब करने का अर्थ सारी पोटली सारा वजन स्वयं के मूड पर लादना ही नहीं होता, उसकी योजना बना सहयोगियों के साथ मिल बांटना भी होता है। ये तो सभी जानते हैं कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। पर समुद्र मंथन के समय छोटी और कमजोर सी गिलहरी के द्वारा बार बार समुद  तट की बालू में लेटकर और फिर जल में जा उस बालू को वहां छोड़ते जैसे कार्य से प्रेरणा तो ली जा सकती है। किसी के पूछने पर गिलहरी द्वारा दिया गया उत्तर भी रेखांकित किए जाने योग्य है कि जब जब समुद्र मंथन का संदर्भ आएगा कम से कम मुझे कामचोर की श्रेणी में तो नहीं रखा जायेगा। और हुआ भी यही गिलहरी के शरीर पर तीन रेखाएं राम के दुलार के चिह्न के रूप में सदा सदा के लिए अंकित हो गई। ऐसे ही दूसरा संदर्भ एक चिड़िया का है जो आग लगने पर अपनी छोटी सी चोंच से लगातार पानी लगा लगा कर आग बुझाने का प्रयास करती है और उसे देखकर उत्साहित अन्य लोग भी बाल्टी भर भर कर पानी डालते हैं। अंतत आग बुझ जाती है। कौआ चिड़िया से पूछता है जब तुझे पता था कि तेरी प्रयासों से आग बुझने वाली नहीं तो भी तूने कोशिश क्यों नहीं छोड़ी, चिड़िया का जबाब याद रखने योग्य है जब जब इस घटना का जिक्र होगा मेरा नाम आग लगाने वालों में नहीं, बुझाने वालों में लिया जाएगा।

     तो जो सत्कार्य में प्राणपण से लग जाते हैं, अपने प्राणों की बाजी लगा देते हैं, कार्य से बचने के बहाने नहीं तलाशते, वे गौरवशाली कहे जाते हैं। आप किसी भी कार्यक्षेत्र और जीवन के किसी भी अनुशासन में क्यों न हों,  अपने कार्य को पूरी निष्ठा और लगन से कर सकते हैं। छोटे छोटे निजी स्वार्थों से ऊपर उठ कर सोचिए तो सही, किसी का भला कीजिए तो सही, सच मानिए आप कभी भी घाटे में नहीं रहेंगे। गुरू नानक का सच्चा सौदा तो याद होगा ही और उनका ये संदेश भी भूले नहीं होंगे कि अच्छे लोगों को सब जगह बिखरना और दुष्ट लोगों को एक सीमित जगह में सिमट जाना चाहिए। दुष्टों के साथ कुतर्क और बहस में अपना कीमती समय जाया कीजिए। न तो उनसे राग रखें न द्वेष पालें न उपेक्षा करें न लाड लडाबें, बस उदासीन हो जाएं। जिस भी क्षेत्र में उनकी प्रतिभा हो, क्षमता हो, योग्यता हो वैसा ही दायित्व प्रभार दे दें, खाली छोड़ना तो अपने लिए मुसीबत मोल लेना है। जानते हो न खाली दिमाग शैतान का घर है, खेत में यदि कुछ भी बोआ न जाए तो खर पतवार स्वत उग आती है।

     कहना और करना एक हो जाएं, कथनी कहनी का अन्तर मिट जाबे, आदर्श यथार्थ का भेद न रहे तो सोचो दुनियां कितनी सुखद होगी। सब अपने से लगने लगे, कोई किसी से घृणा न करे, किसी के प्रति राग द्वेष न रखें, सब आपस में स्नेह सौहार्द से मिल कर र, तो वसुधा कुटुम्ब न हो जाए हें पर ये सब तो केवल विचारों में अच्छा लगता है, बहुत हुआ तो किताब में लिख दिया जाएगा, पाठ्यक्रम में लगा दिया जाएगा, उसे पढ़ पढा कर परीक्षा में लिख दिया जाएगा, झोली भर अंक ले लिए जाएंगे, चार पांच अंकों की सेलरी मिल जाएगी पर ये सब व्यवहार का अंग तो फिर भी नहीं बन सकेगा। तो कहना आसान है और जो आगे बढ़कर इस सबको कहेगा उससे ही करने की आशा जोड़ ली जाएगी। तो कहो भी तभी जब करने की हिम्मत हो। अच्छी अच्छी बात कर लेना, सुवाक्य, सूक्तियों का संचयन और प्रस्तुति एक बीबीबात है और उसका दशांश भी व्यवहार में ले आना दूसरी। तो जो बोलो सोच समझ के बोलो। जो बोलेगा उससे ही कुंडा खोलने की उम्मीद लग जाएगी।

जो बोले सो कुंडा खोले

 सफर जारी है....1015

04.08.2022

जो बोले सो कुंडा खोले.....

प्राथमिक कक्षा में हिंदी की पुस्तक में एक कविता थी जिसका लब्बोलुआब यह था कि बिल्ली के दबे पांव चुपचाप आने से चूहों को कुछ पता नहीं चलता और वे बिल्ली का भोजन बन जाते हैं। इस पर  चूहों की सभा बैठती है, बुजुर्ग चूहा सभी चूहों से सुझाव मांगता है । एक उत्साही चूहा बिल्ली के गले में घंटी बांधने का प्रस्ताव देता है। सभी ताली बजाकर इसका समर्थन करते हैं लेकिन जैसे ही बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा पूछा जाता है, सभी चूहे एक एक कर दुम दबा कर भाग जाते हैं। सच भी है सुझाव देना एक बात है और उस सुझाव को अमल करने के लिए अपने को प्रस्तुत करना, उसे क्रियान्वित करना और अभिव्यक्ति के सारे खतरों को उठाते हुए पहले से तैयार गढ़ मठ को तोड़ नए प्रतिमान स्थापित करना बिलकुल दूसरी। हालांकि इतिहास वही रच पाते हैं जो इनिशियेटिव लेने का साहस रख पाते हैं और केवल आगे ही नहीं आते, प्रस्ताव और सुझाव ही प्रस्तुत नहीं करते बल्कि उसे अमली जामा पहनाना भी जानते हैं। वे कहते ही नहीं, उसे करते भी हैं।

     अब करने का अर्थ सारी पोटली सारा वजन स्वयं के मूड पर लादना ही नहीं होता, उसकी योजना बना सहयोगियों के साथ मिल बांटना भी होता है। ये तो सभी जानते हैं कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। पर समुद्र मंथन के समय छोटी और कमजोर सी गिलहरी के द्वारा बार बार समुद  तट की बालू में लेटकर और फिर जल में जा उस बालू को वहां छोड़ते जैसे कार्य से प्रेरणा तो ली जा सकती है। किसी के पूछने पर गिलहरी द्वारा दिया गया उत्तर भी रेखांकित किए जाने योग्य है कि जब जब समुद्र मंथन का संदर्भ आएगा कम से कम मुझे कामचोर की श्रेणी में तो नहीं रखा जायेगा। और हुआ भी यही गिलहरी के शरीर पर तीन रेखाएं राम के दुलार के चिह्न के रूप में सदा सदा के लिए अंकित हो गई। ऐसे ही दूसरा संदर्भ एक चिड़िया का है जो आग लगने पर अपनी छोटी सी चोंच से लगातार पानी लगा लगा कर आग बुझाने का प्रयास करती है और उसे देखकर उत्साहित अन्य लोग भी बाल्टी भर भर कर पानी डालते हैं। अंतत आग बुझ जाती है। कौआ चिड़िया से पूछता है जब तुझे पता था कि तेरी प्रयासों से आग बुझने वाली नहीं तो भी तूने कोशिश क्यों नहीं छोड़ी, चिड़िया का जबाब याद रखने योग्य है जब जब इस घटना का जिक्र होगा मेरा नाम आग लगाने वालों में नहीं, बुझाने वालों में लिया जाएगा।

     तो जो सत्कार्य में प्राणपण से लग जाते हैं, अपने प्राणों की बाजी लगा देते हैं, कार्य से बचने के बहाने नहीं तलाशते, वे गौरवशाली कहे जाते हैं। आप किसी भी कार्यक्षेत्र और जीवन के किसी भी अनुशासन में क्यों न हों,  अपने कार्य को पूरी निष्ठा और लगन से कर सकते हैं। छोटे छोटे निजी स्वार्थों से ऊपर उठ कर सोचिए तो सही, किसी का भला कीजिए तो सही, सच मानिए आप कभी भी घाटे में नहीं रहेंगे। गुरू नानक का सच्चा सौदा तो याद होगा ही और उनका ये संदेश भी भूले नहीं होंगे कि अच्छे लोगों को सब जगह बिखरना और दुष्ट लोगों को एक सीमित जगह में सिमट जाना चाहिए। दुष्टों के साथ कुतर्क और बहस में अपना कीमती समय जाया कीजिए। न तो उनसे राग रखें न द्वेष पालें न उपेक्षा करें न लाड लडाबें, बस उदासीन हो जाएं। जिस भी क्षेत्र में उनकी प्रतिभा हो, क्षमता हो, योग्यता हो वैसा ही दायित्व प्रभार दे दें, खाली छोड़ना तो अपने लिए मुसीबत मोल लेना है। जानते हो न खाली दिमाग शैतान का घर है, खेत में यदि कुछ भी बोआ न जाए तो खर पतवार स्वत उग आती है।

     कहना और करना एक हो जाएं, कथनी कहनी का अन्तर मिट जाबे, आदर्श यथार्थ का भेद न रहे तो सोचो दुनियां कितनी सुखद होगी। सब अपने से लगने लगे, कोई किसी से घृणा न करे, किसी के प्रति राग द्वेष न रखें, सब आपस में स्नेह सौहार्द से मिल कर र, तो वसुधा कुटुम्ब न हो जाए हें पर ये सब तो केवल विचारों में अच्छा लगता है, बहुत हुआ तो किताब में लिख दिया जाएगा, पाठ्यक्रम में लगा दिया जाएगा, उसे पढ़ पढा कर परीक्षा में लिख दिया जाएगा, झोली भर अंक ले लिए जाएंगे, चार पांच अंकों की सेलरी मिल जाएगी पर ये सब व्यवहार का अंग तो फिर भी नहीं बन सकेगा। तो कहना आसान है और जो आगे बढ़कर इस सबको कहेगा उससे ही करने की आशा जोड़ ली जाएगी। तो कहो भी तभी जब करने की हिम्मत हो। अच्छी अच्छी बात कर लेना, सुवाक्य, सूक्तियों का संचयन और प्रस्तुति एक बीबीबात है और उसका दशांश भी व्यवहार में ले आना दूसरी। तो जो बोलो सोच समझ के बोलो। जो बोलेगा उससे ही कुंडा खोलने की उम्मीद लग जाएगी।

बढे चलो बढे चलो

 सफर जारी है....1014

03.08.2022

बढे चलो बढे चलो ......

संस्थाएं हो या कार्यालय, जहां के कार्मिकों को काम  कल पर टालने की आदत पड जाती है और इस आदत में वे घुर्र गांठ लगा बैठते हैं, वे जीवन भर नहीं सुधरते। दूसरों को गच्चा दे वे मन ही मन प्रसन्न भले हो लें पर वे अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे होते हैं, अपना भविष्य बरबाद कर रहे होते हैं। उनकी अक्ल घास चरने चली जाती है और वे अपने सुरक्षा जोन में सिमटे अपने को तीस मारखा समझते रहते हैं। ऐसा नहीं है कि उन्हें रास्ते पर नहीं लाया जा सकता पर किसी को क्या पड़ी है जो बर्रा के छत्ते में हाथ डाले। तुम भी चुप हो वह भी चुप है, नई कहानी कौन कहेगा। चोर चोर मौसेरे भाई बनकर रहने के अपना अलग आनंद है। तो स्थिति को जस का तस बना रहने दो। अरे भाई, अब तक भी तो सब चल रहा था, फल फूल रहा था, सब अगन मगन थे।

पर शांत पानी में कंकड़ी मार अगले ने हलचल पैदा कर दी। बिगड़े बैलों की गरदन नाप ली गईं, नकेल डाल दी गईं, अब हिनहिना तो सब सकते हो पर रस्सी तुड़ा कर भाग नहीं सकते। न खाता है न खाने देता है, न पीता है न पिलाता है। सो सब जगह सूखा ही सूखा है, ऊपर की मलाई पर रोक लग गईं है और काम के दवाब बढ़ गए हैं तो असंतोष और तिलमिलाहट के बादल घिर आए हैं।तू डाल डाल मैं पात पात का खेल जारी है, चूहा बिल्ली की सी दौड़ चलती रहती है, अधिकांश बिल्लियां नौ से मूसे खाकर हज की ओर रुख कर चुकी हैं और जिन्हें चक्क दूध की आदत थी वे पी नहीं पा रही तो लुढ़काने और बिखेरने में लगी हुई है। कहीं कहीं खोंसने और झपट्टे मारने के दौर जारी है। बिगड़े नबाब हंटर की मार खा के दस कदम आगे बढ़ते हैं पर जैसे ही वार हलका हुआ फिर दस कदम पीछे लौट लेते हैं। काई इतनी गहरी जमी है कि लगातार खुरचे जाने की मुहिम जारी है। कभी कभी नबाब बदले बदले से लगते हैं पर सब ओढ़ा हुआ है, दरअसल मन के स्तर पर कुछ नहीं बदला है।बस मार कूट के मेहरा पे बिठा तो दिए जाते हैं पर हुंकारा भरने  को टस से मस नहीं होते। डोर ये है  कि कुएं को प्यासे तक लाया जा रहा है पर वे मुंह सिले बैठे हैं कि कहीं एक बूंद भी उनके मुंह में गिर जाए। उन्हें कुंए के शुद्ध मीठे पानी की दरकार नहीं, होठों को चस्का तो मदिरा का लगा हुआ है। ऐसे दीठों के लिए समझाहट बुझाहट सब बेकार है। वे जूते लाठी पैने के यार हैं। सुना है न कि मार के आगे भूत भागता है और भागते भूत की लंगोटी भी भली लगती है।

         अब इन जंजालों में पड़ जाओ तो वेशकीमती समय पंख लगा कर फुर्र हो जाता है। वहीं घिसा पिसा रूटीन, इस उस को नोटिस इश्यू करते ही दिन बीतता है और एवरेज निकालो तो सौ दिन में अढ़ाई कोस भी नहीं चला गया होता। कुछ भी नया और रचनात्मक नहीं बस दिन भर काम की व्यस्तता की दुंदभी बजती रहती है पर परिणाम निल बटा निल। सारी ऊर्जा, सारी शक्ति सिरफिरों के साथ बहस में खर्च होती है। दिन थानेदारी करते बीतता है। तय समय में काम करने का दबाब साथियों के मुंह सिकोड़ देता है और माथे पर बल डाल देता है। प्रसन्नता उल्लास मुस्कान सब मुंह छिपा लेते हैं, रचनात्मकता दुम दबा कर भाग जाती है। अब ऐसे में उमस घमस मारे डालती है, बारिश की झड़ी भी मन को भिगो नहीं पाती। सो ऐसी पुलसिया थानेदारी से तो सामान्य सिपाही बन कर लगातार सार्थक काम करना, रचनात्मकता से लबरेज रहना सौ बट अच्छा। बढे चलो बढ़े चलो वीर तुम बढे चलो के शंख नाद के साथ आगे और आगे बढे चलते हैं।

याद करो कि भूल जाओ

 सफर जारी है....... 1013

02.08.2022

 याद करो कि भूल जाओ .....

ज़िंदगी को जिंदादिली से जीना सीखना पड़ता है। पर लोग साधन और अवसरों के अभाव का बयान करते  हमेशा रोते झींकते रहते हैं और अच्छी भली ज़िंदगी को बोझिल और नीरस बना लेते हैं। बड़े बड़े महापुरुषों की आत्मकथा और जीवनी पढ़ते बोध हुआ कि न तो कोई धन से बड़ा होता है और न पद से। वे जो आज सफलता के शिखर पर परचम लहरा रहे हैं, उन्होंने ऐसा कुछ विशेष जरुर किया है जिसे अन्य नहीं कर पाए। उपाधि और योग्यता किसी कार्य क्षेत्र में प्रवेश करने का माध्यम भले हो, पर उस क्षेत्र में जमे रहने के लिए ,बने रहने के लिए निरंतर अध्यवसाय करना होता है, चिंतन करते हर पल अपने को मांजना होता है, हर दिन कुछ नया सीखना होता है, अपने अनुभव के दायरे को बढ़ाना होता है। सहयोगियों से मिलना जुलना होता है, उनकी समस्याओं के समाधान खोजने होते हैं, उन्हें लगनशील बनाना होता है, उन्हें अपडेट रखने के लिए समय समय पर नवीकरण कार्यक्रम आयोजित करने होते हैं। उनसे जुड़ना होता है। यदि हार हो तो उसका जिम्मा स्वयं लेना होता है और जीत हो तो क्रेडिट टीम को देना होता है। पूर्व राष्ट्रपति मिसाइल मैन अब्दुल कलाम का अनुभव तो यही बयान करता है।

जिंदगी एक कोरा कागज है जिस पर आप चाहे जैसी चित्रकारी कर सकते हो। चाहो तो खूब फूल पत्ती बनाओ और उसमें मनचाहे रंग भरो या उल्टी सीधी रेखाएं खींचो, उन्हें मिटाओ, फिर पेंसिल चलाओ, जैसी चाहो आकृति बनाओ और रंग छिटकाओ। चाहो तो किसी को अपनी निजता में शमिल करो, उससे अपने सुख दुख शेयर करो या सूमसाम से बैठे खीझते रहो, जो पास है उसे देखो मत, नजर अंदाज़ करो और जो नहीं है उसे लेकर शिकायती स्वर बनाए रखो। जो अपने हैं उनकी ओर से निगाह फेर लो और दूसरे गांव में जा के अजनबियों से रिश्तेदारी जोड़ो।

भाई मेरे,ये जीवन है। हर पल नए अनुभव नए लोग ज़िंदगी के खाते में जुड़ते जाते हैं, कुछ से यारी दोस्ती हो जाती है तो कुछ को भूलभाल जाते हैं। जो आज निजी की श्रेणी में हैं वे कल दूसरी पाली में चले जाते हैं। जिनसे आज दांत काटी रोटी है, जो लंगोटिया यार है, वे कल कट्टर शत्रु हो जाते हैं। कुछ याद रह जाते हैं कुछ बिलट जाते हैं। अब स्मृति भी बेचारी क्या करे, उस की अपनी सीमा है। सो जो अनुपयोगी हो जाते हैं, प्राथमिकता के पहले पायदान पर नहीं रह पाते, जो अब काम के नहीं है, वे मोटी मोटी फाइलों में टैग कर रिकार्ड के तौर पर रख लिए जाते हैं और वक्त जरूरत खंगाल लिए जाते हैं। अब जो बिल्कुल ही काम के नहीं रह जाते, वे मैमोरी से डिलीट ही कर दिए जाते हैं ।सो जो किसी के ध्यान में बने रहना चाहते हो, नजरों में चढ़े रहना चाहते हो तो अपने को अपडेट किए रखो। उसकी आवश्यकताओं के अनुरूप अपने में अदल बदल करते रहो।

ये जो दिन भर फिल्मी गाने सुनते रहते हो.. भूल गया सब कुछ, याद नहीं अब कुछ या नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा, तेरी आवाज़ ही पहचान है गर जो याद रहे सब झूठ थोड़े ही होते हैं। सबका अपना अपना समय है, कोई जीवन के प्रारंभ में लाइम लाइट में आ जाता है तो कोई मध्य भाग में और कोई दुनिया से जाते जाते जुगनू सा चमक जाता है। सो समय का इंतजार करो, समय के साथ साथ चलो, आज हो कल नहीं होगे, भुला बिसरा दिए जाओगे। आज सबकी नज़र में हो भी, तो इसमें तुम्हारा भला है क्या। जन्म माता पिता ने दिया, नाम उन्होंने दिया, पालन पोषण उन्होंने किया, शिक्षा गुरुओं ने दी, सामाजिकता का पालन उन्होंने सिखाया, समय समय पर वे तुम्हें थामे रहे, और आज जब तुम्हारी करने की बारी आई तो पतली गली से खिसकने के मूड में आ गए, मुंह में गज भर की जुबान आ गई कि तुमने हमारे लिए किया ही क्या है। ऐसा ही होता है, ऐसे ही कहा जाता है।

जिंदगी में समत्व बहुत जरुरी है, ये सुख दुख मौज मस्ती कठिनाई परेशानी आज है कल नहीं होगी। तो कभी याद किए जाओगे और कभी भुला बिसरा दिए जाओगे।

हामिद के बहाने

 सफर जारी है.....1012

01.08.2022

हामिद के बहाने....

महान रचनाकार मुंशी प्रेमचंद की आज जयंती है, उन्हें  शत शत नमन । वे एक समर्थ रचनाकार के रुप में सदैव सदैव याद किए जायेंगे । कालजई साहित्य रचकर वे अमर हो गए हैं। आम जन की समस्याओं को बड़ी गहराई से चित्रित करते वे जनता के प्रतिनिधि बन गए हैं। एक सफल साहित्यकार आसपास के परिवेश से विषय चुनता है, पात्र भी वहीं से लेता है, वहीं की घटनाओं को शब्दों में पिरोता है और उसे एक पुस्तक के रुप में सबके सामने ले आता है। दरअसल वह केबल लिखता नहीं है, उन स्थितियों को जीता है। उदासीन होकर किनारे नहीं बैठा रहता, समुद्र में छलांग लगा देता है और मोती चुन कर ले आता है, मन की थाह ले लेता है, और उन्हें करीने से सबको परोस देता है ।हम जैसे तो डूबने के डर से किनारे ही बैठे रहते हैं। अपने निजी लोगों के मन ही नहीं समझ पाते, औरों की तो बात तो दूर की है।

             चूल्हे से तवा उतारते रोटी सेंकते  दादी नानी के हाथ तो आज भी जल जाते हैं पर कितने नाती पोते धेवते हामिद बन अपने हिस्से के तीन पैसे से मेले के विभिन्न आकर्षणों से अपने को दूर रख, बाल सुलभ चंचलता को बिसार, अपने साथियों के मध्य अपने को हीरो सिद्ध करते बूढ़ी दादी के लिए चिमटा खरीद पाते हैं। क्या आधुनिकता के इस दौर में हामिद का चरित्र अब बदल गया है। उसकी संवेदन शीलता चूक गई है जो वह दादी नानी की पीढ़ी तो छोड़ो, अपने ही जन्मदाताओं और सहोदरों के साथ भी समाज सम्मत व्यवहार नहीं कर पाता। अब हामिद जैसे चरित्र गढ़े नहीं जाते, इनका प्रतिशत जो बहुत कम हो गया है। सब बदल गया है, स्व प्रधान हो गया, निजी स्वार्थ हावी हो गया, अब कौन किसके लिए सोचे भला, अपने से ही समय नहीं बचता।

             बड़े भाई साहब आज भी मौजूद हैं, दो बैलों की कथा के हीरा मोती की संवेदन शीलता आज भी दिख जाती है। सवा सेर गेहूं का शंकर, कफन का माधव और बड़े घर की बेटी सब ज्यों के त्यों हैं। बड़े घर की परिभाषा बदल गई, अब धन संपत्ति और आधुनिक संसाधनों से लैस मगर संवेदनाओं से रिक्त घर बड़े घर कहे जाते हैं और तथाकथित बड़े घर की बेटियां अब घर बनाती नहीं, बिगाड़ती हैं। किस किस का जिक्र करूं,उनकी कहानियां पढ़ते एक नई दुनियां में पहुंच जाती हूं, सारे पात्र जाने पहचाने लगते हैं, ऐसा लगता है मानो कल ही तो मिले थे उनसे। प्रेमचंद मनोभावों के चितेरे हैं। घटनाओं को इतनी बारीकी से उकेरते हैं कि सब हस्तालमक हो जाता है, पाठक उस काल में पहुंच जाता है, घटनाओं को जीता है, पात्रों से दोस्ती कर लेता है, और जब रचना के आखिरी पन्ने पर पहुंचता है,रचना समाप्त होती है तो वह जैसे स्वप्न से जागता है। उपन्यास सम्राट उन्हें ऐसे ही नहीं कहा जाता। गोदान के होरी,गोबर,धनिया,झुनिया, मातादीन,सिलिया कहीं चले थोड़े ही गए हैं, वे आज भी जैसे के तैसे अपनी जगह स्थिर हैं। बदलते परिवेश में वेशभूषा भले ही बदल गई हो पर अंतस वैसा का वैसा है, आचरण और कार्य पद्धति में रंचमात्र भी परिवर्तन नहीं आया। निर्मला तो हर दसवें परिवार में नजर आ जायेगी। पढ़ी लिखी निर्मला जानती तो सब है पर कभी बाबुल के घर की इज्जत ढापने और कभी ससुरालियों का मान बनाए रखने के चक्कर में अपना सर्वस्व होम कर देती है पर फिर भी उसके हिस्से क्रेडिट नहीं आता, बदनामी और सौतेली मां होने का ठप्पा जरुर लग जाता है। इन निर्मलाओं का को भवितव्य तब निर्धारित था, वही आज भी है। कुछ नहीं बदला। कर्मभूमि और रंगभूमि की पृष्ठभूमि में भी कौन से बड़े बदलाब हो गए।

             आज जयंती के ब्याज से उन्हें स्मरण करते नमन करते हैं। उनकी रचनाएं हर पाठक के मन में गहरे रची बसी हैं। रचनाओं के पन्नो से निकल निकल पात्र जब मर्जी बाहर आ जाते हैं, पाठक से घुल मिल जाते हैं, उनके साथ साथ घर तक चले आते हैं, उठते बैठते, सोते जागते साथ चिपके रहते हैं। उनसे पीछा छुड़ाना सहज नहीं। तो प्रेमचन्द की रचनाएं तो मन में गहरे धंसी हुई है, उनकी कितनी कितनी कहानियां कंठस्थ है, बस उचित परिवेश देखती हैं और झट से जबान पर आ जाती हैं। प्रेमचन्द हर आम व्यक्ति के पसंदीदा रचनाकर हैं, वे निर्विवाद व्यक्तित्व हैं, समर्थ रचनाकार हैं, मन के भावों के सफल चितेरे हैं। उन्हें शत शत नमन।

आ, अब कोंकण चलें

 सफर जारी है ....1011

31.08.2022

आ, अब कोंकण चलें..... 

कोंकण प्रदेश गोवा, भाषा मराठी और कोंकणी दोनों का प्रभाव, गोवा नाम सुनते ही सच सच बताना क्या इमेज बनी  दिमाग में, यही न, अठखेलियां करता दहाड़े मारता समुद्र और उसकी शोभा मीरामार, कोलबा, और कलंगुट बीच, पणजी में मनोरंजन से भरपूर क्रूज की सवारी, चर्च, बेयर फुट, स्वर कोकिला लता मंगेशकर की याद दिलाता मंगेश मंदिर, उत्तरी और दक्षिणी गोवा का प्राकृतिक सौन्दर्य, नारियल और काजू का प्रदेश, यही न। आप ने बिलकुल ठीक सोचा, हर दसवें पर्यटक की गोवा के विषय में कमोवेश यही राय होती है।

          लेकिन किसी भी स्थान को देखने की पर्यटन से इतर दृष्टि भी हुआ करती है।सन 88 और 89 में दो बार गोवा में वास्को और पणजी आना हुआ। संस्थान के शैक्षिक सदस्यों का किसी भी हिंदीतर प्रदेश में जाने का मुख्य संदर्भ हिंदी अध्यापकों का नवीकरण और पुनश्चर्या कार्यक्रम ही होता है। इस बार का प्रयोजन आजादी अमृत महोत्सव के तहत केंद्रीय हिंदी संस्थान और दो संस्थाओं के संयुक्त तत्वाधान में गोवा मुक्ति संघर्ष में साहित्यकारों का योगदान विषयक दो दिवसीय संगोष्ठी थी। संगोष्ठी की पूर्व संध्या में गोवा के हिंदी साधकों के साथ चर्चा में विद्वानों को जानने का अवसर मिला। हिंदी की बढ़ोत्तरी के लिए इन स्नेहिल बंधुओं की ललक और हिंदी के लिए कुछ कर जाने की चमक ने हमारी टीम को आनंद से भर दिया। अगला पड़ाव प्रसिद्ध कोंकणी साहित्यकार ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता आदर योग्य श्री दामोदर मौजो जी से मुलाकात का था। मध्यस्थ बने प्राचार्य भूषण भावे जी, एक सौम्य और ज्ञान के आगार व्यक्तित्व से मिलना बहुत ही सुखद रहा। एक बार फिर पुष्टि हुई कि विद्या ददाति विनयम। सहज सरल व्यक्तित्व के धनी दंपत्ति से मिलते लगा कि भरी हुई डाल ही झुकती है। उनकी आयु ने भले ही सत्तर से अधिक वसंत देखे हों पर सोच से वे युवा ही नजर आए। कितनी सरलता सहजता से जीवन की महान उपलब्धियों को बहुत संकोच के साथ ऐसे गिना दिया जैसे गिनती पहाड़े सुना रहे हों। विशिष्ट बात यह है कि ये पुरस्कार उन्हें निबंधों के लिए मिला। कोंकणी के लोकसाहित्य को सहेजने की चिंता उन्हें बराबर है, लगातर इसका उल्लेख उनकी टिप्पणियों में उभरा। ऐसे संत स्वभाव के धनी व्यक्तित्व से मिलना इस प्रवास की महती उपलब्धि अंकित की जा सकती है।

          गोवा मुक्ति संघर्ष को उकेरती, झरोखे से लोहिया जी, मधु लिमए, सुधा ताई जोशी ,गोवा मूल के साहित्यकारों और इस आंदोलन में अपनी आहुति देने वाले, संघर्ष करने वाले हुतात्माओं के विषय में जानना हो तो हीरक जयंती के उपलक्ष्य में ग्वालियर से पुनर्प्रकाशित तीन रचनाओं... वरिष्ठ मराठी साहित्यकार इंदुमती केलकर की लाहौर किला से गोवा की अगवाद जेल तक... डाक्टर राम मनोहर लोहिया के संघर्ष का एक अध्याय, प्रसिद्ध हिन्दी पत्रकार गणेश मंत्री की गोवा मुक्ति संघर्ष,संस्कृत व मराठी की प्राध्यापिका चम्पा लिमए और वरिष्ठ पत्रकार कुर्बान अली द्वारा संपादित गोवा लिबरेशन मूवमेंट एंड मधु लिमए को अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। गोवा मुक्ति के मंत्रदाता डाक्टर राम मनोहर लोहिया के साहस और देशभक्ति के प्रति श्रद्धापूर्ण नमन। मराठी साहित्यकार बोरकर जी की दो पंक्तियां दृष्टव्य हैं..धन्य है लोहिया, धन्य है ये भूमि, धन्य हैं इसके पुत्र, धन्य हैं जनता के वे नेत्र जिन्होंने यह त्याग देखा।

          मूल प्रश्न भाषा का है। लोकसाहित्य और संस्कृति का संरक्षण भाषा से ही संभव है। केंद्रीय हिंदी संस्थान के प्रतिनिधि और गोवा विश्व विद्यालय हिन्दी विभाग की अध्यक्षा, चौगुले महाविद्यालय की प्रभारी प्राचार्य, आयोजक और संचालन सूत्र संभाल रहे नेतृत्व का एक सुर से यही मंतव्य था कि विदेशी भाषा के पुछल्ले से छुटकारा पा हमें भारतीय भाषाओं के विकास पर बल देना चाहिए। बड़ी बड़ी बातें तो बहुत कर ली गईं, अब उन्हें व्यावहारिकता का जामा पहनाने की जरूरत है। अभिभावकों के निमित्त भी अपने सोच में बदलाब लाने का समय आ पहुंचा है, अपने पाल्यों को अपनी अपनी भाषाओं में शिक्षित करें, शिक्षा केबल रोजगार का ही माध्यम नहीं, वह मनुष्य को मनुष्य बनने में महत्वपूर्ण रोल निभाती है। सभी को मल्टीनेशनल में जाकर कमाई नहीं करनी, सभी को देश छोड़ छोड़ कर विदेशों में नहीं बसना है। प्रतिभा पलायन बहुत हो चुका, अब अपने देश, अपनी भाषा, अपनी संस्कृति पर ध्यान दो।

          यात्राएं बहुत समृद्ध करती हैं बशर्ते उनके पीछे प्रयोजन सुनिश्चित हों। ये छोटी छोटी एक दो दिवसीय यात्राएं अनुभव से भर देती हैं।

खेल खेल में सीखो नेतृत्व

 सफर जारी है....1010

30.07.2022

खेल खेल में सीखो नेतृत्व....

हमारी पीढ़ी का बचपन कबड्डी, खो खो, नीली पीली साडी, पोसम्पा भई पोसम्पा, गुट्टे, रस्सी कूद, गुड़िया गुड्डे, गेंद तड़ी, सात टप्पे, स्टापू , लूडो, सांप सीढी, चक्खन पे , छूहा छाही, आइस पायस, कैरम, रस्सा कसी, घोड़ा जमाल खाई,विभिन्न प्रकार की कूद और दौड़ जैसे इसी प्रकार के विविध खेल खेल खेलते बीता है। जिन खेलो में दो दल होते , उन दोनों का अलग अलग मुडड यानी नेता यानी लीडर होता था। मुडड शायद मूड सिर से रचा गया होगा। लीडर आगे आगे और सब उसके पीछे उसकी कमर या फ्रॉक या कमीज कस कर पकडे रहते। एक और खेल होता जिसमें दोनों दलों के बीच बीच एक रेखा खींच दी जाती और दोनो दल एक दल को अपनी अपनी ओर खींचने की कोशिश करते। जिस दल के साथी मुखिया का साथ नहीं छोड़ते, उसे हिम्मत बंधाते, जोर लगा के हईसा करते, वे जीत जाते और प्रतिपक्षी दल की हिप हिप हुर्रे हो जाती। ये खेल खेलते सीखा कि मुखिया का रोल बड़ा महत्त्वपूर्ण होता है और दल के प्रत्येक सदस्य को उसके निर्देशों का पालन करता होता है तब जाकर कहीं जीत होती है।

जब खेल जैसे छोटे कार्य में आठ दस साल के बच्चे की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण है, कक्षा में मानीटर का दायित्व जिसे मिल जाता है, वह अपने को अति विशेष मानने लगता है, सबकी कपरे इकठ्ठी कर अध्यापक को देने, चाक रजिस्टर आदि ला देने और कक्षा को शांत रखने जैसे कार्यों को करने में अपनी शान समझता है जबकि उसे अन्य कक्षा सहपाठियों से अधिक काम करना पड़ता है तो जीवन के विविध अनुशासनों में नेतृव की भूमिका कितनी प्रभावी होती होगी। घर से ही इसकी शुरुआत हो जाती है जब माता पिता बच्चों को छोटे छोटे दायित्व सौंपना शुरू कर देते हैं। अभिभावक की अनुपस्थिति में बच्चे अपने दायित्व को कितनी संजीदगी से निभाते हैं, इस पर भविष्य की आधारशिला का निर्माण होता है। दरअसल नेतृत्व करने काअर्थ सब कुछ खुद करना होता भी नहीं, उसे सबको साथ लेकर चलना होता है, सबसे सबकी क्षमता के अनुसार लाभ लेना होता है, सबको बराबर दायित्व सौंपना होता है, सबकी निगरानी करनी होती है, काम कराने और उसका तय सीमा में निपटान करना होता है, सबको साथ लेकर चलना होता है।

पर इसाका यह अर्थ कदापि नहीं लिया जाना चाहिए कि वह हमेशा निर्देश देने के लिए बना है, उसे खुद कुछ नहीं करना है। बस बैठे बैठे सबके काम का जायजा लेना है, सबको भड़काना है, डांटना है,कुछ ही लोगों को दायित्व देना होता है और शेष को खुला और स्वतंत्र छोड़ देना है।

निश्चित ही उसे निर्धारित समय में कार्य निपटान के आदेश देने होते हैं, स्वयं सजग होकर निगरानी करनी होती है, जैसे भी हो कार्य संपन्न कराना होता है। ध्यान दीजिए सब जगह प्रेरणार्थक क्रिया का प्रयोग किया गया है अर्थात उसे सब काम में खुद नहीं लगना, दूसरों को लगाना है। लोगो से काम लेना भी विशेष योग्यता की मांग रखता है। स्वयं से आगे बढ़कर सब कुछ कुछ खुद  करने लग जाना नेतृत्व के दायरे में नहीं आता। करने और करवाने में बहुत अंतर है। नेतृत्व का अर्थ केवल निर्देश देना भर नहीं, कार्य को सही तरीके से करने, उसमें आने वाली व्यावहारिक परेशानियों को समझना और उसके निवारण और समाधान तलाशना भी है। बल्कि यही ज़्यादा जरूरी भी है। कई कई बार केवल निर्देश देने भर से , दबाब बनाए रखने, बात बात पर डांटने फटकारने, आलोचना करने, कमियां निकालने, अगले को हतोत्साहित करने से ही काम संपन्न नहीं हो जाते। उसे तरीके से डील भी करना होता है, समझाना बुझाना होता है, सही रास्ते दिखाने होते है।

और फिर सबकी नेतृत्व क्षमता एक समान नहीं हुआ करती। जिसे आगे आगे बढ़कर हर काम खुद निबटाने की आदत होती है, वे करना भले जानते हो पर दूसरों से करवाने और काम लेने में कच्चे होते हैं। सही नेतृत्व अधीनस्थों की कार्य दक्षता को भली भांति समझता है, उनसे कार्य लेना जानता है, साम दाम दण्ड भेद की नीति जानता है, सबको साथ लेकर चलना जानता है, सबका विश्वास जीतना जानता है। उसे मुखिया की परिभाषा कंठस्थ ही नहीं होती, बल्कि उसे जीना भी जानता है। मुखिया मुख सो चहिए खान पान को एक , पाले पोसे सकल अंग तुलसी सहित विवेक। विवेक को रेखांकित किया जाना आवश्यक है। कठिन से कठिन परिस्थितियों में विवेक से काम लेना होता है ,चाहा अनचाहा बहुत कुछ जज्ब कर आगे बढ़ जाता है।

सो नेतृत्व की डोर सदैव ऐसे हाथों में सौंपी जानी चाहिए जो दायित्वशील हों, कार्य को नियत समय पर करने वाले से अधिक करवाने वाले हों, सबका कंट्रोल पैनल अपने हाथ  रखते हों। जो ज्यादा ही संवेदन शील हों उन्हें कार्य में साधन की भूमिका निभाने का निर्वाह करना चाहिए। किसी भी संस्था का नेतृत्व भावुकता, दयालुता, सबका ध्यान रखने की वृत्ति से नहीं चला करता, उसके लिए कठोर,स्टर्न और दृढ़ होने की जरूरत होती है, कठोर से कठोर दंड देने में वे हिचकिचाते नहीं, दूसरों के प्रति हद से अधिक संवेदनशील होना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना कहा जाता है, इसके लिए पुरस्कृत नहीं किया जाता। सो नेतृत्व के गुण विकसित करो, उनमें रचो पचो, प्रभाव बनाना सीखो, बात बात पर हड़काना सीखो और जो ये सब नहीं कर पाओ तो  आम जनता में शमिल हो जाओ , साधन बने रहो और चैन से सो ओ।

ऐसे हते तो हते

 सफर जारी है....1009

29.07.2022

ऐसे हते तो हते.......

इतनो टैम तो जा दुनिया ए समझबे में ही निकल गयो, अधबूढ़े होने को आए पर जा दुनिया को सिस्टम कछु समझ न आयो। ऐसे ऐसे झूठे भरे पड़े कि काम निकारबे कू बड़ी बड़ी बात करें, गधा ऊ ए बाप बना लये करे , अगले ए ऐसे ऐसे सब्जबाग दिखाबे कि कछु पूछो ई मत । ऐसे मलाई लगा लगा के बात बनाएंगे कि तुम देखते ही रह जाओ।  हमें का सल हती कि ऐसी होय करे दुनिया। हम तो अपने जैसे ई जानते सबन ने कि जो कही जाए वो ही करो करें। काहे कू बड़ी बड़ी बात करें। अरे काहे कू बको जब तिहाए बस की हती नाय तो चुप है जाओ। सांच कहो निखालिस और ओढ़ के कम्बल सो ओ खूब निधड़क होके, काऊ को डर न लगे। वैसे तो काहू ते हू झूठ नाय बोलबो चहिए पर  अपने निजी लोगन ते बिलकुल हू नाय। अब  झूठ मूठ कू कहते फिरो  कि काहू की सौगंध धरवा ले तू ई है हमाई ।अरे भईया दूसरे घर ते आई तो दूसरी ई होय करे चाए तुम अपनी जान हू निकाल के दे दियो, सामने वाले पे नेकऊ फरक नाय पड रयो, दुनिया ए कुटुम मानो, सब अपने ई है ऐसे तो कही ही जाबे पर जे सच नाय होत । घुटना तो पेट कू ही नबो करे। चाकू ते काटो तो ऊ पानी अलग नाय होय।

और हम ऐसे बेवकूफ निकले कि अपनेन ते ई कुट्टी कर लई। ऐसे रूठे कि बिनकी बात ऊ नाय सुनी, हमाए दिमाग में तो जे ही हती कि सच को साथ देनो चहिए। सच ही जीतो करे।

हमें का पतो ई के  सबरे के सबरे अपनो काम निकालबे कू ऐसी चिकनी चुपड़ी बात करो करे। हमने तो सांची जानी कि अब बार बार कहो करे कि तू ही चंदा तू ही तारा तू ही धरती तू ही आकाश, तो सांची ही कह रए होंगे। हमें नेकऊ भ्यास नाय भई कि अगलो अपनो काम सही तरियां है जाबे जा मारे मीठी मीठी बात करे। अब एक को कसूर होय तो परेखो करें, पूरो अवा को अवा ही एसो है। घर होय बाहर होय नाते रिश्तेदार होय सब पहले अपनो काम देखे। जे कम अकल वाले तो साधन बनवे कू होय करे। अब अपनी गांठ की अकल नाय राखोगे तो जे ई हाल होयगो। और बनो मीठे, सीधे सट्ट, चूस के निचोड़ के फफ्फस करके फैंक दये जाओगे। फिर बैठे रहियो मूड पकर के, डकरात रहियो अम्मा बाबा ए याद करके, कोऊ न आ रयो बचाबे कू। जब तुम अपनी अक्ल ए गिरवी रख देयगो तो अगले कू का पड़ी है कि अपनो काम धाम छोड़ के तुमाई सपेटबे कू आबे। बाय का पागल कुत्ता ने काटो ए।

तुम्हे सदावरत लूटाबे को शौक चर्रा रयो है तो खूब लुटाबो, तुम ते मने कौन ने करी है। पहले तो सबन के काजे हाथन धरती छोड़ोगे, जरूरत ते ज्यादा करोगे और जब अगलो तुम्हे नेकऊ भाव नाय देगो तो चिलापिलाओगे, तुम्हें बुरो लगेगो, तुम रोयगो झींकोगे, खिसियाओगे। तिहारो दुनिया पे ते विश्वास उठ जावेगो। अरे भलेमानस जे दुनिया ऐसी ही होय करे, सबन ने अपनो काम चहिए, अब तुम बेवकूफ बनो तो बनबो करो। तिहायो ही करो धरो ए, सबने खूब समझाई के नाय कि थोड़ी बहुत चालाकी सीखो, कछु छिपायो ऊ जाबे, पर तिहाई समझ में भरे जब। बहुत आदर्शवादी बनो करती तो भुगतो अब, सब चल दए अपने अपने मारग कू, रह गई ठूंठ सी अकेली, और मत सोचे अपने काजे, तेरे जेसेन को जे ई हाल होनो चहिए। बड़ी चलती दुनिया ते अलग थलग, अब भुगत बैठ के। अकल तो तोय अबहु नाय आय होएगी। ठस्स दिमाग जो है।

अब का बताए बहना तुम कू, भगवन जी ने ई ऐसे गढ़े हैं तो हम का करे, कोई कछु मांगे तो मने नाय करी जाबे। पर दूसरो ज्यादा सयान पताई दिखाए तो गुस्सा तो आबे ही। अब का करे ऐसे हते तो हते।

बिसारिए न राम

 सफर जारी है....1008

27.07.2022

बिसारिए न राम .....

ये जो पल पल पर चिन्ता करने का स्वभाव बन गया है, जरा मनचीता नहीं हुआ कि लगता है आसमान गिर पड़ेगा, बादल फट जाएंगे, अब क्या होगा, कैसे करेंगे, क्या करेगे, कैसे होएगी टाइप प्रश्नों से घिर जाते हैं ये जानते बूझते भी कि चिंताएं परेशानी का समाधान नहीं हुआ करती बल्कि चिंता से समस्या  में सौ गुना इजाफा ही होता है, चिन्ता किए बिना नहीं रहा जाता। वैसे आदमी कुछ और करे न करे पर चिंता तो कर ही सकता है। अब चिंतन होता नहीं तो चिंता करके ही काम चला लेता है। स्वभाव से मजबूर जो है। समाधान खोजने की जगह चिन्ता करना शायद ज्यादा सरल लगता हो।

 चिन्ता को अंतिम विकल्प के रुप में चुनने वाले हम बरगे लोगों को हारिए न हिम्मत बिसारिए न राम बिलकुल भी याद नहीं रहता। दोनों में से एक भी याद रह आता तो या तो हिम्मती बनते, जैसा होता जितना होता, हाथ पैर चलाते, कम से कम ये संतोष तो रहता कि हमने अपना सा किया। और जो फिर भी सफलता नहीं मिली तो को अत्र दोष। दुबारा से फिर मेहनत करेंगे, बेहतर करेंगे और फल पाएंगे। हिम्मत हारने से हाथ पैर छोड़ने से भला क्या मिलता है। पर दुर्वल मानसिकता के लोग सरल रास्ता चुनते हैं, वे जल्दी हिम्मत हार जाते हैं, दो चार हलके फुलके प्रयास वे भी बेमन से किए, किसी दूसरे के कहने से कर भर दिए कि लो नहीं मान रहे हो, सारे दिन किच किच लगाए रहते हो तो तुम्हारी संतुष्टि के लिए ये भी किए देते हैं। तो जिस काम में आपका आत्म ही नहीं जुड़ा होता, जिसे अनिच्छा से किया जाता है, जिसे सामने वाले के संतोष के लिए किया जाता है उसमें भला सफलता मिलेगी भी कैसे। बात बात पर हिम्मत छोड़ बैठना, हिम्मत हार जाना, मुझसे नहीं होगा, मैं इसे कर ही नहीं सकता जैसे वाक्य बोलने दोहराने की आदत हो जाए तो काम कैसे चलेगा। हारिए न हिम्मत ज़िंदगी को जिंदाजिली से जीने का पहला सूत्र है। मन को मजबूत बनाए रखिए। ये बात बात पर घबराना, चिन्ता करना, हाथ पर हाथ धरे बैठा रहना , केवल झींखना, रोना कलपना, बेबात की चिंता करना, छोटी सी बात को भी ताड़ बनाकर कहना, हमेशा शिकायती स्वर रखना आगे बढ़ने की निशानी नहीं है। ये तो आपके कदमों में वैसे ही जंजीर डाल देगी। तो हिम्मत मत हारो, साहसी बनो और जो जितना कार्य क्षमता में हो, किए जाओ।

 दूसरे राम को मत बिसारो। एक तो हिम्मत से काम नहीं लेते, पहले से ही मुझसे नहीं होगा का राग अलापना शुरू कर देते हैं और फिर रही सही कसर मार नास्तिक बने बैठे रहते हो। अरे राम को भजो तो सही, उन्हें सच्चे मन से ध्याओ तो सही, भजो तो सही,उनका नाम लो तो सही। ये क्या हर बात में खुद को ही कर्ता क्यों मान बैठते हो। तुम अपने हिस्से का करो और राम जी पे छोड़ दो, देखो राम करते हैं या नहीं। दाता एक राम भिखारी सारी दुनिया, राम एक देवता दुखियारी सारी दुनिया। राम भजो राम भजो राम भजो बाबरे। उसके बिना सद्गति है भी नहीं। भगवत भजन में कोई दाम नहीं लगता, बस अपना काम किए जाओ और राधे राधे जपो जाओ। उसे ही मत बिसारो। वही आपकी शक्ति है। उसी पर भरोसा रखो। इतनो इतनो के बिगड़े काम बनाए तो हमसे कोई दुश्मनी थोड़े ही है कि हमारी ही सुध नहीं लेगा। रोज जपो, बिना स्वार्थ के भी जपो, बस उसके नाम में लौ लगाए रखो। रटते रहो राम राम कहते रहो, कभी तो कान देंगे, वे गरीब नेवाज कहे जाते हैं, सबकी नैया पार लगाते हैं तो हमें ही क्यों छेकेंगे। सो उनके आगे ही हाथ पसारते हैं, उनसे ही कहते सुनते हैं प्रभो, लाज रखो हमारी, तुम्हारी शरण में है भगवन, जो उचित लगे करो, क्या मांगे भगवन, हम तो अनाड़ी है नहीं जानते जो मांग रहे हैं वह हमारे अनुकूल होगा भी या नहीं तो प्रभु जीवन डोर तुम्हें ही सौंप देते है, जैसे रखोगे रह लेंगे प्रभु। रक्षा करो प्रभु, त्राहि माम त्राहि माम।

तो गांठ बांध लेते हैं.... हारिए न हिम्मत बिसारिए न राम।

धीरज धर ले मेरे मना

 सफर जारी है...1007

27, 07.22

धीरज धर ले मेरे मना......

धैर्य और शांति दो ऐसे गुण है जो किसी भी व्यक्ति के जीवन को बदल कर रख देते हैं। कुछ में ये जमजात होते हैं तो कुछ विकसित कर लेते है। जीवन है तो दुख, कष्ट, मुसीबत, विपत्ति कभी भी आ सकती है पर इनके प्रति आप कैसा रिएक्ट करते हैं, सारा दारोमदार इस पर निर्भर करता है। जो आने वाली विपत्ति को पहले ही सूंघ लेते हैं, वे उससे बचने के उपाय में जुट जाते हैं। बेबात का हो हल्ला नहीं मचाते। विपरीत से विपरीत स्थिति में शांति बनाए रखते हैं। वे समाधान सोचते हैं कि ऐसी स्थिति में क्या क्या किया जा सक्ता है। दूसरे हमेशा शिकायती स्वर लिए रहते हैं, इस उस की आलोचना कराते रहते है, सभी में दोष खोजते रहते हैं। वे छोटी से छोटी समस्याओं को पहाड़ के रुप में देखते है और दिन भर उसका रोना रोते रहते हैं। समस्या का विश्लेषण उसे आधा कर देता है बल्कि कई बार तो समस्या  होती ही नहीं,उसे कल्पना कर क्रिएट कर लिया जाता है। जब करने को कुछ सार्थक सा नहीं होता तो दिमाग बेबात की बात में अधिक समय लगाता है। समस्या को रचता पचता है।

ऐसे लोगों को देख शेख चिल्ली की कहानी बहुत याद आती है जो केवल कल्पना लोक में रहता है और अपना ही नुकसान कर लेता है। शेखचिल्लियों की कमी थोड़े ही हैं, एक खोजो, अनेक मिल जायेंगे। वे अनजान बने रहना चाहते हैं। खुद विपत्तियों को आमंत्रण देते हैं। उनमें न धैर्य होता हैं न शांति। बस तिल का ताड़ बनाने में माहिर होते हैं। ऐसे लोगो से दूर की रामराम भली। समस्या का होना उतनी बड़ी बात नहीं है पर आप उस को लेकर कैसे विचार रखते हैं, ये जरूरी है। एक मुसीबत तो यह है कि हमने लोगों को अलग अलग खांचों में बांट रखा है, अपने पराए के वर्ग बना रखे हैं इसलिए किसी भी बात पर वस्तुनिष्ठ तरीके से नहीं सोच पाते। और जब हमारी दृष्टि में ही दोष है तो स्थितियां सुलझने के बजाय लगातर उलझती जाती है।

जीवन में धैर्य बनाए रखना बहुत जरूरी है। जो आपत्ति काल में भी शांत बने रहते हैं, विचलित नहीं होते, धैर्य से काम लेते हैं, स्थितियों का सही विश्लेष्ण करते है, वस्तुनिष्ठता से काम करते हैं, उनके लिए बड़ी से बडी समस्या भी चुनौती नहीं होती। ये दो गुण धैर्य और शांति आपको अनेक समस्याओं से बचा ले जाते हैं। धीरज अपने आप आता है, आपके अंदर से आता है, दूसरा इसे आप में इंजेक्ट नहीं कर सकता। बस सामने वाला तो आपको धैर्य बंधा सकता है, अपने अनुभव शेयर कर सकता है, बहुत हुआ तो समझा सकता है पर निर्णय तो आपको ही लेना होता है कि आप जीवन को कैसे जीते हो। ये जो अथाह धन संपत्ति वालों को तुम सुखी समझे बैठे हो, उनके अपने दुख हैं। वे तुम्हारी समझ में नहीं आएंगे, तुम तो उन्हे बाहर से देख सकते हो, उनके कष्टों का अंदाजा नहीं लगा सकते। बात दुख कष्ट की है भी नहीं, बात है हमारे दृष्टिकोण की कि हम कितने सकारात्मक हैं, किस प्रसंग को किस रुप में ग्रहण करते हैं। तो बनाए रखिए मन में धैर्य और शांति और गाते गुनगुनाते रहिए.... धीरज धर ले मेरे मना। धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा फल तो रितु पर होय, भैया मेरे सो धीरज बनाए रखो, सब सही हे जाएगो।

बनो तो कर्मवीर बनो

 सफर जारी है......1006

26.07.2022

बनो तो कर्मवीर बनो......

अपने अपने पाल्यों को अभिभावक चिकित्सक,अभियंता, चित्रकार, आईं ए एस, पी सी एस अधिकारी, शिक्षक, आर्किटेक्ट और जीवन के जितने भी अनुशासन हो सकते हैं, उनके प्रमुख बनाने , उन प्रकल्पो का हिस्सा बनने का स्वप्न संजोते हैं, उन स्वप्नो को पूरा करने में धन संपत्ति और अपनी सारी ऊर्जा लगा देते हैं पर वे उनमें इतना गौरव बोध नहीं भर पाते कि कोई भी कार्य छोटा बड़ा नहीं होता। मर्जी जिस क्षेत्र में चले जाओ, अपना सौ प्रतिशत दो, काम के प्रति प्रतिबद्धता रखो, सत्य के रास्ते चलो, व्यवहार प्रतिमानों का उल्लंघन मत करों, शिष्टता के दायरे में रहो यानी कर्मवीर बने रहो तो तुम दुनिया फतह कर सकते हो।

              कभी धन प्रभावी हो जाता है तो कभी सिफारिश का बल, योग्यता हो न हो पर सिफारिश और वह भी किसी उच्च ओहदे प्राप्त व्यक्ति की हो तो शत प्रतिशत काम कर जाती है। ये सिफारिश भी व्यक्ति की ज़िंदगी में बड़ा रोल निभाती है। आपके और आपके कार्य के विषय में पूरा आंकलन कर बिना किसी दवाब के स्पष्ट शब्दों में नियमानुसार संस्तुति करना एक बात है और केवल अधिकारों का प्रयोग कर जबरदस्ती किसी को निर्देशित करना दूसरी। हम किस समाज में रहते हैं दुर्भाग्य से दूसरे प्रकार की सिफारिश अधिक प्रभावी है।

              अरे अपने अपने पाल्यों को प्रारंभ से ही कर्मवीर बनाने में क्यों नहीं जुट जाते। कितने विस्तार से कर्मवीर लंबी कविता में समझाया गया है कि कर्मवीर कौन होते हैं। देखकर बाधा विविध बहु विघ्न घबराते नहीं, रह भरोसे भाग्य के दुख भोग पछताते नहीं, काम जितना भी कठिन हो लेकिन उकताते नहीं, भीर में चंचल बने जो धीर दिखलाते नहीं, हो गए एक बार में उनके बुरे दिन भी भले, हर जगह हर काल में वे ही मिले फूले फले। पर्वतों को काटकर रास्ते बना देते हैं वे, सैकड़ों मरुभूमियों में नदिया बहा देते है भी, है काम कौन सा ऐसा जो उनसे नहीं होता भला। केवल पहले अनुच्छेद की पंक्तियां ही आचरण का विषय बन जाए तो सफलता स्वयं ही चरण चूमने चली आती है। पर सफलता के ये रास्ता बहुत कम लोगो के चयन का विषय बनता है। लोगों का शॉर्टकट में विश्वास अधिक है।

              मन से दुर्बल हैं इसलिए जरा सी भी विपत्ति आते हायतौबा मचाने लगते हैं, हाइपर हो जाते हैं, मार घबराते हैं कि अब कया होगा, कैसे होगा, मेरे पास तो न धन का बल है न सिफारिश का, मैं तो ज़िंदगी में कभी आगे बढ़ ही नहीं सकता। पर वे यह भूल जाते हैं कि इन सबसे बड़ कर आत्म बल और धैर्य का बल होता है, निरंतर कार्यशीलता होती है। विघ्न बाधाएं तो जीवन का हिस्सा हैं, जीवन की राह समतल होती कब है, उसमें तो ढेर खतरनाक मोड़, रपटन, कांटे, पथरीला पन होता ही है, पर उनके डर से हाथ पैर छोड़ कर बैठा नहीं रहा जा सकता, उन सब को पार करते अपनी मंजिल, अपने लक्ष्य को साधना होता है। भाग्य के भरोसे छोड़ हाथ पर हाथ धरे बैठे नहीं रहना होता, दुख भोग पछताना नहीं होता बल्कि अपनी निरंतर कार्यशीलता से उन बाधाओं पर विजय पानी होती है। काम की कठिनता को देख कर जी नहीं चुराना होता, बार बार ये नहीं कहना होता कि हमसे तो होगा नहीं, हो ही नहीं सकता। जितनी बार आप इन निराशा पैदा करने वाले वाक्यों को दोहराते हैं आपका मनोबल कम होता जाता है और आप अंतत उस ककार्य में असफल हो जाते हैं। दरअसल आप प्रारंभ से ही ये मानस बना चुके होते हैं कि मुझसे नहीं होगा। आपकी शक्ति लगातर क्षीण होती जाती है। तो हमेशा सकारात्मक बने रहिए। काम की कठिनता से उकताएं नहीं, आप के स्थान पर उसे जो भी करेगा, वह भी आप जैसे दो हाथ पैर का स्वामी होगा, वह चतुर्भुज या चतुरानन या दशानन नहीं होगा। तो जब कोई अन्य कर सकता है तो आप क्यों नहीं। संकल्प की शक्ति बहुत बडी होती है, पांच फुटी मानव इतने बड़े बड़े जलयान और जलपोत को उड़ा और खींच ले जाता है। मुसीबत कठिनाई आने पर मन की चंचलता बढ़ जाती है, धैर्य जबाब दे जाता है। पर इन सब से कार्य सिद्धि नहीं मिला करती।

                 और जो दुर्दिन बुरे समय का रोना रोते बैठे रहते हैं मार खीझते और झींकते रहते हैं उन्हें याद दिलाना जरूरी है कि कर्मवीर इन सबको बाधा के रुप में लेता ही नहीं, ये सब तो प्रेरक हैं। फिर से रेखांकित करते हैं हो गए इक आन में उनके बुरे दिन भी भले, हर जगह हर काल में वे ही मिले फूले फले। तो करना ज़रुरी है, ईमानदारी ज़रुरी है और निरंतरता ज़रुरी है। और जो संकल्प ले लिया तो पर्वतों को काटकर मार्ग बनाना या मरुभूमि में नदियां बहा देना सरल हो जाता है। ऐसी प्रेरणास्पद कविताएं केवल कक्षा में पढ़ने पढ़ाने, अर्थ, व्याख्या, प्रश्न उत्तर और शब्दार्थ लिखने के लिए ही नहीं हुआ करती, ये तो जीवन बदल कर रख हैं। बस उन्हें दिन भर गुनगुनाने और आचरण में लाये जाने के प्रयत्न जरूरी हैं। जब आप दिन भर ऐसे अंशों को गाते दुहराते हैं तो आपका मानस भी वैसा तैयार होता है। तो कर्मयोगी बनने के प्रयास में लगे जरुर रहिए। देर सबेर सफलता मिलेगी अवश्य।

मेल मुलाकातें

 सफर जारी है....1005

25.07.2022

मेल मुलाकातें.......

जीवन स्वयं में एक यात्रा है। जीवन पर्यंत हम मानुष न जाने कितने कितने व्यक्तियों से मिलते जुलते हैं, कितने कितने स्थानों को देखते हैं, कुछ स्मृति में ऐसे कैद होते जाते हैं कि भुलाए नहीं भूलते, बार बार स्मृति पटल पर छा जाते हैं, हम बार बार किसी न किसी ब्याज से उन्हें याद करते रहते हैं और कुछ ऐसे गायब हो जाते हैं कि गधे के सिर से सींग। कुछ महत्वपूर्ण क्षणों को हम एल्बम में कैद कर संजो लेते हैं और उन पन्नों को जब मर्जी उलट पलट कर देख लेते हैं, उनमें धूप हवा लगाते हैं और फिर स्मृति मंजूषा को बंद कर देते हैं। जैसे जैसे समय बीतता जाता है, यादें धुंधली पड़ती जाती है। ये हम सबके साथ कमोवेश घटित होता ही है।

           ज्यादा ही सौभाग्यशाली हुए तो हर पड़ाव में इतने इतने स्नेही स्वजन मिल जाते हैं कि उनका स्नेह झोली में नहीं समा पाता, झोली छोटी पड़ जाती है तब दो चूंटी चावल और नेक से दूध की याद आती है जिसे बाल गणेश दादी अम्मा के पास लेकर पहुंचते है खीर बनवाने को और खीर उबल उबल कर इतनी अधिक हो जाती है कि बड़ी बड़ी नादों में भी नहीं समा पाती, सदावृत बांटने के बाद भी इतनी बच जाती है कि उसे मिट्टी में गाड़ना पड़ जाता है और वह सब हीरे मोती में बदल जाती है। जीवन के हर छोटे बड़े पड़ाव पर मुझे भी भले लोग बहुत मिले हैं। एकदम फिट और टिपटाप, व्यवहार में दक्ष, खूब कुशलता से अपनी बात रखने वाले, पहली भेंट में ही दिल में उतर जाने वाले, कौली भर गले मिलने वाले, बिछुड़ते पनीली आंखों के साथ विदा लेने वाले और फिर मिलने का वायदा करने वाले। बेलगांव और मैसूर के एक डेढ़ दिनी ठहराव ने भी खूब संपन्न कर दिया। उजास से भरे सेंट फिलोमिना विद्यालय के कार्य तत्पर विद्यार्थी, वहां का दक्ष स्टाफ, अतिथियों को हाथो हाथ लेने का भाव, सुदूर स्थानों से पधारे हिंदी साधकों का हिंदी प्रेम, समृद्ध मंच, प्रतिबद्ध हिंदी प्रेमियों के छोटे छोटे दलों से आत्मीय मुलाकात, उनकी भाषाई दक्षता सभी कुछ साये की तरह मेरे साथ चला आया है।

          बेलगुंदी में कांग्रेस कुआं, आनंदेश्वर मंदिर, काका कालेलकर की बहुत बहुत पुरानामकान जिसमें वे बालपन में पांच छह वर्ष रहे, वहां की नगर पंचायत प्रधान हेमा जी और बुजुर्गवारों का स्नेहाशीष, यादव जी का स्नेहिल आतिथ्य , एयरपोर्ट अधिकारी की कार्य तत्परता के साथ साथ अदभुत चित्रकारी, जंगल में मंगल रचा देने की काबिलियत कभी भी भुलाई नहीं जा सकती। मैसूर में कितने कितने नए परिचय जुड़ गए और स्नेहिल संबंधों की पुस्तक और मोटी हो गई। जब स्वस्थ और सकारात्मक भाव से दिल से मिला जाता है तो दृष्टि भी बदल जाती है। फिर सामने वाले में केवल और केवल नुस्ख ही नहीं निकाले जाते, उनकी आलोचना ही नहीं की जाती बल्कि उनके व्यक्तित्व के प्रभावी पक्षों को सराहा जाता है और जो समझ में नहीं भरता उसके प्रति उदासीनता बरत ली जाती है। किसी का सुघड़ मंच संचालन भा गया तो किसी की साफगोई, किसी की बात कहते कहते भावुकता का चरम भिगो गया तो किसी की भाषा प्रेम और भाषाई दक्षता ने मन जीत लिया।

          स्थान कहां पीछे रहे भला, मैसूर पैलेस का भव्य सौन्दर्य, चामुंडी मंदिर तक जा मां के दर्शन का सौभाग्य न मिल पाना शायद अभी तपस्या पूरी न हुई हो या दुबारा आना निश्चित हो। वृंदावन गार्डन के संगीतमय फव्वारे जैसे गीत के बोलों पर थिरक थिरक कर नृत्य कर रहे थे, भीड उमड़ी पड़ रही थी , इतना विशाल जन सागर, सब के सब उत्साह से लबरेज थे एकदम मेले जैसा दृश्य, वही भरे भरे बाजार, बच्चो को कंधे पर बिठाए माता पिता,  गुब्बारे लेने को मचलते जिद करते बालवृंद और युवाओं की उत्साहित टोली। सारे के सारे दृश्य आंखें समेट रही हैं, सब साथ जो ले जाने का मन हो आता है। बस, अब कुछ ही घंटों में जेसे उड़ जहाज को पंछी फिर जहाज पर आबे, अपने जहाज पर लौट आना है। तो बस सब को दिल में बसाए चले चलते हैं।

देखि दिना को फेर

 सफर जारी है........1003

24.07.2022

देखि दिना को फेर.........

जब हवा का रुख विपरीत दिशा में हो तो ताकत लगाने की बजाय चुप बैठना ज्यादा फायदेमंद है। तेज हवाओं को दूसरी दिशा में मोड़ पाने में अपनी सारी शक्ति लगा देने से ज्यादा बेहतर है तेज तूफान में घास की माफिक जमीन पर लेट जाना और तूफान के गुजर जाने पर जिजीविषा से सिर ऊंचा कर खड़े हो जाना। जो अकड़ के एवज में ऐंठ के मारे पैठ कू जाते हैं , वे अपनी शक्ति भी बेजा करते हैं और ठनठन गोपाल रह जाते हैं तो स्थितियां अनुकूल न हो तो कुछ समय के लिए शांत भाव में बैठना ज्यादा श्रेयस्कर है। कौन दिन बारह मास एक समान रहते हैं। दिन की तो छोड़ो, सबको शीतलता देने वाला चंदा भी एक समान कब रहता है, कभी घटते घटते बिल्कुल विलुप्त हो जाता है तो कभी सोलह कलाएं बढाते बढाते अपने पूर्ण रुप में शोभित होता है और पूर्णिमा के चांद सा अभिहित होता है, सबका प्रेमासप्द बनता है और सब उसे देख अर्घ्य देते व्रत का पारण करते हैं।

चंद्रमा वही रहता है पर दिनों का फेर उसे मावस से पूर्णिमा की यात्रा करा देता है। और चांद को देखो न विलुप्त होता टूटता है और न पूर्ण होता उछलता है। जानता है वह कि जब पूर्णिमा ही शाश्वत नहीं होती तो अमावस की काली रात कौन लम्बी बनी रहने वाली है, कभी तो काली अंधियारी रात ढलेगी और सुबह का सूरज सारे तमस को चीर जगत को रोशन करता दिपदिपाता प्रखर तेज सा सबको आंख चोंधियाने पर विवश कर देता है। सो जब जब संक्रांति काल हो चुप लगा जाओ, ज्यादा बहस में मत पड़ो, तर्क वितर्क मत करो क्योंकि यह बेकार की बहस को जन्म देगा और परिणाम शून्य का शून्य रहेगा।

तो कभी कभी सब आते जाते, जानते बूझते मौन होना ज्यादा सुखकर होता है। उस समय को उका जाइए , ज्यादा तीन पांच मत कीजिए, कोई सफाई स्पष्टीकरण मत दीजिए क्योंकि जो आपको समझते हैं उन्हें समझाने की, तर्क वितर्क करने की जरूरत नहीं और जो मन में रेसा पाले बैठे है, वे आपको हर बात पर गलत ही ठहराएंगे चाहें आप रत्ती भर भी दोषी न हों। तो सामने वाले को ये अवसर मतहो दीजिए कि वह आप पर हावी हो सके, बात बात पर आपको नीचा दिखाने की कोशिश करे, आपको यह अहसास दिलाए कि आप आज जो भी कुछ भी सब उसके रहमो करम पर हैं। तो किसी से भी अनड्यू मत लीजिए। जितना है अपनी झोली में, उसी में गुजारा करना सीखिए। भीख से कभी किसी का पेट नहीं भरा करता और मान लो एक बार को पेट भर भी जाए तो नीयत कभी नहीं भरा करती, नादीदे की तरह हमेशा हाथ फैलाए खडा रहता है। 

       तो करते रहिए अनासक्त भाव से कर्म, मत बंधिए किसी लालच से, अपने बाहुबल पर भरोसा बनाए रखिए, कर्मवीर बने रहिए और संभल संभल कर चलते रहिए अपने निर्दिष्ट पथ पर । जो आपको समझना नहीं चाहते, वे आपके लाख समझाने पर भी नहीं समझेंगे। रहीम को दोहराते रहिए चुप हो बैठिए देख दिनन को फेर, जब नीके दिन आइए तनिक न लागे देर।

ही और भी की महिमा

 सफर जारी है....1002

22.07.2022

ही और भी की महिमा.......

लम्बे समय से अनुभव कर रही हूं कि यदि आप सभा गोष्ठियों में लोगों से मिलते जुलते खुद अपना परिचय देने में संकोची हैं , इस बात में विश्वास रखते है कि अरे अपने विषय में क्या बताना, अगला उचित समझेगा तो आप ही बता देगा और नहीं भी बताएगा तो कौन कद कम हुआ जाता है, रहेगें तो वही न, जो हैं। न कद बदलेगा और न नाम बदलेगा और न काम धाम । तो काहे चिन्ता की जाय। ओढ़ के रजाई खूब खर्राटे मारकर नींद पूरी की जाए। अरे इतना ही होगा न अमुक ही होगा और आप भी की श्रेणी में पहुंच जाएंगे।

ये ही और भी की कहानी भी अजब गजब है एक को सिंहासन पर बिठा देते हैं तो अगले की सत्ता पर खतरा मंडराने की स्थिति आहूत कर देते हैं। सच ही है हाथ आई बाजी भला छोड़ी भी क्यों जाए, फिर मौका मिले न मिले तो आज ही अच्छे से कस के निचोड़ लो। बड़े होना और बड़प्पन बनाए रखना दो अलग अलग बाते हैं। कितनी कितनी बार तो सुना सुनाया होगा बड़े बड़ाई न करें बड़े न बोले बोल, रहिमन हीरा कब कहे लाख टका मेरा मोल। अब इस नीति पर चलें तो बैठे रहो कम्बल ओढ़ के, कोई पूछने नहीं आ रहा। किसी को कया पड़ी है जो आपकी आरती उतारे, आपके विषय में गूगल पर सर्च करें। अरे अगला ये सब तब करता है जब उसका कोई काम अटका पड़ा हो, आपके बिना निठ ही नहीं रही हो। तो आप पहले ये डिसाइड करो कि आप ही की कोटि में रहना चाहते हो या भी में भी खुश हो। भी कभी मूल नहीं होता, उसकी कोई वव्यक्तिगत सत्ता भी नहीं होती, वह पलोथन जैसा होता है जो है तो ज़रुरी पर उसकी अपनी कोई सत्ता नहीं है। बस साथ में पिछलग्गू सा लगा रहता है और ही हमेशा उसे अपने से एक केटेगरी नीचे ही रखता है। बराबरी पर नहीं रखता।

परिचय देते कहता है आई एम सो एंड सो, अपनी पूरी उपलब्धि विस्तार से बताता है और बाद में एक टैग सा उछाल देता है हां ये भी हैं। अरे तो क्या हम दुम छुल्ले हैं। बताते तो पूरी बात बताओ नहीं तो चुप लगा जाओ। अगले को जरूरत होगी तो बता देगा अपनी जन्म कुंडली नहीं तो मुंह में दही जमा के बैठ जाएगा। पर भी की केटेगरी में तो बिलकुल भी शामिल नहीं होगा। और क्यों हो भला, अरे जैसा भी है जो भी है उसकी अपनी सत्ता है, उसका अपनाआभा मंडल है, उसका अपना व्यक्तित्व है, उसका अपना नाम है काम है छोटा बड़ा जैसा भी हो।

सो बनो तो ही ही बनो, मैं ही हूं,पूरी तरह हूं और जब तक दम में दम है ही ही बने रहेंगे। क्यों बने भी, भी से तो लगता ही ऐसे है जैसे हमारी कोई आवश्यकता ही नहीं थी, हम तो सब्जी के साथ धनिया बन तुल गए या गेहूं के संग बथुए को भी पानी लग गया। न जी न, हमें नाय बननो बथुआ, हम तो गेंहू ही भले।

यात्राओं के मध्य

 यात्राओं के मध्य.....

सभी यात्राएं शुरू तो जीरो माइल से ही होती हैं पर नन्हे नन्हे बढ़ते कदम उसे इकाई से दहाई, दहाई से सैकड़ा ,

 सैकड़ा से हजार, हजार से दस हज़ार और लाख तक ले जाते हैं । लाख से आगे भी दस लाख, करोड़, दस करोड़, अरब, खरब, नील, पद्म ,शंख और उससे भी आगे जहां है पर सब अपनी अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही चल पाते हैं। तो आज हजार कदम नापते मन में उमंग जागी है, देखें कितना और चल पाते हैं। फिर अंदर से आवाज आती है.....चल चला चल ओ राही चल चला चल । हिम्मत न हार, चल चला चल। अब जब तक चला जा रहा है खूब चल रहे हैं। मन है तो चले चलते हैं, कोई दबाव तो है नहीं , न किसी की गाय भैंस खोली है कि चलना ही चलना पड़ेगा। पड़ेगा से ही तो बाध्यता शुरू होती है, कसमसाहट होती है, मन उचट जाता है फिर आप नहीं चलते, मजबूरी आपको चलाती है। और जहां मजबूरी होती है वहां मन से नहीं चला जाता। हर दो कदम के बाद कुड़कुड़ाते है , भुनभुनाते हैं, चिड़चिड़ाते हैं और दो कदम भी ऐसे चलते हैं जैसे आफत आ गई हो। मुंह सिकोड़ लेते हैं, पैर तो ऐसे आगे बढ़ाते हैं जैसे हाथ पैरों में जान ही न हो । तो ऐसे बेमन से कोई सौ हजार कदम थोड़े ही चला जाता है।

 चलो तो जिंदादिली से चलो, जब तक मन हो तब तक चलो, हंसते मुस्कराते चलो, झूमते झामते चलो। झींको मत भिनको मत, अहसान सा मत पटकते रहो। खूब घूमो फिरो, मस्ती के भाव में जीओ । और सुनो ,ये यात्राएं हमेशा एक स्थान से दूसरे स्थान को जाते पैदल ,बस ,टैक्सी ,रेल, हवाई जहाज, पानी के जहाज से ही नहीं होती ।मन से, विचारों से, शब्दों से आप जगत की यात्रा घर बैठे ही कर सकते हो। देखा है न शब्द ही स्थाई होते हैं फिर चाहे वे किताबों में सोने जैसे अक्षर का रुप ले पृष्ठ दर पृष्ठ अंकित होते जाएं या मुख से निसृत होकर, बोले जाकर पूरे आकाश में ध्वनित होते रहें । देखा है न किसी ऊंची पहाड़ी या खाली इमारत में आवाज कैसे गूंजती है और हम कैसे अपने ही उच्चरित शब्दों की प्रतिध्वनि सुनकर हर्ष से भर उठते हैं। देखा है न एक अध्याय और दूसरे अध्याय के बीच कुछ न कुछ जुड़ाव बना ही रहता है। तो एक यात्रा से दूसरी यात्रा के मध्य भी कुछ बातें सेतु बनती है। कुछ अच्छा लगता है कुछ बुरा, कुछ जुड़ता है तो कुछ छूटता भी है। हां, किसी के विषय में दूसरों से सुनी सुनाई बातों के आधार पर निर्मित ऊंटपटांग अटकलें टूटती हैं। पूर्व धारणाओ में सुधार कर लिया जाता है। अब यात्रा करते, पढ़ते पढ़ाते, बतियाते  आप लोगों से, उनके शहरों और प्रांतों से रूबरू होते हैं, उनके घर परिवार और कार्यस्थल में जाकर मिलते हैं, उन्हें प्रत्यक्ष रुप से सुनते हैं, उनके व्यवहार को मायन्युटली ओबजर्ब करते हैं,उनके मित्रो साथियों से मिलते है तो आप हर बार नए अनुभवों से भर उठते हैं। हर बार आपकी गलत धारणाएं टूटती है और आप पुनर्नवा होते हैं।

        तो दो यात्राओं के मध्य का समय बड़े सोच विचार का होता है, अपने को परिमार्जित करना होता है, गलत धारणाओ से मुक्त होना होता है और तो और जब आप विचारों की यात्रा नहीं कर रहे होते, लिख नहीं रहे होते तो आप सबसे अधिक लिख रहे होते हों यानी लिखने की प्लानिंग कर रहे होते हैं। तो करते कराते रहिए यात्राओं के मध्य के समय का प्रयोग और बनाए रखिए अपने को जिंदादिल और जीवंत।

गरजत बरसत सावन आयो रे

 सफर जारी है...999

20.07.2022

गरजत बरसत सावन आयो रे.....

अब सावन को आना तो बादलों की गड़गड़ाहट , बिजली की तड़तड़ाहट और बारिश की फुआरो के साथ ही चाहिए था पर अब के सावन सूमसाम सा प्रवेश कर गया है, कर क्या गया ,चार पांच दिन भी बीत गए सूखे सूखे में।लगता है आगरा शहर से मेघा रूठे रूठे से हैं, देश भर में खूब बरस रहे हैं, बरस ही नहीं रहे, इत्ती जोर से बरस रहे हैं कि कहीं बादल फट जाते हैं तो कही सब बहा के ले जाते हैं। अब के तो पूजा पाठ से मानेंगे के जोर जोर से गानो पड़ेगो काले मेघा पानी दे, पानी दे गुड़धानी दे । भूरो बादल पानी लावे, कारो बादर जी डरपानबे और जो  कछु याद न आए तो बालपन में पड़ी काई बाई कविता ए गा लेयो ....अम्मा जरा देख तो ऊपर चले आ रहे हैं बादल, गरज रहे हैं बरस रहे हैं दीख रहा है जल ही जल। हवा चल रही क्या पुरवाई भीग रही डाली डाली, ऊपर काली घटा घिरी है नीचे फैली हरियाली। भीग रहे हैं ताल बाग वन भीग रहे हैं घर आंगन,बाहर जाऊ मैं भी भीगूं चाह रहा है मेरा मन।

         पर चाहिबे ते कछु नाय होत भईया। काऊ जोतिशी से पूछो कि का करिबे ते मेघा झड़ी लगाएंगे। मोय तो जे लग रई  है कि आधो सावन ऐसे ई उमस और घमस में ही निकल जाएगो।बहुत भयो तो अमावस बीते नेक बूंदाबादी हे जाय तो है जाय पर लच्छन लग नाय रये बरसबे के। और जे मान लेयो कि कछु सी बूंद परऊ गई तो जमीन ऐसी दहक रई है कि दो तीन पोत की बारिश तो ऊंट के मुंह में जीरा दाखिल होयेगी, नेक बूंदन ते का प्यास बुझेगी धरती मैय्या की, चुप्प पी जाएगी पांच छह बारिश तो। अब तुम जानो कैसी तपी है जेठ बैसाख और अषाढ़ भर।इत्ते पानी ते कछु नाय होने को। बोई डोर है जावेगो कि नंगो न्हायगो कि निचोड़ेगो।     

 पर भईया मानुष के हाथ में कछु नाने, अब पैइसन से थोड़ी खरीदी जाबेगी बारिश कि हम तो बौत अमीर है कि बारिश हू खरीद लिंगे। धूप बादल चंदा सूरज तो अरबपति पे हू नाय खरीदे जा सके। एक जे ई तो बचे हैं बाकी तो सब खरीद लियो ई समझो। सो हम बार तो बादल की आस लगाए बैठे है कि खूब जम के बरसे बदरा और रेडुआ में गानो बजे.... बरखा रानी झूम के बरखो।अब हम बहन बेटीन ने तो बाबुल के अंगना जाके खूब झूलबे को मन कर रयो है के हरियाली तीजें आए तो हम सखी सहेली मिल के ऊंची ऊंची पेंग भर के, एक दूसरे ए झोटा दे के खूब जोर जोर ते गाबें कि गोवर्धन को बीजना हरियाली तीजें आबेंगी, मेरी दादी लीपे चौंतरा मेरे बाबा फूल बिखेरंगे के अमुआ के लंबे चौड़े पत्ता पपिहा बोले के अरी मेरी बहना सातों सहेली चलो संग झुला पे चल के झूल लें, कैसी खड़ी हो री बहना अनमनी अरी बहना कैसो तिहारो सत्संग झूला पे चल के झूल लें। चम्पा चमेली वन में जायके, अरे बहना मन में तो उठी है उमंग झूला पे चल के झूल लें। अरे साठ पार हो गए तो क्या झूलने और गाने पर बैन लग गया, मैय्या बाबुल स्वर्ग सिधार गए तो भैया भाभी दीदी छुटकी सब तो है, सो हम तो खूब मगन है के गांगे कि बहुत दिना है गए बलम जी मैं पीहर कू जाऊंगी, और भैया आ गयो मोय लिबाबे झूला झूलबे जाऊंगी मैं तो खूब खूब बतराऊंगी। सावन तो बहन बेटियों के लिए पीहर मायके की सौगात लेकर आता है, मन कैसा हिलोरें लेता है, अपने बचपन की सखी सहेलियों से मिल कैसे हरखा जाता है, दुनिया भर के काम काज एक तरफ और सावन की तीज कजली दूसरे पलड़े में। ये त्योहार सारी खीझ, सारा दबाव सारा तनाव सब उड़नछू कर देते हैं। मन कैसा हिंडोले सा दोलायमान होता है।

         तो आते रहें ये सावन भादों, तीज राखी के त्योहार, मनाती रहे आधी आबादी अपनी खुशियां, झूले जाते रहे झूले, पड़ते रहें नीम और आम की डाल पर मोटी रस्सी के झूले, खोजी जाती रहे पटलियां, दिए जाते रहें झोटे, बढ़ती रहें पींगे और गूंजती रहे सावन के गीत मल्हार, बहन बेटियां जाती रहें मायके, इनका मन हरखता रहे और गरज बरस के साथ सावन की फुआरें सबके मन को भिगोती रहें।

बहनापा/भाईचारा

 सफर जारी है....996

17.07.2022

बहनापा/भाईचारा......

संबंध निभाना भी एक कला है। एक वे हैं जिनसे अपने गिनती के चार रिश्ते नहीं निभते और दूसरी तरफ वे हैं जो निजी संबंधों के साथ साथ बहनापे और भाईचारे को भी सहजता से निभा ले जाते हैं। वसुधा को कुटुंब ऐसे ही थोड़े कहा गया है। और फिर वसुधा धरती मां है तो उस पर बसने वाले सभी जन भाई बहन ही हुए न, स्कूलों में प्रतिज्ञा करते भी यही दोहराया जाता है भारत हमारा देश है,हम सब भारत वासी भाई बहन है। फिर ये बहनापा और भाईचारा गुम कहां हो जाता है। हमारे संबंधों में सहजता क्यों नहीं रहती, हम एक दूसरे के प्रति कटु और संवेदन शील क्यों हो जाते हैं, एक दूसरे से क्यों झगड़ते हैं, एक दूसरे की आलोचना करते बाज क्यों नहीं आते।

यह सब निर्भर करता है कि आपका किन लोगो से पाला पड़ा है, आप किन लोगों के संपर्क में आए हैं, आप दूसरों के प्रति कैसा सोच रखते हैं। मेरे कार्य क्षेत्र ने मुझे देश के विभिन्न प्रांतों के विद्यार्थियों, शिक्षकों और अन्य अन्य लोगों से मिलने का सुअवसर दिया है। जिस मर्जी कोने में चले जाइए, भरपूर प्यार और आदर मिलता है । ये उन की खूबी है। उत्तर भारत में तो रहते ही हैं पर दक्षिण भारत, पूर्व और पूर्वोत्तर,पश्चिम में भी स्नेहिल संबंधों का दायरा बहुत विस्तृत है। कभी कभी तो लगता है जितना मेरी झोली में डाला जाता है, जितना स्नेह और आदर मेरे हिस्से में आता है, जितना स्वागत और सत्कार भाव मुझे मिलता है, उसका प्रतिदान तो कई कई जन्मों में भी संभव नहीं। शायद स्नेह भाव प्रतिदान मांगा भी नहीं करता, प्रभु बस ये सद्भाव बना रहे इतनी ही प्रार्थना है।

महाराष्ट् कई बार आना हुआ, नागपुर में लंबा प्रवास भी रहा पर इस बार शेवगांव और अहमद नगर के अनुभव यादों में प्रभावी बन गए। शिरडी एयरपोर्ट पर प्रो पुरुषोत्तम जी और प्रिय संजय का स्वागत भाव, शिरडी जी के दर्शन, संत ज्ञानेश्वर जी की साधना स्थली, प्रकृति की अद्भुत छटा, गोष्ठी में गणमान्य लोगों से भावभीनी मुलाकात, पुरषोत्तम कुंदे जी का सधा नेतृत्व दिल में गहरे पैठ गया। लोग बहुत करते हैं तो पैसा खर्च कर आपको व्यवस्था उपलब्ध करा देते हैं पर आपकी रूचि को ध्यान रख परिवार को कष्ट दे आपको मनचाहा भोजन परोसना छोटी बात नहीं होती। क्या देविका जी का प्रेम भाव भुलाए जाने की वस्तु है। फिर शेरके जी का शेवगांव से अहमद नगर की यात्रा, वहां के इतिहास की जानकारी, चांद बीबी का महल और अहमद नगर किले की मजबूत प्राचीर जिसमें जवाहर लाल नेहरू को कैद किया गया था और यहीं उन्होंने डिस्कवरी ऑफ इंडिया लिखी। उन्हें ये सब बताना ही था क्योंकि वे इतिहास के ही आचार्य ही थे।

अहमद नगर में प्रवेश ,प्रिय रिचा से स्नेह मिलन, राजीव जी का भावभीना स्वागत, हिंदी सृजन संस्था जिसकी फाउंडर स्वयं रिचा जी ही हैं,के कर्मठ सदस्यों से मुलाकात बहुत सुखद रही। हिंदी की बढ़ोत्तरी के प्रयास हिंदीतर क्षेत्रों में अधिक व्यापक हैं और विस्तार पा रहे हैं, ये हम सबके लिए सुखद है। लोग आपस में भाई बहिन का संबोधन देते अवश्य हैं पर उसे निभाते व्यावहारिक नहीं हों पाते। पर भाग्यशाली हूं मैं कि ऋचा की ने मुझे जिज्जी  का संबोधन मात्र सैद्धांतिक रुप से ही नहीं दिया गया, उसका निर्वाह भी पूर्ण निष्ठा से किया गया। घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर बिलकुल नई जगह में एक घर मिला, घर जैसा वातावरण मिला। किसी से मिलने पर उसके व्यक्तित्व की कई कई परतें खुलती हैं। रिचा लघु कथाकार तो हैं ही, शब्दों को तो साधती ही हैं, पेड़ पौधों वनस्पतियों से उन्हें बहुत प्रेम है। छत पर जो पौधे, लता, बेल गुल्म उनके संरक्षण में फल फूल रहे हैं, वे सब उनके प्रति श्रद्धावनत हैं। अच्छे व्यक्तित्व और चरित्रों से मिलना सब के भाग्य में नहीं हुआ करता। मैं सौभाग्यशाली हूं कि मुझे ये अवसर मिला।

बस कुछ ही घंटों में वापिसी है। आते हैं तो जाते ही हैं। पर जो स्नेह और सद्भाव लेकर जा रहे हैं वह अमूल्य है। तो मिलते रहें ऐसे अवसर और अपने को भरापूरा अनुभव करते रहें।

बुजुर्गों के घर /वृद्धाश्रम

 सफर जारी है....996

18.07.2022

बुजुर्गों के घर /वृद्धाश्रम.....

मां एक कहानी सुनाती थीं जिसमें एक परिवार में बड़े बूढ़े न होने पर घर की मालकिन मिट्टी के बड़े बूढ़े खरीद लाती है, सभी काम उनकी आज्ञा लेकर उनसे पूछकर करती है और बहुत सी मुसीबतों और विपत्तियों से बच जाती हैं। यहां तक कि एक बार चोर उसके चोरी करने आते हैं पर घर की मालकिन को बड़े बूढ़ों से बात करते सुनकर चोरी का माल वहीं छोड़ भाग जाते हैं। पता नहीं, कहानी कितना सच थी पर इतना सच था कि घर में बुजुर्गों का खूब मान सम्मान था, उनसे पूछे बिना, उनकी राय लिए बिना महत्त्वपूर्ण फैसले नहीं लिए जाते थे। घर में उनका स्थान प्रवेश द्वार के पास का कमरा बैठक हुआ करता था जो आज ड्राइंग रूम में बदल गया है। घर के बुजुर्ग घर के रक्षा कवच थे, उनके होते नकारात्मक शक्तियों का प्रवेश घर में वर्जित था। किसी मंथरा और घर फोड़ी की हिम्मत नहीं थीं कि बुजुर्गों की छत्र छाया के होते उस घर पर नजर डाल पाती । आने वाले को ता छान के ही घर में प्रवेश मिलता।

धीरे धीरे समय बदला, प्रवेश द्वार के स्थान पर बुजुर्ग घर के पिछवाड़े भेज दिए गए l उनकी आज्ञा की कोई वकत नहीं रही, अब काम करने से पहले उनकी राय ली जानी आवश्यक नहीं समझी जाती। सूचनात्मक तरीके से उन्हें केवल संदेश दिए जाने लगे कि हम जा रहे हैं। अब जा रहे हो तो जाओ, कौन पूछ रहे हो, सूचना दे रहे हो तो ले ली। फिर इसमें भी कटौती कर दी गई। सारे फ़ैसले चुपचाप किए जाने लगे। बुजुर्गों को इसमें शामिल करने की जरूरत ही नहीं समझी गई । वे आऊट डेटेड जो हो चुके थे। नई टेक्नोलॉजी की समझ नही थी उन्हें। जैसा भी था पर वे घर में तो थे, दो समय रोटी तो मिल जाती थी। अपने बच्चों को देख कर ही खुश हो लेते थे भले ही दूर से देखना होता। बात तो नहीं हो पाती थीं। वे भी क्या करते बेचारे, व्यस्तता  दिन पर दिन बढ़ती ही जाती थी। सबको बड़ा और बड़ा जो बनना था, बहुत सा पैसा कमाना था, सबके सपने बहुत बहुत बड़े थे चांद तारों को झोली में भर लेने के। नाती पोतों की अपनी अपनी व्यस्तताएं थी। बहुएं भी घर बाहर और ऊपर से बुजुर्गों को संभालने में चिड़चिड़ करने लगी थीं सो घर में सेवक सेविकाओं की फौज लग गई। पर वे घर के कोने में पड़े उपेक्षित दर उपेक्षित होते चले गए और अब नौबत यहां तक आ गई कि घर के कोने भी वेशकीमती हो गए और वे वृद्धाश्रम में धकेल दिए गए। यहां बस कुछ पैसे भरकर आप सब जिम्मेदारियों से मुक्त थे। बस बिलकुल निजी और प्राइवेसी वाली बिंदास लाइफ, मर्जी चाहे जहां घूमो, जहां मर्जी घूमो कोई रोकटोक करने वाला नहीं।

          इस सुख में डूबे बिलकुल भूल गए कि हम अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे थे। अगली पीढ़ी बहुत मायन्यूटली सब ओबजर्ब कर रही थीं। हम कौन अमर मूल खा कर आए हैं, बूढ़ा तो हमें भी होना है तो जैसे को तैसा तैयार बैठा है। कहां आदर्श थे कि अभिवादन शीलस्य नित्य वृद्धोपसेविन चतवारी तस्य वर्धनते आयु विद्या यशोबलम। और आज ओल्ड एज होम की बढ़ती संख्या बता रही है कि समाज की संरचना पूरी तरह बदल चुकी है, लोगों के सोचने के तरीके बदल गए हैं। शायद वे अधिक अपडेटेड हों और हम पिछड़े सोच के हों। पर इतना तो निश्चित है कि जैसा बोएंगे वैसा काटना तो होगा ही। हम आज जितने एडवांस हो रहे है अगली पीढ़ी उससे कहीं अधिक एडवांस होगी तो एक बार जरुर विचार कर लें कि फिर ओल्ड एज होम से आगे क्या डेवलपमेंट हो सकते हैं। बहुत हो गई कमाई, बहुत बड़े बन गए ।अब भी नहीं चेते तो दुर्दशा के लिए तैयार रहो। अरे संस्कारित करो उन्हें, बहुत हो गया।

नियम तो नियम है

 सफर जारी है.....995

16.07.2022

नियम तो नियम है ......

चलना सब को सड़क पर ही है, सड़क सबकी है, किसी की बपौती नहीं। तभी तो कह दिया जाता है सड़क तेरे पिताजी की है क्या। जो कर देगा, वह चलेगा। तो एक दूसरे पर भन्नाते क्यों हो। नियम बना दिए गये हैं, सबको पालन करना ही चाहिए, जगह जगह यातायात के सिपाही भी आपको नियंत्रित निर्देशित करते मिल जाएंगे। और जो आपमें इनकी जेब भरने की सामर्थ्य हो तो नियम तोड़ने पर भी तुम्हारा चालान नहीं कटेगा, तुम्हें छोड़ दिया जायेगा और तुम ट्रैफिक नियमों को घता बताते, लाल बत्ती को नज़र अंदाज़ करते कालर ऊंची कर मूंछों पर ताव देते फर्राटे से निकल जाओगे। यानी जिन्हें नियमों का पालन करवाने के लिए नियुक्त किया गया वही उन्हें तोड़ने में सहायक हो जाएगा। यही नियति है नियमों की, वे बनाये तो बड़े सोच समझ के जाते हैं लेकिन पालन के समय उनकी धज्जियां उड़ा दी जाती है। नियमों में जान बूझ कर कोई लू पोल छोड़ दी जाती है जिससे अगले को लाभ मिल सके और आपका कोटा भी पूरा हो सके। नियमों में ढील दिए जाने का ये सिलसिला सब जगह लागू है कहीं विशेष परिस्थिति का हवाला देकर तो कहीं किसी अपने को लाभ पहुंचाने के लिए नियमों को तोड़ा मरोड़ा जा सकता है, उनकी व्याख्या अलग तरीके से की जा सकती है यानी कुछ भी कर के अपनो काम हो जाना चहिए। यानी नियम कानून वस्तुनिष्ठ नहीं हुआ करते, उनमें व्यक्तिनिष्ठता बनाई रखी जाती है, कुछ जा न कुछ गुंजायश छोड़ दी जाती है।

यदि नियम नियम है तो सबके लिए बराबर होना चाहिए। क

किसी को भी छूट क्यों मिले और यदि एक को भी ये छूट दे दी गई तो अगले के लिए रास्ते खुल जाते हैं। पूरी ज़िंदगी मनुष्य इसी लाभ कमाने के जुगाड में लगा रहता है। लंबी लाइन में कौन लगे, रुको कोई न कोई शॉर्ट कट निकल ही आयेगा।  टिकट बुकिंग के लिए एजेंट है तो कहीं आपके कार्य कराने के लिए सुविधा शुल्क की व्यवस्था है। नियम तो जनसामान्य के लिए होते हैं क्योंकि वे आम होते हैं खास नहीं, वे बड़े ओहदे पर नहीं होते, उनके पास देने के लिए सुविधा शुल्क नहीं होता इसलिए वे प्रभावशाली नहीं होते। मूल शुल्क ही मुश्किल से जुट पाता है तो लेने देने को पैसा कहां से आए। पर अब अधिकांश लोग ले दे के काम कराने की फिराक में लगे रहते हैं। यानी इनके पास इतनी मुद्रा है कि वे कमफर्ट जोन से बिना निकले भी उनके काम संपन्न हो जाते हैं। तो इसीलिए तो सब लक्ष्मी की फिराक में उसकी जुगाड में लगे रहते हैं। आश्चर्य है न स्कूल की फीस मुश्किल से जुटाने वाले भी अपने पाल्यों को ट्यूशन दिलाने की व्यवस्था में विश्वास करते हैं, क्या करें उन्हें करना पड़ता है। तो सबकी मानसिकता यह बनती जा रही है कि दुनिया में बने रहना है, अपनी को अप टू द डेट रखना है तो बस सारा ध्यान कमाने और कमाने पर दो, बाकी तो सब पैसे के बल पर साध लिया जाएगा। एसा न होता तो आदमी की इतनी हिम्मत कैसे हो जाती कि वह आपसे यह कहने का साहस कर पाता कि साब कुछ ले दे के हो जाए तो बताए। आप योग्यता पूरी करते हों न करते हों पर आप दूसरे की जेब भरने की सामर्थ्य रखते हों तो सब संभव हैं। कैसे भाई क्या आप प्रभावशाली के रौबदाब में आकर नियम बदल दोगे या पैसों की गरमी उन नियमों की बखिया उधेड़ कर रख देगी। नहीं भाई नियम नियम होते हैं, वे केवल पटल पर लिखने के लिए नहीं होते, केवल फाइलों में कोट नहीं होते, जिल्द चढ़ा मढवा कर रखने के लिए नहीं होते। वे सब के द्वारा पालन के लिए होते हैं फिर चाहे साधारण हों या विशेष, आम हों या खास, गरीब हो या अमीर।

तो ये सुविधा शुल्क की परिपाटी खत्म कीजिए साब, बहुत हो गया, सबको लाइन में लगने दीजिए। नियमों को तोड़ने पर दंड सबके ताईं समान रखिए तभी ये नियम कानून बचे रहेंगे और लोग इसके अनुपालन को आवश्यक मानेंगे। एक जेसे अपराध के लिए दो प्रकार के दंड कैसे हो सकते हैं साब। तो साब जी नियम केबल बनाइए ही मत उनके अनुपालन के निर्देशों को भी आवश्यक कर दीजिए।

आखिर वे ऐसे क्यों हैं

 सफर जारी है ...994

15.07.2022

आखिर वे ऐसे क्यों हैं .......

वे हमेशा भुनकते तुनकते ही क्यों रहते हैं, हमेशा क्रोध में क्यों तने रहते हैं, दूसरों में दोष और कमियां ही क्यों खोजते रहते हैं, उन्हें कोई भी पसंद क्यों नहीं आता, उन्हें नुक्ता चीनी की आदत क्यों पड़ गई है, क्या आपने कभी इन छोटी छोटी और महत्वपूर्ण बातों पर विचार किया है, या इसे भी यह कह कर हवा में उड़ा दिया गया कि हम पे टैम नहीं है। अरे जो बातें आपके जीवन को प्रभावित कर रही हों, जिससे आपकी छवि धीरे धीरे धूमिल होती रही हो, आपके दोस्त मित्र सखी सहेली सब दूरी बनाते जा रहे हों,कटते जा रहे हों, परिवार में कलह के बादल घिरते जा रहे हों, बच्चे अलग रूठे मटके से रहते हों, दांपत्य जीवन में जहर घुलता जा रहा हो तो भी इगोइस्ट बने रहना कहां तक उचित है। अरे जब बोलने बतराने सुख दुख बांटने के लिए पास कानी चिरैया भी पास नहीं होगी तब सोचना शुरू किया भी तो भला हाथ क्या आयेगा।

 ऐसी शिक्षा दीक्षा पाने का भला क्या फ़ायदा हुआ कि जीवन ही सुख पूर्वक नहीं बीत पाया। कोई न कोई इल्लत लगी ही रही। ज़िंदगी भर इतने मोटे मोटे ग्रंथ पढ़ते रहे, मार किताब इकठ्ठी  कर कर के लाइब्रेरी बना डाली, उपाधि के निरे बंडल के बंडल ले लिए, इतने इतने पुरस्कार और शील्ड जीत कर ड्राइंग रूम में सजा लिये पर व्यवहार करना नहीं सीख पाए, आचरण में कोई बदलाब नहीं आया।शक्ल सूरत से हीरो पर अकल में  वही जीरो के जीरो बने रहें। अरे भाई मेरे, मंहगे कपडे पहन कर इतरा भले ही लो पर उससे तमीज थोड़े ही आ जाती है। सुंदर दिखने के लिए भले ही से खूब मंहगी क्रीम चेहरे पर पोत लो पर आचरण में तो मोटी और काली भैंस ही बने रहते हो। कोई कुछ पूछे तो चिल्ला चिल्ला कर क्यों बोलते हो, अगला न तो बहरा है और न ही उसे कम सुनाई देता है। क्या फ़ायदा हुआ इतनी इतनी पढ़ाई का भला जब सम्बन्धों को ही ढंग से नहीं संभाल पाये। प्राथमिक कक्षा से ही बड़े बड़े सूक्ति और सुवाक्य सिखाए गए, खुशकत और इमला लिखाई गई, ऐसी मोटी मोटी कापी भर के कापी भर भर के प्रश्नों के उत्तर लिखे, रात दिन बैठ कर घोटा लगाया खूब रेज के नंबर भी पा लिये पर जैसे ही अगली कक्षा में पहुंचे पिछला सब सफाचट हो गया। नाम के आगे पदनाम लग गया, उपाधि जुड़ गई लेकिन दिमाग सफाचट ही बनाए रखा। उसे काहे को कष्ट दें। ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया। अब उपयोग में लाते तो कुछ कम हो जाता तो जो जो सिखाया उसे लिख दिया, लिखने के लिए ही तो पढ़ा था कौन व्यवहार में लाना था।

 जो भी मेहनत थी, पैसों का व्यय था, डांट मार थी वह उपाधि प्रमाणपत्र के लिए नहीं थीं भाई, वह सब आपके व्यवहार में दिखना ज़रूरी था। विनम्र होना था, मीठा बोलना था, क्रोध को जीतना था, संयम रखना था, अपना ही अपना नहीं देखना था, दूसरे की भी परवाह करनी थी, सब आप जेसे ही तो थे। तो आप उनसे सुपर कैसे हो गए। बात बात पर दूसरे के ऊपर बादलों से बरसते क्यों रहे, जितनी देर सामने वाले को सुनाने के लिए अपने कोषागार से तीखे व्यंग्य बाण निकालते थे, उसके क्षणांश में कहीं अपने अन्दर झांक लेते, ये जो बात बात पर लाल पीले होते रहते हो, सामने वाला तो जब प्रभावित होगा तब होगा पर जहां ये क्रोधाग्नि जलेगी उसकी लपटें तो सबसे पहले आपको ही लपेटे में ले लेंगी,उस स्थान को ही सुन्न काला कर देंगी, व्यवहार तो आपका ही बदलेगा, माथे पर सलवटें आपके पड़ेंगी, आंखें लाल पीली आपकी होंगी, आवाज़ आपकी विकृत होगी तो ये जो बात बात पर दुर्वासा सा रूप धारण कर लेते हो, उस क्रोध को सही समय के लिए बचा कर रखो। शांत रहो, धैर्य रखो, पहले खुद में गंभीरता तो लाओ, खुद को स्थिर तो करो, बात को समझो तो सही। तुम्हारा क्रोध, तुम्हारी खीझ, तुम्हारी तुनक, तुम्हारी हर दूसरे में दोष देखने की प्रवृत्ति, खुद के ईगो को तृप्त करने के लिए दूसरों पर बरसने, जहर उगलने, उसे बात बात पर नीचा दिखाने की सोच तुम्हें सुपर नहीं बनाती बल्कि तुम्हारे खोखले पन को दर्शाती है। दूसरी लकीर को लगातार घिस घिस कर छोटी करने में अपनी शक्ति का अपव्यय क्यों करते हो, इतनी देर में तो उस लकीर के समानांतर उससे बड़ी दूसरी रेख खींच खींच सकते हो, इन सब तू तू मैं मैं में कुछ नहीं रखा है, इनसे उबरो। बदलना ही है तो सबसे पहले खुद को बदलो, खुद सुधरो, अपने को डिस्टर्ब मत करो। जो खुद सुलझा हुआ होता है, वह बेबात की बातों में नहीं उलझता। अपनी शक्ति का अपव्यय नहीं करता। अपने को सहेजता है, आगे बढ़ता है, सबसे मिलता जुलता है। संबंधों को कुशलता से निबाह ले जाता है, जोडक योजक बनता है।

 तो वे अपना आत्म विश्लेषण कर लें, खुद में झांक लें, अपने अवगुणों को त्याग दे, मनुष्य हैं तो मनुष्य बन के रहें।

गुरुजी तो गुरुजी हैं

 सफर जारी है...993

14.07.2022

गुरुजी तो गुरुजी हैं.....

वे गुरुजी हैं, उनसे ही तो सब सीखा है, अब भी सीखते ही रहते हैं, सीखना चाहो तो सारी ज़िंदगी सीखते रहो। सीखने की कोई उम्र थोड़े ही होती है। पहले अक्षर ज्ञान सीखते हैं, फिर किताब पढ़ना सीखते हैं, प्रश्नों के उत्तर लिखना सीखते हैं, अपने को अभिव्यक्त करना सीखते हैं कि कब कैसे किससे क्या कितना बोलना है, कब चुप रहना है, कब बात को हवा में उड़ाना है, कब छोटी सी बात को इशू बना देना है, कब बडी से बडी बात को दो मिनट में समाप्त कर देना है और कब बात जा बतंगड़ बना देना है। सब सीखा ही तो जाता है और जिन जिन से सीखा जाता है,  वे सब गुरु की श्रेणी में रख दिये जातें हैं। स्कूल और महाविद्यालय की पढ़ाई समाप्त होने तक बार बार गुरू जी बदलते रहे पर कुछ ऐसे दिमाग पर छा गए कि उनकी सीख उनकी बातें आज भी मस्तिष्क में गूंजती रहती हैं। किताबें तो बहुतों ने पढ़ाई पर जो जीवन जीने के दो चार ज़रूरी बातें और सूत्र सिखा गये, वे भुलाए नहीं भूलते।

तो सबसे पहली गुरु तो मां रही जिसने व्यवहार करना सिखाया, कुम्हार की तरह ठोक पीट कर पर अन्दर से हाथ का सहारा दे गढ़ती रही, तब तो खूब कुनमुनाते भुनाभुनाते थे कि जब देखो अंकुश ही लगाती रहती हैं कि ये नहीं करना है वह नहीं करना है, यहां मत जाओ, वहां मत जाओ, इससे उससे बात मत करो, अकेले क्यों गई थीं, बता कर क्यों नहीं गये, जी लगा कर क्यों नहीं बोला जाने क्या क्या उपदेश होते थे जो उस समय तो बिलकुल भी अच्छे नहीं लगते थे पर सच तो यह है कि वही सब बातें ज़िंदगी में बहुत काम आई। पुस्तक पढ़ कर तो कक्षाएं पास कर ली, प्रथम द्वितीय आते अपने को तुम्मन खां समझते रहे पर ज़िंदगी की वास्तविकता से जब सामना हुआ तो पता चला किताबों में सभी प्रश्नों के उत्तर नहीं लिखे होते, कुछ उत्तर स्वय से खोजने होते हैं, कुछ समय सिखाता है तो कुछ अनुभव। घर परिवार अपने अंदर बहुत से गुरु छिपाए रहते हैं जिन्हें हम गुरु की संज्ञा तो कभी नहीं देते वैसे भी घर की मुर्गी तो दाल बराबर समझी जाती है।

घर परिवार से बाहर निकलते स्कूल वाले गुरुजी हमें बहुत सा सूचना परक ज्ञान देते हैं कुछ को रटना होता है तो कुछ को समझना होता है और कुछ में गहरे उतरना होता है। सब से सीखते ही तो रहते हैं। आकाश धरती पर्वत समुद्र चंदा तारे सूरज हवा पानी यहां तक की पूरी कायनात हमें सिखाती ही तो है । पर्वत कहता शीश उठाकर तुम भी ऊंचे बन जाओ, सागर कहता है लहरा कर मन में गहराई लाओ, समझ रहे हो क्या कहती है उठ उठ गिर गिर तरल तरंग, भर लो भर लो अपने मन में मीठी मीठी मृदुल उमंग, धरती कहती धैर्य न छोड़ो कितना भी हो सिर पर भार, नभ कहता है फैलो इतना ढक लो तुम सारा संसार। या जल से पतला कौन है कौन भूमि से भारी कौन अग्नि से तेज है कौन काजल से कारी, जल से पतला ज्ञान है और पाप भूमि से भारी, क्रोध अग्नि से तेज है और कलंक काजर से कारी। तरुवर फल नहिं खात है नदी न संचय नीर, परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर। सब सिखा ही तो रहे हैं।

कबीर गुरु की महिमा लिख गए कि गुरु तो गोविंद से भी बडा है क्योंकि गोविंद तक पहुंचने का रास्ता तो वही बताता है इसलिए गुरु की महिमा सात समुद्र की मसि, सब धरती कागद और सारे वन की लकड़ी को लेखनी से भी नहीं लिखी जा सकती। गुरु की महिमा अपरंपार है। गुरु सर्वोपरि है।

आज गुरुपूर्णिमा पर जीवन को आकार देने वाले सभी गुरुओं को सादर नमन। इतने सुधारे बुहारे गए पर अभी भी बहुत बहुत सी कमियों के आगार हैं, आज भी सुधारे जाने की बहुत गुंजायश है, रोज किसी न किसी से कुछ न कुछ सीख ही रहे हैं। कृष्णम वन्दे जगत गुरु में सारे गुरुओं को समाहित करते उन्हें करबद्ध प्रणाम और आप सभी को गुरुपूर्णिम की हार्दिक बधाई, मुनिया पूनो की शुभकामना।

देव शयन को चले गये हैं

 सफर जारी है....992

13.07.2022 

देव शयन को चले गये  हैं......

हां हां भाई, देवता क्यों नहीं सो सकते,जब सबको काम के बाद आराम चाहिए तो देवता तो हम सबसे ज्यादा काम करते हैं, तो क्या वे थकते नहीं होगें, उन्हें भी तो कुछ दिनों के लिए आराम चाहिए या नहीं। हम सबकी विपत्ति में वे सहायता करते हैं, उनके नाम जप से हमें बडी शांति मिलती है। ये तो भलमनसाहत समझो कि वे रोज रोज नहीं सोते, रात्रि जागरण करते हैं तभी तो हम चैन से सो पाते हैं। अब ये अलग बात है कि हम घर और मंदिर में स्थापित भगवान के विग्रह को विधिवत सुलाने का उपक्रम करते हैं , पर्दा लगा देते हैं और सुबह प्रभाती गाकर, घंटी घंटे बजाकर उन्हें विधिवत जगाते हैं। पर सोचो यदि भगवान भी रात में खर्राटे मारकर सोते तो हमारी समस्याओं को भला कौन सुनता और दूर करता।

कल आषाढ़ मास की ग्यारस को हरिशयनी एकादशी हो गई और देवता विधिवत शयनकक्ष में भेज दिए गए हैं। वे भगवान हैं तो चार मास में ही अपनी नींद पूरी कर लेते है और सोचो कहीं कुंभकर्ण जैसे छह महीने सोते तो कैसी बीतती। आषाढ़,सावन, भादों और आश्विन (क्वार) चार महीने बारिश के हैं,बारिश के कारण सब जगह कीचड़ और गंदगी रहती है, संत महात्मा इस अवधि में एक ही स्थान पर बैठकर भजन कीर्तन करते हैं। ये चातुर्मास जैन धर्मालंबियो के लिए भी बड़े महत्त्वपूर्ण हैं।

आषाढ़ के चारों सोमवार शीतला मैया को समर्पित हैं तो श्रावण के सोमवार महादेव को, आगरा शिव की नगरी है, राजेश्वर, बल्केश्वर, कैलाश और पृथ्वीनाथ मंदिर में भोले बाबा प्रतिष्ठित हैं, सावन की रिमझिम फुआरों के बीच परिक्रमार्थी नगर परिक्रमा करते हैं, कांवर चढ़ाते है, हर हर महादेव से पूरा परिकर गुंजायमान होता है। फिर आता है भाद्रपद... नागपंचमी, जन्माष्टमी,सलूने राखी, गाज जैसे स्थानीय पर्वों से घर परिवार में चहल पहल बनी रहती है। आश्विन मास पूर्वजों को याद करने, उनका श्राद्ध करने का है और महालया अर्थात शक्ति की उपासना को समर्पित है। दशहरे के बाद शरद पूर्णिमा और फिर कार्तिक मास की शुरुआत हो जाती है यानी करवा चौथ, अहोई अष्टमी,प्रकाश का त्योहार दीपावली, अन्नकूट का त्योहार गोवर्धन और भाई बहिन के स्नेह का त्योहार भाईदूज यानी यम द्वितीया। कार्तिक माह की एकादशी को देवताओं के जागरण का समय हो जाता है देवउठनी एकादशी ,जिसे देवोत्थान/देवठान भी कहा जाता है जागो रे देवा उठो रे देवा आंगुलिया चटकाओ देवा के मंगल गीत गवते हैं।

तो ये है देव शयन से देव जागरण की यात्रा। अब इस बीच इतने इतने त्योहार आते हैं , दुःख हो या सुख, हम जैसों का तो भगवान् ही सहारा है।हम तो भगवान का ही  स्मरण करते हैं। उन्हें छोड़कर और कहां जाएंगे भला। हमारा तो एक दिन काम न चले उनके बिना, वे सो गये गुदगुदे बिस्तर पर खराटे मार के तो हम जैसों की तो भट्टा बैठ जायेगा। हमारा उनके बिन और है ही कौन। न भाई हम तो बिलकुल नहीं जाने देंगे उन्हें सोने के लिए और वे भी पूरमपट चार महीने। भला ऐसे कहीं होता है क्या कि भक्त पुकारते रहें और तुम ऐसी गहरी नींद सो जाओ कि कान पे जूं भी न रेंगे। तो सुनो  देवता तुम्हें सोनो ही है तो सांकेतिक रुप से भले ही सो जाओ घंटा दो घंटा कू  पर वे अपने भक्तों के लिए तो आपको सोते हुए भी जागना पड़ेगा। भक्तों को इनके बिन कल नहीं पड़ती और भगवान कौन भक्तों को अधर में डाल चैन से सो पाते हैं। तो आग है दोनों तरफ बराबर लगी हुईं। भगवान एक बार को सोने का मन बनाये भी तो ये भक्त मंडली उन्हे कब सोने देगी। दूसरों की क्या कहे जब से सुना है कि भगवान चार महीने को सोने चले गये हैं, हमारो तो हालत पतली हो गई कि अब अपना दुखड़ा किससे कहेंगे, किसे सुनाएंगे, कौन हमें ढाढस बंधाएगा।

तो देवता जी तुम्हाई नाय चल रही साब, राजी राजी मान लेयो तो ठीक नहीं तो जबरदस्ती करनी पड़ेगी। तो सोने को कार्यक्रम ए रद्द कर देयो , इतने काम फैले पड़े हैं और इन्हें देखो कि फरमान जारी कर दिया कि चार महीने को सोने जा रहे हैं। घर की खेती समझ रखी है क्या। और क्या जाना जाना लगा रखा है। हाथ छुड़ाए जात हो निबल जान के मोय,हृदय ते जब जाओगे सबल बदूगी तोय।

जाने बिगाड़ी, वो ही बनाबेगो

 सफर जारी है.......991

12.07.2022

जाने बिगाड़ी, वो ही बनाबेगो.......

अब का होयगो राम जी, अब कैसे होएगी, मोये तो कछु समझ न आ रयो । बिट्टन को डकराते देख अम्मा बोली...चों हारी हारी सी बात कर रई है लली , सब राम जी संभालिंगे। बिगड़ी बे ई बनाबत हैं। नेक भगवान को ऊ नाम ले लो कर, सबन के आगे हाथ फैलात है, भगवान के आगे इतने हाथ जोड़ती तो तोय कछु न कछु उपाय जरुर सूझ जातो। भला आदमी की इतनी औकात कहां ते होएगी, वो तो निमित बन जात है पर बाय मदद करबे की प्रेरणा तो  भगवान जी ही देवें। बाके मज्जी के बिना तो पत्ता हू नाय हिले, तू का बात कर रई है बिट्टन। इन मानुस के बस को कछु नाने,  जिन्हें तो बस बेसिर पैर की हांकबे की आदत है। कछु करे चाए नाय करे पर जबान कतरनी सी खूब चलबा लेयो। कोई कोई होत ही ऐसो है कि करबे कू सींक हू नाय सरकाई जाएगी और  बात आकाश पाताल की करिंगे। एक और मुसीबत हते ऐसेन के संग के अपने आगे काहू ए कच्छू नाय समझे। बस अपनी ही सेर रखनी बिन्हे, जब देखो तब अपनी ही पेलबे में लगे रिंगे। मैंने जे करो मैंने वो करो, ऐसेन को मैं तो सिर चढ़ के बोले। अपने आगे काहू ए कछु नाय समझे। कोई समझाबे की कोशिश करें तो बा ते अटक लड़ाई मोल लेबे कू तैयार बैठे रह। बातन में बिनते कोई जीत नाय सके। बात तो ऐसी करिंगे कि आकाश में हू थेगड़ी लगा आंगे पर काऊ काम की आस मत लगा बैठियो। बस जे तो बातन के ही शेर हैं। सो बहना मेरी ऐसेन से तो बच के ही रहो। जाई में भलाई है। और तू तो खूब समझदार है, पूरी गिरिस्थी पार लगा लाई , अब नेक दुख से ऐसी गैली बाबली हे गई कि हरेक के आगे अपनो रोनो लेके बैठ जात है। लोग रो के, सहानुभूति सी दिखाए के तेरे मन की थाह ले रए हैं, और तू पेट की ऐसी भोली है कि सबन के आगे कच्चो चिठ्ठा खोल के बैठ जाएगी। जे तो हमेहु सल है कि तो पे भारी विपत ओखा परी है पर दुख अपने रस्ता ही जायेगो। ऐसे घबराएगी तो कैसे होएगी। और सुन, ऐरे गैरेन की बातन में चो आ जात है, नेक काहू ने जूठे कू कई और तू सांचे कू आस लगा के बैठ जाएगी और कई म्हा ते सहायता नाय मिली तो रोएगी बिलखेगी बिना बात कू परेशान होएगी। अरे कहबो एक बात है और करिबो दूसरी। नेक अपनो दिमाग हू तो लगानो चहिए कि काऊ ने झूठ मूठ कू सहायता करिबे की बात कह दई तो बाके ही भरोसे बैठे रह गए। ऐसे तो कही ही जात है पर जाको जे मतबल थोड़े ही होत है कि अगलो बंध गयो, बाने कही चों, अब तो बाय करनी ही करनी पड़ेगी। ऐसे नाय होय करे।

तो बिट्टन हमाई मान, भगवान ते लौ लगा, बिनते ही दिन रात कहो कर कि भगवान तुमने ई बिगाड़ी है, अब तुम्ही बनाओगे। हमने तो तुम पे छोड़ दईं है। तुम्हे लगे कि सहायता करनी चहिए तो कर दीयो नाय तो जैसे राखोगे रह लिंगे। हमाई काय, हम तो तिहारे भरोसे हैं। हमाई मैय्या एक भजन गाओ कतती... पकड़ लेयो हाथ बनवारी नहीं तो डूब जाईएंगे, हमारो कछु न बिगड़ेगो तिहाई बात जायेगी। तो बिट्टन रानी, दुख होय चाए सुक्ख बस भगवान जी में जी लगाए राखो, अपनी पतवार अपनी डोर बिन्हें सौंप देओ और तुम  ते जो बन पड़े जितनो हो सके, जितनी सामर्थ्य होय उतनो कर देओ । बाकी वे जाने बिनको काम जाने। तो हमने तो बाके हाथ डोर सौंप दई है। और बिट्टन रानी तू सुखी रहबो चाहे तो तोय ऊ जे ही करनो चहिए। जाने बिगाड़ी है वो ही बनाएगो।

डाकिया डाक लाया

 सफर जारी है...९९०

११.०७.२०२२

डाकिया डाक लाया ......

चिठिया हो तो सब कोई बांचे भाग्य न बांचो जाए पर अब तो बांचने को चिठ्ठी पत्री ही नहीं आती , डाकिया ही नहीं आता, तो चिठ्ठी कहां से आती जिसे बांचा जा सकता था।, भाग्य बांचना तो दूर की बात है । चिठ्ठी आए न आए पर फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, ट्विटर पर संदेश थोक के भाव आते हैं। आश्चर्य तो इस बात का है कि वे भी चोरी के हैं, खुद नहीं लिखे जाते इसलिए दूसरों के घर से आई मिठाई की माफिक इधर से उधर फारवर्ड कर दिए जाते हैं। यही सोच कर खुश होते रहते हैं कि आज हमने इतने अधिक संदेश फॉरवर्ड कर दिए यानी अपनी गांठ से कुछ नहीं गया और वाहवाही भी मिल गई। टेक्नोलॉजी ने लाल रंग के डाक बक्सौ लेटर बाक्स और डाकिए की छुट्टी कर दी। डाकिए बेचारे का कोई अता पता नहीं तो उस पर निबंध कौन लिखे। निबंध की तो छोड़ो, चिठ्ठी पत्री तक कोई नहीं लिखता कि उन्हे पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय और लिफाफे की जानकारी हो। जब लिफाफा ही नहीं जानते तो उस पर टिकट चिपकाने का संदर्भ तो और नहीं जानते होंगे। पोस्टकार्ड का प्रयोग मरे गिरे के समाचार के लिए होता था कि कोना फटा देखकर दूर से ही पता चल जाए कि कहीं कुछ गड़बड़ है। ऐसे पोस्टकार्ड सूचना पढ़ने के बाद घर से बहर ही रख दिए जाते , उनका प्रवेश घर के अन्दर नहीं था। अब इन पोस्ट कार्डों की जगह फोन ने ले ली है और कहीं कहीं तो फोन से संदेश देकर, लिखकर उसे सार्वजनिक कर दिया जाया है कि जिसकी मर्जी हो पढ़े और सांत्वना बधाने और सामाजिकता निभाने चला आए नहीं तो कोई बात नहीं।

        मौत के अवसर पर भी शोक प्रकट करने आये लोगों को चाय पानी बिस्किता की व्यवस्था का भला क्या औचित्य, पर अब सब बदल सा गया है। ब्याह शादी,जन्मोत्सव के निमंत्रण पत्र को छपवाने की आवश्यकता पर अब प्रश्नचिह्न लगने लगा है अरे जब सब वर्चुअल ही भेजना है तो कार्ड को भी वर्चुअल ही डिजायन कर उसे सार्वजनिक कर दो, प्रेस वाले के चक्कर काटने की जरुरत अब नहीं रही। चिठ्ठी न कोई संदेश, चिट्ठियां हो तो सब कोई बांचे, डाकिया डाक लाया, कबूतर जा जा जा मेरे प्यार की पहली चिठ्ठी साजन को दे आ , संदेशे आते हैं जैसे गाने बहुत पीछे छूट गये। अब इनकी आवश्यकता ही कहां रही। ये सब तो पिछले जमाने की यादें जैसी हैं। हालांकि ये दौर बीत चुका है लेकिन पाती की आवश्यकता तो आज भी अनुभव की जा रही है, न की जा रही होती तो राजस्थान से पाती लिखो की जबरदस्त मुहिम क्यों छेड़ी जाती। बिटिया तो आज भी अपने माता पिता को, माता पिता अपने बाल गोपालों को, भाई अपनी बहिन को बहिनें अपने भाइयों को और हम सभी पाती तो लिखते ही हैं फिर भले ही तकनीक ने उसके मोड बदल दिए हों। क्या वाकई फोन और आधुनिक उपकरणों ने पाती की जगह ले ली है या इन की तुरत फुरत सुविधा और यातायात के तेजी से बदलते साधनों ने पाती लिखने की आवश्यकता को लगभग खत्म सा कर दिया है। पहले सात समंदर पार से गुड़ियों के बाजार से गुड़िया लाने और पापा जल्दी आए जाने जैसे गाने का अब कोई औचित्य रहा नहीं। जैसी मर्जी गुड़िया चाहो ऑनलाइन मंगा सकते हो और सात समंदर पार बैठे पापा भैया से वीडियो काल से बात कर सकते हो, अब दूर रहा ही कौन जिसे चिठ्ठी पत्री लिखने की नौबत आ पड़े। अब तो सब आपके हाथ में जो छोटा सा फोन सेल नाम का यंत्र है उससे दुनिया मुठ्ठी में कर सकते हो।

        चिठ्ठी पत्री की जो शुरुआत यहां सब ठीक है आशा है वहां भी सब कुशल से होती थी, जो संबोधन और अभिवादन दिए जाते थे, वे तो सब हवा हवाई हो गए, अब तो पिता भी डीयर फादर हो गए, पति पत्नी हाय हनी और डार्लिंग में सिमट गए, आपका आज्ञाकारी, विनीत पूछ दबा कर भाग गए।अनौपचारिकता रही ही कहां। वे ज़माने लद गए जब केवल अपनी बात ही नहीं लिखी जाती थी, आस पड़ोस की दादी चाची ताई मौसी जैसे रिश्तों की कुशलता बताने और पूछने का रिवाज था। अरे ये तो छोड़ो, मानुष की बात थी, घर के गाय कुत्ते घोड़े भैंस तोता भी चिठ्ठी के विषय होते थे। पर ये सब पुरानी बात और नोस्टोलीजिया कह कर छोड़ दिया जायेगा। अब इन्हें कौन समझाए कि तकनीक मोड भर बदलती है, विषय वस्तु तो आप क्रिएट करते हो, भावनाओं पर किसी का पहरा कहां होता है, कोई भी नई खोज उन्हें थोड़े ही रोक सकती है। सच तो यह है कि अब आप के इतने इतने आभासी मित्र हो गए हैं, इतनों इतनों से जानपहचान हो गई है, आपको किसी दूसरे की जरुरत ही महसूस नहीं होती। पर ध्यान रखिएगा कि अपने तो अपने होते हैं बाकी सब सपने होते हैं। तो मिलते रहिए अपनो से, लिखते रहिए उन्हें चिठ्ठी पत्री, लेते रहिए उनकी राजी खुशी। कहीं दुनियावी भीड़ में आपके सारे रिश्ते अपनी पहचान न खो दें। आप आभासी दुनिया में मस्त रह आएं और वे रिश्ते आपके संबंधी कहीं भीड़ में बिल्ट जाए और फिर खोजे से भी न मिलें। जो चीजें आउट ऑफ साइट हो जाती है वो आउट आफ माइंड भी हो जाती है। वैसे भी आपने इन्हें दूर के रिश्ते मान लिया है, ममेरे,तयेरे, मौसेरे, चचेरे, फुफेरे रिश्तों को कजिन में निबटा दिया है। आपके सब से कनसर्न ही खत्म होते जा रहे हैं। आप ग्लोबल होने की बात जरुर करते हों पर दिल पर हाथ रख कर सोचिएगा करा आप अपनों के कितने करीब हैं, ऐसा न हो कि आधी छोड़ पूरी को धाबे, आधी मिले न पूरी पावे का हाल हो जाए। तो जुड़े रहिए अपनो से, अपने के अपनो से लिखते रहिए उन्हें चिठ्ठी पत्री, खोलते रहिए अपने मन और लेते रहिए उनकी राजी खुशी।

ये छोटे छोटे पड़ाव बहुत सुखद है

 सफर जारी है....९८९

१०.०७.२०२२

ये छोटे छोटे पड़ाव बहुत सुखद है........

बालकों का परदेश से घर आना जितना सुखद होता है चाहे वह एक छोटा अंतराल ही क्यों न हो, वापिसी उतनी ही कारूनिक होती है. घर जो खुशियों से भर उठता है, दीवारें, खिड़कियां छत से रसोई आंगन बाग बगीचे सब उदासी से भर उठते हैं, और तो और आस पड़ोस की गहमा गहमी हल्की पड़ जाती है। कल तक जो चेहरे उमग रहे थे वह एमपी अंसुवाए से हो जातें हैं, आंखों के कटोरे छलछलाने को आतुर होते है, पर उन्हें डपट दिया जाता है बाबरे हो रहे हो क्या, बालक नौकरी पर जा रहे हैं, उसे ढाढस बंधाओ, ये क्या बचपना कर रहे हो। उसके जाने की तैयारी में सहयोग करो। कोई ज़रूरी चीज छूट न जाए, वो तो बालक हैं, नई जगह देखने के उत्साह में कई बार छोटी छोटे ज़रूरी चीजें नजर अंदाज़ कर जाते हैं। घर से दूर जाना उन्हें भी उतना ही सालता है, घर उनका भी छूटता है, बचपन की यादें उन्हे भी परी लोक में ले जाती है, बारे बहिनों की शरारतें उनके मन मस्तिष्क को भी आलोदित करती हैं पर जाना तो है ही। फिर पूरा विश्व हर अपना घर है। उदार चरितानाम तु वसुधैव कुटुंबकम् का पाठ भी तो आपने ही पढ़ाया था कि सारा जहां अपना ही है। सब जगह घूमो देखो वहां की तकनीक सीखो, जी जो जहां से अच्छा मिले, उसे लेते चलो। वह भी ज़रूरी है। सब अपने ही हैं। छोटे चित्त के मत बनो, ये मेरा ये पराया ऐसा तो छोटे चित्त वाले सौंपते है। बंजारों की तरह बनो। सबको देना सीखो, बांटना सीखो, सुगंध सीमित दायरे में बंध कर नहीं रह सकती, उसे सबको सुवासित करना होता है।

खुला आसमान, विस्तृत धारती, ऊंची ऊंचे पर्वतो की चोटियां , नीलए समुंदर, दिगदीगंत सब तुम्हारे  ही है । तो सब को देखो, सबका आनंद लो, तो जब जितने समय जहां हो वहां पूरी तरह रहो, वहां के हो रहो। जैसा देश वैसा भेष रखो। बस फिर तो लौटना ही है। सबको लौटना ही होता है भला अपना देश गांव किसे प्यारा नहीं होता। यात्रा में वापिसी निश्चित होती है जैसे उड़ जहाज को पंछी फिर जहाज पे आबे, मेरो मन कहां अनत सुख पाबे। सूर ऐसे ही थोड़े लिख गए हैं। यात्रा यात्रा होती है, जीवन भी तो एक यात्रा है। मंजिल तक पहुंचने के बीच अनेक पड़ाव होते हैं जहां कुछ देर रुका जाता है, आनंद लिया जाता है, सबसे मिला जुला जाता है, यात्रा के प्रसंग सुनाए जाते हैं, भावनाएं अनुभूतियां कही, बांटी और शेयर की जाती हैं,पीपीएल फोटो शोटो लिए जाते हैं, खाया पिया घूमा सूमा जाता है। कहने को सब किया जाता है पर बहुत कुछ ऐसा फिर भी रह जाता है, बिटबीन द लाइंस मिसिग रह जाता है जिसे शब्दों में नहीं बांधा जा सक्ता। ढेर सामान की पोटली बांध दो फिर भी कितना कुछ छूट जाता है। हजार लाख बार सीने से लगा लेने, पुचकार लेने के बाद भी मन कहां भरता है माता पिता का, वह तो पीछे पीछे सरपट दौड़ लगाता है। जातें हैं तभी तो वापिसी होती है। तो बालक बच्चे आते जातें रहें, जहां रहें खुशियां उनके आसपास मंडराती रहें। मन भारी है पर कोई नहीं हंसी खुशी विदा करते हैं सी आफ करते हैं। ईश्वर तुम्हें स्वस्थ और प्रसन्न रखे। कहा भए जो बीछुरे तो मन मो मन साथ, गुड़ी उड़ी आकाश में तऊ उडावक हाथ ।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...