Tuesday, July 19, 2022

सौभाग्य न सब दिन सोता है

 सफर जारी है....937

18.05.2022

शिक्षा के केंद्र रहे नालन्दा की भूमि अहर्निश प्रणम्य है और उस पर गया और बौद्ध गया जाने का यात्रा लाभ और वह भी बुद्ध पूर्णिमा के दिन मिल जाए तो यही लगता है कुछ पुण्य उदय हुए होंगे।कब से मन में था कि गया जाकर दोनों कुल के पितरों का पिंड दान कर सकें।ईश्वर ने ज्यादा प्रतीक्षा नहीं कर बाई।वैचारिक संगोष्ठी से मन तो वैसे

 ही उत्फुल्ल था और जब अलसुबह इस कार्यक्रम की जानकारी मिली तो पांचों घी में और सिर कढ़ाही में था।मारे उत्साह के रात भर नींद ही आंखों से कोसो दूर चली गई औरबस रात सपनों में बीत गई।

 पटना से गया लगभग135 किलोमीटर है ट्रेवलर में लद कर हम नवरत्न सफर पर चल दिये।एक से एक बढ़कर विद्वान और बिल्कुल मौलिक और अनछुए विषयों पर चर्चा इस यात्रा में खूब तड़का लगाया।गरम और नरम दल अपने अपने पक्ष को बखूबी रखते और जैसे ही बात का रुख किसी विवाद की तरफ मुड़ता, न्यायमूर्ति तुरन्त उसे एक नए विषय में बदल देते।पासंग मारने की तो जरूरत ही नहीं पड़ी।सुन्दरकांड की सारगर्भित व्याख्या,वरिष्ठ पत्रकार के चुभते सीधे सीधे सवाल, सहयोग परिषद के संरक्षक की संतुलित टिप्पणी, अपना अपना पक्ष रखते दो प्रमुख रचनाकारों की जुगलबंदी ने खूब समा बांधा।क्या नहीं था इस यात्रा में कहानी, कविता, गजल, शास्रीय संगीत, रवींद्रनाथ टैगोर के गीत वह भी सुर और ताल में, सच में बहुत यात्राएं की होंगी पर ये सफर कुछ हट के था।अपने अपने विषय के महारथी विद्वानों को सुनना काफी लाभदायक रहा।हम तो चुप्प ही श्रोता बने रहे।अब इतने लोग कहने वाले तो एक आध गम्भीर श्रोता भी तो जरूरी था।

 आयोजक भाई की निगाहें तो बिल्कुल सीसीटीवी की माफिक काम कर रही थीं कि कब किसको फल फलारी चाहिए कब किसका प्यास से तड़क रहा है और किसे कब चाय की तलब लग रही है,जब पेट में चूहे उपद्रव मचाने लगे तो गर्मागर्म पूड़ी आलू सब्जी और जलेबी की व्यवस्था हो गई।खा पी के निच्चू हो के सोचाचलो अब वो काम तो कर लें जिसके निमित्त आये हैं।बड़े विधिविधान से पूरी मंडली ने अपने अपने पितरों को विधि विधान से गया में स्थापित किया।और जब पंडित जी तीन पीढ़ियोंके नाम पूछ रहे थे और याद न आने पर ब्रह्मा विष्णु महेश या गंगा जमुना सरस्वती का नाम लेने की छूट दे देतातो लगा सच में हमारे पूर्वज देवी देवता ही तो हो गए हैं।कोई रिश्ता ऐसा नहीं था जिसका उल्लेख नहीं हुआ हो।रिश्तों की दृष्टि से कितने भरे पूरे हैं हम।और जिन नामों से इतनी चिपक है वह तो दूसरी पीढ़ी तक को याद नहीं रहता।सभी साथी बहुत ही विचारवान और तार्किक थे पर यहां सब आस्था और विश्वास के साथ पूजा सम्पादित कर रहे थे।मैं बार बार सभी के चेहरे पर पसरी शांति और आनन्द के भाव को चोर निगाहों से देख लेती।संकल्प तो एक लेकर आया था लेकिन उनके शूभ संकल्प ने सबको अपने रंग में भरंग लिया।सभी की चाह बलबती हो उठी और अंत में सभी ने गया में पिंड भर ही दिए।सच।ये ऐसा लगा मानो पितर साक्षात आकर हमें आशीर्वाद दे रहै हों।

 अगला पड़ाव बौद्ध गया था, निर्वाण पा बुद्ध तो हम सबके लिए पूजनीय हो गये हैं।कितनी शांति है उनके चेरेहरे पर जैसों सबको अपना सा बनने की सीख दे रहै होंबुद्धम शरणम गच्छामि।धम्मम शरणम गच्छामि,संघम शरणम गच्छामि केवल तीन सूत्र वाक्य ही नहीं, ये जीवन की सार्थकता है।पर बुद्धत्व सबके हिस्से तो नहीं आता फिर भी बोधि बृक्ष में नीचे बैठने से छूने से कुछ तो शांति मिलती ही है।ये सारे अवसर जिस के ब्याज से हाथ आये उसका उल्लेख किए बिना बात पूरी कैसे होगी भला।आजादी के अमृत महोत्सव के चलते स्वाधीन भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण के विविध आयाम विषयक संगोष्ठी में संस्कृति के वैश्विक रूप को तो उकेरा ही गया साथ ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओंपर सार्थक चर्चा थी।इसी क्रम में हनुमान चालीसा के अधिकृत विद्वान पूज्य प्रदीप भैया और सुंदरकांड पर अपनी व्याख्याओं से सबके संदेहों कक निवारण करने वाले आदरणीय मनोज जी से परिचय खाते में जुड़ गया।सच में इस शैक्षिक यात्रा के कई संदर्भ बहुत मौजूं हैं।बस मैं तो इतना ही कह सकती हूँ कि संतों की संगत सदैव सुखकारी होती है और सारे दुखों को स्नेहिल स्पर्श से ही हर लेती हैं।हम बथुआ को तो गेंहू के संग पानी लग गया, बस इतने में ही भर पाये।मिलते रहे ऐसे सौभाग्य, बस ऐसे क्षणों को तो साड़ी के पल्लू में घिर्र के बांधने कक मन होता है।

रिश्ते छीज रहे हैं

 सफर जारी है.....936

17.05.2022

अनाज साफ करते फटकन और आटा पिसाते छीजन  सुना था पर रिश्तों में भी सीलन और छीजन आ जाती है, रिश्ते धुंधुआते हैं,रिश्तों में काट फांस होती है, रिश्तों की बुनाबट में यदि फंदे ही गलत पड़ जाए तो सारी बुनाई ही गलत हो जाती है ।रिश्तों को सींचना होता है, उन्हें खाद पानी देना होता है,गुड़ाई करनी होती है, खर पतवार उखाड़ फेंकने होते हैं।कभी नरमाई तो कभी गरमाई से काम लेना होता है ।उन कोमल तंतुओं को बहुत संभाले रखना होता है जिनके कारण ये रिश्ते जुड़ते हैं,ये अनुभव भी कर लिया।

    रिश्ते जोड़ना एक बात है और उन्हें संभाले रखना दूसरी।जो रिश्ते मां की कोख से मिलते हैं सहोदरों के, उसमें भी संतुलन बनाये रखना होताहै तो फिर वे रिश्ते जो एक नए सम्बन्धके साथ मिलते हैं उन्हें साधे रखना तो और टेढी खीर है।ये मुंह फुलाये रिश्तों को निभाने में तो पूरी उम्र बीत जाती है पर उनके मुंह ही सीधे नहीं होते।किसी न किसी बात को लेकर रूठा मटकी चलती ही रहती है।कितना भी संभल कर चलो पर हड़का तो किसी भी बात पर जा सकता है।रिश्तों की गरिमा तार तार की जा सकते है और तो औरउसे दो फाड़ भी किया जा सकता है।रिश्ते की दुनिया केवल परिवार तक ही सीमित नहीं होती।आप चाहे जहां रिश्ते बना सकते हैं, उन्हें निभा सकते हैं बस शर्त एक ही होती है कि आप उनसे अपेक्षाएं न जोड़ें।रिश्तों में दरार आने की एक बड़ी वजह अपेक्षा है।इसलिए आप पड़ोसी धर्म और दोस्ती के रिश्ते अच्छी तरह निभा ले जाते हो क्योंकि कर के भूल जाते हो, बस इसलिए कर देते हो कि आपको करना अच्छा लगता है।सूद तो दूर की बात,मूल की भी इच्छा नहीं रखते।बस कर दिया सो कर दिया।

   याद करो आप किसी गरीब की बेटी की शादी में जितना मर्जी सहयोग कर दो पर उसे कभी जुबान पर नहीं लाते, उसका जिक्र भे नहीं करते क्योंकि आप उस अपनी मर्जी से करते हैं, करने का कोई दबाब नहीं होता।आपसे कोई कहता भी नहीं है, बस आपको उचित लगा और आपने कर दिया।तो सौ बातों की एक बात यह है कि रिश्ते वहां आसानी से निभ जाते हैं जहां मन में गुंजायश हो, उदारता हो, सामने वाले की परिस्थिति समझ आती हो।ये नहीं कि दस पैसे का किया और दासियों बार इसे गाते रहें, दस लोगों को सुनाते रहे।अरे सम्बाई नहीं तो मत करते।और जो तुम न करते तो कोई दूसरा करता,अगले का काम तो हो ही जाता।सच तो यह है कि दिलों में गुंजायश ही बाकी नहीं रही ।रिश्तों को ऐसा मोड़ तरोड जगह जगह से पिचका दिया कि बस क्या कहें।सारे संदर्भ अर्थ आधारित ही नहीं हुआ करते।व्यवहार बड़ी बात है तो रिश्तों को निभाना है तो खुटसयाने मत बनो।भाषा की गरिमा बनाये रखो।किसी पर चौबीस घण्टे लदे ही मत रहो।उसे व्यक्तिगत स्पेस दो।उसकी भी पसन्द नापसन्द हो सकती है।उसे भी कुछ अच्छा बुरा लग सकता है।उसकी भी इच्छा अनिच्छा हो सकती है।

   रिश्तों को खाद पानी देना जरूरी है।उन्हें पनपने के लिए स्पेस देना जरूरी है, कभी कभी ढील देना जरूरी है।कोई सम्बन्ध न रखना चाहे तो उससे दूरी भी जरूरी है।रिश्तों के ताने बाने ठीक से डालना जरूरी है।जो रिश्ते स्वार्थ आधारित होते हैं उनकी उम्र लंबी नहीं हुआ करती।वे जल्दी दम तोड़ देते हैं।यथार्थ में तो वे पहली चोट में ही टूट गए होते हैं पर बाहरी दिखाबे के लिए हम उन्हें आरोपित किये रहते हैं।मृतजीवी रिश्तों के मुख में गंगा जल की बूंदे टपकाते रहते हैं।चलो हम कम से कम रिश्तों को जीते तो हैं, लड़ते हैं तो क्या बाहरी के सामने तो सब एक हैं।चिंता है आने वाली पीढी की जब वे अकेले होंगे तो चाचा ताऊ के रिश्ते कहीं समाप्त न हो जाएं, यदि सब अच्छा ही चल रहा था तो घर के बूजुर्ग वृद्धाश्रम में कैसे पहुंच गए, इकलौते बालक को चचेरे फुयेरे तयेरे के अर्थ संन्दर्भक्यों पता नहीं रहते, जब बच्चों के पिता उसके सुख के लिए बिना सास का घर वर तलाशते हैं,उसे पट्टी पढ़ाते हैं कि तू अपना और अपने पति का देख, तुझे सास के कुनबे से क्या लेना देना।तो रिश्ते तो बिगड़ेंगे ही, अब तो सहेजे भी नहीं जा सकते।वे लगातार छीज रहे है और उन्हें छीजना भी चाहिए क्योंकि उसकी उचित परवरिश नहीं हो पाती, उसे बित्ते भर जमीन भी नहीं मिलती,बस सब पर एक ही बात हावी है कि हो सके तो रिसते छीजते रिश्तों को बनाने की एक कोशिश कर ली जाए।

बहुत जरूरी है प्रतिबद्धता

 सफर जारी है....936

16.05.2022


जीवन जैसा भी हो ,उसे जीना होता है।कुछ लोग जीते हैं और कुछ इसे काटते सा हैं।जब पूछो कैसे हो भाई तो घिसा पिटा सा एक ही जबाब मिलता है बस समय काट रहे हैं।और जो पूछो भाई क्या हुआ तो उनके पास मौसम से लेकर तबियत तक की इतनी शिकायतें होती हैं कि कई बार भरम हो जाता है ये मुसीबतों से घिरे हुए हैं या मुसीबतें इनसे घिरी हुई हैं।इन्हें झींकना बहुत पसंद है।छोटे छोटे ढेरों खुशी के अवसर आते हैं जिन्हें पकड़ा जा सकता है और हंसी खुशी जीया जा सकता है।पर नहीं, कुछ का स्वर तो हमेशा शिकायती और उलाहने तायने से भरा रहता है।उनके स्वर से खीझ सी टपकती रहती है।ऐसा लगता है दुनिया भर की कटाह इन पर ही पड़ गई है।जबकि सच तो यह है कि कम साधनों में भी खुशी खुशी जीया जा सकता है।खुशियां साधनों की मोहताज नहीं हुआ करती।हां ,आपका दृष्टिकोण जरूर मायने रखता है। अब आपने आदत ही बना ली हो कि हमें तो साब रोते पीटते ही जीना है तो उसमें भला कौन हथेली लगा सकता है। 

जो मिला, वह आंख तर नहीं आता और जो पास नहीं,उसकी कमी हमेशा खलती रहती हैं कि देखो, सब खूब आराम से हैं, बस हम ही मुसीबत के मारे हैं या यों कह लीजिए कि पराई थाली का भात हमेशा मीठा लगता है।और कहीं वह थाली उन्हें मिल जाये तो मीन मेख उसमें भी खोज लिए जाते हैं कि नेक ऐसा और होता।ये नेक उनका पीछा कभी नहीं छोड़ता सो वे किसी भी अवसर को एन्जॉय नहीं कर पाते। कुछ की तो दृष्टि अगले के सुख पर ही लगी रहती है कि उसे देखो कैसे हंस रहा है, ठहाके लगा रहा है, खूब मौज में है, उसकी तो पांचों घी में और सिर कढ़ाही में है।यानी तुम्हारी कुढ़ने की आदत है तो तुम किसी भी बहाने से कुढ़ना शुरू कर सकते हो।अब तुम्हें सबसे कटे कटे रहने की आदत है तो अगला इसमें क्या कर सकता है भला।उसे सबसे मिलना जुलना पसन्द  है,वह प्रसन्नचित्त रहता है और आपका सारा समय उसे खुश देख कुढ़ने में ही चला जाता है।सबका अपना अपना जीवन है, सबका जीने का तरीका अलग है।आपका अपना जीवन है।उसे आप कैसे जीते हैं ,यह आप पर निर्भर करता हैं।सुख दुख तो सबके साथ  हैं, थोड़ी बहुत ऊंच नीच भी सबके साथ लगी रहती है।कोई परम् सुखी नहीं है।सुना तो होगा कोई तन दुखी कोई मन दुखी कोई पल पल रहत उदास, थोड़े थोड़े सब दुखी और सुखी राम के दास ।अब कुछ सुख दुख, कठिनाई मुसीबत को जीवन का अनिवार्य हिस्सा मानते हैं और उसे इसी भाव से लेते हैं।उसे बहुत व्हेटेज नहीं देते।लो तुम आ गए, बैठ जाओ एक तरफ, पड़े रहो कोने में, अभी टैम नहीं है तुम्हें अटेंड करने का।वे बड़ी से बड़ी घटना सुखद हो या दुखद, सामान्य रूप से लेते हैं तो कुछ इसे तिल का ताड़ बना देते हैं।कुछ छोटे से छेद को वहीं का वहीं रफू कर देते हैं और कुछ उसे अंगुली से फाड़ और चौड़ा कर देते हैं।फिर उसे लेकर रोते झींकते रहते हैं।

जीवन जीने का सबका अपना अपना तरीका है।ये आप पर निर्भर करता है कि आप किसी परिस्थिति के प्रति कैसे रिएक्ट करते हैं, उसके समाधान सोचते हैं या समस्या को मेग्नीफाई करते हैं, बढा चढ़ा कर सबके सामने गाते हैं, उसका इतिहास बताना शुरू कर देते हैं।अब समस्या है ये तो सबको पता है पर उससे कैसे सिलटा जा सकता है उस ओर सोचना जरूरी है।जीवन को जीने के लिए आपकी  प्रतिबद्धता बहुत जरूरी है।आपके उसूल बहुत जरूरी हैं, आप किस तरह समस्या को लेते हैं ।उसे हउआ बनाकर या उसका विश्लेषण कर के।जो लोग छोटे छोटे स्वार्थों के वशीभूत हो जाते हैं, अकर्मण्य होते हैं, हमेशा दूसरों पर डिपेंडेंसी रखते हैं, केवल समस्या का बयान करते हैं ,करने के नाम इधर उधर रस्ता बदल लेते हैं ,उन्हें हर बाधा बड़ी ही लगती है।उनका समस्या के निदान से कोई सरोकार नहीं होता।बस हो हल्ला मचाकर लाइम लाइट में बने रहते हैं और जब सब सिलट जाए तो सबसे पहले आकर यश लूटते हैं कि हमने तो पैले ही कई साब।

तो दुनिया रंग बिरंगी है दोस्तो, आपका मनोबल बढाने वाले कम और धकेलने वालों की संख्या अधिक है।संभल कर रहिये और चलिए।जीवन को भरपूर जीने के लिए प्रतिबद्धता बहुत जरूरी है तो चाहे जो करो छोटा या बड़ा, उसके हर पहलू को समझो, नहीं आता तो सीखो,पूछो, सलाह लो, पर करो जरूर।चार बार गिरेंगे तो क्या फिर उठकर खड़े हो जाएंगे।ठोकरें भी तो सिखाती ही हैं।कभी न कभी तो सीख ही जायेंगे।बस, बढ़ना है आगे बढ़ना है और पूरी प्रतिबध्दता से बढ़ना है।आगे होय सो देखी जाएगी।सफर जारी है....936

16.05.2022

बहुत जरूरी है प्रतिबद्धता......

जीवन जैसा भी हो ,उसे जीना होता है।कुछ लोग जीते हैं और कुछ इसे काटते सा हैं।जब पूछो कैसे हो भाई तो घिसा पिटा सा एक ही जबाब मिलता है बस समय काट रहे हैं।और जो पूछो भाई क्या हुआ तो उनके पास मौसम से लेकर तबियत तक की इतनी शिकायतें होती हैं कि कई बार भरम हो जाता है ये मुसीबतों से घिरे हुए हैं या मुसीबतें इनसे घिरी हुई हैं।इन्हें झींकना बहुत पसंद है।छोटे छोटे ढेरों खुशी के अवसर आते हैं जिन्हें पकड़ा जा सकता है और हंसी खुशी जीया जा सकता है।पर नहीं, कुछ का स्वर तो हमेशा शिकायती और उलाहने तायने से भरा रहता है।उनके स्वर से खीझ सी टपकती रहती है।ऐसा लगता है दुनिया भर की कटाह इन पर ही पड़ गई है।जबकि सच तो यह है कि कम साधनों में भी खुशी खुशी जीया जा सकता है।खुशियां साधनों की मोहताज नहीं हुआ करती।हां ,आपका दृष्टिकोण जरूर मायने रखता है। अब आपने आदत ही बना ली हो कि हमें तो साब रोते पीटते ही जीना है तो उसमें भला कौन हथेली लगा सकता है। 

जो मिला, वह आंख तर नहीं आता और जो पास नहीं,उसकी कमी हमेशा खलती रहती हैं कि देखो, सब खूब आराम से हैं, बस हम ही मुसीबत के मारे हैं या यों कह लीजिए कि पराई थाली का भात हमेशा मीठा लगता है।और कहीं वह थाली उन्हें मिल जाये तो मीन मेख उसमें भी खोज लिए जाते हैं कि नेक ऐसा और होता।ये नेक उनका पीछा कभी नहीं छोड़ता सो वे किसी भी अवसर को एन्जॉय नहीं कर पाते। कुछ की तो दृष्टि अगले के सुख पर ही लगी रहती है कि उसे देखो कैसे हंस रहा है, ठहाके लगा रहा है, खूब मौज में है, उसकी तो पांचों घी में और सिर कढ़ाही में है।यानी तुम्हारी कुढ़ने की आदत है तो तुम किसी भी बहाने से कुढ़ना शुरू कर सकते हो।अब तुम्हें सबसे कटे कटे रहने की आदत है तो अगला इसमें क्या कर सकता है भला।उसे सबसे मिलना जुलना पसन्द  है,वह प्रसन्नचित्त रहता है और आपका सारा समय उसे खुश देख कुढ़ने में ही चला जाता है।सबका अपना अपना जीवन है, सबका जीने का तरीका अलग है।आपका अपना जीवन है।उसे आप कैसे जीते हैं ,यह आप पर निर्भर करता हैं।सुख दुख तो सबके साथ  हैं, थोड़ी बहुत ऊंच नीच भी सबके साथ लगी रहती है।कोई परम् सुखी नहीं है।सुना तो होगा कोई तन दुखी कोई मन दुखी कोई पल पल रहत उदास, थोड़े थोड़े सब दुखी और सुखी राम के दास ।अब कुछ सुख दुख, कठिनाई मुसीबत को जीवन का अनिवार्य हिस्सा मानते हैं और उसे इसी भाव से लेते हैं।उसे बहुत व्हेटेज नहीं देते।लो तुम आ गए, बैठ जाओ एक तरफ, पड़े रहो कोने में, अभी टैम नहीं है तुम्हें अटेंड करने का।वे बड़ी से बड़ी घटना सुखद हो या दुखद, सामान्य रूप से लेते हैं तो कुछ इसे तिल का ताड़ बना देते हैं।कुछ छोटे से छेद को वहीं का वहीं रफू कर देते हैं और कुछ उसे अंगुली से फाड़ और चौड़ा कर देते हैं।फिर उसे लेकर रोते झींकते रहते हैं।

जीवन जीने का सबका अपना अपना तरीका है।ये आप पर निर्भर करता है कि आप किसी परिस्थिति के प्रति कैसे रिएक्ट करते हैं, उसके समाधान सोचते हैं या समस्या को मेग्नीफाई करते हैं, बढा चढ़ा कर सबके सामने गाते हैं, उसका इतिहास बताना शुरू कर देते हैं।अब समस्या है ये तो सबको पता है पर उससे कैसे सिलटा जा सकता है उस ओर सोचना जरूरी है।जीवन को जीने के लिए आपकी  प्रतिबद्धता बहुत जरूरी है।आपके उसूल बहुत जरूरी हैं, आप किस तरह समस्या को लेते हैं ।उसे हउआ बनाकर या उसका विश्लेषण कर के।जो लोग छोटे छोटे स्वार्थों के वशीभूत हो जाते हैं, अकर्मण्य होते हैं, हमेशा दूसरों पर डिपेंडेंसी रखते हैं, केवल समस्या का बयान करते हैं ,करने के नाम इधर उधर रस्ता बदल लेते हैं ,उन्हें हर बाधा बड़ी ही लगती है।उनका समस्या के निदान से कोई सरोकार नहीं होता।बस हो हल्ला मचाकर लाइम लाइट में बने रहते हैं और जब सब सिलट जाए तो सबसे पहले आकर यश लूटते हैं कि हमने तो पैले ही कई साब।

तो दुनिया रंग बिरंगी है दोस्तो, आपका मनोबल बढाने वाले कम और धकेलने वालों की संख्या अधिक है।संभल कर रहिये और चलिए।जीवन को भरपूर जीने के लिए प्रतिबद्धता बहुत जरूरी है तो चाहे जो करो छोटा या बड़ा, उसके हर पहलू को समझो, नहीं आता तो सीखो,पूछो, सलाह लो, पर करो जरूर।चार बार गिरेंगे तो क्या फिर उठकर खड़े हो जाएंगे।ठोकरें भी तो सिखाती ही हैं।कभी न कभी तो सीख ही जायेंगे।बस, बढ़ना है आगे बढ़ना है और पूरी प्रतिबध्दता से बढ़ना है।आगे होय सो देखी जाएगी।

पाठशाला बोल रही है

 सफर जारी है....935

15.05.2022


 सब बोलते हैं, फूल खिलखिलाकर बहुत कुछ कह जाते हैं, रात्रि की नीरव चांदनी भी कुछ कुछ कह जाती है तो भला पाठशाला की दीवारें, खिड़कियां, खेल का मैदान, कक्षा कक्ष का बोर्ड कुछ नहीं कह सकता क्या।अरे भाई, अब वो दौर धीरे धीरे अतीत में बदल रहा है जब पूरे दो साल तक इन पाठशालाओं पर कोरोना का काला साया था, बिल्कुल नीरव और सुनसान हो गई थीं पाठशाला, कक्षा कक्ष सांय सांय भाँय भाँय करते थे, खेल के मैदान बच्चों की पदचाप को तरस गए थे, वह बड़ा सा प्रवेश द्वार बिल्कुल मौन हो गया था।बड़ी और भव्य बिल्डिंग अपनी जगह थी लेकिन उसमें पढ़ने वाले गायब थे, सब जैसे ऑन लाइन में सिमट कर रह जिक था।ब्लैक व्हाइट बोर्ड अपने स्थान पर थे पर उसका प्रयोग करने वाले अध्यापक घरों में कैद थे, बागबानी खूब खिल रही थी पर उसे देखने और ललचाती निगाहों से तोड़ने के लिए उत्सुक बालगोपाल नदारद थे।बड़ा सा घण्टा अपनी जगह टँगा हुआ था, लेकिन टन टन ध्वनि करने वाला चौकीदार घर में सोया पड़ा था।अब वहां किसी की उपस्थिति ही नहीं थी जिसे प्रार्थना सभा में, कक्षा में बुलाने और आधी पूरी छुट्टी के लिए घण्टी टनटनानी पड़े।सब बिल्कुल व्यवस्थित तरीके से मौजूद था पर वे नन्हे मुन्ने बाल गोपाल जिनके लिए ये सारा सरंजाम था, वे ही गायब थे।किसी भी शैक्षिक संस्था के मूल में तो विद्यार्थी ही होते हैं बाकी तो सब उनके सहयोग के लिए ही होता है फिर चाहे अध्यापक हों, प्रधान अध्यापक हों, प्रशासन हो,क्लेरिकल स्टाफ हो,चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हो बड़ा सा पुस्तकालय ,प्रयोगशालाएं और विहंगम क्रीड़ा स्थल।बस जब मूल ही गायब तो सब बेकार सा लगने लगता है।

विद्यार्थी विद्यालय की, संस्था की आत्मा है।उसे मूल में रखकर ही सारे सरंजाम किये जाते हैं तो जैसे ही अध्ययन अध्यापन ऑफ़ लाइन हुए, प्रत्यक्ष शिक्षण प्रारम्भ हुआ, सब बदल गया है।वे मनहूस से कक्षा कक्ष कैसे जीवंत से हो गए हैं, व्हाइट बोर्ड लिप पुत गये हैं, किताबें लगातार पढ़ी जा रही हैं, पुस्तकालय की शोभा लौट आई है।किताबें विद्यार्थियों के हाथों और आंखों की संस्पर्श पा कैसी निखर गई हैं। सूने पड़े वीरान छात्रावास फिर से आबाद हो गए हैं।अध्यापकों की जिजीविषा शक्ति जैसे दुगुनी तिगुनी चौगुनी हो गई हो।सभी की भागदौड़ शुरू हो गई है, हर तरफ अफरा तफरी है।सब जाग से गये हैं।जिसे देखो वही व्यस्त है।सब पेंडिंग काम शीघ्रता से निपटा रहे हैं।उबासी लेते कर्मचारी पूरी तरह सजग हो गए हैं।सबके मन में अपने अपने काम को अच्छी तरह से करने की ललक जाग गई है।इतने बड़े बड़े परिवर्तन हो रहे हैं और वजह बस एक ही है कि संस्था के जैसे प्राण लौट आये हैं।

सच में चार मंजिला अत्याधुनिक भवन कार्मिकों के अभाव में सूने पड़े रह जाते हैं।घर की शोभा घर वालों से ही होती है।जब तक घर में बर्तन न खटके तब तक घर घर सा लगता ही नहीं और जहां चार बर्तन होते हैं तो खटकना तो लाजिमी ही है।घर में लोग हैं तो घर गन्दा भी होगा,अफरा तफरी भी होगी, अव्यवस्था भी होगी, सफाई भी करनी होगी, खाने की व्यवस्था भी होगी, घर घर सा तभी लगता हो जब शोरगुल हो, कोई कुछ मांगे, आप कभी पुचकारे कभी डांटें, बिल्कुल सूमसाम सा और खूब खूब व्यवस्थित तो होटल हुआ करते हैं घर नहीं, संस्थाएं नहीं।जहां लोग होंगे वहीं सारी व्यवस्थाएं आवश्यक होंगी, वहीं कार्मिक अपेक्षित होंगे, वहीं अधिकारी को नियुक्त करने के प्रसंग होंगे, अधिकारी होंगे तो उनके लिए सहायक होंगे, चपरासी चौकीदार होंगे, गाड़ी होगी तो चालक चाहिए होगा।गन्दगी होगी तो सफाई कर्मी होंगे, बागबानी होगी तो माली होंगे।तो एक की आवश्यकता दूसरे से उपजती है।

होते रहे शिक्षण प्रशिक्षण, आते रहें नित नवीन अध्येता, पढ़ाते रहें अध्यापक, पढ़ी जाती रहें ये पुस्तकें पत्रिकाएं ग्रन्थ और समाचार पत्र, बने रहे ये अधिकारी तो मिलता रहे उनके सहायकों को काम।बस चलता रहे ये सिलसिला और बोलती बतराती रहें ये पाठशालाएं, हम जैसे तो इसी में भर पाएंगे।

जहां सुमति तहँ संपत्ति नाना

 सफर जारी है....934

14.05.2022

रामचरित मानस की एक चौपाई की अर्धाली भी यदि जीवन में उतार ली जाए, तो जीवन जीना आसान हो जाता है,जीवन में चमत्कारिक परिवर्तन हो जाता है और बहुत सी समस्याओं के समाधान स्वतः मिल जाते हैं।पर हम मूर्ख अनेको बार अखण्ड पाठ करते भी निसंग से रहते हैं।लो जी बस आपने कहा तो हमने पड़ लिया।अनेको बार पढ़ते दोहराते बहुत कुछ कंठस्थ भले हो जाए पर उसके भाव को समझने और अंगीकार करने करने में हम असमर्थ ही रहते हैं क्योंकि उसे अर्थ सहित कभीग्रहण ही नहीं किया जाता, बस संगीत की जोरदार ध्वनि के मध्य हम भी उन्हें मात्र उच्चरित करते रहते हैं।मंगल भवन अमंगल हारी, द्रवउ सुदशरथ अजिर बिहारी के सम्पुट का अर्थ भी नहीं जान पाते।

किसी भी घर, समाज और देश की उन्नति के लिए सुशासन बहुत जरूरी है, आपसी सद्भाव परस्पर सौहार्द और एक दूसरे के प्रति समझ आवश्यक है और यह समझ आती है सुमति से।सुमति के साथ ही कुमति जुड़ी हुई हैं।दोनों मनुष्य के ह्रदय में निवास करती हैं।कुमति सुमति सबके उर रहहीं, वेद पुराण निगम अस कहहीं।बस जिस क्षण जिसका प्राधान्य हो जावे, व्यक्ति उसी के अधीन हो जाता है।कैकई तो राम को भरत से बढ़कर मानती थी पर मन्थरा की कुटिलता ने उनके अंदर की कुमति को हवा दे दी, उनमें ऐसा जहर भर दिया, अपने पराये की ऐसी पट्टी पढा दी कि वह दशरथ से प्राणप्रिय राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास और भरत के लिए राजगद्दी मांग बैठी।औरस पुत्र भरत के लिए राजगद्दी की मांग तकतो ठीक था पर कुमति ने उन्हें राम के प्रति इतना विषाक्त कर दिया कि वे उन्हें चौदह वर्ष के वनवास पर भेजने के लिए तुल गई।अब ये बात अलग है कि इस जिद से केवल उनके हाथ पति का स्वर्गवास और पुत्र की घृणा ही आई।

तो जब जब कुमति का आधिपत्य होता है, कुछ न कुछ अनर्थ होता ही है।सो बार बार कहा गया बुद्धिमान बनो।पढने लिखने से समझ विकसित होती है इसलिए बार बार दोहराया जाता रहा कि चार अक्षर लिख पढ़ लो, लोगों में बैठने लायक हो जाओगे।मत पढो ज्यादा, अक्षर ज्ञान ही ले लो, गीता रामायण तो बांच सकोगे, वक्त जरूरत अपने को लिख बोलकर व्यक्त तो कर सकोगे, अपनी बात तो रख सकोगे पर अफसोस कि बड़ी बड़ी डिग्री और प्रमाणपत्र के पुलिंदे भी सामान्य समझ न जगा सके।समझ तो जब जगती तब ऐसी नीयत होती।यहां तो नीयत में ही खोट था सो कहने सुनने के लिए पट्टी और कॉपी पर सदा सच बोलो, झूठ मत बोलो, बड़ों का आदर करो, चोरी चकारी मत करो, आपस में मत लड़ो, मिलजुल कर रहो जैसे वाक्य खूब जमा जमा के सुंदर लेख में लिखते अवश्य रहे हों पर उनका रंचमात्र असर असली जीवन में न ला पाये।उस सबको तो बस पास फेल और अंकों तक ही सीमित कर दिया।जीवन उनके बिना भी दौड़ रहा हो तो उनकी वक़त भी क्या होती भला।ये तो भला हो उन ठोकरों का जिन्होंने जीवन का असली गणित सिखा दिया।बहुत भटकने के बाद जीवन जीने के असली सूत्र हाथ लगे कि जहां सुमति तहँ सम्पत्ति नाना, जहां कुमति तहँ विपत्ति निदाना।

       जो घर को स्वर्ग बनाना चाहते हो, सुखी रहना चाहते हो तो सुमति को जगाए रखो, दुर्बुद्धि से बचो, दूर रहो, उसकी तरफ भूल से भी मत देखो, दरवाजे खिड़की सब बन्द रखो, ये तो जरा सी सन्द में भी घुस आते हैं, बड़े लुभावने लगते हैं, मीठी मीठी चिकनी चुपड़ी बातें करते हैं, मिठबोले होते हैं मुख में राम बगल में छुरी रखते हैं, विष रस भरा कनक घट जैसे होते हैं ।इनसे जितनी दूरी बरतो उतना ही अच्छा।इन्हें तो पास भी मत फटकने दो।जैसे ही गलत सलत विचार आये उसे झटक दो।ये तो हर क्षण घात लगाए बैठे रहते हैं कि व्यक्ति जरा असावधान हो तो झपट्टा मारे, अपनी गिरफ्त में ले लें और जो एक बार इनके चंगुल में फंस गए तो सहज नहीं छूटते, फिर सहज मुक्ति नहीं मिला करती।कुमति का मार्ग बहुत आकर्षक और लुभावना है, जल्दी फंसा लेता है अपनी गिरफ्त में।तो ऐसों की संगत से  ही तोबा कर लो,दूर से ही हाथ जोड़ दो कि हम तो ऐसे ही भले, हमें ज्यादा चाहिए भी नहीं, इसी में आराम से गुजर बसर हो रही है।दोनों समय भरपेट खाते हैं, सिर पर छत और पांवों के नीचे जमीन है,सुख दुखमें साथ निभाने को अपने हैं, मिल बैठने को चार रिश्तेदार और मित्र है, शरीर ढकने को वस्त्र हैं, ओढ़ने बिछाने को सब व्यवस्था है, पैर में उपानह है सिर पर टोपी है, जीवन जीने को और क्या चाहिए भला।और फिर संतोष तो अंदर आता है। सन्तोषी सदा सुखी।बस ये सुमति बनी रहे, कुमति से बचाब हता रहे, बस प्रभु से यही प्रार्थना है।भूलें न कभी इस जीवन सूत्र को जहां सुमति तहँ संपति नाना, जहां कुमति तहँ विपत्ति निदाना। जीवन के इस मूलमंत्र को पकड़े रहें।बस नैया पार लग ही जाएगी।राधा रानी की कृपा से भवसागर पार हो ही जायेंगे।हमारो धन राधा श्री राधा श्री राधा, गोपाल धन राधा श्री राधा श्री राधा।

चुप हैं तो क्या

सफर जारी है...935

14.05.2022

अब भई अधिक बक बक करने की आदत नहीं है, शब्दों के खर्च के मामले में थोड़े सूम से हैं।करें भी क्या, बचपन से ये ही सिखाया पढाया गया कि बोलने से पहले सौ बार और लिखने से पहले हजार बार सोचो।शब्दों को सोच समझ कर खर्च करो।न ज्यादा न कम, बस जहां जितनी जरूरत हो उतना ही। सोच सोच के काम करने की ऐसी घुट्टी पिलाई गई कि अभी तक असर है।बहुतेरा सोचते हैं कि हम भी दुनियावी हो जाये ,बकबकी हो जाएं, जो मुंह में आये सो बोलते जाएं, न ये देखे कि क्या कहा जा रहा है,। किससे कहा जा रहा है और क्यों कहा जा रहा है।बस हमें तो कहना सिद्ध।न कह पाने का कैसा प्रेशर होता है, ये तो बस वही जानता है जो नहीं कह पाता और पेट पकड़े बैठा रहता है कि मौका मिले तो हल्का हो लें। अपने मन का गुबार निकाल लें, काहे को अपने दिल दिमाग पर भार रखे रहें।

          सो लोग दनदनाते आते हैं, शब्दों से पूरे लबालब और आते ही बिना क्रम के उगलना शुरू कर देते हैं, बीच बीच में उत्तेजित भी हो जाते हैं, शब्द कम क्रोध ज्यादा उगलते हैं,अपनी गलतियों पर उनकी नजर जाती हो न जाती हो पर अपने गलत सलत को किसी भी प्रकार से सिद्ध करने में लगे रहते हैं।पहले ऐसे लोगों से मिलने में बहुत कोफ्त होती थी, लगता था पूरा दिन ही बेकार चला गया।धीरे धीरे धैर्य आता जा रहा है अब सामने वाले की भाप निकलने तक बिल्कुल मौन बने रहते हैं और अगला जब कह कबा के खाली हो जाता है तब उसके हालचाल पूछना शुरू कर देते हैं।अब जब अगला क्रोध की ज्वाला में जल रहा हो तो आप जो मर्जी कहिये, वह उसे अपने मूड के अनुसार ही ग्रहण करेगा।तो ऐसे में चुप्पी लगाना ही बेहतर है।पहले तुम ही हल्के हो लो।वैसे भी जब दिमाग में इतना उल्टा सीधा भरा हो तो सामने वाले की सही बात भी गलत और भली भी बुरी लगती है।

          अपने को रिलीज करने के बाद जैसे ही उठ के चले कि हाथ पकड़ कर बैठा लिया ।इन सभी बातों का जबाब भी लेते जाओ।चुप थे तो इसलिए नहीं कि हमारे पास जबाब नहीं था या हमें बोलना नहीं आता था या तुम से डर लगता था या तुम जैसों से दबते थे या तुम्हारा सामना करने की हिम्मत नहीं थी या शब्दों का टोटा पड़ गया था या कि हम मुंह में दही जमाये बैठे थे कि तुमसे कमजोर पड़ते थे।बस सिखाया गया था अगला जब बोले तो उसे पूरी तरह सुनो, बीच में मत टोको, कितना भी तीखा कटु और बदतमीजी से बोले, बोलने दो क्योंकि हर व्यक्ति वही दे पाता है जो उसके पास होता है।कहने की तमीज बाजार में नहीं बिका करती जिसे खरीद कर पहना जा सके।ये तो परिवार से संस्कार से विरासत में मिलती है।जो मारे क्रोध के कांप रहा हो उससे अच्छे शब्दों और व्यवस्थित होने की मांग कैसे की जा सकती है भला।ये विशेषता तो शांत चित्त वालों की होती है।

          अगले को ये समझाना भी जरूरी हो जाता है कि सुनने वाला ईंट की मोटी दीवार नहीं है कि जब मन करा, भड़भड़ी में आये और सौ पचास चौबे ठोक के खिसक लिये ।बस अपने को रिलीज किया और हाथ झाड़ चल दिये कि अपना तो हो गया ।नहीं साहब इतनी आसानी से नहीं जा सकते आप, अब तो जबाब लेकर जाना होगा।खाली हाथ तो नहीं जाने देंगे भला।अब ये कोई बात थोड़े ही हुई कि इतना इतना दिया और बदले में खाली हाथ जाने दें।तो सुनो और तसल्ली से सुनो, आराम से सुनो, अब सब कह लिया तो खाली हो के सुनो कि जो अभी अभी विष रस को उड़ेल गए हो, उसे हमने छू आ भी नहीं है, हमारे काम का है भी नहीं, चाहो तो उसे पिछबाडे कचरे के ढेर में जाकर फैंक सकते हो, अकेले नहीं उठा पा रहे हो तो साथ में दो नौकर भेज देते हैं,आराम से घर पहुंचा आएंगे।अब सुनो, गलती को स्वीकारने में जो सुख है ,उसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते।गलती से भी गलती हो गई हो तो उसके लिए केवल तीन शब्द बोल लीजिये दोहरा लीजिये कि मुझे क्षमा करें, मुझसे गलती हो गई, आगे से ध्यान रखा जायेगा, बस बात समाप्त।ध्यान रखिएगा कि हर  बात का जबाब  बात से ही नहीं हुआ करता । कुछ के जबाब में चुप्पी में भी छिपे होते हैं।तो इन चुप्पियों को कम मत समझियेगा, उसके अर्थ और संदर्भ ग्रहण कीजियेगा। बड़े दिलकश होते हैं ये संदर्भ।

          सजायाफ्ता मुजरिम की तरह हाथ बांधे खड़े रहने की कोई जरूरत नहीं ,केवल गलती को स्वीकार कीजिये।उसे असत्य कथनों से पोषित मत कीजिये क्योंकि एक असत्य की रक्षा के लिए अनेक असत्य गढ़ने पड़ जाते हैं। आप अपने बुने जाल में स्वयम फंसते जाते हैं।फिर निकलना बहुत मुश्किल होता है।असत्य की गुजलकें बड़ी मोहक होती है,बड़ी जल्दी गिरफ्त में ले लेती है तो जितना हो उससे बच कर रहना सीखिए साब।काम करते हैं तो उन्नीस बीस होता ही है सो करेगा उसी से गलती भी हहोगी।जो हाथ बांध कर बैठे हैं ,जो करना ही नहीं चाहते, वे तो वैसे भी खुद मरे के समान हैं।बस केवल अपना समय नष्ट कर रहे हैं।दूसरों का तो क्या बिगाड़ पाएंगे पर हां, स्वयम को नष्ट जरूर कर लेंगे।तो उठिए, भाषाई समझ विकसित कीजिये, उसके संस्कार को बचाये रखिये, गिरना बहुत आसान होता है, सारी ताकत तो उठने में ही लगती है।तो इतने ऊंचे उठो कि जितना उठा गगन है।

क्यों नहीं लेते राम का नाम

 सफर जारी है...934

13.05.2022

        एक गीत के बोल सुबह से बहुत हावी हैं 'सुबह और शाम, काम ही काम'।अब हो सकता था कि शाम तक सब भूल भुला जाते पर दोपहर की खाने की छुट्टी में घर जाते मित्रों ने फिर दो पंक्तियां उछाल दीं... जिज्जी, काम से काम पे जा रहे हैं।वाह री औरत की जात,कहीं भी हो कितनी भी व्यस्तता हो पर घर हमेशा हावी रहता है कि अम्मा जी के भोजन का समय हो गया कि बच्चे स्कूल से आ गए होंगे कि भूखे होंगे कि पति को दवाई देनी है कि घर पर मेहमान आ गए होंगे।पता नहीं घर तो दोनों का होता है पर इन चिंताओं का कन्सर्न एक से ही ज्यादा क्यों होता है।शायद वह घर निर्मात्री होती है इसलिए या अधिक दायित्व शील होती है या पूरा आसमान अपने ऊपर टिका समझती है कि कहीं वह हटी तो छत भरभरा कर न गिर पड़े।अपने को धुरी मानने की भूल करती है या सच में परिवार की धुरी ही वह होती है, राम जाने।पर जब देखो काम और काम में अपने को आकंठ डुबोये रहती है।तो अपनी बिरादरी को इतने अधिक  कामों में व्यस्त देख गीत की मूल पंक्तियों  'सुबह और शाम काम ही काम क्यों नहीं लेते पिया प्यार का नाम' में ही बदलाब कर नई पंक्तियां गढ़ दीं। क्यों नहीं लेते बन्धु राम का नाम.अब प्यार व्यार तो हवा हुए, यह तीसरापन तो राम को याद करने का है।बहुत गुलछर्रे उड़ा लिये, फूली फूली चर ली, इस उस की चुगली में खूब समय बिता दिया।कबीर को पढा तो जरूर कि 'बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजा आपना मुझसे बुरा न कोय'।पर उसे गुन नहीं पाये।दूसरों की तरफ संकेत करते बिल्कुल भूल गए कि चार अंगुलियों का इशारा हमारी ओर ही है।

        भजन को केवल गाने के लिए गुनगुनाते रहे, उसके भाव को पकड़ ही नहीं पाये, भगवान के आगे घण्टरिया बजाते रहे पर कभी भक्ति में लीन नहीं हुए।भले ही दिखाने को नेत्र बन्द थे पर सच में तो सब देखते ही रहते थे।मुंह से राम राम बोलते और दिमाग में कुछ और ही चलता रहता।शायद इसे ही मुंह में राम बगल में छुरी कहते होंगे।'माला तो कर में फिरे जीभ फिरे मुख मांहि, मनवा तो चहुँ दिसि फिरे ये तो सुमरिन नाहि'।ऐसा ही तो सुमरिन करते रहे हम।सूरदास ने कम से कम स्वीकारा तो था कि 'प्रभु हों सब पतितन को टीको, और पतित सब दिना चार के हों तो जनमत ही को'।कम से कम ये भक्त कवि अपने विषय में स्पष्ट तो थे, अपनी कमियों को जानते थे तो थे।और जानते थे इसलिए उन बुराइयों से छुटकारा पाना चाहते थे।'अच्छा हूँ या बुरा हूँ जैसा भी हूँ तुम्हारा' कहते थे, प्रार्थना करते थे, अनुनय विनय करते थे, विनय के पद रचते थे, गोविंद को इतना चाहते थे कि उन्हें प्रेम के मोल खरीद ही लेते थे।याद है न प्रेम दीवानी मीरा घोषित कर देती है 'माई री मैंने लीनो गोविन्दो मोल, कोई कहे महंगों कोई कहे सस्तो लियो री तराजू तौल'।

        गोपियों के  पास तो एक ही मन था जो श्याम संग चला गया।स्पष्ट कह देती हैं गोपियाँ ' ऊधो मन न भये दस बीस, एक हुतो सो गयो श्याम संग को आराधे ईश'।पर यहां तो मन भौतिक वस्तुओं के पीछे ही डांव डांव डोलता है।कृष्ण के वियोग में यदि मधुवन हरे हैं तो उन्हें उलाहना सुनने को मिलता है 'मधुवन तुम कत रहत हरे, विरह वियोग श्याम सुंदर के ठाड़े क्यों न जरे'।पर यहां तो कृष्ण मिले न मिले ,मन उनके अभाव में व्याकुल हो कब रोता है, कब ह्रदय के अंदर से पुकार निकलती है।बस किसी तरह मन का सा हो जाये और मन का सा क्या है बस भौतिक संसाधनों की प्राप्ति।ईश्वर से मांगते भी क्या है बस ये मिल जाये वो मिल जाये।सारा सारा दिन इसी उठापटक में निकाल देते हैं ।ईश्वर से नेह लगाया ही कब, उसे मीरा राधा की तरह चाहा ही कब, कभी उसके विरह में इतने तड़पे ही नहीं कि उसे पाने में सब खोना पड़े।बस दिन रात उससे बहुत कुछ मांगा होगा कभी अपने लिए तो कभी अपनों के लिए।पर कभी ध्रुव की सी लगन नहीं लगी कि सब छोड़ 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय 'का अजपा जप करते, कुछ मालाएं जपी भी तो तुरंत उनका फल चाहा।निष्काम भक्ति करना नहीं आया।तीन चौथाई बीत गई, अब पसरत्ता समेटने की बारी है पर मन की चंचलता पर किसका बस है, वह तो निरंकुश है, कभी भी कहीं भी चला जाता है।खूब गीता पढ़ लो पर मन तो अभ्यास से सधता है।

        तो अर्थोपार्जन में ही लगे रहे, न किसी भूखे को खाना दिया न प्यासे को पानी।अब निर्लिप्त निरासक्त भाव से काम करने और हर क्षण प्रभु को भजने का अभ्यास डालना है।हर कदम पर राधे और श्याम निकले, बस हाथ भले ही काम करे पर जिव्हा राम ही राम जपे।बस प्रभु सुबह और शाम कर लिया बहुत काम, अब समय है काम के साथ साथ प्रभु को याद करने का, उसका  नाम लेने का।तो याद कर लो ये पंक्तियां.... 'सुबह और शाम, काम ही काम, क्यों नहीं लेते बन्धु राम का नाम, नाम ही तारे, नाम उबारे लेता चल प्रभु राम का नाम'।

मैया तो स्वर्ग से हू बढ़कर होय करे

 सफर जारी है.....933

11.05.2022

नेक टिक जा छोरा,सुनत नाय नेकऊ,अपनी अपनी ही दागे जा रयो है।अम्मा जी के आगे तो सबन ने सांप सूंघ जातो।  पीठ पे कस के दो थाप धर देती, ऐसो सन्न कर देती कि  सब हवा निकल जाती।अब देखो चींटी के हू पर निकर आये हैं।है तो नेकसो सो पर बड़ी फू फांय करे ।अपने आगे काऊ ए गिने ही नाय।कब ते समझा रये है महतारी बाप दोनों पर बा ढीठ के कान पे जू नाय रेंग रई।एक तो आजकल के बालक बड़े मनमौजी होय करें।जो मन में आ गई सो फिर करके ही दम लिंगे,फिर नाय सुन रये वे ब्रह्मा की हू,भले ही से तुम बकबो करो, कीकबो करो, बिन की सेहत पे रत्ती भर हू फर्क नाय पर रयो।सुने ही नाय फिर ।तुम भले ही बकबो करो।

    अब कल की बात ई ले लेयो ,वो का कहत ए ,हम्बे मदरस डे ।अब जे नयो चलन चलो है कि मैया की फोटो मोबाइल पे लगा देत ऐं और अखबारन में छाप लिंगे और मन गयो मदरस डे ।अब इन बाबरेन ने इत्त्ती ऊ सल नाय कि कि जो जन्म देबे, तुम्हें नौ महीना अपने पेट में धरे, तुम्हें पाले पोसे ,खुद गीले में सो के तुम्हें सूखे में सुलाबे, खुद भूखी रह के तुमारो पेट भरे ,तुमाई दिन रात कुसल मनाबे ,तुमारो चेहरा देख के जीबे, बो का तुम्हारे काजे साल में एक दिना पूजबे की वस्तु होयगी, तुम बाय पूजो चाये मत पूजो, बाके संग फोटो खींच के लगाबो चाहे मत लगाबो पर बाको मान जरूर राखो।बा ते उलटो सीधो मत बोलो, जबान दराजी मत करो, गाली गुपता मत देयो, चीख चीख के मत बोलो, शांति ते हू बात कही जा सके।हमें खूब सल है कि अब तुम बड़े है गए हो, अब तुम्हे मैया की जरूरत नाय रई, तुम सबरे काम कर सको।अब तो पैसा ई मैया बाप है, बस बाके पीछे दौड़ो भागो, मैया तो एक छोड़ दस मिल जांगी।मैया तो ना मिलो करे हां तुम अपनो काम निकारबे कू मतबल साधबे कू काऊ ए मैया बना ले ओ, बड़े प्यार ते बोलबो करो तो अलग बात है।जो अपनी मैया को सगो ना हो सको, जो मां जाए भैया ते सम्बन्ध नाय रखे वो कौन ए मान दे सके भला।मैया ए औलाद ते कछू नाय चहिये, बस वो बनो रहे राजी खुशी रहबो करे,अपने घर परिवार में अगन मगन बनो रहै इतने में ई आत्मा तृप्त है जाबे, मन भर जाबे बाको।बाने तो अपनो सब कुछ सारी ममता तुम पे लुटा दई,भगवान के आगे मन्नत मांगी ,देवी देवता मनाए तब जाके तुम गोदी में पाए ।अब बताओ तुम ते बढ़ कर बाको कौन है सके, तुम्हारे मोंह ते मैया सुनबे कू कैसी कैसी तरसी, तुम्हाये पहलो शब्द बोलबे पे कैसी खुश भई, सबन ने बताती डोली कि आज हमाये लाला ने मम मम कहबो सीख लयो है, अब वो सरक सरक के चले, दीवार पकड़ के खड़ो है जाबे।अब बा मैया ए तुम आईना दिखाबे डोलत  हो,बाए दुनिया भर की बात सुना के अपने कू तुम्मन खा समझबे लगो हो।नेक दिमाग ते सोचो कि कल कू तुमहू महतारी बाप बनोगे तो तुम्हें अच्छो लगेगो का कि तुमाई औलाद तुम्हें मारे पीटे कि तुम्हें अलंकार की भाषा से लजाबे कि तुम्हें मारे पीटे, कि तुम्हाये संग बुरो बर्ताब करे कि तुम्हें घर ते बाहर कर देबे कि तुम्हें बूढ़ेन के आश्रम में छोड़ आबे कि तुम्हें नाती पोतेन ते दूर रखें कि तुमते रोज लड़बो ही करे कि तुम्हें बात बात पे सुनाबो ई करे कि तुम्हारे तीतरे से बिखेरो करे।तो भैया जो बात तुम्हें अपने काजे पसन्द नाय वैसो दूसरे के सङ्ग चों कर रये हो।काहे कू अपनी राह में कांटे बो रये हो, ध्यान रखियो जैसो करोगे वैसो ही भरनो पडेगो।तो नेक अपनो जीवन सुधार लेयो, गुड़ मत देयो पर गुड़ की सी बात तो करो।हमेशा खिंचे बंधे से रहत हो,ऐंठ के मारे पैठ कू जात हो, तुम पे सीधी तरिया ना रहो जाबे।अरे धन्य भाग मानो अपने कि सिर पे मैया बाप को सायो है, भले ही वे सूखे ठूंठ है गए होय, छाया न दे पा रये होय पर तुम्हारो हित ही करिंगे,हित की सी ही कहेंगे।

    तो बालको, अब हू समय है कि सुधर जाओ, माता को साल में एक दिन ही नाय होय करे, बो तो हर पल दिल में बसी रये, तुम बई के अंश हो सो बाय कैसे भूल सको।अब निन्यानबे के फेर में पर गये हो सो बाबले है गए हो।जब जगोगे तो मन बडो धिक्कारेगो कि हाय राम हमने जे का कर दयो।बाद में पछताबे ते कछू ना होबे को।सो आज ते बल्कि अबही ते गांठ बांध लेयो कि जननी जन्मभूमि तो स्वर्ग ते हू ऊंची होय करे, बिनको सम्मान करबो चहिये।माताजिन को एक दिन नाय होबो करे ।जे तो दिन रात मन में ध्यान में बसी रये।बिन्हे याद थोड़े ही करनो परे, वो तो हमारे अंदर ही हैं, हमारी शिराओं में बाको खून ही बह रयो है, बाको दूध पीके ही तो हम बड़े भये हैं,बो तो हमारी नस नस में बसी है, सदा हमाये मन में रैत है।हमें समझाबे बताबे की कोई जरूरत नाये कि मैया स्वर्ग ते हू बड़ी होय करे, बाके वास्ते ये तन मन और प्राण है।

 सफर जारी है....932

10.05.2022

किसी से मिलने पर हम सबसे पहले उसका परिचय प्राप्त करते हैं मसलन उसका नाम क्या है, वह क्या करता है, कहां रहता है, कितना पढा है आदि आदि।ज्यादा ही घनिष्ठता हो तो उसके परिवार के विषय में जानकारी ले लेते हैं, नौकरी का मसला हो तो पढ़ाई लिखाई ,डिग्री सर्टीफिकेट ,अनुभव प्रमाणपत्र यानी बायोडेटा का संज्ञान लेते हैं,शादी विवाह का मसला हो तो उसकी नौकरी, उसकी कमाई ,उसके परिवार के विषय में जानने की उत्सुकता होती है, किसी से मित्रता करनी हो तो दूसरी तरह की जानकारी अपेक्षित होती है औऱ वैसे ही बहुत सामाजिक होने का शौक चर्रा रहा हो तो अगले के सामाजिक परिसर की जानकारी ले ली जाती है मसलन वह किन के साथ उठता बैठता है, संग साथ कैसा है, शराब जुए गुटखा आदि खाने की लत तो नहीं है आदि आदि. यानी परिचय के क्षेत्र अलग अलग हैं औऱ सामने वाला अपनी जरूरत के अनुसार उतनी ही जानकारी रखना चाहता है जितना आवश्यक हो।अब हम कोई महापुरुष तो हैं नहीं, न कवि, रचनाकार और लेखक हैं जिनकी जीवन शैली याद करने की बाध्यता हो।तो जहां जितना जरूरी होता है उतना ही परिचय लिया दिया जाता है और नहीं तो महादेवी की तरह टीप दिया जाता है 'परिचय इतना इतिहास यही, उमड़ी कल थी मिट आज चली'।

एक अध्यापक अपने विद्यार्थी के परिचय में शैक्षिक प्रगति को प्राथमिकता के स्तर पर रखता है,शेष बातों की जानकारी द्वितीयक होती है. सामान्यतया उसका सम्पर्क अपने पाल्य विद्यार्थी से छह से आठ घंटे का रहता है, इसके बाद दोनों की अपनी अपनी जिंदगी होती है. लेकिन आवासीय परिसर औऱ नवोदय विद्यालय के अध्यापक अपने पाल्यों के ऐसे अभिभावक होते हैं जो हर छोटी बड़ी गतिविधि पर आई वाच रखते हैं। उसकी उदासी ,उसकी प्रसन्नता सबसे अध्यापक का कंसर्न होता है.

पिछले तीन साढ़े तीन दशक में हजारों -हजारों विद्यार्थियों को पढ़ाते एक बात खूब अच्छी तरह समझ आ गई कि जिन विद्यार्थियों को आप कक्षा में पढ़ाते हैं ,उसके पूरे व्यक्तित्व पर उसके परिवार की छाप अवश्य होती है, उसके व्यवहार में शालीनता या उग्रता के बहुत से कारण तो उसके पारिवारिक परिवेश में ही मिल जाते हैं, उसकी संगत से बहुत सी बातें स्पष्ट हो जाती हैं। 

इस पुष्टि पर मुहर आज एक विद्यार्थी के परिवार से मिल कर औऱ हो गई है.श्री प्रेम कुमार हुगड़े मेरे प्राक्तन विद्यार्थी नीरज के पिता है. वे कर्नाटक बीदर के मूल निवासी हैं पर बाद में हैदराबाद में बस गये ।इक्कीस बरस पोरबंदर और पांच बरस आनन्द, गुजरात के नवोदय विद्यालय में हिंदी अध्यापक के पद से अभी दो बरस पूर्व ही सेवानिवृत्त हुए हैं । परिवार में हिंदी, तेलगु ,मराठी बोली जाती है,86 वर्ष की वयोवृद्ध दादी भले ही बेड रिडन हों पर ज़ब उन्हें व्हील चेयर पर पोता नीरज हम सबसे मिलाने लाया तो उनके चेहरे की प्रसन्नता देख कर बहुत खुशी हुई. माँ तो माँ होती है ।उसे इस बात का ख्याल बहुत रहता है कि अभ्यागत ने भोजन किया है या नहीं सो ज़ब काफी देर तक मैं प्रेम हुडगे जी से उनके नवोदय विद्यालय  के अनुभव पूछती रही,सामाजिक समस्याओं पर चर्चा करती रही कि इस पीढ़ी को किस तरह संस्कारित किया जाए, उनका विचार था कक्षा आठ तक नैतिक शिक्षा को अनिवार्य कर दिया जाए।बात आगे बढ़ती तब तक अम्मा जी ने निर्देश दे ही डाला....पहले इन लोगों को खाना खिलाओ ।

बाद में बातचीत कर लेना. बहुत ही स्नेह आदर के साथ बिलकुल रूचि का भोजन क्या जैसे प्रसाद पाया हो ।बस थोड़े में ही तृप्ति हो गई ।गृह स्वामी चाय ,काफी, ठंडा सबसे परहेज करते हैं।बेहद सात्विक हैं ।खानपान और आचार विचार दोनों में।शायद हमारा आज का अन्न पानी वहीं लिखा था।तभी ऐसे बानक बने।फिर सबको तिलक कर पान पुष्प दे विदा किया।  परिवार की समरसता, सामंजस्य, सौहर्द के हम मुरीद हुए।डेढ़ घंटा अविस्मरणीय समय के रूप में दर्ज हो गया। श्री हुडगे जी के विद्यालयी अनुभव अपनी स्मृतियों में संजोये हम अगले पड़ाव के लिए चल तो जरूर दिए हैं पर स्मृति मंजूषा में वे पल कैद हो गये हैं, एक आदर्श परिवार से मिलकर मन बहुत प्रसन्न है।

यात्रा- एक छोटा ब्रेक

 सफर जारी है.........931

08.05.2022

जहां से आप चले थे, उस प्रस्थान बिंदु को तीन साढ़े तीन दशक बाद लौट कर देखना आपको प्रसन्नता से भर देता है।यादों की रीलें एक के बाद एक लगातार खुलती जाती हैं, ये यादें आपको विगत में ले जाती हैं, कभी आप प्रसन्नता से झूम उठते हैं तो कभी पैंतीस वर्ष बाद भी उन स्थानों और व्यक्तियों को वैसा ही देखने का सपना पाले रहते हैं जैसा आपने उन्हें छोड़ा था जबकि तब से न जाने कितना पानी बह गया होता है, चेहरे की लालिमा वक्त के थपेड़ों से झुर्रियों में बदल गई होती हैं,कितने इस जहां से ही जा चुके होते हैं।एक और केवल एक दिन की यात्रा ने झोली को खुशियों से भर दिया है।बहुत से लोगों से मिलना जुलना हुआ, कितनी कितनी बातों का आदान प्रदान हुआ।भले ही शहर में चार मीनार, बिरला मंदिर, हुसैन सागर न घूमा हो, भले ही यहां से भौतिक रूप में कुछ न खरीदा हो पर जितना स्नेह और आदर लेकर लौट रही हूँ, उसे किसी तराजू से नहीं तौला जा सकता।

हां, मैं बात कर रही हूँ अपने एक दिवसीय हैदराबाद प्रवास की, पहले दिन पहुंचना और रास्ते भर पैंतीस साल पहले उस शहर में नौकरी जॉइन करने की यादों में खोया रहना कि देखें कितना बदल गया होगा मेरा शहर, एयरपोर्ट पर साथियों का भावभीना स्वागत आश्वस्त कर गया कि शहर को मेरी प्रतीक्षा है, एयरपोर्ट से होटल तक के दो घण्टे के सड़क सफर में रास्ते भर तेलुगु में लिखे साइन बोर्डों को पढ़ पढ़ कर यह तय करती रही कि पिछला सब याद तो है।शहर पूरी तरह बदल गया है, अब ठेठ प्रादेशिक पोशाक हाफ साड़ी के स्थान पर मॉडर्न पोशाक आधिपत्य जमा चुकी है।शहर को तो बदलना ही था ।अब वह एक आई टी हब में जो बदल चुका है।हुसैन सागर में बुद्ध की विशाल प्रतिमा को देख ऐसा लगा मानो वह मुझे बुला रही है कि इतने पास से होकर गुजर रही हो, तनिक रुको, बैठो बतराओ पर समय के अभाव ने मन मसोस कर जाने के लिए विवश कर दिया।होटल में रात बड़ी कसमसाहट में बीती कि कैसे सुबह हो और अपनी कर्मस्थली केंद्र को फिर से निगाहों में भर लूँ।

                   नौ बजे सरकारी जीप केंद्र पर पहुंच चुकी थी, सद्य निर्मित नये भवन में स्थान्तरित हुआ केंद्र सजा बना खूब इतरा रहा था और मैं बाबरी वहां पुराने भवन के चीकू के पेड़ को खोज रही थी।उत्साही स्टाफ चंदन तिलक से स्वागत में लगा हुआ था।सेमिनार में प्रतिभाग करने विद्वान पधार चुके थे।किताबों के आदान प्रदान के साथ परिचय सत्र प्रारम्भ हुआ।आजादी के अमृत महोत्सव पर दक्षिण के लोक काव्यों में राष्ट्रीय चेतना केंद्रित विषय रखा गया था।विषय प्रवर्तन के साथ गोष्ठी प्रारम्भ हुई, सुघड़ सूत्र संचालिका ने अपने सधे हुए वक्तव्य से सभागार के हर व्यक्ति को प्रभावित किया।लोककाव्यों के संचयन और संरक्षण को रेखांकित किया गया, राष्ट्रीय चेतना के ब्याज से जोश जगाती रचनाओं ने हाल को ऊर्जा से भर दिया।भोजनावकाश के बाद बहुभाषी कवि गोष्ठी थी।तेलुगु, तमिल, मलयालम ,कन्नड़ ,हिंदी ,ब्रज में प्रस्तुत रचनाओं ने सबको वाह वाह करने पर मजबूर कर दिया।घड़ी की सुइयां तेजी से खिसक रही थी पर आज समय जैसे ठहर गया था।अंतिम पड़ाव के रूप में हिंदी की सेवा साधना में लगे साधकों के साथ विमर्श बैठक थी।जानना जरूरी था कि दक्षिण प्रांत में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए कौन सी दिशाएं निर्धारित की जा सकती हैं, सरकारी और गैर सरकारी स्तर क्या क्या प्रयास किये जा सकते हैं।सबने अपने मनोगत व्यक्त किये।फिर से इस बात की पुष्टि हुई कि हिंदी की गति में बाधक रोड़े अपनो के द्वारा ही बिछाए गए हैं और मन बना लें तो उन्हें हटाया जा सकता है।

          हिंदी के कार्य में लगे शिक्षक बेहद उत्साही हैं, वे

 कार्य करना चाहते हैं, तय व्यवस्था के प्रति उनके मन में आक्रोश है पर वे अपने अपने स्तर भर खूब खूब कर रहे हैं।इसी क्रम में संस्थान के विद्यार्थी रहे नीरज हुडगे जो अब शोधार्थी हैं और सत्यनारायण जो अध्यापन कर रहे हैं से मिलना हुआ।दोनों बहुत दूर से दौड़े चले आये थे कि गुरुजी से मिलना होगा।सफर की पाठक मंजू शर्मा, मेरी सहयोगी अग्रजा शकुंतला जी और अनीताजी,प्रो सरराजु, प्रो एस एम इकबाल, डाक्टर ऋषभ, डा सुमन लता, अहिल्या मिश्रा,चारी जी,श्याम सुंदर, महेंद्र ठाकुर, सुरेश उरतृप्त सहित अनेक अनेक महत्वपूर्ण नामों की सूची है जिसे यहां उदधृत करना सम्भव नहीं हो पा रहा।सभी को ह्रदय की गहराइयों से नमन। सभी हिंदी विद्वान दिमाग के कम्प्यूटर में फीड हो गए हैं, विजिटिंग कार्ड और पते ले लिए गए हैं कि कौन जाने कब किससे कहां मुलाकात हो जाये।शीला वानोडे जी ने खूब रच पच कर सुस्वादु भोजन परोसा है, पूरनपोली की मिठास अभी तक मुंह में घुली हुई है।बस आज विद्यार्थी के परिवार से मिल दोपहर वापिसी है।कल से फिर वही दिनचर्या शुरू होगी।इस यात्रा ने मुझे अनुभव और स्नेह आदर की दृष्टि से बहुत बहुत समृद्ध किया है।तो आप भी करते रहिए छोटी छोटी यात्राएं और अपने को अनुभव सम्पन्न बनाते रहिये।ये छोटे छोटे ब्रेक जिंदगी की नीरसता एकरसता को तोड़ते हैं और आप फिर से गति पकड़ लेते हैं।

होकर भी न होना

 सफर जारी है....930

08.05.2022

         आपने अनुभव किया होगा कि कभी कभी आप होते तो हो पर आप नहीं होते,आपके अस्तित्व को नकार दिया जाता है, आप लोगों की निगाह में नहीं चढ़ पाते ,उनकी अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाते तो वे आपको अपने खाते से माइनस कर देते हैं। यानी उनके लिए आप होकर भी नहीं होते।आप भीड़ से घिरे होते हैं पर आप बेहद अकेलापन महसूसते हैं, इसके जस्ट बिपरीत भी होता है जब आप बिल्कुल अकेले हों फिर भी कुछ यादें, कुछ साथ ,कुछ बातें आपको भरापूरा रखती हैं। हाथ और झोली भले ही खाली हो पर आप खुशी के सागर में डूबते उतराते रहते हो, क्योंकि आप मन से बड़े समृद्ध होते हैं। और ऐसा आप अकेले के साथ ही नहीं होता,इस श्रेणी में बहुत से लोग आते हैं।वे मन के निश्छल, भोले भाले, सीधे सादे कहें तो बिल्कुल सिम्पलटन, छल कपट से दूर भले ही हो पर बेहद अव्यावहारिक होते हैं।बात बात पे सोचते बहुत हैं।नियमों और सिद्धांतों के पीछे लठ लेकर पड़े रहते हैं। इनकी समझ में दो दूनी चार का गणित ही आता है।दुनियादारी में निल बटा निल होते हैं।स्कूल की पढ़ाई में भले ही सौ में से नब्बे ले आते हों पर जीवन की पढ़ाई में कभी पास नहीं हो पाते।

        बार -बार ठगे जाते हैं पर अपने नियमों में कोई हीला हवाला बर्दाश्त नहीं करते।दुनिया ऐसों को शेखचिल्ली और लप्पू झनझन की कैटेगरी में रखती है।जो जरा मीठा बोल जाए, तमीज से पेश आ जाये उसके मुरीद हो जाते हैं,इनका बस चले तो ऐसों के पैर ही छू लें।जरा सी बात पर खुश हो जाते हैं और किसी की तिरछी निगाह और वक्र भृकुटि से इनके खून का दबाब बढ़ जाता है।अब लाख समझा लो कि भई दुनिया ऐसे ही चलती है पर इनके दिमाग में तो भूसा भरा होता है, बिल्कुल ठस्स दिमाग होते हैं।कोई समझाए बुझाए तो उलटा उसे ही ज्ञान देने लगते हैं कि देखो संत भी तो बिच्छू के काटने पर उसे बार -बार पानी से बाहर निकाल देते हैं कि जब ये अपनी दुष्टता नहीं छोड़ता तो मैं अपनी सज्जनता क्यों छोड़ूँ भला।अब संत कहते हैं तो ठीक ही कहते होंगे। पर बड़ा मुश्किल होता है विपरीत स्वभाव वालों के बीच जिंदगी बिताना ,जिमि दसनन महुँ जीभ बिचारी।विभीषण होते तो जाकर पूछ लेते कि उन्होंने कैसे जीवन जिया, सारे दुष्ट राक्षसों के मध्य अपनी शुचिता कैसे बरकरार रख पाए।रावण तो सगा भाई था कोई चचेरा तयेरा नहीं ,बिल्कुल मां जाया, एक ही कोख से पैदा थे दोनों पर स्वभाव बिल्कुल अलग, एक पूरब तो दूसरा पश्चिम।जब विभीषण ने समझाया दूत अवध्य होता है या श्री राम की भार्या को वापिस लौटाने में ही भलाई है तो भरे दरबार में लात मार कर  निकाल दिया। वो तो भला हो राम जी का कि उन्होंने ह्रदय से लगा लिया, लंका का राज ही दे दिया पर जगत में तो घर का भेदी लंका ढाए प्रसिद्ध हो ही गया।

         जब दांतों के मध्य जीभ जैसी स्थिति हो, चारों ओर हउआ ही हउआ हों तो बहुत सावधानी रखनी होती है।कभी कभी आप परिस्थिति को जानते समझते तो अच्छी तरह हैं पर ......मारीच को खूब पता था कि मिठबोला भांजा रावण अपनी गलत मंशा के लिए उसे सोने का मृग बनने का ऑफर दे रहा है पर वह बेबस था तो सोच लिया जब दोनों तरफ से मरना ही है तो राम जी के हाथों मरना ज्यादा उचित होगा कम से कम मुक्ति तो हो जाएगी।उसने तो इसीलिए हा राम हा राम उचारा था।उसकी तो मुक्ति हो गई पर हा राम सुर के सारे संदर्भ ही बदल गए और रावण साधु का वेश धर भिक्षा मांगने के ब्याज से सीता को हर ले गया।

       तो जो हो वही बने रहो, अपनी मूल प्रकृति को छोड़ो मत।कभी कभी हो के भी मत हो ओ, कोई बात नहीं, नान विजिविल होना अदृश्य होना भी अच्छा है।अरे किसी को नहीं दिखते तो क्या पर हो सत्य तो यही है न।और तुम्हें कौन किसी से प्रमाणपत्र लेना है।अपने में मस्त रहो, कोई बोले तो ठीक न बोले तो ठीक, कोई खुश तो अच्छी बात, नहीं खुश तो अपनी बला से।सबको खुश रखने का कोई ठेका नहीं लिया और ले भी लेते तो सबको खुश किया भी नहीं जा सकता था।जब महादेव पार्वती नहीं कर पाए तो हम कौन खेत की मूली है।तो करते रहो ,चलते रहो ।रुको मत, जो रुक गया ठहर गया वो गया।हो तो सही ,अब किसी को नहीं दिख

जरा याद करो तुम उनको

 सफर जारी है....929

07.05.2022

किसी परिवार में जन्म लेना ,माता पिता के लाड़ और सहोदरों के बीच पलना बढ़ा होना औऱ तीसरा पन आते आते माता पिता भाई बहिनों से एक एक कर बिछड़ते जाना बहुत सालता है, जो अभी इस भौतिक संसार में हैं ,उनसे भी मिलना नहीं हो पाता ।कहीं भौगोलिक दूरी आड़े आ जाती है तो कहीं मनों में खिंचाब पैदा हो जाता है । दूसरे घर की सदस्यता लेते ही आप की भूमिका में परिवर्तन आ जाता है। आप किसी घर के लाडले सदस्य पापा की परी और माँ के आंचल तले लुका छिपी खेलने वानी छोटी गुड़िया ही नहीं रह जाते, भैया और दीदी की छुटकी से अलग आपका अस्तित्व गहराता है।आपकी निजता, आपकी अस्मिता नए परिवार के साथ बंध जाती है. आपकी भूमिका में बदलाब आता है। नए परिवार के प्रति दायित्व शील हो जाते हैं,आपकी जीवन डोर बिल्कुल अनजान एक नये से परिवार से जुड़ जाती है ,अपनों के दायरे में कुछ नये अपने जुड़ते जाते हैं,परिकर में विस्तार होता है पर जन्मदाता परिवार की जड़ों से आप कटते  नहीं है बल्कि दोनों को बराबर खाद पानी देने की कोशिश में लगे रहते हैं। वे मन में गहरे धंसे होते हैं तो हमेशा दिल में बसे ही रहते हैं फिर भले ही गाहे बगाहे ही मिलना क्यों न हो।

      ये अलग बात है कि अपने को यहां वहां की व्यस्तताओं में फंसाये हम उन भावों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देते।उन हवाओं को अपने आसपास भी फटकने नहीं देते जो उन भूले बिसरे दिनों की याद दिलाये जिन्हें हमने कहीं गहराईयों में गाड़ रखा है, ऐसे सीलन भरे कोनों में छिपा दिया है कि वहीँ सब गल सड़ जाए ताकि उचित हवा पानी धूप मिलते वे रक्त संबंध ,वे सहोदर भाव ,वे बचपन में खेल खेल में रूठना मटकना औऱ फिर सारे गिले शिकवे भूल गले लग जाना जैसे दबे छिपे भाव अपना सिर न उठाने लगे। फिर तो बड़ी गड़बड़ हो जाएगी.और जो कहीं ऐसा हो गया तो ये छितराये से भाव सारे रिश्तों पर भारी पड़ जाएंगे, इनकी अवधि लंबी तो है ही साथ ही गहरी भी है। फिर तो  बड़ी आफत मच जाएगी. बड़ी उलझनें पैदा हो जाएगी,डर है कि नये रिश्तों में कहीं खिंचाब न आ जाये ,कहीं रस्सा कसी न होने लगे । तो बेहतर है जो जहां हैं उसे वहीं बने रहने दिया जाए हैं ,जैसा चल रहा है चलने दें। यथास्थिति बनी रहने दी जाए.

पर सोचो और खूब सोचो, गहराई से सोचो, दिमाग लगाओ कि घर तुम्हारे अकेले का थोड़े ही छूटा है ।अगले को भी  नया परिवार मिला है, तो उसे भी नए माहौल में सामनजस्य बिठाना होगा, उसे भी अपना विगत एक किनारे कर नये रिश्तों में रचना पचना सीखना होगा।नये को याद करना होगा, पुराने को भुलाना होगा. तभी तो बात बनेगी, तभी तो नया परिवार बनेगा, तभी तो रिश्ते गहरे होंगे, उनमें मजबूती आएगी, रंग निखर कर आएगा, तभी तो आपसी सौमनस्य बढ़ेगा, तभी तो गाड़ी आगे बढ़ पाएगी.तो सबको अपने अपने सम्बन्धों के सम्बन्धियों के विषय में सोचना ही होगा,तभी तो गाड़ी आगे बढ़ पाएगी। 

तो मिल बैठ कर रास्ते निकलते हैं ।यूं मुँह फुलाये बैठे रहने से कुछ नहीं होने वाला।अरे लड़ कौन रहा है भाई, बात कही जा रही है और बात कहने का अधिकार तो सबके पास है।ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मसला है।तो सबमें रचो बसो जरूर पर अपने उस बाग को भी झांक कर देखना, उसकी देखभाल करना, उसे दबाई दारू दिलवा कर,उसके सुख दुख पूछकर, जो बन सके सहयोग कर आप कोई अहसान नहीं थोप रहे होते हो, बल्कि अपने भूले बिसरे कर्तव्यों को ही निभा रहे होते हो।इसके लिए तुम्हारी प्रतिबद्धता होना बहुत जरूरी है।इन छोटे छोटे कामो से काम को कर आप अपने जिम्मेदारी का ही निर्वाह कर रहे होते हो।तो जो अपने हैं उन्हें भुला बिसरा मत दो, जो भुला दिए गए हैं ,उनकी खोज खबर लो,उनके पास जाओ, उनसे बोलो बतराओ ।जरा याद करो तुम उनको जो तुम्हारे ही हैं पर वक्त की धूल ने उन्हें भुला बिसरा दिया है।मन पछ्तैहै अवसर बीते न हो जाये कहीं।

कौन कह रहा बनजारों सा

 सफर जारी है......928

06.05.2022

वे जो जीवन भर इधर से उधर किसी न किसी काम से घूमते रहते हैँ, बनजारे कहलाते हैँ. ऐसों के लिए ही कहा गया होगा कि इनके पैर में चक्कर है, कभी एक जगह टिक कर नहीं बैठ पाते. आज यहां तो कल वहां.बनजारे ऐसा करते हैँ तो कोइई नई बात नहीं है क्योंकि उनका पूरा का पूरा जीवन संसार के सब जीवधारियों के लिए होता है. वह सबका होता है औऱ सब उसके होते हैँ. कविता की पंक्तियाँ याद कीजिये जरा... कौन कह रहा बनजारों सा ये जीवन बेकार है, मैं सबका हूँ सब मेरे हैँ सबसे मुझको प्यार है.कोई निश्चित घर द्वार नहीं, जहां बैठ गये वहीँ घर हो गया. चाँद औऱ तारों की छत है दिशा दिशा दीवार है सारा आँगन मेरी धरती पूरब पश्चिम द्वार हैँ. इतने मिठबोले हैँ कि सबसे संबंध गाँठ लेते हैँ. सबको अपनी परिधि में ले आते हैँ या उनके दायरे में फिट हो जाते हैँ. कोई ईगो नहीं पालते. जो मिल गया उसी में खुश. दरअसल उनके पास दुःखी होने का समय ही नहीं है. ज़ब कभी समय मिले तो भी कोई कारण नहीं खोज पाते कि चलो इस बात पर बहस कर लें कि किसी भी बात पर रायता फैला दें कि अगले की बेबात पर ही टांग खिंचाई कर दें कि फूफा की तरह रूठ कर ही बैठ जाएं औऱ तब तक नहीं माने ज़ब तक अगला नाक नहीं रगड दें, अगले की आपकी देहरी के चककर लगाते चप्पल न घिस जाए कि अगला अपनी शान अपनी पगड़ी आपके चरणों में न रख दे. न जी, ये बनजारे इन सब बातों से कोसों दूर होते हैँ. उन्हें तो आदमी छोडो जीव जंतुओं से भी स्नेह हो जाता है. भोजन करने बैठते हैँ अभ्यागत के साथ साथ  चिड़िया चीटी, कौआ, गाय, कुत्ता सब का भाग निकाल देते हैँ. सबके सर पर वरद हस्त रख देते हैँ, सबकी पीठ 

सहला देते हैँ. उन्हें कोई पराया नहीं लगता, सब उनके अपने हैँ. जिस घर में जन्म लेते हैँ उनके प्रति अपने दायित्व तो जरूर निभाते हैँ पर गलत सलत में हाँ में हाँ नहीं मिलाते. अपनी समबाई सा खूब समझाते हैँ कहते हैँऔऱ जो न माने तो उसके भाग्य पर छोड़ देते हैँ कि न माने तो कर ले मन की सी, फिर मत रोइयो कि अब का करूं.अब बनजारे ऐसा करें तो एक बार को समझ भी आता है कि आगे नाथ न पीछे पगहा, कहाँ ले जायेगा बेचारा जोड़ जोड़ के, सब यहीँ तो रह जाना है. औऱ जिनके आगे पीछे हैँ जो आस औलाद वाले हैँ उन्हें जे सोच लेनी चहिये कि पूत सपूत तो का धन संचय औऱ पूत कपूत तो का धन संचय. ढंग को निकल गयो तो इतने रेज को कमायेगो कि घर भर देगो,अपने परिवार के साथ साथ 🥰औऱ दस कू पाल लेयगो औऱ जो भगवान ने बिगार ही दई तो धरे भये ही ए उड़ाय डालेगो.

 तो कान खोल के सुन लेयो अपनो धर्म मत बिगाडो.जो बन पड़े जरूर कर देयो. जितनो तिहारो दायित्व है बाये जरूर निभाओ पर अपने पराये में ऐसो भेद मत कर दीयों कि कल कू पछताते फिरो कि जे तो हमसे गनती है गयी, हमें ऐसो नाय करनो चहिये तो भैया मरे पीछे खूब रोबो करो साँप निकलबे पीछे खूब लकीर पीटबो करो, बा ते कछु नाय होत.गिरधर कह गये कि नाय बिना बिचारे जो करे सो पाछे पछताय, काम बिगाड़े आपनो औऱ जग में होत हंसाय, जग में होत हंसाय चित्त में चैन न पाबे.तो भैया हम जे न कह रहे कि तुम सब घर बार छोड़ z

अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है

 सफर जारी है....927

05.05.2022

बस एक बार सोच लो, दृढ़ संकल्प ले लो कि मुझे यह कार्य पूरा करना है तो सब सब हो सकता है, यहां तक कि शारीरिक अक्षमता भी आड़े नहीं आती।इस यात्रा प्रवास में ऊर्जा से भरपूर कितने व्यक्तित्व संपर्क में आये कि जिनकी कार्यनिष्ठा देखकर दंग हो गई।बिना थके निरन्तर चलने वाले इन मनस्वियों को दिल की गहराई से बधाई।तब लगा कि मन की दृढ़ता पास हो तो कैसे साधनों के अभाव में भी खुश रहा जा सकता है।जो बांट कर खाते हैं उनके पास अभाव फटकता भी नहीं है।बड़े बड़े तूफानों को भी ऐसे झेलते हैं कि मानो कुछ हुआ ही नहीं हो।कैसी भी विपत्ति आ जाए विचलित हुए बिना शांत बने रहते हैं, किसी को प्यार से समझाते हैं किसी को डांट देते है किसी के प्रति तटस्थ हो जाते हैं कुछ को छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं।वे जो मर्जी तरीका अपनाते हो पर स्वयम को कभी परेशान नहीं करते।वे जानते हैं बहुत रोने धोने चीखने चिल्लाने से दूसरों से उलझने से अपनी मन शांति भंग करने से भी परिस्थितियों को नहीं बदला जा सकता तो जितना श्रम इस सब1में लगाओ उससे तो अच्छा ही है कि इतनी देर में अपनी शक्ति का संचय कर दूसरे कार्य में लग जाओ ।

         सिक्किम प्रवास में देखा कि कर्मठ छुकी चौबीस घण्टे में अड़तालीस घण्टो काकाम निबटाती है, सबकी सहायता को सदैव उद्यत रहती है, सब काम अपने ऊपर ले लेती है, सेवाभावी सबको आदर सत्कार देती है।इसलिए नहीं कि उस पर किसी का कर्जा है या करना उसकी मजबूरी है।वह ये सब करती है क्योंकि उसे ये सब करना अच्छा लगता है।इतने घण्टों के श्रम के बाद भी चेहरा प्रफुल्लित रहता है क्योंकि वह काम को झुंझला के नहीं करती, अपना फर्ज दायित्व समझ के करती है।काम का कितना भी दबाव क्यों न हो,मन की शांतिको भंग नहीं करती।बस अगन मगन सी लगी ही रहती है।एक छुकी ही क्यों, अभी तो औरों को जानना समझना बाकी है जो अपनी धुन के पक्के हैं और बिना किसी शिकवे शिकायत के अपने काम में लगे रहते हैं।सच  जीवन में सफलता भी उनके कदम चूमती है जो एकला चलो के सूत्र को पकड़ लेते हैं।एक बार सबका आवाहन जरूर करते हैं,कहते भी हैं साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला तक जाएगा मिल कर बोझ उठाना, साथी हाथ बढाना साथी रे।पर जब कोई साथ नहीं हो तब भी अकेले चल देते हैं।वे अपनी राह खुद बनाते हैं, बनी बनाई पगडंडियों पर चलना उन्हें नहीं भाता।वे हमेशा लीड करते हैं, फॉलोअर नहीं बना करते।

         ऐसों से जब मुलाकात होती है बात होती है तो आपको भी विश्वास हो जाता है कि अकेला चना भी भाड़ फोड़ सकता है।साधनों की कमी और दूसरों का सहयोग उतना मायने नहीं रखता जितना आपकेमन की दृढ़ता, आपका कार्य के प्रति समपर्ण, आपका जोश मायने रखता है।पर जोश में होश नहीं खोने होते, सुविचारित होना होता है, योजना बनानी होती है ,काम की निरंतरता बनाये रखने होती है,अपनी शक्ति को तौलना और बटोरना होता है, लक्ष्य पर एकाग्र चित्त हो निशाना साधने में निपुण होना होता है।समस्या आपकी है तो समाधान भी खुद से खोजने होते हैं,हमेशा दूसरों के आगे रोना धोना नहीं होता।तो चलिए आप भी उठिए, संकल्प लीजिये, शक्ति संचय कीजिये, अपने साहस को तौलिए,अपनी क्षमताओं पर विश्वास रखिये और श्रीगणेश कर दीजिए।बाधाएं आएंगी, बिघ्न डराएंगे, विरोधी शोर मचाएंगे पर तुम्हें लक्ष्य से डिगना नहीं है।बस शांत भाव से अपना काम करते रहिए, करते रहिए, एक न एक दिन सफलता आपके कदम अवश्य चूमेगी।

         तो सिद्ध करना जरूरी है कि अकेला चना भी भाड़ फोड़ सकता है।बस लगे रहने होता है तो दोस्तो लगे रहिये चलते रहिये निरन्तरता बनाए रखिये, भाड़ को फोड़ने को आप अकेले चने ही काफी है।

ओटन लगे कपास

 सफर जारी है....926

04.05.2022

ये ओटना क्या होता है और कपास किस चिड़िया का नाम है।और बने रहो विलायती बाबू ,कभी कपास ओटी हो तो जानोगे।बस रेडीमेड जब सब कुछ उपलब्ध है तो किसी को कुछ और जानने की जरूरत भी कहाँ रही।पानी बोतलों में ,चीनी पैकिटों में, सब्जी कटी हुई और अंकुरित तक सब बड़े बड़े मॉल में मिल जाती हो तो लोगों को भला कैसे पता चलेगा कि इनकी उपज कहां होती है और ये हम तक कितनी प्रक्रियाओं से गुजर तक पहुंचती है।वैसे भी सबको आम खाने से मतलब होता है गिनने के चक्कर में कौन पड़े।अब जीवन की आपाधापी ,भागदौड़ और व्यस्तता इतनी अधिक बढ़ गई है कि किसी को किसी से कोई लेना देना नहीं है।कोई कुछ जानना समझना नहीं चाहता,  बस कैसे भी उसका काम हो जाना चाहिए।उसे शब्दों के फेर में पड़ना पसन्द भी नहीं।और तुम हो कि उसे रोज मुहावरेदार भाषा सुना सुना के पकाए जा रहे हो।कभी कहते हो दो और दो हमेशा चार नहीं होते तो कभी कहते फिरते हो चार दिन की चांदनी है।अरे भाई बिजली की ऐसी ऐसी व्यवस्थाएं है कि रात भी जगमगाती रहती है तो फिर चांदनी को चार दिन में क्यों बांधते हो।और बिजली गुल हो जाये तो हमारे पास ढेरो ढेरों वैकल्पिक व्यवस्थाएं हैं।प्यासा कुए के पास जाता है क्यों जाए भई,उसके पास इतनी पावर है कि बेचारा कुआ खुद उसके पास  दौड़ा चला आता है।एक और एक ग्यारह नहीं होते,अब तो अकेला ही हजार के बराबर होता है।आज किसी को किसी की दरकार कहां रही, सब अपने में भरे पूरे है।अब लँगोटिये यार नहीं हुआ करते, उनके लिए कोई और उपमा खोजो।आदमी आसमान पर पहुंच गया और तुम अभी तक भाड़ ही झोंकने में लगे रहे।कम से कम भाड़ में जाओ को अब तो सिलेबस से बाहर करो।पता नहीं कहां कहां से चुन चुन के मुहावरे और कहावते जबरन कोर्स में रख दिये गए कि उनके साथ द्रविड़ प्राणायाम करते रहो।

लाठी की बड़ी महिमा गाई गई लाठी में गुण बहुत है सदा राखिये संग, गहरे नद नाली परत सदा निभाबे संग, सदा निभाबे संग मार कुत्ता को भगाबे।अरे इतनी सुंदर सुंदर स्टाइलिश सुनहरे मूठ वाली छड़ी आ गई है अब कौन लाठी रखता है भला।वे दिन हवा हुए जब मुख्य दरवाजे के पीछे एक मोटा डंडा रखा रहता था कि चोर आ जाए कि घर में कुत्ता घुस आए तो उसे मार कर भगा दो और चोर को पीट पीट कर अधमरा कर दो।अब कुत्ते तो घर के बिस्तर पर सोते हैं उन्हें दुत्कारा नहीं जाता बल्कि गोद में लेकर सारा दिन स्वीट स्वीट नामों से पुकारा जाता है, तुम्हें एक बार को रोटी मिले न मिले पर उसे खूब दुलराया जाता है।तो अब धोबी का कुत्ता घर का न घाट का कहना बन्द करो।उसके तो दिन बहुर गए हैं।बारह बरस बाद तो घूरे के दिन भी बदल जाते हैं फिर वह तो आखिर कुत्ता मेरा सोना मेरा बबुआ है।रही बात चोर की, वे बहुत एडवांस हो गए हैं, उन्होंने चोरी के नये नये तरीके ईजाद कर लिये हैं।बन्द घरों सब माल गायब हो जाता है और तुम्हें कानों कान खबर भी नहीं होती।ऊंची दुकान फीकी पकवान अब आउटडेटेड हो चुका है, अब तो लोग फीके पकवान के लिए ब्रांडेड दुकानों पर ही जाते है, सब सुगर फ्री की डिमांड करते हैं।क्या करें खून में चीनी का स्तर इतना बढ़ गया है कि सब उससे दूरी बरतने लगे हैं।अब ये लेवल तो बढ़ना ही था।भरपूर सुविधाओं ने हमें महाआलसी जो बना दिया है।साइकिल से जाने में भले ही नाक नीची होती हो पर जिम में उसे चलाने के लिए मोटर गाड़ी में बैठकर जाते हैं।एक और देखो चोर चोर मौसेरे भाई। अरे वे मौसेरे ही क्यों ,चचेरे तये रे फुफेरे ममेरे क्यों नहीं जो सकते।चोरों में तो भाई बंदी चलती ही है।अब कहेंगे नानी के आगे ननसाल की बात मत करे लाली, ननसाल ही क्यों दादी के आगे ददिहाल की क्योंनहीं कर सकते।वे दिन लद गए जब साले सलहज जब कभी के मेहमान हुआ करते थे, आज वे गृहस्थी के जरूरी अंग हो गए हैं।तो बदलते माहौल में अपने मुहावरों को भी अपडेट करना जरूरी है।नौ सौ चूहे खाके बिल्ली हज को ही क्यों जाए,वह तीर्थ यात्रा पर चारों धाम भी तो जा सकती है।और इतनी बातें हमें अगला एक मुहावरे पर ही सुना गया कि उस दिन मुंह से निकल गई अरे भाई आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास, तो ओटन और कपास के बहाने हमारी क्लास ले डाली, ऐसे धो धो के सुनाया, ऐसे धोबीपाट मारे कि अभी तक कोमा में है।सोच रहे हैं कि अब अपने भाषायी व्यवहार से मुहावरों को ऐसे गायबकर देना चाहिए जैसे गधे के सिर से सींग।लो इतनी सावधानी बरतते एक मुहावरा और आ गया ।भाई तेरे हाथ जोड़े ,हमें तो बशख दो।कान में ऐंठा दे लयो कि अब नाय बोलिंगे साब।चन्दना तो चुप ई भलो।

सो भाई इन घिसे पिटेमुहावरों के पीछे लठ्ठ लेकर मत पड़े रहो, अब इनसे उबरो, नए ईजाद करो।जमाना बहुत बदल गया है अब सोलहवीं शताब्दी नहीं, इक्कीसवीं सदी में जी रहे हो।

सबका मालिक एक

 सफर जारी है....925

02.05.2022

दुनिया में दो ही सम्बन्ध सर्वोपरि हैं मालिक और मजदूर का, स्वामी और सेवक का, बड़े और छोटे का, ताकतवर और कमजोर का,संपन्नता और गरीबी का।एक इसलिए श्रेष्ठ ठहरता है क्योंकि दूसरा हीन है, एक ताकतवर इसलिए है क्योंकि दूसरा कमजोर है, शोषक इसलिए है क्योंकि कोई शोषित है, उत्तीर्ण का महत्व अनुत्तीर्ण के परिप्रेक्ष्य में ही है।यदि सब एक से हो जाते तो कोई किसी पर शासन कैसे कर पाता, कोई किसी से बड़ा कैसे ठहर पाता।कल मजदूर दिवस पर श्रम के बोझ से दबे बेबस मजदूरों के चित्र, कविता, आलेख की खूब खूब प्रदर्शनी लगी।कभी बाल मजदूरी की बात की जाती रही तो कभी श्रमिकों के अधिकार पर खूब कलम दौड़ी, उनके इतिहास रेखांकित किये जाते रहे,उनके प्रति सहानुभूति और संवेदनाओं का बाजार खूब गर्म होता रहा, चर्चाओं में मजदूर ही मजदूर समाया रहा,मालिक मजदूरों के आगे उसके श्रम का दशांश देते भी अपनी मूंछों को मरोड़ मरोड़ ताव देते रहे कि देखो इन्हें हम ही तो पाल रहे हैं, हम न होते तो कब के मर खप गए होते,कीड़े मकोड़े की तरह जीवन बिता रहे होते।

         बार बार मंथन चलता रहा कि सबका मालिक एक और सबका साईं एक कहते हम रोज किसे स्मरण करते हैं, यदि ये मिल मालिक हम मजदूरों के माई बाप हैं तो इनका भी तो कोई मालिक होता होगा, हम इनकी चाकरी करते हैं तो ये भी तो किसी की चाकरी करते ही होंगे, जैसे मालिक हमें दुत्कारते हैं, ज्यादा काम लेकर कम मजदूरी देते हैं और कभी कभी तो वह भी डकार जाते हैं, कितनी उपेक्षा से हमें देखते हैं, अपने को राजा और हमें प्रजा समझते हैं तो क्या कोई इनका मालिक नहीं होता होगा, कि क्या कोई इनकी मेहनत की कमाई नहीं डकार लेता होगा ,कि क्या कोई इन्हें दुत्कारता फटकारता नहीं होगा ,कि क्या कोई इनसे भी बड़ा नहीं होता होगा,कि  क्या ये भी किसी के चाकर नहीं होते होंगे, कि क्या इनका भी कोई मालिक नहीं होता होगा।जरूर से होता होगा तभी देनहार के नैन नीचे झुके रहते हैं और एक हाथ से दिया दूसरे हाथ को भी पता नहीं चलता।देनहार कोई और है भेजत है दिन रैन, लोग भरम हमरो करें ताते नीचे नैन।सबको देने वाला बादशाह अकबर भी अल्लाह से हाथ फैला कर मांगता ही है और उसे मांगते देख सहायता मांगने आया व्यक्ति लौट जाता है कि जब ये ही मंगता है तो भला मुझे क्या देगा, एक मंगता दूसरे मंगते को भला क्या दे सकता है।तो मांगना ही है तो उससे ही मांगो जो सबको देता है, सबका दाता है।दाता एक राम भिखारी सारी दुनिया कि राम एक देवता दुखियारी सारी दुनिया।ज्ञान का प्रकाश जब अंदर जगायेगा, प्यारे श्री राम के तू दर्शन पायेगा, जोत से जिसकी है उजियारी सारी दुनिया।दाता एक राम भिखारी सारी दुनिया।

तो जो ये बार बार कहा जाता है कि दुनिया में सब बराबर है, कि कोई छोटा बड़ा नहीं है,कि सब में एक ही परमात्मा का अंश है , कि वही सबकी रक्षा करता है ,कि जब कोई दुशासन किसी द्रोपदी का चीर हरण करता है तो कान्हा स्वयम उसका चीर बढाने आ जाते हैं ,कि किसी गज को जब ग्राह पकड़ लेता है तो राम उसे बचाने स्वयम आ जाते हैं ,कि होलिका बुआ प्रह्लाद को जलाकर मारने के लिए आग की लपटों के बीच उसे गोदी में लेकर बैठती तो है पर उल्टा हो जाता है वह स्वाहा हो जाती है और प्रह्लाद बच जाता है,कि जब प्रह्लाद को ऊंचे पहाड़ों से धकेला जाता है, पानी में फेंक दिया जाता है पर कोई उसे बचा लेता है क्योंकि उसे सब जगह यहां तक कि खम्भे में भी हरि दिखते हैं और प्रह्लाद के विश्वास की रक्षा के लिए हिरण्यकशिपु के वध के लिए प्रभु स्वयम नृसिंह के रूप में प्रगट हो जाते हैं, कि हिरण्यकशिपु को मिले वरदान कि न दिन में न रात में न भीतर न बाहर न देवता से न दानव से न अस्त्र से शस्त्र से वह मारा जा सकता है तो दोनों बखत मिले आधे नर और आधे सिंह के रूप में बीच देहरी पर न अस्त्र से न शस्त्र से बल्कि नाखूनों से उसके शरीर को फाड़ देते हैं। मीरा को मारने को राणा विष का प्याला भेजते हैं और प्रेम दीवानी मीरा उसे अमृत समझ पी जाती है ,उसका बालबांका भी नहीं होता,कि विष का प्याला राणा जी भेजा पीबत मीरा हांसी रे, पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे।

        सब निश्चिन्त रहो कि जो हमारा मालिक है जिसके हम मजदूर कहे जाते हैं, वह भी किसी का मजदूर ही है, उसका भी कोई मालिक जरूर है।जैसा आचरण वह हमारे साथ करता है ,अगले के साथ वैसा करने को कोई पैदा हो ही जाता है।कोई अपनी खीझ हम पर उतारता है तो वह भी किसी की खीझ का शिकार निश्चित ही बनता है।तो अपने अकेले को श्रमिक मजदूर मानते लजाने की कोई जरूरत नहीं, सब के सब मजदूर ही हैं, सब श्रम ही करते हैं फिर चाहे हाथ पैर का हो या दिमाग का, शारीरिक हो या मानसिक बौद्धिक हो, बिना श्रम के भला किसको मिला करता है।जो बार बार दूसरों को देख ये सोचे बैठे हो देखो उसके तो बड़े मजे हैं, कैसे बैठा बैठा रोटी तोड़ रहा है, उसके अपने कर्म हैं, कभी कर आया होगा तो फल आज मिल रहा होगा क्योंकि किये बिना तो किसी को कुछ नहीं मिला करता।तो ये मजदूर दिवस श्रमिक दिवस हम सबका साझा दिवस है क्योंकि मूलतः तो हम सभी श्रमिक ही हैं और हम सबका मालिक भी एक ही है।सबका मालिक एक।

जो सापेक्ष हो वह सत्य कैसा

 सफर जारी है...924

02.05.2022

 अक्सर सोचती हूँ कि आखिर सच की परिभाषा है क्या, न्याय किसे कहते हैं, योग्यता अयोग्यता का क्या पैमाना है।जो बात एक संदर्भ में ठीक होती है, वह संदर्भ बदलते ही गलत कैसे हो जाती है।संवेदना है तो जीव मात्र के लिए होनी चाहिए, पर उसमें भी अपने पराये का भेद कहां से आ जाता है ।अपना काला कलूटा तीन फुटी भी दुनिया का सबसे स्मार्ट बन्दा लगता है तो जिसे दूसरा कहते हैं उसके गोरे रंग और छह फुटे शरीर को भी नजर अंदाज क्यों कर दिया जाता है।अपनों के घेरे में आने वाले के सौ खून भी माफ और इस घेरे से बाहर के व्यक्ति की सामान्य सी भूल भी तिल का ताड़ कैसे बना ली जाती है।अपनों की आंख में झलकते पानी की चंद बूंदें भी संज्ञान में आ जाती हैं तो अगले के झर झर बहते आंसुओं को नौटंकी कैसे कह दिया जाता है।कैसे एक के चेहरे की हल्की सी मलिनता नोटिस ले ली जाती है तो अगले का ह्रदय विदीर्ण कर देने वाला रोदन भी कैसे अनसुना कर दिया जाता है।एक की धीमी सी फुसफुसाहट भी समझ आ जाती है तो दूसरे के स्पष्ट कथन भी क्यों नजर अंदाज कर दिए जाते हैं।

 ये अपने तुपने का घेरा दिन प्रतिदिन संकीर्ण होता जा रहा है।बातें भले ही वसुधैव कुटुम्बकम की दोहराई जाती रहें पर सत्य और असत्य को परिभाषित करते हमारा सरोकार केवल और केवल अपने पराये के भेद पर आधारित होता है।इन अपनों की भी अनेक अनेक श्रेणियां है।ये थोड़ा सा अपना है ये वाला ज्यादा अपना है।ये पहले घेरे में आता है तुम अंतिम वाले में।रक्त सम्बन्ध सिर चढ़ कर बोलता है या घुटने तो भैया पेट को ही नवते हैं तो इस न्याय के अनुसार सबके घुटने पेट को ही नवने चाहिए, इस पर कोई आपत्ति और सवाल भी नहीं उठाए जाने चाहिए पर ऐसा होता कब है।जो जो अपनों के लिए सच और न्याय पूर्ण होता है वह दूसरों के लिए कैसे बदल जाता है।अब बेटा बेटी तो एक भाव हैं, हर माता पिता को अपने बेटा बेटी में दुनिया भर की अच्छाई नजर आती ही है, उसके दोषों पर दृष्टि जाने का रेखांकित करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।पर जैसे ही ये सन्दर्भ बदल ते हैं हमारे सोच की दिशा भी बदल जाती है, शक की सुईं दूसरे कहे जाने वाले पर चली जाती है, हमारे सोचने का ढंग ही बदल जाता है, हम तटस्थ नहीं रह पाते ।शायद तभी नीर क्षीर विवेकी न्यायाधीश की व्यवस्था की जाती है, सरपंच के रूप में अलगू जैसे पंच चुने जाते हैं जो सारी मित्रता को परे रख जो उचित है वही कहते हैं, इसमें मेरा तेरा नहीं देखते।यदि गलत है तो गलत है।रानी वरुणा के अपने सुख के लिए गरीबों की झोंपड़ी जलाने पर राजा न्याय सुना देते हैं कि जब तक रानी अपने स्वयम के श्रम से कमाई से गरीबों की झोपड़ी नहीं बनबा देती उनका महल में प्रवेश वर्जित है।

 तो न्याय की परिभाषा अपने परायों के मध्य नहीं रची जा सकती कि जो मेरा है वह सब सच और जो दूसरे का है वह सौ प्रतिशत, सोलह आने गलत, इसमें कोई शक सुभा की गुंजायश ही नहीं।अपने ने कहा है तो उसे आंख मूंद कर स्वीकार कर लो और अपने की सीमा रेखा से घेरे से बाहर का हो उसे भाड़ में जाने दो, धूल डालो ससुरे पर, हमें क्या लेना देना, मेरा तो हो गया न, अब तेली की तीनों मरे और ऊपर से टूट टे लाट, हमें क्या लेना देना हमारा तो हो गया न, ऐसे सबके लिए सोचते रहे तो पड़ गया पूरा।खजाना नहीं खाला हो जाएगा, फिर हम क्या ठनठन गोपाल बन कर नहीं बैठे रहेंगे।ये सूमता अर्थ की ही नहीं, भाव की भी है आखिर हम दूसरों के लिए क्यों सोचे, अभी तो हम अपनों से ही निबट पाए और तुम और पाँय पो रहे हो।अरे भाई घर में दीया जला कर ही चौराहे पर जलाया जाता है।घर फूंक तमाशा क्यों देखे भला।हमें कोई कबीर नहीं बनना,तुलसी कहते होंगे काहू की बेटी सों बेटा न ब्याहब और मांग के खायबो मसीत को सोइबो उनका सिद्धांत होगा, हम तो अपने के दायरे में ही खुश है।हम तो छोटी बुद्धि के ही भले, हमें नहीं बनना उदार चेता, हमें क्या लेना देना विश्वमय और ईशमय से।बस हम तो येन केन प्रकारेण अपनों की रक्षा करते रहें, उनके रक्षा कवच बने रहें इतना ही बहुत है जी।अब तुम्हें सोचने का रोग है तो सोचते रहो,तुम्हारी मर्जी।तो दुनिया सदैव से ऐसे ही चलती है ऐसे ही चलती रहेगी।वशुधैव कुटुम्बकम की बड़ी बातें नोटिस बोर्डों पर बोल्ड अक्षरों में चस्पा कर जरूर दी जाएंगी, पर हम तो ऐसे ही चलेंगे।न बदले थे न बदलेंगे।केवल अपना स्वार्थ देखेंगे।बोलेंगे भी तो उतना ही बोलेंगे जिससे हमारा काम सधता हो।न हम सुधरे हैं न सुधरेंगे।सत्य सदा से  सापेक्ष ही हुआ करता है, वह निरपेक्ष हो ही नहीं सकता।अब तुम्हें अपनी मटर अलग भुनाने हो तो तुम्हारी मर्जी, अकेले बैठे अपनी नई मनु स्मृति लिखते रहो, किसने रोका है और कौन रोक सकता है भला।

जागे फिर न डसैहों........

 सफर जारी है......923

01.05.2022

भक्त अपने प्रभु से भांति भांति से निवेदन करता है।कभी रूठ जाता है तो कभी तायने उलाहने देता है।और जब कैसे भी नहीं सुनाई होती तो पहले स्तुति अभ्यर्थना करता है, रोता गाता है, अपने को दीन हीन बताता है कि तुम दयाल दीन हों तुम दाता मैं भिखारी या मैं सब पतितन को टीको, और पतित सब दिना चार के मैं तो जनमत ही को या अब लों नसानी अब न नसैहो, राम कृपा भव निसा सिरानी जागे फिर न डसै हों या गर्भ में उल्टा लटका खूब पुकारता है कि बस प्रभु एक बार इस नरक से मुक्ति दे दो फिर जीवन भर आपको याद करूंगा पर जगत में आते ही माया बांध लेती है, नाते रिश्तों के बंधन में जकड़ जाता है और गर्भ में प्रभु से किया वायदा भूल जाता है ठीक वैसे ही जैसे मुसीबत में तो राम याद आते हैं और जैसे ही विपत टली तो हम अगन मगन हो जाते हैं, फिर कोई कहां याद रहता है भला।ऐसा नहीं होता तो कबीर को क्या पड़ी थी जो वे दुख में सुमिरन सब करे लिख लिख कर काले कागज करते रहते।जब ज्ञान होता तो पश्चाताप करने लगते कि प्रभु जी गलती हो गई, बस एक बार बस इस बार नैया पार लगा दो फिर तेरी डोर कभी नहीं छोड़ूंगा कि प्रभु जी मेरी नैया पार लगा दो, भवसागर में फंसी है नैया इसको बाहर निकालो।उस समय तो जाने कौन कौन से नाम याद नहीं आ जाते।विघ्नहर्ता गणेश से लेकर जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जै कपीश तिहुँ लोक उजागर, कभी जै शिव जै शिव, भोले बाबा, जै माता दी, राम राम, कृष्ण कृष्ण सब जुबान पर भाग भाग के आ जाते हैं, उस क्षण केवल और केवल बस एक सहारा दीखता है मेरा कोई न सहारा बिन तेरे, नन्द लाल संबरिया मेरे, प्रभु आ जाओ प्रभु आ जाओ बस मुझको दरस दिखा जाओ की रट लग जाती है।

भगवान जी बच के रहना इन भक्तन ते, जिनको कोई ठिकाना नाये, अबही तुम्हारी विरुदावली गाएंगे  कि दुर्योधन की मेवा त्यागी साग विदुर घर खायो, जब जब भीर पड़ी भक्तन पर नङ्गे पांव हि भाजो।जे तो तुम्हें ऐसे ही नचाएंगे। सुनी तो होगी कि परमपिता ए छछिया भरि छाछ पे ब्रज गोपिन ने परमपिता हू ए नाच नचा दयो कि पहले नाच के दिखा तब माखन मिलेगो।इनकी बातन में मत आ जइयो प्रभु जे तो पल में तोला पल में मासा हैं।अबही आंसू बहा रये हैं और अगले ही खन सुख पा के तुम्हें बिसार दें।कुंती ए सब पतो हतो ताई ते तो कह दई सुख के माथे सिल परे जो भगवद नाम भुलाय, और बलिहारी जा दुक्ख कू जो पल पल नाम रटाय।तो प्रभु जी तुम तो इन भक्तन ए एक न एक विपत्ति में अटकाये ही रहो करो, इन्हें सल हू तो पड़नी चहिये कि बिना प्रभु जी के जे कितनो अकेलो है।और सब तो चार दिना के साथी है जैसे ही हंस उडो,चोला छूटो सबे घर ते बाहर निकारबे की जल्दी मच जाबे कि मुर्दा है, जाहे जल्दी ते जल्दी फूंको पजारो।वो तेरो प्यारो सो बेटा हत काये चार जनन के संग काठी में बांध के कंधा पर धर के राम राम सत्य कहतो सूधो मरघट में जाके तोय फूकेगो पजारेगो तेरी कपाल क्रिया करेगो और इतने ते हू पेट न भरे, राख ठंडी होत खेम अस्थिन ने बीन बान के एक घड़ा कलश में धरि के लाल कपड़ा बांध के गंगा जी में प्रवाहित कर आयगो।तेरहीं कर के सालाना श्राद्ध कर आबेगो और अपनी दुनिया में अगन मगन है जायेगो, बहुत याद आबेगी तो फोटू पे माला चढ़ा देगो।और तेरी तिरिया दरवाजे तक रोती पीटती आबेगी संगी साथी श्मशान तक चले जाबिंगे पर साथ में कोई न जा सके। जे दौलत इकठ्ठी करबे में लगो परो काये कछू संग नाय जायेगो।जब हंसा अकेलो उड़ जायेगो, संग तेरे नहि कोई जायेगो।बस प्रभु जी को नाम ही जाए तबही तो बीमार होते खेम कहो करे कि राम राम रटो भैया।तब तो बड़े भाव ते भजन गावेगो इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले, गोविंद नाम लेके मेरे प्राण तन से निकले,मेरे मुख में गंगाजल हो उसमें भी तुलसी दल हो।जब प्राण कंठ आये कोई रोग न सताए मुख से राम राम गाये।पर कहां सम्भव हो पाताहै ये सब, मरणासन्न को भी वेंटीलेटर पर धर कृत्रिम सांस देते रहते है शायद बच जाए।बीमारी में कहां राम रटे जाते हैं।तो बस जब तक सांस है तब तक हर सांस पे उसका सुमिरन होता रहे।

इन भक्तन की बातों में मत आ जइयो प्रभु, जे बड़े बनाऊ हैं।अबही जो टसूबे बहा रये हत काये, तुम्हें सिमर रहे हत काये जैसे ही बिपत टली सब भूल भाल जाएंगे।जे तो सब कहबे की बात है कि अब लों नसानी अब न नसेहो, राम कृपा भव निशा सिरानी जागे फिर न डसेहो।ऐसे तो कही ही जाए प्रभु अपनो काम निकारबे कू।पर जे सच नाय।तो इनते पहले त्रिवाचा भरवाबो बहुत जरूली है कि बोल लाला सांची सांची कह प्रभु के नाम ए रटेगो कि नाय।पर हमारे प्रभु तो बड़े भोलेभाले हते नेक लोटा भर जल ते ही खुश हो जाबे तभी तो बिन्हे भोले भंडारी कहो करे और वो छलिया तो राधे राधे कहबे ते ही चलो आबे कि राधे राधे कहो चले आएंगे बिहारी, आएंगे बिहारी चले आएंगे बिहारी।राधा मेरी चन्दा चकोर हैं बिहारी कि राधे राधे कहो।तो सब मिल के बोलो राधे राधे श्याम मिला दे इतने ते ही तर जाओगे।तुम चाहे जितने मर्जी दुष्ट है जाबो पर प्रभु जी तो समदर्शी हते।सो गाते रहो प्रभु जी मेरे अवगुण चित न धरो, समदर्शी प्रभु नाम तिहारो चाहे तो पार करो।एक लोहा पारस में राखत एक घर बधिक परो, जे दुविधा पारस नहीं जानत कंचन करत खरो कि प्रभुजी मेरे अवगुण चित न धरो।एक नदिया इक नार कहावत मैलो नीर बहो, जब मिलि एक वरण भई सुरसरि नाम परो कि प्र

ठोकरें भी सिखाती हैं........

 सफर जारी है...922

30.04.2022

जीवन का हर अनुभव आपको समृद्ध बनाता हैं खासतौर पर जब आपको ठोकर लगती है, आप गिरते हैं, चोटिल होते हैं और माता पिता गुरु की सीख को याद करते हुए धूल झाड़ कर उठ खड़े होते हैं।बचपन में गिर जाने पर फिसल जाने पर बड़ों dvaaraa कह दिया जाता चींटी मर गई यानी गिरने से तुम्हारा नहीं अगले का ही नुकसान हुआ है, गिर गिर कर ही खड़े होना सीखते हैं और हम बच्चे कपड़ों की धूल झाड़ उठ कर खड़े हो जाते और आगे बढ़ जाते।गिरने पर रोते तभी तक थे जब तक कोई उठाने वाला और पीठ सहलाने वाला सामने हो कि कोई बात नहीं, ऐसे तो गिरते ही रहते हैं।चलो उठो धूल झाड़ो आगे बढ़ जाओ।संभल कर चलना सीखो।फिर बड़े होते ये आदत में शुमार हो गया कि जीवन में इन घटनाओं से सबक लेते आगे बढ़ जाओ, वहीं चिपके मत रह जाओ।ये ठोकरें आपको सिखाने के लिए, नए पाठ पढ़ाने को ही आती हैं।तब से गिरते पड़ते नये नये चरित्रों से टकराते रोज सीख ही तो रहे हैं।इतनी जिंदगी बीत गई पर अभी तक आधे सबक भी याद नहीं हो पाए।जब तक पुराने सबको को दुहरा दुहरा कर पक्का करें तब तक एक नये सबक से साबका पड़ जाता है।

          हर तीसरा सामने वाले को बेबकूफ और खुद को बेहद अक्लमंद और तुम्मन खां समझे बैठा है।ऐसे ऐसे व्यक्तित्वों से दुनिया भरी पड़ी है कि बस पूछो ही मत।अब दो दिन पहले की ही बात ले लो कि ऐसे अड़ियल टट्टू से पाला पड़ गया कि कुछ पूछो ही मत।बात पूरी बता के दे नहीं और पूछने पर हर बार इधर से उधर सरका दें,कि आज कल में हो जाएगा, बस मैम आप बिलकुल चिंता मत कीजिये।हम हैं न, सब कर लेंगे ।बस आप निश्चिन्त रहें।पर जिसके पास दायित्व हो वह भला निश्चिन्त बैठ कैसे सकता है।तो जब बादल बिल्कुल ही सिर पर घिर आये तो घबराहट और बैचेनी बढ़ने लगी कि अब तो मूसलाधार के आसार हैं पर न कहीं छये की व्यवस्था है और न ही छाता रेनकोट दिख रहे हैं।और अगले ने सम्पर्क के सारे साधन बन्द कर रखे हैं।चौबीस घण्टे पहले तो अलर्ट हो ही जाना चाहिए और यहां तो सोता पड़े हुए हैं, सब सूमसाम से।लग ही नहीं रहा कि कुछ बड़ा आयोजन होने को है।खैर चुप्पी इसलिए साध ली कि कभी कभी अगला बड़े बड़े सरप्राइज चुपके से देता है और आपको अचंभित कर देता है।आप सोचते ही रह जाते हो कि अरे हमने तो सोची जे कछू नाय करेगो पर जाने तो सब चमाचम कर दयो।काहू ए सल हू नाय परी और सब रज की तज कर दयो।सोचे तो यही बैठे थे पर सारे अरमानों पर पानी फिर गया जब मिस्टर सो एन्ड सो अंतिम क्षण पर व्यस्तताओं का रोना रोते प्रकट हुए और जब व्यवस्थाओं का जायजा लिया तो पता चला कि सरप्राइज तो था ,कार्यक्रम वैश्विक के स्थान पर वन मैन शो में बदल दिया गया था।पर्चे में जिन्हें होना चाहिए था वे सिरे से गायब थे और अपनों को रेवड़ियों का बांट बखरा कर दिया गया था।अच्छा तो अब समझ आया कि इतनी टालमटोल इसलिए की जा रही थी और हम थे कि आंखें मूंदे विश्वास किये बैठे थे कि अगला कह रहा है तो सब हो ही गया होगा, सब कर लिया होगा।खैर आनन फानन में युद्ध स्तर से सब व्यवस्थित किया गया ।

          तो एक सबक और मिला कि अपना काम और साझे के काम में अंतर होता है।किसी के भरोसे आंख मूंद कर काम छोड़ कर नहीं बैठा जा सकता।संयुक्त साझेदारी में आपकी भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है, आपको हर समय सावधान होना होता है।हर घड़ी सीसीटीवी कैमरे की तरह चुस्त और सावधान होना होता है।सारी गतिविधियों पर आई वाच रखनी होती है।अगले को बार बार झकझोरना होता है और इतने पर भी अगला मक्कड़ किये बैठा रहे, इधर से उधर करता रहे तो भविष्य के लिए साझे के काम में हाथ डालने से बचना चाहिए। ये जिंदगी रोज नया पाठ पढ़ाती है, रोज लगती ठोकर चेताती है कि बहुत आंख खोलकर,सर्पिल घुमावदार रास्तों की जटिलता समझ कर चलना आपके हित में है।तो ठोकरों से सबक लेना जरूरी है दोस्तो ।

Thursday, May 19, 2022

परिचय इतना इतिहास यही

 सफर जारी है....889

28.03.2022

महादेवी गरीयसी महीयसी हैं, आधुनिक युग की मीरा कही जाती हैं, छायावाद के स्तम्भ की मजबूत कड़ी है, उनके संस्मरण उनकी संवेदनशीलता और अपनत्व के आईने हैं, वे कविता लिखती हैं, गद्य लिखती हैं, संस्मरण लिखती है पर जब परिचय की बात आती है तो लाज शर्म से सिकुड़ कर बस इतना ही कह देती है विस्तृत नभ का कोई कोना, मेरा न कहीं अपना होना, परिचय इतना इतिहास यही, उमड़ी कल थी मिट आज चली।

सच में महनीय लोग इतने ही विनम्र होते हैं कि वे अपने गुणों को कभी प्रकाशित नहीं करते, अपने विषय में कभी डींग नहीं हांकते।उनकी खुशबू तो स्वयम ही उड़ उड़ कर चारों ओर बिखर जाती है।रहिमन हीरा कब कहे लाख टका मेरो मोल।हीरे की परख जौहरी ही कर पाता है।और फिर हीरा कौन दुकानों में सज के बिकता है। वह तो खदानों में खानों में मिट्टी के नीचे दबा कुचला पड़ा रहता है ,टेढा मेढ़ा सा।कितनो को तो वह हीरा सा लगता ही नहीं।अब हीरा तो हीरा है, उसे तो तराशना होता है, खोजना होता है और जब तराशा जाकर किसी आभूषण में नग बन जड़ जाता है तो बस इतना जगमगाता है ,इतना दिपदिपाता है कि आंखें चुंधिया जाती है।समंदर के किनारे किनारे चलने वालों को मोती भला कब मिला करता है, वह तो उनके हाथ ही लगता है जो गहरे जाते हैं।जिन खोजा तिन पाईया गहरे पानी पैठि, हों बौडी ढूढन गई रही किनारे पैठ।महादेवी को जानना है तो उनकी रचनाओं के सागर में गहरे डूबना होता है।दसवीं कक्षा में उनकी शैली याद करते बस जीवन परिचय और रचनाएं ही रटा करते थे।भाषा शैली और संवेदना से परिचय तो तब हुआ जब स्मृति की रेखाएं पढा, गौरा, गिल्लू ,घीसा को पढा, अतीत के चलचित्र पढा, सोनजुही को पढा।जिन महिला अधिकारों और स्वतंत्रता की बातें आज की पीढ़ी करती है और स्वच्छंदता को ही स्वतंत्रताका पर्याय मानती हैं,उन्हें तो वे कब का प्राप्त कर चुकी थीं।वे सिखाती है अधिकार मांगे नहीं जाते, उन्हें तो लिया जाता है।वस्त्रों की स्वतंत्रता से विचारों की स्वतंत्रता घोषित नहीं होती।वे सीधे पल्ले की साड़ी पहने सिर पर आँचल लिए ही महिला विद्यापीठ की स्वामिनी बन जाती हैं,खुद तो आगे आती ही हैं,सुभद्रा जैसी मित्रों को भी आगे लाने के लिए दृढ़ संकल्पित होती है, कितनी कितनी लड़कियों के लिए शिक्षा का द्वार खोल देती हैं।स्वभाव से बेहद सरल हैं ।राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद से मिलने जाती हैं तो रेलगाड़ी में सूप साथ धर ले जाती हैं।उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई क्या कहेगा।

ऐसा पारदर्शी मन है उनका जो सब कह देता है ।अंदर कुछ नहीं रखता।राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद जी के पास पहुंचती है और भोजन के समय जब पता चलता है कि आज तो उनका एकादशी उपवास है तो महादेवी मन ही मन सोच लेती हैं कि बस आज तो आनन्द आ गया, खूब फलाहार, मिठाई, दूध, दही की दावत मिलेगी पर उन्हें आश्चर्य होता है जब इतने उच्च पद पर आसीन व्यक्ति को अर्धांगिनी सहित जमीन पर बैठ उबले आलू से व्रत का पारण करते देखती हैं।वे भी सुखपूर्वक वही खाती है और एक पाठ सीख लेती हैं कि बड़े होना सरल और सह्रदय होना है।दर्प विहीन होना है।वे इतनी सह्रदय हो पाती हैं क्योंकि उनके परिवेश में सब संवेदनशील ही हैं।

आम व्यक्ति को यदि वैवाहिक जीवन में अपेक्षित नहीं मिलता तो वे टूट जाते हैं, निराश हो जाते हैं, डिप्रेशन में चले जाते हैं या बहुत ही एग्रेसिव हो जाते हैं और सब कुछ तहस नहस कर देते हैं पर महादेवी ऐसा कुछ भी नहीं करतीं, बाल विवाह होता है उनका, गृहस्थी नहीं बस पाती ।वे कोई हायतोबा नहीं करती, कोई केस नहीं ठोकती,बस शांति से अपने को रचनात्मक कार्य में लगा देती हैं।अपने दुख को भुला जगत के दुख दूर करने में स्वयम को झौंक देती हैं।मैं नीर भरी दुख की बदली में उन अकेले के दुख की बात नहीं है। स्पंदन में चिर निस्पंद बसा, क्रंदन में आहत विश्व हंसा, नयनोँ में दीपक से जलते, पलकों में निर्झरणी मचली, मैं नीर भरी दुख की बदली।

वे साहित्याकाश में द्युतिमान नक्षत्र हैं।हम स्त्रियों के लिए प्रेरणा हैं।हमारी आदर्श हैं।उन के कद तक पहुंचने के लिए तो ढेरो ढेरो मंजिल पार करनी होती हैं।इतना बूता सबका कहां हो पाता है।हां,वे आपकी पसंदीदा साहित्यकार हों, आपके मन में रची बसी हों, उनकी रचनाओं को पढ़ते आप उन्हें अनुभूत कर पाते हों तो यही बड़ी उपलब्धि होगी।महादेवी महा देवी ही हैं, उनकी अष्टभुजा भले से न दिखती हों पर उनके साहित्य की व्यापकता उन्हें वाकई देवी के पर आसीन कर देती है।

का करि सकत कुसंग

 सफर जारी है

24.03.2022

सत्संगति किम न करोति पुनसाम, बड़ी महिमा गाई गई है सत्संगति की।सज्जन पुरुषों का साथ ही सत्संगति है और सज्जन पुरुषों का अर्थ भी बता दिया गया कि जिसे देख आपकी बांछे खिल जाए वे होते हैं संत।बड़े भाग तब जानिए जब मिलने आबे सन्त, सन्तन को मिलनो करे सब दुखन को अंत।सन्त हिरदय नवनीत समाना जो पराये दुख से भी द्रवित हो जाता है।परोपकाराय सतां विभूतय:।फिर सन्तो के लक्षण भी गिना दिए गए कि वृच्छ कबहू नहि फल भखे नदी न सन्चे नीर, परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर।चित्त प्रसन्न हो जाता है, बुद्धि की जड़ता दूर होती है,वाणी में सत्य का संचार होता है पाप दूर होता है,और भी जाने क्या क्या संतों के मिलने से सम्भव हो जाता है।सो एक सूत्र रटा दिया गया कि हमेशा अच्छे लोगों का संग करो।

पर दुनिया तो संतो के साथ असन्तों से भी भरी पड़ी है तो कैसे चुनें सज्जनों को तो उसके भी उपाय गिना दिए गए, आबत ही हरषे नहीं नैनन नहि सनेह, तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसत मेह।रहीम भी पट्टी पढ़ाते रहे रहिमन रहिला की भली जो परसे चित लाय, परसत चित मैलो करे सो मैदा जरि जाए।कबीर भी हाथ भर आगे बढ़ आये रूखी सूखी खाय के ठंडा पानी पीब, देख पराई चूपरी मत ललचावे जीभ।सो अच्छे बनने भले बनने और बुरों से बचने की सीख सब देते रहे पर दुनिया में केवल अच्छे ही अच्छे थोड़े ही भरे पड़े हैं तो यह भी सिखा बता दिया गया कि कहो रहीम कैसे निभे बेर केर को संग, वे डोलत रस आपने उनके फाटत अंग।फिर भी ऐसों के साथ रहना ही पड़ जाए तो जिमि दसनन महुँ जीभ बिचारी जैसे रहो, विभीषण रहा कि नहीं रावण की लंका में, प्रह्लाद हिरण्यकशिपु के साथ और ध्रुव सुरुचि के साथ जिसने उसे पिता की गोद से ही उतार दिया और माता सुनीति ने भगवान प्राप्ति की राह दिखा दी।तो असज्जन मिल जाये, उनके पड़ोस में बसना ही पड़ जाए तो  उनसे भिडो मत, उपेक्षा भी मत करो उन्हें बुरा लग गया तो तुम्हारी सात पुश्तो तक की खबर ले लेंगे तो तुलसी बाबा लिख गए बन्दो संत असज्जन चरना।अटको मत, अपनी राह चले चलो फिर भी दुष्ट बीच में आ जाये तो हाथ जोड़ लो।भिड़ोगे तो तुम्हारा ही टाइम खोटा होगा, उसका क्या बिगड़ना है भला ,वह तो पहले से ही बिगड़ा हुआ है।

    सो पहले तो कुसंग से बचने की कोशिश करो और जो मान लो कि उनके साथ रहनव ही पड़ जाए तो चन्दन बन के रहो।अपनी प्रकृति उत्तम रखो, तुम क्यों किसी से प्रभावित होते हो, प्रभावित करना ही है तो अपनी सद प्रवृत्ति से उसे प्रभावित करो।देखो चन्दन के वृक्ष पर ढेरों सांप लिपटे रहते है पर चन्दन तो अपनी शीतलता छोड़ उनका विष ग्रहण नहीं करता।बल्कि अपनी खुशबू से उन्हें ही तर रखता है।न मानो तो याद कर लो रहीम दादा की बात.. जो रहीम उत्तम प्रकृति करि सकत कुसंग, चन्दन विष व्यापत नहिं लपटे रहत भुजंग।रात दिन भुजंगों से घिरा रहकर भी अपनी शीतलता नहीं छोड़ता, विष ग्रहण करना तो दूर रहा।सो कैसे बना जाता है चन्दन वृक्ष सा जो जितना घिसा जाता है उतनी ही सुगन्ध देता है, माथे पर लेप करो तो शीतलता देता है।तुलसी इसी चन्दन को लगाने के ब्याज से ही तो राम लक्ष्मण राजकुमारों के दर्शन कर पाते हैं।चित्रकूट के घाट पर भई सन्तन की भीड़, तुलसी दास चन्दन घिसे तिलक देत रघुवीर।

    कैसे हुआ जाता है चन्दन सा शीतल कि दिन रात भुजंगों के मध्य रहकर भी उनका विष तनिक प्रभावित न करे।यहां तो भुजंग ही अपना विष छोड़ते रहते हैं, डसने को हरदम जीभ लपलपाते रहते हैं।सारा दिमाग ही खराब कर देते हैं।सारी की सारी अक्कल घास चरने चली जाती है।उनकी जहर बुझी बातें इतना असर छोड़ जाती है, दिल में ऐसी धंस गढ़ जाती हैं कि उससे आगे कुछ सूझता नहीं है।बहुत पहले एक मित्र ने कहा था क्यों दूसरे की दुष्टता से प्रभावित हो जाते हो, तुम्हारी सज्जनता का असर माहौल पर क्यों नहीं पड़ता।अगला गलत होते भी कैसे प्रभावी हो जाता है और तुम सत्यवादी और सही होते सोते भी उसके जाल में कैसे फंस जाते हो, क्यों इतना प्रभावित हो जाते हो कि अपने को ही चौपट कर बैठते हो।तुम्हारी अच्छाई सज्जनता सामने वाले को प्रभावित क्यों नहीं कर पाती, एक अच्छा हो तो पूरे माहौल को खुशनुमा कर देता है तो तुम कैसे हर बार बुराई के आगे सिर झुका उससे प्रभावित हुए रहते हो, यानी सीधी सी बात है तुम्हें चन्दन होना नहीं आता।हो जाते तो लिपटे रहें भुजंग तुम्हारा बाल बांका भी नहीं कर पाते।कुसंग की आयु ही कितनी होती है, साधु जब अपनी सज्जनता से वाल्मीकि जैसे डाकू को मरा मरा जप में लगा राम का चरित्र लिखबा लेते हैं, बुद्ध अंगुलिमाल की आंखों में आंखे डाल अपने चरणों में झुकने को विवश कर देते हैं, बाबा भारती खड़गसिंह को सुल्तान घोड़े को अस्तबल में बांधने को विवश कर देते हैं तो तुम्हारी अच्छाई तुम्हारी सज्जनता दुष्टों पर प्रभाव क्यों नहीं छोड़ पाती। अब या तो तुम्हारी सज्जनता सोलह आने खरी नहीं ,उसमें कुछ मिलावट है या अगले के संस्कार ऐसे गहरे हैं कि कारी कामर पर दूजा रंग नहीं चढ़ता।सो चन्दन बनो चन्दन कि भले ही सैकडों भुजंग लिपटे रहें पर वह अपनी शीतलता नहीं छोड़े,उस पर विष का प्रभाव हो ही नहीं।सो चन्दन बनो चन्दन।प्रभुजी तुम चन्दन हम पानी, जाकी अंग अंग बास समानी।तुम्हारी सुगन्ध सामने वाले जे नथुनों में घुस जाए, व्याप्त हो जाये,चन्दन विष व्यापत नहीं लपटे रहत भुजंग।और जो रहीम उत्तम प्रकृति का कर सकत कुसंग।vv

बातें हैं बातों का क्या

 सफर जारी है

22.03.2022

बातें मोहक होती हैं,मन मोह लेती हैं, बातों ही बातों में प्यार हो जाता है, बातें गढ़ जाती है, चुभ जाती हैं, बातें खिसिया देती है,बातें उत्तेजित करती हैं, बातें क्रोध दिलाती हैं, बातें आवेश में ले आती हैं, बातें कुछ कर गुजर जाने को प्रेरित करती हैं,बातें जिला देती हैं, बातें जीते जी मार देती हैं, बातें रुला देती हैं, बातें हंसा देती है।आखिर बात बात होती है और जहां सलीके से कही बात आपका सौ दो सौ ग्राम खून बढा देती है तो उज्जडता और बेहूदगी से कही गई बात आपके पूरे सिस्टम को हिला कर रख देती है।

बात अपने में भला होती क्या है  कुछ शब्दों का समुच्च्य ही न ,कभी शब्द मोती की तरह पिरो माला बन जाते हैं तो कहीं क्रोध आक्रोश और जहर उगलते सामने वाले को धड़ धड़ धड़ गिराते चले जाते हैं।कुछ भी साबुत नहीं छोड़ते न दिल न दिमाग।बस एक तीखी तेज कटार से अगला पिछला सब काटते चले जाते हैं।काटते उन्हें यह भी याद नहीं रहता कि वे उसी पेड़ की डाली हैं,शाखा हैं, फूल हैं, पत्ती हैं।मूल पर बार बार चोट करते यदि एकबारगी सब तहस नहस हो गया तो क्या तुम्हारा अस्तित्व बच पायेगा।मूल को सींचे बिना तो पेड़ भी नहीं लहलहाते भले ही फुलक को बाल्टी भर सींचते रहो।पर जब अगला कहता है तो अपने अंदर का सारा गन्द, सारा कीचड़, सारा मैल, सारा आक्रोश, सारी भुनभुनाहट ,सारी खुदगर्जी रह रह कर निकालता जाता है।उसे कब याद रहता है कि उसने क्या क्या कह दिया है।वह तो बस अपने को खाली करता जाता है,करता जाता है और जब एकबारगी खाली हो जाता है तो फिर नए सिरे से अपने को भरना शुरू करता है। सात पुश्तों की बात याद करता है, गढ़े मुर्दे उखाड़ता है, अनेक बार कही गई बातों को बारीक बारीक काटता पीसता है। सुनाने के लिए अपने भार को टांगने के लिए वही खूंटी चुनता है जो सब लाद लेने को तैयार हो, सीमा से अधिक वजन उठा ले, रो झींक भले ले पर अगले का रंच मात्र अहित न करे।

जो ज्यादा बोझ से खूंटी लहक गई कि टूट ही गई तो क्या जल्दी ही नई खूंटी मिल जाएगी, टूटी हुई का क्रियाकर्म तो करोगे या उसे यू ही कबाड़ में डाल दोगे।आखिर तो इतने लम्बे समय तक तुम्हारी कहनी अनकहनी का बोझ चुप उठाये चली जा रही है कि कभी तो अगले को बुद्धि आएगी,कभी तो सोच पायेगा कि आखिर वह बोल क्या रहा है। ऐसों को अपसेट माइंड की श्रेणी में  नहीं रखा जा सकता, वे डिमेंशिया के शिकार तो बिल्कुल भी नहीं है, होते तो उन्हें अपने और अपनो के हित की एक एक बात भला याद रहती , वह अपने को कहीं कच्चा नहीं पड़ने देते, आश्चर्य की बात है लाख गुस्से में हों ,कहीं गच्चा नहीं खाते।विष बुझे तीर जने कहां कहां से निकाल कर लाते हैं कि उनका कोटा कभी खत्म नहीं होता।वे सीखे सिखाये पढ़े पढाये हैं, सारा दिन सी आई डी की तरह नये नये प्लान गढ़ने में लगे रहते हैं।उन्हें इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितना बहूमूल्य समय यों ही बीता जा रहा है।सुनने वाले का क्या, वह तो तब तक सुन रहा है जब तक चिपक है ,लाग लपेट है, सम्बन्धो की ऊष्मा है नहीं तो छूटने में भला कितना समय लगता है।चाहे तो सब वहीं का वहीं झाड़ झूड कर मुक्त हो जाये , अगला पिछला  सब हिसाब चुकता कर ले। ब्याज को छोड़ भी दे तो भी मूल ही इतना है कि देते देते चुक भले जाओ पर भाव सम्पदा का दस अंश भी न चुका पाओ।अरे कुछ देना भी सीखो, देना भौतिक सम्पदा का ही नहीं होता,किसी के मीठे वचनों का ही प्रतिदान दे दो।और जो देना सीखे ही नहीं हो तो कम से कम वाणी की शुचिता तो बनाये रखो।अगला तो इतने से ही भर पायेगा।कौन वह तुमसे कुछ लेने आया है, प्यार के दो बोल सबसे बड़ी नेमत कहे जाते हैं, उनमें तो कम से कम कंजूसी मत बरतो।वचने का दरिद्रता।

   फिर ये भी याद रखना जरूरी है कि ये सब खट्टी मीठी बातें किसी को चिपट नहीं जाती, वह तो धूल सी झाड़ कर आगे बढ़ जाता है पर तुम्हारा आंकलन खूब हो जाता है कि कितने पानी में हो।छोड़ो यार ये बातें हैं बातों का क्या।

है हार जीत तुम्हारे हाथों में

 सफर जारी है...875

14.03..2022

भक्त की महिमा न्यारी है।वह अपने ऊपर कुछ भी नहीं लेता, बस उसे भक्ति करनी आती है, प्रभु को भजना आता है।सब ईश्वर का कार्य मानकर करता है फिर परिणाम चाहे कुछ भी हो सब उसकी मर्जी मान लेता है।जीत गए तो भी भले और न जीते,हार गए तब भी कोई बात नहीं।जैसी प्रभु की मर्जी।सब उसे सौंप निश्चिन्त हो जाता है।अब सौंप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे हाथों में, है जीत तुम्हारे हाथों में है हार तुम्हारे हाथों में।बस दिन रात एक ही निश्चय दोहराता है  मेरा निश्चय बस एक यही एक बार तुम्हें पा जाऊ मैं, अर्पित कर दूं इस जीवन का सब प्यार तुम्हारे चरणों में।अपने पास कुछ भी रखने की इच्छा शेष नहीं।जो जग में रहूं तो ऐसे रहूं ज्यों जल में कमल का फूल रहे,मेरे सब गुण दोष समर्पित हों करतार तुम्हारे हाथों में।जल में कमल वत रहना इतना आसान कहाँ होता है ये तो कमल ही है जो कीचड़ में भी खिला खिला रहता है, कमल नाल भले पानी में डूबी रहे पर पत्तों पर पानी का कोई प्रभाव नहीं, सब बूंदें फिसल जाती हैं।फूल भगवान को चढ़ जाता है,बीज से मखाने बन जाते हैं और नाल कमल ककड़ी सब्जी के काम आ जाती है।अपने पास कुछ नहीं रखता, तेरा तुझको अर्पण के भाव से सब सन्सार को सौंप देता है।उसकी एक मात्र इच्छा है यदि मानुष योनि में जन्म मिले तो बस तेरे चरणों में लगन लगी रहे।यदि मानुष का मुझे जन्म मिले तो तेरे चरणों का पुजारी बनूं, इस पूजा की एक एक रग का हो तार तुम्हारे हाथों में।रसखान भी तो यही मांगते हैं... मानुष हों तो वही रसखान बसों ब्रज गोकुल गांव के गवारिन, जो पशु हो तो कहा बस मेरो चरों नित नन्द की धेनु मँझारन, जो खग हों तो बसेरों करो मिलि कालिंदी कूल कदम्ब की डारन, और पाहन हो तो वही गिरि को जो क्यो छत्र पुरन्दर धारण।नहीं पता कि किस योनि में जन्म मिलेगा बस भक्त तो एक ही बातजानता है पशु पक्षी पत्थर मानव मर्जी जिस योनि में भी जन्म दो रखना आप के चरणों में ही प्रभु, उनसे विलग मत कर देना प्रभु, बस इतनी कृपा बनी रहे।जब इस संसार में आ ही गया, इसकी माया में बन्ध गया फंस गया फिर भी प्रभु एक ही विनती है जब जब संसार का कैदी बनूं, निष्काम भाव से करम करूं,फिर अंत समय में प्राण तजूं निराकार तुम्हारे हाथों में।अंत भी हो तेरी गोद में हो, आंखों में बस तेरी छबि बसी रहे।इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले ,गोविंद नाम लेके प्राण तन से निकले ।वंशीवट हो श्री यमुना जी का तट हो,मेरा सांवरा निकट हो जब प्राण तन से निकले।मेरे मुख में गंगा जल हो और उसमें तुलसी दल हो, मुख में राम का नाम हो जब प्राण तन से निकले ।मरते मरते भी तेरी छबि आंखों में बसी रहे,बस और कोई इच्छा नहीं है प्रभु।कितनी श्रद्धा कितना विश्वास है भक्त को प्रभु आते जरूर हैं बस दिल की गहराइयों से अन्तस् से सच्चे भाव से उन्हें पुकारना होता है।भगवान और भक्त में बस एक ही भेद है।मुझमें तुझमें बस भेद यही मैं नर हूँ तुम नारायण हो, में मैँ हूँ संसार के हाथों में  संसार तुम्हारे हाथों में।तुम चालक हो हम तो सवारी हैं।बस नाव में बैठ गए, पतवार तो आप ही खेओगे।

बड़ा भरोसा है खेवनहार पर तभी मस्त होकर गाता है भक्त, मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है, करते हो तुम कन्हैया मेरा नाम हो रहा है।सब वही तो करता है, हम तो निमित्त भर हैं फिर भी सारा क्रेडिट अपने ऊपर लेते फूले नहीं समाते कि मैंने किया।पतवार के बिना ही मेरी नाव चल रही है,हैरान है जमाना मंजिल भी मिल रही है,करता नहीं मैं कुछ भी सब काम हो रहा है।सच जब प्रभु पर अगाध विश्वास हो तो काम सिद्ध हो ही जाते हैं।तुम साथ हो तो मेरे किस चीज की कमी है,किसी और चीज की अब दरकार ही नहीं है।बस एक तुझे पा लिया तो और क्या पाना शेष रह गया भला।मैं तो नहीं हूँ काबिल तेरा प्यार कैसे पाऊं,टूटी हुई वाणी से गुणगान कैसे गाऊं, सब तेरी प्रेरणा से ये कमाल हो रहा है।मुझे हर कदम कदम पर तूने दिया सहारा,

मेरी जिंदगी बदल दी तूने कर के एक इशारा,एहसान पे ये तेरा एहसान हो रहा है।प्रभु मैं तो बहुत भटक जाता हूँ पर आप हर बार संभाल लेते हो।तूफान आंधियों में तूने ही मुझको थामा, तुम कृष्ण बन कर आये मैं जब बना सुदामा,तेरे करम से अब ये सरेआम हो रहा है।करते हो तुम प्रभु जी मेरा नाम हो रहा है।प्रभु आपकी कृपा से सब काम हो रहा है।मेरा काम हो रहा है।

भाव तो जागे कि करने वाला कोई और है हम उसके हाथों की कठपुतली हैं, जैसा नचाता है नाचते हैं।सो अपने सब गुण दोष उसे समर्पित कर देने में ही भलाई है।सूरदास की तरह प्रभु जी मेरे औगुन चित न धरो, समदर्शी प्रभु नाम तिहारो चाहो तो पार करो।एक बार विनत होकर देखो तो सही, उसकी शरण गहो तो सही, उसका भजन करो तो सही, न जाने डमडम डीगा डीगा जैसा क्या क्या गाते हो, क्लब में उल्टे सीधे गानों पर थिरकते हो कभी भगवान का नाम भी ले लिया करो, दो चार भजन गुनगुना लिया करो, ठुमक लिया करो, छोटी छोटी गैया छोटे छोटे ग्वाल छोटो सो मेरो मदन गुपाल पर ठुमक लिया करो।देखना कैसा आनंद आएगा, मन खुश हो जाएगा।ये सब भले ही आधुनिकता की श्रेणी में न आता हो और मन को बहुत सुकून मिलता है।प्रभु भी हम तो चाकर तेरे।

लघु न दीजिये डारि

 फर जारी है......871

10.03.2022

लघु न दीजिये डारि.......

लघुता में भी व्यापकता छिपी है।एक छोटा सा दीपक घने अंधकार को अपनी ज्योति से चीर देता है।तभी महादेवी कहती हैं मधुर मधुर मेरे दीपक जल प्रतिक्षण प्रतिपल जीवन का पथ आलोकित कर, अज्ञेय भी यह डीप अकेला मदमाता इसको भी पंक्ति दे दो लिखते हैं।बिहारी के दोहे तो देखने में भले छोटे हों पर घाव बड़े गम्भीर करते हैं सतसैया के दोहरे ज्यों नाविक के तीर, देखन में छोटे लगे घाव करे गम्भीर।छोटी मिर्च बड़ी तेज बलमालोक में खूब प्रचलित है ही।रहीम तो दोहे दर दोहे रचते ही हैं रहिमन देख बड़ेन को लघु न दीजिये डारि, जहां काम आवे सुईं कहा करे तलवारि।सच ही तो बै छोटी सी बित्ते भर की सुई फ़टे हुए कपड़ो को सी देती है, सारे छिद्रों को रफू कर देती है, सुई का काम जोड़ने का है इसलिए दर्जी भी उसे टोपी में लगाता है, उसमें लम्बा धागा डाल के रखता हैं कहीं वह निगाह से बिलट न जाये।उसी छोटी सी नुकीली पैनी सुई से पैर में गड़ा कांटानिकाल लिया जाता है, कोई बड़े अस्त्र शस्त्र के साथ लड़ने आये पर आप छोटी सी सुई चुभोकर उसके सारे वार खाली कर देते हैं।अब सुई इतनी महत्वपूर्ण है तभी सबको जोड़ कर रख पाती है।कैंची का तो काम ही काटना है वह तो अच्छे भले नए कपड़े को भी अनेक टुकड़ो में बांट देती है वह तो सुई का ही बूता है कि सारे टुकड़ों को करीने से जोड़ कर बिल्कुल नाप की सुंदर पोशाक में बदल देती है।कैंची का काम कतरना है इसलिए दर्जी उसे पैरों के पास ही रखता है।अब चाहे जुबान हो जो कैंची सी कतर कतर चलती है और सबका बुरा बना देती है या फिर कैंची हो काम तो दोनों का एक ही है।

छोटी सी चींटी विशालकाय हाथी की सूंड में घुस जाए तो उसकी नाक में दम कर देती है, बेचारा घण्टों परेशान रहता है याद आ गई होगी दर्जी हाथी की कहानी कि कैसे दर्जी के लड़के के द्वारा फल न दिया जाकर उसकी सूंड में सुई चुभो देता है और हाथी तालाब का गंदा पानी सूंड में भरकर उसकी दुकान में डाल देता है।बस जैसा करो वैसा भुगतो।

किHछोटी सी चीटी पानी में पत्ता डाल कर फाखते को बाहर आने में भी सहायता करती है।शिकारी के पैर में काटकर उसका ध्यान बंटा देती है और पक्षी की जान बच जाती है।छोटी है तो क्या हुआ बड़े बड़े जो कर नहीं पाते उसे चुटकी बजाते कर देती है।चना न चब्बू कहानी में चिड़िया का दाना चिरी हुई लकड़ी के बीच फंस जाता है उसकी मदद चूहा बिल्ली राजा रानी बढ़ ई कोई नहीं करता, सब उसे टरका देते हैं लेकिन छोटी सी बेमालूम सी चींटी हाथी की सूंड में घुसकर उसे परेशान कर देती है और हाथी परेशान होकर वही करता है जैसा चीटी चाहती है।अंत में बढई लकड़ी चीर ढ़ेता है और नन्ही प्यारी चिड़िया को उसका दाना मिल जाता है वह दौल का दाना खुशी से चाब लेती है।

एक और कहानी याद आती है जिसमे सोते सिंह राजा को छोटा चूहा उस्ककी नाक पर चढ़ कर परेशान करता है, शेर को गुस्सा आता है वह चूहे लो अपने पंजे में दबा कर खतम करना ही चाहता है पर चूहा निवेदन कर लेता है मुझे आप छोड़ दें, कभी मैं भी आपके काम आ स्कता हूँ।शेर को हंसी आ जाती  है भला ये मरगिल्ला सा चूहा मेरी क्या सहायता करेगामममममKपर दयावश उसे छोड़ देता है।भाग्य का खेल देखिए कि वही छोटा चूहा शेर के जाल में फंसने पर अपने दोस्तों को साथ लेकर जाल काट देता है।वह तो इतना बहादुर है कि चित्रग्रीव कबूतरों की सहायता भी व्याध बहेलिया के जाल को काटकर करता है।

सच तो यह आकार प्रकार में छोटे होने से कुछ नहीं होता,सारा खेल बुद्धि का है।जहां छोटी सी सुई से काम चल जाए वहां भला तलवार का क्या काम।युद्ध हमेशा तलवारों से ही नहीं लड़े जाते,  समझदारी से भी बात बन जाती है।बात कहने का सलीका हो तो मधुर वचन से भी काम चल जाता है।सो आकार की लघुता पर ध्यान मत दो।बस ये देखो यदि अगला बुद्धि से छोटा है तो जरूर सावधान रहें।ये अक्कल से पैदल लोग खुद तो अपना कबाड़ा करते ही हैं साथ वाले को भी ले डूबते हैं।तो ऐसे लघु सोच वालों से दूरी बरतने में ही भलाई है।

शक्ति का नाम ही नारी है

 सफर जारी है.

09.03.2022

शक्ति का नाम ही नारी है.......

लो जी कर लो बात, जो शक्ति का स्वयम आगार हो, वह भला कमजोर कैसे हो सकती है, हां,कोमलता उसकी प्रकृति है पर कोमल होने से कोई कमजोर थोड़े ही हो जाता है।याद तो होगा कोमल है कमजोर नहीं तू शक्ति का नाम ही नारी है, जग को जीवन देने वाली मौत भी तुझसे हारी है।दुनिया में जीने के लिए  बल पहली आवश्यकता है और यह बल धन शक्ति और विद्या का होता है।धन की अधिष्ठात्री लक्ष्मी, विद्या की सरस्वती और शक्ति की दुर्गा हैं और तीनों स्त्री का ही प्रतिरूप है।तीनों शक्तियों ने अपने अपने वाहन भी निश्चित कर रखे हैं एक शेर पर सवारती है दूसरे उलूक पर तो तीसरी हंस पर।सौभाग्य से तीनों ही देवी के रूप में पूजी जाती हैं।बसन्त पंचमी पर मां सरस्वती, दीपावली पर महालक्ष्मी और नवदुर्गो में दुर्गा का आराधन वंदन पूजन होता है।अब यदि ये त्रिदेवियाँ शक्ति का आगार है तो हम स्त्रियां भी तो इनका ही प्रतिरूप हैं, हम भला कमजोर क्यों कही जाएंगी।

इतिहास साक्षी है खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी, विद्योत्तमा अपाला अनुसूइया के किस्से अभी पुराने नहीं पड़े, सावित्री अपने पातिव्रत बल से यमराज के मुंह से अपने पति को छुड़ा लाई, इस कथा को  हर बरस बडमावस पर ताजा कर लिया जाता है।वह विद्या बुद्धि में अपना लोहा मनवा चुकी है, अंतरिक्ष तक पहुंचकर उसने अपनी शक्ति को सिद्ध कर दिया, धनोपार्जन में वह किसी से पीछे नहीं।फिर भी वह दीन हीन उपेक्षिता क्यों है।क्या उसे अपनी शक्ति का विस्मरण हो गया है, क्या उसे हनुमान की भांति याद दिलाना पड़ेगा कि का चुप साधि रहे बलबाना।क्या वह अपने मार्ग से भटक गई है, क्या स्वतंत्रता के सही अर्थ को समझने में उससे कहीं चूक हो गई है, आखिर उसे मुक्ति चाहिए किससे,उसने अपने पैरों में खुद अपने सोच की बेदी तो नहीं डाल रखी है।कहीं उसने खुद को खूंटे से बंधा हुआ तो नहीं समझ लिया है जबकि खूंटे का अस्तित्व तो है ही नहीं, बस लम्बे समय से बंधे रहते उसे इसकी आदत सी पड़ गई है जबकि खूंटे तो कब के उखाड़ फैंक दिए गए हैं।उसने अपने घेरे स्वयम ही तैयार किये हैं और उसी में आबद्ध होकर रहना उसे रास आ गया है।

और मजे की बात यह है कि ये सब उसने स्वेच्छा से चुना है, उसे इस सब में आनन्द आता है, अपनों को भरपेट भोजन खिला कर उसे किसी मानसिक तृप्ति होती है, जन्म देते वह कैसे गौरव से भर उठती है, गृह लक्ष्मी है वह, घर की कल्पना ही उसी से है गृहणी ग्रहम उच्चयते, बिन घरनी घर भूत का डेरा।अरे सुबह से शाम तक वह परिवार के लिए ही खटती है न, इसको ये दे उसको वे दे, घर भर की छोटी से छोटी जरूरत का ध्यान रहता है उसे।आखिर वह अपने परिवार की स्वामिनी है।मकान पुरुष भले अपने बाहुबल से बना लेता हो पर घर तो उसे स्त्री ही बनाती है।वह अष्टभुजा होती है तभी न सारे काम जल्दी जल्दी सिलटा लेती है।उसे अव्यवस्था से अनख होती है सो आगे बढ़कर अपनी सारी थकान को भूलभाल कर पहले सब व्यवस्थित करने लगती है तब मुंह में हाथ देती है।उसे भला कौन निर्देशित करेगा वह खुद ही दिन भर सबको सही मार्ग सुझाती बताती रहती है।फूल से अधिक कोमल है तो वज्र से भी अधिक कठोर है।बस एक बार निश्चय कर ले तो पहाड़ को भी फूंक से उड़ा दे, कितनी भी कमजोर हो पर बच्चे की रक्षा के लिए तो रणचण्डी बन जाती है, अकेले ही दस बीस से भिड़ जाती है।वह आग का गोला है उस आग को चूल्हे के बीच सीमित कर दिया जाए तो हद भर के लिए भोजन तैयार हो जाता है और सीमाएं लांघ ले तो सब स्वाहा कर देती है।प्यार स्नेह की डोर से बांधो तो अपना सर्वस्व न्योछबर कर देती है पर उसे बेबजह बल और शक्ति से जंजीरों से जकड़ा जाय तो सारे बन्धन एक झटके में छिन्न भिन्न कर देती है।उसके भीतर सृष्टि और प्रलय दोनो पलती है।उसे कमजोर समझने की भूल भी मत कर लेना।अभी वह मार्ग से भटकी हुई है जिस दिन उसे बोध हो गया, अपनी शक्ति का स्रोत पता चल गया, अपने अस्तित्व का भान हो गया, वह नींद से जाग उठी, सब बदल जायेगा।नभी तो वह इस बात से बेखबर है उसे अपनी शक्तियों का भान ही नहीं, वह मार्ग भटक गई है, दुनिया की चकाचोंध में भटक गई है, सेमल के फूल के पीछे ताबड़तोड़ दौड़ भाग कर रही है।आनन्द स्रोत को पकड़ नहीं पाई है, आनन्द स्रोत बह रहा फिर क्यों उदास है आश्चर्य है कि जल में रहकर भी मछली को प्यास है। 

घर से तो शुरुआत होती है उसका परिवार बड़ा व्यापक है, एक घर में पलती है तो दूसरे घर को आकार देती है।माता पुता भाई बहिन के साथ नए रिश्तों को भी बखूबी निभा ले जाती है।उसे क्या परवाह उसके तो एक नहीं दो दो घर है, दो घरों का सम्बल उसके साथ है, एक घर से संस्कार पाती है तो दूसरे घर जा उसे बोती है।उसे तो दो घरों का प्यार मिलता है दशरथ से ससुर कौशल्या सी सास और लक्ष्मण से देवर उसकी कामना में रहते हैं।मान देती है मान पाती है।आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर उसे कई कई मंचों से सम्मानित किए जाने के उपक्रम हैं पर सबसे बड़ा सम्मान तो उसे अपने गौरव को याद कर मिल जाता है।उसमें सबको साथ ले कर चलने की शक्ति है, सबको एक सूत्र में बांध कर रखना जानती है वह।उसे सम्मानित करते पुरस्कार स्वयं सम्मानित होते हैं।उसके सामने संभावनाओं का खुला आकाश है, उसके पंख भी मजबूत हैं वह ऊंची उड़ान भरने को तत्पर है।उसकी दृष्टि कितनी भी दूर तक हो पर वह पैरों के नीचे की जमीन नहीं छोड़ती, जड़ों से सदैव जुड़ी रहती हैं, जानती है रहिमन सींचे मूल को फूले फल अघाय।केवल फुलक को सींचने से कुछ नहीं होता।

मानवी हो तुम, दुनिया को तुमसे बहुत सी आशाएं हैं।सच में तुम्हारे अंदर आशासों सम्भावनाओ का अथाह सागर लहराता है, बस अपनी शक्ति को पहचानो, सारे कुहरे को छांट दो, सूरज तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है, डरो मत, पूरी कायनात तुम्हारे साथ है।बस लक्ष्य से भटक मत जाना।सारा जहां तुम्हारा है।कोमल भले ही हो पर कमजोर नहीं हो, शक्ति की स्रोत हो बस पहचानो उसे और स्वयमसिद्धा और खूब सामर्थ्यवान बनो।शक्ति अपने अंदर से आती है बाहर से इंजेक्ट करने से नहीं।शक्ति की आगार तुम्हें शत शत नमन।

Thursday, April 28, 2022

नाथ न कछु मोरी प्रभुताई

 सफर जारी है...855

23.02.2022

प्रभु को भजो सच्चे मन से तो प्रभु भी सुनें।पर लोग करते तो अपने मन की हैं और जब सब गुड़ गोबर हो जाता है, नैया बीच भंवर में डूबने लगती है अपने सारे हाथ पैर मारने के बाद भी हाथो के तोते उड़ जाते हैं कुछ हाथ नहीं आता तब उसे प्रभु याद आते हैं कि कि ऐसे में उसकी नैया प्रभु ही पार लगा सकते हैं,तब जाकर कहीं उनका नाम सिमरन होता है और वह भी केवल तब तक के लिए जब तक उसका काम बन जाये जैसे ही बात बनी अपनी फुल फोरम में आ जाता है और सारा सेहरा अपने सिर बांध लेता है कि उसने ये किया उसने वो किया।जब वह प्रभु को ही नकार देता है तो भला आदमी की उसके सामने कटा औकात, उसका तो धर्म ही है अपना काम बनता भाड़ में जाये जनता, उनका अपना पेट हाऊ होता है दूसरा भूख से मरे तो मरता रहे, उनकी थाली में छप्पन भोग चाहिए चाहे अगले की प्लेट में सूखी रोटी भी न हो।दुनिया भरी पड़ी हैं ऐसे बेंपैदी के लोटो से, जिनका कोई धर्म ईमान नहीं होता, ये थाली के लुढ़कने बैंगन होते है जहां लाभ मिले वहीं के हो जाते हैं।गिरगिट की तरह कभी भी रंग बदल लेते हैं गंगा गए गंगादास जमुना गए जमुनादास।इनका अपना कोई स्टैंड पॉइंट नहीं होता,सिवाय स्वार्थ के।बस जहां से ये पूरा होता हो वहां गधे को भी बाप बना लेते हैं, वैसे खाने में बड़े नखरे हैं पर मुफ्त का मिले तो सब उदरस्थ कर लेते हैं डकार तक नहीं लेते।

अब क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी नीयत छिपी रहे, नकली चेहरा सामने आए असली चेहरा छिपा रहे।वे कुछ करें या नहीं करें पर बात बनाने में नम्बर वन होते हैं, ऐसा समा बांधते है कि सबको लगता है कि भाई ये बड़े तीसमारखां है।और जो दिन भर खटते हैं, अपना भरपूर देते हैं वे चुपचाप बैठे रहते हैं कि कर दिया काम हो गया अब उसे बखानने की क्या जरूरत।आता था तो कर दिया, कर्तव्य और दायित्व के दायरे में आता था, करना ही था सो कर दिया, इसमें हल्ला गुल्ला मचाने,ढिंढोरा पीटने की क्या सबको बताने की क्या जरूरत है?वैसे भी खाली बर्तन ज्यादा आवाज करते हैं थोथा चना घना बजता है और अधजल गगरी बहुत छलकती है।भरे पूरे तो लबालब होते हैं अपने खोल में रहते हैं,उन्हें जताने की जरूरत ही नहीं होती।वे खजूर के पेड़ की तरह ऊंचे नहीं होते कि न किसी को छाया मिले और फल अति दूरी पर लगें कि कोई तोड़ ही न पाए।वे तो फलों से लदी डाली से सबके लिए सुलभ होते हैं कि छोटा बालक भी हाथ बड़ा कर तोड़ ले।

विनम्रता उनकी खास पहचान होती है, बड़े बड़े कार्य पलक झपकते कर जाते हैं पर बिल्कुल सामान्य बने रहते हैं।सारा प्रताप रघुराई का बता देते हैं प्रभु मैं क्या करने योग्य हूँ ये तो सब तुम्हारी कृपा थी तुम्हारा अनुग्रह था।याद आता है रामचरित मानस का प्रसंग कि हनुमान लंका दहन कर आते हैं, भगवान राम उनसे सारा प्रसंग पूछ रहे हैं हनुमान चाहते तो एक एक प्रसंग को रच पच कर विस्तार के साथ बता सकते थे, भगवान राम की नजरों में हीरो बन सकते थे, इस अवसर को पकड़ सकते थे, कुछ भी मांग सकते थे पर वे अपनी प्रसंशा आप नहीं करते, अपने मुंह मिया मिठ्ठू नहीं बनते, बहुत ही सहज भाव से राम के प्रश्नों का उनकी जिज्ञासा का जबाब देते हैं।प्रभु पूछ रहे हैं कहु कपि पालित रावण लंका ,केहि विधि दहेउ दुर्ग अति बंका।यह सब तव प्रताप भगवाना,बोला वचन विगत हनुमाना।शाखामृग के बड मनुसाई साखा ते साखा पर जाई,नाघि सिंधु हाटकपुर जारा,निसिचर गन विधि विपिन उजारा।सो तव सब प्रताप रघुराई,नाथ न कछु मोरी प्रभुताई।ता कहु प्रभु कछु अगम नहिं जापर तुम अनुकूल,प्रभु प्रताप बड़वालनहि जारि सकई खलु तूल।

सब प्रभु का प्रताप बता दिया अपने ऊपर कोई श्रेय नहीं लिया ।नाथ न कछु मोरी प्रभुताई, मेरा कुछ नहीं, मैं तो अधम हूँ, प्रात लेई जो नाम हमारा, ताहि दिन मिले नहि आहारा,ऐसे दरिद्री पर आपने कृपा की प्रभु, हम तो साखामृग हैं एक साखा से दूसरी पर उछलते रहते हैं, इसमें हमारा क्या।बस आपकी कृपा से सब हो गया नाथ न कछु मोरी प्रभुताई, सो तव सब प्रताप रघुराई।हनुमान चाहते तो समुद्र लांघने से लेकर लंका दहन के प्रसंग को खूब नमक मिर्च लगा अतिशयोक्ति पूर्ण तरीके से वर्णन कर सकते थे, उनका कार्य वाकई बड़ा था पर उन्होंने इतने बड़े कार्य को केवल दो पंक्ति में बयान कर दिया । नाघि सिंधु हाटकपुर जारा, निसिचरगन विधि विपिन उजारा बस इसके आगे कुछ नहीं, बात ही समाप्त कर दी और फिर प्रभु का प्रताप बखानने लगे सो सब तव प्रताप रघुराई, नाथ न कछु मोरी प्रभुताई।प्रभु तुम जिस पर दयालु हो जाओ जिस पर अपनी कृपा बरसा दो जिसके अनुकूल हो जाओ वहां सब सम्भव हो जाता है, कुछ भी अगम नहीं रहता।

जब जब येप्रसंग पढा और दोहराया जाता है सोचने पर विवश कर ढ़ेता है कि हम हनुमान सी भक्ति क्यों नहीं रख पाते, करते दस है तो बखानते हजार हैं, हमेशा अपने को हाइलाइट करने की कोशिश में लगे रहते हैं, सारा सेहरा अपने माथे बांधना चाहते हैं कि कलगी मेरे सिर ही सजे, सारा क्रेडिट मुझे ही मिले।बिल्कुल भूल जाते हैं कि बिना ईश कृपा के तो आप एक पग भी नहीं चल सकते।और उसकी कृपा बरस जाए तो बिनु पग चले सुने बिनु काना, कर बिन कर्म करे विधि नाना।तो बनी रहे उसकी कृपा,कहते दुहराते रहें... नाथ न कछु मोरी प्रभुताई, तव सब प्रताप रघुराई।प्रभु आपकी दया से सब काम हो रहा है, करते हो तुम प्रभुजी मेरा नाम हो रहा है।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...