Thursday, September 15, 2022

ये अविस्मरणीय यात्राएं

 सफ़र जारी है....1058

17.09.2022

ये अविस्मरणीय यात्राएं......

यात्राएं बहुत अनुभव संपन्न बनाती हैं बशर्ते आप आंख कान खुले रखें।गुजरात से गुजरात यानि सूरत से अहमदाबाद की यात्रा ने समझाया कि खाखड़ा, फाफड़ा,थेपला, गांठिया, खारे में भी मीठा, सींगदाना, कपडे , गरबा और हीरे का पर्याय ही  नहीं है गुजरात, बल्कि इससे इतर भी बहुत कुछ है जो गुजरात को गुजरात बनाता है। यहां की मिटटी में कुछ तो खास है जो इसे औरों से अलग करता है। नर्मदा, गोदावरी और कावेरी की त्रिवेणी है यहां, साबरमती है, यह गांधी और कालेलकर की जन्मभूमि है, लोग मिलनसार है, उनकी बोली में मिठास में है और सबसे बड़ी बात है कि अगले को ठगने का भाव नहीं। साबरमती के संत का आश्रम है, बा कुटीर 

 है, उसे देखते देखते वर्धा का सेवाग्राम  याद आ जाता  है।

               सच तो यह है कि कोई भी शहर आपके दिल और दिमाग़ में जगह बनाता है कि आपका संपर्क कैसे लोगों से हुआ, कौन कौन मिला, किस किस से मुलाकात हुई, किस किस को सुना आदि आदि। ये सारे के सारे प्रभाव आपकी यात्रा को सुखद अथवा कष्टकारी बनाते हैं। फिर आपके स्वभाव पर भी निर्भर करता है कि आप स्थितियों को किस तरह ग्रहण करते हैं, खुशमिजाज हैं या रोतडे हैं, छोटी छोटी बातों को दिल से लगा लेते हैं या हर फिक्र को धुंए में उड़ाते चलते हैं। आज सभा को संबोधित करते माननीय शास्त्री जी ने जब पुण्य का अंग्रेजी वर्जन पूछा तो सब बिलकुल मौन हो गए। उसका अंग्रेजीकरण हो ही नहीं सकता क्योंकि उस भाषा में पुण्य की कल्पना है ही नहीं ।विभिन्न क्षेत्रों में हिंदी के कार्यान्वयन में जुटे लोगों से मिलकर लगा कि विद्यालय, महाविद्यालयों, संस्थानों के अतिरिक्त भी हिंदी खूब फल फूल रही है। सब खूब खूब काम कर रहे हैं। बहुत जागरूक और समर्थ है। सबके पास सपने हैं, मंजिल की ऊंचाइयां है, साधन भले से कम हों लेकिन जज्बा कमजोर नहीं है। कुंए के मेढक बने बैठे रहो और उसी पानी को जगत समझते रहो तो तुम्हारी मर्जी, काम की अधिकता का रोना रोते रहो, उसे ही घोटते पीसते रहो तो कोई क्या कर सकता है। बाहर बास निकल कर समझ आता है कि हम कितने पानी में हैं, हमें क्या क्या और सीखना है, हम पिछड़ क्यों रहे हैं, अपने को अपडेट क्यों नहीं कर पा रहे हैं। असली मूल्यांकन तो बराबर वाले लोगों में बैठकर ही होता है नहीं तो घर में ही अपुन तुपन कर के तीसमारखा बनते रहो, मैं ये मैं वो करते रहो, जंगल में मोर नाचा किसने देखा।

      कितना कितना काम करते हैं लोग, केरल के संतोष अलेक्स ने जब बताया कि अनुवाद पर इनकी इतनी इतनी किताबें प्रकाषित हैं और तीन विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में लगी हैं तब लगा हम तो यूं ही रह गए। लोगों से मिलिए तो ,तब अपना आंकलन होता है, तब ऊंट पहाड़ के नीचे आता है। इस हवाई यात्रा में छोटी सी मुलाकात में ही गहरी छाप छोड़ गई पंजाब नेशनल बैंक, देहरादून की राजभाषा अधिकारी अरुणा ज्योति , जो पत्रिका भी निकालती हैं, खूब लिखती पढ़ती हैं, खूब व्यवहार कुशल और खुशमिजाज है, जल्दी ही सबके दिलों में जगह बना लेती हैं, बिंदास जीती हैं। अभी भी उसका मुक्त हास्य कानों में गूंज रहा है। प्रिय विशेष, अनामिका सिन्हा, परमेश्वर पाठक, डाक्टर अर्चना दुबे और भी न जाने कितने कितने परिचित चेहरे गड्डमद्द हुए जा रहे हैं, कुछ की शक्लें दिमाग में चस्पा हैं लेकिन नाम याद नहीं आ रहे हैं। और जो आज की यात्रा के वाहन चालक थे, रवी व्यास उनके शिष्ट व्यवहार ने  बहुत प्रभावित किया। वे जब अपने परिवार के विषय में जानकारी दे रहे थे तो लग रहा था लोग वैसे ही संस्कार हीनता की बात करते हैं, संस्कारी पिता अपने बच्चो में कूट कूट कर संस्कार भर देता है। दरअसल वह निर्देश देकर या उपदेश देकर नहीं सिखाता, अपने आचरण और व्यवहार से कथन को पुष्ट कर देता है, कहने की तो जरूरत ही नहीं पड़ती।

      यात्राएं मुझे अनुभव की दृष्टि से बहुत संपन्न करती हैं। हर बार कुछ नए पाठ जुड़ जाते हैं। अभी कल के प्रसंग और शेष है और फिर परसो सुबह जैसे उड़ जहाज को पंछी फिर जहाज पे आबे, की तर्ज पर अपने कार्यस्थल पहुंचे जाते हैं। सूरत यात्रा से जुड़े सभी सहयोगियों का आभार कि यात्रा को सुखद और अनुभव संपन्न बनाया।

सूरत का हिंदी मेला

 सफ़र जारी है....1057

15.09.2022

सूरत का हिंदी मेला......

हिंदी दिवस का पुण्य पर्व दो दिवसीय द्वितीय राजभाषा सम्मेलन के आयोजन के ब्याज से हिंदी की त्रिवेणी बही सूरत में। हां हां, वहीं सूरत जो गुजरात में है और जिस गुजरात ने शीर्षस्थ  नेतृत्व सहित सरदार बल्लभ भाई पटेल काका कालेलकर, महात्मा गांधी , दयानंद सरस्वती सदृश महापुरुष भारत को दिए हैं। लोग तो ये मुंह और मसूर की दाल पर कहने में जुटे थे कि ये सूरत और सूरत जाने का सपना पाले बैठे हैं जनाब। पर हिंदी के सम्मेलन किसी की सूरत पर थोड़े ही टिके होते हैं। वे तो सबके लिए सहृदय होते हैं, संवेदन शील होते हैं।हिंदी जन जन की भाषा है तो फिर आपकी सूरत ऐंचक बैंचक कैसी भी हो, वे आपकी सीरत देखते हैं और आपको आयोजन का हिस्सा बना ही लेते हैं फिर चाहें वक्ता हो ,श्रोता हो या दर्शक। मुख्य भूमिका में हों या सहायक, आप सम्मेलन के अनिवार्य हिस्से बन ही जाते हैं, अरे जब माननीय विद्वान बोलेंगे तो सुनने वाले भी तो चाहिए जो सुनकर जरुरी बातों को नोट कर उसे प्रसारित प्रचारित करें और अपने आचरण और व्यवहार में लाएं, उसे अपनी कार्य पद्धति में शामिल करें।

            हिंदी वालों के भाग से इस बार छींका सूरत में फूटा और हर तरह की सूरत वाले बन ठन कर सूरत पहुंच ही गए , उन्हें पहुंचना ही था क्योंकि हिंदी तुलसी की भवितव्यता की माफिक अपने चाहने वालों को, प्रेमियों को अपने पास बुला ही लेती है ... ताहि तहां ले जाए । फिर जो हिंदी के लिए दृढ़ संकल्पित होते हैं, वे तो किसी भी सूरत में सूरत पहुंच ही जाते हैं।ये जो हिंदी का मेला है, शिष्ट भाषा में इसे सम्मेलन कहा जाता है क्योंकि इस स्थल पर एक से सोच वालॉ और हिंदी के प्रचार प्रसार में लगे, उसके लिए पूर्णत समर्पित साधकों का सम्मिलन जो होता है। आयोजक मंडल तो अपने पूरे लाव लश्कर,सामान असबाब के साथ हफ्तों पहले से वहीं डेरा डाल देते हैं तब न आयोजन की इतनी दुरुस्त और चाक चौबंद व्यवस्था हम सब के लिए जुटा पाते हैं। और हम जैसे प्रतिभागी इलेवंथ आवर पहले भाग्मभाग करते ही सही,उड़नखटोला से  उतर सूरत मेले में सम्मिलित हो जाते हैं और सूरत की सूरत देख कर ही दम लेते हैं।

देखा तो सूरत बीस पच्चीस साल पहले भी था पर तब संदर्भ बाल गोपालों की पढ़ाई को लेकर था। इस बार हिंदी रंग में रंगे पगे और हिंदी भाव से भरे पूरे थे। तो और हिंदी इतनी गहरा रही थी, मन उछाह से बाबला हुआ जा रहा था कि अपने दल बल के साथ आ पहुंचे सूरत शहर में। 

 शहर सूरत की सूरत देखने में हमारी सूरत से क्या लेना देना था, वैसे भी कहन है नेक कामों में सूरत से कुछ नहीं होता, सीरत अच्छी होनी चाहिए। तो कुछ से सूरत यानि विशेष प्रभाव के साथ और कुछ अपनी सीरत के सर्टिफिकेट शो कर सूरत पहुंच गए। सभागार के मीलों आसपास विशाल जन समूह बिखरा था। सभी रंग बिरंगे परिधानों में अपने गले में परिचय पत्र लटकाए और प्रवेश पर्ची हाथ में पकड़े पंक्ति बद्ध खडे थे, बिल्कुल अनुशासित सिपाही की तरह। आख़िर ये सब हिंदी के योद्धा हैं जिन्हें शांति और गंभीरता के साथ पुरजोर तरीके से अपनी बात रखनी आती है। वे कहते कम करते अधिक हैं । उनका मानना है बात नहीं काम बोलता है। कितने कितने नए परिचय खाते में जुड़ गए, पटर पटर बोलने वाले, अपने को कुछ विशेष दिखाने वाले, बड़बोले टाइप और मौन हिंदी साधक जो स्वयं में ज्ञान आगार हैं, चलते फिरते पुस्तकालय हैं , सूचनाओं के अधिकृत स्रोत हैं।तो ऐसे हिंदी साधकों और हिंदी प्रेमियों से मिलना स्वाभाविक रुप से सुखद होता है। ऐसे मेले ठेलो में हिंदी प्रेमियों का जमावड़ा होता है, परिचय बढ़ता है, नई नई सूचनाएं मिलती है और आप भरे पूरे हो जाते हैं। आपस में हिंदी का सुख दुख बतरा लेते हैं, मन की कह सुन लेते हैं और हिंदी को शिखर पर ले जाने के रास्ते खोज लेते हैं। चिंतन मनन, आपसी वार्तालाप, और कहने सुनने से ही तो रास्ते निकलते हैं।

 पुस्तक प्रदर्शनी के ब्याज से अन्य प्रकाशनों, हिंदी के क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न अनुशासनो की कार्य प्रकृति को दिखने का अवसर मिला। नया सीखने के मौके हर जगह होते हैं बस सीखने जानने का मानस बना रहे। माननीय राज्य शिक्षा मंत्री, राज्य गृह मंत्री और केन्द्रीय गृह मंत्री का केन्द्रीय हिंदी संस्थान के प्रकाशन स्टाल पर आना और हमारा उन्हें गुजराती, सौराष्ट्री , चरोत्तरी भाषा के अध्येता कोष भेंट कर पाना संस्थान को गौरव भाव से भर देता है। जहां हिन्दी है, हिंदी की बातें हैं, हिंदी के विषय में विचार विमर्श है, हिंदी की पड़ताल है, हिंदी के उज्ज्वल भविष्य के सपने हैं, हिंदी का गौरवशाली इतिहास और परंपरा है, वह स्थान हम हिंदी साधकों के लिए पुण्य भूमि ही है। सादर नमन वदन करते दूसरे दिन के कार्यक्रमों में भागीदार बनते हैं। जय हिंदी जय भारत के उद्घोष के साथ कामना है कि ये हिंदी मेले लगते रहें और हम आप सभी से पुन: पुन: मिलते रहें, सीखते सिखाते रहें।

Tuesday, September 13, 2022

घूरे पे गुलाल, न बाबा न

 सफ़र जारी है....1056

15.09.2022

घूरे पे गुलाल, न बाबा न.......

सबके लिए करो जरुर ,मरो ज़रूर पर जब लोग आपको यूज करने लगें तो सावधान होना बनता है। सीधे सादा होना और बेवकूफ , सिंपल और सिंपलटन होना दो अलग अलग बातें हैं। प्राणि मात्र के लिए संवेदन शील होना,सबकी सहायता के लिए सदैव तत्पर रहना, सबका हित साधना तो अच्छी बात है पर यदि अगला आपको बेवकूफ समझ आपका दुरुपयोग ही करने लग पड़े तो न केवल सावधान हो जाएं बल्कि सतर्क भी हो जाइए। जानते समझते तो आप सब है कि जो अति का सीधा होता है वह जीवन भर कष्ट उठाता है, देखो तो मीठे गन्ने को कोल्हू में पेला जाता है और कड़वी तीखी चीजों को थू थू थूका जाता है। वन में भी सट्ट सीधे पेड़ ही पहले काटे जाते हैं ,टेडे मेडे तो वैसे ही अनुपयोगी मान छोड़ दिए जाते हैं। उनके सीधे करने में, छील खुरचने में कौन वक्त बेकार करें, इन अड़ियलो के संग जितना दिमाग और समय लगाएगा, उससे आधे में तो खुद ही कर लेगा। तो दुष्टों और खलो से सब दूर रहना ही पसंद करते हैं। गोस्वामी तुलसीदास तो मानस के प्रारंभ में ही ऐसे खलो की वंदना कर लेते हैं और आगे कह भी देते हैं दुष्ट संग नहि देय विधाता, ताते भलो नरक कर बासा। कुछ उन्हें दूर से ही प्रणाम कर लेते हैं कि इनसे तो दूर की राम राम भली, कौन अटके ऐसों से, बिना बात ही दिमाग खराब करो, ऐसों की तो सुन के उका जाओ, ज़बाब ही मत दो, कान ही मत दो, अनसुना कर दो, आवाज घूंट जाओ, उनके सामने ही मत पड़ो, रास्ता बदल लो, क्या फायदा ऐसों के मुंह लगने से, चुप ही भली। तो कुछ उनके प्रति उदासीन हो जाते हैं और कुछ उन्हें ऐसे काम सौंप देते हैं जो देर सबेर पूरे हों भी तो कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता।

           जिन्हें केवल अपना स्वार्थ ही दिखता हो, जिनकी आंख में सुअर का बाल हो, उन्हें भला किसी की सज्जनता,सहृदयता,दयालुता, कर्तव्य परायणता, निष्ठा से भला क्या लेना देना। जैसे भी हो बस इनका काम बनना चाहिए, उनका स्वार्थ सिद्ध होना चाहिए फिर वे आपको दूध में से मक्खी की तरह निकाल फेंकेंगे, उनके जाने आप भाड़ में जाओ, चूल्हे में जाओ, उन्हें आपसे क्या लेना देना। लेना देना तो केवल तब तक था जब तक आपसे उनका काम सध रहा था, मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं, अब यूं जा रहे हैं कि हमें जानते नहीं। इन जैसों का तो वही डौर है कि अपना काम बनता, फिर भाड़ में जाए जनता। अब आपको यदि ऐसों कृतघ्नो पर बहुत लाड आ रहा है तो आप अपने को प्रस्तुत करते रहिए, उनकी बला से। वहां उड़द पे सफेदी भी नहीं आयेगी चाहे आप कर कर के मर ही क्यों न जाओ। वो तो मरने की खबर सुन ये और कह देंगे कि अरे ये काम और निबटा जाता तभी मर लेता यानी उनके काम पूरे होने से पहले आप मर भी नहीं सकते।आप को ज्यादा ही पिदने का शौक है तो धा पा के लगे रहो, चला नहीं जा रहा हो तो भी लंगड़ाते लंगड़ाते गर्म नर्म रोटी परस के खूब खिलाए जाओ, कोई मना भला क्यों करेगा। शरीर तुम्हारा, तुम्हें ही चिन्ता नहीं है, तुम्हें ही अपनी परवाह नहीं तो दूसरा क्या करेगा। देखो भाई जब तुम नहीं रहोगे तो भी सब काम होंगे, सब वैसी आदत डाल लेंगे तो तुम्हारे करने से सब बदला नहीं जा रहा और हट जाने से आसमान गिरा नहीं जा रहा। तो जितना बस का हो, जितना कर सको खूब कर दो। मन भा रहा है तो करो। किसी दवाब में मत करो। और  मुफ़्त की सेवा भला किसे बुरी लगती है। मुफ्त का चंदन, घिस मेरे नंदन। सो आपके पास जरूरत से ज्यादा है, और भरपूर है तो खूब बांटो, तुम्हारे हाथ पैर में दम हो तो खूब करो।दोनों हाथ उलीचिए यही सयानो काम। 

           करने की दिली इच्छा हो और भलेमानस बनने का रोग लगा हो तो आदमी स्वेच्छा से जान हथेली पर रखकर  सेवा के क्षेत्र में निकल जाता है, फिर किनने क्या कही, उसे परवाह नहीं होती। आप सोच लेते हो  उनका किया उनके साथ है और मेरा मेरे साथ। जैसी करनी वैसी भरनी , बोया पेड़ बबूल का आम कहां से हो, जो जैसा करेगा वैसा भरेगा, जैसा बोओगे वैसा काटोगे,सूधे का सदा भला बरगी बातें बोल बोल कर अपने को तसल्ली देते रहते हो। ये बातें कहने  सुनने में बहुत अच्छी लगती है पर व्यवहार में लाने में बड़ा कठिन होता है । आखिर तो आप मनुष्य ही हैं, आप में भी भावनाओ का अथाह सागर हिलोर लेता है , बुरा भला आपको भी लगता होगा, ठगे जाने का दुख भी मनाते होंगे, उन क्षणों को कोसते भी होंगे कि जब आप ऐसों के चंगुल में पड़ गए। तो जब महसूस होने लगे कि आपके करने का कोई मतलब नहीं है, यहां सब धान बाईस पसेरी गिने जाते हैं तो घूरे पर गुलाल डालना बंद करो। भरे पेटो में ठूंसने का कोई फायदा नहीं। अपात्र को देना देने का अपमान है। जिसके लिए दिन रात मगज मारी कर रहे हो, उस पर कोई असर नहीं, घर की मुर्गी दाल बराबर है। तुम तो लुटा लुटा के खाली हुए जाओ और उनकी आंखों के तर ही न आबे तो कया जरूरत है खुद को खोखला करने की। किसी को उतना ही देना चाहिए जितने की उसे जरूरत है। जरूरत से अधिक तो वैसे भी इधर उधर लुढ़क जाता है। तो करो ज़रूर पर घूरे पे गुलाल डालने की कोई जरूरत नाय। हमने तो कान में ऐंठा दे लयो, न बाबा न , हमें तो कर्रे वाले हाथ लग गए , तिहाई मज्जी डालो तो खूब डालबो करो।

हिंदी हूं हिंदी

 सफर जारी है ....1055

13.09.2022

हिंदी हूं हिंदी....... 

हां, मैं हिंदी हूं हिंदी ,हिंद की हिंदी, हिंदुस्तान की हिंदी। सितम्बर की चौदह तारीख मेरे नाम है सो आज का दिन मेरा है, दिन ही क्या, सप्ताह, पखवारा, माह सब मेरा ही है। देखा नहीं क्या, हर स्कूल , कालेज, संस्था में इस महीने तो मैं ही मैं छाई रहूंगी। मेरे नाम पर गुजरात के सूरत में एक बड़ा मेला लगा है, क्या कहते हैं उसे राजभाषा सम्मेलन, हां, तो राजभाषा हूं तो मुझे खूब मान मिलता है, बड़े बड़े लोग मंच पर बैठ मेरा गुणगान करेंगे, मेरे विकास, मेरे प्रचार प्रसार के लिए योजना बनाएंगे, विद्वान भाषण देंगे , कुछ से लेख लिखेंगे, कुछ प्रपत्र का वाचन करेंगे, स्कूली स्तर पर गीत संगीत, अंत्याक्षरी, नाटक, कविता प्रतियोगिता होगी। कुल मिलाकर मेरे खूब चर्चे होंगे, जगत हिंदीमय हो जाएगा, मैं फूली नहीं समाऊंगी, मेरी खुशी की कोई सीमा नहीं होगी।

पर ये दिन बीतते, सप्ताह बीतते, माह बीतते मेरी खुशी काफूर हो जाएगी, मेरे मस्तिष्क पर चिंता की लकीरें गहरा जायेंगी, मैं फाइलों और दस्तावेज में बंद कर दी जाऊंगी, जो आज मुझे केंद्र में रख ताली बजा गोल गोल घूम और नाच रहे हैं, वे सब मुझे अकेला छोड़ अन्य अन्य कार्यों में व्यस्त हो जाएंगे। मेरी ओर मुंह उठा के देखेंगे भी नहीं, मैं अपनी दुर्दशा पर अकेली ही रोती और सुबकती रहूंगी। जो आज मेरे नाम का जप सा कर रहे हैं ,हिंदी हिंदी जप रहे हैं, मैं उनके ह्रदय में बसी होती तो वे एक माह बाद मुझे भुला थोड़े ही देते। वे आडंबरी ज्यादा है, करते कम गाते अधिक हैं, उनका हिंदी जप ठीक वैसा ही है जैसा माला तो कर में फिरे जीभ फिरे मुख माहि, मनवा तो चहुं दिश फिरे यह तो सुमिरन नाहि। ये बड़बोले मेरे कार्यक्रमों के नाम पर ही एक बड़ी राशि फूंक देते हैं और मेरे हाथ कुछ नहीं आता।

तो सुनो मेरा निवास स्थान कहां है, मैं रहती कहां हूं, पनपती कहां हूं। लक्ष्मी धन की देवी के आगमन के लिए आप घर में खूब सफाई रखते हो न, कोना कोना साफ करते हो न तो मेरे लिए भी अपने मन के कोनो में स्थान बनाओ, मुझे मन से सीखो, मेरा रोज प्रयोग करो, मुझे व्यवहार में लाओ। मैं तो रोज़ रोज़ सीखते तुम्हारे अनुभव की विषय वस्तु बनती हूं। तो जो सीखो उसे रोज रोज दोहराओ, लिखो, सुनाओ, बोलो तब तो मुझे सीख पाओगे।

हां, मैं बहुत सरल हूं, जलेबी जैसी गोल गोल घुमावदार और उलझी हुई नहीं। जैसी बोली जाती हूं वैसी ही लिखी जाती हूं। पी यू टी पुट और सी यू टी कट जैसा मेरा उच्चारण नहीं हूं, जो हूं जैसी हूं वैसा ही बोले जाने में यकीन रखती हूं। मुझे सीखना जानना बहुत सरल हैं, मुझे ही क्या सारी भारतीय भाषाओं को सीखना आसान है। जो अपना होता है उसे जानने समझने में भला कहां समय लगता है। तो पहले वर्णमाला लिखना और उच्चरित करना सीखो, फिर वर्तनी को सीखने को हर व्यंजन का मात्रा सहित अभ्यास करो, बारह खड़ी की प्रेक्टिस ज्ञान में बहुत इजाफा करती है। जानते तो होगे बारहखड़ी है क्या, क का कि की कु कू के कै को कौ कं क:, गिनो कितने हो गए बारह ही न, तो हर व्यंजन के साथ इस क्रम को बार बार दोहरा लो, खूब लिख लिख के देख लो, बोलने की खूब प्रेक्टिस कर लो। फिर संयुक्त अक्षर लिखने सीख लो कि खड़ी पाई अंत में हो तो उसे हटाकर दूसरा व्यंजन जोड़ दो म्यामार, म की खड़ी पाई हटा दी न और या लिख दिया। बिल्कुल ठीक। अब मध्य में खड़ी पाई हो तो घुमावदार हिस्से, हुक को हटाकर अगला व्यंजन जोड़ दो, उदाहरण भी दें क्या, लो इस क्या को देख लो। आ गया न समझ। जो व्यंजन गोलाकार आकृति के हैं उनके नीचे हलांत लगा दो, मतलब दो व्यंजनों को जोड़ते एक में से कुछ मायनस करके ही दूसरा जोड़ा जाता है । र के रेफ को विशेष रुप से जान लो। ये कभी ऊपर उड़ाया जाता है तो कभी व्यंजन के साथ अपनी दोस्ती कर लेता है। जो संयुक्त व्यंजन लिखना सीख गए तो अनुस्वार अनुनासिकता का अभ्यास कर लो। बस अब तो विरामादि चिह्न सीखना शेष है। कहां अल्प विराम लगेगा और कहां पूर्ण विराम, कहां प्रश्नवाचक चिह्न लगेगा और कहां संबोधन चिह्न। अब  दो व्यंजनों को मिलाकर शब्द गढ़ना शुरू करो धीरे धीरे तीन चार पांच छह तक के अभ्यास में भी निपुण हो जाओगे। सरल सरल वाक्य लिखो, ये लिखना आ जाए तो संयुक्त वाक्य बनाओ, अनुच्छेद लिखो, पृष्ठ दर पृष्ठ लिखते जाओ। पहले देख कर लिखो, टीपो, उतारो फिर खुद सोच सोच के लिखो। जो मन में है सब लिख डालो, गुरुजी को दिखा दो, जो गलत हो उसे दुबारा सीख लो, बहुत होगा तो डांटेंगे, हो सकता है दो थाप लगा दें पर सीख तो जाओगे न ।बस तो सीखना जरुरी होता है। जो एक बार लिखना बोलना पढ़ना सुनना समझ आ गया तो दूसरे को भी सिखा सकोगे। बस दूसरा तीसरे को तीसरा चौथे को और ये क्रम बढ़ता ही जाएगा, मैं विस्तृत होती जाऊंगी, मेरा प्रसार क्षेत्र बढ़ता ही जाएगा, पूरे हिन्द में क्या पूरे विश्व में मेरा परचम लहरेगा। बस तुम कर्मयोगी से लगे रहना। नित साधना करना। लोगों तक मुझे पहुंचाना। मुझे मौन साधक बहुत पसंद है जो अनवरत मेरे प्रचार प्रसार में लगे रहते हैं।

     तो तुम भी बनो मौन साधक, करो खूब गाओ कम, मुझे पालो पोसो,दुलराओ, अंक में भरो, मैं तो भाव की भूखी हूं जो मुझे भाव से भजता है, मुझे ध्यान से सीखता है, परिश्रम से पोसता है, उसके पास तो मैं दौड़ी दौड़ी आती हूं। मैं हिंदी हूं हिंदी, करोड़ों की कंठहार, अपनी सहोदराओं के साथ प्रेम से रहती हूं, मेरा किसी से विद्वेष, वैर भाव नहीं, मैं तो सबसे लेकर अपने में समाहित कर लेती हूं। तो बोलो जय हिंद जय हिंदी।

पितर गया भेज दिए गए हैं

 सफर जारी है.....1054

12.09.2022

पितर गया भेज दिए गए हैं.......

श्राद्ध पक्ष में पितर धरती पर आते हैं अपने प्रियजनों को आशीर्वाद देने, उनकी कुशल मनाने और उनका लोकमंगल चाहने। स्वजन भी पितृपक्ष में अपने अपने पितरों का जल में काले तिल डाल कुशा से तर्पण करते हैं, अग्नि प्रज्वलित कर पितरों का आवाहन करते हैं, घी,लौंग, परसी थाली में से मीठा और पूरी के टूक से उन्हें जिमाते हैं, जलती अग्नि पर जल छिड़कते हैं, कौए, गाय, कुत्ते, भिखारी का भाग निकालते हैं और फिर ब्राह्मण के ब्याज से उन्हें भोजन खिला तृप्त कर दक्षिणा दे विदा करते हैं और मन ही मन संतुष्ट हो लेते हैं। जब से होश संभाला है, घर में बाबा दादी का श्राद्ध ऐसे ही होते देखा है। ससुराल में भी कमोवेश यही प्रक्रिया दोहराई जाती रही है। कुछ ज्यादा पढ़े लिखे लोग जो इस सबमें विश्वास नहीं करते, इसे ढकोसला मानते हैं, वे गाय को घास खिला, किसी अनाथ या वृद्ध आश्रम में जा दान दे आते हैं, किसी भूखे को भोजन करा आते हैं। जिसको जिसमें सन्तोष मिले, वह वही कर लेता है पर पितरों को खूब मान देता है। जीते जी भले उन्हें सूखी रोटी के दो टुक्कड़ मिले न मिले पर स्वर्गस्थ होते ही, दूसरे लोक का प्राणी होते ही उनके लिए देशी घी की पूरी, इमरती, दही बूरे और भी उस बहुत कुछ का प्रावधान भी हो जाता है जो भले से उनके बजट में नहीं समाता। इस पक्ष में सोलह दिन तक किसी न किसी रिश्तेदार का श्राद्ध अवश्य रहता है। पूर्णिमा से प्रारंभ होकर अमावस तक की तिथियां पूर्वजों के नाम कर दी गईं हैं, इन्हीं तिथियों में से ही किसी दिन उनके प्राण छूटते हैं।

छह दशकों में पहली बार ऐसा हुआ है कि पूर्णिमा, पड़वा, दौज़ सूने रहे हो, दादी सास, ददिया ससुर, बड़ी बहू और माताजी किसी को जिमाया तक न हो। अभी तो श्वसुर, सास, पिता की तिथि आनी शेष है। इस बार  चूल्हे पर न कढ़ाही चढ़ी है और न इमरती का भोग लगा है, न खीर बनी न दहीबड़े और न अदरक डाल के मूली कस और न मूली की भुजिया। न जिजमान जिमाए गए हैं, न दक्षिणा न दानदिया गया है। नहीं नहीं ऐसा बिलकुल नहीं है कि हम अति आधुनिक हो गए या अपने संस्कार भूल गए हों, हमारी श्रद्धा समाप्त हो गई हो, कदापि नहीं बिल्कुल नहीं, अरे उन्हें कैसे भुलाया जा सकता है भला, वे तो अब भूत हो गए हैं और मनों में गहरे जम गए हैं। लोकश्रुति के अनुसार जिनका पिंड दान गया में जाकर भर आते हैं, उन्हें वहां प्रतिष्ठित कर आते हैं, उन्हें उनके परम धाम पहुंचा आते हैं तो फिर उनका श्राद्ध वर्जित है। श्राद्ध भले से ही न किया जाए पर श्रद्धा का भाव अधिक से अधिक गहराता जाता है। कुछ माह पूर्व पटना की यात्रा के सुयोग बनने पर हम भी गया जाकर अपनी तीन पीढ़ियों के पिंड भर आए हैं। अब सालाना परंपरा गत विधि से श्राद्घ करने की औपचारिकता भले से न हो, पर श्रद्धा भाव से उन्हें याद करने पर तो कोई प्रतिबंध नहीं है। आश्चर्य है जो पितर अपनी तिथि वाले दिन स्वप्न में साकार हो जाते थे, उन्हें देख कर समझ आ जाता था कि अरे, आज तो इनकी तिथि है। पर इस बार तीन दिन बीते जा रहे हैं पर न तो बूढ़ी दादी सास जिन्हें प्रत्यक्ष देखने का सौभाग्य ही नहीं मिला, बड़ी बहू और माताजी आज रात सपने में भी नहीं आए तो मान लें कि पितर अपने अपने स्थान पर सचमुच चले गए हैं। वे इस पितर पक्ष में घर भले न पधारे हों पर अपने गोलोक धाम से दोनों हाथ उठा हमें आशीर्वाद अवश्य दे रहे होंगे। हमारी कुशल मंगल अवश्य मना रहे होंगे। वे हमारे बड़े हैं, पूज्य हैं, श्रद्धास्पद हैं, हमारे मन में गहरे धंसे हुए हैं। उन्हें किसी ब्याज से याद थोड़े ही करना पड़ता है। वे हैं जरुर फिर चाहें वे किसी भी जगत में क्यों न हों। कुछ माह पूर्व ही उन्हें अपने हाथों से विष्णु लोक के परम धाम भेज कर आए हैं। अब वे आवागमन से मुक्त हो गए हैं। वे भले से मुक्त हो गए हों पर हम जीवधारी तो अभी तक माया मोह में फंसे हुए हैं, कहां विमुक्त हो पाए हैं। सब तो यादों में बसा हुआ है। रोज एक एक चैप्टर अपने आप आंखो के आगे खुलता चला जाता है और तिथि विशेष पर ज्याड़ा गहराता जाता है। साथ बिताए क्षण मन पर हावी होने लगते हैं, उन क्षणों को खूब भाव मग्न हो कर जी लिया जाता है।

       जो हैं और जो शेष हो चुके हैं, सब अपने ही हैं। वे अपने ही बने रहें, बस इसी में सारा सन्तोष है। हम श्रद्धा से उनके साथ बने रहे, उतना ही पर्याप्त है। कभी हमें भी इतिहास ही बन जाना है, इन्हीं सोलह तिथियों में ही हमारे जन्म मरण की तिथि निहित है। इन्हीं में से किसी को हमें गोलोकवासी होना है, जीवन मरण से, आवागमन के बंधनों से मुक्ति पानी है , भूत हो जाना है, अपने आत्मजो के हाथो तर्पित होना है,श्राद्ध का भोजन पाना है, काक के ब्याज से पुकारे जाना है, सूक्ष्म हो जाना है। हम सबको देख सकेंगे पर हमारे आत्मीय हमें स्थूल रुप में नहीं देख पाएंगे इसलिए वे किसी ब्राहमण रुप में हमें खोजेंगे, हम तक भोजन पानी पहुंचाएंगे, कभी पीपल पर घड़ा बांध आऐंगे तो कभी किसी प्यासे को भरपेट जल पिला हमें तृप्त कर देंगे। हम सब की गति और नियति यही है। एक दिन हम सबको भूत हो जाना है, श्राद्ध के निमित्त अपनों की कुशल मंगल लेने आना है, उन्हें फलने फूलने का आशीष देना है, अपनी लगाई बेल को हरहराते देखना है। बस तो जो आज है वह भी हमारा है और जो कल होगा, वह भी हमारे नाम होगा। रहें न रहें हम महका करेंगे, श्रद्धा भाव से याद किए जाते रहेंगे, श्राद्ध के ब्याज से पकवान पाते रहेंगे और एक दिन गया में स्थापित कर दिए जाएंगे।

पाठशाला जीवन की

 सफर जारी है....1053

11.09.2022

पाठशाला जीवन की........

विद्यालय महाविद्यालयों  की कक्षाओं में बहुत पढ़ लिख लिये, खूब डिग्री डिप्लोमा प्रमाणपत्र बटोर लिये, प्रथम द्वितीय तृतीय आते रहे और अपने को खूब फन्ने खां समझते रहे, अपनी उपलब्धियों पर मार इतराते रहे कि मैं ये मैं वो, मुझसा कोई नहीं, देखो मुझे मिले मैडलों और प्रशस्ति पत्रों से पूरा घर भरा पड़ा है, मेरे अध्यापक और सहपाठी मेरी खूब प्रशंसा करते हैं, स्वप्न लोक में विचरण करते रहे पर जब जीवन के कठोर और यथार्थ धरातल से सामना हुआ तब पता चला कि ये पढ़ाई लिखाई, ये मेडल, ये शील्ड ये पुरस्कार सब के सब एक कोने में धरे रह गए, जिन प्रश्नों और कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, उनके उत्तर और समाधान तो किसी भी कक्षा में किसी भी अध्यापक द्वारा बताए ही नहीं गए हैं, बताना तो दूर उनका जिकरा भी नहीं क्या गया। जाने किया क्या रटते रहे हम, रट्टा मार मार के खूब कापी भरते रहे हम, मास्टर जी ने सब सही सही बताया, कुछ भी नहीं काटा और न कापी पर कोई लाल लाल गोले बनाए, खूब झोली भर भर के अंक दिए। जब सब कुछ सही था तो उस सही को व्यवहार में लाते ही सब गड़बड़ कैसे हो गया। सब लिखा पड़ा बरबाद कैसे हो गया। जो जो सिद्धांतत सीखा सिखाया गया, उसे प्रयोग करते ही हम गलत कैसे ठहराए जाने लगे, सबके माथे पर लकीरें क्यों पड़ गई, सब नाराज क्यों हो गए। सब उसे झुठलाने में क्यों लग गए।

यदि सत्य का पाठ झूठा था तो तीसरी कक्षा की पुस्तक में सत्यवादी हरिश्चंद्र,सच्चा  बालक का पाठ क्यों पढ़ाया गया, श्रवण कुमार की मातृ पितृ भक्ति के प्रसंग क्यों बार बार दोहरवाए गए, गांधी की सत्य अहिंसा का पाठ क्यों पढ़वाया गया, राखी,नन्ही लाल चुन्नी, झूठा गडरिया, लालची और चालाक लोमड़ी, बंदर और मगर, सोने का अंडा देने वाली मुर्गी, आरुणि, एकलव्य, ध्रुव, प्रहलाद के प्रसंग बार बार क्यों सुनाए जाते रहे। इन्हें पढ़ते जो मानस तैयार हुए, जिस तरह के सुनहले स्वप्नो की दुनिया रची गई, जो सब्जबाग दिखाए गए, वे सब आज बिखरे क्यों जा रहे हैं, इतने इतने बिखर गए हैं कि समेट में ही नहीं आ रहे, सदा सच बोलो, झूठ बोलना पाप है, चोरी का माल मोरी में जाता है, सच्चे का बोलबाला, झूठे का मुंह काला जैसे वाक्यों की खुश्कत , इमला, इन्हें बीस बीस बार लिखने का निर्देष सब धुंधलाते जा रहे हैं, मंच पर वाद विवाद में अपना पक्ष दृढ़ता से रखते, भाषण वक्तव्य देते जो तालियों की गूंज से हाल गूंज उठता था, आज वही तालियां कानों में जहर बुझे स्वरों में क्यों बदलती जा रही हैं। सिखाया तो ये गया था कि न तो अन्याय करो और न अत्याचारी, अनाचारी, अन्याय करने वाले का साथ दो। यदि तुम ऐसों के साथ खड़े हो, कोई विरोध नहीं करते फिर चाहें चुप्पी का कोई भी कारण क्यों न हो, आप पाप और अपराध में लिप्त माने ही जते हैं, आपकी चुप्पी भी स्वीकृति ही है मौनम स्वीकृति लक्षणम।

पढ़ाया तो ये गया था कि प्रकृति की तरह देना सीखो, प्रकृति हमें देती है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखें, सूरज हमें रोशनी देता, हवा नया जीवन देती है, भूख मिटाने को हम सबकी धरती पर खेती होती है, औरों का हित हो जिसमें हम कुछ ऐसा करना सीखें, हम भी तो कुछ देना सीखें। हमें पढ़ाया गया परोपकारम सदा विभूतय कि नदियां अपना पानी स्वयं नहीं पीती, पेड़ अपने फल स्वयं नहीं खाते, संत पुरुष बिच्छू जैसे बार बार काटने डंक मारने वाले की भी रक्षा ही करते हैं, हमें दधीचि,कर्ण और शिवि की दानशीलता के प्रसंग रच पच कर सुनाए गए, सीता सावित्री लक्ष्मीबाई जीजाबाई की कहानी सुनाई जाती रही, बड़े बड़े महापुरुषों के जीवन की घटनाएं बताई जाती रहीं और जब ऐसा मानस तैयार हो गया तब बार बार सुनाया जा रहा है कि ये सब बातें परीक्षा पास करने कराने के लिए हुआ करती हैं। इनका जीवन की वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं हुआ करता। तो जो अब तक पूरी वसुधा ही  कुटुम्ब है जैसे सूत्र पढ़ते रटते रहे, उन्हें भूलो और जो जीवन का सच है उसे समझो।

जीवन की पाठशाला में प्रवेश करते ही सारे आदर्श बिला गए, सारे सूत्र गड़बड़ा गए, जो पढा जो सीखा जिसके बल पर उपाधिया बटोरी, मेडल और प्रशस्ति पत्र पाए, उस सबको भूलने के लिए कहा जा रहा है, जो गणित पढा, जिन फार्मूलो को रटा, सब आउटडेटेड हो गए, सारी की सारी कहावतें, मुहावरे, लोकोक्ति बेकार हो गईं। सांच को आंच कहां जैसी बातें गई तेल लेने। अब तो निकम्मो, कामचोरो, झूठे, बकबकियों, आलसी, बड़बोलो की फौज तैयार हो रही है। संवेदना और करुणा अलग थलग पड़ गईं हैं, उन्हें कोई कौदी के भाव भी नहीं पूछता, सत्य से सब आंख चुराने लगे हैं, जो कर सकते थे, उन्होंने गांधारी की तरह आंख पर पट्टी बांध ली है, पिता धृतराष्ट्र की तर्ज पर केवल और केवल अपने दुर्योधन को राजगद्दी दिलाने में लगे पड़े हैं। पुत्र मोह इतना अधिक गहरा गया है कि उन्हें सत्य असत्य, न्याय अन्याय में भेद करना भारी पड़ रहा है, द्रौपदी का चीर बढ़ाने अब कृष्ण नहीं आया करते, द्रौपदी को ही आगे आना पड़ता है। भीष्म पितामह भला मौन के अलावा क्या कर सकते हैं। वे दुर्योधन का नमक जो खा रहे हैं और अपनी प्रतिज्ञा से बंधे हुए हैं।

जीवन की पाठशाला  जो पाठ पढा रही है वह पहले पढ़े पाठों से बिलकुल भिन्न है। अब दुविधा में है कि सच कौन सा है जो किताबों में लिखा था वह या जिसे अब नंगी आंखो से देख रहे हैं वह। अब तो झूठ और अन्याय ही फलता देख रहे हैं, सत्य पर झूठ हावी है, जो कुछ नहीं करते, वे जोर जोर से बोलकर सही को धमकाते धकियाते रहते हैं। अब सारा समय तो इन कुत्सित लोगों की चालों से बचने और उनसे निपटने में ही चला जाता है। उनके पास पैसे और सिफ़ारिश का बल है, उनकी ऊंचे लोगों में पैठ है, वे कुछ भी कर सकते हैं , सफेद को काला करने की कुब्बत रखते हैं और सही लोग बेचारे एक कोने में उपेक्षित से पड़े रहते हैं। जो जीवन की पाठशाला सिखा रही है, सत्य तो वही है। पर फिर भी पिछले पढ़े पर, उन जीवन मूल्यों पर विश्वास गहरा है कि झूठ के पैर नहीं होते, उसे घुटने टेकने ही पड़ते हैं, सत्य जी विजयी होता है इसलिए सत्यमेव जयते कहा ही नहीं जाता, सब जगह लिखा भी जाता है। पढा तो यह भी है कि सत्य परेशान भले ही हो पर अन्तत जीतता अवश्य है। अभी तो संघर्ष के दिन हैं, झूठ पैर पसारे है, देखें सत्य कब जीतता है, उसका सूर्य अपने तेज से कब दीप्त होता है कि उसके तेज प्रकाश से सबकी आंखें चुंधिया जाए। बस प्रतीक्षा और प्रतीक्षा ही है।

Friday, September 9, 2022

कहन, लोकोक्ति, मुहावरे के ब्याज से......

 सफर जारी है ........1051

10.09.2022

कहन, लोकोक्ति, मुहावरे के ब्याज से......

घर घर चूल्हे माटी के हैं बहना , मैंने बातऊ पूरी नाय करी तब तक तो चमेली बोल उठी ..ए रहन दे, अब कोई के घर में माटी के चूल्हा ना होवे, अब तो सिगरे गैस के चूल्हा पे बनाबे और कोई कोई तो बाए का कहबे इंडक्शन पे बना लेत है। अब कोई के घर माटी न बची के चूल्हा बनाबे कि बालक मिट्टी खाबे। बे जमाने और हते जब बालकन की तो छोड़ो,कन्हैया हू खूब माटी खायो करते। बो कैत नाए का तेरे लाला ने माटी खाई, जशोदा सुन माई। बाकायदा बिनको मंदिर है, बामे परसाद में माटी के लडडू ही मिलो करें। पहले की बात और हती सबके घर कच्चे होते, गोबर माटी से लीपे जाते, चूल्हा अंगीठी ऊ लीपे जातो पोता ते। काऊ के नेक चोट लग जाए, खून बून निकल आबे , नकसीर फूट जाबे तो झट्ट सीना पीली माटी लगा दई, सुंघा दई। बात बात पे कोई दागधर के झोरे थोड़े ही भागो करते । बैयर बानी सब जानती कि छोटो बालक रो रयो है तो बाए घुट्टी पिला दई के टूंडी पे हींग को फोआ धर दयो के हींग मल दई के गोद में लले के डकार दिला दई। बड़े कू हींग अजवायन की फंकी दे दई। और तो और काऊ बालक की बात करते करते जीभ कट जाबे तो मोंह में चीनी भर देते। मतबल जे कि इन छोटी छोटी बातन को इलाज घर में ही हतो। तबही जे कहन बनी होएगी के रसोईघर में ही बहुतेरे रोगन को इलाज है। सारे रोगन की जड़ जे पेट है। पेट ठीक रहे तो जे समझो कि तिहाई आधी बीमारी दूर है गई। पर अब कोई न समझे इन बातन ने, दौड़े छूटे सब डागदर के ही भागो करें।

देखो हम का कह रए ओर बाहेली ने अर्थ को अनर्थ कर दयो बात को। पूरी बात तो सुनी नाय और माटी और चूल्हा पे हमें ई लंबो चौडो भाषण पिला दयो, पूरी बात सुने बिना ई लठ्ठ ले के पिल पड़ी। ऐसेई बा दिन करी। हमने कही सोबरन को तो वो ई डोर है कि ऊंची दुकान फीको पकवान। सुनत खेम ही शुरू है गई, बाकी रेलगाड़ी ती सौ की स्पीड पे दौड़बे लगे बिना रुके, जे दारी की एक बार शुरू हे जाबे तो अपनी पूरी बात कह के ही रुके, बीच में कोई कोमा अल्प विराम न , सीधो पूर्ण विराम ही लगो करे। अब कहन लागी ए जीजी बिना मीठे के ऊ कहीं पकवान होय करें। आजकल जे नए चोचले चले हैं कि फीकी मिठाई खाई जाएगी के कम चीनी की की फीकी चाय पी जाएगी के हमें शुगर हे गई है। शुगर हे गई है शुगर हे गई है, हाथ पैर नाय हिलाओगे, दिन भर गोबर के चोथ से एक जगह ही जमे बैठे रहोगे, बस सारे दिना मुंह चलाते रहोगे, पेट में अंट संट ठूंसते रहोगे तो शुगर नाय तो का नमक होयगो। अरे खूब काम धाम करो, टैम ते खाओ भरपेट, खूब घी खाओ, गुड खाओ देखो ठीक रहत हो कि नाय। दिन भर तो सफेद, लाल, पीली गोली कैप्सूल ठूंसते रैत हो, एसिडिटी के मारे कलेजा जलत रैत है सो अलग, हाय हाय चिल्लात हो। अरे जे ख़ाली पेट चाय काफी सुडकबो ठीक नाय। ढंग ते चबा चबा के दाल सब्जी चावल रोटी खाओ दो टैम और खूब स्वस्थ रहो। इतनी तो बीमारी पाल रखी हैं कि दवाई ते छुट्टी मिले तो खाने कू सोचे। और फिर जे कहावत कैत डोल तो कि ऊंची दुकान फीके पकवान। पकवान तो मीठे ही होय करें भैया।

           देखी इन गैर पढ़ी लिखीन की बात, कैसे बात को बतंगड़ बना दयो। इन जैसेन ते तो बात करबो ही फिजूल है। कोई कहावत, लोकोक्ति, मुहावरे की बात सुनाओ तो ऐसे खींच के रख देत है कि कछू पूछो ई मत, सब अक्ल घास चरने चली जाए। घर घर चूल्हे माटी के ही होय करें बहना जाको मतबल होत है कि सबके घरन में थोड़ी ऊंच नीच तो लगी ही रहत है। हम्माम में सब नंगे ही है, जा घर की मत उघाड़ो बोई अच्छो है। जो तुम्हें दूर ते बड़े सुखी लग रए हैं, दिन भर ठहाके से लगात रैत हैं, बिनकी हंसी के पीछे आंसू रैत है, वे सब बातन कू भुला के अपने कू सुखी दिखाबे की कोशिश में लगे हैं। तो तुमऊ खुश रहबो सीखो, दूसरे के कहबे की ज़्यादा परवाह मत करों। बिनको तो काम ही हे कहबो। वे जई के काजे बने हैं और हम सुनबे को।

           ऊंची दुकान फीके पकवान को अर्थ होय करे कि बात तो बड़ी बड़ी करें पर अन्दर ते खोखले है। नाम रख राखो है धन्ना सेठ और घर में भुंजी भांग हू नाय। जाई ए कह ते नाम बड़े और दर्शन छोटे। एक और है नेक सुई चुभो देयो तो गुब्बारे की सारी अकड़ फुस्स है जाबेगी। तो भईया ठोस बनो, फफ्फस मत बनो। न बातन ते और न कर्मन ते। ठाले बैठे फेंको मत बड़ी बड़ी, करो।करिबे को फल मिल ते। और एक जे हैं सरकाएंगे सींक हू नाय पर बात आकाश पाताल की करवा लेयो। टाइम टेबल तो रोज बनेगो पर अमल एक हू दिन नाय होयगो। ऐसेन ई कैत हैं शेख चिल्ली। सपने आकाश ते हू ऊंचे देखगे और काम रत्ती भर हू नाय करें। सो भैया, समय समय पे इन कहाबतन ने, कहन ए, लोकोक्तिन ने, मुहावरेन ने हू दोहराबो जरुरी है, इनते हू ज्ञान मिलो करे।

Thursday, September 8, 2022

घर कौन सा घर हमारा है,

 सफर जारी है...1051

09.09.2022

घर, कौन सा घर हमारा है.......

घर चारदीवारी से घिरा और कच्ची पक्की छत के साथ एक अहाता भर नहीं  है, यह एक प्यारा सा अहसास है कि हां मेरा भी घर है। यह खरीदा हुआ या उपहार में प्राप्त कोई प्लॉट या भूखंड भी नहीं जिसे मकान की संज्ञा दी जाती है। आप जिंदगी में पैसा कमा कमा के, पेट काट कर आधे पेट भूखे सो कर ,बचत कर करा के मकान भले खरीद लो, पर उसे घर बना पाना सबका सौभाग्य नहीं हुआ करता। घर को याद करते रमेश दिविक की कविता की पंक्तियां दिमाग में गोल गोल घूमने लगती हैं पापा कैसा लगता होगा उनको जिनका नहीं होता है घर। सच बड़े किस्मत वाले होते हैं वे जिनके पैरों के नीचे जमीन और सिर पर छत होती है। जब बाहर से थके हारे आते हैं तो घर बड़ी शिद्दत से आपका इंतजार करता है, आपको दुलराता है, आप पर स्नेह की वर्षा करता है, आप को थपकी दे दे सुलाता है, आप को विश्रांति देता है। घर यानि एक ऐसी जगह जो आपकी सारी थकान हर लेता है, आपको सुकून देता है, आप तरोताजा हो जाते हैं, आप चार्ज हो जाते हैं और अगले दिन फिर काम पर निकल पड़ते हैं। घर आपको भावनात्मक सहारा देता है। जब आप थके और परेशान होते हैं, आपकी सारी पीड़ा हर आपको ऊर्जा से भर देता है।

दुनिया में सबके पास एक घर होता है फिर चाहे वह कच्चा हो पक्का हो, एक कमरे का हो दस कमरे का हो, एक मंजिला हो या बहुमंजिला हो ,सारी सुविधाओं से लैस हो या जगह जगह थेगड़ी और पैबंद के साथ हो, फाइव स्टार जैसा हो या झोपड़ी हो , खाने को छप्पन भोग हो या दो टाइम की रोटी के भी लाले हों पर घर होना जरुरी है। हर बालक जन्म लेते घर में ही पलता बढ़ा होता है। उसके घर का एक स्थाई पता होता है जिसे वह स्कूल और कार्यस्थल पर रजिस्टर में चस्पा कर देता है। यह पता उसकी स्थाई पहचान है। इसी पर उसकी चिट्ठी पत्री, संदेश, सामान आता जाता रहता है। वह भले ही कितने घर बदले पर घर होना जरुरी है। इसके बिना नहीं चलता।

मित्रो, घर तो सबको चाहिए फिर चाहे पुरुष हो स्त्री हो मानव हो मानवेतर हो, हर जीवधारी के लिए घर आवश्यक है इसलिए पक्षियों का घोंसला, जानवरों का अस्तबल और बाड़ा, चींटी , केंचुआ और सांप के बिल और शेर की गुफा होती ही है। घर पर उनका एकाधिकार होता है। यदि कोई उनके घर में जबरदस्ती घुसने की कोशिश करे तो उसे लतिया धकिया के बाहर कर दिया जाता है। घर है, यह भाव ही सुरक्षा और आश्वासन देता है।

जब दुनिया में सबके घर होते हैं, घर पूरी तरह उनके न भी हों पर एक निश्चित कोना उनका जरुर होता है। पर आधी आबादी का सच ये नहीं है। वे एक घर में जन्म तो लेती अवश्य है पर जैसे जैसे बड़ी होती जाती है उन्हें कह कह के ये अहसास दिला दिया जाता है कि तुम्हें दूसरे घर जाना है। इस घर की देहरी से तुम्हारी विदाई होनी निश्चित है। तुम पराई अमानत हो। हम तुम्हें पाल पोस कर,पढा लिखा कर, संस्कारित कर इसलिए तैयार कर रहे हैं जिससे तुम किसी दूसरे घर को आबाद कर सको। तुम तो बाबुल के आंगन की चिड़िया हो जिसे उड़ना ही उड़ना है, किसी अन्य डाल पर बसेरा बनाना है फिर चाहे तुम जितना मर्जी रोती गिड़गिड़ाती रहो कि काहे को ब्याही विदेश रे सुन बाबुल मेरे, हम तो बबुल तेरे आंगन की चिड़िया चुगत चुगत उड़ जाएं रे सुन बाबुल मेरे। जितना मर्जी रोते गाते रहना कि मेरे जाने के बाद तेरा आंगन सूना हो जायेगा, बाग के झूले पर कौन झूलेगा, जब तुम बाजार से थके हारे आओगे तुम्हें पानी का गिलास कौन देगा, कौन तुम्हारे समान को तहा कर रखेगा, कौन तुम्हें लाड करेगा, उनके पास हर बात का ज़बाब होगा कि मेरे आंगन बहू छमछम पायल खनकाती आयेगी और बाग में नाती पोती झूलेगी, तू चिन्ता मत कर लाडो, लाडो घर जा अपने। और हम लाडो अपने उस बाबुल मइयो के घर की देहरी से विदा  कर एक नए घर भेज दी जाती हैं जिसे ससुराल कहा जाता है। बचपन से हमें इस घर का सपना दिखाया जाता है कि ये घर प्रशिक्षण शाला भले हो पर तुम्हारा असली घर वही है। यहां जिस जिस काम की रोक है, वहां सब कर सकोगी क्योंकि वही तुम्हारा असली घर होगा। इस घर में अपना बचपन, कैशोर्य छोड़ हम युवा होती बहन बेटियां पुत्रियां नए घर में प्रवेश करती हैं इस आशा और विश्वास के साथ कि अब हम अपने असली घर आ गईं। इसी घर में भेजने के लिए बबुल कितने परेशान होते थे कि बिटिया के लिए कब घर वर मिलेगा, कब उसे डोली में बिठा हम विदा कर निश्चिंत हो पाएंगे कि बेटी के हाथ पीले कर दिए, अब वह अपने घर की हुईं, हम गंगा स्नान कर मुक्त हुए। पर माता पिता कब मुक्त हो पाते हैं? बेटियों को लेकर इनकी चिंताएं असीमित होती हैं होनी भी चाहिए आखिर वे माता पिता जो हैं, उन्होंने अपना कलेजा, दिल का टुकड़ा निकाल के जो दिया है, ढेरो कर्ज में डूब कर भी वे अपनी बेटियों का सुख सकून चाहते हैं। पिता बहुत खुश होते हैं चलो बेटी अपने घर विदा हुई, हमारा दायित्व पूरा हुआ।

जिस घर के सपने बचपन से बेटियों के मन में बोये जाते हैं, उन्हें रोज रोज याद दिलाया जाता है कि तुम तो पराई अमानत हो, जिस दिन ब्याही जाओगी तुम्हारे कुल गोत्र सब बदल जायेंगे, तुम्हारा नया जन्म होगा, एक नई जिंदगी होगी, धीरे धीरे तुम्हारी जड़े इस घर से उखड़ कर वहीं जम जाएंगी, तब तुम यहां आते अपनी अनेक व्यस्तताएं गिनाओगी कि अभी नहीं आ सकती कि घर में मां अस्वस्थ है या इनको फुरसत नहीं है या बच्चों की परीक्षाएं चल रही हैं टाइप तुम्हारी बातें हमें सुकून ही पहुंचाएगी कि चलो बिटिया अपने घर परिवार में सेटल हो गई है।

पर बाबुल के घर को छोड़ जिस घर में हम बेटियां ब्याही जाती हैं, जिसे हमारा ससुराल कहा जाता है वहां भी तो हम पराई जाई ही कहलाती हैं, दूसरे घर से आई ही कहलाती हैं। सच ही एक घर में जिस दूसरे घर की अमानत कही जाती हैं, वहां भी उन्हें अपना घर कहां मिलता है। वह घर तो पहले से दूसरे का है जो वहां बरसों से रह रहा है, वो घर उसका ही है, वहां आप रहने गई है, एडजस्ट आपको होना है जो भी जैसा भी ठौर आपको मिले। किसी नई जगह जाकर अपना स्पेस बनाना, सबका दिल जीत लेना, सबको अपने सेवा भाव से खुश किए रखना, अपने पहले घर की इज्जत को बनाए रखना सब इतना आसान कहां होता है, चौबीस घंटे तो सिर पर तलवार लटकी रहती है कि कहीं कुछ गलत न हो जाए, अब लाख सावधानी बरतें, कुछ न कुछ चूक तो हो ही जाती है, उस छोटी सी भूल चूक को कैसे बड़ा करके धो धो के सुनाया जाता है, लपेटे में उस घर के लोग भी ले लिए जाते हैं, आखिर उपज तो उसी घर की हो, संस्कार तो वहीं से ले कर आई हो। तब मन हिचकी भर भर के रोता है कि बाबुल तुम तो कहते थे लाडो वो घर तेरा है पर यहां तो सब यही कहते हैं ये घर हमारा है। तो फिर आखिर मेरा घर है कौन सा। उस में पराई अमानत थे और इस घर में दूसरे घर से आई कहे जाते हैं। ये बेटियां बड़ी होशियार हो गईं हैं अब। दोनों घर को अपना बनाए रखती हैं बल्कि उन दोनों घर के साथ एक नया घर और बना लेती हैं, रच गढ़ लेती हैं जिसे वे हमारा और कभी कभी मेरा अपना घर कहती हैं जहां वे खुल के सांस ले पाती हैं। अब उन्हें एक कोने की दरकार नहीं, पूरा का पूरा घर उनका होता है। वे बराबरी का आधिकार मांगती है और बिना करे नहीं मांगती। खूब मेहनत करती हैं। दोनों कुलों को सार्थक करती हैं। उन्हें याद रहता है कि पुत्री पवित्र कुल दोऊ। वे बड़े से बड़े पद पर आसीन भले हो गई हों पर उनमें से कितना प्रतिशत ऐसा है जिनके पास कहने के लिए घर नहीं तो उस विशाल लम्बे चौड़े घर में एक सुविधा जनक स्पेस हो जिसमें वे स्वेच्छा से उठ बैठ सकती हों, अपने को सुरक्षित महसूसती हूं, अपने परिवारी जन और इष्ट मित्रो के साथ बैठ सकती हों, उस स्पेस में उन्हे अपनत्व मिलता हो।

बहुत जरुरी है ये बहस कि उनका घर कौन सा है। एक तरफ उन्हें होम मेकर कहा जाता है, गृह निर्मात्री कहा जाता है, बिन घरनी घर भूत का डेरा कहा जाता है, गृहिनी गृहम उच्चयते कहा जाता है, किसी पुरुष की सफलता के पीछे उसके महत्व को रेखांकित किया जाता है और दूसरी तरफ उसका कोई घर ही निश्चित नहीं होता। एक में पराई अमानत होती हैं तो दूसरे घर में दूसरे घर से आई कही जाती हैं, जिससे निकालने की धमकी ही नहीं दी जाती बल्कि उसे बाकायदा निकाल ही दिया जाता है कि यह घर मेरा है और इसमें रहना है तो मेरी शर्तो के अनुसार रहना होगा नहीं तो बाहर का रास्ता देखो, जिस घर से विदा की गई हो वहां अपना सामान सट्टा बांध के चली जाओ। अरे वहीं रहना जाना होतातो तुम्हारे तायने उलाहने क्यों सुनते भला। तो एक्स वाई जेड तुम जो भी हो, कान खोल के सुन लो कि ये घर तुम्हारा अकेले का नहीं है, इसमें सब कुछ साझा है। तो जितना तुम्हारा है उतना दूसरे का भी। तो निकलना ही होगा तो तुम निकलोगे क्योंकि मकान तुमने भले बना लिया हो, घर तो इसे हम स्त्रियों ने ही बनाया है, चूल्हा तो हमीं फूंकते हैं जब जठराग्नि शांत होती हैं, स्नेह हम भी बिखेरते हैं तभी स्निग्धता आती है, प्यार के बंधन से रिश्ते की दीवारों का फेविकोल हमीं बनते हैं तो तुम हमारे हो तो घर भी हमारा है। वो जमाने लद गए जब हम दूसरों के घर में अपना एक कोना तलाशते थे, आज ये पूरा जहां हमारा है और ये किसी ने भीख या दान में नहीं दिया, अपनी शक्ति से अर्जित किया है, हम स्वयं पर खुद ही गर्वित हो लेते हैं,कोई और हो न हो। अपने में भरे पूरे होना भी उपलब्धि होती है। साथ आओ मित्र स्वागत है, हमेशा हमेशा के लिए तुम्हारे हैं साथी भाव से, स्वामी बनोगे तो हम दासी ही रह जाएंगी न। तो आओ चलें साथी बनें, एक दूसरे के साथ बने रहें। घर साझा हुए करते हैं, किसी अकेले की संपत्ति नहीं। ये मेरा या तुम्हारा घर नहीं, ये हमारा घर है प्यारा सा घर।

Wednesday, September 7, 2022

या विमुक्तये,

 सफ़र जारी है.....1050

08.09.2022

या विमुक्तये.............

शिक्षा की विद्यार्थी होने के कारण अनेक शिक्षाविदों के विचारों को पढ़ते, उनके द्वारा दी गई  अनेकानेक परिभाषाओं को रटते, उसका संकुचित और व्यापक अर्थ समझते , शिक्षा और विद्या में अंतर करते जो बात गहरे पैठी, जिसने झकझोरा, वह थी सा विद्या या विमुक्तये। अर्थात विद्या वह है जो हमें विमुक्त करती हैअनेक अंधविश्वासों, अनेक गलत मान्यताओं और बंधनों सी, तेरे मेरे के भाव की जगह वयम का भाव पोषती है, वसुधैव कुटुंबकम् का भाव पैदा करती है। इसीलिए उसे कल्पलता कहा जाता है। उसे सर्व धनं प्रधानम कहा गया क्योंकि न उसे कोई चुरा सकता है, न बांट सकता है, न ये वहन करने में भारी है, व्यय करने पर प्रतिदिन बढ़ता है। है न आश्चर्य कि दुनिया में कोई ऐसी वस्तु नहीं जो खर्च करने पर भी कम न हो, बल्कि बढे। जी हां विद्या को जितना बांटोगे उतने ही अधिक ज्ञान से भरेपूरे हो जाओगे। विद्या विनय शील बनाती है। स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते। व्यक्ति खाली हाथ और साधारण सा भले दिखता हो पर जब अपना मुख खोलता है, बोलना शुरू करता है तब सबको हतप्रभ कर देता है, अपने ज्ञान का लोहा मनवा लेता है। पावस ऋतु में ही तो कौए और कोयल की पहचान होती है देखने में तो दोनों काले ही हैं पर एक अपने मधुर बोलों से सबकी प्रिय बन जाती है, सराही जाती है और दूसरा अपनी कांव कांव के कारण दुरदुराया जाता है, उसका कर्कश स्वर और कांव कांव किसी को पसंद नहीं। ये अलग बात है श्राद्ध पक्ष में वे समादारित हो जाते हैं। पर कोयल हर समय अपने मधुर स्वर के कारण लोगों के दिलो में स्थान बनाए रहती है। आप अपने पाल्यो को निर्देशित करते हो....बच्चो जब अपना मुंह खोलो, तब तुम मीठी बोली बोलो, इससे तुम यश पाओगे, सबके प्यारे बन जाओगे।

हम सभी बड़ी बड़ी उपाधियों, डिप्लोमा,प्रमाणपत्र के साथ उच्च शिक्षित अवश्य हो गए हों पर विद्यावान तो नहीं ही हुए हैं। हमारा ज्ञान सूचनात्मक दृष्टि से भले ही विस्तार पा गया हो पर अभी गहरी समझ तो कम से कम विकसित नहीं हुई है। हम अपने दुराग्रहों और पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं हो पाए हैं। विनयी होता तो दूर, हम तो जितने उच्च शिक्षित होते जाते हैं, उतने ही अहंकारी और दंभी होते जाते हैं मैं ये मैं वो का भाव प्रधान होता जाता है। और मजे की बात तो यह है कि जिस अकूत संपदा, बढ़ते बैंक बैलेंस और बहुमंजिली इमारतों, विदेश में बसे स्वजनों की उपलब्धियों पर हम गर्वित होते मुदित होते हैं, उनमें से कुछ भी साथ नहीं जाता। जिंदगी भर  ऊहापोहों में पड़े रहते हैं, कंदुक से इधर से उधर ठोकर खाते रहते हैं, इसके उसके भले बुरे बनते हैं, इस उस की आलोचना में जीवन का महत्वपूर्ण समय निकाल देते हैं । आयु के भले से छः सात आठ दशक पार कर लें पर दिमाग से तो बच्चों जैसी मूर्खता ही करते रहते हैं। शैशव, बचपन, कैशोर्य, यौवन जीते प्रौढावस्था तक भले आ पहुंचे हो, पर व्यवहार में बचपना ही कर जाते हैं, बेबात की बात को इश्यू बना लेते हैं, जो गलत सलत मन में ठान लिया, उसे ऐसे या वैसे कर ही लेते हैं, पोल खुल गई तो माफी का घिघियाया स्वर अपना लेते हैं कि आगे सेऐसा नहीं करेंगे पर हमेशा ही वैसा करते हैं क्योंकि आपने मन से ही वैसा सोच रखा है, अगले से केवल ठप्पा मुहर लगवाने की नीयत जो होती है। अपनी शर्तों को इतना बड़ा और महत्वपूर्ण कर देखते हैं कि साथ वाला या तो हमेशा स्वीकारोक्ति देता रहे, सही गलत पर मुंडी हिलाता रहे और कहीं अगला भी अड़ियल निकल गया, अपनी समझदारी का परिचय दे दिया, आपको आपकी भाषा में समझा दिया तब कितने तिलमिला जाते हैं आप और दूसरे हि क्षण ऐसों को इस या उस बहाने से दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फैंकते हैं। और अकेलेपन का सुख उठाते हैं। अब बैचेनी इसलिए भी बढ़ जाती है कि अब कमजोर तो सामने है नहीं तो जोर किस पर आजमाएं, जो मन हर मन कुढ़ते भुनते रहते हो, उसकी भड़ास किस पर निकाले। बैठे रहो अपने खोल में लिपटे, किसी के पास इतना समय नहीं कि तुम्हारे झूठे अहम को पोषित करने उसे थपथपाने और दबदबाने को अपने जीवन को होम कर दे और तुम खाली बैठे मूंछों पर ताव देते रहो। हो ही नहीं तुम इस लायक कि किसी को अपनी जीवन में शामिल कर सको। बैठे रहो अपनी झूठी अकड़ में। तुम जैसे किसी को क्या बरबाद करेंगे, खुद को ही संभाले रहो, वही बड़ा काम है।

       विद्या तो प्रकाश का दीप जलाती है, अंधकार को दूर करती है, सच कहने का साहस देती है, बड़ा बनाती है, व्यवहार करना सिखाती है, छोटो को प्यार और बड़ो को आदर देना सिखाती है तो हम ने कौन सी शिक्षा ग्रहण की कि अभी तक इस सब को आचरण का विषय ही नहीं बना सके,। स्पष्ट और दो टूक कहना ही नहीं सीख सके, मार जलेबी की तरह बात को गोल गोल घुमाते रहे। काका कालेलकर की एक बात कि सत्य बोलने के श्रम नहीं करना पड़ता है, वह तो सहज स्वाभाविक होता है उसे सरल से सरल वाक्य में कहा जा सकता है, मन को बहुत भाती है, दिल के बहुत समीप है। सारी मुसीबत तो सत्य को असत्य बना कर बोलने में लगती है, सोच विचार कर गढ़ गढ़ कर बोलना पड़ता है क्योंकि आप कुछ छिपाना चाहते हैं। सत्य कहीं उद्घाटित न हो जाए तो तौल तौल कर बना बना कर अलंकार से भूषित कर बोलते हैं। सत्य तो प्रकाश सा दीप्त है, स्वयं सिद्ध और प्रमाणित है उसे क्या सिद्ध करना। सिद्ध तो झूठ को करना होता है, तथ्य जुटाने होते हैं, प्रमाण देने होते हैं। सत्य को तुम सात तहो में छिपा कर रखो वह फिर भी नहीं छिपता, सूर्य के प्रकाश सा प्रखर और दीप्त होता है।

  तो शिक्षित बल्कि कहें उच्च शिक्षित तो बहुत हो लिये, उसके बल पर आजीविका भी खोज ली, जीवन का एक तिहाई हिस्सा भी बीत गया, अब अंतिम पड़ाव पर तो विद्या के सा विमुक्तये भाव को आत्मसात कर लें, अपने ही बनाए कटघरों के बंधन से मुक्त हो जाए, बहुत कर लिया मेरा तेरा, अब तो वसुधा को कुटुम्बवत मानने का समय है, अपनी सारी अकड़ और दंभ से, आग्रहों दुराग्रहों पूर्वाग्रहों से मुक्ति का क्षण है। अब भी नहीं चेते, सा विद्या या विमुक्तये के भाव से पोषित नहीं हो सके तो हाथ मलने और पछताने के सिवा और कुछ बाकी नहीं रहेगा। सो जागो जागो और जागो भाई। बीती जाती रैना है।

Tuesday, September 6, 2022

जो बीत गई सो बात गई,

 सफ़र जारी है .......1049

08.09.2022

जो बीत गई सो बात गई.....

जो बीता, वह कल में बदल जाता है और सब बीते हुए को भुलाने की बात कहने लगते हैं। सब आज में जीने की सीख देते हैं। जो हुआ सो हुआ, उसे भूल जाओ और आगे की सोचो। बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध लेय। जो जो घटा वह अच्छा था या बुरा, आपका एक अनुभव था और अनुभवों से हमेशा सीख ली जाती है, उसे भूला भुलाया नहीं जाता। अतीत की जमीन पर खडे होकर ही तो वर्तमान की नींव रखी जाती है, उसे खुशहाल बनाया जाता है, उससे सीख ली जाती है। यदि ऐसा नहीं होता तो सफलता का परचम लहरा चुके व्यक्तियों से उनके जीवन की मुख्य बातों को रेखांकित करने के लिए क्यों कहा जाता, उनके जीवन वृत्त पाठ्यक्रम में क्यों लगाए जाते, वे अपने जीवन के उन प्रसंगों को क्यों हाईलाइट करते जिनके चलते उनके जीवन में जबरदस्त बदलाब आया। बीत गईं सो बात गई के आधार पर तो उन्हें विगत की परेशानियों कठिनाइयों को जड़ से भुला देना चाहिए था और आज की सफलता पर इठलाना चाहिए था।

पर ऐसा नहीं है। अमीर बनता व्यक्ति अपनी गरीबी के दिनों को भूलता भुलाता नहीं, वह उसे अनमोल याद की तरह साथ लिए चलता है कि जब दंभ अहंकार पैदा होने लगे तो उस पोटरी को खोल थोडा झांक सके कि न न मुझे ऐसा बिलकुल नहीं करना है। मैंने दुख झेला है, हिम्मत नहीं हारी, तब जाकर यहां तक पहुंच पाया हूं। जो भी घटा अच्छा या बुरा, उसके अनुभव आपकी थाती हैं। उनसे सीख लेना जरुरी है। जब हम अपने जीवन की सुखद घटनाओं को प्रसंगों को बराबर याद करते हैं, सुभद्रा कुमारी को अपना बचपन इतना प्रिय है कि बार बार उसे याद करती कह उठती है, लिख कर ही संजो देती है बार बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी, गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी। जेम्स बाट जितना भी बड़ा भाप का इंजन क्यों न बना लें पर बचपन की वह घटना नहीं भूलते जब वे रसोई में बैठे आग पर चढ़े पतीले में खौलते पानी के ढक्कन पर दवाब रखकर भाप की शक्ति समझ पाते हैं। लिंकन राष्ट्रपति बनने के बाद भी कहां भूल पाते हैं कि उनका जीवन कितनी गरीबी में बीता है, न्यूटन गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत की खोज प्रयोगशाला में नहीं, बगीचे में आम को पेड़ से नीचे गिरता देख कर ही करते हैं जो मर्जी हवा में उछालो, वह आता जमीन पर ही है।

साहित्यकार लिखते रहे मेरो मन अनत कहां सुख पावे, जैसे उड़ जहाज को पंछी फिर जहाज पर आबे। सुख तो अपनी माटी अपनी जमीन से जुड़े रहने में ही है, मर्जी चाहे जहां जितना मर्जी घूम आओ, पर लौटना तो अपनी भूमि पर ही होता है। अपनी जमीन भला किसे प्यारी नहीं होती, कहते हो न ऐसे लगा कि जैसे पैरों तले जमीन खिसक रही हो। इस जमीन पर पांव जमाए रखना बहुत जरुरी है। अपनी माटी अपनी जमीन का कोई सानी नहीं। जिसकी रज में लोट लोट कर बड़े होते हैं, घुटनों के बल सरक सरक कर खडे होते हैं, उसे भला कैसे भुलाया जा सकता है। हिमवासी विषुवत रेखा का वासी भी मर्जी जितनी कठिनाइयों में क्यों न रहे, रखता है अनुराग अलौकिक वह भी अपनी मातृभूमि पर। तो कहां भूले जाते हैं अपने कच्चे पक्के घर, आंगन, दालान, बचपन की पाठशालाएं, अध्यापको की मार डांट, वह बेंच पर खड़ा कर देना, मुर्गा बना देना, पतली सी डंडी से सूंत देना, हथेली पर फुटे से चटाचट मारना, कक्षा से बाहर खड़ा कर देना, सब का सब याद है, उसी के कारण तो जो आज है बन पाए। अध्यापक ही क्यों, माता पिता से लेकर नाते रिश्तेदार, अड़ोसी पड़ोसी, समाज सब तो अपने अपने तरीके से ठोक ठोक कर हमारे खोट निकालने में लगे रहे, कह सुन कर हमें गढ़ते रहे तब तो आज इस रुप में हो पाए। और तुम रोज रोज कहते हो जो बीत गया उसे भूल जाओ, बस आज में रहो। ये आज आज ही थोड़े पैदा हो गया, इसमें कितना कितना कल समाया है तुम क्या जानो बाबू। तुम्हें तो फूली फूली चरने की लगी हुई है। अरे हर बात के पीछे बातों का लंबा इतिहास होता है, उसे जाने रहना होता है।

हां यह सच है कि अतीत को कंधे पर शव की तरह लादे रहे नहीं चला जा सकता, पर उससे सीख तो ली जा सकती है, उसको नींव में रखकर ऊपर की मंजिल तैयार की जा सकती है। हर का एक अतीत होता है उसे अच्छा बुरा नहीं कहा सकता, कुछ कटु यादें हैं तो उनसे सीख ली जाती है और जो सुखद प्रसंग हैं तो उन्हें गाहे बगाहे दोहरा लिया जाता है जिससे उसकी याद धूमिल न पड़ जाए। याद करना बुरी बात होती तो पढ़ते पढ़ाते  प्रश्नों के उत्तर याद करने के लिए क्यों कहा जाता। तो हमसे तो नहीं भूलता न अच्छा न बुरा, न सुखद न दुखद, न सुविधाएं न कष्ट। जीवन तो इस सबसे मिल कर ही बनता है मीठा मीठा हम खाएं तो आक थू जैसा कड़वा क्या कोई और खाएगा। सुख हमें बांधता है तो दुख भी खूब पाठ पढ़ाता है दुख की पिछली रजनी बीच विकसता सुख का नवल प्रभात। तो बीत गई सो बात गई ही सच नहीं है, इन्हीं बीते लम्हों के साथ बहुत कुछ जुड़ा होता है जो भूल कर भी नहीं भुलाया जा सकता। और उसे भूले भी क्यों कर, उससे सीख ले आगे बढ़ जाएं, उससे चिपके न रहें, बस बात इतनी सी है।

Monday, September 5, 2022

अगले जनम मोहे मास्टरनी ही कीजो

 सफर जारी है...1047

07.09.2022

अगले जनम मोहे मास्टरनी ही कीजो.......

हां, तो क्या बुराई है भई मास्टरनी बनने में, सबकी पसंद अलग अलग होती है। किसी को डाक्टर बनना पसंद है तो किसी को इंजीनियर, कोई समाज सेवा करना चाहता है तो कोई वकील कोई नेता कोई अभिनेता तो कोई राजनेता। कोई कुछ भी बने, ये उसकी मर्जी। और किसी के नाम पर तो नाक भोंह नहीं सिकोड़ते फिर मास्टरनी और वह भी हिंदी वाली के नाम इतना बुरा इंप्रेशन क्यों दिया, मुंह तो ऐसे बनाया जैसे मुंह में कड़वी गोली आ गईं हो या चबाते चबाते दांत तर कंकड़ आ गया हो। क्यो भाई पहले तो हमें ये बता दो कि मास्टर मास्टरनी के नाम से इतनी एलर्जी क्यों है। इन्हीं मास्टर मास्टरनी की बदौलत तुम और तुम्हारी औलाद चार आखर पढ़ के भले लोगों के बीच खड़ी हो पाती है। ये प्रजाति न हो तो सब के सब काले अक्षर भैंस बराबर बने रहते। बालक अभी चार कदम चलना भी नहीं सीख पाता, तब से उसे स्कूल जाने को लगातार उकसाते हो। अभी तो वह अपनी दैनिक आवश्यकताओं को कहने लायक भी नहीं होता तब तक उसे कंधों पर भारी भरकम बैग टांग, टिफिन और बोतल के साथ स्कूल रवाना कर देते हो, अभी छुटके तीन बरस के भी नहीं हो पाते तो उनके इम्तिहान शुरू हो जाते हैं। जो स्कूल में बच्चा खुशी खुशी जानें को तैयार हो जाता है तो इसकी वजह ये स्नेहिल मास्टरनियां ही होती हैं जो प्यार से सब सिखा  देती हैं। उनके पास पढ़ाई के अतिरिक्त भी बहुत कुछ है देने को, वे छोटी छोटी बातें जिन्हें सिखाने में आपके पसीने छूट जाते हैं, वहीं उसे वह ऐसी ट्रिक से सिखाती हैं कि आप भी दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं। ओर हद तो तब हो जाती है जब आप का बालक आपकी बात को तरजीह न देकर मास्टरनी, मैम, भैनजी की बात मानने लगता है, मैम ने जो कहा, वह ही सोलह आने सत्य है।

और तो किशोर होते वे बच्चे जो आप से नहीं संभलते, उन्हें भी ये मास्टरनियां उचित राह पर ले आती हैं, भाषा की शालीनता सिखाती हैं, उज्जड़ से उज्जड विद्यार्थी भी अपनी टीचर जी के आगे गऊ बनकर रहता है। वह जानता है ये घर नहीं है जो उसकी मनमर्जी चलेगी, ये कक्षा है, स्कूल है यहां सबको नियम से ही चलना पड़ता है, गुरुजी का आदेश मानना ही पड़ता है नहीं तो समाजिक निंदा होती है और बेभाब की पिटाई होती है। बालक की तो छोड़ो, बालक के माता पिता भी टीचर जी को बहुत मानते हैं। बिगड़े बालक को मास्टर मास्टरनी के हाथ सौंप आते हैं कुछ भी करो पर इसे सुधार दो और पैसे का ज्यादा ही घमंड हुआ तो एक वाक्य और चैंप आते हैं कि पैसे की बिलकुल चिन्ता मत करना, दो तीन चार जितने मरजी कहो, ट्यूशन लगा देंगे पर ये शर्तियां पास होना चाहिए। क्या जादू होता है इन मास्टर मास्टरनियों के हाथों में कि बिगड़ैल बैल को भी नाथ देते हैं, मस्त हाथी को भी अंकुश के जोर से काबू में कर लेते हैं।

                मास्टरनी बनने के ढेरों लाभ हैं बल्कि कहूं तो दोनों हाथ लडडू होते हैं। नमस्ते तो थोक के भाव मिलती है। पिछले पैंतीस वर्षो में अपने विद्यार्थियों से इतना स्नेह और सम्मान मिला है कि अभिभूत हूं। उनकी प्रतिदिन की टिप्पणियों ने जो इतने ऊंचे आसन पर बिठाया है उसके आगे ये बेस्ट टीचर अवार्ड कोई मायने नहीं रखते। यदि आप अपने विद्यार्थियों के दिल में गहरे उतर जाते हो, हर क्षण उनके लिए उपस्थित रहते हो, उनकी बड़ी से बड़ी परेशानियों को चुटकी बजाते सुलझा देते हो तो आप अपने विद्यार्थी के लिए किअलादीन के चिराग से कम नहीं। यदि आप अपने दायित्व को शिद्दत से निभाते हो तो जो सम्मान जो आदर उनकी आंखों में झलकता है, उसके आगे बहुत कुछ फीका हो जाता है। कितना कितना सम्मान मेरी झोली में आया है, उससे में भरी पूरी हूं। जब बहुत साल पहले पढ़े विद्यार्थी को नाम से पहचान जाती हूं तो उसके चेहरे पर जो खुशी झलकती है, उसके कोई सानी नहीं। जब उन्हें कौली भर उनकी राजी खुशी पूछती हूं तो वे जैसे धन्य हो जाते हैं। उनकी संख्या से मेरे परिवार में वृद्धि होती है। कितनी कितनी मानस संताने हैं मेरी जो विश्व पटल पर फैली हुई हैं। उनके स्नेह भाव से मैं खूब लदी फदी हूं। जिन्होंने डुगलाते कदमों से कक्षा की देहरी पार कर मुझ तक आना सीखा, अब वे कद्दावर हो गए हैं, अपने अपने क्षेत्र में रोशनी बिखेर रहे हैं। कई तो परामर्श दाता की भूमिका में है, तकनीक सिखाने में माहिर हैं। जिन तकनीकों  को समझने सुलझाने में हमें द्रविड़ प्राणायाम करना पड़ता है ,उसे वे चुटकी बजाते ही सुलझा देते हैं लो गुरुजी हो गया। 

                अपनी इन मानस संतानों से बहुत समृद्ध होती है ये मास्टरनी की प्रजाति। पूरी धरती कुटुम्ब सी लगने लगती है। जहां मर्जी चले जाओ आपने जिस फसल को बोया है जोता है सींचा हैं, संस्कारों की बुआई की हैं निराई की है खर पतवार को उखाड़ फैंका है, कठोर जमीन को गोड गोड कर मिटी को भुरभुरा बनाया है, उसे समतल किया है उस फसल के दस बारह तैयार फल हर जगह मिल जाते हैं, आपकी प्रतीक्षा करते हैं, आपसे मिलकर अपने को धन्य समझते हैं। पहले आपने उन्हें सहारा दिया आज वे आपका सहारा बन जाते हैं। इस टीचरी की नौकरी ने तो मुझे बहुत कुछ दिया है, मेरे संपर्क सूत्र विस्तृत किए हैं, मेरे ज्ञान में वृद्धि की है। विषय समझ आ जाने पर विद्यार्थी के चेहरे पर जो तृप्ति जो संतोष देखा है, उसे देख सारे श्रम की भरपाई हो गई है। और आप पूछते हो भला मास्टरनी बन के तुम्हें मिला ही क्या। बंधी हुई सेलरी, आदर्श की हद में बंधा जीवन, सादा रहन सहन, कोई फ़ैशन नहीं, बस दिन रात अनुशासन के कठोर दायरे मैं बंधा रहना, केश विन्यास में कोई बदलाब नहीं बस सारे बालो को कस कर बांध लेना, वाणी में संयमित रहना, आवरण में हर पल सावधान रहना, आपकी हर गतिविधि कई कई जोड़ी आंखों से लगातार निगरानी की जाती है, आप किसी के रोल माडल बन रहे होते हैं तो व्यवहार में इतनी सावधानी तो अपेक्षित है ही। जितना दिया, उससे कई गुना अधिक पाया है।

                पढ़ाना मेरा पैशन है, व्यवसाय नहीं। तो हर जनम में मास्टरनी और वो भी हिंदी की मास्टरनी ही बनना चाहूंगी । प्रभु जी अगले जनम मोहे मास्टरनी ही कीजो।

Sunday, September 4, 2022

मूरख ह्रदय न चेत

 सफर जारी है.......... 1047

05.09.2022

मूरख ह्रदय न चेत....

ज्ञान के अभाव में सभी मूरख ही हैं और ज्ञान मिलता है गुरूजी से। आजकल गुरुजी के अनेकों विकल्प मौजूद हैं मसलन नोट्स, कुंजी और सबसे महत्वपूर्ण गूगल बाबा जो एक क्लिक पर सारी सूचनाएं बिलकुल सही सही उपलब्ध करा देते हैं। अब सूचनाओं का संग्रह ही तो ज्ञान नहीं है न। जब तक समझ विकसित न हो , अक्क्ल में कोई बात पूरी तरह न घुस जाए, जब तक उसके प्रयोग की क्षमता न आ जाए तब तक मर्जी चाहे जितने डिग्री डिप्लोमा प्रमाणपत्र ले लो, सब रद्दी कागज के पुलिंदे बन कर रह जाते हैं। और जो जीवन में गुरू मिल जाए, और कहीं सदगुरु मिल जाए तो सब अंधकार छंट जाता है इसीलिए कहा गया मूरख ह्रदय न चेत, जो गुरू मिलहि विरचि सम।

                 गुरू वहीं नहीं है जो कक्षा में पढ़ाता है। श्रीमद भागवत की कथा में दत्तात्रेय जी ने जिन चौबीस गुरुओं का उल्लेख किया है, उनमें तो मक्खी चींटी से लेकर सर्प और कुत्ता भी सम्मिलित हैं। जो सिखाए वही गुरू। इसमें आयु की अधिकता का भी कोई प्रश्न नहीं। बोध जागे तो पांच साल के ध्रुव में जग जाए और न जागे तो सौ साल भी कम पड़ जाएं। सिद्धार्थ ने जो जो देखा, वह सब तो हम भी रोज रोज देखते हैं पर हमें तो बोध नहीं जगता। हम में से कितनों की हिम्मत होती है कि आधी रात को मनोरमा पत्नी और दुधमुंहे पुत्र राहुल को सोते लांघ कर ज्ञान की खोज में निकल जाएं। निकलना तो दूर, सोचें भी नहीं। अरे आराम से वातानुकूलित कक्ष में परिवार के साथ रह रहे हैं काहे को दर दर भटकते डोलें। ऐसी प्यास तो सिद्धार्थ को ही लगी सो पीपल वृक्ष के नीचे समाधि लगा के बैठ गए, बुद्धत्व प्राप्त हुआ और बुद्ध कहलाए। बौद्ध धर्म ही प्रचलित हो गया।

     गुरू तो कोई भी हो सकता है और जिसके कहे शब्द दिल में गढ़ जाएं वही गुरू हो जाता है। तीन संदर्भ तो सब्की स्मृति में खूब गहरे धंसे होंगे । रत्नाकर जो पेशे से डाकू थे (ऐसा लोक में प्रचलित है), परिवार के भरण पोषण के लिए लूटमार करते थे पर जब सप्त ऋषियों के संपर्क में आए और उनके कहने से परिवार के पास दौड़े दौड़े ये पूछने चले गए कि मेरे पाप में कौन कौन भागी होगा और जब पारिवारिक सदस्यों ने एक स्वर से कह दिया कि परिवार के मुखिया होने के कारण हमारा भरण पोषण तुम्हारा धर्म है, अब उसे तुम कैसे निभाते हो पाप करते हो या पुण्य, ये तुम जानो, हमारा उसमें कोई भाग नहीं। रतनाकर की आंखें खुल जाती है। दौड़ कर जाते हैं, इनका बंधन खोलते हैं, मरा मरा का गुरुमंत्र लेते हैं और उल्टा नाम जप कर ही महर्षि वाल्मीकि बन जाते हैं, रामायण रच देते हैं। ऋषि का दिया ज्ञान उन्हे महर्षि बना देता है।

     वरद राज की कथा भी याद होगी कि कैसे उसका ब्याह धोखे से विद्योत्तमा से करा दिया जाता है और जब मूर्ख कालीदास मुख खोलता है, उष्ट्र को उटर कहता है तो पोल खुल जाती है। विद्योत्तमा की डांट फटकार इतनी बुरी लग जाती है कि अभिज्ञान शाकुंतल, रघुवंश, किरातार्जुनीयम  जैसे काव्य रच देते हैं, कवि नहीं महाकवि बन कर ही दम लेते हैं।

     रामचारित मानस के रचियता तुलसी को भला कौन नहीं जानता। गोद लिए हुलसी फिरें तुलसी सो सुत होय। रत्नावली के प्रेम में ऐसे आसक्त कि सौंप को भी रस्सी समझ उसके सहारे चढ़ पत्नी के कक्ष तक पहुंच जाते हैं और रत्नावली की एक फटकार कि अस्थि चरम मय देह तामे ऐसी प्रीत, जो होती भगवान में तर जाति भवभीति। ग्रंथ के ग्रंथ लिख जाते हैं और राम चरित मानस लिख कर अमर हो जाते हैं।

     तीनों ही घटनाएं सिद्ध करती हैं कि गुरू कोई भी हो सकता है और जब बोध जगता है तब सारा का सारा अंधकार छंट जाता है, प्रकाश ही प्रकाश छा जाता है इतना प्रकाश कि आंखें चुधियाने लगती है।  ज्ञान का प्रकाश जब अन्दर जगाएगा, प्यारे श्री राम के तू दर्शन पाएगा, ज्योति से जिसकी है उजियारी सारी दुनिया, राम एक देवता। बस ज्ञान का प्रकाश हो जाए तो सब मूर्खता दूर हो जाती है। खूब समझदारी आ जाती है।ज्ञान गुरू देता है और कहीं गुरु विरंच सम हो तो सोने में सुहागा। गुरु को ब्रह्मा विष्णु महेश के साथ परम ब्रह्म की संज्ञा दी गई है पर ऐसे गुरु खोजने होते हैं ।कबीर को रामानंद, सूरदास को बल्लभाचार्य, विवेकानंद को राम कृष्ण परमहंस, दयानंद को विरजानंद चंद्रगुप्त को चाणक्य, शिवा को समर्थ गुरु रामदास, भगवान राम और कृष्ण को विश्वामित्र वशिष्ठ और सांदीपन जैसे गुरु न मिले होते तो वे वे न होते जो आज हैं। मुझको कहां खोजे बंदे मैं तो तेरे पास में की तर्ज पर गुरु भी हमारे आसपास ही होते हैं, माता को तो प्रथम गुरु कहा ही गया है। तो गुरुओं का वरद हस्त बना रहे, इनकी कृपा मिलती रहे, बस जीवन धन्य हो जाएगा। सदगुरु की खोज तो जारी रखें पर गुरु घंटालों से ज़रूर बच कर रहें।

Saturday, September 3, 2022

जिन गोविंद दियो बताय......... दु

 सफर जारी है.....1046

04.09.2022

जिन गोविंद दियो बताय.........

दुनिया में सबको एक उसी गोविंद की आस है, उसे ही भजा जाता है हे कृष्ण हे गोविन्द हे मुरारी, ईश इच्छा सर्वोपरि है, उसकी मरजी के बिना तो एक पत्ता भी नहीं हिलता, वो जो चाहे तो मूक भी बोलने लगे और पंगु भी पर्वत लांघ जाए। अभी चार दिन पूर्व ही विघ्न विनाशक का जै गणेश जै गणेश जै गणेश देवा की स्तुति से आवाहन किया है, उन्हें विराजा है, उनसे रिद्धि सिद्धि, बल बुद्धि मांगी है। अंधन को आंख देत कोढ़ी को काया, बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया दोहराया है। पर उस परम पिता, सर्व शक्तिमान प्रभु का ठौर हमें कौन बताता है,  कौन हमें उससे मिलने की राह दिखाता है,कौन उस तक पहुंचने का मार्ग बताता है तो कबीर खंगालने होते हैं, उनके दोहे, सबद, रमैनी की व्याख्या करनी होती है, उसे समझना होता है जिसमें वह स्पष्ट रूप से कह देते हैं ....गुरु गोविंद दोउ खडे काके लागू पांय, बलिहारी गुरु आपने जिन गोविंद दियो बताय।

विचार का असली मुद्दा तो यहीं से शुरू होता है जब गुरु इतना बड़ा पथ प्रदर्शक है कि वह सामान्य समस्याओं उलझनों का तोड़ और समाधान तो बताता ही है, यह तो उसके लिए बाएं हाथ का खेल है। वह तो गोविंद तक पहुंचने का मार्ग भी बता देता है। यह सच ही होगा नहीं तो ज़रा मुसीबत पड़ने पर हम गुरुजी को क्यों तलाशते हैं, उनसे विनती प्रार्थना क्यों करते हैं, क्यों कहते हैं गुरू बिन ज्ञान नहीं।पर आज के गुरु क्या इस कसौटी पर खरे उतर रहे हैं, क्या वे दुनियावी झंझटों, मोह माया से छुटकारा दिलाने में वाकई समर्थ है। क्या ये गुरुजी शिवा के समर्थ रामदास, विवेकानंद के रामकृष्ण परमहंस, दयानंद के  विरजानंद, राम के वशिष्ठ और विश्वामित्र, कृष्ण के  सांदीपन , चंद्रगुप्त के चाणक्य जैसी सामर्थ्य रख पाते हैं, क्या उन्हें अन्तर हाथ सहार दे ठोक ठोक कर गढ़ पाते हैं गुरू कुम्हार शिष्य कुंभ है गढ़ गढ़ काढ़े खोट , अन्तर हाथ सहार दे बाहर बाहे चोट को जीवन में प्रयोग कर पाते हैं या काली कमरिया ओढ़े बैठे रहते हैं, चिकने घड़े से हो जाते है जिस पर कोई रंग नहीं चढ़ता और पानी फिसल जाता है। इतने उच्च गौरव बोध की तो बात भी मत करो, इसका तो जिकरा भी मत करो । वे लौकिक शिक्षा दे लें, वही बड़ी बात है। और अधिकांश तो इतना भी नहीं कर पाते। जो  इसे कमाई और आजीविका वृत्ति के रुप में ही लेते हों ,वे भी जितना कमाते हैं उसका दशांश भी नहीं देते। वे पढ़ते भी उतना ही हैं  जिससे अगली कक्षा में प्रमोट हो सकें। और जैसे तैसे डिग्री डिप्लोमा पाकर कहीं भैन जी या मास्टर जी बन चिपक सकें । जब पढा ही उतना खोंच भर जाता है तो रेज का कहां से पढा पाएंगे। पढ़ाने के लिए तो बहुत पढ़ना होता है, पढ़ने से अधिक गुनना होता है, समझना होता है, तथ्यों को उसी रूप में पहुंचाना होता है, दस बात याद करते हो तब जाकर क्लास तक पांच पहुंचा पाते हो। अपनी बात की पुष्टि के लिए जीवन जगत से लेकर उदाहरण और दृष्टांन देने होते हैं। ये सब तब संभव होता है जब विषय को अच्छी तरह समझा हो। अब रट्टा मार के परीक्षा में लिखने तक का ही श्रम करोगे तो कक्षा में पढ़ाने जाते डिब्बा गुल होगा ही। और जो कहीं किसी विद्यार्थी ने कोई प्रश्न पूछ लिया तो या तो उसे डांट के चुप करा दोगे या बगले झांकने लगोगे। हमारे प्राथमिक अध्यापको के  तो ४४१में चार का भाग देने में छक्के छूट जाते हैं और श्यामपट पर लिखते वर्तनी की ढेरो अशुद्धियां के बीच शुद्ध शब्द खोजने में द्रविड़ प्राणायाम करना पड़ता है। इंस्पेक्शन को आए बेचारे आधिकारी के सिर लाज से झुक जाते हैं कि क्या ये ही वे अध्यापक हैं जिनके हाथों हम भविष्य की पीढ़ी का निर्माण सुरक्षित सौंप निश्चिंत बैठे है। जरा भी लाज शर्म बाकी बची होती तो अध्यापक कहलाते लाज आती, दो चुल्लू पानी में डूब मरने का मन होता पर नहीं साब, हम तो निरे ढीठ और पक्के बेशरम हो गए हैं, कहता रहे लाख कोई, हम पर कोई फर्क नहीं पड़ता। क्यों पड़े , सब एक ही नाव पर सवार है, तू मेरी ढाक मैं तेरी ढाकता हूं। अब काम में दीदा नहीं लगता, काम चोरी की आदत पढ़ गई है तो काम चोर है और चोर चोर तो मौसेरे भाई होंगे ही। पूरे सिस्टम में भांग जो घुली हुई है। सिफारिश और रिश्वत खोरी का बाजार इतना गर्म है कि जिसकी जेब में पैसा है या बड़े ओहदे वालों को जेब में रखे घूमते हैं , वे सरेआम सिस्टम को चुनौती दे देते हैं। 

          बड़ी कोफ्त होती है आखिर सालाना शिक्षक दिवस मनाते हम कौन सी प्रतिज्ञा लेते हैं और उस पर कितने खरे उतरते हैं। शिक्षक होना अपने ज्ञान को, जानकारी को विद्यार्थी  में स्थांतरित करना है। उसे सजग समर्थ नागरिक बनाना है, उसे जीवन के उच्च आदर्शों से समन्वित करना है उसे सांच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप, जाके हिरदय सांच है ताके हिरदय आप का पाठ पढ़ाना है,ऐसी बानी बोलना सिखाना है जो मन का आपा खोय, औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय । उसे सत्पथ पर चलने की शिक्षा देनी है, उसे मुसीबतों से लड़ना, उनसे जूझना सिखाना है, मुसीबतों के आगे हार जाना, घुटने टेक देना और पीठ दिखाकर भाग जाना नहीं। उसके विवेक को जाग्रत करना है। उसे बोध कराना है कि उसके अन्दर अपार शक्तियों का भंडार है, वह शक्ति पुंज है। उसे अपनी सामर्थ को तौलना है, वह भूला और भटका हुआ है, उसे चेताना है का चुप साध रहे बलबाना।उसे सही मार्ग दिखाना है, समझाना ज़रूरी है, सूचना तो वह गूगल बाबा की शरण में जाके भी ले सकता है।

          अब जो ये सब कर सको तब उस श्रेणी के अध्यापक बनने की पंक्ति में खड़े होने का साहस कर सकोगे  जिसके लिए कबीरा लिख गए सात समुद्र की मसि करूं लेखनी सब वनराय, सब धरती कागद करूं गुरू गुन लिखा न जाए। तो लगे रहिए लाइन में, कोशिश करते रहिए क्योंकि कोषिश करने वालो की हार नहीं होती और लहरों से डर कर ये नौका पार नहीं होती, कुछ किए बिना जय जय कार नहीं होती।

Friday, September 2, 2022

दुविधा में दोऊ गए

सफर जारी है.....1045

03.09.2022

दुविधा में दोऊ गए........

जीवन संकल्प विकल्प से भरा है। न जाने कितनी कितनी बार ऐसे क्षण आते हैं जब हमें दो में से एक चुनना होता है पर हम निश्चय नहीं कर पाते, दोनों के बीच झूलते रहते हैं,। एक तरह से कहें तो दोनों हाथ में लडडू की चाहना होती है, अम्मा भी प्यारी और बबुआ भी प्यारो, किसी एक को भी छोड़ना नहीं चाहते। यदि दोनों ही नुकसान दायक हों, इधर कुआ उधर खाई की स्थिति हो तो भी कम नुकसान वाले को चुनना चाहेंगे। पर जिनमें चयन के निर्णय की योग्यता नहीं होती, वे बीच में झूलते रहते हैं। बहुत मन पक्का कर होय सो राम कर भी लें तो भी जो नहीं चुना होता, उसी में पूरी चेतना केंद्रित रहती है और जो कच्चे पक्के मन से चुन भी लिया और वह अधिक लाभ का सौदा नहीं रहा तो दिन रात मार खिझियाते खिसियाते रहते हैं कि इससे अच्छा तो उसे ही चुन लेते।

दो या दो से अधिक में से एक चुनने के निर्णय की दृढ़ता अचानक नहीं सीखी जाती। इसे तो बचपन से ही सिखाना होता है। पर हम माता पिता अपने ही विकल्पों को बहुत जल्दी समाप्त कर लेते हैं और बच्चे की जिद के आगे हथियार डाल देते हैं कि तुझे नहीं समझ आ रहा तो ले, दोनों ले ले । बस यहीं से चूक प्रारंभ होती है। उसे जितना मर्जी समय दीजिए पर उसे अपना मन समझने दीजिए कि उसे चाहिए क्या, उसे निर्णय करने दीजिए, उसे उसके संकल्प विकल्पों पर विजय पाने दीजिए, उसे सिखाएं कि सोच समझ के चुनो और जो चुनो उस पर दृढ़ रहो, उसके लाभ हानि समझ लो। यह ही नहीं निश्चित कर पा रहे कि तुम्हारी पसंद क्या है, मीठा चाहिए या नमकीन या खट्टा, गर्म, ठंडा या गुनगुना, हल्का या भारी, उसे चुनने की आदत डालो, उसे समझाना ज़रूरी है कि दो में से एक चुनना होता है, अपने मन को जानना होता है, अपनी रूचि पता होनी चाहिए। इधर उधर फैली पसरी वस्तुएं हमारा ध्यान जरूर बंटाती हैं पर हमें अपने को अपनी रूचि पर केंद्रित करना आना ही चाहिए। हमेशा मन पर ही सब नहीं छोड़ देना चाहिए। मन की क्या, वह तो खूब भटकाता है। उसे तो सब चाहिए होता है, वह तो अपने को कभी एक जगह केंद्रित कर ही नहीं पाता ,बस इच्छाओं के आकाश में उड़ता घूमता भटकता ही रहता है। उसे नियमित और अनुशासित तो आप करते हैं, डांट डपट के रखते हैं, वर्जित स्थानों पर जाने से रोकते हैं। मन की क्या, वह तो निरंकुश होता है, जब चाहे ,जहां चाहे, मुंह उठा के चल देता है। हम मन को नियंत्रित करें न कि मन हमारे ऊपर शासन करे।

         आप एक होटल में खाना खाने जाते हैं ,आप चार प्राणी है, उनमें से तीन अपनी अपनी पसंद का खाना आर्डर कर देते हैं पर चौथा सदस्य बड़ी देर तक यह तय नहीं कर पाता कि उसे पिज्जा चाहिए या बर्गर या कुछ और। कभी बहन की प्लेट का पिज्जा देखता है तो कभी मां की प्लेट का पिज्जा या पिता की प्लेट का आलू परांठा। मां विकल्प देती है तुम कुछ भी मंगा लो, सबमें में शेयर कर लेना पर पिता अड़े रहते हैं कि नहीं, तुम अपनी पसंद का चुनो, उसे मंगाओ और खाओ लेकिन तब दीदी की प्लेट पर नजरें नहीं गडी होनी चाहिए। ऐसा नहीं है कि पिता कंजूस है कि उसके पास इतना पैसा नहीं कि वह अपने बालक को इतने ऑप्शन खरीद के न दे सके कि जो खाया जाय खा लो, बाकी पैक करा के ले चलेंगे। वह ये सब कर सकता है लेकिन नहीं करता क्योंकि उसे बच्चे को यह अभ्यास डालना है कि वह अपनी रूचि पहचान सके, वह उस पर ध्यान केंद्रित कर सके और उसे एंजॉय कर सके। हम में से आधों की समस्या तो यह है कि हमें ये ही मालूम नहीं होता कि हमें आखिर चाहिए क्या, कभी उसे चुन लेते हैं जो अधिकांश लोग चुन रहे होते हैं या हम उस के निर्णय से प्रभावित हो जाते हैं जिसे जीवन में अधिक मानते हैं, जिसके प्रभाव में होते हैं और फिर जिंदगी भर गाते रोते हैं कि भाई क्या करें, हम ने तो इसके उसके कहने से ऐसा कर लिया, हमारा तो मन ही नहीं था। अरे मन नहीं था तो क्यों किया और किसी के कहने से ही निर्णय लिया, किसी के दवाब में ही लिया तो उसे डिट्टो करो, लाभ हानि भुगतने के लिए तैयार रहो। ऐसे थोड़े ही होता है कि जो लाभ हुआ तो शुरू हो गए कि हमने तो पहले ही कही थी और जो कहीं नुकसान हुआ तो अगले को पानी पी पी के कोसेंगे कि हमारा काम तो इसने बिगाड़ दिया। यानि चित्त भी मेरी पट्ट भी मेरी। तुम ही सबसे अधिक समझदार हो सो तुम्हारे दोनों हाथों में लडुआ होने चाहिए।

अपने पाल्य में चयन करने, निर्णय करने और उस निर्णय पर अडिग होने की आदत बचपन से ही डालिए, पहले तो झुनझुने से उसके हाथो बजते रहते हो और फिर जब उसकी आदतें सीमेंट सी पक्की हो जाएं, वह किसी भी बात में निर्णय न ले पाए, हमेशा दूसरे के नाम की पर्ची फाड़ता रहे, उसका आत्मविश्वास डूगलाता रहे तब मार परेशान होते हो। सोच सोच के बहुत सोचो पर संकल्प विकल्प में ही मत उलझे रह जाओ, चयन का निर्णय करो और अपने उस चयनित फैसले के साथ आगे बढ जाओ। नहीं तो दुविधा में दोऊ गए माया मिली न राम या आधी छोड़ पूरी को धाबे, आधी मिले न पूरी पाबे का हाल हो जाएगा। 

Thursday, September 1, 2022

तो हरे भरे बने रहिए न

 सफर जारी है....10432

..09.2022

तो हरे भरे बने रहिए न......

कहावत है पेड़ सूखा तो परिंदों ने ठिकाना बदला । जो उजाड़ हो जाते हैं, जो खाली हो जाते हैं, जिनके पास दूसरे को देने के लिए कुछ नहीं बचता, जो भाव शून्य होते हैं, लोग उनसे धीरे..धीरे किनारा कर लेते हैं। जिनमें देश और संस्था प्रेम तो छोड़ो , किसी के लिए भी कोई प्रेम भाव शेष नहीं रहता, उन जैसों के लिए ही लिखा गया होगा जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं, वह ह्रदय नहीं वह पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। ऐसों के लिए देश गया तेल लेने, वे तो अपने इसके उसके लोगों को ही भाव नहीं देते, फिर समाज की कौन कहे।

सूखे ठूंठ पर भला कौन बसेरा बनाना चाहता है, पक्षी तक उसकी फुनगी पर बैठना पसंद नहीं करते, उड़ कर कहीं दूसरा ठिकाना खोज लेते हैं। सूखे पेड़ की दुर्दशा पर दुख तो प्रकट किया जा सकता है लेकिन उसके साथ बने रहना सबके बस का नहीं होता। पर यदि उस ठूंठ में जिजीविषा बाकी हो, कोई हरापन कहीं शेष रह गया हो तो फिर से सूखे तने पर छोटे छोटे पत्ते फूटने लगते हैं , सब हरा भरा हो जाता है। तो अपने अंदर कुछ सपने बचा कर रखिए जरूर कि जब सब छुट जाए तो ये बचा कुचा साहस बहुत काम आता है। जब तक शरीर में ताकत होती है, व्यक्ति अंधाधुंध  दौडता है, सब अपने पेट में भरना चाहता है लेकिन ऐसा कर नहीं पाता, कर भी नहीं सकता। हर की अपनी सीमाएं होती हैं। जो बिना सोचे समझे , बिना लक्ष्य निर्धारण किए दौड़ते हैं उनके हाथ कुछ नहीं आता, और शक्ति भी समाप्त प्राय हो जाती है। वे बिल्कुल शून्य हो जाते हैं। जो हाथ हमेशा देने के लिए उठते थे, उन्हें आज पसारने की नौबत आ जाती है। इष्ट मित्र साथ छोड़ने लगते हैं और आप बिल्कुल खाली खाली से हो जाते हैं, दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं। खाली हाथ तो भला अपने भी नहीं पूछते ,फिर दूसरों के विषय में तो सोचना ही फिजूल है।

ये खाली पन केवल धन दौलत का ही नहीं हुआ करता, शक्ति हीन होने का भी होता है। खाली कुए को भला कौन पूछता है, पतझड़ हो चुके वृक्षों पर किसकी दृष्टि जाती है भला, खाली डब्बा खाली बोतल किसके होते हैं भला। हुनर हीनों को कोई क्यों पूछे भला। उनसे भला किसी का क्या फायदा। दुधारू पशु की तो लात भी सही जाती है पर जैसे ही वह दूध देने योग्य नहीं रहतीं, उसे किनारे कर दिया जाता है। बैल तभी तक उपयोगी रहते हैं जब तक वे गाड़ी में जुते रहते हैं, उनकी खातिर दारी भी तभी तक होती है, बाद में तो उनके लिए सूखे भूसे के भी लाले पड़ जाते हैं, अंकोर की कौन कहे j तो खुद आगे बढ़कर स्वयं को सहेजिए। अपनी शक्ति को बचा कर रखिए, अपने हुनर को जिन्दा रखिए, सबके लिए उपयोगी बने रहिए लेकिन दूसरों के हाथ का खिलौना बन कर मत रह जाइए। समझ लीजिए बकत आदमी के काम की होती है, उसके हुनर की होती है। काम ही सबको पसंद होता है, चाम नहीं, कोरी लंबी चौड़ी बातें नहीं। आपकी चिकनी चुपड़ी बातों का राज बहुत जल्दी खुल जाता है। तो बातों के भरोसे ही मत बैठे रहिए जनाब, काम कीजिए काम। जब कुछ भी शेष नहीं होगा तब काम ही आपके काम आयेगा। आपकी मेहनत ही रंग लायेगी। काम ही आपको इज्जत दिलाता है। काम ही से वाह वाही मिलती है, शाबासी मिलती है, पीठ ठोकी जाती है, सराहना मिलती है। लोग आपके काम को सराहते हैं, आपको सिर आंखों पर बिठाते हैं, आपको पूजने की हद तक मान देते हैं।

ये कमाई एक दिन में नहीं हुआ करती, वर्षो की मेहनत का परिणाम होती है। अपने को भरापूरा बनाए रखना बहुत बहुत ज़रूरी होता है। कुछ ऐसा हुनर, कोई ऐसी जिजीविषा जरूर बचाए रखिए जिससे आप सदाबहार बने रहें। जो पूरी तरह खाली हो जाते हैं, टूटे सामान हो जाते हैं, वे कबाड़ में फेंक दिए जाते हैं। जीते तो वे भी हैं पर हर क्षण मर मर कर। उनके मन में कोई उत्साह ही नहीं बचता। जिंदगी को इतना नीरस भी मत बनाइए साहब। जिंदगी बार बार नहीं मिला करती तो उसे भरपूर जीना ज़रूरी है, सब ख़त्म होने पर भी जो कुछ बचा रहता है, वह बड़े काम का होता है। तो उस महत्वपूर्ण को जरूर पकड़े रहिए, उसे हाथ से खिसकने मत दीजिए। सूखे ठूंठ मत बन जाइए, अपने हरेपन को जिन्दा बनाएं रखिए, मनोबल को ऊंचा रखिए, सब सध जाता है। आप ही साधते हैं, दूसरा कोई हथेली लगाने नहीं आता। याद होगा स्वर्ग अपने मरे ही दिखता है। तो बने रहते हैं हरे भरे, संवेदनाओं से भरे पूरे।


Wednesday, August 31, 2022

मेरी मईया

 सफर जारी है....1043

02.09.2022

 मेरी मईया......

 लो जी सितम्बर आ गया और याद आने लगे  हिंदी दिवस, शिक्षक दिवस, श्राद्ध पक्ष ,और फिर शारदीय नवरात्र। पिछले चौदह पन्द्रह सालों से इनमें मां को याद करने का दिन और जुड गया है। पहले मां आंखों के सामने थी जीती जागती, अब तो बस यादों में शेष है। सुख में हो दूर बैठी निहारती होगी पर जरा परेशानी आई नहीं तो ढाढस बंधाने, सांत्वना देने ,सिर पर अपना वात्सल्य भरा हाथ रखने चली आती है। मेरी ही नहीं, दुनिया भर की मांऐं ऐसी ही होती हैं अपनी संतानों को नेक कष्ट में नहीं देख पाती। बच्चे मर्जी चाहे जितने बड़े हो जाएं, दादी नानी का पद ही क्यों न पा जाएं, मां के लिए तो दुलारे बच्चे ही बने रहते हैं। बच्चों को अपनी मां की शिकायत करनी हो तो वे दादी नानी की ही धौंस देते है।जब तक मां होती है, कभी लगता ही नहीं कि मां के बिना भी  जीवन हो सकता है। जब तक ब्याहे नहीं जातें तो  घर  पूरा पूरा हम बेटियों का ही होता है । पर  हाथ पीले होते ही अपने उस घर के सन्दर्भ बदल जाते हैं, नाम बदल जाता है, उसे पीहर, मायके , नैहर कहा जाने लगता है। जहां जन्मे, पले, बड़े हुए, खेले कूदे, पढ़े लिखे, जीवन जीने के जरूरी  सूत्र सीखे, वही घर अचानक से पराया हो गया और एक बिलकुल नए अजनबी माहौल को हमारा नया घर कहा जाने लगा। हम बेटियां अचानक से पराई हो गईं। कहा सुना तो जाता था कि बेटियां पराई अमानत होती हैं, उन्हें दूसरे घर जाना होता है, ये घर तो प्रशिक्षण शाला है, सीखो और दूसरी जगह जाकर बरतना, मत बनाओ खाना पर आंखों में जरूर भर लो कि सब किया कैसे जाता है। केबल आंखों में ही मत भरो, करके भी देख लो जिससे तुम्हारी आदत में आ जाए और हमें भरोसा हो जाए कि तुम सब कर लोगी, सब निभा ले जाओगी। सुनते तो थे कि बेटियों को ये घर छोड़कर एक दिन अपने घर जाना ही होता है, इनकी आगे की जिंदगी की डोर उस नए घर से बंधी होती है पर मन में बड़ा भरोसा था कि जैसे रोने मचलने रूठने मटकने पर पिताजी मां को कह देते..... क्यों रुला रही हो गुड़िया लाडो को, जो मांग रही है दे क्यों नहीं देती। हमारे मजे हो जाते कि हमारे मन की सी हो गई। पर हमें कहां पता था कि ये इतना लाड प्यार  इसलिए था कि वे जानते थे कल को ये बच्चियां अपने अपने घर चली जाएंगी तो आना जाना भी दूसरे की मर्जी से होगा। विदा होते खूब हिचकी ले ले के रोए पर मां पिताजी रोकने के बजाय उल्टा हमें ही पाठ पढ़ाने लगे कि लाली ,खूब अच्छी तरह रहना, वह घर भी तुम्हारा है, वहां भी माता पिता भाई बहिन हैं, बस उन रिश्तो के नाम बदल जायेंगे, वहां जेठ देवर ननद होंगे। पुत्री दो कुलो को पवित्र करती है टाइप और भी बहुत कुछ समझाया गया। जीवन भर कोशिश तो पूरी की कि मातृ और श्वसुर कुल कलंकित न हो। गलती से भी कुछ ऐसा हो जाता तो उनकी आत्मा को कितना कष्ट होता।

          जब जब आना होता मां, सोचते खूब बतराएंगे, कितनी कितनी बातें इकठ्ठी हो जाती तुम्हें बताने के लिए, पर तुम हमारे बिना कहे ही सब समझ जाती। तुम्हारे आगे मन खोलने की जरूरत ही नहीं पड़ी, तुम तो अंतर्यामी थीं। चेहरा देखकर तो छोड़ो, आवाज के सुर से ही सब समझ जाती कि उनकी लाडो कैसी है। धीरे धीरे समझ आ गया कि लड़कियों के दो घर हुआ करते हैं एक वह जिसमें जन्म लेते हैं, पलते हैं, बड़े होते हैं, शिक्षित दीक्षित होते हैं और जब फसल तैयार हो जाती है तो अधिकार क्षेत्र बदल जाते हैं। ये ही दुनिया की रीत है, इसमें नया क्या है। जब बेटियां ब्याही जाएंगी तभी घर में वधुएं आएंगी न। मां का सारा लाड प्यार तो उनके जानें के बाद ही याद आता है। जब तक मां  है तब तक उसे हम बच्चे टेकिन फार ग्रांटेड लेते हैं। वह कुछ भी करें हमें लगता है ये तो करना ही था , मां जो हो। मां यानि दुनिया की सबसे शक्तिशाली औरत जो अपने बच्चे की जीवन रक्षा के लिए किसी भी चौखट को पूज सकती है तो उस पर कुदृष्टि रखने वाले के लिए रणचंडी बन उसका संहार भी कर सकती है। बच्चे के लिए तो मां अनमोल और सबसे जरुरी होती है। कितने नादान और कभी कभी इतने स्वार्थी हो जाते हैं हम बच्चे कि जब मां को हमारी सबसे अधिक जरूरत होती है हम अपनी गृहस्थी में उलझे होते हैं, हमारे पास बीमार मां को देखने जानें उसकी सेवा सुश्रुषा करने के लिए समय का टोटा होता है, जरा सा करना पड़ जाए तो कितना भुनकते तुनकते हैं, झींकते है। मां तो वैसे ही बहुत संकोच में होती है सौ जरूरतों को मार लेती है बहुत ज़रूरी होने पर धीमे और कमजोर स्वर में बहुत ज़रूरी कुछ कहती भी है तो उसे हम कान पर होकर टाल देते हैं। पता नहीं वाकई व्यस्त होते हैं या अपनी परिस्थितियों पर परदा डालने हेतु मार व्यस्तता ओढ़े रहते हैं। मां, तुम मां हो, सब गलतियों को नज़र अंदाज़ कर देती हो, उन पर धूल डाल देती हो पर जब अपना ही अंतर धिक्कारता है कि मां के लिए इतना भी नहीं कर सके और जो किया, उसका भी अहसान सा थोपते रहे तो सिर शर्म से झुक जाता है।

          मां तो सब जानती है अपने बालक की रग रग पहचानती है,उसने ही तो गढ़ा है अपनी संतति को। वह कभी नाराज होती ही नहीं, बस अपने बालक को सुधारने, रास्ते पर लाने को नाराजगी का चोगा जरूर ओढ़ लेती है और बच्चे के द्वारा गुदगुदी करने पर हाल मान भी जाती है। मन में रेशा नहीं पाले रखती। मां, आप तो हमेशा यादों में हो, आपको अलग से याद नहीं करना पड़ता। आपकी आवाज, आपके निर्देश कि बेटा ऐसे कर लेना दिमाग में गूंजते रहते हैं। आप ही ने सिखाया था माता पिता गुरु का ऋण चुकाने का सबसे अच्छा उपाय अच्छे माता पिता बनना है, अपने बालक की भली भांति परवरिश करना है, उसे न केबल शिक्षित करना है बल्कि संस्कारों से दीक्षित भी करना है कि वह आप पर गर्व कर सके। कोशिश तो की है मां, पर शायद आप जितना सफल नहीं हो सके। गुरु ऋण उतारने के सन्दर्भ में आपका निर्देष था जो सीखा उसे सब में बांट दो, विद्या बांटने से बढ़ती है व्यय कृते वर्धते एव नित्यम विद्या धनम सर्व धनं प्रधानम। हां, थोडा थोडा रोज बांट ही तो रहे हैं। बस मां , तुम हम बच्चो को दिशा निर्देशित किए रखना, आयु में भले ही छह सात दशक पार कर लिए हों पर अकल के तो कच्चे ही बने रहे, समझदार और व्यवहार कुशल बनना नहीं आया, अभी भी कोई बिना गलती के बिना बात के ऊंचे स्वर में चिल्ला दे तो झट आंखें बरस जाती हैं कि हमारा क्या कसूर था, बिना बात ही लतियाए धकियाए गए। अब नहीं सुधर पाए तो नहीं सुधर पाए, कांच का सा मन है सो हाल किरच जाता है। हम भी क्या राम कहानी ले के बैठ गए मां तेरे आगे। बस ख्यालों में आती रहना, ढाढस बंधाती रहना, सब कर लेंगे, सब निबट जाएगा, बस तुम्हारा आशीर्वाद बना रहे। सो जा मां, बहुत देर हुई, तुम याद आती हो, तो पिटारा खोल के बैठ जाती हूं।

 सादर नमन और भाव पूर्ण स्मरण मां।

Tuesday, August 30, 2022

नगर ढिंढोरा पीटती,

 सफर जारी है......1048

01.09.2022

नगर ढिंढोरा पीटती.......

शुद्ध ,सात्विक, एकनिष्ठ प्रेम का प्रतीक हरतालिका तीज का पर्व अभी अभी बीता है, सुहागिनों ने अपने जीवनसाथी की लंबी आयु की प्रार्थना की है,अर्द्धनारीश्वर जैसे प्रेम की आकांक्षी हैं वे, सदा समाधि में रहने वाले महादेव की प्रतीक्षा में रत है पार्वती और जब शिव में मोह जागता है तो सती के शव को कंधे पर डाल तांडव करते हैं, जहां जहां देह के अंश गिरते हैं, वह स्थान तीर्थ हो जाता है। कन्याएं भक्ति भाव से शिव जैसे वर प्राप्ति के लिए व्रत उपवास करती हैं और विवाहिता अपने दांपत्य के साफल्य और सौभाग्य के लिए शिव पार्वती की पूजा उपासना करती हैं। गौरी पुत्र गणेश घर घर विराजे जाते हैं, गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ के तुमूलभेदी शोर से वातावरण गूंजने लगता है और फिर ऋषि पंचमी पैर पसार लेती है। भादों बीते कवार में पितरों को याद करते हैं और फिर शारदीय नवरात्र, दशहरा दीवाली, और देव उठने का समय आ जाता है यानि हम उत्सव जीवी वर्ष भर किसी न किसी ब्याज से प्रेम,उत्साह और जिजीविषा को बनाए बढ़ाए रखने हेतु  पर्व त्योहार मनाने में मस्त और व्यस्त बने रहते हैं। जीवन है तो धूप छांव की माफिक सुख दुख आते जाते रहते हैं पर ढेर दुख पर भी ये आस्था भारी पड़ती है। प्रभु का नाम लो सब ठीक हो जाएगा का भाव बड़ी आश्वस्ति देता है, जिलाए रखता है, आपसे कोई प्रेम करे या आप किसी के प्रेम में पागल बने रहे, नतीजन प्रेम तो बना ही रहता है। सृष्टि ही प्रेम पर टिकी है। सिखाया समझाया भी यही जाता है कि मिलजुल कर रहो, प्रेम भाव से रहो, आपस में सौहार्द बना रहे, लड़ो झगड़ो मत, एक दूसरे के साथ को महसूस करो, उसे जीओ, तुम्हें बहुत मिला है। उनको देखो जिनके पास मार दौलत भले हो पर प्रेम लुटाने को पात्र नहीं तो अपने अपने प्रेमास्पद में लिप्त रहो। प्रेम ही तो जीना सिखाता है, वह अंधकार भरे रास्ते में रोशनी  किरण है।

    जब प्रेम इतना पावन है कि मानव को जीने की ताकत देता है तो वह कौन सा प्रेम है जिसे न करने के लिए, प्रेम में न पड़ने के लिए नगर भर में मुनादी पिटवा दी गईं कि ... जो मैं ऐसा जानती प्रेम किए दुख होय , नगर ढिंढोरा पीटती प्रेम न करियो कोय। प्रेम किए बिना कैसे रहा जा सकता है भला और फिर प्रेम किया कहां जाता है, वह तो हो जाता है। प्रेम किया नहीं जाता हो जाता है, दिल दिया नहीं जाता चोरी हो जाता है। जिससे एक बार लगन लग जाए तो जीवन भर के लिए उसी के हो के रह जाते हैं। मीरा को ही देख लो ऐसी लागी लगन मीरा हो गईं मगन, वो तो गली गली हरी गुन गाने लगी, महलों में पली, बन के जोगन चली मीरा रानी दीवानी कहाने लगी। विष राणा ने दिया प्याला मीरा ने पिया वो तो गली गली हरी गुन गाने लगी। ऐसी लगन लगी कि सब भूल भाल गई बस मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई, जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई और पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे, इतनी प्रेम दीवानी हुई कि गोविंद को ही मोल खरीद लिया माई री मैंने लीनो गोविंदो मोल, कोई कहे सस्तो कोई कहे मंहगो, लियो री तराजू तौल, माई री मैंने लीनो गोविंदो मोल। जो प्रेम किया तो किया, पूरी दुनिया विरोध में, सास ससुर पति विरोध में पर लगन लगी तो लगी और मीरा प्रभु में जोत बन कर समा गईं।

    आखिर कौन सा प्रेम है जिसके लिए लिखा गया प्रेम किए दुख होय। प्रेम करते तो दुनिया बदल जाती है सब जगह हरा ही हरा दिखता है, हर पल सुहाना होता है, एक एक पल को कैद कर के रखा जाता है फिर भले ही दुनिया कहती रहे अरे प्यार का खुमार नशा उतरने दो, पेट की आग प्रेम की आग से बड़ी होती है, चार दिन की चांदनी के बाद फिर अंधेरी रात आती है। प्यार का नशा जब उतरता है और व्यक्ति ठोस कठोर खुरदरे धरातल पर आता है तो खाली यार से भूख नहीं बुझती, जीवन कोरे प्यार से नहीं चला करता, उसके लिए व्यावहारिक होना पड़ता है, दो दूनी चार का गणित लगाना पड़ता है, केलकुलेशन बिठाने पड़ते हैं, प्यार व्यार को बेवकूफी कह घता बतानी पड़ती है। फिर प्रेमासपद की चिन्ता नहीं, उससे मिलने वाले लाभ हानि की बात अधिक प्रभावी हो जाती है। मेरा तेरा शुरू हो जाता है, प्रेम के स्नेहिल वृक्ष में कैक्टस उग आते हैं, मार उठा पटक शुरू हो जाती है, रूठा मटकी होती है, अपने अपने पक्ष में आग्रही हुआ जाता है और लागी लगन टूट जाती है बिलकुल दो टूक हो जाती है, तू अपने घर मैं अपने घर का फैसला हो जाता है और जिस जमीन पर प्यार की फसल लहलहानी थीं, वह सूख कर बंजर हो जाती है। लो और कर लो प्रेम, यही नियति होती है प्रेम कि इसीलिए ढिंढोरा पीटा गया होगा प्रेम किए दुख होय तो प्रेम न करियो कोय।

         पर साहब, ढिंढोरा पीटने से कुछ नहीं होता, प्रेम तो दुख कष्ट सह कर भी होता है बशर्ते किसी एक में प्रेम जिंदा रहे। सच तो यह है कि प्रेम के लिए कोई शर्ते निर्धारित नहीं की जाती कि ऐसा होगा तो प्रेम है और वैसा होगा तो प्रेम नहीं करेंगे। ये प्रेम नहीं ,अनुबंध है, एक साझा समझौता पत्र है। पर प्रेम तो आज की दुनिया में भी सांसे ले रहा है। दो में से एक को भी सच्चा प्रेम हो जाए तो दीवानापन खत्म कहां होता है, भले ही प्यार की जड़ में खूब मट्ठा डालते रहो, वह पनपता भी है और वट वृक्ष भी बनता है। कल नासिक के एक साहित्य प्रेमी दंपत्ति  मिलने आए , मेरा प्रश्न बार बार उनकी रोजी रोटी को लेकर होता कि जीवन चलाने के लिए कुछ ठोस जमीन चाहिए होती है तो बताओं परिवार चलाने, बालक अजिश की शिक्षा दीक्षा के लिए कुछ तो सोचा होगा, उन दंपत्ति ने जो कहा ,कहीं दिल को गहरे छू गया ...दीदी जिंदगी चलाने के लिए भौतिक वस्तुएं उतनी प्रभावी नहीं होती जितना आपसी सौहार्द भाव होता है, हम दोनो के दिल मिले हुए हैं, और हम सोचते हैं जीवन की छोटी छोटी खुशियों को झोली में समेट लें, जहां जाना होता है बालक को भी साथ ले जाते हैं, इसे भी तो साहित्य के संस्कार देने है, बस दीदी जैसे भी हो, हमारा हो जाता है, मैं लिखती हूं, ये मनोवैज्ञानिक काउंसलर है , जो मिल जाता है उसी में जीवन चल जाता है। पचास के पेटे में पहुंचे उस दंपति से बातें करते लगा कि प्रेम ही तो आगे बढ़ने की शक्ति देता है, कम में गुजारा करना सिखाता है, जब दो प्रेम भाव में साथ हों तो सब निभ जाता है, पैसे की कमी नहीं अखरती। बस ये साथ  साथ का भाव बना रहे तो प्रेम जिंदा भी रहता है, खूब हरियाता, लहलहाता और पनपता भी है फिर संसार में ढिंढोरा नहीं पीटना पड़ता कि प्रेम किए दुख होय और प्रेम न करियो कोय।

दर्शक दीर्घा

 सफर जारी है....1041

31.08.2022

दर्शक दीर्घा........

आप जब मंच पर माइक के सामने होते हैं तब आपकी निगाहें दर्शक और श्रोता के चेहरे पर बराबर बनीं रहती है। और नहीं बनीं रहतीं तो बनी रहनी चाहिए। आखिर आप उनके लिए ही तो बोल रहे होते हैं। वे ही तो आपका लक्ष्य होते हैं। इसलिए किसी भी कार्यक्रम को संबोधित करने से पहले यह जानकारी लेना बहुत जरुरी होता है कि आखिर दर्शक दीर्घा में बैठने और  सुनने वाले कौन होंगे, किस स्तर के होंगे। वे बुद्धिजीवी हैं, सहृदय श्रोता हैं, विषय में रूचि रखते हैं या सभागार भरने को भीड इकठ्ठी की गई है।तदनुसार ही आप अपनी बात को रखते हैं। बात जिनको संबोधित की जा रही है, उन्हें अच्छे से समझ में आ जाए इसलिए आप अपनी आवाज को स्पष्ट रखते हैं, उच्चारण शुद्ध रखते हैं, वाणी प्रखर होती है। आप बोलते हैं, दहाड़ते या मिमियाते नहीं। पिच कई बार बढाते घटाते हैं, कुछ शब्दों को रेखांकित करते  श्रोताओं का ध्यान आकर्षित करते हुए दोहराते हैं, भावाभिव्यक्ति के लिए हाथ भी चलाते फिराते हैं, जो कह रहे हों उसे प्रभावी बनाने के लिए चेहरे पर भी भाव लाने की भरसक कोशिश करते है। आप ये सब करते हैं कि बात सही तरह से समझाई जा सके, श्रोता उसे ग्रहण कर सकें।

और जो आपकी बात आपका कथन सामने वाले के दिल में गहरा उतर जाता है, तो उसकी स्वीकारोक्ति नकार उसके चेहरे पर आ जाते हैं। दोनों हाथ अनायास ताली बजाने को उठ जाते हैं और जब तक आप बोलते हैं तालियों की गड़गड़ाहट आपके उत्साह को बनाएं रखती है। आप मंचस्थ और दर्शक दीर्घा में बैठे चेहरों पर आते जाते भाव से अपना मूल्यांकन कर सकते है कि आप उन्हें बांधे रखने में कितने सफल हुए हैं। निश्चित ही दर्शक दीर्घा में बजती तालियां आपके उत्साह को हवा देती है।  पर यहीं सबसे अधिक सावधानी अपेक्षित  है। इन तालियों के भेद को समझा जाना जरुरी है। जहां करतल ध्वनि आपके बोलने से सहमति होती है, वहीं विषय समझ न आने पर ये हूटिंग का रुप भी ले लेती है तो तालियों के प्रभाव में मत खो जाइए, उसकी गूंज से इस अंतर को समझते रहिए। जहां विषय की गहरी समझ जरुरी है वहीं उसे आप रख कैस रहे हैं, इस पर भी ध्यान जरुरी है। अच्छे से अच्छा वक्तव्य अच्छी प्रस्तुति के अभाव में अप्रभावी हो जाता है। आप विषय को किस रुप में रख रहे हैं ...सूचना दे रहे हैं, समझा रहे हैं, उद्धरणों से पुष्ट कर रहे हैं, व्याख्यायित कर रहे हैं, अपनी टिप्पणी जोड़ रहे हैं, किसी के कथन को कोट कर रहे हैं या उस विषय की परते खोल श्रोताओं के लिए सरल और सुगम बना रहे हैं। कई कई बार व्याख्यान विषय पर नहीं, मैं पर आधारित हो जाता है। मैंने ये किया मैंने वो किया सी आगे बढ़ता ही नहीं है। सूचनात्मक रुप में कोई जानकारी देते हुए आगे बढ़ जाना एक बात है और स्वयं को केंद्र में रख बातें करना दूसरी।

आपके बोलने से पूर्व आपका परिचय दे ही दिया जाता है कि अब अमुक अमुक बोलेंगे। इसके बाद तो आपके शब्द, आपकी बातें, आपकी भाषा शैली, विषय की रोचक प्रस्तुति ही दर्शक दीर्घा को बांधे रखती हैं। पिन ड्रॉप साइलेंस का अर्थ ही होता है कि अगला आपको सुन रहा है, सुन ही नहीं रहा , बड़े ध्यान से सुन रहा है। कितनी कितनी जोड़ी आंखें आपके चेहरे को गौर से देखती हैं, आप पर चस्पा हो जाती हैं, कान आपको सुनने के लिए प्रतीक्षारत होते हैं तभी आपकी गुरु गंभीर वाणी, खनकती आवाज गूंजने लगती है। आपकी आवाज में वह दम होना चाहिए कि जब तक आप बोलें , कान आपकी तरफ ही लगे रहें, आंखें भले ही बंद हो साधारणीकरण करवा रही हो। ये सब तब घटित होता है जब आप पूरी तैयारी के साथ पोडियम पर होते हैं, माइक संभालते हैं और श्रोता को बांध लेते हैं। ये भी ध्यान रखना जरुरी है कि सामने बैठे श्रोता सुनने ही आए हैं। तो आपको भी सुनाने में दक्ष होना जरुरी है।

          साथियो, अपनी बात रखने का जब जब अवसर मिले, उसे पकड़ो। कहने की पूरी तैयारी रखो। विषय की अच्छी तैयारी रखो। इस गुमान में मत रहो कि हमें सब आता है, इसके लिए क्या पढ़ना पढ़ाना, सब ठीक है, क्या है दो चार भारी भरकम बात कह देंगे, इधर उधर की सूचना चैंप देंगे, बस हो गया काम। हमारा तो नाम ही इतने रौब दाब वाला है कि सब लोहा मानते हैं। इस गलत फहमी में मत रहिएगा जनाब। लोग आपको सुनने आते हैं न कि आपके नाम और पद को। तो जब जब लोगो से संवाद का अवसर मिले उसे व्यर्थ मत जानें दीजिए। अपने पास  रूपरेखा तैयार रखिए, कहने वाली बातों को रेखांकित कर लीजिए। संबोधन में अधिक समय व्यर्थ मत कीजिए, वातावरण को खुशनुमा बनाए। रखिए। अपने श्रोताओं को उस कालखंड में ले जाइए जिसकी बात आप रख रहे हैं। आपके शब्द यह कमाल कर सकते हैं आपके चेहरे पर आते जाते भाव ये प्रभाव पैदा कर सकते हैं, आपकी आवाज की पिच, उसका सुरीलापन, उसकी दहाड़, उसकी करुणा संवेदना सब मिल मिलाकर संयुक्त प्रभाव छोड़ती है और जब आप अंतिम सोपान पर आते हैं तो लगता है आप एक नए लोक में श्रोताओं को घुमाकर एक्जिट पर छोड़ रहे हों। आप वाणी को विराम देते हैं तब श्रोता उस काल खंड से जैसे बाहर निकलता है और तालियां बजने लगती हैं, श्रोता आपको और सुनना चाहते हैं।

          तो अपनी वाणी में ये प्रभाव पैदा कीजिए, सुर को तराशिये, विषय की पूरी तैयारी रखिए और पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने श्रोताओं के मध्य उपस्थित होइए, मंच पर चढ़िए, माइक संभालिए और अपने को अभिव्यक्त करना प्रारंभ कर दीजिए। सारी शुभकामनाएं और शुभेच्छाएं आपके साथ हैं।

Monday, August 29, 2022

जैसे पेड़ खजूर

 सफर जारी है....1040

30.08.2022

जैसे पेड़ खजूर .......

ये लो कल्लो बात, हम तो जे समझे बैठे थे कि सारी मुसीबत नाटे कद वालों की होती है, आलोचना के शिकार वे बनें और कहीं आस पास में छह फुटिया खड़ा हो जाए तो कद और छोटा लगने लगे और मन में धुकुर धुकुर अलग लगी रहे कि जे बांस से हटें तो नेक सहज हो पाएं। लंबे कद की शान में तो बड़े बड़े कसीदें पढ़े गए कि जिसकी बीबी लम्बी उसका भी बडा नाम है और जिसने अच्छा खासा कद पाया हो वह तो दूर से ही अलग चमकता रहता है। फिर हमारे कबीर जी को क्या हो गया कि लिख मारा बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर। अब खजूर के पेड़ के अपने आनंद हैं। कन्या लांगुर गाते दुहराते हैं न मईया तेरी गेल में एक लंबो पेड़ खजूर, बापे चढ़ के देखियो मेरी मईया कितनी दूर कि लांगुर तुम लुटिया हम डोर सरक चले जई वन में कि चक्की चल रई बड़ के नीचे रस पी जा लांगुरिया। और कबीरा यों कह रए कि बडा भया तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर और जैसे ही आगे की लाइन पढ़ी कि पंछी को छाया नहीं फल लागे अति दूर सो ज्ञान चक्षु खुल गए कि ताड़ जैसे लंबे लंबे होने का कोई अर्थ नहीं जो किसी के काम न आ सको। अब खजूर और ताड़ के पेड़ भले से लंबे हो पर आम आदमी के बस का न तो उस खजूर को तोड़ पाना सहज है और न राहगीर को उन चार पत्तों की छाया नसीब हो पाती है जो शीर्ष पर टिके बस अपने में ही आनंदित होते रहते हैं पर किसी के काम नहीं आते।

फिर पड़ा विद्या विनयम ददाति कि पढ़े लिखें गुने व्यक्ति तो नम्र होते हैं, ऐंठ के मारे पैंठ को नहीं जाते। अब देखो फलों से फलों से लदा वृक्ष कैसे झुका झुका सा रहता है कि छोटा बालक भी हाथ बढ़ा के डाली झुका कर फल तोड़ ले नहीं तो पेड़ को झकझोर कर हिला दें तो पके आम कैसे टप्प सीना जमीन पर गिर पड़ते हैं। फिर बताया गया नर की अरु नल नीर की गति एकही कर जोय, ज्यों ज्यों नीचो हे चले त्यों त्यों ऊंचे होय। जो भरे होते हैं वह अधजल गगरी से छलकते नहीं और थोथे चने से बजते नहीं। के अधजल गगरी छलकत जाए और थोथा चना बाजे घनात। जो शारीरिक कद से छोटे हो तो उसे बढ़ाने के ढेर विकल्प बता दिए गए और सबसे आसान तो ऊंची एड़ी के उपानह पहन लो कि पटरे पर खडे होकर ऊंचे पे रखी वस्तु भी उतार लो। मतलब कद को लेकर कोई सोचने विचारने की बाट नहीं, उसके विकल्प खुले हैं।

पर छोटे न हों हम बुद्धि से हों ईश मय से विश्व मय, हों राम मय और कृष्ण मय जगदीश मय जगदेव मय प्रार्थना सुनी तो लगा कि छोटे कद जा होना उतना हानिकारक नहीं जितना बुद्धि से सोच से छोटा होना। जो छोटा सोचते हैं वे कभी बड़े बन ही नहीं पाते, वे क्षुद्र बुद्धि के मालिक होते हैं। पहले तो सोचते विचारते ही नहीं हैं और जो कहीं सोचना पड़ भी जाए तो केबल स्व केंद्रित सोचते हैं एमआ बांटे रेवड़ी फिर फिर अपने को देय। उनका घेरा बहुत आत्म केंद्रित और छोटा होता है। उससे इतर उनकी दृष्टि ही नहीं जाती। और जो कभी किसी के लिए कुछ करने की नौबत आ पढ़े, कि किसी मजबूरी में करना ही पड जाय तो किए हुए को इतनी इतनी बार गायेंगे सुनाएंगे कोट करेंगे कि लेने वाले को अपराध बोध होने लगे कि किस मुहूर्त में मैं सहायता लेने चला गया। सुनते तो यह भी हैं कि यदि के लिए कुछ करना ही पड जाए, किसी भी भाव से करो तो करके उसे भूल जाओ। उसका हिसाब किताब ऊपर वाला कर लेगा। तुम एक कैसा दोगे वह दस लाख देगा, गरीबों की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा। बनो ऐसे कि एक हाथ से दो तो दूसरे को पता भी न चले और देते समय नीचे नेत्र कर लो। मत देखो कि किसे दिया है, बस जो जरूरत मंद था, इसकी थोड़ी सी सहायता की है।दो तो उसे मैगनीफाई मत करो, दे के भूल जाओ क्योंकि आदमी की भला क्या बिसात कि वह  किसी को कुछ दे सके। असली सच तो यह है कि देनहार कोई और है भेजत है दिन रैन, लोग भरम हमरो करें ताते नीचे नैन।

सो छोटा नाटा कद उतनी नहीं बिगाड़ता जितनी छोटी बुद्धि और छोटे सोच से हानि होती है। क्यों सोचो छोटा भला, सोचने में क्या जाता है, बड़ा सोचोगे तो एक दिन कुछ बडा कर भी जाओगे। आखिर जो बड़े सपने देखते हैं वे एक न एक दिन बड़े बनते भी हैं। बस करना होता है। कोरे सपने देखना तो शेख चिल्ली का काम है। तोजैसे पेड़ खजूर न बने, बड़ा सोचें, बड़ा करें छोटे न हों हम बुद्धि से।

Sunday, August 28, 2022

चेहरे ऊपर चेहरा

 सफर जारी है....1039

29.08.2022

चेहरे ऊपर चेहरा ....

कुछ लोगों से मिलते जुलते ये पंक्ति बार बार दिमाग में गूंजती हैं ... एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं लोग। उनके चहरे के नित नए बदलते चेहरे को देख ये निश्चित करना बहुत मुश्किल हो जाता है कि आखिर असली चेहरा है कौन सा। मिलते हर रोज़ हैं पर एक बदले चेहरे के साथ । मन होता हैं इनके चहरे के सारे नकाब नोंच कर अलग फैंक दिए जाएं और असली चेहरे का सच सबके सामने ले आया जाए। पता तो लगे लोगों को कि ऐसे सीधे सादे दिखने वाले चेहरे के पीछे का सच क्या है। अंदर कुछ बाहर कुछ होते हैं। जैसे ही सामाजिकता का दबाब हटा, अपने मूल रुप में आ जाते हैं। लोगों से मिलते ही मेकअप किए चेहरे के साथ हैं इसलिए ऐसों की सोशल इमेज कहीं अलग होती है। वे जमाने भर के लिए भले ओर दयालु होते हैं वही जिसके होते हैं उसके लिए खौफ बने रहते हैं। एक झूठ पर पर्दा डालने को अनेक नए झूठ खडे कर लेते हैं। जो कहते हैं वह करते नहीं और जो करते हैं उसका कोई जिकरा नहीं होता। बस हाथी की तरह के खाने और दिखाने के दो सेट रखते हैं। मन में कुछ और चलता रहता है पर वाणी कुछ और कहती है इसलिए अक्सर शब्द हावभाव के साथ संतुलन नहीं बिठा पाते। यदि वे इन मामलों के उस्ताद न हों तो,बहुत शातिर न हों तो चोरी हाल पकड़ में आ जाती है। चोर की दाढ़ी में तिनका ऐसे ही थोड़े कहा गया होगा। वे चोर को चोरी के लिए उकसाते हैं और पहरेदार के साथ मिलकर जागते रहो की आवाज भी लगाते रहते हैं। वे अपने बेहद निजी लोगों को पहले से ही समझाए होते हैं कि समाज में इज्जत बनी रहे तो सबके सामने झूठ मूठ डाटूगा भी और दो चार थाप भी लगाऊंगा , पर तुम बुरा मत मानना। ये तो लोगों को दिखाने के लिए हैं। करना वही जो चाहते हो, मेरी पूरी सहमति है पर दुनियां दिखाने के लिए तो ये छद्म व्यवहार किए ही जाते हैं।

अब इतने ही समझदार होते, दुनिया की असलियत जानते तो लोगों को समझने में बार बार  गच्चा क्यो खा जाते। अब कोई बड़ी बड़ी बातें कर रहा है तो वैसा आचरण भी होता होगा। हमें क्या पता कि नौ सौ चूहे खा के बिल्लियां हज करने को जाया करती हैं, ये धर्म की आड़ में खेल खेला जा रहा है, कभी डिग्रीधारी के नाम पर कभी खानदान के नाम पर लोगो को बेवकूफ बनाने की मुहिम छिड़ी हुई है।मेकअप की आड़ में काले कारनामों को अंजाम दिया जा रहा है। अब तो ये खेल खुल्लम खुल्ला और खेला जा रहा है। लो उखाड़ लो हमारी मूछ पूंछ जो तुम पे उखाडी जाय। अरे हमारी ऊपर तक पहुंच है, सब काला पीला काले पीले को सफेद बुर्राक में बदलने की ताकत रखते हैं। और जो बार बार दंडाधिकारी से सजा दिलाने का सपना पाले बैठे हो, कभी पूरा नहीं होने का। ऐसों को तो हम अपनी जेब में रखते हैं, ऐसे तो हमारे तलवे चाटते हैं, ज्याड़ बक बक करे तो रुपयों की गड्डी से उसका मुंह बंद कर दिया जाता है। पैसे में तो बड़ी ताकत है साब, पैसा फेंको तमाशा देखो। धन तो अच्छों अच्छों के ऐब ढक देता है। काले किसट्ट उल्टे तवे को भी पैसों का मुलम्मा चढ़ा कर दूध सा उजला और एकदम भक्क सफेद दिखाया जा सकता है।

क्यों इतना नाटक करते हो, छद्म ओढ़े रहते हो, अरे जो हो वही बने रहो, जो यथार्थ में हो वैसे ही दिखने चाहिएं। ये ओढ़े गए मोटे बोरे से लबादे बहुत भरमाते हैं। असल को साफ छिपा जाते हैं। बस नकली मुखौटे की आड़ में सब चलता रहता है। लाख गलत और झूठे सही, सबकी निगाहों में पाक साफ बने रहते हो। गलत सलत करते हो और कह सुन कर, सिफारिश का दबाब डलवा कर सब रफा दफा करवा देते।अधिकारी की सही का ठप्पा लगाकर झूठ को ही सच प्रमाणित करवा लिया। अब तुम चाहे जैसे मरजी बने रहो, फाइल में तो अच्छा अच्छा रिकार्ड हो ही गया है। आधिकारी कौन दूध के धुले हैं, सो वे न कहने की हिम्मत जुटा ही नहीं पाते। और छोटे बड़े सब मिलकर घाल मेल करते रहे हैं। जब जब निबू की चूक खट्टी बूंद इन जैसों के सफेद उजले दूध की कढ़ाई में पड़ जाती है, दूध फट जाता है और सब दूध का दुध पाणी का पानी हो जाता है। ऐसे दस बीस सब सिस्टम में होते हैं जो उखाड़ पछाड़ में लगे रहते हैं और सात तहों में से भी सच खोज कर ले आते हैं। उन्हें सच को सच कहने और सही करने का ऐसा भूत चढ़ा हुआ है कि गलत के लिए अंतरात्मा गवाही नही देती और सच सामने आते ही सालों से बुने और बने  ढांचे टूट जाते हैं, एक सच कहते इसके उसके सबके बुरे बन जाते हैं। कोई विकल्प है क्या। हां हां क्यों नहीं, तुम भी चेहरे ऊपर चेहरा चस्पा कर लो और सब ऐसे ही चलने दो पर तुम्हारी अंतरात्मा इसके लिए कभी गवाही देगी नहीं। तुम तो लगातार सत्य की खोज में लगे रहोगे। लगे रहो, रोका किसने है पर इस सब के लिए बहुत सशक्त बनना होगा, संकल्प शील और दृढ़ प्रतिज्ञ रहना होगा, बार बार की चोट से टूटना नहीं, और मज़बूत बनना होगा। कर पाओगे ये सब तो नोच डालो सारे लबादों और नकाब पोशों को, उनके चेहरे नंगे कर दो, वे तिलमिलाएंगे, घोड़े से हिनहिनाएंगे, मक्खी से भिनभिनाएंगे जरूर पर तुम चुप बने रहना, करो अधिक पर कहो कुछ नहीं, मौन में बड़ी शक्ति होती है। और जो तुमसे ये सब न निठ पाए तो जैसा चल रहा है चलने दो, यथास्थिति बनी रहने दो।चलने दो वैसा ही जैसों सदियों से चला आ रहा है। बस अपना अपना देखो, मेरा तो हो गया कह कर तान चद्दर सोते रहो। अब तुम सोचो कि दोनों में से  करना क्या है। हम तो कल भी सच के साथ थे, आज भी हैं और भविष्य में भी ऐसे बने रह की उम्मीद है। नेक इरादे वाले के साथ भी कारवां जुड़ जाता है फिर देर भले हो। तो चेहरे पे चेहरे मत लगाते रहिए नहीं तो एक दिन असली चेहरा ही गायब हो जाएगा, अंतरात्मा की आवाज कानों तक नहीं पहुंचेगी। सब बिखर जाएगा, कुछ भी नही सिमटेगा तो नोच फैंकिए इन लबादे और झूठे मुखौटों को।

Friday, August 26, 2022

फल तो रितु पर होय

 सफर जारी है ......1038

28.08.2022

फल तो रितु पर होय.......

पता नहीं कितनी कितनी पंक्तियां है जो सालों के अनुभवों का निचोड़ है, देखने में मात्र दो लाइन का छोटा सा दोहा लगता है पर अपने अंदर अर्थ विस्तार की ढेरों छटाएं समाए रहता है। छोटा बालक जब प्रश्न का उत्तर लिखता है तो वह जो जो जानता है सब लिख मारता है। उसे इस बात का बिल्कुल भी बोध नहीं होता कि क्या क्या पूछा गया है, उसे तो जो आता है लिखना सिद्ध। और जिन्हें कुछ नहीं आता, वे पूरी वर्णमाला ही लिख डालते हैं कि हमने तो सब आखर लिख दिए, जो पसंद हो उस शब्द, पदबंध,वाक्य, अनुच्छेद की रचना करते जाओ, जितना मर्ज़ी पेज रंगने हो रंगते जाओ, मना किसने की है। वे तो बालक हैं अबोध हैं पर हम बड़े भी तो बिना सोचे समझे यही सब करते हैं। कह तो अंधाधुंध अंट संट कुछ भी बकते जाते हैं नहीं तो मुंह सिल के बैठ जाते हैं कि लो कर लो, जो करना हो, हम कुछ बोलेंगे ही नहीं। दोनों ही अति के छोर है के तो उल्टा सीधा करना और नहीं तो करना ही नहीं।

कुछ ऐसे हैं जो मगते की तरह चौबीस घंटे हाथ ही फैलाए रहते हैं, उन्हें तो बस मिलना चाहिए। उन्होंने पढा ही नहीं होता कि सहज मिले सो दूध सम, मांग मिले सो पान, कह कबीर वह रक्त सम जामे खींचा तान। ऐसा तो समझदार सोचता है। वह पहले तो मांगेगा ही नहीं और यदि मांगने की नौबत आ ही गई तो अपने लिए नहीं सर्व जन हिताय मांगता है। मर जाऊ मांगू नहीं अपने तन के काज, परमारथ के कारने मोहि न आबे लाज। महामना ने सर्वजन हिताय मांगा और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय बन गया। प्रकृति तक देने में विश्वास करती है लेने में नहीं। प्रकृति हमें देती है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखें। न बाबन न, हमसे देने की नहीं, बात ही करनी है तो लेने की करो। देने के हमारे अपने नियम धरम है। देंगे तो अपनो को देंगे। अंधा बांटे रेवड़ी फिर फिर अपनो को देय। जब घुटने तक पेट को नवते हैं तो हम क्यों नहीं नवेंगे। हमें नहीं बनना सूरज और हवा कि मार सुना सुना के मारे डालते हो... सूरज हमें रोशनी देता हवा नया जीवन देती है, भूख मिटाने को हम सबकी धरती पर खेती होती है। दूजों का भी हित हो जिसमें हम कुछ ऐसा करना सीखें, हम भी तो कुछ देना सीखें। क्यों सीखें हम देना। हम तो लेने में विश्वास रखते हैं

हमें नहीं बनना वृक्ष, नदी और साधु जैसा। मार सुना सुना के आती किए देते हो कि वृक्ष कबहू नही फल भखै, नदी न संचे नीर, परमाथ के कारने साधून धरा शरीर। हां तो वृक्ष के दांत ही नहीं थे कहां से फल खा लेता, नदी पे कौन भंडार धरे थे जो जल इकठ्ठा कर लेती और साधुओं की तो पूछो ही मत, वे तो जन्मते ही ऐसे हैं। हम तो असाधु ही भले। कम से कम अपने भंडार तो भरे रहते हैं। अरे दूसरों को तो जब बांटे जब अपने से बचे, यहां तो अपने के ही लाले पड़ रहे हैं। अरे हमपे से बचेगा तो अपने बाल बच्चों के लिए नहीं भर  लेंगे। फिर सात पीढ़ियां बैठ कर खा सकें, इतना तो करना बनता ही है। हमें क्या मूरख समझ रखा है कि दोऊ हाथ उलीच उलीच कर खुद ठनठन गोपाल बन जाएं और फिर दूसरों के आगे हाथ फैलाने की नौबत आ जाएं। न बाबा न। हम तो पहले अपने घर में दीया जलाएंगे ता पीछे सोचिंगे बाहर की। ऐसे तो कबीर ही थे कि जो बीच बाजार में लुकाठी लेकर खडे हो गए और आने जाने बालो को और बुला रहे हैं कि जो घर फूंके आपनो चले हमारे साथ। खुद तो डूबे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे।

एक और हैं जो पहले तो हाथ नहीं हिलाएंगे कि अपनी पे आ गए तो एक ही दिन में सौ दिन का पानी पिला देंगे और फिर लम्बी डुबकी मार जायेंगे। इन्हें तो इतनी भी समझ नहीं कि धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा फल तो रितु पे होय। के तो हिल के नहीं देंगे कि बिना स्पीड ब्रेकर के दौड़ते ही चले जायेंगे और कहीं टीचरी में गलती से घुस गए तो साल भर के ग्यारह महीने तान के लंबी सोएंगे और इम्तिहान बिलकुल सिर पर आ गए तो दस दिन में तीन सौ पचपन दिन की कसर पूरी करेंगे। ऐसे थोड़े ही होता है। रोज पढ़ाओ थोडा थोडा तो बालकों के भेजे में भी भरे कुछ, उन्हें कुछ समझ आए, तुम तो के सौ की स्पीड में चलते हो कि बिलकुल थम जाते हो। रोज रोज करो तो काम का पहाड़ ऊंचा नहीं होगा। उसे देख के भय भी नहीं लगेगा। रोज का रोज करना आसान भी होता है।

तो भाई मत बनो कबीर, सबके बूते का होता भी नहीं कबीर जैसा हो पाना। तुम तो उनका लिखा समझ लो उतना ही बहुत है। और समझ में न भरे तो रट ही लो। मोंठ का पानी गुन नहीं करेगा तो औगुन भी नहीं करेगा। मत सोचो दूसरों के लिए, अपना तो देखो, तुम तो खुद के लिए ही सावधान नहीं हो दूसरे का क्या कर पाओगे। तो बहुत फूली फूली चर ली, अब भी चेत जाओ। रोज रोज करोगे  तभी सफलता मिलेगी। फल रितु आने पर ही आयेगा

 सो धैर्य बनाए रखो। माली सींचे सौ घड़ा फल तो रितु पर होय। धैर्य।

Thursday, August 25, 2022

हम रहें न रहें, संस्था ये रहनी चाहिए

 सफर जारी है........1037

26.08.2022

हम रहें न रहें, संस्था ये रहनी चाहिए......

 मजबूत राष्ट्र के लिए जरुरी हैं ऐसी संस्थाएँ जो राष्ट्र के लिए देशभक्त नागरिकों का निर्माण ही नहीं करती, बल्कि उन्हें स्वतंत्र चेता भी बनाती हैं। उनमें राष्ट्र भक्ति के भाव को कूट कूट कर भरती हैं। वे केवल पढ़ लिख कर शिक्षित ही नहीं होते, बल्कि संस्कारित और दीक्षित भी होते हैं। देश के लिए मर मिटने बलिदान होने का सपना केवल सैनिक ही नहीं पालते, विभिन्न संस्थाओं में कार्यरत कार्मिक भी संजोए रहते हैं। जरुरी नहीं कि सीमा पर सिर कटा कर आने या दुश्मन के सीने में दस बीस गोली मारना ही वीरता हो, मेडल पाना ही शौर्य की निशानी हो। देश से पहले संस्था जिसमें आप अपनी रोजी रोटी कमाते हैं, समाज जिसमें आपका अधिकांश समय गुजरता है, पड़ोस जिसके साथ आप की रोज की उठा बैठक होती है , घर जो आपको दिन भर की थकान के बाद विश्राम देता है, जिसके आप अनिवार्य सदस्य होते हैं, में आपकी भूमिका बहुत निर्णायक होती है।

              सच पूछें तो सारी शुरुआत घर से ही होती हैं, बोलने चालने, खाने पीने, ओढ़ने पहनने और छोटो बड़ो के साथ व्यवहार करने का सबूर तो घर से ही ग्रहण किया जाता है, अच्छी बुरी आदतों का बीज तो वहीं रोपा जाता है, मूल्य तो वहीं विकसित किए जाते हैं। जी कारे या तू तड़ाक से बोलना भी वहीं से सीखते हैं, बड़ो के साथ दुर्व्यवहार, असभ्य और अशालीन भाषा भी वहीं सीखी जाती है और स्त्री जाति के सम्मान या बात बात पर उन्हें लताड़ने, उन पर अपना पौरुष आजमाने की सीख भी वहीं से मिलती है। ये आदतें जिन्हें हम बचपना या लड़कपन या बाल हठ कह सिरे से नकार देते हैं ,जिन पर लाड प्यार  लुटाते यह बिलकुल भूल जाते हैं कि हम समाज के लिए ऐसे नासूर तैयार कर रहे हैं जो समय पाते लाइलाज हो जायेंगे।

             बिजली पानी की बचत की आदत घर से ही पड़ती है न। जिन्हें इनके प्रति असावधान होने का चस्का लग जाता है ,वे छोटी बड़ी जिस मरजी संस्था में पहुंच जाए, मरजी चाहे जिस बड़े से बड़े पद पर पहुंच जाए , जीवन भर उन्हीं आदतों का शिकार बने रहते है। एक बार अपने से बड़ो की अवज्ञा की जो आदत पड़ी, वह जिंदगी भर नहीं छूटा करती। क्रोध को नियंत्रित करना नहीं आता , उसका सही स्थान और सही तरीके से अभिव्यक्ति नहीं आती तो हर छोटी बड़ी बात पर आक्रोश ऐसे फूटता है कि सब गुड गोबर हो जाता है, इतने जोर जोर से चिल्लाते हैं कि डर के मारे सब एक कोने में छिप जाते हैं। घर परिवार से निकल संस्थाओं में सेवा देने जाते ये बाशिंदे लाज शर्म सब को ताक पर उठा कर रख देते हैं। जरा सा काम का दबाब क्या बढ़ जाए, बस फूट पड़ते हैं। धीरज तो नाम मात्र का नहीं, बस उतावले हैं कि एक ही सांस में सारी सीढ़िया चढ़ ली जाएं, और अब तो सीढ़ियों की भी जरूरत नहीं रही, लिफ्ट जो हैं जो बटन दबाते ही उन्हें निर्धारित स्थान पर ले जाती हैं। इससे उनका समय और श्रम दोनों बचता है फिर भले ही जॉगिंग और एक्सरसाइज के लिए जिम में जाने और साइकिल चलाने की कवायद क्यों न करनी पड़ जाए।

 जल्दबाजी में कुछ भी कच्चा पक्का पेट में डाल लेना या बिना भूख खूब ठूंस ठूंस के खा लेना और फिर डाक्टर की शरण लेना यानि पहले बीमारी को आमंत्रण देना और फिर उसका इलाज करने में एडी चोटी का जोर लगा देना। पहले समय से न सोना न उठना और फिर नौकरी पर जाते हड़कंप मचाना, घर भर को हिला कर रख देना। इन सिपाहियों को किस फ्रंट पर लड़ने भेजा जा सकता है जो स्वयं में ही समस्या के रुप में तैयार हो रहे हैं।

         कोई भी संस्था ईंट मिट्टी गारे सीमेंट से ही नहीं बना करती, उस पर महंगे रंग रोगन करने से ही नहीं चमका करती। उसमें काम करने वाले सद्स्यों की कर्मठता उसके  सबसे बड़े आभूषण होते हैं, सद्व्यवहार और पारस्पिक सौहार्द, नियमों का पालन, कठिन श्रम, अधिकारी के निर्देशों का यथोचित पालन , छोटे बड़ों से बोलने के यथायोग्य तरीके उस में जड़े वे नगीने होते हैं जिससे संस्था चमकती हैं। सदस्यों का भरपूर आत्मविश्वास और कार्य को सीखने की ललक उन्हें कार्य दक्ष बनाती है। और ये कार्यकुशल सदस्य संस्था के प्राण कहे जाते हैं। संस्था के कार्यो के उत्तरदायित्व को निजी भाव से ग्रहण करते ये सैनिक खुद तो ऊंचे उठते ही है, साथ ही अपनी संस्था को भी यथोचित गौरव दिलाते हैं। कार्मिक ही तो संस्था की आत्मा है। उसकी धुरी हैं, जहां वे जरा सा चूके, सब सिस्टम गड़बड़ा जाता है।

         तो बने रहें ये सैनिक मुस्तैद, लगे रहें अपने अपने कार्यों में, बढ़ते रहें प्रगति पथ पर निरंतर। व्यक्ति के सम्मान से बढ़ कर संस्था का मान होता है। व्यक्ति आते जाते हैं, पर संस्थाऐं बनी रहती हैं। घर का मुखिया अपने मान अपमान को भूल भुला घर की नींव को मज़बूत करता है, उसमें सेंध लगाती, उसकी जड़ खोदती ताकतों से बचाब में लगा रहता है और संस्था का शीर्षस्थ स्वयं को भुला बिसरा संस्था के मान की रक्षा में लग जाता है। व्यक्ति तो  आते जाते रहेंगे  पर संस्थाऐं बची रहनी चहिए, इनकी कार्य संस्कृति का क्षरण नहीं होना चाहिए, हर छोटे बड़े सदस्य को  अपने निजी स्वार्थों को परे रख इसके मान की रक्षा में लग और जुट जाना चाहिए। तो बनी रहें ये राष्ट्र भाव को पोषित करती ये संस्थाए, हम रहें न रहें।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...