Tuesday, July 19, 2022

हंसते रहो मुस्कराते रहो

 सफर जारी है.....962

13.06.2022

खुशियां पैसों की मोहताज नहीं हुआ करती।अरे हंसने मुस्कराने में कौन पैसा लगता है।वैसे भी सब बिकाऊ ही नहीं हुआ करता।जिन्हें खुश रहना आता है वे अभाव में भी के प्रसन्न रहने के अवसर खोज लेते हैं।याद आती है उस राजा की कहानी जो बीमार हो जाता है और वैद्य जी उसके रोग का इलाज एक खुश मिजाज व्यक्ति की कमीज पहनना बताते है।खुश व्यक्ति की खोज शुरू होती है और आश्चर्य की बात तो यह निकली कि जो सदा प्रसन्न और मस्त रहता था उसके पास कमीज तो छोड़ो, फ़टे चिथड़े भी नहीं थे।वह नङ्गे वदन ही मस्त था।यदि सुख और प्रसन्नता वस्तु में होते तो अमीर तो कभी दुखी ही नहीं होते।पर सारे भौतिक संसाधनों के बाद वे बीमार दुखी और अप्रसन्न है।आरामदेह विस्तरों पर एसी कमरों में भी उन्हें नींद नहीं आती, खाने के लिए बहुत कुछ है उनके पास लेकिन भूख गायब है।जो थोड़ा बहुत खाते हैं उसे पचाने के लिए मुठ्ठी भर गोलियां फांकनी पड़ती है।वर्जिश व्यायाम की ढेरों मशीनें  खरीद कर घर में ही जिम तो तैयार कर लिया गया  है पर कसरत का समय ही नहीं मिलता।

भूख नींद कोई भोजन और विस्तर पर निर्भरथोड़े ही हुआ करती है।भूख में तो किवाड़ भी पापड़ लगते हैं और नींद ठौर नहीं देखा करती।जब आती है तो पत्थर पर भी आ जाती है, गर्मी सर्दी में भी आ जाती है।जिन्हें खुश रहने की आदत होती है वह हंसने मुस्कराने की कोई भी वजह खोज लेते हैं और जो रोतड़े हैं उन्हें सब कुछ होते सोते भी रोने झींकने से फुर्सत नहीं मिला करती।वे भरे गिलास पानी और परसी थाली में भी कोई न कोई नुस्ख निकाल लेते हैं।जो पास है वह आंख तर नहीं आता और पराई थाली का भात सदैव मीठा लगता है।दुखी होने के ऐसे ऐसे कारण खोज लाते हैं जिनके सिर पैर ही नहीं होते।अपना आत्मविश्लेषण करें न करें पर दूसरों के काम में नुक्ताचीनी निकालते रहते है।धीरे धीरे यह वृत्ति उनके स्वभाव का अंग बन जाती है।

          अरे भाई हंसो ,खिलखिलाओ ,ठहाके लगाओ देखो मन प्रसन्न रहता है या नहीं।दुख कष्ट तो अपने रास्ते जाता है पर उसी के विषय में सोच सोच कर हम स्वयम को खूब परेशान कर लेते हैं।बिल्कुल भूल जाते हैं धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा फल तो ऋतु पर होय।और यदि हमारे रोज शोक मनाने,रोते झींकते रहने से यदि दुख वाकई में कम होते हों या मन को तसल्ली मिलती हो तो खूब रोओ,खीझो, झींको, किसी को क्या परवाह।बस तुम आप ही धीरे धीरे मन से कमजोर होते जाओगे, अच्छा सोच ही नहीं पाओगे।तो निर्भर तुम पर करता है कि तुम बड़े से बड़े दुख को कष्ट को हंसते मुस्कराते झेल जाओ या उसे पानी छिड़क छिड़क कर और बोझिल कर लो, विकल्प तुम्हारा है।जिंदगी मिली है तो उसमें फूल और कांटे दोनों होंगे ही।और जो तुम्हें ये लगता है देखो सामने वाला कितने आराम से है तो उसके कष्टों से आपका साबका नहीं पड़ा।आप किसी के लिए अपने मन में कुछ भीसोचने के लिए स्वतंत्र हैं पर वह सब सच और यथार्थ हो, यह आवश्यक नहीं होता।तो अपनी खीझ, गुस्सा ,झींकना ,हमेशा तनाव में बने रहना,चौबीस घण्टे टेन्स रहना को छोड़ो भाई, चीजें अपने आप बदलती हैं, समस्याएं उतनी बड़ी भी नहीं होती जितना हम अनुमान लगा बैठते हैं।और मान लो है भी तो मुंह सुजाये बैठे रहने से कौन कम हो जाएगी।उपाय खोजो, चिंतन करो, रास्ते निकालो ।हंसी खुशी रहो।जानते हो ये हंसना मुस्कराना समस्याओं की विकरालता को कम कर देता है और हम आसानी से उसके समाधान खोज पाते हैं।

साँच को आंच कहां

 सफर जारी है....961

12.06.2022

बड़ी बड़ी बातें पुस्तकों की शोभा होती हैं लेकिन जब जीवन का यथार्थ बनती हैं तो भरी सर्दी में पसीने छूट जाते हैं।सत्य की औकात पता चलती है जब राहगीर भी व्यंग्य कस देता है देखो ये बड़े सत्यवादी बनने चले हैं ।अरे भाई तब सतयुग था तो हरिश्चन्द्र की वक़त थी, अब जहां चोर चोर मौसेरे भाई हों ,सब आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हों तब सत्य का उद्घोष करना मजाक सा लगता है।एक तरफ पहरेदार को जागते रहो की ड्यूटी पर लगा दो और दूसरी तरफ चोरों को घर का रास्ता दिखा दो।कक्षा में सच्चा बालक की कहानी पढाओ और जब बालक सच बोले तो उसे कहो सच के जमाने लद गये, अब ऐसा नहीं होता।दूध में पानी मिलाए बिना घोसी का काम नहीं चलता, सौ में दस झूठ मिलाना तो सामान्य बात है।जब सोना ही चौबीस कैरट शुद्ध नहीं होता तो बाकी का क्या।

सदा सत्य बोलो की खुश्कत और इमला तो खूब लिखवाई जाती रही, पाठ के प्रश्न उत्तर रटाये जाते रहे, सही लिखने पर झोली भर अंक दिए जाते रहे लेकिन जैसे ही उसे व्यवहार में लाना शुरू किया ,सबकी नजर ही बदल गई।अब कहा जाने लगा किताबी पढाई और जीवन जीने के अंतर को पाटा नहीं जा सकता।नियम हमेशा दूसरे के लिए होते हैं और अपवाद अपने और अपनों के लिए।क्यों भाई ये कौन सा गणित है।अभी तो सिखाया था दो और दो चार होते हैं और अब पार्टी बदलते ही दो और दो पांच कैसे हो गए, काली कामर पर दूसरा रंग नहीं चढ़ता पर यहां तो सब रंग चढ़े जा रहे हैं।कल जब तक बेटी ब्याहनी थी ,नियम आदर्श कुछ और थे और अब घर में बहू के लिए सब नियम पलटा खा गए।ये तो कोई बात नहीं हुई मित्रो।ये तो सरासर चालबाजी है।अब ऐसे कितने दिनों तक बात को मूंद कर रखोगे, कभी न कभी तो भंडाफोड़ हो ही जायेगा।याद रखो

काठ की हांडी चूल्हे पर बार बार नहीं चढ़ा करती।अरे भाई सच को कब तक परदों में छिपाए रखोगे।सच तो सूर्य सा दीप्त होता है।सारे अंधकार को चीर कर सामने आ जाता है।वह किसी के रोके नहीं रुकता।

लाख कहते रहो तुम कि अब जमाना बदल गया है पर कान खोल के सुन लो बाबू, नैतिक मूल्य तो शाश्वत होते हैं, उन्हें

अदला बदला नहीं जा सकता।अरे झूठ के पैर नहीं होते तो नहीं होते, वह क्या और कैसे टिकेगा सत्य के आगे।हां, इतना सच है कि सत्य हारे न हारे पर परेशान बहुत होता है।अधैर्यशाली जल्दी साहस छोड़ देते हैं, जल्दी से पाली बदल लेते हैं और मोहक असत्य की टीम में जा खड़े होते हैं । सत्य को दुत्कारते और धता बताने लगते हैं।अब चमकना है तो तपना  होता है, सोना आग में तप कर ही कुंदन बनता है।जब निखरना है तो मुसीबत से भय क्यों खाते हो, जल्दी से हाथ पैर क्यों छोड़ देते हो, हाय हाय क्यों करने लगते हो।ऐसे क्या मोम के बने हो जो जरा सी गर्मी पाते ही पिघल जाओगे।मजबूत बनो, कठिनाइयों से भागो मत, उन्हें फेस करना सीखो, उनका सामना करो, रास्ते खोजो, उपाय सोचो।ये क्या कि जरा सी मुसीबत आई नहीं कि फें फें रोना शुरू कर दिया, हाथ फैलाये सहायता मांगने चल दिये नहीं तो काम बीच में ही छोड़ के भाग आये कि हमसे नहीं होगा भाई, हमारे बूते का नहीं है।अरे दूसरा तीसरा जो भी करेगा उसके क्या चार हाथ पैर होंगे, उसके पास दिन में चौबीस घण्टे से अधिक का समय होगा।नहीं न, वह भी तुम्हारे जैसा मानुस ही होगा।बस फर्क इतना है कि तुमने हथियार डाल दिये हैं और अगले ने हौसला छोड़ा नहीं है।

सच की ताकत आजमा कर तो देखो पर सच निखालिस सच होना चाहिए, कोई मेल मिलावट नहीं, कोई धोखाधड़ी नहीं, कोई बेईमानी नहीं।बस सच्चे मन से शुद्ध मन से अपना काम किये जाओ, देर सबेर सफलता मिलेगी जरूर।।     

       आज मिलने आये युवा प्राध्यापको की आंखों में भविष्य के सपने बहुत साफ दिखे। बस उनकी लगन धीमी न पड़ जाए।वे थोडे कष्ट मुसीबत आते ही हाय हाय न करने लगे, अपने लक्ष्य से दूर न हो जाये, सत्य पर डटना जरूरी है।पूरी कायनात आपको डिगाने में सारी शक्ति लगा देगी।देखना है उनके साहस को, शक्ति को, धैर्य को, लगन को कि वे कितनी दृढ़ता से सब अलाय बलाय का सामना करते हैं।बस आंच कभी नहीं होती।सत्य परेशान हो सकता है पर अंततः विजयी होता ही है।

बड़े न बोले बोल

 सफर जारी है....960

11.06.2022

बड़े न बोले बोल

अक्सर हम व्यक्ति को उसकी पढ़ाई लिखाई, उसके पद ओहदे, उसके मान सम्मान, उसकी धनसंपदा से तौलते हैं।उसके गुणों पर हमारी दृष्टि कम ही जाती है।जबकि गिरधर की कुण्डलिया कहती है गुन के गाहक सहस नर बिन गुन लहै न कोय।गुणों को कहना नहीं पड़ता, वह तो आपके व्यवहार, स्वभाव और व्यक्तित्व से स्वयम ही परिलक्षित हो जाते हैं।जो वास्तव में बड़े होते हैं, वे बड़े बड़े काम चुपचाप कर जाते हैं, उसका ढिंढोरा नहीं पीटते।आत्म प्रचार और प्रदर्शन में उनकी रुचि नहीं होती।वे जैसे हैं उसी रूप में उपस्थित हो जाते हैं।छद्म नहीं ओढ़ते।उनकी सादगी, सरलता, तरलता आपको ऐसे बांध लेती है कि बस आप उसके स्नेह के मुरीद हो जाते हैं।

सद्गृहस्थ होना सबसे बड़ा गुण है।वह अपने दायित्वों से दूर नहीं भागता,बल्कि निष्ठा से उनका पालन करता है।स्वयम उपार्जित धन से सभी आश्रितों की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।उसकी निष्ठा केवल पारिवारिक सदस्यो तक ही सीमित नहीं हुआ करती, बल्कि अडोस पड़ोस के साथ पशु पक्षी आगन्तुक सभी उसकी पारिवारिक परिधि में आते हैं।वह सभी के लिए स्नेहिल होता है।भोजन को भाव से पकाता है और उसे मिल बांटकर खाता है।गाय ,कुत्ते, पक्षी, भिक्षुक, अभ्यागत का अंश प्रतिदिन निकाला ही जाता है।भोजन और भजन में भाव बहुत प्रभावी है।जैसा खाओगे अन्न वैसा होगा मन में भोजन की गुणवत्ता से अधिक प्रभावी भाव है।भोजन जिस भाव से पकाया और परोस कर खिलाया जाता है, खाने में वैसा ही आनन्द आता है।और यदि भोजन प्रभु को अर्पित कर उसे प्रसादी समझ कर ग्रहण किया जाय तो उसका स्वाद कई गुना बढ़ जाता है।

जीवन की भाग दौड में सबसे जरूरी भोजन ही उपेक्षित हो रहा है।उसे इतनी भगदड़ में खाया जाता है कि जैसे सारी देरी इसी के कारण हो रही हो।हम सारी ऊर्जा जिस धन के अर्जन में लगा देते हैं, उस ऊर्जा के पुनः संचयन के लिए भोजन बहुत जरूरी है, पौष्टिक भोजन जरूरी है और उसे तरीके से ग्रहण किया जाना भी।आप कितने भी अधिक व्यस्त हों, आपको घरेलू कामकाज निबटाने का समय नहीं मिलता हो, तो उसके लिए आप सहायक की खूब मदद लेते रहिये लेकिन भोजन जिस भाव से आप बनाते और परोस कर खिलाते हो, उस भाव को अनदेखा नहीं किया जा सकता।क्यों बार बार मां के हाथ के खाने के स्वाद को याद करते हम उसका विकल्प नहीं खोज पाते ,रेस्तरां आपको घर जैसा खाने का प्रलोभन देते हैं जिससे आप उस के प्रति आकर्षित हो खिंचे चले जाते हो।कहां से आता है भोजन में स्वाद, क्या केवल तेल मसाले और मंहगे उत्पाद उसे स्वादिष्ट बना पाते हैं। ये उसके आवश्यक घटक भले ही से हो, पर भोजन में स्वाद तो भाव का प्रधान होता है।और कहीं वह भोजन प्रभु का भोग हो, उसे प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाए तो और सोने में सुहागा।

जीवन में सद्गुणी व्यक्तियों से मिलना आपको बहुत सम्पन्न बना देता है।आप बड़भागी होते हैं जब ऐसे संत स्वभावी लोगों से आप मिल सके, उनके सान्निध्य में कुछ समय बिता सकें, उनकी सकारात्मक ऊर्जा से अपने को चार्ज कर सकें और जीवन जीने के कुछ टिप्स ले सकें।कुछ सीख सकें कि काम शांति और सहजता से ज्यादा आसानी से निपटाये जा सकते हैं, धैर्य बनाये रखना जरूरी होता है, बात को दृढ़ता और विनम्रता से भी रखा जा सकता है।कोई जरूरी नहीं कि आप हमेशा सप्तम स्वर में चिड़चिड़ाहट और कड़वाहट के साथ ही बोलें।उच्च ओहदे के साथ साथ आपके व्यवहार की समरसता, आपका सौहार्द ,आपकी विनम्रता सामने वाले को सहज रखती है।मैं भाग्यशाली हूँ कि मेरे परिकर में मेरे इष्ट मित्रों में ऐसे व्यक्तित्वों चरित्रों की संख्या अच्छी खासी हैं जिनसे मिलकर मन प्रसन्न हो जाता हैं, मैं स्वयम को ऊर्जस्वित और चार्ज अनुभव करती हूँ।ऐसों से कुछ क्षणों की मुलाकात रास्ते की थकान को उड़नछू कर देती है ।ऐसे सत्पुरुष तो बिना दिए ही बहुत कुछ दे देते हैं और कहीं आपको उनके हाथों प्रसाद पाने का सौभाग्य और मिल जाए तो अपने को बड़भागी मानना तो बनता है।हम आप जब किसी के प्रति बहुत दयार्द्र होते होंगे तो अधिकतम अपनी जेब ढीली कर बाजार से कुछ खरीद लेते होंगे पर अगले को भोजन समय होने पर घर से बना कर लाया भोजन प्रेमभाव से खिलाना तो हम सबके बूते का नहीं ही हुआ करता।ऐसे सज्जनों से मुलाकातें हमें बहुत कुछ सिखाती हैं बशर्ते सीखने का मानस तो हो।बने रहें ये प्रकाश स्तम्भ जिंदगी में, इनके प्रकाश से हम भी दिपपदिपाते रहेंगे।रहीम बहुत याद आते हैं... बड़े बड़ाई न करें बड़े न बोलें बोल, रहिमन हीरा कब कहे लाख टका मेरो मोल।

ऊर्जा और उत्साह के स्रोत हैं त्योहार

 सफर जारी है.....959

10.06.2022

मनुष्य उत्सव धर्मी है।सात वार में आठ त्योहार मनाने वाले हम भारतीयों का मानस त्योहार का नाम सुनते ही कैसा हरिया जाता है।फिर चाहे वे राष्ट्रीय हों, सामाजिक हों, सांस्कृतिक हों या आयातित हों।हमें तो इसी ब्याज में स्वादिष्ट सुस्वादु पकवान खाने बनाने को मिल जाते हैं और एक के साथ फ्री की तर्ज पर आध्यात्मिक और नैतिक प्रसंग, सन्दर्भ और कथाएं भी थोक के भाव मिल जाती हैं।हर बरस इन कथाओं को दोहराते हम अपने को समृद्ध और जागरूक करते रहते हैं।कथा के अंत में जोड़ी गई टिप्पणी जैसो भगवान ने बाको करो, बाकी लाज राखी, ऐसो सबको होय, के भाव से सबके सुखी स्वस्थ और प्रसन्न रहने की दुआ और प्रार्थना करते रहते हैं।अभी अभी इसी जेठ माह में वट मावस मनाई ,आज गंगा दशहराऔर कल निर्जला एकादशी का पर्व है।सुराही, घड़े, पंखे और मौसमी फलों आम खरबूज तरबूजों के बाजार सज गए हैं।

नदियां हमारा जीवन हैं, वे पूज्य हैं, हम भारतीय गंग जमुनी सभ्यता के पोषक हैं।गंगा अवतरण की कथा से हम परिचित हैं कि भगीरथ कठोर तप कर गंगा को धरती पर लाये क्योंकि राजा सगर के साठ हजार पुरुखों को तारने के लिए यह जरूरी था।वे तप के बल पर गंगा को धरती पर लाने में सफल तो हुए पर वेगवती गंगा की तेज धार यदि सीधे धरती पर गिरती तो सब पाताल चले जाते, कोई बचता ही कहाँ तो आशुतोष, देवाधिदेव भोलेनाथ से प्रार्थना की गई प्रभु आप संभालो, भोले भंडारी तो नीलकण्ठ हैं, अपने भक्तों के लिए कालकूट विष भी गटक जाते हैं, सिर पर अर्ध चन्द्र धारण करते हैं, तन पर भभूत रमाये रहते हैं सर्पों की माला कंठ में पड़ी रहती हैं,नंदी उनकी सेवा में रहता है चूहा पुत्र गणेश है वाहन है तो मयूर दूसरे पुत्र कार्तिकेय का, पत्नी गौरा शेर पर विराजती हैं, शिव परिवार तो अपने अनोखे पन के लिए ही जाना जाता है तो महादेव गंगा को भी सिर पर धारण कर लेते हैं और जटाजूट की एक लट खोल देते हैं कि गंगा भगीरथ के पीछे पीछे  होकर गुजरे कि सबका कल्याण हो सके।गंगा को पृथ्वी पर लाने का प्रयास ही उन्हें भगीरथ बना देता है और वे एक मिसाल बन जाते हैं। भगीरथ प्रयास,भीष्म प्रतिज्ञा तो जनमानस के आदर्श हैं।

               नदियों में स्नान करने से पूर्व उनकी पूजा आराधना की जाती है, उन्हें स्वच्छ बनाये रखने की प्रतिबद्धता हमें याद रही होती तो आज नदी को जानो जैसे प्रकल्पों का आयोजन करने की जरूरत नहीं पड़ती।हम प्रकृति का दोहन करने में इतने मशगूल हो गए कि यह भी याद नहीं रहा कि कम से कम उस डाल को तो नहीं काटे जिस पर बैठे हैं।वह प्रकृति जो हमें जीवन भर कुछ न कुछ देती रहती है उसके प्रति भी हम कृतघ्न हो गए, परिणाम हमारे सामने हैं।हम कविता ही भुला बैठे....प्रकृति हमें देती है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखें।सूरज हमें रोशनी देता, हवा नया जीवन देती है, भूख मिटाने को हम सबकी धरती पर खेती होती है, दूसरों का भी हित हो जिसमें हम कुछ ऐसा करना सीखें, हम भी तो कुछ देना सीखें।खूब पढ़ते पढ़ाते रहे कि नदियां अपना जल नहीं पीती, पेड़ अपना फल नहीं खाते,संत तो परोपकारी होते हैं, वे अपना जीवन परार्थ में ही लगा देते हैं।दधीचि से लेकर शिवि तक की दीर्घ परम्परा है हमारी।हम याद क्यों नहीं रख पाते, सब भूलभाल कैसे जाते हैं।

               तब लगता है ये वार तोहार याद दिलाने के सूचक ही तो नहीं है।हम इनके ब्याज से ही सही,अपनी समृद्ध परंपरा को पूजें।हम प्रकृति पूजक बने रहें, उनका अंधाधुंध दोहन न करें।जंगल बचे ही कहाँ अब, नदियों को हम पहले ही प्रदूषित कर चुके, वायु तक शुद्ध नहीं बची, पानी बोतल में समा गया, अब कितना और गिरेंगे हम।सब कुछ नाश करने पर तुल गए क्या।तालाब हमने पाट दिए, नदियां हमने दूषित कर दी, जंगल काट दिए,पर्यावरण संतुलन को बिगाड़ने के दोषी हम हैं तो आखिर कब सुधरेंगे हम।आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या छोड़ा हमने, पीने को पानी नहीं होगा और सांस लेने को शुद्ध हवा तो कैसे बचेगा उनका जीवन।कैसे भी जिस किसी ब्याज से बात समझ आ जाएं, समझ लेनी चाहिए।अभी कम से कम सचेतक तो हैं जो हमें हर पल जागरूक कर रहे हैं, कर्तव्यों के प्रति आगाह कर रहे हैं, अभी भी चेत जाओ, ये समय भी खो दिया तो केवल और केवल पश्चाताप शेष रह जॉयेगा, सिर धुनना शेष रह जॉयेगा, कुछ हाथ नहीं आएगा।

               तो पर्व के महत्व को समझो, अपनी सांस्कृतिक परम्पराओ को जानो कि आखिर मौसमी फलों को दान देने उन्हें खाने, गेहूं की कौमुरी बनाने के संदर्भ क्या केवल मुंह के स्वाद बढ़ाने के लिए हैं या इनके सन्दर्भ और भी हैं।ये दशहरा मात्र खरबूज तरबूज का नहीं, नदियां स्नान करने लायक बची रहें, ये कवायद जरूरी है।हम बाथ टबों में इतने मशगूल न हो जाएं कि जल के प्राकृतिक स्रोतों को ही भुला बैठें।जाग मुसाफिर जाग, अब जागन की बार।

असल परीक्षा तो अब है

 सफर जारी है...958

09.06.2022

पढ़ते पढ़ाते परीक्षा देते लगता था कि इससे बड़ा और कोई काम हो ही नहीं सकता और जब रिजल्ट निकलता और कहीं पास हो जाते तो सोचते हमने जग जीत लिया।कुछ अंको की बढ़त रिजल्ट कार्ड को शोभनीय बना देती और पहला दूसरा स्थान पाने पर बहुत विशेष बन जाते।मैया बलैया लेते नहीं थकती थीं और पिता कम से कम सौ पचास लोगों के मध्य इस समाचार को कह कबा नहीं लेते तब तक उनकी रोटी नहीं पचती थी।जब ये किताबी पढ़ाई खत्म हुई और बी ए एम ए, बीएड एमएड पीएचडी सब कर करा ली तो बड़े खुश हुए कि चलो ये परीक्षा का दौर तो गुजरा।पढ़ लिख कर तैयार हुए तो जीवन की सबसे जरूरी बात चाई माई कर दी गई क्योंकि सीखे गए ज्ञान की असली परीक्षा तो अभी बाकी थी।वो रात भर रट्टा मार मार कर कॉपी भर लिखने की परीक्षा से पिंड छूटा तो लगने लगा था कि चलो अब परीक्षा से छुट्टी हुई।हमें क्या पता था कि इससे बड़ी परीक्षा तो अभी बाकी है।वहां कम से कम तीन घण्टे लिख लिखा कर हाथ में रिजल्ट कार्ड आते छुट्टी तो मिल जाती थी पर इस परीक्षा में न तो रट्टा काम आता था और नकल की तो रत्ती भर गुंजायश न थी।और मजे की बात कि कोई अंक नहीं कोई रिजल्ट नहीं, बस बात बात पे ताने उलाहने कि ये भी  नहीं आता, वह भी नहीं आता।।समझ ही नहीं आता था कि ये कौन से प्रश्न हैं जो रोज नए नए तरीके सेआ खड़े होते हैं।स्कूल कालेज की परीक्षा में एक प्रश्न भी आउट आव सिलेबस आ जाता तो विद्यार्थी मार हंगामा मचा देते कि पेपर आउट ऑफ सिलेबस आया है और परीक्षार्थियों के भविष्य को ध्यान रखते अंकों में विशेष ढील दे दी जाती, सब पास कर दिए जाते, गेंहू के साथ खतुआ बथुआ को भी पानी लग जाता।

तब साल में दो छोटी आंतरिक परीक्षा और एक वार्षिक परीक्षा होती उसी में दादी नानी सब याद आ जाती और अब तो रोज ही परीक्षा सी होती, सारे के सारे प्रश्न आउट ऑफ सिलेबस, हंगामा तो दूर की बात, चूं भी नहीं  कर सकते थे और सारे प्रश्नों के उत्तर में बड़ा सा गोला मिलता।बहुत कोफ्त होती एक तो इतने कठिन कठिन प्रश्न हल करने को दे दिए जाते और उस पर कोई छूट भी नहीं मिलती।असफल होने पर ऐसी बेइज्जती होती और वह भी सरे आम कि बस बार बार स्कूली परीक्षा को याद कर रो लिया करते।समझ ही नहीं आता था कि ये पढाई नई थी कि हम ही घबराहट में सब भूले जा रहे थे, प्रश्नों का उत्तर देते हकलाते लगते।रोज रोज की असफलता से सारा आत्मविश्वास चुक सा गया लगता था।उन परीक्षाओं से उबरते तो क्या पर धीरे धीरे आदत में आ गया कि भाई अब फर्स्ट सेकंड आने के सपने छोड़ो, अब तो सप्लीमेंट्री और ग्रेस मार्क्स के भी लाले पड़ गए।हमेशा भय सा लगा रहता पता नहीं अब कौन सा नया प्रश्न पूछ लिया जाए।सारी हुशियारी धरी की धरी रह गई।माता पिता ये समझ ही नहीं सके कि इस घर का हीरा उस घर में कोयला कैसे सिद्ध हुआ।जिस प्रतिभा पर उन्हें बड़ा नाज था, जिसकी होशियारी की मिसाल दी जाती थी, अब वह औसत विद्यार्थी की श्रेणी में भी क्यों नहीं रखा जा सका।क्या पढाई बदल गई या परीक्षा के तरीके, अब सफलता इतनी दूर कैसे हो गई कि उसे छूने के लिए कई कई कोस लगातार दौड़ना पड़ता है फिर भी मिल पाने की कोई गारंटी नहीं हुआ करती।इन परीक्षाओं से उबरे तो सामाजिक और कार्यस्थल की परीक्षाएं मुंह बाएं खड़ी थी।लगता है पूरा का पूरा जीवन परीक्षाओं से भरा हुआ है।हर दिन कुछ नए प्रश्नों के साथ परीक्षा शुरू होती है,पढ़ने और दोहराने का अवसर नहीं है, बस एक समय विशेष में जो सीख लिया,वही खजाना काम आ रहा है, बहुत कुछ सिलेबस बदल गया है, अब उसकी किताबें भी नहीं मिलती, बहुत से ऐसे प्रश्न हैं जो अनुत्तरित ही रह जाते हैं, पहले का सा समय तो रहा नहीं कि दौड़े छूटे जन्मदाताओं के पास प्रश्न लेकर पहुंच गए और जब तक संतोषजनक उत्तर नहीं मिला उनसे दिमाग मारते रहे।अब स्वयम से ही सारे प्रश्नों के उत्तर खोजने होते है,कोई मार्गदर्शक भी नजर नहीं आता जो सही रास्ते सुझा सके।फिर गुरुजी की तलाश में चल निकलते हैं पर सारे प्रश्नों के समाधान तब भी नहीं मिलते।तो बस अभी तक पढाई और परीक्षा में व्यस्त हैं पहले किताबें पढ़ते थे अब लोगों के चेहरे पढ़ते हैं।पहले परीक्षाएं एक निश्चित समय और अंतराल पर होती थी अब कभी भी हो जाती हैं, कोई निर्धारित शेड्यूल नहीं है।बस अभी लिखते लिखते वाक्य भी पूरा न हो और परीक्षा की घड़ी आ जाए, कौन जानता है।तो हर क्षण परीक्षा देने का मानस बनाये रखो।

जीवन ही एक परीक्षा है, कठिन सरल सभी प्रकार के प्रश्न हैं तो तैयारी तो पूरी रखनी होती है, अब पास फेल की चिंता रही भी नहीं ।बस परीक्षा दे देंगे और दूसरी परीक्षा की तैयारी में जुट जाएंगे।जो परिणाम होगा, स्वीकार लेंगे।अपना सा कर देंगे, जो आता है लिख देंगे, बाकी परिणाम विधाता पर छोड़ देते हैं।अब सब अपने हाथ तो नहीं हुआ करता न।

रही किनारे बैठि

 सफर जारी है....957

08.06.2022

जो बाहर ही बाहर से सतह  छूकर लौट आते हैं, उनके हाथ मोती नहीं लगा करते।वे बाहरी टीमटाम से ही काम चला लेते हैं।बस उतना ही करते हैं जितने से काम चल जाए।पढ़ते भी उतना ही हैं कि बस पास भर हो जाएं।अगली कक्षा में चढ़ जाएं और बस इतने नम्बर आ जाएं कि कहीं चार पैसे कमाने का जुगाड़ हो जाए।इन्हें ज्ञान व्यान से कोई लेना देना नहीं होता।बस किसी तरह काम भर चल जाए।इसलिए वे गहरी समझ भी नहीं रखते, बस थोड़ा थोड़ा सबमें से ले लेते हैं।अपना कुछ नहीं होता, कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा।जिंदगी तो उनकी भी पार लग ही जाती है जो अधकचरे और अधभरे होते हैं ।बस इतना है कि वे छलकते खूब है, बजते भी टनाटन हैं पर गम्भीरता को अपने पास फटकने भी नहीं देते।उससे तो दूर की राम राम भली।काहे को इतना दिमाग मारे तो चुप्प ही खोल में सिमटे पड़े रहते हैं।बस जब भूख प्यास लगी, बाहर मुंह निकाला, खाया पीया और फिर अपने कुँए में जाकर बन्द हो गये।उनका आसमान कुआ ही है।वे कूपमण्डूक ही बने रहना चाहते हैं।उनके लक्ष्य ही बहुत छोटे होते हैं बस वे पूरे हो जाए, फिर उन्हें कोई चिंता नहीं।दुनिया जाए भाड़ में तान लंबी सोइये।उनके जाने सब भाड़ चूल्हे में जाए, उन्हें कोई परवाह नहीं।वे अपनी दुनिया में अगन मगन हैं।।                       अधजल गगरी छलकत जाए, थोथा चना बाजे घना जैसी कहावतें खासतौर पर उनके लिए ही बनी होती है।बस वे फूली फूली चरने के आदी होते हैं।करेंगे धरेंगे कुछ  नहीं पर लाभ और क्रेडिट पूरा का पूरा चाहिए।बस चाहिए सो चाहिए, मुंह से निकल गई सो निकल गई।

            जो गहरे उतरते हैं विषय में या पानी में, कुछ न कुछ लेकर ही लौटते हैं।फिर जिन्हें कुछ प्राप्त करने की धुन सवार होती है वे कठिनाइयों की परवाह कब करते हैं, वे दिनरात नहीं देखते, बस जी तोड़ मेहनत करते हैं और लक्ष्य को पाकर ही रहते हैं।लक्ष्य निश्चित करते हैं और उसे पाने के लिए प्रयत्नशील भी होते हैं।मुश्किल तो उनकी है जिन्होंने अपने जीवन के लिए कोई स्वप्न ही नहीं बुने और बुने भी तो शेखचिल्ली से जिन्हें व्यावहारिकता की कसौटी पर नहीं परखा, अपनी शक्ति नहीं तौली, अपने साधन नहीं देखे, उतनी मेहनत नहीं कर पाए जितनी अपेक्षित थी।उन्होंने असफलता का ठीकरा भी दूसरों के सिर फोड़ दिया।वे खुद डूबे तो डूबे पर अपने साथ सनम को भी ले डूबे।

            अब समझ आता है कबीर ने ऐसे ही नहीं लिख दिया होगा...जिन खोजा तिन पाईया गहरे पानी पैठि, हों बूडी डूबन डरी रही किनारे पैठि।जो चाह रखते हैं ,उन्हें अपनी बाजुओं पर गजब का विश्वास होता है।वे कोई दांव खाली नहीं जाने देते ।हर कदम सुनियोजित तरीके से उठाते हैं, शत प्रतिशत देते हैं, बाद के लिए कुछ नहीं छोड़ते, सब आज और अभी कर डालते हैं, कल भला किसने देखा है।उन्हें कबीर कभी भूलते ही नहीं.... काल करे सो आज कर आज करे सो अब्ब, पल में परलै होयगी बहुरि करेगो कब्ब।जो ठान लिया सो ठान लिया, फिर चाहे जितने मर्जी आंधी तूफान आते रहें, वे निरन्तर चलते रहते हैं,कोई बाधा उन्हें नहीं रोक पाती।अकेले ही चलते रहते हैं और देर सबेर मंजिल तक पहुंच ही जाते हैं।मंजिल को तो वे पड़ाव भर मानते हैं ,कुछ देर विश्राम करते हैं, शक्ति संजोते और बटोरते हैं और फिर यात्रा शुरू कर देते हैं।आते रहें आंधी तूफान, कड़कती रहें बिजलियाँ, बरसते रहे ओले, होती रहे झमाझम बरसात, वे नहीं रुकते, चलते और बढ़ते ही जाते हैं आगे और आगे।साथी मिलें तो ठीक नहीं तो एकला चलो रे।चरैवेति चरैवेति उनके जीवन का मूलमंत्र होता है।

            तो आप भी गहरे जाकर खोज लाइये उन मोतियों को जिनसे जीवन की सार्थकता होती है, डरिये मत गहरे जाने से, सारा तत्व माल तो वहीं छिपा है।और जो आज भी किनारे किनारे डर कर बैठे रहे तो कुछ नहीं होने का।चूहे की मौत मारे जाओगे।तो उठो ,जागो ,संकल्पशील बनो,बात को समझो, जो अभी भी नहीं चेते तो अवसर निकल जॉयेगा, फिर पछताने से कुछ नहीं होने का।बस हाथ मलते रह जाओगे।मन पछितैहे अवसर बीते।सो भाई मेरे, किनारे बैठ कर शेख चिल्ली के से स्वप्न मत बुनते रहो, आगे बढ़ो, हिम्मत रखो, तुम कर सकते हो, तुम्हारे अंदर अपार क्षमता है।तुम चाहो तो दुनिया को गोल गोलघुमा दो।पर चाहो तब न।जब चाहोगे तो सब संभव हो जाएगा।बस संकल्प शक्ति कमजोर नहीं पड़नी चाहिए, बाकी तो सब सध जाता है।

दीरघ दाघ निदाघ

 सफर जारी है....956

07.06.2022

जेठ की गर्मी और उस पर भी नौतपा,ऐसी प्रचंड गर्मी कि छांह भी छांह की चाह रखती है।अब जेठ से बड़ा ओहदा और किसका होगा ,रिश्तों में भी और माह में भी।ज्येष्ठ तो ज्येष्ठ है, ससुर का प्रतिनिधित्व करता है।परिवार को साथ लेकर चलता है, सबको नेह की डोर से बांधे रखता है।घर भर के बच्चों का ताऊ और बड़ा पापा है।जहां चाचा के पास सब छोटी बड़ी बातें शेयर की जा सकती हैं वहीं जेठ जी से थोड़ा पर्दा बना रहता है, वे तो बच्चों को डराने के काम ज्यादा आते हैं।कुछ गड़बड़ की तो बस ताऊजी कान खींच देंगे।सो रिश्तों की गर्माहट मौसम पर भी असर दिखा रही है।ऐसा नहीं है कि पहले गर्मी नहीं पड़ती थी कि लू नहीं चलती थी कि अंधड़ तूफान नहीं आते थे कि सबके सब सीरे में बैठे रहते थे।नहीं भाई नहीं, गर्मी तब भी थी।मौसम का चक्र है , तपेंगे नहीं तो सरसेंगे कैसे, जेठ तपेगा तभी तो आषाढ़ में बारिश का पहला लोंदा गिरेगा, मिट्टी की खुशबू नथुनों में भरेगी, धरती खूब प्यासी होगी तभी दो तीन बारिश का पानी ऐसे ही सोख जायेगी।

सो पहले तपना होता है खूब ,पसीना बहता है तभी हवा सीरी लगती है।अब गर्मी है  तो दिन भी पहाड़ सा लम्बा है और  रातें भी गर्म हैं । इतनी गर्म कि किसी को चैन नहीं पड़ रहा है,बस सब हाय हाय कर रहे हैं।जो सुविधा सम्पन्न हैं वे एसी कूलर की हवा का आनन्द ले रहे हैं और जिन्हें बिजली ही मयस्सर नहीं ,वे हाथ पंखे बीजना से बयार कर सीरे हो लेते हैं, नीम पीपल की घनी छाँब ही उनका आसरा है।पानी  छिड़क छिड़क कर घर आंगन द्वारी ठंडी रखते हैं, डेले की बर्फ को कूट काट कर उसी में चीनी बुरक चुस्की का स्वाद ले लेते हैं।क्या करें कम से कम कुछ देर को ठंडक तो मिल जाती है। इतनी गर्मी में सबके दिमाग भी बहुत गर्म हो गए हैं।क्या मानुस क्या पशु पक्षी सभी जीभ निकाले पानी पानी कर रहे हैं।ऐसी गर्मी को लक्ष्य करते लिखा गया होगा.... कहलाने एकत वसत अहि मयूर मृग बाघ, जगत तपोवन सो कियो दीरघ दाघ निदाघ।इतनी प्रचंड गर्मी कि पशु पक्षी सब आपसी शत्रुता भुलाकर जहां छाँब का टुकड़ा मिल जाता है, जो कोना मिल जाता है उसी में मिल बैठ जाते हैं, बस जान बची रहे,लड़ा भिड़ा तो बाद में भी जा सकता है।सर्प और मोर का वैर जग जाहिर है पर वैर तो तभी तक है जब तक जिंदा हैं, हिरन को बाघ भला कहीं जिंदा छोड़ता है, उसका बस चले तो देखते ही फाड़ कर रख दे।पर जब अपनी जान पर खतरा मंडरा रहा हो तब अपनी जान बचाने की पड़ती है।सो भला हो उस प्रचंड गर्मी का, उस दीरघ दाघ निदाघ का जिसने जगत को तपोवन सा बना दिया है। आपसी शत्रुता को भुला दिया है।

तो ये सच है कि दुख माँजता है, सब वैर भाव भुला देता है, समझदार बना देता है, जब खुद के हाथ झुलसते हैं ,सिर पर बेभाव के झंडे पड़ते हैं ,पीड़ा का अहसास होता है तब समझ आता है कि मार का दर्द एक सा होता है। आग सबको समान रूप से झुलसाती है, वह अमीर गरीब को नहीं देखती, उसका धर्म है जलाना। दुख की अनुभूति समान होती है पर पता नही क्यों हम अपने और दूसरे के कष्ट में अंतर कर बैठते हैं।अपना दुख दुख और दूसरे का मक्कड़ लगता है, बहानेबाजी लगता है।धूप तो सबको एक सा ही तपाती होगी, बस किसी के पास धूप से बचने का साधन है तो आड़ हो जाती है और जो इससे वंचित है वे सूर्य के प्रखर ताप को नङ्गे सिर सीधे झेलते हैं।धूप के मारे सुन्न काले हो जाते हैं।

यह भी देखा कि बहुत सुविधाओं में रहते रहते धूप ताप सहने की शक्ति कम हो जाती है।कल घर परिवार में भागवत कलश यात्रा में टीकाटीक दुपहरिया में  जहां महिलाएं, किशोरी ,तरुणी के झुंड के झुंड सिर पर कलश धरे आनन्द और उत्साह में भरे नङ्गे पैर उछलते कूदते च

ले जा रहे थे , वहीं हम जैसे पोच गर्मी के मारे बाबले हुए जा रहे थे।उनकी क्षमता उत्साह के आगे तो हम बहुत बौने सिद्ध हो रहे थे।धूप ताप तो सबके लिए बराबर था पर सब उसे अपने अपने स्वभाव और प्रकृति के संदर्भ में ग्रहण कर रहे थे ।दिमागी करतब करते भले ही सयाने बन लें पर सच में सर्दी गर्मी सहने की शक्ति तुलनात्मक रूप में शून्य थी। 

       भरी दोपहरी में चलते बस एक ही दोहा मानस में उछल कूद कर रहा है.... बैठि रहि अति सघन वन पैठि सदन तन मांहि, देख दुपहरी जेठ की छाँहो चाहति छाँह।

हे प्रभो मुझे बता दो

 सफर जारी है....955

06.06.2022

सुनते सुनाते कितना कुछ कान में जाता है और कहीं वह सब हृदयंगम हो जाए तो जीवन में कैसा बदलाब आ जाता है।फिर आप कैसे निश्चिन्त हो जाते हो, आप को किसी से भय नहीं लगता।बस सारे दिन एक ही भाव प्रधान रहता है प्रभुजी हैं न, मुझे किस बात की चिंता, वे सब संभाल लेंगे।और जब आप को यह प्रतीति होने लगती है कि ईश्वर हर क्षण मेरे साथ है,वह मुझे हर पल देख रहा है तो कुछ गलत करने का विचार तक मन में नहीं आता।हजार आँखो से देख रहा है तुझे देखने वाला, छोटी से छोटी गलती भी उसकी निगाह में आ जाती है हम भले ही उसे इस उस पर डाल अपने को दोषमुक्त सिद्ध करने की कोशिश करते रहें।जब ईश्वर में इतनी प्रगाढ़ आस्था होती है तो गलत करते शर्म आती है, संकोच भी होता है कि अरे प्रभु के सामने क्या मुंह लेकर जाऊंगा। आप हर क्षण ईश्वर से बस एक ही प्रार्थना करते हैं बस प्रभु मुझे माया के बंधनों से बचा लो।मैं तो महा अज्ञानी हूँ, कुछ जानता नहीं, बस तुम्हारी शरण आना चाहता हूँ, हे प्रभु मुझे बता दो चरणों में कैसे आऊँ।

            कितना सुंदर भजन है, बस जो ध्यान से सुनो तो उसी में खो जाओ।बाल गोपाल पाठशाला की बालिका खुशी कितने भाव में डूब कर गाती है कि बस सुनते ही जाओ सुनते ही जाओ,फिर भी मन न भरे।अक्सर इस भजन को सुनते भावमग्न हो जाती हूँ,कहीं खो जाती हूँ।भजन के बोल हैं.... हे प्रभु मुझे बता दो चरणों में कैसे आऊँ, माया के बंधनों से छुटकार कैसे पाऊं, है प्रभु मुझे बता दो।अब प्रभु जी हैं कि कुछ बता के ही नहीं देते।भजन के बोल सुनते लगता है कि भक्त ने कलेजा निकाल के रख दिया हो।बस एक और एक ही इच्छा बलबती है, प्रभु चरणों में ध्यान लग जाए और माया में बन्धनों से मुक्ति मिल जाए।मुक्त ही तो नहीं हो पाते माया के बंधनों से।।मुक्ति तो खुद प्रभु से प्रार्थना करती हैं ....मुक्ति कहे गोपाल से मेरी मुक्ति बताय,ब्रज रज उड़ि मस्तक लगे तो मुक्ति मुक्त हो जाए अर्थात जब मुक्ति को भी मुक्त होने के लिए ब्रज रजकी धूल चाहिए तो फिर हमें तो उन्हीं गलियों में चलना ही होगा जहां ब्रजराज बसते हैं चलो सखी वहां चालिए चालिए जहां बसै ब्रजराज, गोरस बेचे हरि मिले एक पंथ दो काज।वृन्दावन के राजा दोउ श्याम राधिके रानी, करम धरम जहां बटत जेबरी मुक्ति भरे तहाँ पानी।तो माया के बंधनों से छुटकार पाने का बस एक ही तरीका है कि ब्रज के बसैया के रंग में रंग जाओ, बस सीता राम जपो राधे कृष्ण भजो।

            नही आता पूजा पाठ, नहीं आती पूजा की कोई विधि तो कोई बात नहीं।वाल्मीकि तो मरा  मरा जप कर ही राम के चरित लिखने सा बड़ा काम कर गए। प्रभु कृपा ने मूर्ख वरदराज से अभिज्ञान शाकुन्तल और रघुवंश जैसा ग्रन्थ लिखा दिया।बस मन साफ और शुद्ध हो और कड़ी मेहनत हो ।प्रभु की कृपा भयउ सब काजू।बस उसका वरद हस्त बना रहे।उसकी कृपा भर हो जाए।तभी भक्त कह उठता है.....ना जानू कोई पूजन अज्ञानी हूँ मैं भगवन,करना कृपा दयालु बन्धन से छूट जाऊं।इस आवागमन के बंधन से मुक्त हो जाऊं, है तो कठिन पर प्रभु की कृपा हो जाये,तो सध जाता है।माया के बंधनों से छुटकार भी मिल जाता है और प्रभु तक पहुंचने का मार्ग भी सुलभ हो जाता है।

            कहां पतितों का शिरोमणि मैं और कहां पतित को उबारने वाले भगवन, प्रभुजी हों सब पतितन को टीको, और पतित सब दिना चार के ,मैं तो जनमत ही को।अपने विषय में भान तो हो कम से कम कि हम कितने पानी में है, अच्छे हैं बुरे हैं,सरल हैं सीधे हैं, खुटसयाने हैं ,परोपकारी हैं, कंजूस है, परमार्थी हैं, कैसे हैं हम।आखिर करुण स्वरों में प्रार्थना कर बैठता है, देखिए क्या शब्दावली चुनता है मानुष।कैसा रोता गिड़गिड़ाता है  ...मैं हूँ पतित स्वामी तुम हो पतित पावन,अवगुण भरा ह्रदय है इसे कैसे मैं दिखाऊँ।माया के बंधनों से छुटकार कैसे पाऊं।हे प्रभु मुझे बता दो चरणों में कैसे आऊँ।

और फिर जैसे भी हैं प्रभु तुम्हारे हैं, पार लगाओ नैया, मेरे कृष्ण कन्हैया, तुम्हें छोड़कर कहां जाएंगे भला, और कौन है तुम्हारे सिवा, बनवारी रे जीने का सहारा तेरा नाम रे, मुझे दुनिया वालों से क्या काम रे। अच्छा हूँ या बुरा हूँ जैसा भी हूँ तुम्हारा,ठुकराओ न मुझे अब चरणों में सिर झुकाऊं, माया के बंधनों से छुटकार कैसे पाऊं।है प्रभु मुझे बता दो चरणों में कैसे आऊँ।तो प्रभु तुम्हारी शरण हैं,बस अपने चरणों में आने का मारग बता दो, माया के बंधन काटो प्रभु, अब तो सुन लो प्रभु।एक भक्त की है अरजी, आगे तुम्हारी मरजी, ठुकराओ या गले लगालो, बस तुमसे कह रहे हैं, तुम हो प्रभु जी अपने तारो या ठुकरादो, jaayen कहां hm भगवन, अपने गले लगा लो।

ज्यादा संयम बरतो तो कायर कहलाते हो

 सफर जारी है....954

05.06.2022

धैर्य, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय निग्रह, मेधा, विद्या, सत्य पालन, अक्रोध धर्म के दस लक्षण जरूर बताये गए हैं पर इन सबकी भी एक सीमा है।धैर्य जब चुक जाए तो आदमी बुरी बिखर जाता है फिर सबकी धैर्य शक्ति और क्षमता अलग अलग होती है।इसलिए धैर्य का एक ही पैरामीटर सबके लिए फिक्स नहीं किया जा सकता।अब कृष्ण तो भगवान थे फिर भी शिशुपाल की सौ गालियों के बाद उन्हें सुदर्शन चक्र चलाना ही पड़ गया फिर हम तो मूढ़ मानव है, हममें इतना धैर्य कहां से होगा, फिर भी सामर्थ्यानुकूल धैर्य बनाये रखते हैं लेकिन कोफ्त तब होती है जब अगला आपके धैर्य को आपकी कमजोरी समझ कायर के विशेषण से नवाज देता है ।क्षमा तो हमेशा बड़े ही करते हैं और छोटे दिनप्रतिदिन उत्पाती होते जाते हैं क्योंकि उन्होंने पढ़ रखा है क्षमा बड़ेन को चाहिए छोटन को उत्पात, कहा रहीम हरि को घट्यो जो भृगु मारी लात।इच्छाओं का दमन भी आवश्यकता से अधिक करना शुरू कर दो तो मन ही मर जाता है फिर किसी बात की इच्छा ही नहीं होती तो जब कभी तो आजादी उन्हें भी मिलनी चाहिए।चोरी ,राम राम राम ,उससे तो बिल्कुल तोबा कर ली है पर व्यवहार में उसका थोड़ा बहुत अंशः स्वतः आ जाता है ।वस्तुओं की चोरी के लिए दण्ड भले ही निर्धारित कर रखा हो कि व्यवहार की चोरी के लिए कोई दण्ड निर्धारित नहीं है, कहो कुछ करो कुछ।  कुछ तो ऐसे जन्मजात चोर हैं कि जब तक सब्जी की ठेल से थोड़ा बहुत धनिया मिर्च, गोलगप्पे वाले से दो चार दोने पानी और नपे दूध के ऊपर थोड़ा सा दूध नहीं डलवा लेते लगता ही नहीं कि खरीददारी की है।

      शौच को बिल्कुल अशौच बना कर रख दिया, शौचाते शर्म लगती है पर फ्रेश होते गर्दन ऊंची हो जाती है। धोने की  जरूरत भी कहां रह गई, ये नेपकिन के पैक के पैक जो शौचालय में रख दिये गए हैं।साबुन के विकल्प भी खोज लिए गए हैं।काहे की शुचिता शेष रही, नहाओ चाहे मत नहाओ, बस टीम टाम कर क्रीम पाउडर की  पोलिश लगा सेंट और डियो छिड़क लिए जाते हैं।कपड़े धोने से बचाब को मोटी मोटी फटी उधड़ी जीन्स पहनना फैशन में शामिल हो गया।पानी की तो इतनी बचत कर ली गई कि भोजन से पहले हाथ धोने के बजाए उसे भी न जाने क्या चुपड़ कर रिप्लेस कर दिया गया।इन्द्रिय निग्रह की बात तो करो ही मत, आंखें अच्छा अच्छा देखने के चक्कर में, कान मधुर सुनने के चक्कर में और जिव्हा सुस्वादु भोजन की लिप्सा में ऐसी बुरी फंसी है कि बस कुछ पूछो ही मत।मेधा का स्थान चतुराई और सा विद्या या विमुक्तये का स्थान अर्थकरी विद्या ने ले लिया है।बस ज्ञानी वही है, समझदार वही है जो चार पांच अंकों की सैलरी पाता हो ,बाकी तो सब भाड़ झोंकते हैं।खूब पढ़े लिखे ढेरों उपाधि पाये इन सेठों धनाढ्यों के आगे पानी भरते हैं।दस बारह वर्ष में मोटी मोटी पुस्तकें पढ़ रात रात भर जग कर  जो  चिकित्सक बनते हैं ,उन्हें किसी अनपढ़ के क्लीनिक और  नर्सिंग होम में अपनी सेवाएं बेचनी होती है, उनसे गवर्न होना होता है, काहे के विद्यावान रह गए वे।सिस्टम ही तो लचर है।

      सत्य की बात करते ऐसे लगता है जैसे किसी दूसरे की सीमा में जा घुसे हों।सब अकबकाई नजरों से ऐसे देखते हैं जैसे बाबले गांव में ऊंट आ गया हो।सत्य बोलना तो दूर उसके नाम और प्रसंग भर से ही उबकाई लेने लगते हैं जैसे दाल में कंकड़ आ गया हो,मुंह का स्वाद खराब हो गया हो।अब कितना संयम रखें, संयम रखते रखते यह हाल हो गया कि अब सामने वाला सत्य को भी झूठ की तराजू पर तौलने लगा।चुप रहो चुप रहो सुनते ऐसे चुपा गए कि अब जुबान ही तालू से चिपक गई है।बस सब एक ही बात कहे जा रहे हैं कि कैसी भी स्थिति परिस्थिति हो ,संयम मत खोना।यहां संयमी होते होते पानी सिर से ऊपर बह गया, लोग कायर,कमजोर की श्रेणी में रखने लगे और तुम अभी तक संयम संयम की रट लगाए हुए हो।आखिर कब तक जज्ब करें अपने को।बहुत हुआ ,बस अब अक्रोध की सीमा पार हो गई, अब तो फूटेंगे ही।काहे को निर्बल और कायर कहलाये, चूड़ियां थोड़े ही पहन रखी है पर सच तो यही है कि हम चूड़ियों बिछुए के साथ ही भरे पूरे हैं।चूड़ियों के शील को नहीं उतार फैंका जा सकता, वे शील और सौभाग्य की सूचक हैं ,डरपोक और कायर होने की नहीं।तो इन्हीं चूड़ी बिछुओं के साथ दो दो हाथ करने की तैयारी है।अब मुहावरे तो तुम बदलो अपने कि हाथों में चूड़ियां पहनने से कोई कमजोर नहीं होता बल्कि दूसरे की शक्ति भी उसमें आ जाती है।तो अब ज्यादा संयमी होने के बंधन उठा कर रख दिये गए, इन्हें तिलांजलि दे दी गई अब दो दो हाथ करने की तैयारी पूरी है।

बिना बात के काहू ते मत अटको

 सफर जारी है.....954

04.05.2022

काहू ते कितनो हू वैर होय, लड़ाई झगड़ा हे जाय, बोलचाल बन्द हे जाबे पर मिले पीछे राम राम जरूर करो, नाराजगी अपनी जगह होय और शिष्टाचार अपने ठीया।जे ही छोटी छोटी बात तो आदमी ए बडो बनाबे।और देख भैया चौबीस घण्टा मुंह फुला के रहबो ठीक नाय, कछू बात है गई,चार बता सुना देयो चार सुन लेयो पर दिल में धर के मत बैठे रह्यो, अरे कह कबा के वई की वई खतम कर देयो।ऐसो कितनो समय लिखा के लाये हो कि सबन ते लड़ भिड़ के फूल के बैठे रहो।कछु न जाओ करे संग में। खाली हाथ ही जानो है सो भैया सबन ते बोल बतराते रहो करो।जाते लगे हमारी नाय बन रई तो चुप लगा गए।पर रोज रोज को रोबो झींकबो, लड़बो भिड़बो ठीक नाय होय करे लाला। अरे काहू ने दो बात बढ़ती कह लई तो का तुम ते चिपट गई, धूल डालो बापे और आगे कू बढ़ लेयो।जाने कही सबरो दोष तो वई ए लगो करे।तुम तो झाड़ झूड के आगे चल देयो।कहां तक रखे रहोगे इन बातन ने दिमाग में।

हां, एक फायदा तो है जाबे कि बातन ते अगले आदमी को स्वभाव पतो चल जाबे।सुनी तो होयगी तुमने दमड़ी की हाडी तो गई2

 पर कुत्ता की जात तो पता चल गई।तो एक बार कू अपनो नुकसान करके हू बात समझ आ जाबे, दूसरे को स्वभाव पतो चल जाबे तो इन दामन में सौदा चोखो ही समझो।कम ते कम हमें पतो तो चल गयो कि अगलो कितने पानी में है, हमें ले के बाकी का सोच है।तो मुँहबादी करबे ते ज्यादा अच्छो हे चुप लगा जाओ, अपने काम ते काम रखो।बकन देयो अगले ने, कह कबा के अपनी गन्दगी ए बाहर निकाल के चुप है जायेगो ससुरो।हम चों अपनी जबान गन्दी करें।इतनी तो सबन ने सल है कि जापे जो होय वोही तो सामने वाले ए परोसेगो।खट्टो मीठो, तीखो, चरपरो, कड़बो।तो जे मान लेयो कि अगले के मन में इतनी घृणा भरी परी है कि अच्छे बोल निकले ही नाय।जब मुंह खोले विष भरे वचन ही बोले।ऐसेन के मोड़े ते कभहू ढंग की बात नाय निकरे।तो आदमी ए समझबो जरूरी है।बाकी जात समझबो जरूरी ऐ।अरे वा जात पान्त की बात नाय कर रई,कबीरा ने कही काय--जात पांत पूछें नहिं कोई, हरि को भजे सो हरि को होई।फिर सबके  खून को रंग तो एक ही होय करे, सबको जन्म हू समान तरीका ते होय, तो कोऊ काहू जात को होय हमें बाते कछू लेनो देनो नाय।बामे इंसान कछू नाय कर सके, जा घर में जन्म मिल गयो, वो ही बाको स्वर्ग दाखिल है।मैया बाप तो भगवान ते हू बड़े होय करें।कहत नाय का पहले घर की मैया ए पूजो तब पहाड़न वाली ए पूजिबे जानो चाहिये।जे नाय की घर की मैया ए तो बूढ़ेन के आश्रम में छोड़ आये और खुद चल दए वैष्णो देवी, अरे पहले बाय देखो जो तुम्हें जा जगत में लाई है, कैसे कैसे कष्ट सहे हैं तुम्हे बडो करिबे में तुम्हाई नींद सोई जांगी है, खुद चाये भूखी रह गई होयगी पर तुम्हारो झेन्दा जरूर से भर दीयो होगो।तो बाको मान करोपहले तब कहीं जइयो।जा बात ए तो गांठ बांध लेयो कि जो अपने जन्मदाता को सगो ना भयो वो कौन को होयगो।

 सो आदमी ए समझबो बहुत जरूरी है, बाको स्वभाव बोली भाषा से सब पतो चल जाबे कि कितनो गहरो है।एक बार कूअपनी गांठ का पैसा जरूर चलो जाबे पर सामने वाले की की असलियत तो जान जाओगे।इन दामन में जे सौदा बुरो नाय। एक बार काहू के स्वभाव ए जान जाओ तो फिर दुख न होय करे।फिर हम बाय ज्यादा भाव नाय देबे, कहतो रह, बकबो कर, हमाये ऊपर रत्ती भर हू असर नाय होय, जे तो है ही ऐसो।जाके मुंह लगबे ते कछू फायदा नाय, अपनो ही टैम खोटो करनो है।काठ की हांडी चूल्हे पर बार बार नाय चढो करे ,मौका बार बार नाय दयो जात , आदमी ए रोज रोज नाय परखो जात, एक कनी ते ई पतो चल जाबे कि खिचड़ी पकी है कि नाय।तो जब अगले की पोल पट्टी पतो चल जाए, आंखिन पे बंधी अज्ञान की पट्टी खुल जाए ,अगले ए समझ जाओ तो फिर रोज रोज काय क्लेश मत पालो, ऐसेंन ते अटको ई मत, अपनो रास्ता बदल लेयो।अपनी अक्कल बेच के काम मत करियो, सुनो सबकी पर करो बाये जो तुम्हें ठीक लगे, अपनी आत्मा की बात जरूल ते सुनो। लगे। अपने मन के अंदर झांको, बहुत सी गलत बातन ते छुटकारो मिल जाये करे।जे बात समझ आ गई तो आधी से ज्यादा काय क्लेश तो वैसे ही दूर है जाबे और जे मान लेओ कि तबहू कोई औगार लग जाए तो बाए राम पे छोड़ देयो।बिनकी शरण में चले जाओ, गात बजात रहो मेरी लाज तेरे हाथ, अब तू ही पत रखियो भगवन, अपनी सी खूब कर लई, अब नाय सिपट रई, तुम्हीं संभालियो प्रभु जी।

 तो सौ बातन की एक बात है पहले तो काहू ते अटको मत, सबन ते रामा श्यामा करो, राजी ते बोलो, और फिर भी अगलो नाय माने तो बाके हाल पे छोड़ देयो पर अपनो मुंह मत खराब करो उल्टी सीधी बक के, सब राम जी पार लगात है।

पर्दा उठने वाला है

 सफर जारी है......953

03.06.2022

 पारी खत्म हुई समझो ,सारे बानक ऐसे ही बन रहे हैं,हाथ से सब छूटता सा जा रहा है, जिस क्षण को पकड़ो, सहेजने की कोशिश करो, हाथों से रेत की माफिक फिसल जाता है।धीरे धीरे सब पीछे छूटता जा रहा है। दृश्यो की रील एक एक कर सामने खुलती है और छटा दिखाकर लुप्त हो जाती है।साथी एक एक कर पीछे छूटते जा रहा है।चित्त की स्थिरता को ग्रहण सा लग गया है , समय पंख लगा कर उड़ता जा रहा है, अंधेरे घिरते जा रहे हैं, नजर धुंधलाती जा रही है, लगता है अब कुछ भी हाथ में नहीं रहा।पता नहीं चलता कि लोग बदल रहे हैं, माहौल बदल रहा है या मन ही ठहर सा गया है।चारों ओर सन्नाटा, उदासी, उमस घुमस सी पसरी हुई है।बहुत कोफ्त हो रही है, मन ही तो पगला सा गया है।ध्यान ही तो चूक गया है, उसे रास्ते पर लाने के प्रयास किये  तो जरूर जा रहे हैं पर अब स्थितियां बिखर सी गई हैं।एक को पकड़ो तो दूसरा हाथ से खिसक जाता है।किस किस को पकड़ो, सब भागने की तैयारी में हैं, बस मौके की तलाश में हैं।अवसर मिले तो खिसक लें।जाने सबको क्यों लगता है कि वे साथ खड़े अहसान कर रहे हैं,काम अपने हिस्से का करते हैं और अहसान अगले पर पटकते हैं।

 उनके स्वर की तल्खी बता रही है कि वे निर्द्वन्द हो गए हैं, परम् स्वतंत्र न सिर पर कोऊ सा स्वेच्छाचारिता भाव उनकी नस नस में समा गया है।अब वे बोलते नहीं, फटते से हैं, शब्द उछल उछल कर बाहर आते हैं।उनका अपने शब्दों पर नियंत्रण ही नहीं है।वे छुट्टे सांड की तरह जहां मर्जी भाग लेते हैं, फिर खोल में दुपक जाते हैं।सारे के सारे समीकरण ही गड़बड़ा गए हैं।एक को पकड़ो तो दूसरा छूट जाता है।इस अकड़ पकड़ के दौर में सब चूहा भाग बिल्ली आई का खेल खेल रहे हैं।बस अब  खेल खत्म हुआ ही समझो क्योंकि अब दूसरा दौर शुरू होने को है। 

सच तो ये है अब नये खेल की पारी शुरू होने वाली है, इस अंक की कथावस्तु समाप्त हुई समझो, अब पर्दा डलने ही वाला है, नये अंक की पटकथा लिखी जा चुकी है, पात्रों की स्क्रीनिंग चल रही है, ये तो भूमिका समझो,बस कुछ ही देर में अंक परिवर्तन होने को है, बस पर्दा उठा ही समझो,शतरंज की बिसात बिछकर तैयार है ,सब गोट अपने स्थान पर रखी जा चुकी है। खेल शुरू होने ही वाला है।अब के खिलाड़ी खूब छंटे हुए और पक्के हैं।किसी के भप्पे में नहीं आने वाले।तो अब के हम दर्शक बने रहते हैं, दूर बैठ कर खेल देखने और खिलाड़ियों को हूट करने का अपना अलग आनन्द है।आप खिलाड़ी जो नहीं है, बस दर्शक दीर्घा में बैठे हैं।जिधर पलड़ा भारी होगा, उधर ही चले जायेंगे, हमें तो जीतने वाले का साथ देना है।अब के भूमिका बदल चुकी है।अब करना बरना नहीं, जबानी जमा खर्च करना है।तो पर्दा बस उठने ही वाला है फिर आराम से बैठकर तेल और तेल की धार देखो।चाहे तो कमेंट भी कर सकते हैं।बल्कि अब कमेंट ही करना है, काम बाम तो बहुत सिलटा लिए ,अब हमीं थोड़े करते रहेंगे, बहुत फूली फूली चर लिये, अब बंधो कुर्सी से, जिम्मेदारी से।अब मांग हमारी है पूर्ति तुम करोगे कहीं से भी करो, हमें क्या, हमें तो बस चाहिए।ही चाहिए।बड़े इतराते से फिरते थे, मैं ये मैं वो करते थकते नहीं थे।बस अब सब तुम्हारा है।तुम जानो तुम्हारा काम जाने।तो तैयार रहना दोस्त, पर्दा उठने वाला है।

जागते रहो

 सफर जारी है....952

02.06.2022

आंख  खोलकर पड़े रहना जागना नहीं कह लाता।जब तक किसी काम में चेतना केंद्रित न हो जाए तब तक सोया और जागा व्यक्ति समान ही होता है।कुछ सोते हुए भी जगे से रहते हैं अर्थात नींद में भी चिंतन करते रहते हैं तो कुछ जागे होकर भी सोए रहते हैं।जिनके दिमाग सोए रहते हैं फिर भले ही आंख भट्टा सी क्यों न खुली रहे, उनसे बहुत जरूरी  सा कुछ न कुछ रोज ही छूट जाता है।अब वे करें भी क्या ,इंसान की सीमा है, सब तो पेट नें भरा नहीं जा सकता ।तो प्राथमिकता तय करना जरूरी है। फिर ध्यान आता है जो आधी को छोड़ पूरी को धाबते हैं, उन्हें पूरी तो छोड़ो,आधी भी प्राप्त नहीं हुआ करती और वे खिसियाने से खम्भा नोंचते से रह जाते हैं।।कुछ ऐसे भाग्यशाली होते हैं कि दोनों हाथों में तो लड्डू होते ही हैं , मन ही मन भी लड्डू फूटते रहते हैं।और यहां ऐसे दलिदर पैदा हुए कि सब करते धरते भी रायता फैल ही जाता है, फिर उसे बटोरते से रहो।समय अलग बर्बाद हो और हाथ में आये निल बटा सन्नाटा।सब भाग्य की बात है, किस्मत के हेठे न होते तो करते धरते भी आलोचना के शिकार क्यों होते।

एक वे लाटसाहब हैं जो करेंगे धरेंगे कुछ नहीं, पर रौब ऐसा गाठेंगे कि सारी जायदाद इनकी बपौती है।और आश्चर्य इस बात का है कि सब जानते बूझते लोग उनका हुक्का सा भरते रहते हैं, बड़ी परवाह है उनकी नाराजगी की, उनके माथे पर नेक सिलवट आ जाएं तो सब को सांप सूंघ जाता है, फिर उनकी चिरौरी में लग जाते हैं।ये सारा माहौल देख कर लगता है कि बेशर्म बने रहने में फायदा है।करो धेला भर मत और रौब गांठो सो अलग।सच ही लिखा कहा होगा जो अति का सीधा होता है वह अपना नाश कराता है, देखो मीठे गन्ने को कोल्हू में पेरा जाता है।देखा है न गन्ने का रस निकालते हुए, कैसे मोड़ तरोड कर मशीन में लगाता जाता है, अंत में जब बिल्कुल जब छूँछ रह जाता है तो उसके बीच भी नींबू लगा फिर मशीन में लगा लेता है और बूंद बूंद रस निचोड़ लेता है, बिल्कुल अंतिम सांस तक।वन में टेढ़े मेढे पेड़ छोड़ दिये जाते हैं और सीधे सट्ट पर झट आरी चल जाती है।तो क्या सीधा होना और गम्भीरता से कार्य करना अपराध की श्रेणी में आता है।और यदि यही सच है तो फिर बदमाश होना, काम से बचने के उपाय खोजना, फूली फूली  चरने वाले,बिना हाथ हिलाए यूं ही मुफ्त में क्रेडिट लेने वाले लोग अधिक अच्छे होते है।सबको वैसा ही हो जाना चाहिए।पर कहीं ऐसा हो गया तो सब बंटाधार ही हो जायेगा।

            नहीं नहीं, ऐसे नहीं चलेगा, अभी कम से कम इतना संतोष तो है कि हम गलत नहीं कर रहे।कहीं सब खरबूजो को देखकर आप से खरबूजे भी रंग बदलने लगे तो फिर उनमें और आप में भला फर्क ही क्या रह जायेगा,फिर तो आप कहने के हकदार भी कहाँ रहेंगे, और अंतरात्मा अलग कचोटेगी सो अलग।क्या एक दिन भी सपनों में भी सो सकोगे, मन चीत्कार नहीं करेगा कि अरे बन्धु,ये अनर्थ तुम कैसे कर सकते हो, रोज तो याद करते हो कि बिना काम किये खाने वाले को अपच हो जाती है, निष्क्रियता व्यक्ति को बिल्कुल जड़ बना देती है।यदि वे तुम्हें देख कर नहीं बदल सकते तो तुम अपने सच के रास्ते से कैसे विरत हो सकते हो, क्या तुम्हारा अंतर तुम्हें धिक्कारेगा नहीं, क्या तुम चैन की नींद सो पाओगे, क्या अपने बड़ों से आंखें मिला पाओगे, क्या तुम खुद को माफ कर पाओगे, क्या अपनी ही नजरों में नहीं गिर जाओगे।अरे जो हो नहीं सकते वैसा सोचते ही क्यों हो।क्या हुआ जो सब काम अपने पेट में नहीं भर पाये, क्या हुआ जो आपसे कुछ कुछ बहुत जरूरी छूट गया, क्या हुआ जो अगले ने आपकी कमियों की ओर इंगित किया, क्या हुआ जो अपनो की श्रेणी में आते थे वे विश्वासघाती निकले, क्या हुआ जो आप ऊंचे ऊंचे लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सके।फिर दोबारा से कोशिश करेंगे, गिरेंगे तो क्या धूल झाड़ कर फिर उठ खड़े होंगे।काम तो बिगड़ा पर अगले का पता तो चल गया।कुछ लोगों में व्यवहारिक समझदारी जल्दी आ जाती है तो कई की अक्ल दाढ़ देरी से निकलती है, कुछ जल्दी सीख जाते हैं तो कुछ गिर गिर कर चोट खा खा कर सीखते हैं।

            नेक हमसे सिलबिल्ले और सीरे धीरे लोग देर से जागते हैं,जब सब प्रसाद बंट जाता  है ,तब पहुंचते हैं और ठनठन गोपाल रह जाते हैं।उनने शायद पिछारी रोटी खाई होती है, तो अक्ल दाढ़ जरा देर से आती है।वे सिस्टम का पार्ट नहीं बन जाते, इसलिए हमेशा हाशिये पर धकेल दिए जाते हैं।तो जागने और समय पर जागने के फर्क को समझना जरूरी है, अपने को अद्यतन करना जरूरी है, जागे तभी सवेरा से सबक लेना जरूरी है।

संकल्प ही कर्तव्य का मूल है

 सफर जारी है.....951

01.06.2022

जो बाजी जीतते हैं, सामान्य से इतर कुछ बड़े काम कर जाते हैं, घर परिवार बाहर कार्य स्थल के साथ साथ समाज में भी अपने को सिद्ध कर पाते हैं, अपनी उपलब्धियों का परचम लहरा पाते हैं, विनीत और मृदुभाषी होते हैं, सबसे हिलमिल कर रह पाते हैं जिनके संपर्क दायरे विस्तृत होते हैं जो भीड़ में अलग पहचान जाते हैं, वे किसी अलग दुनिया से नहीं आते।वे भी हम सबकी तरह दो हाथ पैर के स्वामी होते हैं,उनके पास भी वही चौबीस घण्टे का सीमित समय होता है पर उनके पास समय प्रबन्धन और लगन का विशेष गुण जरूर होता है जिससे वे सफलता के शिखर पर पहुंचते हैं।

कल एक सप्तति आयोजन में प्रतिभाग करने का संयोग बना।देश आजादी के पिचहत्तर वर्ष पूरे होने की खुशी में अमृत महोत्सव मना रहा है यानी उपलब्धियों के क्षण हमें सदैव गौरवान्वित करते हैं, हमें उन्हें सेलीब्रेट करते हैं।जीवन के सत्तर वर्ष की उपलब्धि का जश्न सप्तति का अवसर है।साहित्यकार और रंगकर्मी का जीवन केवल परिवार के लिए ही नहीं हुआ करता, उसकी परिधि में समाज, विद्यार्थीऔर शोधार्थी सभी सिमट आते हैं।उसका व्यक्तित्व बरगद सा विशाल होता जाता है।उसकी जड़े गहरे जमती जाती है।उसके पास सब को देने के लिए कुछ न कुछ जरूरी होता है।वह दोनों हाथों से बांटता है फिर भी कोष खाली होने के बजाए बढ़ता और बढ़ता ही जाता है।व्यये कृते वर्धते एव नित्यं विद्या धनम सर्व धनम प्रधानम।ज्ञान का कोष कभी खाली नहीं होता चाहे से जितना मर्जी बांटो। सच तो ये ज्ञान पुस्तकीय सूचना भर नहीं है, अनुभव सम्पन्नता आपको बड़ा बनाती है,आप स्वयम करके सीखते है।रोजाना के अनुभवों और seekh को उसमें जोड़ते जाते हैं, प्रतिदिन एक नया पाठ उसमें सम्मिलित होता जाता है।आप गहरे कुए जैसे होतेजिसके पानी का स्रोत कभी सूखता नहीं है।

      कई कई बार हम इतने सामाजिक हो जाते हैं कि परिवार कहीं बहुत पीछे छूट जाता हैं और हम शिखर पर अकेले रह जाते हैं।पर कल के आयोजन की एक विशिष्टता यह भी रही कि पूरा परिवार इस आयोजन में सहभागी था और जब साहित्यकार ने अपना रचना कर्म तीसरी पीढ़ी को हस्तांरित किया तो सभी रोमांचित हो गए यानी पुत्र के साथ पौत्र भी दादा से साहित्य संस्कारों की विरासत प्राप्त कर रहा था।एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मूल्यों का हस्तांतरण सदैव सुखद ही होता है।सामाजिक परिवेश की बड़ी भूमिका होती है और हमारे द्वारा तैयार विद्यार्थी शोधार्थी हमारी मेहनत का प्रतिफल होते हैं ।इन आयोजनो से ये संदेश भी जाता है कि उम्र केवल आंकड़े भर नहीं होती, उसमें आपका अनुभव भी सम्मिलित होता हैं, आप केवल संचय ही नहीं करते जाते ,बल्कि समानांतर बांटना भी सीखते हैं।आचार्य अच्युतन साहित्यकार के साथ साथ रंगकर्मी और सफल अभिनेता भी है।जिंदगी के पारी उन्होंने सावधानी से खेली इसलिए सफल ता उनके कदम चूमती है।सप्त ति तो मात्र एक पड़ाव है, हम सबकी शुभकामना है कि वे शतायु हों।

      केरल हिंदी परिषद के संरक्षक आदरणीय बालकृष्णन नायर,उनके पुत्र श्रीजू, आचार्य मूसा, श्री रघुराम जी,कालीकट विश्वविद्यालय हिंदी विभाग के अध्यक्ष आचार्य प्रमोद कोपवृत जी, शशिधरन जी, तमाम हिंदी सेवी, रंगकर्मी और हिंदी अध्येताओं से मिलकर मन बहुत प्रसन्न है।प्रो गोपीनाथन जी से रूबरू मुलाकात न होने का दुख साल रहा है पर अगली बार अवश्य मिलेंगे।हिन्दी का भविष्य निश्चित ही उज्ज्वल है।वह अपने प्रयोक्ताओं के मध्य खूब फल फूल रही है।नई पीढ़ी को सीखने का जो थोड़ा बहुत संकोच है वह अवरोध भी जल्दी दूर होगा।दरअसल हिंदी हिंदी कहने से हिंदी नहीं सीखी जाती, उसे सीखने और सिखाने का जज्बा और संकल्प भी मायने रखता है।जशना ने सही कहा कि वे यूट्यूब चैनल के माध्यम से हिंदी सिखातीहैं और स्पोकन हिंदी को सीखने के लिए डॉक्टर इंजीनियर और बैंककर्मी उनके विद्यार्थी हैं।हम मिल कर आगे बढ़ेंगे तो भाषा भी निश्चित तौर से आगे बढ़ेगी।और भाषा के सीखने सिखाने का प्रश्न केवल विद्यार्थी और शिक्षक से ही नहीं जुड़ा है,विविध क्षेत्रों में काम कर रहे फिर चाहे वे रंगकर्मी हों या अन्य, हिंदी को सीखना उतना ही जरूरी है जितना किसी अध्यापक को।तो नवीकरण कार्यक्रमों की परिधि में इन्हें भी शामिल करना बहुत जरूरी है।किसी भी भाषा को प्राथमिक स्तर से सिखाया जाए, विधिवत सिखाया जाए तो उसे जल्दी और आसानी से सीखा जा सकता है।तो इसे भी योजना का भाग बना लेना होगा।

      संकल्प से सब सध जाता है तो हम सब सबसे पहले संकल्प के धनी हो बाकी तो सब साथ में मिल ही जाता है।

सेवनीय महावट

 सफर जारी है....950

1.06.2022

जेठ मास की मावस वट मावस है, इस दिन सावित्री की कहानी दोहराई जाती है किस तरह वह अपनी प्रत्युपन्न मति से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण छुड़ा लेती है।विवाह से पूर्व ही नारद जी से उसे पता चल गया था कि सत्यवान की आयु बहुत कम है,वह चाहती तो विवाह से इंकार कर सकती थी, स्वयंवर ही तो था मद्र देश के राजा अश्वपति की कन्या का,उसके लिए वर की क्या कमी थी भला, दूसरा पति चुन सकती थी पर नहीं जो एक बार चुन लिया सो चुन लिया।अब होय सो राम।जो होगा देखा जाएगा।सास ससुर अंधे, उनका राज्य भी शत्रुओं ने छीन लिया।बिल्कुल निर्धन, इकलौता लड़का है  सत्यवान तो माता पिता की सेवा तो करनी ही है।दायित्व छोड़ कर कहीं भागा नहीं जा सकता था।सब जानते बूझते चुना, चुना तो चुना फिर ये नहीं कि बीच रास्ते छोड़ कर भागें।निभाया और पूरी शिद्दत से निभाया।यमराज ने तीन वरदान दिए तो उन्हें भी ऐसी चतुराई से मांगा कि एवमस्तु कह यमराज भी अपने वचन से बंध गये।उन्हें सत्यवान का जीवन लौटाना पड़ा।और बस सावित्री का नाम अमर हो गया। महिलाएं सालाना वट बरगद की पूजा करती हैं, जीवन साथी की लंबी आयु मांगती है।

         हर बार इस विषय को उठाते आलोचित तो बहुत होती हूँ ,घर परिवार समाज सखी सहेलियों को लगता है कि आज के घोर वैज्ञानिक और तकनीक के युग में ये कैसी महनीया हैं जो हमें इस कथा के ब्याज से फिर से सत्यवान सावित्री के युग में ले जा रही हैं।आज जब बराबरी का युग है तो एक ही क्यों पिदे,बीमार है तो डॉक्टर हैं न, सेवा सुश्रुषा के लिए नर्से हैं सेविका हैं।अब इतना भी क्या कि अगला बीमार है तो उसके लिए हम जान दे देंगे, उसे मौत के मुंह से निकाल कर लाने को मृत्यु के देवता के आगे हाथ पैर जोड़ेंगे।ठीक है भाई हमें भी उसका जीवन प्यारा है तो बड़े से बड़े डाक्टर को दिखा तो रहे हैं।अब ठीक तो व्यक्ति दवाई से ही होगा, अब खुद भी खाना पीना छोड़ के पूजा पाठ में लगे रहो, दुआ मांगो प्रार्थना करो और उससे सब ठीक हो जाएगा, हमारी समझ में तो नहीं भरता भाई।

         भर भी नहीं सकता क्योंकि अब सब भौतिकता के दबाब में जीते हैं।दवा से बढ़कर दुआ का असर होता है, इसे सुना ही नहीं, चरितार्थ होते भी देखा है।मनचीता मिल जाए इसलिए दर दर भटकते देखा है, पूजा पाठ जप करते देखा है।कहा तो यहां तक जाता है कि जो बात दवा से नही होती वो बात दुआ से होती है ,जब मुर्शिद कामिल मिलता है तो बात खुदा से होती है।ये स्नेह और सेवाभाव ही होता होगा जिसके चलते पत्नी अपने सुहाग के लिए और मां परिवार के लिए न जाने कितने व्रत उपवास पूजा पाठ तीर्थ में व्यस्त रहती है।और ये सब एकतरफा नहीं है। दूसरे पक्ष को भी परिवार के लिए सब करते देखा है, पाया है ।जब घर की धुरी बीमार हो जाए तो वे कैसे अकेले असहाय से हो जाते हैं।सच्चे मन से बार बार मनाते हैं कि सब जल्दी से ठीक हो जाए।बड़बड़िये तो जरूर होते हैं ,जल्दी तुनक भी जाते हैं पर अगले के लिए सोचते भी खूब हैं भले ही उसकी अभिव्यक्ति के सही तरीके न जानते हों।

         बचपन से देखते आ रहे हैं मैया को तीन दिन के इस कठिन व्रत का  पारण करते।पहले दिन एक टैम अलोना भोजन, दूसरे दिन अयाचित और तीसरे दिन निर्जल उपवास रखते, पिता को भी खूब चिंतित होते देखा है उन दिनों, हम सबको निर्देशित करना कि आज अपना काम अपने आप करो, मां को परेशान मत करना वह उपवास में है।और इतने कठिन समय में भी मां को पूरी दिनचर्या उसी शिद्दत से निभाते देखा है।रोज शाम पूजा कक्ष के साथ पीपल और तुलसी चौरा पर दीपक जलाते, कहीं सुन भर लिया था कि दीपक जोत से घर का अंधकार दूर होता है, कष्ट कटते हैं ।बस जब तक जिंदा रहीं, हाथ पैर चलते दीपक जलाने में कोई नागा नहीं हुई।पहले बरगद पूजने बल्केश्वर घाट जाती रहीं और अशक्त होते बरगद की डाली को पूजती रहीं।

         कहती थी देखो बरगद कितनों को छाया देता है आश्रय देता है, जमीन की जड़ को जो पकड़ता है तो छोड़ता नहीं बल्कि जटाओं को भी मिट्टी को सौंप देता है।सो वट जैसे व्यक्तियों के पास सदा जाओ, बैठो उनका मार्गदर्शन लो, वे हमेशा उपकार करते हैं।सावित्री हम सबके लिए आइकन है ,रोल मॉडल है वह आज भी पूज्य इसलिए हैं कि उसने मूल्यों को नहीं छोड़ा, जो उचित समझा किया, दोनों परिवार को अपना माना,दोनों का सुख चैन चाहा।बहुत कुछ सीखना है उनसे।अब तुम्हें ये सब मखौल लगता है तो लगता रहै पर अपना सच तो यही है मूल्य जहां से भी मिले अवश्य ग्रहण किये जाने चाहिए।ये हमारे आधे अंग के लिए सेवा और श्रद्धा भाव है, यह बहुत निजता का प्रश्न है, आप स्वीकारें या मखौल बनाए आपकी मर्जी पर इससे न तो वट वृक्ष की गरिमा में रंच मात्र अंतर आएगा और न सावित्री का कद छोटा हो जाएगा।

हाल और राल

 सफर जारी है....949

30.05.2022

 हां भाई हां,ये तीन यानी ननिहाल, ददिहाल और ससुराल बड़े जरूरी है जिंदगी में। बिल्कुल एकल परिवार में रहो तब भी जन्मदाता और सहोदर तो होते ही हैं।।दुनिया में आये हो तो जन्मदाता होंगे ही, आकाश से तो  टपके नहीं होंगे, जन्मदाता हैं तो उनके भाई ,बहिन, माता ,पिता भी होंगे।ये हैं तो ददिहाल और  ननिहाल भी होगी।अब तुम वहां जाओ न जाओ, ये अलग बात है। सहोदर हैं तो बहनापा भाईचारा निभाना भी आ ही गया होगा ।मौसेरे, ममेरे, चचेरे ,तयेरे, फुफेरे रिश्ते तो जन्म के साथी हैं, इनसे दूरी भले ही रखे रहो पर इन्हें नकार तो नहीं सकते।सम्बन्ध निभ जाए तो सोने में सुहागा और दूरी बनाए रखो तब भी सम्बन्धों का अस्तित्व तो अपनी जगह बना ही रहता है।रिश्तों की जड़ में कितना भी मठा डालो, ये तार तो मरे पीछे भी जुड़े रहते हैं।इन सम्बन्धों को निभाने की कला सबको नहीं आती।अरे जो निजी सम्बन्धों को ही नहीं निभा पाते ,वे अन्य सम्बन्धों को कैसे पोसेंगे भला। 

 सम्बन्धों को निभाना भी एक कला है।कुछ इसमें बड़े कुशल होते हैं।अपना भी नुकसान नहीं करते और सब से व्यवहार भी बनाये रखते हैं।दरअसल सम्बन्ध वे ही निभते हैं जिनमें आप अपेक्षा नहीं जोड़ते।बस जो बन पड़े, उतना कर भर देते हैं।हर व्यक्ति अलग परिवेश में पलता बड़ा होता है तो उसका व्यक्तित्व भी अलग तरह से शेप लेता है।आप के लिए जो बातें बिल्कुल महत्वहीन होती हैं ,हो सकता है अगला उन्हें पहली प्राथमिकता पर रखता हो।तो कई कई बार अगले को जानना समझना बहुत जरूरी होता है, उसके व्यवहार को समझना होता है, उसे क्या अच्छा बुरा लग जायेगा पता लगाना होता है।फिर यदि कोई अपना है तो उसकी छोटी -छोटी बातों को नजरअंदाज भी करना सीखना होता है। ,रूठे सुजन मनाइए जो रूठे सौ बार, रहिमन फिरि फिरि पोइए टूटे मुक्ता हार।कितनी कितनी बार सम्बन्धों को सहेजना होता है ,देखना होता है कि उनमें गांठ न पड़ जाए और जो गांठ पड़ गई तो गांठ गठीले बन्धनो को निभाना बड़ी टेढी खीर होता है। रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय, टूटे से फिर न जुड़े जुड़े गांठ पड़ी जाए।

 रिश्तों में निभाव में स्वभाव और प्रकृति बड़ी भूमिका निभाते हैं।विपरीत स्वभाव वाले के साथ आपके रिश्ते लम्बे नहीं चला करते।रहीम ने पहले ही सावधान किया कि कहो रहीम कैसे निभे बेर केर को संग, वे डोलत रस आपने उनके फाटत अंग।प्रेम से परोसी मोटे अनाज की रोटी भी स्वाद लगती है और बेमन से परोसी मैदा की पूरी भी मन को प्रसन्न नहीं कर पाती।रहिमन रहिला की भली जो परसे चित लाय, परसत मन मैलो करे सो मैदा जर जाय।सच ही सम्बन्धों का निभाव हर किसी के बस का होता भी नहीं।ऐसे तिर्यक का तो बिल्कुल भी नहीं जो व्यवहार का क ख ग भी नहीं जानते, बस हर समय मुंह सुजाये रहते हैं।

 अब जो व्यक्ति  अपने इन सगे रिश्तों को ही नहीं निभा पाते, वे नए रिश्तों में कैसे सामंजस्य बिठा पाएंगे।सम्बन्धों के निभाव की नींव तो घर से ही पड़ती है।यदि वहीं आंकड़े गलत बिछ गये,फंदे ही गलत डल गए तो आगे की बुनाबट सही कैसे होगी।घर परिवार बसाते नये घर से सम्बन्ध जुड़ता है ,घरवाली/ घरवाला मिलते हैं,ससुराली रिश्ते जुड़ते हैं, सास ससुर, साले सलहज, साली साडू के सम्बंध फ्री में मिलते हैं,तो चार दिन की चांदनी तक तो सब निभ जाता है लेकिन लम्बे समय तक इसे वे ही निभा पाते हैं जो समझदार होते हैं और सम्बन्धों की गरिमा समझते हैं।अरे अब तो रिश्तों की दृष्टि से और संपन्न हो गए, एक छोड़ दो दो घर हो गए, दोनों हाथों में लड्डू पा गए और क्या चाहिए भला।छेमचन्द की बात याद कर लिया करो छेम गए ससुराल दिना छह में आये, और छेम के आ गए छह मेहमान छेम कहीं गये न आये।तो आते जाते रहिये सम्बन्धियों के यहां, बोलते बतियाते रहिये उनसे, चिठ्ठी पत्री डालते रहिये, राजी खुशी मनाते रहिये उनकी।कुल मिलाकर निभाते रहिये इन सम्बन्धों को, सम्बन्धियों को ।बड़े भाग्यशाली होते हैं वे जिनके पास सम्बन्धों का अकूत खजाना होता है।

कहना सुनना भी सीखो

 सफर जारी है......948

29.05.2022

सारी डिग्री ,उपाधि ,प्रमाणपत्र, पुरस्कार, शील्ड धरे के धरे रह गए जब जीवन के खुरदरे यथार्थ से सामना हुआ।जब सीख रहे थे तो छोटी छोटी उपलब्धियों पर बहुत गर्वित हो लेते थे देखो हमने कैसा तीर मार लिया, हम फर्स्ट आ गए, हमें इनाम मिला, हमारी प्रशंसा हुई और हम फूल के कुप्पा हो जाते कि बस हमने सारा जग जीत लिया।अब क्या है ,ये पहुंचे वो पहुंचे।बस मंजिल नजदीक ही दिखती थी लेकिन जब से चलना शुरू किया तब से चल ही रहे हैं, ढेरों टेढ़े मेढ़े मोड़ हैं ,घुमावदार रास्ते हैं ,वक्र हैं ,दंशनाए हैं,कहीं फूल हैं कहीं कांटे है, जगह जगह काई जमी है,फिसलन है,सब एक दूसरे को टँगड़ी मार आगे निकले जा रहे हैं।सबको भागने की पड़ी है, यहां कोई किसी के लिए नहीं रुकता।रुकना तो छोड़ो, आप गिर कर घायल हो जाए, भीड़ आपके ऊपर से गुजर जाएगी पर कोई संज्ञान नहीं लेगा।दया ,सहानुभूति, श्रद्धा ,त्याग, बलिदान सब पुस्तकों में ही अच्छे लगते हैं।वास्तविक जीवन में ये सब एक तरफ सरका दिए जाते हैं ।बस सबको एक ही चिंता लगी रहती है किसी तरह मेरा काम हो जाए ,दूसरा गिरे तो गिरे, मरे तो मरे मुझे क्या।अपना हो जाना चाहिए बस।

जीवन में मंजिल का तो नहीं पता कि कब आती है पर छोटे छोटे पड़ाव निश्चित ही आते हैं,जो भी छोटी छोटी खुशियां हैं उन्हें वहीं उसी क्षण मना लेना होता है।फिर तो उठी पैंठ आठवें दिन ही जुरती है।सुख और खुशियां अकेले नहीं आती ,वे अपने साथ दुख ,कष्ट ,मुसीबत की औगार भी साथ लाती हैं, एक आंख हंसती है तो दूसरी खून के आंसू रोती है।न दुख स्थायी होता है न सुख, बस सब आते जाते रहते हैं।यहां कुछ भी टिकाऊ नहीं है,न कुछ लेकर आये थे न कुछ लेकर जाना है, बस मुठ्ठी बांधे आये थे और हाथ पसारे जाना है। अंत में बस व्यवहार भर रह जाना है ।तो उसे करते तो सावधानी बरती ही जा सकती है।कहना आ जाये तो आधी समस्याए कम हो जाए।पर सब कुछ सीखा हमने पर आनुपातिक बोलना ही नहीं सीख पाये।कभी ज्यादा शब्द लगा दिये जो पैबंद से थेगदी से अलग दिखते हैं तो कभी उनमें इतना गैप छोड़ देते हैं कि वे अलग थलग कोनो में पड़े रहते हैं, किसी का किसी से कोई लेना देना नहीं होता।बस सब अपनी मस्ती में इठलाते रहते हैं ,हमें क्या के भाव में दुपके से  पड़े रहते हैं।जो कहना आ जाए तो आधी समस्याएं दूर हो जाएं।पर न कहने में महारथ हासिल है न सुनने में।बस दलिदरी से कुछ भी निरर्थक प्रलाप करते रहते हैं।बोलने से अवकाश मिले तो कान में कुछ जाए, कुछ समझ आये।इतनी तो तमीज ही नहीं सीखी कि जब दो बात कर रहे हों तो बीच में अपनी मटर नहीं भुनानी चाहिए।पहले बात तो समझ लो, तुम्हारा सम्बन्ध उस बात से है भी या नहीं।

कायदा तो ये कहता है जब तक पूछा न जाए, सलाह मांगी न जाए तब तक मुंह बंद रखो और जो पूछा जाए तो तमीज से जबाब दो।इतना चीख के क्यों बोलते हो, सब बहरे थोड़े ही हैं।स्वर कोमल रखा जा सकता है ,हो सके तो पिच भी धीरे रखो, ध्यान रखो तुम अपना पक्ष रख रहे हो, कोई युद्ध लड़ने नहीं जा रहे।और जो एक बार सुनना आ जाए तो बात जल्दी समझ आती है और उसी त्वरा से आप जबाब दे पाओगे।थोड़ा ठहर ठहर कर बोलो, उच्चारण की शुद्धता पर ध्यान दो ,शब्दों के अर्थ समझ कर प्रयोग करो, तसल्ली से अपनी बात रखो,दूसरे को सुनने समझने का अवसर दो।तुम तो बोलते हो ऐसा लगता है धड़धड़ मेघ गरज रहे हों कि लपालप बिजली चमक रही हो कि तड़तड़ातड़ ओले गिर रहे हों।स्वर इतना कर्कश क्यों कर लेते हो।सहज भाव से बोलो, कर्णप्रिय बोलो, सब सुनेंगे।सब सुनने के लिए ही बैठे हैं।बात वजनी होनी चाहिए, उसका कुछ अर्थ होना चाहिए।अनर्गल बोलों ही क्यों।शब्द बिना बात के खर्च क्यों करें।हम तो मितव्ययी हैं भाई तो जहां दस शब्द चाहिए पांच से काम निकालते थे, करते क्या, कहने को तो बहुत कुछ था पर सिखाया यही गया कि तौल मोल के बोलो।शब्दों को हिसाब से खर्च करो। वैसे भी शब्द को ब्रह्म कहा गया तो उसे पूजो, मनाओ, तब जाकर उसे अगले को सौंपो ,सामने वाला भी खुश और तुम भी खुश।तो नहीं आता तो सीखो कहना और सुनना, सच जिंदगी जीना बहुत आसान हो जायेगा।

लागी छूटे न

 सफर जारी है....947

28.05.2022

लगन तो लगन है, जिस किसी से और जिस किसी में भी लग जाए बस एक बार तो फिर नहीं छूटती।ये लगन जो ईश्वर से लग जाए तो भवसागर ही पार करा देती है।दिन रात भजन के बोल दिमाग में गूंजते रहते हैं लगन तुमसे लगा बैठे जो होगा देखा जाएगा, तुम्हें अपना बना बैठे जो होगा देखा जाएगा।और जो सांसारिकता में लग जाए तो लागी छूटती नहीं है।फिर तो गदही में भी परी के दर्शन होते हैं।ऐसे थोड़े ही कहन बनी होगी दिल लगा गधी से तो परी क्या चीज है।बस ये जी का लगना ही तो जी का जंजाल है।जी ही तो नहीं लगता पढाई लिखाई में।और कहीं प्यार व्यार के चक्कर में पड़ जाए तो बस सब वारे न्यारे करा देता है।ये जी ही दिल, जिगर ,मन ,मनुआ कहा जाता है।कभी कभी ये खो जाता है तो कभी आपके बस में नहीं रहता।और आप उसे खोजते पगलाते से इधर से उधर घूमते हो 'जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी, अभी अभी यहीं था किधर गया जी'।

        देखने में कैसा छोटा सा लगता है जी, और बड़े बड़ों की नींद हराम कर देता है।क्या करे जी ही तो नहीं लगता नहीं तो आदमी हम भी काम के होते आज।इस जी ने तो ऐसी की तैसी कर के रख दी।क्या क्या तायने सुनबा देता है, भरे बाजार इज्जत उछाल देता है।जिंदगी भर तो मास्टरनी की डांट खाते रहे कि एक ये हैं महारानी इनका पड़ने में दीदा ही नहीं लगता, बस खेल खूब खिलबा लो।इधर उधर की बातें बनबा लो पर पढ़ने की मत कहो।इधर मास्टरनी टिर्राती और घर आओ तो मैया बापू हाय तौबा मचाते रहते अरे क्या होगा इस लड़की का, लंबी ऊंची तो खूब हो गई पर घर के कामकाज में  बिल्कुल जी नहीं लगता इसका, जब देखो दौड़ी छूटी बस्ता इधर उधर फैंक सहेलियों से बतराने निकल जायेगी।अब क्या करें दोस्तों से बात करने में बड़ा दिल लगता।और इसके बड़े ठोस कारण थे कि सहेलियों के   पास दुनिया जहान की बातें थी, सूरज की चन्दा की हवा की धूप की, इस मोहल्ले की उस मोहल्ले की, इस की उसकी सबकी।अब बातों में जी लगता था तो लगता था क्या करें।एक बार को खाना न मिले तो चलेगा ,बातों से पेट भर लेंगे पर अकेले बिल्कुल सूमसाम बैठना तब न पसन्द था न अब है । जी जिसमें लग जाता है, उसकी जी हजूरी करते पेट नहीं भरता।और जिससे उखड़ जाए उसकी सूरत भी नहीं देखना चाहता।बस कुछ दिल में बस जाते हैं और कुछ से दूरी बढ़ जाती है।

        लगन लगी मीरा को, राधा को, गोपियों को, शबरी को, विदुर को, गज को बस सबका कल्याण हो गया, दुनिया ही बदल गई, नाम अमर हो गया, साहित्य में दर्ज हो गई।'ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन वह तो गली गली हरि गुण गाने लगी, महलों में पली बन के जोगन चली मीरा रानी दीवानी कहाने लगी'।राधे तो कृष्ण की ऐसी आराध्या शक्ति बनी कि कृष्ण मय हो गई।गोपियों को तो कुछ होश ही नहीं रहा, सब बाबली सी पूछने लगी मोकू लिखो है का मोकू लिखो है का।हनुमान को लगन लगी तो वे राम भक्त बन गए, ध्रुव को लगी तो पांच वर्ष की आयु में ईश्वर को पाने चल दिये, प्रह्लाद को हरि नाम का ऐसा चस्का लग गया कि वे अन्य साथियों को भी हरि कथा सुनाने लगे, वाल्मीकि को लगन लगी तो मरा मरा कह कर ही तर गए,वज्र बुद्धि के कालीदास महाकवि बन गए, तुलसी को पत्नी रत्नाबली की बात 'अस्थि चरम मय देह में तामे ऐसी प्रीत जो होती भगवान में तर जाती भवभीत 'इतनी अधिक लग गई कि रामचरितमानस ही रच गई।सिद्धार्थ को लगी तो बुद्धत्व प्राप्त हो गया।तो जीवन में कुछ लगना जरूरी है, सपनों का जगना जरूरी है, उत्कट लालसा जरूरी है।बस एक बार जो लगन लग जाये तो सब सध जाता है फिर साधन हो न हो, कोई फर्क नहीं पड़ता।बस व्यक्ति लक्ष्य तक पहुंच ही जाता है।

        कुछ को प्यार बांधता है तो कुछ को किसी का व्यवहार ही इतना अखर जाता है कि व्यक्ति खट्टा खा जाता है।मन फिर गया तो फिर गया, फिर उसकी ओर रुख तक नहीं करता।और कहीं दिल लग गया तो इतना सेंटी हो जाता है कि गाता डोलता है 'जिस गली में तेरा घर न हो बालमा उस गली से हमें तो गुजरना नहीं, जो डगर तेरे द्वारे पे जाती न हो उस डगर से हमें तो गुजरना नहीं'।जो जी लग गया तो ऐसा लग जाता है कि पूरी दुनिया छोड़ बैठते है और मन उचट गया तो बाबाजी बन बैठते हैं।दुनिया छोड़ने की बात करने लगते हैं।कैसा होता है ये लगना एक पल में जिंदगी बदल देता है।बस चाह जग गई तो जग गई, लगन लग गई तो लग गई फिर तो लागी छूटे न का रिकार्ड बजता रहता है।'एक तू जो मिला सारी दुनिया मिली'का राग अलापना शुरू हो जाता है और जो कहीं जी उचट गया तो पानी पी पी के उसकी सात पुश्तों को कोसते हैं।कभी जिसके साथ जीने मरने की कसमें खाई थी ,उससे लगन छूटी टूटी तो उसी के मरने के सपने संजोते हैं, उसके दुनिया छोड़ने पर घी के दीये जलाते हैं।कैसा होता है ये लगना जो पल में तोला पल में माशा कर देता है, अपनों को पराया बना देता है।कल तक जिस एक के लिए दुनिया छोड़ी थी ,आज उसी को दुनिया से रुसख्त करने के ख्वाब बुनने लगता  है और आगे ऐसे बढ़ जाता है जैसे बटोही।

        तो बस ये लगन लगी रहे,लागी छूटे न।

लाज शरम क्यों नहीं आती

 सफर जारी है.....946

27.05.2022

आप भी कमाल की बातें करते हैं, अरे उन्होंने पढ़ रखा होगा, उन्हें याद होगा कि जिसने करी शरम उसके फूटे करम और जिसने ओढ़ी बेशर्माई, उसने खाई दूध मलाई।सो जिनकी खाल गैंडे सी  मोटी होती है ,उन्हें सुईं की चुभन महसूस ही नहीं होती।तेज से तेज पिन की नोंक भी भोंथरी हो जाती है।जान बूझ कर रोज एक कांड करना उनकी फितरत में शामिल है जिससे वे चर्चा में बने रहते हैं ।उनका सिद्धांत है पहले खूब ऊधम काटो,फिर उस पर   लीपा पोती कर दो।अकर्मण्यता की भी हद होती है भाई,काम न करने के सौ बहाने और वजह गिनाने के हजार कारण तो ऐसे लोग जेब में रखे घूमते हैं।सौ दिन चले अढाई कोस इन पर पूरी तरह चरितार्थ होता है।।एक पैरा की टिप्पणी लिखने में कम से कम चार पांच घण्टे तो चाहिए ही चाहिए और फिर उस लिखे के क्रियान्वयन में एक दो दिन  तो लगने ही है। पूरे सिस्टम में नकार जो घुली हुई है।अधिकांश की फितरत एक सी है बस किसी तरह काम से बचा जाए, उससे कन्नी काटी जाए।चोर चोर मौसेरे भाई हैं, सो नित नई नई चालें चलते हैं कि बस हाथ तक नहीं सरकाना पड़े।काले को सफेद करने की फुल प्रूफ योजना बनाते हैं और मान कर चलते हैं कि उनके इस स्याह सफेद की जानकारी किसी को नहीं होगी।खूब चतुराई बरतते कोई न कोई ऐसा सबूत छूट ही जाता है जिससे कलई खुल जाती है और सब पानी सा साफ हो जाता है।उन्हें ये भी गुमान है कि उनकी काली करतूतें किसी सीसीटीवी में कैद नहीं हो पायेगी,। उन्होंने कच्ची गोलियां थोड़े ही खेली हैं।पर वे बिल्कुल भूल गए हैं कि अगले ने कच्ची गोलियां नहीं खेली है, बाल भी धूप में सफेद नहीं किये हैं।उनकी आंखे सीसीटीवी से भी तेज हैं।चोर की दाढ़ी में तिनका इन्हें दिख जाता है।ये गर्दन तक कीचड़ में फंसे सच का सामना कर ही नहीं पाते, दो चार चोट में मुंह खोल देते हैं, सब सच उगल देते हैं।वो तो ये  इस लिहाज में मरे जा रहे हैं कि सब अपने ही हैं, काहे को थुक्का फजीहत करो।पर उनके हौसले दिन प्रतिदिन बुलन्द होते जा रहे हैं। समझदार के लिए इशारा काफी होता है पर अगला निरा मूर्ख हो, अपना भला बुरा न सोच पाये, ज्यादा ही ख़ुट सयाना हो तो क्या किया जा सकता है, एक दिन ये करम ही ले डूबेंगे।न्याय की लाठी बडी बेआवाज होती है।अचानचक पड़ती है, बेभाव की पड़ती है, इतनी दनादन तड़ातड़ पड़ती है कि आप संभल भी नहीं पाते

       ऐसा नहीं कि उन्हें पता न हो कि जो काम किये बिना खाता है, उसे अपच हो जाती है कि चोरी का सारा माल मोरी में चला जाता है कि ऊपर वाले की लाठी बेआवाज होती है कि भगवान के यहां देर है अंधेर नहीं कि पाप का घड़ा लबालब भरने पर ही फूटता है।पर वे अभी गहरी नींद और तन्द्रा में हैं। उन्हें किसी का कोई भय नहीं रहा, अपने आगे किसी को कुछ मानते नहीं, अभिमान की पराकाष्ठा है पर शायद उन्हें याद नहीं रहा कि अहंकार तो अति बलशाली रावण का भी नहीं रहा, उसे नेस्तनाबूद होना ही पड़ा तो तुम्हारी क्या हस्ती है।बस अपने दिन पूरे हुए ही समझो, बत्ती बुझने से पहले लौ बड़ी फड़फड़ाती है, बड़ी जोर से चमकती है और फिर हमेशा के लिए बुझ जाती है।     

           उन्हें बड़ा गुमान है कि हमारा कोई भला क्या बिगाड़ पायेगा,हमारी पीठ भारी है। वे नहीं जानते कि जिस भीत पर वे टिके हुए हैं , वह निरी बालू की भीत है।एक धक्के में ही ढह जाएगी।उन्हें अपने ज्ञानी ध्यानी होने का बहुत गुमान है, वे इतने भरे हुए हैं कि उन्हें कुछ सुनाई ही नहीं देता। सुनें तो तब जब कानों से रुई हटे।वे स्याह को सफेद करने की कला में माहिर हैं। उन्हें ये बोध ही नहीं कि परम् सत्ता तो कोई और है ,उसकी मर्जी के बिना तो पत्ता भी नहीं हिलता।बस दुष्टों का अंत जब नजदीक होता है तो बुद्धि घास चरने चली जाती है।कुछ सुनाई ही नहीं देता, बस सरपट दौड़ता है और ठोकर खाकर धड़ाम सीना गिर पड़ता है।उसकी नियति ही यही है।वे अपने को परम ज्ञानी मान बैठे हैं।हिरण्यकशिपु की तरह खुद को ही भगवान घोषित किया हुआ है।ईश्वर को वे मानते नहीं, परम् नास्तिक जो है।बस उनके जीवन में प्रह्लाद आना शेष है।जो स्वयम को सर्वेसर्वा मान बैठा हो, वह भला ईश्वर और उसके नामित  प्रतिनिधि को कैसे स्वीकारेगा,उसकी हेठी नहीं हो जाएगी।तो अभी उन्हें फूली फूली चरने दो, उन्हें इस गलत फहमी में बने रहने दो कि उनकी पांचों घी में और सिर कढ़ाही में है।उनका किया बहुत जल्द सामने आने वाला है।फिर सिर धुन धुन पछतायेंगे पर क्या फ़ायदा।सांप के जाए पीछे लकीर पीटने से भला मिलता ही क्या है, बस ठेंगा ही न।तो वे अभी नासमझ है, उनके पाप के घड़े भरने में थोड़ा और वक्त बाकी है तो थमे रहिये ।जिन्हें अब शरम नहीं आती, वे इतने शर्मिंदा होने वाले हैं कि शरम को भी शरम आ जायेगी और उसे छिपने के लिए कोई ठौर ठिकाना भी नहीं मिलेगा। कह सुन कर अपना मुंह क्यों गन्दा करें, उनका पतन तो निश्चित है।बेशर्मों को ऐसी शरम आएगी कि मुंह छिपाने को जगह तक नहीं मिलेगी।तुमने कहना समझाना था सो कह दिया, अब तो बैठ के तेल और तेल की धार देखिए।आप तो चुप्प बैठ के तमाशा देखने की तैयारी करो।घड़े फूटने ही वाले हैं।

परखिये चारी

 सफर जारी है.....945

26.05.2022

                इस चौपाई को पढ़ते अनुसुइया और सीता का प्रसंग याद आता है कि माता पुत्री को उपदेश दे रही है कि धीरज ,धर्म, मित्र अरु नारी, आपत काल परखिये चारी।अर्थात आपत्ति काल में ही इन चार साथियों की परख होती है ,उनकी विश्वसनीयता सिद्ध होती है कि वे विपत में पड़े  व्यक्ति का साथ देते हैं या उन्हें मुसीबत में छोड़कर पतली गली से निकल जाते हैं और अगला रोता कलपता गाता रहता है 'सुख के सब साथी दुख में न कोय',कबीर भी याद दिलाते हैं जब व्यक्ति ईश्वर तक को केवल सुख में ही याद करता है ,दुख में भुला देता है तो बेचारे मानुस को क्या पड़ी है कि वह एक साधारण से मनुष्य का विपत काल में साथ दे और अपने को आफत में डाले।हालांकि उसे धर्मानुसार नियमानुसार ऐसा करना चाहिए पर कौन मानता है नियमों को। 

      धीरज ,धर्म ,मित्र और नारी की परख विपदा के समय होती है, यह सार्वकालिक और सार्वभौमिक सच है ।पर जब बिना सन्दर्भ के इस चौपाई को अकेले उदधृत किया जाता है तो बार -बार ध्यान प्रथम अर्धाली के अंतिम  पद नारी पर चला जाता है।पहले तीन तक तो शत प्रतिशत सहमति बनती है पर नारी के स्थान पर लगता है कि जीवन साथी होना चाहिए था।ये ठीक वैसा ही मसला है जैसे आदि काल से दिए जा रहे आशीर्वाद 'पुत्रवती भव 'को 'संतति वान भव' में बदलने की मुहिम हो। सौभाग्य तो दोनों का होता है भले ही स्त्री के संदर्भ में यह सौभाग्यवती भव ,सदा सुहागन रहो या सौभाग्यकांक्षिणी के रूप में हो।सौभाग्य की आकांक्षा क्या केवल स्त्री को ही होती है ,अगला सौभागशाली होने में कोई रुचि नहीं रखता क्या, उसे इसमें गौरव की अनुभूति नहीं होती क्या '।फिर इस आशीर्वाद में ये पक्षपात क्यों।वे आयुष्मान और चिरंजीवी हैं तो ये भी आयुष्मती विशेषण से युक्त हैं, वे आत्मज हैं तो ये आत्मजा हैं ।वे वृषभानुजा हैं तो ये हलधर के वीर हैं,दोनों की जोड़ी तभी तो जमती है।चिरजीवो जोरी जुरै क्यों न स्नेह गम्भीर  ऐसे ही थोड़े रच दिया होगा।फिर आपत काल तो दोनों में से किसी पर भी आ सकता है, वह लिंग भेद देखकर थोड़े ही आएगा।आपात काल किसी एक वर्ग के लिए आरक्षित तो नहीं होता न।फिर ऐसे कष्टकारी समय में ये परीक्षा अकेली आधी आबादी की ही क्यो निर्धारित हुई होगी। इसके दायित्व से शेष पचास प्रतिशत को क्यों और कैसे मुक्त रखा गया होगा।

        ये बात आसानी से पचती नहीं है कि जब गृहस्थी की  गाड़ी के दोनों पहिये हैं तो एक पहिये  के पंचर होने ,कमजोर पड़ जाने पर ,कम पढ़े लिखे होने पर ,जड़ बुद्धि होने पर, अधिक होशियार न होने पर दूसरे को समर्थ होना ही चाहिए, इसमें कोई दो मत नहीं है।फिर इसमें लिंग भेद की बात कहां से घुस आई नारी ही को रेखांकित क्यों किया गया।चौपाई तो यूं भी हो सकती थी धीरज, धरम ,मित्र और नर नारी, आपत काल परखिये चारी।दोनों एक दूसरे के प्रति पूर्णतः समर्पित हो, घर तो तभी चलता है।एक को बिल्कुल मुक्त छोड़ दो और दूसरे के कंधे पर भारी जुआ रख दो तो ये तो बेइंसाफी हो जाएगी न।एक जल्दी थकेगा और दूसरा आराम तलब होकर केवल आदेश ही देता रहेगा तब तो चल गई गृहस्थी।पर यह भी उतना ही बड़ा सच है कि अधिकांश परिवार ऐसे ही एक पहिये पर दौड़ रहे हैं।जो जितना स्किल्ड है जिसे अपने कंधों पर सारा बोझ लादने की पुरानी आदत है ,लद्दू घोड़ा बना रहता है और अगला तिक तिक चाबुक चलाता रहता है।वह सारा वजन लादे हुए चलता तो है पर बीच बीच में कभी चिढ़ चिढ़ा जाता है,भड़कता है, कह कबा कर रिलीज होता है , फिर बैल की तरह बोझा उठा के चल देता है कि आखिर करना तो उसे ही है।पता नहीं वह ये क्यों माने बैठा है कि आसमान उसके कंधों पर ही टिका है।जैसे ही वह सांस लेने के लिए रुका, आसमान नीचे गिर पड़ेगा।जो जितना स्किल्ड है जितना कार्य कुशल है ,उतना ही अधिक कार्य में व्यस्त है क्योंकि उसे काम से बचना नहीं आता।और जो इस सब जंजाल से मुक्त है कि हमें तो करना आता ही नहीं, दरअसल कभी किया ही नहीं, ऐसे ही निठ गई।अब तीसरे पन में क्या खाक मुसलमा होंगे।ऐसे कौन से तीस चालीस बरस शेष हैं, बहुत जीयेंगे तो दस बरस और, अब इतनी कट गई तो ये भी निभ ही जाएगी।कौन आफत मोल ले।।        कह तो सच ही रहे हैं कि जब तुलसी बाबा ने लिख दई तो उसे ही प्रमाण मानो, काहे को अपनी अक्कल लगा रहे हो।

बस अगले के ऊपर ही जिम्मा डाले रहो और खुद पतली गली से निकल जाओ,अपने ऊपर आंच की छोड़ो लपट तक मत आने दो, साफ बच जाओ ।

रही बात धीरज/धैर्य की, विपत्ति आने पर सबसे पहले  धैर्य ही जबाब देता है कि अब कैसे होयगी।मुसीबत है पहाड़ सी और उससे निपटने को साधन है राई से, न जन शक्ति है न धन शक्ति,और मुसीबत आने पर बुद्धि वैसे ही ठस्स हो जाती है।तो मुसीबत में कठिनाई में विपत्ति में धैर्य बना रहे तो आधी समस्या दूर हो जाती है।धर्म तो अच्छे अच्छों का छूट जाता है, उसके दस लक्षणों में से एक भी याद नहीं रहता जबकि धर्म का पहला लक्षण धैर्य ही है।याद तो होगा ही धृति क्षमा दमोस्तेयं शौचं इन्द्रिय निग्रह, धी विद्या सत्यम अक्रोध दशकम धर्मम लक्षणम।रही बात मित्र की तो सच्चा मित्र आपत्ति काले न जहाति, गुह्यं गुह्यति गुणान प्रकटी करोति के सिद्धांत पर अडिग रहता है।कृष्ण सुदामा सी मित्रता रखता है।देता इस तरह है कि सीधे हाथ से दे तो बाएं को भी खबर न हो।तो धैर्य ,धर्म ,मित्र के साथ जीवन सहचर का जोड़ लगा दें तो बात अच्छे से हजम हो जाएगी।

अति सूधो स्नेह को मारग है

 सफर जारी है....944

26.05.2022

कहा सुना तो यही जाता है प्रेम स्नेह का बंधन सबसे बड़ा होता है।आप प्रेम से सबको जीत सकते हैं।प्रेम में इतनी ताकत होती है कि वह बड़े से बड़े कार्य करवा लेता है।प्रेम दीवानी मीरा का हाल किसी से छिपा नहीं है।प्रेम में दुख दरद भी मिलता है लेकिन प्रिय की प्राप्ति में ऐसे सैकड़ों दुख दरद न्यौछाबर किये जा सकते हैं।ए री मैं तो प्रेम दीवानी मेरो दरद न जाने कोय, घायल की गति घायल जाने के जिहि लागी सोय।बस लग्न गई तो लग गई फिर कोई परवाह नहीं, कितने भी कष्ट मुसीबतें आये, अगला पलट कर तक नहीं देखता, भेजते रहें राणा जी विष का प्याला, उसे भी गटक लिया जाता है।विष का प्याला राणा जी भेजा पीबत मीरा हांसी रे, पग घुघरू बांध मीरा नाची री।कहते रहो तुम कि ये सौदा लाभ का नहीं है पर जो प्रेम में बिक गया सो बिक गया।कोई कहे सस्तो कोई कहे महगों लियो री तराजू तोल, माई री मैंने लीनो गोविन्दो मोल।उधर गोपियों का भी यही हाल है, वे कृष्ण के प्यार में आकंठ डूबी है।मधुवन को हरे भरे देख कर आश्चर्यचकित हैं, प्रश्न कर बैठती हैं मधुवन तुम कत रहत हरे, विरह वियोग श्याम सुंदर के ठाड़े क्यों न जरे।उन्हें यमुना अत्यंत मलीन दीखती है।लखियत कालिंदी अति कारी।जब प्रिय दूर हो तो सारी की सारी कायनात उसी के विरह में डूबी लगती है।ब्रज वनिताएँ तो उस सांवले की एक झलक पाने को, उसकी वंशी की धुन पर सब छोड़ छाड़ कर पागलों की तरह दौड़ती हैं।

       ऊधो ज्ञान की पोटरी लेके उन्हेँ समझाने आये है।उनसे साफ साफ कह देती हैं ऊधो मन न भये दस बीस, एक हुतो तो गयो श्याम सङ्ग को आराधे ईश ।ऊधब के हाथ सांबरे ने प्रेम पाती भेजी है सो मोकू लिखो है का, मोकू लिखो है कहती बाबली हो जाती है प्रिय नहीं आये तो क्या उसकी चिठ्ठी तो आई है।लो आगई उनकी याद वो नहीं आये।प्रेम इतना शक्तिशाली होता है कि एक तू जो मिला सारी दुनिया मिली जैसे गीत गबबा देता है।रसखान तो कृष्ण प्रेम में इतने मगन हो गए कि हर जन्म में उनका साथ पाने को किसी भी योनि में जन्म लेने को तैयार हो गए मानुष हो तो वही रसखान बसो ब्रज गोकुल गांव के गवारिन, जो पशु हो तो कहा बस मेरो चरो नित नंद की धेनु मँझारन, जो खग हो तो बसेरो करो मिलि कालिंदी कूल कदम्ब की डारन, और पाहन हो तो वही गिरि को जो धरयो छत्र पुरन्दर धारन।इससे अधिक प्रेम की पराकाष्ठा क्या होगी कि बस उस प्रिय का साथ भर चाहिए, वह मुझे भले से न देखे पर मैं उसे दूर से ही निहारता रहूं।धन्य है ऐसा प्रेमजिसमें सब दिया ही दिया जाता है, लेने की कोई तमन्ना नहीं है।

       फिर घनानन्द को पढ़ते लगा कि प्रेम का मारग तो सरल सीधा सा है जामें नेक सयानप बांक नहीं।तहाँ साँच चले तजि आपुनपो झिझके कपटी जे निशांक नहीं,घनानन्द प्यारे सुजान सुनो यहां एक ते दूसरों आंक नहीं, तुम कौन धों पाटी पढ़े हो लला मन लेत हो देहु छटांक नहीं।प्रिय से प्रतिदान मिले न मिले कोई परवाह नहीं, मन भर लेकर भी छटांक भर की तमन्ना नहीं।प्रेम का गणित तो ऐसा ही होता है।उस प्रेम के आंक के अलावा कोई दूसरा आंकड़ा दिखता ही नहीं।सब देकर भी कभी कभी झोली खाली की खाली रह जाती है पर कोई अफसोस नहीं होता कि मुझे कुछ नहीं मिला।आप अपने प्रेम को निभाते ही रहते हैं।प्रेम प्रतिदान की आशा करता भी कहां है।प्रेमास्पद मिले न मिले पर चेतना में हमेशा बना रहता है, उसकी यादों और एक झलक के सहारे भी रहा जा सकता है।

       यदि प्रेम इतना सात्विक होता है, यदि प्रेम में इतनी शक्ति होती है यदि प्रेम इतना सच्चा होता है तो वह ये आजकल का कौन सा प्रेम है जो मनचाहा न मिलने पर न होने पर प्रिय को दिन रात कोसता है, उसके मरने की दुआ मांगता है उसे और उसके सम्बन्धियों को पानी पी पी कर कोसता है।कोसता ही नहीं ,सरेआम उसकी हत्या ही कर देता है ।उसके प्रेम के पात्र रोज बदल जाते हैं, आज इससे था कल उससे हो जाता है, स्थिरता कहीं नहीं होती।पहले एक के लिए दूसरी को छोड़ता है तो मन बदलने पर दूसरी को पाने के चक्कर में पहली को रास्ते से हटा देता है।ये प्यार का कौन सा रूप और प्रकार है जिसमें प्रेमास्पद रोज बदल जाते हैं।न तो इस प्रेम में अनन्यता दिखती है न एकनिष्ठता।बस अपने निजी स्वार्थ वश रोज पात्र बदल लिए जाते हैं घनानन्द तो कहते थे यहां एक ते दूसरों आंक नाम और आजकल का चलताऊ प्रेम यह सिद्ध करने लगा कि इसमें तो ढेरों ढेरों आंक है जो मर्जी चुनो पसन्द न आये  उसे छोड़ सकते हो और फिर अगला चुन सकते हो।अवसर अनेको हैं बस लेते जाओ, मन भर जाए तो बदल लो, सब बिकता है यहां, बोलो क्या क्या खरीदोगे।

       आज सब खरीद ही तो रहे हैं।एक बार में पसन्द कहां आ पाता है कभी रूप चाहिए तो कभी गुण फिर उस सबसे मन भर गया तो कुछ और की मांग उठ जाती है।अब ये मन ही तो है बेचारा ,बिना लगाम का घोड़ा जब जिधर चाहे मुंहउठाकर चल देता है।आज ये पसन्द तो इसे चख लो अब इससे मन भर गया तो दूसरे को टेस्ट कर लो।क्या हुआ, प्यार व्यार कुछ नहीं बस पात्र को कमोडिटी की तरह बदलते रहो।लिव इन रिलेशन शिप का जमाना है, जब तक मन करे रहो फिर पत्ता झाड़ दो।सुनते थे कि प्यार में शुचिता पवित्रता होती है, जो चुना वह जीवन की थाती होती है पर आजकल प्यार के जो संस्करण दिख रहे हैं वे तो इतने स्वार्थ परता से भरे हुए हैं कि बस प्रेम के सारे अर्थ ही बदल दिए गए।घनानन्द जी, आपने तो सही लिखा था कि अति सूधो स्नेह को मारग है जामे नेक सयानप बांक नहीं।पर अब इसके निहितार्थ बदल गए हैं, प्रेम की डुगडुगी बजती तो है पर उसमें गाम्भीर्य नहीं ,केवल खोखलापन बाकी है।तो बजाते रहो और जब मन भर जाए तो दूसरी डुगडुगी पीपनी खरीद लो।

परिवार पहली पाठशाला

 सफर जारी है....943

25.05.2022

शिक्षा के अभिकरण पढ़ते जाना कि परिवार बच्चे की प्रथम पाठशाला और मां पहली गुरु है।विद्यालय, समाज की  आदि इसके बाद शुरू होती है।अनौपचारिक शिक्षा का श्रीगणेश यहीं होता है और संस्कारों की पृष्ठभूमि भी यहीं तैयार होती है बल्कि कहें तो परिवार जिन मूल्यों को रोपित कर देता है, आगे के संसाधन उसे ही विकसित और पल्लवित करते हैं।सबसे जुड़ने का भाव, बड़ों को आदर और मान देने का भाव तो बालक यहीं से ग्रहण करता है।भजन भोजन भाषा और भाव की पीठ परिवार में रखी जाती है कि क्या खाना है कैसे खाना है और खाना ज्यों जरूरी है, अपने बड़ों को इष्ट के आगे हाथ जोड़ते पूजा करते देख वह भी यही सब दोहराता है, भाषा का संस्कार तो वह परिवार से ही पाता है कि बड़ों से कैसे विनम्रता से बोला जाता है या कैसे ध्यान पूर्वक उनकी बात सुनी जाती है, उनसे जबान नहीं लड़ाई जाती, उन्हें पलट कर जबाब नहीं दिया जाता, गलत बात की जिद करो तो आप पहले प्यार से समझाए बुझाये जाते हो और अगर जरूरी हो तो ठोके कूटे पीटे भी जाते हो।अब वे परिवारी जन हैं तो तुम्हें सही रास्ते पर लाने के लिए साम दाम दण्ड भेद अपनाएंगे ही,आप उनके बेहद अपने हो तो आप को सुधारना उनका कर्तव्य है।वे यह कह कर नहीं छूट सकते कि हमने तो अपना सा किया अब नहीं माने तो क्या करें।

वे स्कूल के टीचर जी नहीं है कि उन्हें नियत पाठ्यक्रम ही पढाना है और उतना ही पढाना है जितनी तनख्वाह मिलती है।वे एक बार को अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ सकते हैं कि मैंने कक्षा के सारे बच्चों को सुधारने का ठेका थोड़े ही लिया है।वह पढा भर देता है फिर विद्यार्थी उसे ग्रहण करे न करे उसकी क्षमता और रुचि ओर निर्भर है पर माता पिता परिवारीजन यह कह कर अपने दायित्व से मुक्ति नहीं पा सकते।आप को तो उन्होंने ही रचा बुना है, आप उनकी प्रतिकृति हो तो वे तुम्हें अपने से कहीं आगे ले जाना चाहते हैं।जो जो उन्हें उपलब्ध नहीं हो सका वह सब अपने बालक की झोली में भर देना चाहते हैं।आखिर आप उनके अंश हो, उनके आत्मज हो, उनका रक्त आपकी धमनियों में दौड़ता है।आप को लेकर उन्होंने ढेरों आशाएं पाल ली है।वे चाहते हैं कि आप उनकी कसौटी पर खरे जरूर उतरोगे।

जीवन मूल्य तो परिवार से ही मिला करते हैं, स्वाभिमान की नींव वहीं रखी जाती है मर जाऊं मांगू नहीं अपने तन मन के काज, परमारथ के कारने मोहे न आबत लाज का सूत्र वाक्य तो परिवार में ही पोषित होता है।सम्बन्धों की नींव तो वहीं रखी जाती है।सहोदर के रिश्ते तो वहीं जन्म लेते हैं।बांट कर खाना तो वहीं सीखते हैं।कितनी भी परेशानी हो विपत्ति हो पर साथ निभाने की कला तो परिवार ही सिखाता है।घर में मां बहिन चाची ताई का आदर करते हो तभी तो दुनिया की स्त्री का सम्मान कर पाते हो, घर के बूजुर्ग दादाजी नानाजी को मान देते हो तभी घर से बाहर वृद्धजनों में बाबा दादा के चेहरे तलाश पाते हो।जैसे संस्कार पा जाते हो वही व्यवहार करते हो।

तो क्या अब परिवार की भूमिका बदल गई है क्या उनके दायित्व क्षेत्र सीमित हो गए हैं क्या सारा का सारा दायित्व उन्हें मंहगे स्कूलों में भेजने भर का रह गया है।दो साल भी पूरे नहीं कर पाता तभी से उसके लिए प्ले ग्रुप खोजने शुरू हो जाते हैं कि कम से कम स्कूल जाना तो सीखेगा,चार बच्चों के बीच बैठना सीखेगा, साहचर्य का भाव विकसित होगा, जो पास है उसे बांटना सीखेगा।पर हम बिल्कुल भूल जाते हैं कि जो समय माता पिता और घर परिवार के साथ रहने का है, पारिवारिक सदस्यों से मजबूत बॉन्डिंग बनने का है, हम धीरे धीरे उससे दूर करते जा रहे हैं।बस उसे बड़ा और बड़ा बनाने की ऐसी धुन सवार है कि उसका बचपन छीनने पर तुल गए हैं।जो बालक अभी अपनी नेचुरल कॉल्स को तरीके से व्यक्त नहीं कर पाता उसे हमने विद्यालय भेजने की पूरी पूरी तैयारी कर ली है।जो समय जो उम्र उसमें मूल्यबोध जगाने और संस्कारित करने की है उस में हमने मोबाइल और टीवी में कार्टून देखने को अलॉट कर दिया है और बड़े इतराते से कहते हैं कि ये तो कार्टून देखे बिना रह ही नहीं सकता, बस मोबाइल देखते देखते कुछ खिला दो तो ठीक।बड़े गर्व के साथ बताते हैं कि मेरा बालक खुद से मोबाइल ऑपरेट कर लेता है।जो देना चाहिए उससे पहले उसे दूर रखते हैं और बाद में सिर धुन पछताते हैं किक्या करें, बहुत दिख करता है किसी की मानता ही नहीं।

      परिवार धीरे धीरे विघटित होते जा रहे हैं, कमाने का इतना दबाब है कि घर के चार सदस्य हैं तो सब कमाई में लगे हैं, चौबीस घण्टे की व्यस्तता है, बहुत जरूरी सब छूटा जा रहा है पर उस ओर किसी का ध्यान नहीं।बस पैसा और भरपूर पैसा हो तो सब खरीदा जा सकता है, भौतिक वस्तुओं के साथ साथ शिक्षादीक्षा सब खरीद सकते हो,डिग्री प्रमाणपत्र सब अरेंज किये जा सकते हैं बस जेब भरी हो और बैंक बैलेंस फुल हो।सर्वे गुणकांचनम आश्रयन्ति।संस्कार किस चिड़िया का नाम है, नैतिक शिक्षा की बात करना बेमानी है, सत्य ईमानदारी गई तेल लेने, चारों ओर झूठ और बेईमानी का साम्राज्य है, सबको कम समय में ज्यादा से ज्यादा चाहिए, शॉर्टकट चाहिए।बस किसी तरह सब झोली में भरा जा सका, इसके लिए कोई भी जुगाड़ लगाई जा सकती है, किसी भी हद तक जाया जा सकता है, मूल्यों की अनदेखी की जा सकती है, संस्कारों को तोड़ा मरोड़ा जा सकता है, बस जैसे भी हो अपना काम हो जाना चाहिए।

      बच्चे वही सीखते हैं जैसा देखते हैं।परिवार आज उनमें वे मूल्य विकसित नहीं कर पा रहा जिसकी दरकार है।सब एक दूसरे पर छोड़ रहे हैं, एक दूसरे कोआलोचित करने में लगे हैं, परिवार को लगता है ये स्कूल का काम है हम पैसा खर्च कर सकते हैं और स्कूल को लगता है जब तक घर परिवार का सहयोग नहीं तब तक अकेला चना क्या भाड़ फोड़ेगा।समाज ने अपने हाथ अलग खड़े कर लिए है।कहीं सामंजस्य नहीं दिख रहा और इस सबके मध्य सबसे अधिक मिट्टी पलीद बालक की हो रही है।वह जो इस सबके मूल में था,वही उपेक्षित हो गया, उसने अपने रास्ते खोज लिए हैं वह परिवार और विद्यालय से मिलने वाले पाथेय को गूगल की शरण में खोज रहा है, दिन भर मोबाइल मेंआंखे गढ़ायेबैठा है कि शायद यहीं कोई रास्ता मिल जाये।अब भी समय है परिवार को अपनी भूमिका तय कर लेनी चाहिए कि वही बालक की प्रथम पाठशाला है और उसे जग में लाने वाली मां प्रथम गुरु है।

अब क्या होगा

 सफर जारी है.…942

23.05.2022

अब क्या होगा

भविष्य को लेकर एक अकेली चिंता बहुत सारे सुखों पर भारी पड़ जाती है।आप लाख सिर झटकते रहें और कहते रहें कि सब ठीक होगा, अभी वर्तमान में रहो, उसे एन्जॉय करो पर मन में पड़ा खटका कहां सहज रहने देता है।कुछ न कुछ चलता ही रहता है।मन की चंचलता अपना प्रभाव दिखाती है औ समझदारी अपनी ओर खींचती हैं।दोनों में से जो प्रभावी हो जीत उसी के खाते में चली जाती है।लाख बार सुनते पढ़ते रहो कि वर्तमान में जीना सीखो, चार्वाक दर्शन अपनाओ, ऋणम कृत्वा घृतं पिबेत का सिद्धांत बना लो पर अपनी चिंता की प्रकृति को कहां ले जाओगे, उस पर विजय कैसे पाओगे।व्यक्ति ऊपर से लादा तो उतार फैंक सकता है पर बुनाबट ही ऐसी है तो उससे सहज छुटकारा पाना असंभव नहीं तो कठिन तो अवश्य होता है।

अब देखो कुत्ते को उसकी पूंछ को लम्बे समय तक सीधी कर पत्थर के नीचे रखो पर जैसे ही दबाब हटा, वह झट से अपने मूल रूप में आ जाती है।

तो बदलाब तो अंदर से आता है, जब तक चिंता बनी रहेगी और चिंतन की प्रवृत्ति विकसित नहीं होगी तब तक अब क्या होगा राम जी करते ही रहेंगे।अतीत पर एक बार को धूल भले से डाल भी दो पर जो होने वाला है, भविष्य है उसके विषय में तो सोचना होता ही है।जो गलतियां अनजाने में या जान बूझकर हो गई उनका दण्ड अब तक भोग रहे हैं तो आगे के लिए सतर्क होना जरूरी है।यदि अब भी नहीं सुधरें तो जो बचा खुचा है उससे भी हाथ धो बैठेंगे।तो सोचना तो होगा कि अब क्या करणीय है और किससे दूरी बरतनी है।सब पेट में नहीं भरा जा सकता तो अपनी प्राथमिकताएं तय करना जरूरी है, अपनी दिशा निर्धारित करना जरूरी है, अपनी आवश्यकताओं को सीमित करना जरूरी है।अब क्या होगा के स्थान पर अब क्या किया जा सकता है पर सोचना जरूरी है, जो पास है जिसे अर्जित करने में खून पसीना एक किया उसका सही वितरण जरूरी है।

तो जब तक नहीं सोचेंगे कि अब क्या होगा तब तक कुछ नहीं होने का।तो जो होना है वह होकर रहेगा, तुम उसमें क्या हथेली लगा लोगे पर जो भी हो उसके विषय में चिंतन अपेक्षित है।छत गिरासू हो तो यह सोच कर नहीं बैठा रहा जा सकता कि होय सो राम, अरे उसकी मरम्मत कराएंगे, बल्ली आदि से उसे टिकाने की व्यवस्था करेंगे, उसके उपाय सोचेंगे, वैकल्पिक व्यवस्था तैयार रखेंगे, कुछ तो करेंगे ही।हाथ पर हाथ धरे बैठे ये ही नहीं दुहराते रहेंगे कि हाय राम अब क्या होगा।जो होगा अचानक तो नहीं होगा, आप भी सब देख समझ रहे होंगे पर उस ओर से पीठ किये बैठे होंगे कि मुझे क्या जब दीवाल गिर जाएगी तब का तब देखा जाएगा।बस यही गलती हम हर बार दुहराते हैं।समय रहते चेतते नहीं, और बाद में दुनिया भर की रोना पीटना मचाते हैं कि हाय राम अब क्या होगा।होगा वह जिसकी आपने पूर्व भूमिका पूर्व पीठिका तैयार कर रखी है, जीवन भर जिम्मेदारियों से किनारा किये रहे, पीठ दिए बैठे रहे, सब दूसरा कर करा दे, हम तो बस परोस कर रखी को खाने आ जाएंगे और वह भी अहसान के साथ, बस तुम बहुत कह रहे हो तो खा लेते हैं।कुछ भी अचानक घटित नहीं होता, रोज थोड़ी थोड़ी टूटफूट होती है, रोज थोड़ा थोड़ा रिसाव होता है पर उसकी हम लगातार उपेक्षा करते रहते हैं,उसे इग्नोर करते हैं और जब बात बढ़ जाती है, फोड़ा फूट जाता है, छत ढह जाती है तब हम बुक्का फाड़ कररोते हैं हाय राम ये क्या हो गया, अब क्या होगा।

तो दिनप्रतिदिन सावधानी रखना जरूरी है, छोटी से छोटी बात का संज्ञान लेना जरूरी है, उसके प्रति आपकी प्रतिबद्धता कटिबद्धता जरूरी है, आपका चिंतन जरूरी है सही प्रयास किये जाने जरूरी है।खाली यह कहने से बात नहीं बनने की कि अब क्या होगा।

जी

 सफर जारी है...941

22.05.2022

बस सब जी का महिमा है साब,ये जी जो न करा ले थोड़ा है।नाम और सरनेम के साथ जोड़ दो तो आपको इज्जत के सबसे ऊंचे पायदान पर बिठा दे,आया जी, हांजी कह दो तो आपको तमीजदार सिद्धकर दे, जी में एक और जी लगा दो तो बहन और जिज्जी बना दे।दो जी के बीच जा लगा दो तो जीजाजी का प्यारा रिश्ता दे दे, जिस मर्जी संबोधन और रिश्तेदारी में जोड़ दो आपकी खूब नामबरी हो जाये।जी हां ये जी ही है जो कभी आपके जी को जी में ला देता है तो कभी जी का जंजाल बन जाता है।

जो जीभ कतरनी सी चलाती रहो तो तुम्हें कभी भी चारों खाने चित्त कर दें और किसी की जी हजूरी में लग जाओ तो तुम्हारी जिंदगी बदल कर रख दे।जी कारा लगाकर बोलो तो तुम्हारी ज से जयजयकार होती है।ज से मीठी मीठी गोल गोल घुमाबदार जकेबी है तो ज से जीना भी हराम हो जाता है।ज से जीवन में जीत मिलती है तो ज से हमारा जी कभी कभी खो भी जाता है और आप गाते डोलते हो जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी, अभी अभे यहीं था किधर गया जी।जी चाहे तो आपको बहुत मान दिला दी और ज्यादा ही जी जी करने लग जाय ओ तो अगले की नजर से ही गिरा दे कि देखो बिना रीढ़ का सा सारे दिन जी जी की पेपनी सी बजाता रहता है।सबको सिर पर ही चढाये रहता है।अब देखो छोटे बारे और सेवकों से जी लगाकर बोलने का कौन सा धर्म है पर नहीं साब आपने इतनी बात कह दी तो उनके श्रीमुख से प्रवचन शुरू हो जाएंगे अरे क्या हुआ जो उसे  नौकर जी कह दिया कि रिक्शा वाले को भैया जील संबोधित कर दिया ,क्यावह इंसान नहीं है, क्या वह हमारा जरखरीद गुलाम है जो आपके आगे हाथ जोड़े हरदमभीगी बिल्ली बन कर खड़ा रहे, आपकी चाकरी करता रहे, आपकी जी हजूरी बजाता रहे, आपके आगे पीछे डोलता रहे।अरे भाई उसकी भी इज्जत है।कभी अचानचक उसके घर पहुंच जाओ फिर देखो अपने घर का राजा है वह, उसका परिवार कैसे उसे इज्जत से नवाजता है, बालक पिताजी पिताजी कहते नहीं थकते तो पत्नी ऐसी आज्ञाकारिणी हैइतना सम्मान देती है हमारे ये के अलावा उसके पास कोई दूसरा संबोधन ही नहीं है।तो भाई जो तुम्हें जी कारे से पुकारता है उसे जीकारे से पुकारने वालो की संख्या भी कम नहीं है।

ये छोटा सा जी कितने कितनों का दिल जीत लेता है।देखन में छोटे लगे पर बड़े गहरे अर्थ छिपाए रखते है।कहने की टोन ही बता देती है कि ये आदर सम्मान वाला जी है या प्रश्वाचक या खिल्ली उड़ाने वाला या उलाहने वाला या स्वीकारोक्ति वाला।किसी की लंबी चौड़ी बात सुनकर आप उत्तेजित हुए बिना केवल जी कह आमने वाले को बहुत कुछ सोचने पर विवश कर देते हैं कि ये जी समझ आने के लिए है या इसका कुछ अन्य अर्थ निकलता है।सामने वाले को सोच में डाल आप उड़नछू हो जाते हैं।ये जी हां जी छोटा सा जी कितनो कितनो को दुविधा में डाल देता है कि इतने लंबे व्याख्यान के बाद इस छोटे से जी से क्या आंकलन किया जाये।तो पकड़े रहिये इस जी को ,जीकारे को, बड़ा काम का है ये।आपको बहुत सारी मुसीबतों से बचा ले जाता है।सुनते हो जी बहुत प्रचलित है जिसको सुनते ही पति महोदय चौंक जाते हैं कि इस जी के ब्याज से पता नहीं कौन सी नई मांग रख दी जाए और जी का जंजाल खड़ा होजाए।सुनते हो जी बडो बडो और अच्छों अच्छों की खाट खड़ी करने की सामर्थ्य रखता है।

तो ये है जी की महिमा।नाम के साथ लगे तो सम्मानीय बना दे और दुष्ट के नाम के साथ लगा दो तो लक्षणा व्यंजना का भाव दे दे।रावण जी कंस जी सूपनखा जी नहीं सुना न कभी, अब मां बेटे के नाम के आगे जी लगाकर बोले तो कैसा पराया सा लगता है।अरे अपनो बच्चों का पिताजी है पर तुम्हारा तो लाडेसर ही है न।जी जरूर लगाकर बोलो, जी कारे से बोलो पर किसी की इतनी जी हजूरी मत करो इतने बिछे बिछे मत रहो कि अपना सम्मान ही न रहे।तो चलते हैं जी, कल मिलते हैं जी, अपना ख्याल रखना जी।

सब धन धूरि समान

 सफर जारी है....940

21.05.2022

बात तो बिल्कुल सच्ची है पर दिमाग में बैठ जाये तब बात बने।सारा झगड़ा तो इसी धन को लेकर ही है, सारी इज्जत, सारे क्रिया कलाप,सारे उलाहने तायने,सारा परिश्रम इस धन को कमाने और फिर उससे भौतिक वस्तुओं की खरीद और संग्रह से है, अपने को ऊंचा दिखाने से है।धन संपत्ति ही तो आपको मान सम्मान दिलाते हैं, वे ही आपको ऊंचे आसन पर बैठाते हैं, एक उसी को कमाने के चक्कर में तो व्यक्ति घर बार छोड़ जगह- जगह भटकता है और जिसे कमाने के लिए इतनी हायतोबा की जाती है ,वह साथ नहीं जाता।मर्जी जितना खाते में शून्य के आंकड़े बढ़ते जाए पर जाना खाली हाथ ही होता है।सब यहीं का यहीं धरा रह जाता है।बिल्कुल वैसे ही नंग धड़ंग चले जाते हो जैसे इस दुनिया में आये थे।मुट्ठी बांधे आया तू हाथ पसारे जाएगा, जो भी तूने छीना बटोरा सब पड़ा यहीं रह जायेगा।सब जानते बूझते भी कि पैसों से कभी पेट नहीं भरता, और और कमाने की ललक बनी ही रहती है।

कहीं बाजार में मिलता होता संतोष तो पैसे देकर उसे खरीद लिया जाता।बड़े चर्चे सुने हैं इसके कि जिसे ये मिल जाए उसके तो बारे न्यारे हो जाते हैं ।संतोषी सदा सुखी पढा सुना तो खूब जाता है पर उसे गुनते नानी मरती है।बस पाठ्यक्रम में था तो पढ़ लिया ,रट्टा मार के इम्तहान में लिख आये, नम्बर मिल गए पास हो गए तो क्या अब उसे पकड़े बैठे रहें। दोहा तो अभी तक याद है हमें,कहो तो सुना देते हैं 'गोधन गजधन बाजिधन और रतन धन खानि, जब आबे संतोष धन सब धन धूरि समान'।पर धन धूल के समान हो सकता है ,यह न तो तब गले उतरा था न अब गले उतरता है कि धन को धूरि क्यों कहा गया।अरे धन से ही तो सारे काम सधते हैं,धन ही तो पुजता है इस कलियुग में फिर धन पर धूल कैसे डाली जा सकती है, उसे कैसे भूला बिसराया जा सकता है।वह है तो जीवन है।'जल ही जीवन है 'कहा जाता है पर जल भी तो पैसे से ही  खरीदा जाता है ।पूरेबीस रुपये में बिसलरी का बस एक बोतल पानी आता है इतनी गर्मी में भला उससे कहीं प्यास बुझती है।इससे तो पहले दिन ही अच्छे थे। कहीं भी ओक लगाकर तो कभी पस भरकर पानी पी लेते और खूब तृप्त हो जाते।प्याऊ पर ,कुए पर ,हेण्डपम्प /खेंचू से कैसा सीरा सीरा मीठा पानी मिलता कि पीते ही आत्मा तृप्त हो जाये।उस दिन बहुत प्यास लगी थी तो राह किनारे लाल लाल कपड़े से ढके घड़ों से दो चार गिलास पानी क्या पी लिया , साथियों ने ऐसे आड़े हाथों लिया, ऐसे धो धो के सुनाया कि क्या जरूरत थी इस पानी को पीने की, बस अब बीमार होने की तैयारी कर लो।भला हो जो कुछ नहीं हुआ।यदि उन्नीस बीस कुछ हो जाता तो मुफ्त के पानी के मत्थे ही सारा दोष मढ दिया जाता।तो बताओ जब पानी तक खरीद कर पीना पड़े तो धन से किनारा कैसे करें ,उसे धूल समान कैसे मान लें।

धूल से याद आया धूल की तो बहुत महिमा है, देश की रज में ही लोट लोट कर बड़े होते हैं,यह बहुत पवित्र है तभी तो माथे पर लगाई और कान्हा के द्वारा खाई जाती है।तेरे लाला ने माटी खाई जशोदा सुन माई और ब्रज की रज परम् पवित्र बास जहां राधे रानी को, भूल्यो चतुरानन यहां हर लियो मन त्रिपुरारी को।तो ब्रज की धूल तो छोटी /तुच्छ हो ही नहीं सकती।तो दोहे में धन को धूल समान क्यों कहा गया।अच्छा ये धूल रेत के लिए कही गई होगी जो उड़ उड़ के आंख में जा पड़ती हैं, कंकड़ सी ककराती है, घर भर को गन्दा कर देती है, जिसे हम धूल डालना कहते हैं ,जो किसी काम की नहीं होती, जिसे बिल्कुल निकृष्ट कोटि में रखा जाता है, जिस धूल से कोई काम नहीं सधता, धन उसके समान है और वह धन भी गोधन, गज धन और बाजि धन जैसा है।आज के युग में किसे गाय, हाथी ,घोड़ा चाहिए भला।गाय का गोबर, घोड़े हाथी की लीद से तमाम गन्दगी ही फैलती है न, दूध डेरी से लो, घोड़े से भी तेज इलेक्ट्रिक वाहन उपलब्ध हैं और आजकल भला हाथी पालने का साहस किसके पास है तो वह सवारी के लिए ही अच्छा लगता है।सोने जबाहरात हीरे मोती मूंगे जैसे रत्न रखकर क्या अपने को संकट में डालना है, अरे भाई इमिटेशन का मिलता है न सब मार्केट में तो वक्त जरूरत उसे पहन लो, क्यों चोर लुटेरों को दावत देते हो।तो गौ, गज, बाजि और रतन धन की तुम्हें जरूरत है नहीं, इन सबका विकल्प रुपय्या तुम्हारा प्रिय है पर उसका भी संचय करना ठीक नहीं।याद तो होगा ही पूत सपूत तो का धन संचय, पूत कपूत तो का धन संचय।लायक निकल गया तो वैसे ही ढेर लगा लेगा और कपूत की गिनती में रहा तो सब वैसे ही बारे न्यारा कर देगा।

तो संतोष को खोजो ,कहीं से भी खोज कर लाओ।फिर लगता है ये कहीं साईं की तरह मन के अंदर ही तो छिपा नहीं बैठा है ज्यों तिल माहि तेल है ज्यों चकमक में आगि, तेरा साईं तुज्झ में जागि सके तो जागि।जैसे पुहुपन में बास है,जैसे मृग की नाभि में कस्तूरी बसी है वैसे ही संतोष भी तेरे मन के अंदर ही छिपा बैठा है, बस उसे बाहर लाना बाकी है।तो सन्तोष कहीं किसी दुकान पर और बाजार में नहीं मिला करता,वह हम सबके पास है।जब आबे सन्तोष धन सब धन धूरि समान, संतोषी सदा सुखी।जब संतोष का भाव आ जाये तो कम में भी अगन मगन रहा जा सकता है, बहुत सा रेज सा पैसा नहीं चाहिए, बस दो टैम दाल रोटी का जुगाड़ हो जाये, तन ढकने को वस्त्र मिल जाये औऱ सिर छिपाने को जगह तो हमसे बड़ा राजा भला कौन होगा और ये भी न मिले तो भी खुला आसमान और धरती तो है ही न, जो जीवन देता है वह चुग्गा और पानी भी देगा, बस ये भाव बना रहे तो सब सध जाता है।बस दोहराना होता है, मनन करना होता है जब आबे सन्तोष धन सब धन धूरि समान।

भय बिनु होय न प्रीत

 सफर जारी है...939

20.05.2022

शिक्षा सिद्धांत में कब का बदलाब हो चुका है कि सिखाने में दण्ड की भूमिका उतनी प्रभावी नहीं होती जितनी पुरस्कार की फिर पुरस्कार चाहे भौतिक रूप में हो या प्रशंसा और प्रोत्साहन के रूप में।शारीरिक दण्ड तो सिरे से ही प्रतिबंधित कर दिया गया है तो अब इसे भी बदल दिया जाना चाहिए कि लठ के आगे तो भूत भागते हैं,कि भय के बिना प्रीति नहीं होती।पाठशालाएं अब आनंदशाला में बदल रही हैं और अध्यापक उनके लिए सहायक और मार्गदर्शक के रूप में है।निश्चित ही यह सुखद स्थिति होनी चाहिए और सब जगह अनुशासन पसरा होना चाहिए।पर वास्तव में ऐसा है नहीं।अब जब सबको यह विश्वास हो गया है कि हमारा कोई क्या बिगाड़ सकता है, हमें कोई छू के तो दिखादे सीधे उसकी शिकायत कर देंगे, उसे आरोपित कर नौकरी से ही बाहर करवा देंगे तब से अनुशासन हीनता और बढ़ी है।लोग उच्छ्रंखल और मनमौजी होते जा रहे हैं, वे परम् स्वतंत्र न सिर पर कोऊ के भाव से जीते हैं, उन्हें किसी का डर ही नहीं रहा।मुंह उठायेदेर सबेर चले आते हैं और जब मर्जी हाथ हिलाए चले जाते हैं, वे निरंकुश होते जा रहे हैं और आप लिहाज में ही मरे जा रहे हैं कि शायद अब मान जाए और सुधर जाए।पर वे पक्के ढीठ और बेशरम हैं, काली कामर ओढ़े बैठे हैं, उन्हें कोई लाज नहीं आती।बड़े जोर से चिल्ला चिल्ला कर गाते हैं जाने करी शरम,बाके फूटे करम, जाने ओढ़ी बेशर्माई ताने खाई दूध मलाई।तो बेशर्म बन दूसरे के हिस्से को हड़प खुश होते रहते हैं कि देखो हमने तो किया भी नहीं और कैसे मजे लूट रहे हैं।

तो याद आता है कि अनुशासन में कोई लिहाज विहाज नहीं चलता, जो अनुशासन तोड़े उसे तुम तोड़ो।सीधी अंगुली से घी न निकले तो टेढी करो, बरतनभले ही तोड़ना पड़े पर घी पूरा निकाल लो।जिन्हें प्यार मोहब्बत की भाषा समझ नहीं आती, उनके लिएनियम बदलना ही होता है।लठ के आगे तो भूत भी भागता है फिर सारे लिहाज और तमीज एक ओर उठा के रख देनी होती है कि करो या भागो।नहीं है बस का तो सिस्टम से बाहर निकलो।नहीं आता है तो सीखो।इस भुलाबे में मत बने रहना कि इतनी कट गई तो आगे भी कट जाएगी।कटेगी बटेगी कुछ नहीं, स्वयम के कटने पिटने ध्वस्त होने की नौबत आ जायेगी।मार बदनामी होगी सो अलग, कच्ची हांडी बार बार चूल्हे पर नहीं चढ़ाई जाती।जैसा करो वैसा भुगतो।जितना शक्कर डालोगे उतना ही मीठा होगा न कम न ज्यादा।लिहाज की ए एम सीका पीरियड समाप्त हो गया, अब ये रिन्यू भी नहीं हो सकती तो उत्पाद ही बदला जाएगा।अब लगताहै कि बड़े बूढ़े ही सही थे जब वे कहते थे कि दो हाथ की दूरी बनाए रखना बहुत जरूरी है, इतने मीठे मत बनो कि लोग हलुआ का गप्पा समझ कर खा जाएं।ये भी याद रखो कि जो अति का सीधा होता है वह जल्दी काटा जाता है।देखा है न वन में सट्ट सीधे पेड़ सबसे पहले काट लिए जाते हैं और टेढ़े मेढ़ों को ऐसे ही छोड़ दिया जाता है कि इनसे कौन उलझे।तभी तो उनकी हिम्मत बढ़ती जाती है और वे हर किसी से उलझने को तैयार खड़े रहते हैं।

बदलते जमाने और परिस्थितियों के अनुसार स्वयम को बदलना बहुत जरूरी है।ऐसे जितने भी भस्मासुर हैं जिन्हें अमर होने कावरदान मिला हुआ है सबको शिवजी जी चाल से मोहिनी रूप धर नृत्य करते करते स्वयम के सिर परहाथ रखने को बाध्य करना होगा तभी इस गन्द से मुक्ति मिलेगी।जब स्वर की कोमलता का कोई असर न हो तब रुक्ष और क्रुद्ध होना ही पड़ेगा।ये रुक्षता ये क्रोध आपकी सारी नमी अवश्य सोख लेगा पर अब व्यवस्था बनाये रखने और दुष्टों को दंड देने का सही समयहै।सुधरने के बहुत बहुत मौके दे लिये, अब कोई गुंजाइश बाकी नहीं रही, थप्पड़ घूंसे लतियाने का समय बीत गया, अब तो अंतिम वार करो, इस पार या उस पार।या तो सुधरो या रास्ता नापो।सच में भय के बिना प्रीत नहीं होती।भय तो बहुत जरूरी हो गया, प्रेम स्नेह सब गए तेल लेने।अब शस्त्र उठाओ अर्जुन, इनका एक ही उपाय है।ये और कोई भाषा नहीं समझते।समझते होते तो कृष्ण के सन्धि प्रस्ताव ले जाने पर पांच गांव देने पर चुपचाप सहमत हो जाते पर इन दुष्टों ने तो उद्घोष कर दिया कि बिना युद्ध के सुईं की नोंक के बराबर भी जमीन नहीं देंगे तो युद्ध जरूरी है पार्थ।और ये जो तुम्हें अपने रिश्तेदार सम्बन्धी दिखाई दे रहे हैं ये सब अन्याय के भागी हैं।तुम इन्हें पहली बार थोड़े ही मारोगे ये तो बहुत बार मारे जा चुके हैं पर रक्तबीज की तरह फिर फिर पैदा हो जाते हैं, इन्हें अब समूल नष्ट करो।ये रामायण काल में भी थे हर युग में होते हैं।याद करो राम तीन दिन तक जड़ समुद्र के आगे रास्ता देने को अनुनय विनय करते रहे पर कोई फायदा हुआ क्या, नहीं न।तब लक्ष्मण ने क्रोध में आकर समुद्र को सोखने को वाण उठाया और जैसे हीशर संधान करने वाले थे कि समुद्र मणियों से भरा थाल लेकर उपस्थित हो गया और समुद्र पार करने को पुल बनाने का मार्ग भी बता दिया कि नाथ नील नल कपि दोऊ भाई, लरिकाई जे आशीष पाई, तिनके परस किये गिरि भारी।और समुद्र पर पुल बनकर तैयार हुआ, सेना पार उतरी, युद्ध जीतकर कर सीता को लाया गया।

तो ये सारे के सारे प्रसंग यही संकेतित करते हैं यही सीख देते हैं कि भय के बिना प्रीत नहीं होती, बोले राम सकोप तब भय बिनु होय न प्रीत।तो दुष्टों के संहार के लिए शस्त्र उठाओ अर्जुन, इसमें कोई पाप नहीं लगता बल्कि अन्यायी के वध से तो संसार प्रसन्न ही होता है।जो बात से सुधरें उनके लिए बात, जो डांट से सुधरें उनके लिए डांट और जो इन दोनों से न सुधरें उनके लिए ठुकाई पिटाई धुनाई ही मुफीद होती है तभी कहा गया कि भय के आगे भूत भागता है।तो उठा लो शस्त्र अर्जुन और सारे के सारे दुर्जनों का नाश करो जो कामचोर हैं, अपमुरादी हैं परम् स्वतंत्र है, निरकुंश हैं, स्वेच्छाचारी हैं।इन्हें मारने में कोई पाप वाप नहीं लगता।उल्टे पुण्य ही मिलता है।अब पाप मिले या पुण्य, वाणी रुक्ष हो या कोमल, कोई परवाह नहीं।बस आगे बढ़ा कदम पीछे नहीं उठना चाहिए, याद रखो मित्र भय बिनु प्रीत नहीं होती।

संशय विहग उड़ावन हारी

 सफर जारी है....938

19.05.2022

संदेह और जिज्ञासा से ही किसी प्रश्न की शुरुआत होती है और जब प्रश्न का उत्तर मिल जाए, जिज्ञासा का शमन हो जाये तो समस्या का समाधान मिल जाता है।यह एक सामान्य प्रक्रिया है और हम सबके जीवन में कमोवेश घटित होती है।कुछ प्रश्नों के उत्तर बहुत सरलता से मिल जाते हैं, उसमें किसी तर्क वितर्क की आवश्यकता नहीं होती, संभवतः ये सूचनात्मक प्रश्न होते हैं, क्या, कौन ,कब ,कहां की श्रेणी से सम्बन्धित।तो जैसे ही जानकारी मिलती है, मन तृप्त हो जाता है।बालक, विद्यार्थी और बुजुर्ग की जिज्ञासाएं लगभग एक सी होती है ...मसलन ये क्या है, कौन है, कहां से आया है, कहां जाएगा, कब जाएगा, कितनी देर रुकेगा, खायेगा या नहीं खायेगा,खायेगा तो क्या खायेगा क्या पसन्द है क्या नापसन्द है, बस इतनी जानकारी उनके लिए पर्याप्त होती है।छोटा बच्चा काले पक्षी को देखकर पूछता है ये क्या है आप कोयल या कौआ बता देते हो, वह मान जाता है।दिमाग में एक बिम्ब बिठा लेता है काला पक्षी यानी कौआ या कोयल,फिर उनके आकार की तुलना से एक और सूचना स्टोर कर लेता है कोयल छोटी कौआ बड़ा, कोयल मीठा स्वर कौआ कांव कांव।अर्थात सूचनात्मक प्रश्नों के उत्तर में स्वीकारोक्ति जल्दी हो जाती है।इसमें कोई संदेह या भरम की गुंजायश भी नहीं होती, जैसा कह दिया जाता है कमोवेश मान लिया जाता है।

रामचरित मानस तुलसी ने लिखी और रामायण वाल्मीकि ने, यह विवाद और तर्क का विषय नहीं है पर जो लिखा गया, उससे विद्वानों की सहमति असहमति हो सकती है।वैसे भी अब विज्ञान अपने चरम पर है तो जिसे सिद्ध कर दिया जाए,जो तर्क की कसौटी पर कसा जा सके, उसे ही स्वीकारा जा सकता है,उसी की जय जय हो सकती है ,आस्था और  विश्वास गए तेल लेने।उनकी भला क्या औकात जो तर्क के दरबार मे  अंगद की तरह पैर जमा सकें।अप्रिय भले ही हो पर सत्य ही पुजना चाहिए तभी सत्यमेव जयते की डुगडुगी बज सकेगी ।अब कृष्ण जी युधिष्ठिर के अश्वत्थामा हतो कहते अपना पांचजन्य बजाने नहीं आते जिसकी शोर में नरो वा कुंजरो की आवाज दब जाए।अब तो सब खुले खजाने होता है, जो है वह है और वह सब के सामने आना जरूरी है।रचनाकार अपने आसपास जैसा देखता है, उसे कलम से उकेर भर देता है।जैसा वह अनुभव करता है ,जैसा उसे उचित लगता है, अपनी बात कह देता है।अब रचनाकार तो मर मुल्तान गये और हम आलोचक और व्याख्याकार वर्तमान सन्दर्भों में उनके लिखे को  इतना घोट पीस रहे हैं, इतने अर्थ और अनर्थ कर रहे हैं कि यदि वे उपस्थित होते तो सिर पकड़ कर बैठ गए होतेकि हाय राम, ये मैंने क्या लिख दिया।

        अब  तुलसी बाबा को ही ले लो जो पता नहीं किस धुन में लिख गए शूद्र गंवार ढोल पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी।मार विमर्श मचा हुआ है पर निष्कर्ष पर कोई नहीं पहुंच पा रहा है।कहने को तो लंबी लंबी चर्चाएं होती हैं, खूब द्रविड़ प्राणायाम किये जाते है पर परिणाम सिफर ही रहता है।अरे भाई जो गलती पर होगा ,उसे सुधारने के लिए छल बल ,साम दाम दण्ड भेद का प्रयोग किया ही जायेगा, किसी को पुचकारा जाएगा ,किसी को दुत्कारा जाएगा, अब इसका मतलब ये थोड़े ही हुआ कि हम उसके दुश्मन हो गए।घर में चार बालक हों तो माँ सब से उनककी प्रकृति के अनुसार व्यवहार करती है, कोई आंख दिखाने से ही चुप हो जाता है तो कोई लात घूंसे खाकर भी दीठ का दीठ बना रहता है।उसे कुटे पिटे बिना चैन ही नहीं आता।तो लंबी लंबी चर्चाएं भले करते रहो,अगले को सही गलत भले से ठहराते रहो उनकी व्याख्या को सही गलत भले ठहराते रहो, तुलसी बाबा तो उनका जबाब देने आने से रहे।तो खुद ही उलझो और खुद ही सुलझो।खूब तर्क गढो, गर्मागर्म चटपटी बहस करो और खुद से ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचे बिना उसे डिस्पर्स कर दो।सब तुम्हारी मर्जी।

        पर इसमें कोई शक शुभा नहीं है कि राम चरित की कथाएं बोध जगाती हैं, सुंदर हैं, अनेक संदेहों का निवारण करती है, जीवन जीने के सूत्र दे देती हैं।सिखाती हैं कि काहे का अभिमान करते हो, सीखो हनुमान से जो लंका को धू धू कर जला देते हैं पर प्रभु के पूछने पर मात्र इतना ही कहते हैंसो सब तव प्रताप रघुराई, नाथ न कछू मोरी प्रभुताई।राम कथा सुंदर करतारी, संशय विहग उड़ावन हारी।तो पढ़ते दुहराते रहिये राम कथा को, चर्चा परिचर्चा करते रहिए, इस सब ब्याज से भी आप उसी राम को याद करते हैं जो रघुकुल नायक है, जिनके नाम मात्र से भव सागर पार हो जाते हैं।राम का नाम बड़ा सुखदाई।चर्चा परिचर्चा का जो भी परिणाम हो पर हमें तो राम चर्चा सुनने को मिल ही गई न, तो हम तो अपने भाग्य सराहते हैं कि ऐसे सत्संग का सुयोग जल्दी जल्दी मिलता रहे।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...