Wednesday, August 17, 2022

बनो तो कर्मवीर बनो

 सफर जारी है......1006

26.07.2022

बनो तो कर्मवीर बनो......

अपने अपने पाल्यों को अभिभावक चिकित्सक,अभियंता, चित्रकार, आईं ए एस, पी सी एस अधिकारी, शिक्षक, आर्किटेक्ट और जीवन के जितने भी अनुशासन हो सकते हैं, उनके प्रमुख बनाने , उन प्रकल्पो का हिस्सा बनने का स्वप्न संजोते हैं, उन स्वप्नो को पूरा करने में धन संपत्ति और अपनी सारी ऊर्जा लगा देते हैं पर वे उनमें इतना गौरव बोध नहीं भर पाते कि कोई भी कार्य छोटा बड़ा नहीं होता। मर्जी जिस क्षेत्र में चले जाओ, अपना सौ प्रतिशत दो, काम के प्रति प्रतिबद्धता रखो, सत्य के रास्ते चलो, व्यवहार प्रतिमानों का उल्लंघन मत करों, शिष्टता के दायरे में रहो यानी कर्मवीर बने रहो तो तुम दुनिया फतह कर सकते हो।

              कभी धन प्रभावी हो जाता है तो कभी सिफारिश का बल, योग्यता हो न हो पर सिफारिश और वह भी किसी उच्च ओहदे प्राप्त व्यक्ति की हो तो शत प्रतिशत काम कर जाती है। ये सिफारिश भी व्यक्ति की ज़िंदगी में बड़ा रोल निभाती है। आपके और आपके कार्य के विषय में पूरा आंकलन कर बिना किसी दवाब के स्पष्ट शब्दों में नियमानुसार संस्तुति करना एक बात है और केवल अधिकारों का प्रयोग कर जबरदस्ती किसी को निर्देशित करना दूसरी। हम किस समाज में रहते हैं दुर्भाग्य से दूसरे प्रकार की सिफारिश अधिक प्रभावी है।

              अरे अपने अपने पाल्यों को प्रारंभ से ही कर्मवीर बनाने में क्यों नहीं जुट जाते। कितने विस्तार से कर्मवीर लंबी कविता में समझाया गया है कि कर्मवीर कौन होते हैं। देखकर बाधा विविध बहु विघ्न घबराते नहीं, रह भरोसे भाग्य के दुख भोग पछताते नहीं, काम जितना भी कठिन हो लेकिन उकताते नहीं, भीर में चंचल बने जो धीर दिखलाते नहीं, हो गए एक बार में उनके बुरे दिन भी भले, हर जगह हर काल में वे ही मिले फूले फले। पर्वतों को काटकर रास्ते बना देते हैं वे, सैकड़ों मरुभूमियों में नदिया बहा देते है भी, है काम कौन सा ऐसा जो उनसे नहीं होता भला। केवल पहले अनुच्छेद की पंक्तियां ही आचरण का विषय बन जाए तो सफलता स्वयं ही चरण चूमने चली आती है। पर सफलता के ये रास्ता बहुत कम लोगो के चयन का विषय बनता है। लोगों का शॉर्टकट में विश्वास अधिक है।

              मन से दुर्बल हैं इसलिए जरा सी भी विपत्ति आते हायतौबा मचाने लगते हैं, हाइपर हो जाते हैं, मार घबराते हैं कि अब कया होगा, कैसे होगा, मेरे पास तो न धन का बल है न सिफारिश का, मैं तो ज़िंदगी में कभी आगे बढ़ ही नहीं सकता। पर वे यह भूल जाते हैं कि इन सबसे बड़ कर आत्म बल और धैर्य का बल होता है, निरंतर कार्यशीलता होती है। विघ्न बाधाएं तो जीवन का हिस्सा हैं, जीवन की राह समतल होती कब है, उसमें तो ढेर खतरनाक मोड़, रपटन, कांटे, पथरीला पन होता ही है, पर उनके डर से हाथ पैर छोड़ कर बैठा नहीं रहा जा सकता, उन सब को पार करते अपनी मंजिल, अपने लक्ष्य को साधना होता है। भाग्य के भरोसे छोड़ हाथ पर हाथ धरे बैठे नहीं रहना होता, दुख भोग पछताना नहीं होता बल्कि अपनी निरंतर कार्यशीलता से उन बाधाओं पर विजय पानी होती है। काम की कठिनता को देख कर जी नहीं चुराना होता, बार बार ये नहीं कहना होता कि हमसे तो होगा नहीं, हो ही नहीं सकता। जितनी बार आप इन निराशा पैदा करने वाले वाक्यों को दोहराते हैं आपका मनोबल कम होता जाता है और आप अंतत उस ककार्य में असफल हो जाते हैं। दरअसल आप प्रारंभ से ही ये मानस बना चुके होते हैं कि मुझसे नहीं होगा। आपकी शक्ति लगातर क्षीण होती जाती है। तो हमेशा सकारात्मक बने रहिए। काम की कठिनता से उकताएं नहीं, आप के स्थान पर उसे जो भी करेगा, वह भी आप जैसे दो हाथ पैर का स्वामी होगा, वह चतुर्भुज या चतुरानन या दशानन नहीं होगा। तो जब कोई अन्य कर सकता है तो आप क्यों नहीं। संकल्प की शक्ति बहुत बडी होती है, पांच फुटी मानव इतने बड़े बड़े जलयान और जलपोत को उड़ा और खींच ले जाता है। मुसीबत कठिनाई आने पर मन की चंचलता बढ़ जाती है, धैर्य जबाब दे जाता है। पर इन सब से कार्य सिद्धि नहीं मिला करती।

                 और जो दुर्दिन बुरे समय का रोना रोते बैठे रहते हैं मार खीझते और झींकते रहते हैं उन्हें याद दिलाना जरूरी है कि कर्मवीर इन सबको बाधा के रुप में लेता ही नहीं, ये सब तो प्रेरक हैं। फिर से रेखांकित करते हैं हो गए इक आन में उनके बुरे दिन भी भले, हर जगह हर काल में वे ही मिले फूले फले। तो करना ज़रुरी है, ईमानदारी ज़रुरी है और निरंतरता ज़रुरी है। और जो संकल्प ले लिया तो पर्वतों को काटकर मार्ग बनाना या मरुभूमि में नदियां बहा देना सरल हो जाता है। ऐसी प्रेरणास्पद कविताएं केवल कक्षा में पढ़ने पढ़ाने, अर्थ, व्याख्या, प्रश्न उत्तर और शब्दार्थ लिखने के लिए ही नहीं हुआ करती, ये तो जीवन बदल कर रख हैं। बस उन्हें दिन भर गुनगुनाने और आचरण में लाये जाने के प्रयत्न जरूरी हैं। जब आप दिन भर ऐसे अंशों को गाते दुहराते हैं तो आपका मानस भी वैसा तैयार होता है। तो कर्मयोगी बनने के प्रयास में लगे जरुर रहिए। देर सबेर सफलता मिलेगी अवश्य।

मेल मुलाकातें

 सफर जारी है....1005

25.07.2022

मेल मुलाकातें.......

जीवन स्वयं में एक यात्रा है। जीवन पर्यंत हम मानुष न जाने कितने कितने व्यक्तियों से मिलते जुलते हैं, कितने कितने स्थानों को देखते हैं, कुछ स्मृति में ऐसे कैद होते जाते हैं कि भुलाए नहीं भूलते, बार बार स्मृति पटल पर छा जाते हैं, हम बार बार किसी न किसी ब्याज से उन्हें याद करते रहते हैं और कुछ ऐसे गायब हो जाते हैं कि गधे के सिर से सींग। कुछ महत्वपूर्ण क्षणों को हम एल्बम में कैद कर संजो लेते हैं और उन पन्नों को जब मर्जी उलट पलट कर देख लेते हैं, उनमें धूप हवा लगाते हैं और फिर स्मृति मंजूषा को बंद कर देते हैं। जैसे जैसे समय बीतता जाता है, यादें धुंधली पड़ती जाती है। ये हम सबके साथ कमोवेश घटित होता ही है।

           ज्यादा ही सौभाग्यशाली हुए तो हर पड़ाव में इतने इतने स्नेही स्वजन मिल जाते हैं कि उनका स्नेह झोली में नहीं समा पाता, झोली छोटी पड़ जाती है तब दो चूंटी चावल और नेक से दूध की याद आती है जिसे बाल गणेश दादी अम्मा के पास लेकर पहुंचते है खीर बनवाने को और खीर उबल उबल कर इतनी अधिक हो जाती है कि बड़ी बड़ी नादों में भी नहीं समा पाती, सदावृत बांटने के बाद भी इतनी बच जाती है कि उसे मिट्टी में गाड़ना पड़ जाता है और वह सब हीरे मोती में बदल जाती है। जीवन के हर छोटे बड़े पड़ाव पर मुझे भी भले लोग बहुत मिले हैं। एकदम फिट और टिपटाप, व्यवहार में दक्ष, खूब कुशलता से अपनी बात रखने वाले, पहली भेंट में ही दिल में उतर जाने वाले, कौली भर गले मिलने वाले, बिछुड़ते पनीली आंखों के साथ विदा लेने वाले और फिर मिलने का वायदा करने वाले। बेलगांव और मैसूर के एक डेढ़ दिनी ठहराव ने भी खूब संपन्न कर दिया। उजास से भरे सेंट फिलोमिना विद्यालय के कार्य तत्पर विद्यार्थी, वहां का दक्ष स्टाफ, अतिथियों को हाथो हाथ लेने का भाव, सुदूर स्थानों से पधारे हिंदी साधकों का हिंदी प्रेम, समृद्ध मंच, प्रतिबद्ध हिंदी प्रेमियों के छोटे छोटे दलों से आत्मीय मुलाकात, उनकी भाषाई दक्षता सभी कुछ साये की तरह मेरे साथ चला आया है।

          बेलगुंदी में कांग्रेस कुआं, आनंदेश्वर मंदिर, काका कालेलकर की बहुत बहुत पुरानामकान जिसमें वे बालपन में पांच छह वर्ष रहे, वहां की नगर पंचायत प्रधान हेमा जी और बुजुर्गवारों का स्नेहाशीष, यादव जी का स्नेहिल आतिथ्य , एयरपोर्ट अधिकारी की कार्य तत्परता के साथ साथ अदभुत चित्रकारी, जंगल में मंगल रचा देने की काबिलियत कभी भी भुलाई नहीं जा सकती। मैसूर में कितने कितने नए परिचय जुड़ गए और स्नेहिल संबंधों की पुस्तक और मोटी हो गई। जब स्वस्थ और सकारात्मक भाव से दिल से मिला जाता है तो दृष्टि भी बदल जाती है। फिर सामने वाले में केवल और केवल नुस्ख ही नहीं निकाले जाते, उनकी आलोचना ही नहीं की जाती बल्कि उनके व्यक्तित्व के प्रभावी पक्षों को सराहा जाता है और जो समझ में नहीं भरता उसके प्रति उदासीनता बरत ली जाती है। किसी का सुघड़ मंच संचालन भा गया तो किसी की साफगोई, किसी की बात कहते कहते भावुकता का चरम भिगो गया तो किसी की भाषा प्रेम और भाषाई दक्षता ने मन जीत लिया।

          स्थान कहां पीछे रहे भला, मैसूर पैलेस का भव्य सौन्दर्य, चामुंडी मंदिर तक जा मां के दर्शन का सौभाग्य न मिल पाना शायद अभी तपस्या पूरी न हुई हो या दुबारा आना निश्चित हो। वृंदावन गार्डन के संगीतमय फव्वारे जैसे गीत के बोलों पर थिरक थिरक कर नृत्य कर रहे थे, भीड उमड़ी पड़ रही थी , इतना विशाल जन सागर, सब के सब उत्साह से लबरेज थे एकदम मेले जैसा दृश्य, वही भरे भरे बाजार, बच्चो को कंधे पर बिठाए माता पिता,  गुब्बारे लेने को मचलते जिद करते बालवृंद और युवाओं की उत्साहित टोली। सारे के सारे दृश्य आंखें समेट रही हैं, सब साथ जो ले जाने का मन हो आता है। बस, अब कुछ ही घंटों में जेसे उड़ जहाज को पंछी फिर जहाज पर आबे, अपने जहाज पर लौट आना है। तो बस सब को दिल में बसाए चले चलते हैं।

देखि दिना को फेर

 सफर जारी है........1003

24.07.2022

देखि दिना को फेर.........

जब हवा का रुख विपरीत दिशा में हो तो ताकत लगाने की बजाय चुप बैठना ज्यादा फायदेमंद है। तेज हवाओं को दूसरी दिशा में मोड़ पाने में अपनी सारी शक्ति लगा देने से ज्यादा बेहतर है तेज तूफान में घास की माफिक जमीन पर लेट जाना और तूफान के गुजर जाने पर जिजीविषा से सिर ऊंचा कर खड़े हो जाना। जो अकड़ के एवज में ऐंठ के मारे पैठ कू जाते हैं , वे अपनी शक्ति भी बेजा करते हैं और ठनठन गोपाल रह जाते हैं तो स्थितियां अनुकूल न हो तो कुछ समय के लिए शांत भाव में बैठना ज्यादा श्रेयस्कर है। कौन दिन बारह मास एक समान रहते हैं। दिन की तो छोड़ो, सबको शीतलता देने वाला चंदा भी एक समान कब रहता है, कभी घटते घटते बिल्कुल विलुप्त हो जाता है तो कभी सोलह कलाएं बढाते बढाते अपने पूर्ण रुप में शोभित होता है और पूर्णिमा के चांद सा अभिहित होता है, सबका प्रेमासप्द बनता है और सब उसे देख अर्घ्य देते व्रत का पारण करते हैं।

चंद्रमा वही रहता है पर दिनों का फेर उसे मावस से पूर्णिमा की यात्रा करा देता है। और चांद को देखो न विलुप्त होता टूटता है और न पूर्ण होता उछलता है। जानता है वह कि जब पूर्णिमा ही शाश्वत नहीं होती तो अमावस की काली रात कौन लम्बी बनी रहने वाली है, कभी तो काली अंधियारी रात ढलेगी और सुबह का सूरज सारे तमस को चीर जगत को रोशन करता दिपदिपाता प्रखर तेज सा सबको आंख चोंधियाने पर विवश कर देता है। सो जब जब संक्रांति काल हो चुप लगा जाओ, ज्यादा बहस में मत पड़ो, तर्क वितर्क मत करो क्योंकि यह बेकार की बहस को जन्म देगा और परिणाम शून्य का शून्य रहेगा।

तो कभी कभी सब आते जाते, जानते बूझते मौन होना ज्यादा सुखकर होता है। उस समय को उका जाइए , ज्यादा तीन पांच मत कीजिए, कोई सफाई स्पष्टीकरण मत दीजिए क्योंकि जो आपको समझते हैं उन्हें समझाने की, तर्क वितर्क करने की जरूरत नहीं और जो मन में रेसा पाले बैठे है, वे आपको हर बात पर गलत ही ठहराएंगे चाहें आप रत्ती भर भी दोषी न हों। तो सामने वाले को ये अवसर मतहो दीजिए कि वह आप पर हावी हो सके, बात बात पर आपको नीचा दिखाने की कोशिश करे, आपको यह अहसास दिलाए कि आप आज जो भी कुछ भी सब उसके रहमो करम पर हैं। तो किसी से भी अनड्यू मत लीजिए। जितना है अपनी झोली में, उसी में गुजारा करना सीखिए। भीख से कभी किसी का पेट नहीं भरा करता और मान लो एक बार को पेट भर भी जाए तो नीयत कभी नहीं भरा करती, नादीदे की तरह हमेशा हाथ फैलाए खडा रहता है। 

       तो करते रहिए अनासक्त भाव से कर्म, मत बंधिए किसी लालच से, अपने बाहुबल पर भरोसा बनाए रखिए, कर्मवीर बने रहिए और संभल संभल कर चलते रहिए अपने निर्दिष्ट पथ पर । जो आपको समझना नहीं चाहते, वे आपके लाख समझाने पर भी नहीं समझेंगे। रहीम को दोहराते रहिए चुप हो बैठिए देख दिनन को फेर, जब नीके दिन आइए तनिक न लागे देर।

ही और भी की महिमा

 सफर जारी है....1002

22.07.2022

ही और भी की महिमा.......

लम्बे समय से अनुभव कर रही हूं कि यदि आप सभा गोष्ठियों में लोगों से मिलते जुलते खुद अपना परिचय देने में संकोची हैं , इस बात में विश्वास रखते है कि अरे अपने विषय में क्या बताना, अगला उचित समझेगा तो आप ही बता देगा और नहीं भी बताएगा तो कौन कद कम हुआ जाता है, रहेगें तो वही न, जो हैं। न कद बदलेगा और न नाम बदलेगा और न काम धाम । तो काहे चिन्ता की जाय। ओढ़ के रजाई खूब खर्राटे मारकर नींद पूरी की जाए। अरे इतना ही होगा न अमुक ही होगा और आप भी की श्रेणी में पहुंच जाएंगे।

ये ही और भी की कहानी भी अजब गजब है एक को सिंहासन पर बिठा देते हैं तो अगले की सत्ता पर खतरा मंडराने की स्थिति आहूत कर देते हैं। सच ही है हाथ आई बाजी भला छोड़ी भी क्यों जाए, फिर मौका मिले न मिले तो आज ही अच्छे से कस के निचोड़ लो। बड़े होना और बड़प्पन बनाए रखना दो अलग अलग बाते हैं। कितनी कितनी बार तो सुना सुनाया होगा बड़े बड़ाई न करें बड़े न बोले बोल, रहिमन हीरा कब कहे लाख टका मेरा मोल। अब इस नीति पर चलें तो बैठे रहो कम्बल ओढ़ के, कोई पूछने नहीं आ रहा। किसी को कया पड़ी है जो आपकी आरती उतारे, आपके विषय में गूगल पर सर्च करें। अरे अगला ये सब तब करता है जब उसका कोई काम अटका पड़ा हो, आपके बिना निठ ही नहीं रही हो। तो आप पहले ये डिसाइड करो कि आप ही की कोटि में रहना चाहते हो या भी में भी खुश हो। भी कभी मूल नहीं होता, उसकी कोई वव्यक्तिगत सत्ता भी नहीं होती, वह पलोथन जैसा होता है जो है तो ज़रुरी पर उसकी अपनी कोई सत्ता नहीं है। बस साथ में पिछलग्गू सा लगा रहता है और ही हमेशा उसे अपने से एक केटेगरी नीचे ही रखता है। बराबरी पर नहीं रखता।

परिचय देते कहता है आई एम सो एंड सो, अपनी पूरी उपलब्धि विस्तार से बताता है और बाद में एक टैग सा उछाल देता है हां ये भी हैं। अरे तो क्या हम दुम छुल्ले हैं। बताते तो पूरी बात बताओ नहीं तो चुप लगा जाओ। अगले को जरूरत होगी तो बता देगा अपनी जन्म कुंडली नहीं तो मुंह में दही जमा के बैठ जाएगा। पर भी की केटेगरी में तो बिलकुल भी शामिल नहीं होगा। और क्यों हो भला, अरे जैसा भी है जो भी है उसकी अपनी सत्ता है, उसका अपनाआभा मंडल है, उसका अपना व्यक्तित्व है, उसका अपना नाम है काम है छोटा बड़ा जैसा भी हो।

सो बनो तो ही ही बनो, मैं ही हूं,पूरी तरह हूं और जब तक दम में दम है ही ही बने रहेंगे। क्यों बने भी, भी से तो लगता ही ऐसे है जैसे हमारी कोई आवश्यकता ही नहीं थी, हम तो सब्जी के साथ धनिया बन तुल गए या गेहूं के संग बथुए को भी पानी लग गया। न जी न, हमें नाय बननो बथुआ, हम तो गेंहू ही भले।

यात्राओं के मध्य

 यात्राओं के मध्य.....

सभी यात्राएं शुरू तो जीरो माइल से ही होती हैं पर नन्हे नन्हे बढ़ते कदम उसे इकाई से दहाई, दहाई से सैकड़ा ,

 सैकड़ा से हजार, हजार से दस हज़ार और लाख तक ले जाते हैं । लाख से आगे भी दस लाख, करोड़, दस करोड़, अरब, खरब, नील, पद्म ,शंख और उससे भी आगे जहां है पर सब अपनी अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही चल पाते हैं। तो आज हजार कदम नापते मन में उमंग जागी है, देखें कितना और चल पाते हैं। फिर अंदर से आवाज आती है.....चल चला चल ओ राही चल चला चल । हिम्मत न हार, चल चला चल। अब जब तक चला जा रहा है खूब चल रहे हैं। मन है तो चले चलते हैं, कोई दबाव तो है नहीं , न किसी की गाय भैंस खोली है कि चलना ही चलना पड़ेगा। पड़ेगा से ही तो बाध्यता शुरू होती है, कसमसाहट होती है, मन उचट जाता है फिर आप नहीं चलते, मजबूरी आपको चलाती है। और जहां मजबूरी होती है वहां मन से नहीं चला जाता। हर दो कदम के बाद कुड़कुड़ाते है , भुनभुनाते हैं, चिड़चिड़ाते हैं और दो कदम भी ऐसे चलते हैं जैसे आफत आ गई हो। मुंह सिकोड़ लेते हैं, पैर तो ऐसे आगे बढ़ाते हैं जैसे हाथ पैरों में जान ही न हो । तो ऐसे बेमन से कोई सौ हजार कदम थोड़े ही चला जाता है।

 चलो तो जिंदादिली से चलो, जब तक मन हो तब तक चलो, हंसते मुस्कराते चलो, झूमते झामते चलो। झींको मत भिनको मत, अहसान सा मत पटकते रहो। खूब घूमो फिरो, मस्ती के भाव में जीओ । और सुनो ,ये यात्राएं हमेशा एक स्थान से दूसरे स्थान को जाते पैदल ,बस ,टैक्सी ,रेल, हवाई जहाज, पानी के जहाज से ही नहीं होती ।मन से, विचारों से, शब्दों से आप जगत की यात्रा घर बैठे ही कर सकते हो। देखा है न शब्द ही स्थाई होते हैं फिर चाहे वे किताबों में सोने जैसे अक्षर का रुप ले पृष्ठ दर पृष्ठ अंकित होते जाएं या मुख से निसृत होकर, बोले जाकर पूरे आकाश में ध्वनित होते रहें । देखा है न किसी ऊंची पहाड़ी या खाली इमारत में आवाज कैसे गूंजती है और हम कैसे अपने ही उच्चरित शब्दों की प्रतिध्वनि सुनकर हर्ष से भर उठते हैं। देखा है न एक अध्याय और दूसरे अध्याय के बीच कुछ न कुछ जुड़ाव बना ही रहता है। तो एक यात्रा से दूसरी यात्रा के मध्य भी कुछ बातें सेतु बनती है। कुछ अच्छा लगता है कुछ बुरा, कुछ जुड़ता है तो कुछ छूटता भी है। हां, किसी के विषय में दूसरों से सुनी सुनाई बातों के आधार पर निर्मित ऊंटपटांग अटकलें टूटती हैं। पूर्व धारणाओ में सुधार कर लिया जाता है। अब यात्रा करते, पढ़ते पढ़ाते, बतियाते  आप लोगों से, उनके शहरों और प्रांतों से रूबरू होते हैं, उनके घर परिवार और कार्यस्थल में जाकर मिलते हैं, उन्हें प्रत्यक्ष रुप से सुनते हैं, उनके व्यवहार को मायन्युटली ओबजर्ब करते हैं,उनके मित्रो साथियों से मिलते है तो आप हर बार नए अनुभवों से भर उठते हैं। हर बार आपकी गलत धारणाएं टूटती है और आप पुनर्नवा होते हैं।

        तो दो यात्राओं के मध्य का समय बड़े सोच विचार का होता है, अपने को परिमार्जित करना होता है, गलत धारणाओ से मुक्त होना होता है और तो और जब आप विचारों की यात्रा नहीं कर रहे होते, लिख नहीं रहे होते तो आप सबसे अधिक लिख रहे होते हों यानी लिखने की प्लानिंग कर रहे होते हैं। तो करते कराते रहिए यात्राओं के मध्य के समय का प्रयोग और बनाए रखिए अपने को जिंदादिल और जीवंत।

गरजत बरसत सावन आयो रे

 सफर जारी है...999

20.07.2022

गरजत बरसत सावन आयो रे.....

अब सावन को आना तो बादलों की गड़गड़ाहट , बिजली की तड़तड़ाहट और बारिश की फुआरो के साथ ही चाहिए था पर अब के सावन सूमसाम सा प्रवेश कर गया है, कर क्या गया ,चार पांच दिन भी बीत गए सूखे सूखे में।लगता है आगरा शहर से मेघा रूठे रूठे से हैं, देश भर में खूब बरस रहे हैं, बरस ही नहीं रहे, इत्ती जोर से बरस रहे हैं कि कहीं बादल फट जाते हैं तो कही सब बहा के ले जाते हैं। अब के तो पूजा पाठ से मानेंगे के जोर जोर से गानो पड़ेगो काले मेघा पानी दे, पानी दे गुड़धानी दे । भूरो बादल पानी लावे, कारो बादर जी डरपानबे और जो  कछु याद न आए तो बालपन में पड़ी काई बाई कविता ए गा लेयो ....अम्मा जरा देख तो ऊपर चले आ रहे हैं बादल, गरज रहे हैं बरस रहे हैं दीख रहा है जल ही जल। हवा चल रही क्या पुरवाई भीग रही डाली डाली, ऊपर काली घटा घिरी है नीचे फैली हरियाली। भीग रहे हैं ताल बाग वन भीग रहे हैं घर आंगन,बाहर जाऊ मैं भी भीगूं चाह रहा है मेरा मन।

         पर चाहिबे ते कछु नाय होत भईया। काऊ जोतिशी से पूछो कि का करिबे ते मेघा झड़ी लगाएंगे। मोय तो जे लग रई  है कि आधो सावन ऐसे ई उमस और घमस में ही निकल जाएगो।बहुत भयो तो अमावस बीते नेक बूंदाबादी हे जाय तो है जाय पर लच्छन लग नाय रये बरसबे के। और जे मान लेयो कि कछु सी बूंद परऊ गई तो जमीन ऐसी दहक रई है कि दो तीन पोत की बारिश तो ऊंट के मुंह में जीरा दाखिल होयेगी, नेक बूंदन ते का प्यास बुझेगी धरती मैय्या की, चुप्प पी जाएगी पांच छह बारिश तो। अब तुम जानो कैसी तपी है जेठ बैसाख और अषाढ़ भर।इत्ते पानी ते कछु नाय होने को। बोई डोर है जावेगो कि नंगो न्हायगो कि निचोड़ेगो।     

 पर भईया मानुष के हाथ में कछु नाने, अब पैइसन से थोड़ी खरीदी जाबेगी बारिश कि हम तो बौत अमीर है कि बारिश हू खरीद लिंगे। धूप बादल चंदा सूरज तो अरबपति पे हू नाय खरीदे जा सके। एक जे ई तो बचे हैं बाकी तो सब खरीद लियो ई समझो। सो हम बार तो बादल की आस लगाए बैठे है कि खूब जम के बरसे बदरा और रेडुआ में गानो बजे.... बरखा रानी झूम के बरखो।अब हम बहन बेटीन ने तो बाबुल के अंगना जाके खूब झूलबे को मन कर रयो है के हरियाली तीजें आए तो हम सखी सहेली मिल के ऊंची ऊंची पेंग भर के, एक दूसरे ए झोटा दे के खूब जोर जोर ते गाबें कि गोवर्धन को बीजना हरियाली तीजें आबेंगी, मेरी दादी लीपे चौंतरा मेरे बाबा फूल बिखेरंगे के अमुआ के लंबे चौड़े पत्ता पपिहा बोले के अरी मेरी बहना सातों सहेली चलो संग झुला पे चल के झूल लें, कैसी खड़ी हो री बहना अनमनी अरी बहना कैसो तिहारो सत्संग झूला पे चल के झूल लें। चम्पा चमेली वन में जायके, अरे बहना मन में तो उठी है उमंग झूला पे चल के झूल लें। अरे साठ पार हो गए तो क्या झूलने और गाने पर बैन लग गया, मैय्या बाबुल स्वर्ग सिधार गए तो भैया भाभी दीदी छुटकी सब तो है, सो हम तो खूब मगन है के गांगे कि बहुत दिना है गए बलम जी मैं पीहर कू जाऊंगी, और भैया आ गयो मोय लिबाबे झूला झूलबे जाऊंगी मैं तो खूब खूब बतराऊंगी। सावन तो बहन बेटियों के लिए पीहर मायके की सौगात लेकर आता है, मन कैसा हिलोरें लेता है, अपने बचपन की सखी सहेलियों से मिल कैसे हरखा जाता है, दुनिया भर के काम काज एक तरफ और सावन की तीज कजली दूसरे पलड़े में। ये त्योहार सारी खीझ, सारा दबाव सारा तनाव सब उड़नछू कर देते हैं। मन कैसा हिंडोले सा दोलायमान होता है।

         तो आते रहें ये सावन भादों, तीज राखी के त्योहार, मनाती रहे आधी आबादी अपनी खुशियां, झूले जाते रहे झूले, पड़ते रहें नीम और आम की डाल पर मोटी रस्सी के झूले, खोजी जाती रहे पटलियां, दिए जाते रहें झोटे, बढ़ती रहें पींगे और गूंजती रहे सावन के गीत मल्हार, बहन बेटियां जाती रहें मायके, इनका मन हरखता रहे और गरज बरस के साथ सावन की फुआरें सबके मन को भिगोती रहें।

बहनापा/भाईचारा

 सफर जारी है....996

17.07.2022

बहनापा/भाईचारा......

संबंध निभाना भी एक कला है। एक वे हैं जिनसे अपने गिनती के चार रिश्ते नहीं निभते और दूसरी तरफ वे हैं जो निजी संबंधों के साथ साथ बहनापे और भाईचारे को भी सहजता से निभा ले जाते हैं। वसुधा को कुटुंब ऐसे ही थोड़े कहा गया है। और फिर वसुधा धरती मां है तो उस पर बसने वाले सभी जन भाई बहन ही हुए न, स्कूलों में प्रतिज्ञा करते भी यही दोहराया जाता है भारत हमारा देश है,हम सब भारत वासी भाई बहन है। फिर ये बहनापा और भाईचारा गुम कहां हो जाता है। हमारे संबंधों में सहजता क्यों नहीं रहती, हम एक दूसरे के प्रति कटु और संवेदन शील क्यों हो जाते हैं, एक दूसरे से क्यों झगड़ते हैं, एक दूसरे की आलोचना करते बाज क्यों नहीं आते।

यह सब निर्भर करता है कि आपका किन लोगो से पाला पड़ा है, आप किन लोगों के संपर्क में आए हैं, आप दूसरों के प्रति कैसा सोच रखते हैं। मेरे कार्य क्षेत्र ने मुझे देश के विभिन्न प्रांतों के विद्यार्थियों, शिक्षकों और अन्य अन्य लोगों से मिलने का सुअवसर दिया है। जिस मर्जी कोने में चले जाइए, भरपूर प्यार और आदर मिलता है । ये उन की खूबी है। उत्तर भारत में तो रहते ही हैं पर दक्षिण भारत, पूर्व और पूर्वोत्तर,पश्चिम में भी स्नेहिल संबंधों का दायरा बहुत विस्तृत है। कभी कभी तो लगता है जितना मेरी झोली में डाला जाता है, जितना स्नेह और आदर मेरे हिस्से में आता है, जितना स्वागत और सत्कार भाव मुझे मिलता है, उसका प्रतिदान तो कई कई जन्मों में भी संभव नहीं। शायद स्नेह भाव प्रतिदान मांगा भी नहीं करता, प्रभु बस ये सद्भाव बना रहे इतनी ही प्रार्थना है।

महाराष्ट् कई बार आना हुआ, नागपुर में लंबा प्रवास भी रहा पर इस बार शेवगांव और अहमद नगर के अनुभव यादों में प्रभावी बन गए। शिरडी एयरपोर्ट पर प्रो पुरुषोत्तम जी और प्रिय संजय का स्वागत भाव, शिरडी जी के दर्शन, संत ज्ञानेश्वर जी की साधना स्थली, प्रकृति की अद्भुत छटा, गोष्ठी में गणमान्य लोगों से भावभीनी मुलाकात, पुरषोत्तम कुंदे जी का सधा नेतृत्व दिल में गहरे पैठ गया। लोग बहुत करते हैं तो पैसा खर्च कर आपको व्यवस्था उपलब्ध करा देते हैं पर आपकी रूचि को ध्यान रख परिवार को कष्ट दे आपको मनचाहा भोजन परोसना छोटी बात नहीं होती। क्या देविका जी का प्रेम भाव भुलाए जाने की वस्तु है। फिर शेरके जी का शेवगांव से अहमद नगर की यात्रा, वहां के इतिहास की जानकारी, चांद बीबी का महल और अहमद नगर किले की मजबूत प्राचीर जिसमें जवाहर लाल नेहरू को कैद किया गया था और यहीं उन्होंने डिस्कवरी ऑफ इंडिया लिखी। उन्हें ये सब बताना ही था क्योंकि वे इतिहास के ही आचार्य ही थे।

अहमद नगर में प्रवेश ,प्रिय रिचा से स्नेह मिलन, राजीव जी का भावभीना स्वागत, हिंदी सृजन संस्था जिसकी फाउंडर स्वयं रिचा जी ही हैं,के कर्मठ सदस्यों से मुलाकात बहुत सुखद रही। हिंदी की बढ़ोत्तरी के प्रयास हिंदीतर क्षेत्रों में अधिक व्यापक हैं और विस्तार पा रहे हैं, ये हम सबके लिए सुखद है। लोग आपस में भाई बहिन का संबोधन देते अवश्य हैं पर उसे निभाते व्यावहारिक नहीं हों पाते। पर भाग्यशाली हूं मैं कि ऋचा की ने मुझे जिज्जी  का संबोधन मात्र सैद्धांतिक रुप से ही नहीं दिया गया, उसका निर्वाह भी पूर्ण निष्ठा से किया गया। घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर बिलकुल नई जगह में एक घर मिला, घर जैसा वातावरण मिला। किसी से मिलने पर उसके व्यक्तित्व की कई कई परतें खुलती हैं। रिचा लघु कथाकार तो हैं ही, शब्दों को तो साधती ही हैं, पेड़ पौधों वनस्पतियों से उन्हें बहुत प्रेम है। छत पर जो पौधे, लता, बेल गुल्म उनके संरक्षण में फल फूल रहे हैं, वे सब उनके प्रति श्रद्धावनत हैं। अच्छे व्यक्तित्व और चरित्रों से मिलना सब के भाग्य में नहीं हुआ करता। मैं सौभाग्यशाली हूं कि मुझे ये अवसर मिला।

बस कुछ ही घंटों में वापिसी है। आते हैं तो जाते ही हैं। पर जो स्नेह और सद्भाव लेकर जा रहे हैं वह अमूल्य है। तो मिलते रहें ऐसे अवसर और अपने को भरापूरा अनुभव करते रहें।

बुजुर्गों के घर /वृद्धाश्रम

 सफर जारी है....996

18.07.2022

बुजुर्गों के घर /वृद्धाश्रम.....

मां एक कहानी सुनाती थीं जिसमें एक परिवार में बड़े बूढ़े न होने पर घर की मालकिन मिट्टी के बड़े बूढ़े खरीद लाती है, सभी काम उनकी आज्ञा लेकर उनसे पूछकर करती है और बहुत सी मुसीबतों और विपत्तियों से बच जाती हैं। यहां तक कि एक बार चोर उसके चोरी करने आते हैं पर घर की मालकिन को बड़े बूढ़ों से बात करते सुनकर चोरी का माल वहीं छोड़ भाग जाते हैं। पता नहीं, कहानी कितना सच थी पर इतना सच था कि घर में बुजुर्गों का खूब मान सम्मान था, उनसे पूछे बिना, उनकी राय लिए बिना महत्त्वपूर्ण फैसले नहीं लिए जाते थे। घर में उनका स्थान प्रवेश द्वार के पास का कमरा बैठक हुआ करता था जो आज ड्राइंग रूम में बदल गया है। घर के बुजुर्ग घर के रक्षा कवच थे, उनके होते नकारात्मक शक्तियों का प्रवेश घर में वर्जित था। किसी मंथरा और घर फोड़ी की हिम्मत नहीं थीं कि बुजुर्गों की छत्र छाया के होते उस घर पर नजर डाल पाती । आने वाले को ता छान के ही घर में प्रवेश मिलता।

धीरे धीरे समय बदला, प्रवेश द्वार के स्थान पर बुजुर्ग घर के पिछवाड़े भेज दिए गए l उनकी आज्ञा की कोई वकत नहीं रही, अब काम करने से पहले उनकी राय ली जानी आवश्यक नहीं समझी जाती। सूचनात्मक तरीके से उन्हें केवल संदेश दिए जाने लगे कि हम जा रहे हैं। अब जा रहे हो तो जाओ, कौन पूछ रहे हो, सूचना दे रहे हो तो ले ली। फिर इसमें भी कटौती कर दी गई। सारे फ़ैसले चुपचाप किए जाने लगे। बुजुर्गों को इसमें शामिल करने की जरूरत ही नहीं समझी गई । वे आऊट डेटेड जो हो चुके थे। नई टेक्नोलॉजी की समझ नही थी उन्हें। जैसा भी था पर वे घर में तो थे, दो समय रोटी तो मिल जाती थी। अपने बच्चों को देख कर ही खुश हो लेते थे भले ही दूर से देखना होता। बात तो नहीं हो पाती थीं। वे भी क्या करते बेचारे, व्यस्तता  दिन पर दिन बढ़ती ही जाती थी। सबको बड़ा और बड़ा जो बनना था, बहुत सा पैसा कमाना था, सबके सपने बहुत बहुत बड़े थे चांद तारों को झोली में भर लेने के। नाती पोतों की अपनी अपनी व्यस्तताएं थी। बहुएं भी घर बाहर और ऊपर से बुजुर्गों को संभालने में चिड़चिड़ करने लगी थीं सो घर में सेवक सेविकाओं की फौज लग गई। पर वे घर के कोने में पड़े उपेक्षित दर उपेक्षित होते चले गए और अब नौबत यहां तक आ गई कि घर के कोने भी वेशकीमती हो गए और वे वृद्धाश्रम में धकेल दिए गए। यहां बस कुछ पैसे भरकर आप सब जिम्मेदारियों से मुक्त थे। बस बिलकुल निजी और प्राइवेसी वाली बिंदास लाइफ, मर्जी चाहे जहां घूमो, जहां मर्जी घूमो कोई रोकटोक करने वाला नहीं।

          इस सुख में डूबे बिलकुल भूल गए कि हम अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे थे। अगली पीढ़ी बहुत मायन्यूटली सब ओबजर्ब कर रही थीं। हम कौन अमर मूल खा कर आए हैं, बूढ़ा तो हमें भी होना है तो जैसे को तैसा तैयार बैठा है। कहां आदर्श थे कि अभिवादन शीलस्य नित्य वृद्धोपसेविन चतवारी तस्य वर्धनते आयु विद्या यशोबलम। और आज ओल्ड एज होम की बढ़ती संख्या बता रही है कि समाज की संरचना पूरी तरह बदल चुकी है, लोगों के सोचने के तरीके बदल गए हैं। शायद वे अधिक अपडेटेड हों और हम पिछड़े सोच के हों। पर इतना तो निश्चित है कि जैसा बोएंगे वैसा काटना तो होगा ही। हम आज जितने एडवांस हो रहे है अगली पीढ़ी उससे कहीं अधिक एडवांस होगी तो एक बार जरुर विचार कर लें कि फिर ओल्ड एज होम से आगे क्या डेवलपमेंट हो सकते हैं। बहुत हो गई कमाई, बहुत बड़े बन गए ।अब भी नहीं चेते तो दुर्दशा के लिए तैयार रहो। अरे संस्कारित करो उन्हें, बहुत हो गया।

नियम तो नियम है

 सफर जारी है.....995

16.07.2022

नियम तो नियम है ......

चलना सब को सड़क पर ही है, सड़क सबकी है, किसी की बपौती नहीं। तभी तो कह दिया जाता है सड़क तेरे पिताजी की है क्या। जो कर देगा, वह चलेगा। तो एक दूसरे पर भन्नाते क्यों हो। नियम बना दिए गये हैं, सबको पालन करना ही चाहिए, जगह जगह यातायात के सिपाही भी आपको नियंत्रित निर्देशित करते मिल जाएंगे। और जो आपमें इनकी जेब भरने की सामर्थ्य हो तो नियम तोड़ने पर भी तुम्हारा चालान नहीं कटेगा, तुम्हें छोड़ दिया जायेगा और तुम ट्रैफिक नियमों को घता बताते, लाल बत्ती को नज़र अंदाज़ करते कालर ऊंची कर मूंछों पर ताव देते फर्राटे से निकल जाओगे। यानी जिन्हें नियमों का पालन करवाने के लिए नियुक्त किया गया वही उन्हें तोड़ने में सहायक हो जाएगा। यही नियति है नियमों की, वे बनाये तो बड़े सोच समझ के जाते हैं लेकिन पालन के समय उनकी धज्जियां उड़ा दी जाती है। नियमों में जान बूझ कर कोई लू पोल छोड़ दी जाती है जिससे अगले को लाभ मिल सके और आपका कोटा भी पूरा हो सके। नियमों में ढील दिए जाने का ये सिलसिला सब जगह लागू है कहीं विशेष परिस्थिति का हवाला देकर तो कहीं किसी अपने को लाभ पहुंचाने के लिए नियमों को तोड़ा मरोड़ा जा सकता है, उनकी व्याख्या अलग तरीके से की जा सकती है यानी कुछ भी कर के अपनो काम हो जाना चहिए। यानी नियम कानून वस्तुनिष्ठ नहीं हुआ करते, उनमें व्यक्तिनिष्ठता बनाई रखी जाती है, कुछ जा न कुछ गुंजायश छोड़ दी जाती है।

यदि नियम नियम है तो सबके लिए बराबर होना चाहिए। क

किसी को भी छूट क्यों मिले और यदि एक को भी ये छूट दे दी गई तो अगले के लिए रास्ते खुल जाते हैं। पूरी ज़िंदगी मनुष्य इसी लाभ कमाने के जुगाड में लगा रहता है। लंबी लाइन में कौन लगे, रुको कोई न कोई शॉर्ट कट निकल ही आयेगा।  टिकट बुकिंग के लिए एजेंट है तो कहीं आपके कार्य कराने के लिए सुविधा शुल्क की व्यवस्था है। नियम तो जनसामान्य के लिए होते हैं क्योंकि वे आम होते हैं खास नहीं, वे बड़े ओहदे पर नहीं होते, उनके पास देने के लिए सुविधा शुल्क नहीं होता इसलिए वे प्रभावशाली नहीं होते। मूल शुल्क ही मुश्किल से जुट पाता है तो लेने देने को पैसा कहां से आए। पर अब अधिकांश लोग ले दे के काम कराने की फिराक में लगे रहते हैं। यानी इनके पास इतनी मुद्रा है कि वे कमफर्ट जोन से बिना निकले भी उनके काम संपन्न हो जाते हैं। तो इसीलिए तो सब लक्ष्मी की फिराक में उसकी जुगाड में लगे रहते हैं। आश्चर्य है न स्कूल की फीस मुश्किल से जुटाने वाले भी अपने पाल्यों को ट्यूशन दिलाने की व्यवस्था में विश्वास करते हैं, क्या करें उन्हें करना पड़ता है। तो सबकी मानसिकता यह बनती जा रही है कि दुनिया में बने रहना है, अपनी को अप टू द डेट रखना है तो बस सारा ध्यान कमाने और कमाने पर दो, बाकी तो सब पैसे के बल पर साध लिया जाएगा। एसा न होता तो आदमी की इतनी हिम्मत कैसे हो जाती कि वह आपसे यह कहने का साहस कर पाता कि साब कुछ ले दे के हो जाए तो बताए। आप योग्यता पूरी करते हों न करते हों पर आप दूसरे की जेब भरने की सामर्थ्य रखते हों तो सब संभव हैं। कैसे भाई क्या आप प्रभावशाली के रौबदाब में आकर नियम बदल दोगे या पैसों की गरमी उन नियमों की बखिया उधेड़ कर रख देगी। नहीं भाई नियम नियम होते हैं, वे केवल पटल पर लिखने के लिए नहीं होते, केवल फाइलों में कोट नहीं होते, जिल्द चढ़ा मढवा कर रखने के लिए नहीं होते। वे सब के द्वारा पालन के लिए होते हैं फिर चाहे साधारण हों या विशेष, आम हों या खास, गरीब हो या अमीर।

तो ये सुविधा शुल्क की परिपाटी खत्म कीजिए साब, बहुत हो गया, सबको लाइन में लगने दीजिए। नियमों को तोड़ने पर दंड सबके ताईं समान रखिए तभी ये नियम कानून बचे रहेंगे और लोग इसके अनुपालन को आवश्यक मानेंगे। एक जेसे अपराध के लिए दो प्रकार के दंड कैसे हो सकते हैं साब। तो साब जी नियम केबल बनाइए ही मत उनके अनुपालन के निर्देशों को भी आवश्यक कर दीजिए।

आखिर वे ऐसे क्यों हैं

 सफर जारी है ...994

15.07.2022

आखिर वे ऐसे क्यों हैं .......

वे हमेशा भुनकते तुनकते ही क्यों रहते हैं, हमेशा क्रोध में क्यों तने रहते हैं, दूसरों में दोष और कमियां ही क्यों खोजते रहते हैं, उन्हें कोई भी पसंद क्यों नहीं आता, उन्हें नुक्ता चीनी की आदत क्यों पड़ गई है, क्या आपने कभी इन छोटी छोटी और महत्वपूर्ण बातों पर विचार किया है, या इसे भी यह कह कर हवा में उड़ा दिया गया कि हम पे टैम नहीं है। अरे जो बातें आपके जीवन को प्रभावित कर रही हों, जिससे आपकी छवि धीरे धीरे धूमिल होती रही हो, आपके दोस्त मित्र सखी सहेली सब दूरी बनाते जा रहे हों,कटते जा रहे हों, परिवार में कलह के बादल घिरते जा रहे हों, बच्चे अलग रूठे मटके से रहते हों, दांपत्य जीवन में जहर घुलता जा रहा हो तो भी इगोइस्ट बने रहना कहां तक उचित है। अरे जब बोलने बतराने सुख दुख बांटने के लिए पास कानी चिरैया भी पास नहीं होगी तब सोचना शुरू किया भी तो भला हाथ क्या आयेगा।

 ऐसी शिक्षा दीक्षा पाने का भला क्या फ़ायदा हुआ कि जीवन ही सुख पूर्वक नहीं बीत पाया। कोई न कोई इल्लत लगी ही रही। ज़िंदगी भर इतने मोटे मोटे ग्रंथ पढ़ते रहे, मार किताब इकठ्ठी  कर कर के लाइब्रेरी बना डाली, उपाधि के निरे बंडल के बंडल ले लिए, इतने इतने पुरस्कार और शील्ड जीत कर ड्राइंग रूम में सजा लिये पर व्यवहार करना नहीं सीख पाए, आचरण में कोई बदलाब नहीं आया।शक्ल सूरत से हीरो पर अकल में  वही जीरो के जीरो बने रहें। अरे भाई मेरे, मंहगे कपडे पहन कर इतरा भले ही लो पर उससे तमीज थोड़े ही आ जाती है। सुंदर दिखने के लिए भले ही से खूब मंहगी क्रीम चेहरे पर पोत लो पर आचरण में तो मोटी और काली भैंस ही बने रहते हो। कोई कुछ पूछे तो चिल्ला चिल्ला कर क्यों बोलते हो, अगला न तो बहरा है और न ही उसे कम सुनाई देता है। क्या फ़ायदा हुआ इतनी इतनी पढ़ाई का भला जब सम्बन्धों को ही ढंग से नहीं संभाल पाये। प्राथमिक कक्षा से ही बड़े बड़े सूक्ति और सुवाक्य सिखाए गए, खुशकत और इमला लिखाई गई, ऐसी मोटी मोटी कापी भर के कापी भर भर के प्रश्नों के उत्तर लिखे, रात दिन बैठ कर घोटा लगाया खूब रेज के नंबर भी पा लिये पर जैसे ही अगली कक्षा में पहुंचे पिछला सब सफाचट हो गया। नाम के आगे पदनाम लग गया, उपाधि जुड़ गई लेकिन दिमाग सफाचट ही बनाए रखा। उसे काहे को कष्ट दें। ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया। अब उपयोग में लाते तो कुछ कम हो जाता तो जो जो सिखाया उसे लिख दिया, लिखने के लिए ही तो पढ़ा था कौन व्यवहार में लाना था।

 जो भी मेहनत थी, पैसों का व्यय था, डांट मार थी वह उपाधि प्रमाणपत्र के लिए नहीं थीं भाई, वह सब आपके व्यवहार में दिखना ज़रूरी था। विनम्र होना था, मीठा बोलना था, क्रोध को जीतना था, संयम रखना था, अपना ही अपना नहीं देखना था, दूसरे की भी परवाह करनी थी, सब आप जेसे ही तो थे। तो आप उनसे सुपर कैसे हो गए। बात बात पर दूसरे के ऊपर बादलों से बरसते क्यों रहे, जितनी देर सामने वाले को सुनाने के लिए अपने कोषागार से तीखे व्यंग्य बाण निकालते थे, उसके क्षणांश में कहीं अपने अन्दर झांक लेते, ये जो बात बात पर लाल पीले होते रहते हो, सामने वाला तो जब प्रभावित होगा तब होगा पर जहां ये क्रोधाग्नि जलेगी उसकी लपटें तो सबसे पहले आपको ही लपेटे में ले लेंगी,उस स्थान को ही सुन्न काला कर देंगी, व्यवहार तो आपका ही बदलेगा, माथे पर सलवटें आपके पड़ेंगी, आंखें लाल पीली आपकी होंगी, आवाज़ आपकी विकृत होगी तो ये जो बात बात पर दुर्वासा सा रूप धारण कर लेते हो, उस क्रोध को सही समय के लिए बचा कर रखो। शांत रहो, धैर्य रखो, पहले खुद में गंभीरता तो लाओ, खुद को स्थिर तो करो, बात को समझो तो सही। तुम्हारा क्रोध, तुम्हारी खीझ, तुम्हारी तुनक, तुम्हारी हर दूसरे में दोष देखने की प्रवृत्ति, खुद के ईगो को तृप्त करने के लिए दूसरों पर बरसने, जहर उगलने, उसे बात बात पर नीचा दिखाने की सोच तुम्हें सुपर नहीं बनाती बल्कि तुम्हारे खोखले पन को दर्शाती है। दूसरी लकीर को लगातार घिस घिस कर छोटी करने में अपनी शक्ति का अपव्यय क्यों करते हो, इतनी देर में तो उस लकीर के समानांतर उससे बड़ी दूसरी रेख खींच खींच सकते हो, इन सब तू तू मैं मैं में कुछ नहीं रखा है, इनसे उबरो। बदलना ही है तो सबसे पहले खुद को बदलो, खुद सुधरो, अपने को डिस्टर्ब मत करो। जो खुद सुलझा हुआ होता है, वह बेबात की बातों में नहीं उलझता। अपनी शक्ति का अपव्यय नहीं करता। अपने को सहेजता है, आगे बढ़ता है, सबसे मिलता जुलता है। संबंधों को कुशलता से निबाह ले जाता है, जोडक योजक बनता है।

 तो वे अपना आत्म विश्लेषण कर लें, खुद में झांक लें, अपने अवगुणों को त्याग दे, मनुष्य हैं तो मनुष्य बन के रहें।

गुरुजी तो गुरुजी हैं

 सफर जारी है...993

14.07.2022

गुरुजी तो गुरुजी हैं.....

वे गुरुजी हैं, उनसे ही तो सब सीखा है, अब भी सीखते ही रहते हैं, सीखना चाहो तो सारी ज़िंदगी सीखते रहो। सीखने की कोई उम्र थोड़े ही होती है। पहले अक्षर ज्ञान सीखते हैं, फिर किताब पढ़ना सीखते हैं, प्रश्नों के उत्तर लिखना सीखते हैं, अपने को अभिव्यक्त करना सीखते हैं कि कब कैसे किससे क्या कितना बोलना है, कब चुप रहना है, कब बात को हवा में उड़ाना है, कब छोटी सी बात को इशू बना देना है, कब बडी से बडी बात को दो मिनट में समाप्त कर देना है और कब बात जा बतंगड़ बना देना है। सब सीखा ही तो जाता है और जिन जिन से सीखा जाता है,  वे सब गुरु की श्रेणी में रख दिये जातें हैं। स्कूल और महाविद्यालय की पढ़ाई समाप्त होने तक बार बार गुरू जी बदलते रहे पर कुछ ऐसे दिमाग पर छा गए कि उनकी सीख उनकी बातें आज भी मस्तिष्क में गूंजती रहती हैं। किताबें तो बहुतों ने पढ़ाई पर जो जीवन जीने के दो चार ज़रूरी बातें और सूत्र सिखा गये, वे भुलाए नहीं भूलते।

तो सबसे पहली गुरु तो मां रही जिसने व्यवहार करना सिखाया, कुम्हार की तरह ठोक पीट कर पर अन्दर से हाथ का सहारा दे गढ़ती रही, तब तो खूब कुनमुनाते भुनाभुनाते थे कि जब देखो अंकुश ही लगाती रहती हैं कि ये नहीं करना है वह नहीं करना है, यहां मत जाओ, वहां मत जाओ, इससे उससे बात मत करो, अकेले क्यों गई थीं, बता कर क्यों नहीं गये, जी लगा कर क्यों नहीं बोला जाने क्या क्या उपदेश होते थे जो उस समय तो बिलकुल भी अच्छे नहीं लगते थे पर सच तो यह है कि वही सब बातें ज़िंदगी में बहुत काम आई। पुस्तक पढ़ कर तो कक्षाएं पास कर ली, प्रथम द्वितीय आते अपने को तुम्मन खां समझते रहे पर ज़िंदगी की वास्तविकता से जब सामना हुआ तो पता चला किताबों में सभी प्रश्नों के उत्तर नहीं लिखे होते, कुछ उत्तर स्वय से खोजने होते हैं, कुछ समय सिखाता है तो कुछ अनुभव। घर परिवार अपने अंदर बहुत से गुरु छिपाए रहते हैं जिन्हें हम गुरु की संज्ञा तो कभी नहीं देते वैसे भी घर की मुर्गी तो दाल बराबर समझी जाती है।

घर परिवार से बाहर निकलते स्कूल वाले गुरुजी हमें बहुत सा सूचना परक ज्ञान देते हैं कुछ को रटना होता है तो कुछ को समझना होता है और कुछ में गहरे उतरना होता है। सब से सीखते ही तो रहते हैं। आकाश धरती पर्वत समुद्र चंदा तारे सूरज हवा पानी यहां तक की पूरी कायनात हमें सिखाती ही तो है । पर्वत कहता शीश उठाकर तुम भी ऊंचे बन जाओ, सागर कहता है लहरा कर मन में गहराई लाओ, समझ रहे हो क्या कहती है उठ उठ गिर गिर तरल तरंग, भर लो भर लो अपने मन में मीठी मीठी मृदुल उमंग, धरती कहती धैर्य न छोड़ो कितना भी हो सिर पर भार, नभ कहता है फैलो इतना ढक लो तुम सारा संसार। या जल से पतला कौन है कौन भूमि से भारी कौन अग्नि से तेज है कौन काजल से कारी, जल से पतला ज्ञान है और पाप भूमि से भारी, क्रोध अग्नि से तेज है और कलंक काजर से कारी। तरुवर फल नहिं खात है नदी न संचय नीर, परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर। सब सिखा ही तो रहे हैं।

कबीर गुरु की महिमा लिख गए कि गुरु तो गोविंद से भी बडा है क्योंकि गोविंद तक पहुंचने का रास्ता तो वही बताता है इसलिए गुरु की महिमा सात समुद्र की मसि, सब धरती कागद और सारे वन की लकड़ी को लेखनी से भी नहीं लिखी जा सकती। गुरु की महिमा अपरंपार है। गुरु सर्वोपरि है।

आज गुरुपूर्णिमा पर जीवन को आकार देने वाले सभी गुरुओं को सादर नमन। इतने सुधारे बुहारे गए पर अभी भी बहुत बहुत सी कमियों के आगार हैं, आज भी सुधारे जाने की बहुत गुंजायश है, रोज किसी न किसी से कुछ न कुछ सीख ही रहे हैं। कृष्णम वन्दे जगत गुरु में सारे गुरुओं को समाहित करते उन्हें करबद्ध प्रणाम और आप सभी को गुरुपूर्णिम की हार्दिक बधाई, मुनिया पूनो की शुभकामना।

देव शयन को चले गये हैं

 सफर जारी है....992

13.07.2022 

देव शयन को चले गये  हैं......

हां हां भाई, देवता क्यों नहीं सो सकते,जब सबको काम के बाद आराम चाहिए तो देवता तो हम सबसे ज्यादा काम करते हैं, तो क्या वे थकते नहीं होगें, उन्हें भी तो कुछ दिनों के लिए आराम चाहिए या नहीं। हम सबकी विपत्ति में वे सहायता करते हैं, उनके नाम जप से हमें बडी शांति मिलती है। ये तो भलमनसाहत समझो कि वे रोज रोज नहीं सोते, रात्रि जागरण करते हैं तभी तो हम चैन से सो पाते हैं। अब ये अलग बात है कि हम घर और मंदिर में स्थापित भगवान के विग्रह को विधिवत सुलाने का उपक्रम करते हैं , पर्दा लगा देते हैं और सुबह प्रभाती गाकर, घंटी घंटे बजाकर उन्हें विधिवत जगाते हैं। पर सोचो यदि भगवान भी रात में खर्राटे मारकर सोते तो हमारी समस्याओं को भला कौन सुनता और दूर करता।

कल आषाढ़ मास की ग्यारस को हरिशयनी एकादशी हो गई और देवता विधिवत शयनकक्ष में भेज दिए गए हैं। वे भगवान हैं तो चार मास में ही अपनी नींद पूरी कर लेते है और सोचो कहीं कुंभकर्ण जैसे छह महीने सोते तो कैसी बीतती। आषाढ़,सावन, भादों और आश्विन (क्वार) चार महीने बारिश के हैं,बारिश के कारण सब जगह कीचड़ और गंदगी रहती है, संत महात्मा इस अवधि में एक ही स्थान पर बैठकर भजन कीर्तन करते हैं। ये चातुर्मास जैन धर्मालंबियो के लिए भी बड़े महत्त्वपूर्ण हैं।

आषाढ़ के चारों सोमवार शीतला मैया को समर्पित हैं तो श्रावण के सोमवार महादेव को, आगरा शिव की नगरी है, राजेश्वर, बल्केश्वर, कैलाश और पृथ्वीनाथ मंदिर में भोले बाबा प्रतिष्ठित हैं, सावन की रिमझिम फुआरों के बीच परिक्रमार्थी नगर परिक्रमा करते हैं, कांवर चढ़ाते है, हर हर महादेव से पूरा परिकर गुंजायमान होता है। फिर आता है भाद्रपद... नागपंचमी, जन्माष्टमी,सलूने राखी, गाज जैसे स्थानीय पर्वों से घर परिवार में चहल पहल बनी रहती है। आश्विन मास पूर्वजों को याद करने, उनका श्राद्ध करने का है और महालया अर्थात शक्ति की उपासना को समर्पित है। दशहरे के बाद शरद पूर्णिमा और फिर कार्तिक मास की शुरुआत हो जाती है यानी करवा चौथ, अहोई अष्टमी,प्रकाश का त्योहार दीपावली, अन्नकूट का त्योहार गोवर्धन और भाई बहिन के स्नेह का त्योहार भाईदूज यानी यम द्वितीया। कार्तिक माह की एकादशी को देवताओं के जागरण का समय हो जाता है देवउठनी एकादशी ,जिसे देवोत्थान/देवठान भी कहा जाता है जागो रे देवा उठो रे देवा आंगुलिया चटकाओ देवा के मंगल गीत गवते हैं।

तो ये है देव शयन से देव जागरण की यात्रा। अब इस बीच इतने इतने त्योहार आते हैं , दुःख हो या सुख, हम जैसों का तो भगवान् ही सहारा है।हम तो भगवान का ही  स्मरण करते हैं। उन्हें छोड़कर और कहां जाएंगे भला। हमारा तो एक दिन काम न चले उनके बिना, वे सो गये गुदगुदे बिस्तर पर खराटे मार के तो हम जैसों की तो भट्टा बैठ जायेगा। हमारा उनके बिन और है ही कौन। न भाई हम तो बिलकुल नहीं जाने देंगे उन्हें सोने के लिए और वे भी पूरमपट चार महीने। भला ऐसे कहीं होता है क्या कि भक्त पुकारते रहें और तुम ऐसी गहरी नींद सो जाओ कि कान पे जूं भी न रेंगे। तो सुनो  देवता तुम्हें सोनो ही है तो सांकेतिक रुप से भले ही सो जाओ घंटा दो घंटा कू  पर वे अपने भक्तों के लिए तो आपको सोते हुए भी जागना पड़ेगा। भक्तों को इनके बिन कल नहीं पड़ती और भगवान कौन भक्तों को अधर में डाल चैन से सो पाते हैं। तो आग है दोनों तरफ बराबर लगी हुईं। भगवान एक बार को सोने का मन बनाये भी तो ये भक्त मंडली उन्हे कब सोने देगी। दूसरों की क्या कहे जब से सुना है कि भगवान चार महीने को सोने चले गये हैं, हमारो तो हालत पतली हो गई कि अब अपना दुखड़ा किससे कहेंगे, किसे सुनाएंगे, कौन हमें ढाढस बंधाएगा।

तो देवता जी तुम्हाई नाय चल रही साब, राजी राजी मान लेयो तो ठीक नहीं तो जबरदस्ती करनी पड़ेगी। तो सोने को कार्यक्रम ए रद्द कर देयो , इतने काम फैले पड़े हैं और इन्हें देखो कि फरमान जारी कर दिया कि चार महीने को सोने जा रहे हैं। घर की खेती समझ रखी है क्या। और क्या जाना जाना लगा रखा है। हाथ छुड़ाए जात हो निबल जान के मोय,हृदय ते जब जाओगे सबल बदूगी तोय।

जाने बिगाड़ी, वो ही बनाबेगो

 सफर जारी है.......991

12.07.2022

जाने बिगाड़ी, वो ही बनाबेगो.......

अब का होयगो राम जी, अब कैसे होएगी, मोये तो कछु समझ न आ रयो । बिट्टन को डकराते देख अम्मा बोली...चों हारी हारी सी बात कर रई है लली , सब राम जी संभालिंगे। बिगड़ी बे ई बनाबत हैं। नेक भगवान को ऊ नाम ले लो कर, सबन के आगे हाथ फैलात है, भगवान के आगे इतने हाथ जोड़ती तो तोय कछु न कछु उपाय जरुर सूझ जातो। भला आदमी की इतनी औकात कहां ते होएगी, वो तो निमित बन जात है पर बाय मदद करबे की प्रेरणा तो  भगवान जी ही देवें। बाके मज्जी के बिना तो पत्ता हू नाय हिले, तू का बात कर रई है बिट्टन। इन मानुस के बस को कछु नाने,  जिन्हें तो बस बेसिर पैर की हांकबे की आदत है। कछु करे चाए नाय करे पर जबान कतरनी सी खूब चलबा लेयो। कोई कोई होत ही ऐसो है कि करबे कू सींक हू नाय सरकाई जाएगी और  बात आकाश पाताल की करिंगे। एक और मुसीबत हते ऐसेन के संग के अपने आगे काहू ए कच्छू नाय समझे। बस अपनी ही सेर रखनी बिन्हे, जब देखो तब अपनी ही पेलबे में लगे रिंगे। मैंने जे करो मैंने वो करो, ऐसेन को मैं तो सिर चढ़ के बोले। अपने आगे काहू ए कछु नाय समझे। कोई समझाबे की कोशिश करें तो बा ते अटक लड़ाई मोल लेबे कू तैयार बैठे रह। बातन में बिनते कोई जीत नाय सके। बात तो ऐसी करिंगे कि आकाश में हू थेगड़ी लगा आंगे पर काऊ काम की आस मत लगा बैठियो। बस जे तो बातन के ही शेर हैं। सो बहना मेरी ऐसेन से तो बच के ही रहो। जाई में भलाई है। और तू तो खूब समझदार है, पूरी गिरिस्थी पार लगा लाई , अब नेक दुख से ऐसी गैली बाबली हे गई कि हरेक के आगे अपनो रोनो लेके बैठ जात है। लोग रो के, सहानुभूति सी दिखाए के तेरे मन की थाह ले रए हैं, और तू पेट की ऐसी भोली है कि सबन के आगे कच्चो चिठ्ठा खोल के बैठ जाएगी। जे तो हमेहु सल है कि तो पे भारी विपत ओखा परी है पर दुख अपने रस्ता ही जायेगो। ऐसे घबराएगी तो कैसे होएगी। और सुन, ऐरे गैरेन की बातन में चो आ जात है, नेक काहू ने जूठे कू कई और तू सांचे कू आस लगा के बैठ जाएगी और कई म्हा ते सहायता नाय मिली तो रोएगी बिलखेगी बिना बात कू परेशान होएगी। अरे कहबो एक बात है और करिबो दूसरी। नेक अपनो दिमाग हू तो लगानो चहिए कि काऊ ने झूठ मूठ कू सहायता करिबे की बात कह दई तो बाके ही भरोसे बैठे रह गए। ऐसे तो कही ही जात है पर जाको जे मतबल थोड़े ही होत है कि अगलो बंध गयो, बाने कही चों, अब तो बाय करनी ही करनी पड़ेगी। ऐसे नाय होय करे।

तो बिट्टन हमाई मान, भगवान ते लौ लगा, बिनते ही दिन रात कहो कर कि भगवान तुमने ई बिगाड़ी है, अब तुम्ही बनाओगे। हमने तो तुम पे छोड़ दईं है। तुम्हे लगे कि सहायता करनी चहिए तो कर दीयो नाय तो जैसे राखोगे रह लिंगे। हमाई काय, हम तो तिहारे भरोसे हैं। हमाई मैय्या एक भजन गाओ कतती... पकड़ लेयो हाथ बनवारी नहीं तो डूब जाईएंगे, हमारो कछु न बिगड़ेगो तिहाई बात जायेगी। तो बिट्टन रानी, दुख होय चाए सुक्ख बस भगवान जी में जी लगाए राखो, अपनी पतवार अपनी डोर बिन्हें सौंप देओ और तुम  ते जो बन पड़े जितनो हो सके, जितनी सामर्थ्य होय उतनो कर देओ । बाकी वे जाने बिनको काम जाने। तो हमने तो बाके हाथ डोर सौंप दई है। और बिट्टन रानी तू सुखी रहबो चाहे तो तोय ऊ जे ही करनो चहिए। जाने बिगाड़ी है वो ही बनाएगो।

डाकिया डाक लाया

 सफर जारी है...९९०

११.०७.२०२२

डाकिया डाक लाया ......

चिठिया हो तो सब कोई बांचे भाग्य न बांचो जाए पर अब तो बांचने को चिठ्ठी पत्री ही नहीं आती , डाकिया ही नहीं आता, तो चिठ्ठी कहां से आती जिसे बांचा जा सकता था।, भाग्य बांचना तो दूर की बात है । चिठ्ठी आए न आए पर फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, ट्विटर पर संदेश थोक के भाव आते हैं। आश्चर्य तो इस बात का है कि वे भी चोरी के हैं, खुद नहीं लिखे जाते इसलिए दूसरों के घर से आई मिठाई की माफिक इधर से उधर फारवर्ड कर दिए जाते हैं। यही सोच कर खुश होते रहते हैं कि आज हमने इतने अधिक संदेश फॉरवर्ड कर दिए यानी अपनी गांठ से कुछ नहीं गया और वाहवाही भी मिल गई। टेक्नोलॉजी ने लाल रंग के डाक बक्सौ लेटर बाक्स और डाकिए की छुट्टी कर दी। डाकिए बेचारे का कोई अता पता नहीं तो उस पर निबंध कौन लिखे। निबंध की तो छोड़ो, चिठ्ठी पत्री तक कोई नहीं लिखता कि उन्हे पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय और लिफाफे की जानकारी हो। जब लिफाफा ही नहीं जानते तो उस पर टिकट चिपकाने का संदर्भ तो और नहीं जानते होंगे। पोस्टकार्ड का प्रयोग मरे गिरे के समाचार के लिए होता था कि कोना फटा देखकर दूर से ही पता चल जाए कि कहीं कुछ गड़बड़ है। ऐसे पोस्टकार्ड सूचना पढ़ने के बाद घर से बहर ही रख दिए जाते , उनका प्रवेश घर के अन्दर नहीं था। अब इन पोस्ट कार्डों की जगह फोन ने ले ली है और कहीं कहीं तो फोन से संदेश देकर, लिखकर उसे सार्वजनिक कर दिया जाया है कि जिसकी मर्जी हो पढ़े और सांत्वना बधाने और सामाजिकता निभाने चला आए नहीं तो कोई बात नहीं।

        मौत के अवसर पर भी शोक प्रकट करने आये लोगों को चाय पानी बिस्किता की व्यवस्था का भला क्या औचित्य, पर अब सब बदल सा गया है। ब्याह शादी,जन्मोत्सव के निमंत्रण पत्र को छपवाने की आवश्यकता पर अब प्रश्नचिह्न लगने लगा है अरे जब सब वर्चुअल ही भेजना है तो कार्ड को भी वर्चुअल ही डिजायन कर उसे सार्वजनिक कर दो, प्रेस वाले के चक्कर काटने की जरुरत अब नहीं रही। चिठ्ठी न कोई संदेश, चिट्ठियां हो तो सब कोई बांचे, डाकिया डाक लाया, कबूतर जा जा जा मेरे प्यार की पहली चिठ्ठी साजन को दे आ , संदेशे आते हैं जैसे गाने बहुत पीछे छूट गये। अब इनकी आवश्यकता ही कहां रही। ये सब तो पिछले जमाने की यादें जैसी हैं। हालांकि ये दौर बीत चुका है लेकिन पाती की आवश्यकता तो आज भी अनुभव की जा रही है, न की जा रही होती तो राजस्थान से पाती लिखो की जबरदस्त मुहिम क्यों छेड़ी जाती। बिटिया तो आज भी अपने माता पिता को, माता पिता अपने बाल गोपालों को, भाई अपनी बहिन को बहिनें अपने भाइयों को और हम सभी पाती तो लिखते ही हैं फिर भले ही तकनीक ने उसके मोड बदल दिए हों। क्या वाकई फोन और आधुनिक उपकरणों ने पाती की जगह ले ली है या इन की तुरत फुरत सुविधा और यातायात के तेजी से बदलते साधनों ने पाती लिखने की आवश्यकता को लगभग खत्म सा कर दिया है। पहले सात समंदर पार से गुड़ियों के बाजार से गुड़िया लाने और पापा जल्दी आए जाने जैसे गाने का अब कोई औचित्य रहा नहीं। जैसी मर्जी गुड़िया चाहो ऑनलाइन मंगा सकते हो और सात समंदर पार बैठे पापा भैया से वीडियो काल से बात कर सकते हो, अब दूर रहा ही कौन जिसे चिठ्ठी पत्री लिखने की नौबत आ पड़े। अब तो सब आपके हाथ में जो छोटा सा फोन सेल नाम का यंत्र है उससे दुनिया मुठ्ठी में कर सकते हो।

        चिठ्ठी पत्री की जो शुरुआत यहां सब ठीक है आशा है वहां भी सब कुशल से होती थी, जो संबोधन और अभिवादन दिए जाते थे, वे तो सब हवा हवाई हो गए, अब तो पिता भी डीयर फादर हो गए, पति पत्नी हाय हनी और डार्लिंग में सिमट गए, आपका आज्ञाकारी, विनीत पूछ दबा कर भाग गए।अनौपचारिकता रही ही कहां। वे ज़माने लद गए जब केवल अपनी बात ही नहीं लिखी जाती थी, आस पड़ोस की दादी चाची ताई मौसी जैसे रिश्तों की कुशलता बताने और पूछने का रिवाज था। अरे ये तो छोड़ो, मानुष की बात थी, घर के गाय कुत्ते घोड़े भैंस तोता भी चिठ्ठी के विषय होते थे। पर ये सब पुरानी बात और नोस्टोलीजिया कह कर छोड़ दिया जायेगा। अब इन्हें कौन समझाए कि तकनीक मोड भर बदलती है, विषय वस्तु तो आप क्रिएट करते हो, भावनाओं पर किसी का पहरा कहां होता है, कोई भी नई खोज उन्हें थोड़े ही रोक सकती है। सच तो यह है कि अब आप के इतने इतने आभासी मित्र हो गए हैं, इतनों इतनों से जानपहचान हो गई है, आपको किसी दूसरे की जरुरत ही महसूस नहीं होती। पर ध्यान रखिएगा कि अपने तो अपने होते हैं बाकी सब सपने होते हैं। तो मिलते रहिए अपनो से, लिखते रहिए उन्हें चिठ्ठी पत्री, लेते रहिए उनकी राजी खुशी। कहीं दुनियावी भीड़ में आपके सारे रिश्ते अपनी पहचान न खो दें। आप आभासी दुनिया में मस्त रह आएं और वे रिश्ते आपके संबंधी कहीं भीड़ में बिल्ट जाए और फिर खोजे से भी न मिलें। जो चीजें आउट ऑफ साइट हो जाती है वो आउट आफ माइंड भी हो जाती है। वैसे भी आपने इन्हें दूर के रिश्ते मान लिया है, ममेरे,तयेरे, मौसेरे, चचेरे, फुफेरे रिश्तों को कजिन में निबटा दिया है। आपके सब से कनसर्न ही खत्म होते जा रहे हैं। आप ग्लोबल होने की बात जरुर करते हों पर दिल पर हाथ रख कर सोचिएगा करा आप अपनों के कितने करीब हैं, ऐसा न हो कि आधी छोड़ पूरी को धाबे, आधी मिले न पूरी पावे का हाल हो जाए। तो जुड़े रहिए अपनो से, अपने के अपनो से लिखते रहिए उन्हें चिठ्ठी पत्री, खोलते रहिए अपने मन और लेते रहिए उनकी राजी खुशी।

ये छोटे छोटे पड़ाव बहुत सुखद है

 सफर जारी है....९८९

१०.०७.२०२२

ये छोटे छोटे पड़ाव बहुत सुखद है........

बालकों का परदेश से घर आना जितना सुखद होता है चाहे वह एक छोटा अंतराल ही क्यों न हो, वापिसी उतनी ही कारूनिक होती है. घर जो खुशियों से भर उठता है, दीवारें, खिड़कियां छत से रसोई आंगन बाग बगीचे सब उदासी से भर उठते हैं, और तो और आस पड़ोस की गहमा गहमी हल्की पड़ जाती है। कल तक जो चेहरे उमग रहे थे वह एमपी अंसुवाए से हो जातें हैं, आंखों के कटोरे छलछलाने को आतुर होते है, पर उन्हें डपट दिया जाता है बाबरे हो रहे हो क्या, बालक नौकरी पर जा रहे हैं, उसे ढाढस बंधाओ, ये क्या बचपना कर रहे हो। उसके जाने की तैयारी में सहयोग करो। कोई ज़रूरी चीज छूट न जाए, वो तो बालक हैं, नई जगह देखने के उत्साह में कई बार छोटी छोटे ज़रूरी चीजें नजर अंदाज़ कर जाते हैं। घर से दूर जाना उन्हें भी उतना ही सालता है, घर उनका भी छूटता है, बचपन की यादें उन्हे भी परी लोक में ले जाती है, बारे बहिनों की शरारतें उनके मन मस्तिष्क को भी आलोदित करती हैं पर जाना तो है ही। फिर पूरा विश्व हर अपना घर है। उदार चरितानाम तु वसुधैव कुटुंबकम् का पाठ भी तो आपने ही पढ़ाया था कि सारा जहां अपना ही है। सब जगह घूमो देखो वहां की तकनीक सीखो, जी जो जहां से अच्छा मिले, उसे लेते चलो। वह भी ज़रूरी है। सब अपने ही हैं। छोटे चित्त के मत बनो, ये मेरा ये पराया ऐसा तो छोटे चित्त वाले सौंपते है। बंजारों की तरह बनो। सबको देना सीखो, बांटना सीखो, सुगंध सीमित दायरे में बंध कर नहीं रह सकती, उसे सबको सुवासित करना होता है।

खुला आसमान, विस्तृत धारती, ऊंची ऊंचे पर्वतो की चोटियां , नीलए समुंदर, दिगदीगंत सब तुम्हारे  ही है । तो सब को देखो, सबका आनंद लो, तो जब जितने समय जहां हो वहां पूरी तरह रहो, वहां के हो रहो। जैसा देश वैसा भेष रखो। बस फिर तो लौटना ही है। सबको लौटना ही होता है भला अपना देश गांव किसे प्यारा नहीं होता। यात्रा में वापिसी निश्चित होती है जैसे उड़ जहाज को पंछी फिर जहाज पे आबे, मेरो मन कहां अनत सुख पाबे। सूर ऐसे ही थोड़े लिख गए हैं। यात्रा यात्रा होती है, जीवन भी तो एक यात्रा है। मंजिल तक पहुंचने के बीच अनेक पड़ाव होते हैं जहां कुछ देर रुका जाता है, आनंद लिया जाता है, सबसे मिला जुला जाता है, यात्रा के प्रसंग सुनाए जाते हैं, भावनाएं अनुभूतियां कही, बांटी और शेयर की जाती हैं,पीपीएल फोटो शोटो लिए जाते हैं, खाया पिया घूमा सूमा जाता है। कहने को सब किया जाता है पर बहुत कुछ ऐसा फिर भी रह जाता है, बिटबीन द लाइंस मिसिग रह जाता है जिसे शब्दों में नहीं बांधा जा सक्ता। ढेर सामान की पोटली बांध दो फिर भी कितना कुछ छूट जाता है। हजार लाख बार सीने से लगा लेने, पुचकार लेने के बाद भी मन कहां भरता है माता पिता का, वह तो पीछे पीछे सरपट दौड़ लगाता है। जातें हैं तभी तो वापिसी होती है। तो बालक बच्चे आते जातें रहें, जहां रहें खुशियां उनके आसपास मंडराती रहें। मन भारी है पर कोई नहीं हंसी खुशी विदा करते हैं सी आफ करते हैं। ईश्वर तुम्हें स्वस्थ और प्रसन्न रखे। कहा भए जो बीछुरे तो मन मो मन साथ, गुड़ी उड़ी आकाश में तऊ उडावक हाथ ।

मानुष से भले पशु

 सफर जारी है.....९८८

०९.०७.२०२२

मानुष से भले पशु.....

सा विद्या या विमुक्तये, विद्या हमें ज्ञानवान बनाती है, पशुता से दूर रखती है, हमें सच्चे अर्थों में मानव बनाती है। विवेक और बुद्धि हमें पशुता से बचाए रखते हैं, पाशाविकता से दूर रखते हैं,हममें मानवीयता का विकास करते हैं, मानुष और पशु के बीच रेखा खींचनी हो तो सबसे पहले पढ़ाई की बात की जाती है,व्यवहारिकता की बात हो तो कहा जाता है कि मनुष्य होते सोते इतनी तमीज भी नहीं कि बात कैसे की जाती है, यदि कोई ज़्यादा ही कांय कांय करें तो कह दिया जाता है कि निरे पशु हो क्या, कोई खाना खाते समय चपर चपर आवाज़ करे तो उसे भी टोक दिया जाता है कि मानुस की तरह रहा कर ।तो इसका सीधा सीधा अर्थ यही निकलता है न कि मानुष और पशु में भेद होता है, मानुस पशु से श्रेष्ठ है, यह श्रेष्ठता विवेक के कारण है। हमें जीवन में पशुता से उठ कर मानवता तक जाना है, निरंतर प्रगतिशील होना है तभी हमारा मानव होना सार्थक होगा।

              अब सच यह है तो मुहावरे, लोकोक्ति और व्यंजना में पशुओं के आचरण को क्यों मानक मान लिया जाता है ?कुछ नमूने देखो जरा.... कुत्ता तक बैठता है तो पूंछ से जगह झाड़ कर बैठता है, गाय सा सीधापन हर मां अपनी बेटी पर आरोपित कर लेती है, कोयल की कूक की मधुरता का कोई सानी नहीं, कुत्ते की स्वामीभक्ति से भला किसको इंकार होगा , शेर सा वीर बालक सबको चाहिए ही पर बलि का बकरा बनने ,बकरी की मिमियाहट, बकरी से क्यों मिमियाते हो,बिल्ली की खिसआहट, खिसआनी बिल्ली खंभा नोचे, बंदर की घुड़की से भला कौन डरता है,कुत्ते का भों भों भौंकना, भैंस सी मोटी खाल, तोते सी रतंत विद्या, कौए की कांव कांव, चूहे की कुतराहट, भैंस की डकराहट, मेढक की टर्राहट, गधे की रेंकाहट , रंगा सियार, सांप सी टेढ़ी चाल , गधे सी बेवकूफी, उल्लू की सी मूर्खता, मेढकी का जुकाम, चील के झपट्टे और चील के घोंसले में मांस रखने से सबको परहेज है , बन्दर बांट कोई नहीं चाहता,पर मां बच्चे के लिए गाय सी रंभाती है, न्याय सबको नीर क्षीर विवेकी हंस सा चाहिए, प्रसन्नता में मन मयूर सा नाच उठता है, चीते की सी तत्परता भला किसे पसंद नहीं, बैल की श्रम शीलता, चींटी सी निरंतरता , चूहे का शेर का जाल काटना यानी जहां काम आबे सुई कहा करे तरवार, कबूतरों का शांति दूत बनना और एकता के साथ जाल लेकर उड़ जाना भला किसको पसंद नहीं आता। कभी कभी तीतर के हाथ बटेर भी लग जाती है और ऊंट पहाड़ तले आ जाता है तो कभी ऊंट के मुंह में जीरा रख दिया जाता है।

बचपन से इन पशु पक्षियों के मध्य ही तो मानुष रहता है , चिड़िया उड़ कौआ उड़ खेलता है, गाय हमारी माता है, हमको सब कुछ आता है। गाय , कुत्ता, बिल्ली,घोड़ा, ऊंट , हाथी जैसे पालतू पशुओं पर निबंध लिखता है,उनकी उपयोगिता जानता है, घोड़े की शक्ति से परिचित होता यह भी सीख लेता है कि घास और चने में बहुत शक्ति होती है ,गाय घास भूसा चरी खली खाकर पौष्टिक दूध देती है । ऊंट, घोड़ा, भैंसा गाडी में जोते जाते हैं, गधे बोझा ढोते हैं तो हाथी ऊंट की सवारी की जाती है, घोड़ी के अभाव में दूल्हे राजा की बारात की शोभा नहीं होती। चूहा गणेश का वाहन है तो मोर कार्तिकेय का, वृषभ नंदी शिव का तो शेर दुर्गा का, लक्ष्मी उलूक पर विराजती हैं तो माता सरस्वती हंस पर। मृत्यू के देवता यमराज को भैसे की सवारी रास आती है तो कन्हाई को धौरी श्यामा गाय पसंद है। 

इन पशुओं से नाते रिश्ते भी जोड़ लिए गए हैं गाय माता तुल्य है, वह अमृत तुल्य दुग्ध का पान कराती है बिल्ली मौसी है तो बन्दर मामा। फिर पशु तो मनुष्य के सबसे अधिक नजदीक हैं। कभी कभी तो  पशु की अन्य जीवो के प्रति ममता मानवों के लिए मिसाल बन जाती हैं। कैसे कहें कि पढ़ने से ही मानवता आती है। पशु तो बिना पढ़ाई के भी सहृदय होते हैं, बिना छेड़े वह भी नहीं काटते। अपनी रक्षा के लिए भौंकते जरुर हैं। अब प्राण रक्षा तो उनका भी धर्म है। तो सच यह नहीं कि पशुओं में पाशविकता होती है और ऐसा है भी तो वह उनका स्वभाव है। पर मनुष्य विवेक शील होकर ,विद्यावान होकर भी यदि पशु जैसा आचरण करें तो उसे किस श्रेणी में रखा जाए। पशु पशु होकर भी मानव के साथ मित्रता निभाने का बूता रखता है पर मनुष्य अपना सारा विवेक खो पशुवत आचरण करता है, इससे बड़ा दुर्भाग्य मानव जाति का क्या होगा।

पढ़े और बड़े लोग

 सफर जारी है.....९८७

०८.०७.२०२२

पढ़े और बड़े लोग.......

हां हां, वे बहुत बड़े हैं, बहुत पढ़े लिखे हैं, जो भी उपाधि होती हैं उन्होने सब ले रखी हैं, एम ए बी ए सब कर रखा है पीएच डी और डी लिट भी कर रखा है, बहुत सारे इनाम और मेडल भी जीत रखे हैं , इनके ड्राइंग रूम में बहुत से प्रशस्ति पत्र , शील्ड भी सजी हुई है। घर में एक विशाल पुस्तकालय है जिसमें दुनिया भर के बड़े बड़े ग्रंथ हैं, कोश हैं, इनसाइकलोपीडिया है, सूक्ति, मुहावरे कोश हैं। उनके यहां बुद्धिजीवियों का हमेशा जमावड़ा लगा रहता है। वे बड़े बड़े कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि और अध्यक्ष होते हैं, उनके गले मालाओं से लदे रहते हैं, ढेरो ऑटोग्राफ देते वे जनसमूह में बहुत प्रशंसनीय और बहुचर्चित हैं।

      तो ऐसे पढ़े लिखे महानुभाव से कल भेंट का अवसर मिला, मन बल्लियों उछल रहा था कि आज तो बिल्ली के भाग से छींका फूट गया, हमें भी इतने बड़े और बहुपठित महापुरुष से मिलने का सौभाग्य मिल रहा है, कल को हम भी  बहुत ठसके से सब को बता पाएंगे कि हम भी अमुक अमुक से फलाने ढिकाने से मिल चुके हैं, उनके मिलने वालों की सूची में हमारा नाम भी दर्ज होने जा रहा है। खैर हम वहां पहुंचे, बाहर आगंतुकों के लिए बने कक्ष में बिठा दिए गए, लम्बे इंतजार के बाद एक व्यक्ति ने सभी के एपोयंटमेंट चेक किए और सबके विजिटिंग कार्ड मांगें। हम भौंचक्के से देख रहे थे कि एक पढ़े लिखे को दूसरे पढ़े लिखे से मिलने के लिए पूर्व में समय लेना पड़ता है। रही विजिटिंग  कार्ड की बात तो वह तो हमने कभी छपवाया ही नहीं था, सोचा था जब साक्षात जा ही रहे हैं तो चेहरा वे देख लेंगे और नाम हम बता देंगे पर नियम तो नियम है, उससे तो छूट मिलने से रही। सो एक पर्ची पर हमने अपना नाम लिख दिया, फिर कहा गया आप कहां से है, क्या करते हैं, अपना पद नाम भी लिख दें। यानी यदि हम कहीं काम नहीं करते, हमारा कोई पद नहीं है तो हम बड़े लोगों से मिलने के योग्य ही नहीं ठहरते। मरता क्या न करता।अंत में उस पर्ची पर प्राथमिक शिक्षक पदनाम लिख दिया और पर्ची उन्हें थमा दी।

      सब के नम्बर आ गए, लोग जाएं और घंटे घंटे भर बाद बाहर निकलें। हमारा नंबर जब दोपहर तक नहीं आया तो बड़ी कोफ़्त हुई कि हम क्या ऐसे गए बीते हैं कि सुबह से आये बैठे हैं और अगले ने अभी तक कोई नोटिस ही नहीं लिया, अरे ऐसे काहे के बड़े हैं जो अगले के समय का ध्यान ही नहीं रखे। आखिरी कोशिश और कर लेते हैं सोच कर उनके निजी सचिव से फिर पूछा कि क्या मैं अंदर जा सकता हूं। मैं बस मिलने चला आया, मुझे कोई विशेष काम नहीं है। सचिव के जबाब की प्रतीक्षा किए बिना ही अंदर चले आये। बड़े साहब पढ़े लिखे महानुभाव अपने मित्रों के साथ गपशप में मशगूल थे। हा हा ठी ठी का माहौल था। हमें देखकर चौंके आपका परिचय, वे कुछ बोलें उससे पहले ही हम शुरू हो गए कि मैं प्राथमिक पाठशाला में पढ़ाता हूं ,बस आप की बहुत चर्चा सुनी तो मिलने चला आया। इतना कहते ही पासे पलट गए, वे क्रोध में आ गए और अपने निजी सचिव को बुलाकर कहने लगे क्या इन्होंने मिलने का समय लिया था, सचिव की घिग्घी बंध गई , वह कुछ कहते,इससे पहले ही हमने कमान संभाल ली। जी, मुझे काफी देर हो गई तो मैं स्वयं चला आया। देखना चाहता था बहुत अधिक पढ़े लिखे कैसे होते हैं, मेरा कद तो बहुत छोटा है आपके सामने। इतनी मोटी मोटी पुस्तकें ग्रंथालय में हैं निश्चित ही आपने इनका अध्ययन अवश्य किया होगा। क्या आपने समय की महत्ता के विषय में नहीं पढ़ा। एक व्यक्ति कोसों दूर से आपके पास केवल मिलने चला आता है और आप उसे पहले से समय न लेने के कारण, विजिटिंग कार्ड न होने के कारण अंदर नहीं बुलाते। उसके समय की कीमत आप नहीं समझेंगे क्योंकि आपने पढ़ा भले ही हो पर आप गुने बिलकुल भी नहीं हैं। पढ़े लिखे और बड़े व्यक्ति की पहली पहचान यह होती है कि वह सामने वाले का सम्मान करता है, उसके समय की कीमत समझता है। वह थोथी बातों में समय नहीं लगाता, व्यवहार कुशल होता है, आगंतुक से धा पा के मिलता है। व्यक्ति किताबें रखने से बडा नहीं होता, आचरण की शुचिता से बडा होता है। माफ कीजिएगा श्रीमान जी, आज मेरा भ्रम टूट गया कि पढ़े लिखे होना ही बड़प्पन की पहचान है। पुस्तक स्थित विद्या यदि समय पर काम नहीं आती तो वह काहे की विद्या। विद्या तो व्यक्ति को विवेकशील बनाती है, विनयी बनाती है, शिष्टाचारी बनाती है, व्यवहार कुशल बनाती है। सबको समान समझने का निर्देश देती है। धिक है आपकी विद्या पर , आपके पढ़े लिखे होने पर।

      तो पढ़ो कम गुनो ज्यादा, रहो सादा करो वादा, बनो शिष्टाचारी तो कहलाओगे सदाचारी और व्यवहारी।

प्यार मनुहार की दावतें

 सफर जारी है....९८६

०७.०७.२०२२

प्यार मनुहार की दावतें.....

तो सुनो किस्सा हमाए गांव की दावत को। छोरा को ब्याह हतो, माड़े की दावत चल रई, अब माड़ो जानत हो कि नाय, छोरा के मामा भात लाए करे बा दिना माड़ो गाड़ो जाय, दामाद  नाय तो फूफा गमला में एक बांस गाड़ो करें, बापे पत्ता छा के सजायो जाय, बाके नीचे ही ब्याह के सबरे काम होय करे। जे वरनी को गीत तो खूब सुनो होयगो....मडये के बीच लाडो ने केस सुखाए, बाबा चतुर वर ढूढो सुघढ वर ढूंढो दादी लेंगी कन्यादान, लाडो ने केस सुखाए। माड़ो मंडप ते कहबे, ब्याह तो मंडप में छये में ही पढ़ो जाबे, फेरा, कन्यादान सब रीत वहीं होबे। कछु सल राखो करो। पर तिहारी हू गनती नाने, आज को माने इन बातन ने, झट सीना कोरट मैरिज कर लेबे और महतारी बाप हू करे तो ऊ दस बारह दिना के ब्याह चार घंटा में निबट जाबे। पहले की तो बात ही और हती, कम से कम पांच दिना की तो लगुन ही निकलती कबहू कबहू तो सात दिना के ग्यारह दिना की हू हो जाती। घर में पीसना होतो,हल्दी फोड़ी पीसी जाती खल्लड मूसली ते ,सूप में कलाबा बांध के गेंहू फटके जाते, हथलगुन बनती, खीकड़ी बताशे कौमुरी मेंहदी बांटी जाती,  थापे धरे जाते, रतजगा होतो , ढोला गबते ....चिड़ी तोय चामरिया भावे, घर में सुंदर नार बलम तोय पर नारी भाबे दुपट्टा रेशमी।बैयर बानी खोइया करती खूब हंसी मजाक चलतो, गाली गबती, ढोलक पुजती। अब काऊ पे टैम ही नाय तो सब गड्डमद्द है गयो, बस दो घंटा में सब निबट जाबे। और का कहते बाय लेडीज संगीत बामे कोई गीत न गाबे बस सबरी डेक बजा के उल्टो सीधो डांस करे।

             का कह रए और कितकू भटक गए, अब जे  दिमाग ही तो है कभी कितकू चलो जाए और कबहू कितकू। तो हम तुमकू ज्योनार को किस्सा सुना रये। पत्तल बिछ गई है, कुल्लड़ सकोरा भोलुआ धर दए हैं। तुमने पत्तल पे पानी छिड़क लयो है , काऊ लंग ते शोर उठ रयो है भईया पत्तल बदल देयो, कुल्लड़ तो चुचा रयो है, सकोरा की किनोर झड़ रई है, हमकू तो न्यो सो दे दे। अब परसवैय्या आ गए, कासीफल को हरी अमिया डाल के साग बनो है, आलू को लपटेबा साग है, अब झोल आ गयो साब, सन्नाटो ऊ परसो जा रयो है। अब दही बूरा को नम्बर लग गयो, सकोरा में ताजो गाड़ो गाड़ो दही भर दयो और खोंच भर के बूरा डाल दयो है।  बूंदी के लडुआ, रसगुल्ला, रबड़ी मीठो धरो जा रयो हैं। अब गरमा गरम पूरी कचौरी को नम्बर लग गयो है। जेमो साब की पुकार लग गई है, पत्तल के भोजन में से पांच कौर निकाल के बापे जल छिड़क के मोंह में हाथ देनो शुरू हे गयो है। अब दुबारा परसवाई शुरू हे गई है। अब सुनो परोसबे और खबवैया के बीच को वार्तालाप रायतो रायतो.... नाय तो, पूरी.....रख दूरी ,जे पूरी लियात है हर पोत, जा किचोरी लिया एक नरम गरम सी, दही बूरो.... भोलुआ भर दे पूरो , रबड़ी....धर जा सबरी। पूरी कौन खाए जब रबड़ी जैसो तर माल सामने होय, रबड़ी झिक पेट खा लई तो अब लडुआ और गुलाब जामुन को नम्बर लग गयो और जा पाछे सन्नाटो पीयो जा रयो है धकापेल। अब पंगत उठ रई है, पत्तल दोना सकोरा समेटे जा रये हैं। अब दूसरी खेप तैयार ठाढी है। सांझ तक जे ही रेलमपेल मची रहेगी। फिर दूसरे दिना बारात की तैयारी शुरू हे जाएगी। ब्याह वाले घर में निरो काम होय करे, शहरन की तरह बाप महतारी ए हाथ बांधे बाबूजी मैम बने घूमबे की फुरसत नाय होय करो। पूरो गांव ब्याह के कामन में हाथ बंटाए करे।

              तो ऐसी होत करे, हमाए बिरज के गांव की दावत, घूम जइयो कबहू टैम होय तो। पर तुम पे टैम कहां होयगो, टैम की ई तो किल्लत है। कित्तो सारो काम फैलो परो है, बाय समेटे कि तुमायो किस्सा सुने। तुम पे तो कछु काम नाय, रोज एक नयो किस्सा सुनाबे बैठ जाओ, तिहाई भली चलाई। हमाए तो आफिस को टैम भयो जा रयो है, सो बाकी को कल सुनाइयो, भली। जैसे हम तो ठाले बैठे हते, हम पे कोई काम नाय, अरे बाबरो सबते मिलबो जुलबो चहिए, सब ते बात करो, बाकी सुनो अपनी सुनाओ, मन हल्को हे जाबे और कछु नाने, राम राम सबन कू।

मोकू लायो है कहा

 सफर जारी है....९७५

०६.०७.२०२२

मोकू लायो है कहा ......

उद्धव जब कृष्ण की पाती लेकर आते हैं तो गोपिकाएं जानना चाहती हैं कि कृष्ण ने उनके लिए क्या लिख भेजा है

मोकू लिखो है का कहती वे सभी उस पत्र में अपना नाम देखने की उत्सुक हैं वे सांवरे के प्रेम में पगी हैं लेकिन ज्ञान बाबरी नहीं हैं, उन्होने तो केवल प्रेम का ढाई आखर ही पढ़ा है। बाकी कुछ नहीं जानती। बेचारे उद्धव महाज्ञानी होने का दंभ पाले बैठे थे कि गोपिकाओं को ज्ञान दे कर आयेंगे। यहां तो संदर्भ ही उलट पलट गया, पूरी पाती खींच तान में फट गई, और गोपियों चिंदी चिंदी कागज ले उसे ही हृदय से लगाए बैठी है कि कृष्ण ने उन के लिए कुछ भेजा है, इससे बडा सौभाग्य उनका और क्या होगा। निर्गुण की उपासना करने की सलाह देते उद्धव को कह देती है हमारे पास तो एक ही मन था जो हम कृष्ण को दे चुके हैं, अब दूसरा मन कहां से लाएं। ऊधो मन नाही दस बीस , एक हतो सो गयो श्याम संग को आराधे ईश।

सोचो वहां तो उद्धव आए थे तभी गोपियों को इतना सुख मिला कि कम से कम हमारे प्रिय के पास से कोई आया तो है, उससे ही खबर मिल जाएगी प्रिय की। पूरे माहौल में विरह ही विरह घुला हुआ है लखियत कालिंदी अति कारी या मधुवन तुम कत रहत हरे, विरह वियोग श्याम सुंदर के ठाढे क्यों न जरे। जब प्यारे कन्हैया के आने की खबर और खबर लाने वाले दूत का आगमन इतना उत्साह भर देता है तो यदि सचमुच में प्यारा कान्हा आ जाए तो सब जैसे जी उठते हैं और दुनियां भर की मांओ के लिए तो उनका लाला ही कन्हैया होता है। उसके आने की खबर से ही उसकी बीमारी उड़नछू हो जाती है, मन उत्साह से भरा भरा रहता है और प्यार छलका छलका पड़ता है और कहीं वह सपना सचमुच पूरा हो जाए , आपका लाडेसर भले ही एक सप्ताह को आपके पास चला आए तो परिवार में कैसी खुशी की लहर सी दौड़ जाती है, लगता है जेठ की तपती धूप  अचानक ही सावन की हरियाली में बदल गई हो, जो पौधे धूप से झुलस से गए थे, एकदम सरसा गये। मन और तन कैसा फूल सा हल्का हो जता है।तो हमारा कान्हा भी माता पिता दाऊ भैया और सारे ब्रज वासियों से मिलने चला आया है। बड़े बड़े सूटकेस जादू के पिटारे हैं , खुलते दर खुलते जा रहे हैं, एक से एक करामाती वस्तुएं निकलती जा रही हैं, पर कोई नहीं कह रहा कि माेकू लायो है का, मोकू लायो है का, जो जो उनके लिए लाया गया, सबने सिर माथे लगाया है। लाला आया है यह बडी बात है, लाना तो सेकंडरी है। छोटा सबकी पसंद का ध्यान रख कर कुछ कुछ जरुर लाया है। सबकी रुचि इन सबसे अधिक बातों में है, कितनी कितनी बातें हैं जो सोच के रखी थीं हजार बारह सौ दिन कम थोड़े ही होते हैं, इतने दिनों की बातों को रोज का रोज लिखा गया होता तो अब तक तो ग्रंथ के ग्रंथ तैयार हो गए होते और कहीं भावनाओं के रेखाचित्र उकेरे गए होते तो कितने कितने चित्रों के बंडल होते जिन्हें सुरक्षित रखने को अभिलेखागार भी छोटे पड़ जाते। पर अब सब भूले जा रहे हैं अब उसे जी भर के देखें कि बात करें कि उसकी पसंद का सब बना बना के खिला दें कि नए देश की बातें पूछें कि उसकी सृजन शीलता के नमूने देखें कि समय को पकड़ें। समय तो यू ही भागा जा रहा है, लाला को भी ढेर सारे काम निबटाने हैं। सब जैसे गड्डमड हुआ जा रहा है।

सदा से ही  कम बोलने वाले पिता का मौन मुखर हो गया है । बडेला का प्यार लुटाने का तरीका अलग है , बहन का स्नेह है, बुआ का दुलार है, मौसी का लाड है और मां , उसका तो कहना ही क्या। उसकी तो आंखें भी बोलती है, ध्यान लगा कर बात सुनते भी वह कितने कितने स्वप्न बुनती  हर पल को संजो कर रखने के यत्न में लगी है। लाडेसर ज्याडा ही लड़ैता है तो कई कई बार उसे ममा बॉय का उपनाम भी मिल जाता है। अब पिटपुछने कितने बड़े हो जाएं, मां के लिए तो गोलू मोलू ही बने रहते हैं,मां की गोद का दायरा कम थोड़े ही हो जाता है। सो एक एक मिनट क्या एक एक सैकंड का महत्व है। एक लंबे अंतराल में कितना कुछ घट गया, घर की बुजुर्ग अम्मा का साया छिन गया, कोरोना की विभीषिका से तो कोई अछूता नहीं रहा। सब समय निकल ही गया। अब कुछ उबरे हैं। घर में उत्सव सा माहौल है, दीवारें भी बोलती सी लगती हैं, हवा अचानक से शीतल हो गई है, उमस गर्मी बैचेनी सब भूल भाल गए हैं, बस इसअवसर के एक एक पल को पूरी तरह जीने का मन है। तो जीते है इन पलों को पूरे शिद्दत से।

आलस वैरी तन बसै

 सफर जारी है.....९८४

०५.०७.२०२२

आलस वैरी तन बसै......

जो भी छोटा बडा काम करना हो, उसे कल पर वे लोग छोड़ते हैं जो अपने कमफर्ट जोन से बाहर ही नहीं निकलना चाहते। वे जैसा है सब वैसा ही रहने देते हैं पर स्थितियों को लेकर हमेशा रोते झींकते रहते हैं कि काश हम ये कर लेते वो कर लेते और फिर सारा दोष परिस्थिति या व्यक्ति अथवा वस्तु पर डाल दिन भर उसे ही आलोचित करते रहते हैं। मसलन नाच न जाने आंगन टेढ़ा या बाबा आबे तो घंटा बाजे को अपने जीवन का ध्येय वाक्य बना लेते हैं। उन्हें चाहिए तो सब पर वे स्वयं को रंचमात्र भी कष्ट नहीं देना चाहते। उनके मानस में यह बात अच्छी तरह बैठ गई होती है कि अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम, दास मलूका कह गये सब के दाता राम। वे तो उस दाताराम को भी चेलेंज कर देते हैं जब हमें ही करने को उठना पड़ा, तो तुम्हारी क्या उपयोगिता रह जाएगी। हम तो नौकरी के लिए आवेदन तक नहीं देंगे, अब दाताराम हैं तो हमें घर बैठे नौकरी देंगे, अपॉयंटमेंट लेटर हमारे घर चल कर आएगा, कोई सहायक हमें कुर्सी पर बिठा देगा। और फिर हम दाताराम को भूल भुला कर अपने को सर्वेश्वर मांगने लगेंगे कि देखो हमें तो बैठे बिठाए नौकरी मिल गई, क्या करें स्कूल प्रबंधन को हमारी बहुत जरुरत थी, माने ही नहीं वे, जबरन कुर्सी पर बैठा दिया।

यानी वे कहते भले हो सबके दाताराम पर वे अर्धाली पर ही जोर देते हैं अजगर करे न चाकरी। ये दोहा उन्हें इतना रट जाता है कि कबीर तो इनके स्वप्न में भी नहीं आते। कबीर को पढ़ा और गुना होता तो जानते कि आज करे सो काल कर काल करे सो अब, पल में परलै होएगी बहुरि करेगो कब। वे सब काम कल पर छोड़ देते हैं कि कल की कल देखी जायेगी, आज तो आनंद करें।और मजे की बात है कि कल कभी आता ही नहीं ।कल आज बनते ही कल में बदल जाता है। इस कल की बड़ी महिमा है, इसने अच्छे अच्छों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। इस कल के चक्कर में सब काम कल पर छोड़ दिए जाते हैं और ये बदमाश कभी आता ही नहीं, रोज़ कल की गुंजायस शेष रह जाती है। आलसियों के पास बहानों की लम्बी सूची तैयार रहती है कि आज मन नहीं है, कल देखेंगे। अरे छोड़ो कौन करे, ऐसे ही ठीक है। यानी कुछ कुछ कह कर अपने मन को तसल्ली देते रहते हैं कर के ही क्या हो जायेगा, जो कर लेते हैं उन्हें भी तो अंत में मरना ही होता है फिर ज़माने को क्या याद रह जाता है, तो हम तो बिना करे ही ठीक हैं। कोई अपनी दिन रात की मेहनत से अब्बल रहे, तो उसकी आलोचना करते डोलते हैं अरे हमें सब पता है बास की चमचागिरी की होगी, रिश्वत खिलाई होगी, तरक्की ऐसे ही थोड़े ही मिलती है। मतलब यह है कि खुद कुछ करेगें नहीं और दूसरों में दोष खोज खोज कर , उनकी आलोचना कर अपने मन को तसल्ली देते रहते हैं कि हम तो ऐसे ही भले। और वे करें भी क्यों, भाग्य के इतने धनी हैं कि कोई न कोई बकरा  बलि देने को उन्हें मिल ही जाता है और जो किसी ने इनकी हुक्म उदूली की तो उसे बेइज्जत कर अपने जीवन से ही बाहर फैंक देते हैं। कठोर और असंवेदनशील तो इतने अधिक होते हैं कि अगला इनकी देहरी पर सौ बार नाक रगड़े, अनकिए की माफी मांगता रहे, आंसू बहाता रहे पर इनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता, वे उसे अपने जीवन से दूध में पड़ी मक्खी सा निकाल फैंकते है। यानी जो उनके अनुरूप नहीं चलेगा वह आउट आफ साइट हो जायेगा।

इन महा आलसियों के किस्से बड़े रोचक हैं। उन्हें करने की आदत तो होती नहीं, सो पिछले किए को भुनाते रहे हैं। मसलन पहले तो मैं ये कर लेता था वो कर लेता था, बस अब इच्छा ही नहीं होती करने की। करने को तो आज भी कर लें पर बिना हाथ हिलाए ही यदि सब किया कराया मिल जाए तो इन दामों में क्या बुरा है। बस हम नहीं बदलेंगे, ऐसे थे और ऐसे रहेंगे। 

आपके आस पास भी ऐसे आलसी जरुर होंगे। उनसे अपने को बचा के रखिएगा। वे आलसी हैं तो हुआ करें, अपनी करनी को वे भुगते, बिना साफ सफ़ाई के गंदगी में उनको रहना रास आता है तो आए, अगले को भला क्या परेशानी होगी। वे जैसे हैं वैसे बने रहें, अपने आलस का फल भोगे, उन्हें भोगना ही होगा, वे इससे बच ही नहीं सकते। पर अपने अकर्मण्यता के छीटें दूसरों पर डालने से बाज आएं। बहुत फूली फूली चर ली उन्होंने, अब कोई बलि का बकरा नहीं बनेगा। आलस उनका, अकर्मण्यता उनकी, काम न करने का फैसला उनका, कमफर्ट जोन से बाहर आना वे नहीं चाहते,यथास्थितिवाद में वे बने रहना चाहते हैं तो ठीक है वे रहें और उसका परिणाम भुगते। उन्हें यही जीवन शैली रास आती है तो आया करे, लोगों को क्या परवाह। अरे परवाह तो अपनो को होती है। वे बार बार सुभाषित, उदाहरण और कहानी इसलिए ही सुनाते हैं कि शायद रोज रोज कहने से कुछ बदल जाए, अगले की समझ में भर जाए क्योंकि रसरी आबत जात से पत्थर पर भी निशान पड़ जाता है फिर वे तो मनुष्य हैं, शायद कहीं संवेदना,अच्छाई, समझ दुपक के बैठी हो और किसी बात का मारक प्रहार हो जाए और अगला सोते से जग जाए। किस किस को सुधारोगे, यहां तो हर शाख में उल्लू बैठा है और फिर ये भी नहीं भूलना चाहिए कि लंका में सब बाबन गज के ही होते हैं तो बात कह भले ही दो पर सुधार की कोई उम्मीद मत रखो। अपना काम करो और आगे बढ़ जाओ बस।

 सफर जारी है.....९८३

०४.०७.२०२२

हाशिए भी ज़रूरी हैं.....

जो परिधि से बाहर हैं, वे हाशिए पर ही हैं । पेज तक पर लिखते हाशिया छोड़ दिया जाता है। हाशिए अक्सर उपेक्षित ही रह जाते हैं, वे पेज की शोभा बढ़ाने के लिए होते हैं, अनुच्छेद परिवर्तित करना हो तो हाशिए के बाद भी कुछ स्पेस छोड़ दिया जाता है। रूलदार कागज हो तो हाशिए अनिवार्य रूप से होते ही हैं पर सादा कागज पर भी स्केल से हाशिए खींच लिए जाते हैं। दरअसल हाशिए पृष्ठ की शोभा को द्विगुणित करते हैं। तो हाशिए हाशिए होते हैं, वे मूल पृष्ठ नहीं होते, हां पृष्ठ का ज़रूरी हिस्सा अवश्य कहे जाते हैं।अब ये अलग संदर्भ है कि कुछ जरुरी नोट्स सदैव से हाशिए पर ही लिए जाते हैं । बहुत कुछ छूटा भी हाशिए पर ही लिखा जाता है। जांचक भी सुझाव और अंक उसी पर टीप देता है। तो इसका एक अर्थ यह भी हुआ कि हाशिए कभी कभी मुख्य पृष्ठ से महत्वपूर्ण हो सकते हैं। हां, उन पर मूल विषय वस्तु सुंदर सुंदर सुडौल अक्षरों में नहीं लिखी जाती। जो भी टीपा जाता है दरअसल वह मूल को अधिक व्यवस्थित करने के लिए तो बहुत महत्वपूर्ण होता है पर वह मूल नहीं होता।l

मूल ज्यादा बड़ा है या उसे सुडौल सुव्यवस्थित सुघड़ बनाने वाला हाशिया। कहीं कहीं तो मूल लिखे में इतनी काटपीट होती है कि सब हाशिए में ही सुधार सुधार कर लिख दिया जाता है और उस लिखे को फिर दूसरे नए पेज पर उतारना होता है ठीक वैसे ही जैसे संतान को जन्म तो जननी ही देती है पर कई बार उसे सर्वश्रेष्ठ सर्वोत्तम बनाने और सर्वोच्च आसन पर बैठाने का कार्य जननी के अभाव /अनुपस्थिति में पालिता करती है फिर भी पालिता जननी पद तो नहीं ही पाती न, जिन्दगी भर हाशिए पर ही बनी रहती है। दोनों एक दूसरे के पर्याय नहीं हुआ करते।हाशिए का वजूद परिधि के आगे सदैव बौना ही रहता है। यदि ऐसा है भी तो क्या, परिधि हाशिए भले ही क्षितिज की तरहआपस में कभी न मिले पर अपने अपने वजूद के साथ अस्तित्व में सदा ही बने रहते हैं। 

तो घर,परिवार,समाज,कार्यस्थल हर जगह हाशिए जैसे लोग बहुत ज़रूरी होते हैं, वे होते हैं पर नहीं होते। दिखते नहीं है पर बीम की तरह संभाले सब रहते हैं। स्तंभ की तरह सदैव खड़े रहते हैं। हाशिए हमेशा सजग होते हैं। उन्हें दौड़ के सब संभालना जो होता है। परिधि पर सूक्ष्म दृष्टि गढ़ाए रहते हैं, सबका अवलोकन करते रहते हैं , जहां गलत होता दिखा, सही करने दौड़ते हैं। वे अभ्यासी हैं। ज़िंदगी भर परिधि को आकार ही तो देते रहते हैं। उनका क्या, वे तो परिधि के चारों ओर ओट किए रहते हैं और इसी में खुश हो लेते हैं। दुनियां भले ही उन्हें महत्व दे न दे, पर वे अपने में भरे पूरे रहते हैं। क्या फर्क पड़ता हैं उन्हें इस उस की चकल्लस से, कौन उन्हें इन उन से प्रमाण चाहिए। सो हाशिए हाशिए ही बने रहें, इतना ही काफी है।

सांझ घिर आई है, सपेरो समेटो

 सफर जारी है.......९८२

०३.०७.२०२२

सांझ घिर आई है, सपेरो समेटो ......

वक्त कैसे उड़ा जा रहा है जैसे मुठ्ठी से रेत फिसल रही हो या पैर के नीचे से बालू खिसक रही हो यानी हम नदी के तट पर हैं। हां जीवन भी तो नदी ही है, इस तट से उस तट जाने में ही समय निकल जाता है, नाव पुरानी हो, और तूफान तेज हो तो नाव बहुत झटखोले खाती है पर खिवैया काली कमली वाला हो तब पार लग जाती है। कितने जतन से मानुष छोटे छोटे सामान  संजोता है,तिनका तिनका जोड़ घोंसला बनाता है पर समय बीतते कैसे सब एक बिंदु में सिमट जाता है। जीवन भर जोड़े बटोरे सामानों से, बुने गए रिश्ते नातों से कैसी चिपक सी हो जाती है, घर भले ही सामान से लदे फदे होते हों लेकिन मन खाली खाली से हो जाते हैं। ये तीसरा पहर होता है जब सांझ की आहट होती है, बच्चे अपनी अपनी मंजिल पर पहुंच चुके होते हैं और घर के बड़े बूढ़े चोला छोड़ चुके होते हैं । जिस मोड़ से दो की गृहस्थी ने विस्तार पाया था, अपने कर्तव्य पूरे कर फिर दो के दो ही रह जाते हैं । वर्षों के जोड़े सामान से लगाव सा हो जाता है, जानते हैं कि इन चूल्हा चक्की,सिल बटना, खल्लड मूसली,सूप छलनी, मशीन, सिलाई, क्रोशिया , बडी बडी बाबा आदम के जमाने की कढ़ाही, परात, कटोरदान, अचार की बोट मर्तबान का कोई उपयोग नहीं होना है, इनके विकल्प आ चुके हैं फिर भी उन्हें घर से बाहर करते जी कैसा कच्चा कच्चा सा हो आता है। सब जानते हैं कि जन्म के साथी तक लम्बे समय तक साथ नहीं रह पाते, कोई कभी तो कभी कोई बिछुड़ता चलता है फिर वस्तुओं से लगाव और चिपक का कोई मायने नहीं होता पर चिपक है तो है, लगाव है तो है, उसका क्या किया जाय।पुरानी आदतें कोई ऐसे ही थोड़े छूटती हैं फिर ये तो बरसों बरते गए सामान हैं।

 घर में साफ सफैयत करते, लिपाई पुताई  और रंग रोगन करते  उन सामानों को लंबे समय तक इधर से उधर सरकाया तो जा सकता है, उनकी जगह बदल बदल कर रखा जा सकता है पर उन्हें एकदम बाहर नहीं किया जा सकता। हालांकि बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि इनका अब कोई प्रयोग नहीं करेगा, नई नई डिजाइनों के इतने अच्छे अच्छे सामान आ गए हैं फिर भी उन्हें हटाते कुछ दरक सा जाता है। भले ही से ये नोस्टोलोजिया हो पर है तो है। हम जैसे मन कड़ा करके कितने कितने सामानों का बारा न्यारा कर देते हैं, पसंदीदा पुस्तकों को उठा पुस्तकालय में दे आते हैं, पुराने पेपरों को बेदरदी से दो टुकड़े कर देते हैं पर डायरियों को हटाते मन नहीं मानता। अब इतना साहस क्या कम है कि चार दिनों में चार अलमारियों को बिलकुल खाली कर दिया।इतने बहादुर तो बन ही गए ।ऐसे ऐसे भी भरे पड़े हैं जो बीस पच्चीस साल पुराने कागजातों को हाथ ही न लगाने दें, अपने आप से तो बिलकुल ही न कहें। अब ये अलग बात है कि तुम दुपका चोरी नजर बचा के इधर से उधर कर दो। 

 सच तो ये है कि घर और सामान ही नहीं बिखरता और भी बहुत कुछ बिखरता है जिसे कोई नाम नहीं दे पाते। बिखरे को समेटना सपेटना होता है। दरअसल ये फैलारा केवल भौतिक वस्तुओं भर का ही नहीं है, इसमें नाते रिश्ते, संबंध और सबसे अधिक मन है। मन जिसने अपने को हजार लाख टुकड़ों में बांट रखा है अचानक कैसे एक बिंदु में केंद्रित हो जाता है। शायद इसे ही समेटना सपेरना कहते होंगे। जितना जल्दी खुद को सब ओर से विलग कर उस परम पिता में केंद्रित हो जाएं, गीता के कर्मयोग को निभा सकें, सब करते सरते भी जल में कमल वत रह सकें, उतना ही अच्छा।बस ईश्वर इतनी शक्ति दें। इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमजोर हो न, हम चलें नेक रस्ते पर हमसे भूल कर भी कोई भूल हो न। हम न सोचें हमें क्या मिला है,हम ये सोचें किया क्या है अर्पण।बस इस प्रार्थना के बोलों को दोहराते रहेंऔर अन्याय और बुराई से बचे रहें, कर्तव्य पथ पर चलते रहें।

नेह की बारिश

 सफर जारी है.....९८१

०२.०७.२०२२

नेह की बारिश.....

जीवन में बहुत भागदौड़  है, सब बहुत ही व्यस्त हैं इतने व्यस्त कि जिस दो टाइम के भोजन के लिए सारे दिन इतनी भागदौड करते है , उसे खाने के लिए भी समय कम पड़ जाता है, भागते भागते खाना खाया जाता है, खाया क्या जाता है उसे जैसे तैसे निगल लिया जाता है,  उसे चबाया तक नहीं जाता। सच में सबके पास इतने इतने काम हैं, इतनी इतनी व्यस्तता है कि बस कुछ पूछो ही मत। किसी से राजी खुशी पूछने के लिए दो मिनट बात करो तो उसे लगता है मेरा समय नष्ट हुआ जा रहा है, सबको जल्दी है, किसी के पास टाइम नहीं। जीवन के लिए केवल और केवल कमाई ही सबसे जरुरी रह गई है, बाकी तो सब बहुत पीछे छूट गया है। और एक पगलैट हम हैं कि मिलने जुलने वालों से उनके नाते रिश्तेदारों के बारे में ही पूछते रहते हैं और अगला मुंह बिचका के ऐसे चल देता है जैसे कुछ कड़वी चीज मुंह में चली गई हो।

लोग अपनी व्यस्तता में परिवार के लोगों को ही याद नहीं रख पाते और हम उनसे नातेदार रिश्तेदार की बात पूछने का साहस कर बैठते हैं तो उनका नाक सिकोड़ना और मुंह बिचकाना तो बनता है न। इतना इतना काम है इतनी इतनी व्यस्तता है कि नाते रिश्तेदारी और सगे संबंधियों से मिलने, उनके यहां जाने के लिए समय का टोटा ही टोटा है। घर के जरुरी काम ही नहीं निबट पाते और इन्हें देखो ये अटरम सटरम नाते रिश्तेदारो में उलझे पड़े हैं। अरे, अपने निजी ही नहीं सपेरे जाते, फिर ये फलाने ढिकाने के चक्कर में कौन पड़े।ब्याह शादी उत्सव आयोजन की तो बात छोड़ो, हारी बीमारी में देखने जाने तक का समय नहीं है। अब मरे गिरे में शोक प्रकट करने के लिए जाना तो जरूरी है। अब ये चाहे दबाब की स्थिति हो या थोड़ी बहुत संवेदना शेष रही हो या सामाजिकता का तकाजा हो, कहा नहीं जा सकता। काम का कितना तो दबांब रहता है सबके पास, कितनी कितनी व्यस्तता है, सांस तक लेने की फुरसत नहीं है। बस व्यापार और नौकरी में ऐसे उलझे पड़े हैं कि पूछो ही मत। सब इस पेट के रगड़े झगड़े हैं, इसी की करामात है जो न करवा दे थोड़ा है। वैसे कभी अपने आप से पूछा है कि क्या वाकई पेट को इतने की मांग है, क्या इतना सब खा लिया जाता है, क्या खाने की भूख सुरसा की तरह मुंह फाड़ती जा रही है या हमारे शौक और सब कुछ पेट में ठूंसने की वृत्ति ने इस मोड़ पर ला दिया है। इस तरह से  चलता रहा तो आने वाली पीढ़ी तो इतनी व्यस्तता में नाते रिश्तेदारी सब भूल जायेगी। सगे बुआ मामा चाचा ताऊ के बच्चों को तो कजिन केटेगरी में वैसे ही रख दिया गया है और अन्य रिश्तों से दूर के कह कर कन्नी काट ली गई है। 

कैसा समाज तैयार कर रहे हैं हम अपने बच्चों के लिए, किस तरह के संस्कार के बीज बो रहे हैं, उन्हें अकेलापन विरासत में क्यों सौंप रहे हैं। क्या हम बिलकुल भूल गए उस राजा की कहानी को जो धन का और सोने का इतना लालची हो गया, इतना मुरीद हो गया कि यह वरदान मांग बैठा कि वह जिस भी वस्तु व्यक्ति को छूए, वह सब सोना हो जाए, मुसीबत तो तब हुई जब खाने के बरतन के साथ भोज्य सामग्री भी सोने की हो गई और जब बेटी को छूआ तो जीती जागती बेटी भी सोने की मूरत में बदल गई। राजा बहुत रोया पर क्या किया जा सकता था। राजा ने खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी, मूर्ख की तरह उसी डाल को काट दिया जिस पर बैठे थे। कमोवेश हम भी तो यही कर रहे हैं, अपनी रिश्तेदारी को ही नहीं जानते, अपने ददिहाल ननिहाल तक नहीं पता। आखिर इतने अकेले होकर हम खुश रह पाएंगे। आज जो धीरे धीरे सभी से कटते अपनी परिधि को हम दिन प्रतिदिन छोटा दर छोटा करते जा रहे हैं, इसका परिणाम भी सोचा है हमने। हमने तो यही पढ़ा था कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है, उसे सबसे मिलजुल कर रहना पसंद है। डर है कि सबसे कटता कहीं वह बिलकुल अकेला ही न पड़ जाए और जब चेते तब तक बहुत देर हो चुकी हो।

पढाई लिखाई के नाम पर तो हम वैसे ही हम अपने बच्चों को एकांतवास दे चुके हैं, न किसी रिश्तेदार से मुलाकात है न किसी परिचित को जानते हैं, बस हमने उन्हें एक ही सपना दिया है कि खूब पढ़ो और ऊंची नौकरी करो। इससे इतर कुछ और सोचने ही नहीं दिया गया। बस परिणाम आज हमारे सामने है। नाते रिश्तेदारों से दूर पैसों के तिलिस्म में अपने बच्चों को फंसा कर माता पिता ही कौन सुखी हैं। जीवन में सब जरुरी है। तो सब साथ साथ चलने दीजिए न , नाते रिश्तेदारी के स्नेहिल संबंधों से उसे मत काटिए, उसे सबके साथ बढ़ने दीजिए, सब में मिलने जुलने दीजिए। इससे इसका व्यक्तित्व और निखरेगा। नेह की बारिश बहुत जरुरी है, उसे भीगने दीजिए, सरसने दीजिए। उसे बांटना सीखने दीजिए, उदार बनाइए, जितना परिकर बढ़ेगा,उसके स्वभाव में शील, धैर्य, सामंजस्य विकसित होगा। पालक आप हैं आप ही तय कीजिए कि आखिर आप उसे किस रूप में विकसित करना चाहते हैं।

मिसफिटिया ही भले

 सफर जारी है....978

29.06.2022

 मिसफिटिया ही भले.....

अब इस नई व्यवस्था में हम जैसे तो फिट बैठने से रहे, कारण एक आध हो तो बताएं, लंबी लिस्ट है। देखो भाई बड़े बड़े क्लबों में जाने की तमीज और कल्चर हम एडॉप्ट नहीं कर पाए,तंबोला हमें आता नहीं, फैशन में जीरो और सजने संवरने में डबल जीरो, बात घुमा फिरा के कहने में कोई उपाधि ले नहीं पाए, इतने बड़े हो गए पर ये कला सीख ही नहीं पाए, दो टूक कह देते हैं बिना किसी लाग लपेट के  सो सबके बुरे हैं। इसी कारण बिरादरी में छेक दिए जाते हैं। दूध में से मक्खी की तरह अलग कर दिए जाते हैं ।मक्खन लगाना आता नहीं तो अधिकारी वैसे ही पसंद नही करते । नखरे  सधते नहीं हमसे, गुस्सा करें और डांटे बांटे तो पिच्च से हंसी छूट जाती है। भाषा की दृष्टि से वैसे ही गंवार है क्योंकि पढ़े लिखों जैसे गिटर पिटर करना नहीं आता। लते कपड़े ओढ़ने पहनने का सबूर है नहीं, कुछ भी लटका कर चल देते हैं, मैचिंग आती है न रंगों का बोध है। बस काले सफेद दुप्पटे और ब्लाउज में ही जिंदगी गुजर गई, ईस्टमैन कलर का जमाना तब था नहीं, अब बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम की तर्ज पर कुछ रंग चुने भी तो वे दो चार रंगो में सीमित हैं लाल हरा नीला पीला। अब अंग्रेजी कलर जानते नहीं।

फैशन की एबीसीडी पढ़नी आई नहीं, बस मुंह धोकर बालो में तेल चुपड लिया, घिर्र के बांध लिए, बालों का स्टाइल आता नहीं, केश सज्जा का डिप्लोमा किया नहीं। क्या करें जब स्कूल जाते कस के दो चोटी बांधने का रिवाज जो था और स्कूल छूटा तो पोनीटेल पर आकर गाडी अटक गई। मेकअप बाक्स आया भी तो क्रीम पावडर के अलावा कुछ समझ ही नहीं आया। फिर क्रीम पाउडर से भी कुट्टी कर ली, बालों की चिकनाई ही चेहरे पर मल ली और बहुत हुआ तो आंखों में काजल लगाया, बिंदी चिपकाई और खरामा खरामा चल देते हैं काम पर या रिश्तेदारी में, ब्याह बरात में, अब क्या हर जगह के लिए अलग अलग तैयार थोड़े ही हुआ जाएगा। अब जो हैं सो हैं, अब क्या खाक मुसलमा होंगे ।सो ज्यादा फैशनेबल और सो कॉल्ड बड़े लोगों के बीच बैठना पड़ जाए तो बडी घुटन महसूस होती है,लगता है छुट्टी की घंटी कब बजेगी, कब मुक्त होंगे जी।

तो बताओ ऐसा ऐरा गैरा पिछड़ा फिसड्डी बाबला सा प्राणी बदलते जमाने के साथ कदम ताल कैसे करे, आज के माहौल में कैसे फिट बैठे । दुनियां मॉडर्न किचिन तक पहुंच गई और हम अभी चौका बासन परात चकला बेलन चिमटाफूंकनी में ही उलझे पड़े हैं, घरों में केसरोल का लेटेस्ट मॉडल आ गया और हम ब्याह के कटोरादान में ही अटके पड़े हैं। अलाने फलाने की रिश्तेदारी में जाने को उतावले रहते हैं, सो घर परिवार अड़ोस पड़ोस इष्ट मित्रो सहेली वाहेली के मध्य  झुनझुने से बजते रहते हैं। बाबा आदम के जमाने के कहलाते हैं। बड़े कहें तो कहें ,छोटे बारे भी चलते फिरते हाथ साफ कर लेते हैं। अब क्या करें ये सब नहीं आता तो नहीं आता।

       तो इष्ट मित्रों ने सुझाया कि  ये सब सीखना बहुत जरुरी है आज के जमाने में , जमाने के साथ मिलकर चलो नहीं तो पिछड़ जाओगी। अंदर से आवाज आई  पिछड़ी तो हो ही और क्या पिछड़ोगी। ज्यादा ही नजदीक वालों ने सुझाया जो जो नहीं आता उसकी कोचिंग ले लो। सब सीख जाओगी। सीखते तो तब जब मन बनाया होता। हमें तो इसी फक्कड़ पन में आनंद आता है। कुछ लीपने पोतने की जरुरत तो नहीं पड़ती। पहले पोतें फिर घंटा भर तक घिस घिस के छुड़ाए तो लीपापोती करो ही क्यों। फिर दूसरी बोली छोड़ फ़ैशन को, पर्सनल्टी डेवलपमेंट की क्लास ज्वाइन कर लें, स्मार्टनेस तो भी आ जायेगी। अरे तो क्या स्मार्ट बनने का भी प्रशिक्षण होता है । फिर कल को कहोगी कि हाइट कम है हाई हील पहन लो, ऐसे कपड़े पहनो वैसा हेयर स्टाइल बनाओ। न भैया हम से नहीं होगा। हम तो बिना स्मार्ट ही भले।

       तो अब अनफिट हैं तो भले मिसफिट हैं तो भले, हम नाय बदल रए, हम तो ऐसे ही हैं, इतनी गुजर गई तो नेक और रही है वो ऊ गुजर जायेगी राम जी सब भली करिंगे।

मिसफिटिया ही भले

 सफर जारी है....978

29.06.2022

 मिसफिटिया ही भले.....

अब इस नई व्यवस्था में हम जैसे तो फिट बैठने से रहे, कारण एक आध हो तो बताएं, लंबी लिस्ट है। देखो भाई बड़े बड़े क्लबों में जाने की तमीज और कल्चर हम एडॉप्ट नहीं कर पाए,तंबोला हमें आता नहीं, फैशन में जीरो और सजने संवरने में डबल जीरो, बात घुमा फिरा के कहने में कोई उपाधि ले नहीं पाए, इतने बड़े हो गए पर ये कला सीख ही नहीं पाए, दो टूक कह देते हैं बिना किसी लाग लपेट के  सो सबके बुरे हैं। इसी कारण बिरादरी में छेक दिए जाते हैं। दूध में से मक्खी की तरह अलग कर दिए जाते हैं ।मक्खन लगाना आता नहीं तो अधिकारी वैसे ही पसंद नही करते । नखरे  सधते नहीं हमसे, गुस्सा करें और डांटे बांटे तो पिच्च से हंसी छूट जाती है। भाषा की दृष्टि से वैसे ही गंवार है क्योंकि पढ़े लिखों जैसे गिटर पिटर करना नहीं आता। लते कपड़े ओढ़ने पहनने का सबूर है नहीं, कुछ भी लटका कर चल देते हैं, मैचिंग आती है न रंगों का बोध है। बस काले सफेद दुप्पटे और ब्लाउज में ही जिंदगी गुजर गई, ईस्टमैन कलर का जमाना तब था नहीं, अब बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम की तर्ज पर कुछ रंग चुने भी तो वे दो चार रंगो में सीमित हैं लाल हरा नीला पीला। अब अंग्रेजी कलर जानते नहीं।

फैशन की एबीसीडी पढ़नी आई नहीं, बस मुंह धोकर बालो में तेल चुपड लिया, घिर्र के बांध लिए, बालों का स्टाइल आता नहीं, केश सज्जा का डिप्लोमा किया नहीं। क्या करें जब स्कूल जाते कस के दो चोटी बांधने का रिवाज जो था और स्कूल छूटा तो पोनीटेल पर आकर गाडी अटक गई। मेकअप बाक्स आया भी तो क्रीम पावडर के अलावा कुछ समझ ही नहीं आया। फिर क्रीम पाउडर से भी कुट्टी कर ली, बालों की चिकनाई ही चेहरे पर मल ली और बहुत हुआ तो आंखों में काजल लगाया, बिंदी चिपकाई और खरामा खरामा चल देते हैं काम पर या रिश्तेदारी में, ब्याह बरात में, अब क्या हर जगह के लिए अलग अलग तैयार थोड़े ही हुआ जाएगा। अब जो हैं सो हैं, अब क्या खाक मुसलमा होंगे ।सो ज्यादा फैशनेबल और सो कॉल्ड बड़े लोगों के बीच बैठना पड़ जाए तो बडी घुटन महसूस होती है,लगता है छुट्टी की घंटी कब बजेगी, कब मुक्त होंगे जी।

तो बताओ ऐसा ऐरा गैरा पिछड़ा फिसड्डी बाबला सा प्राणी बदलते जमाने के साथ कदम ताल कैसे करे, आज के माहौल में कैसे फिट बैठे । दुनियां मॉडर्न किचिन तक पहुंच गई और हम अभी चौका बासन परात चकला बेलन चिमटाफूंकनी में ही उलझे पड़े हैं, घरों में केसरोल का लेटेस्ट मॉडल आ गया और हम ब्याह के कटोरादान में ही अटके पड़े हैं। अलाने फलाने की रिश्तेदारी में जाने को उतावले रहते हैं, सो घर परिवार अड़ोस पड़ोस इष्ट मित्रो सहेली वाहेली के मध्य  झुनझुने से बजते रहते हैं। बाबा आदम के जमाने के कहलाते हैं। बड़े कहें तो कहें ,छोटे बारे भी चलते फिरते हाथ साफ कर लेते हैं। अब क्या करें ये सब नहीं आता तो नहीं आता।

       तो इष्ट मित्रों ने सुझाया कि  ये सब सीखना बहुत जरुरी है आज के जमाने में , जमाने के साथ मिलकर चलो नहीं तो पिछड़ जाओगी। अंदर से आवाज आई  पिछड़ी तो हो ही और क्या पिछड़ोगी। ज्यादा ही नजदीक वालों ने सुझाया जो जो नहीं आता उसकी कोचिंग ले लो। सब सीख जाओगी। सीखते तो तब जब मन बनाया होता। हमें तो इसी फक्कड़ पन में आनंद आता है। कुछ लीपने पोतने की जरुरत तो नहीं पड़ती। पहले पोतें फिर घंटा भर तक घिस घिस के छुड़ाए तो लीपापोती करो ही क्यों। फिर दूसरी बोली छोड़ फ़ैशन को, पर्सनल्टी डेवलपमेंट की क्लास ज्वाइन कर लें, स्मार्टनेस तो भी आ जायेगी। अरे तो क्या स्मार्ट बनने का भी प्रशिक्षण होता है । फिर कल को कहोगी कि हाइट कम है हाई हील पहन लो, ऐसे कपड़े पहनो वैसा हेयर स्टाइल बनाओ। न भैया हम से नहीं होगा। हम तो बिना स्मार्ट ही भले।

       तो अब अनफिट हैं तो भले मिसफिट हैं तो भले, हम नाय बदल रए, हम तो ऐसे ही हैं, इतनी गुजर गई तो नेक और रही है वो ऊ गुजर जायेगी राम जी सब भली करिंगे।

 सफर जारी है....977

28.06.2022

चलते चलो चलते चलो.....

हां तो चल ही तो रहे हैं जब से होश संभाला है। कितना तो चल लिये , जितना रास्ता नाप आए उसका दूना आगे दिखता है। जाने कितनी लंबी सड़क है कि कहीं ओर छोर दिखाई ही नहीं देता। बस सब एक ही राग अलाप रहे हैं चलते चलो चलते चलो, चरैवति चरैवति । अरे कोई बताएगा क्या कि कुल कितने किलोमीटर की यात्रा तय करनी है, कब तक चलते रहना है, मंजिल कब आयेगी, आयेगी भी कि नहीं या छोटे छोटे पड़ावों में ही संतोष खोजना होगा। अब ये सब कोई बताएं भी कैसे, सब हमारी तरह यात्री ही हैं कोई दस कदम आगे तो कोई दस कदम पीछे, सब भागे ही जा रहे हैं, सबको जल्दी है पर पता किसी को नहीं कि आखिर जाना कहां है। मार धकापेल मची हुई है। सब हाय हाय कर रहें हैं।

       दुनिया में आए नहीं कि स्कूल जाओ स्कूल जाओ  की रट शुरू गई, अरे न मन भर कर सो पाए न खेल पाए बस जब देखो स्कूल का काम कर लिया की डांट फटकार, उससे निबटो तो घर पर भी पढ़ो, पढ़ाई नहीं जी का जंजाल हो गई, खैर स्कूल कालेज की पढ़ाई पूरी हुई तो सोचा अब आराम करेंगे, सब क्लास तो पढ़ ली पर नहीं ये तो किताब की पढ़ाई थी, असली पढ़ाई तो अब शुरू होनी थी। जिंदगी जीने की पढ़ाई। स्कूली पढ़ाई में परीक्षा टाइम टेबिल /स्कीम पहले लिखवा दी जाती, सिलेबस निश्चित था ही,जरुरी प्रश्नो का संकेत कर दिया जाता, फिर गैस पेपर और पिछले वर्ष के सॉल्व्ड पेपर बाजार में मिल जाते थे सो अंदाजा हो जाता कि परीक्षा में कैसा पेपर आएगा। पर जिंदगी की परीक्षा में तो सब कुछ अनिश्चित था न कोई निर्धारित सिलेबस न कोई महत्वपूर्ण प्रश्नों की चर्चा, न गैस और सॉल्व्ड पेपर, बस चढ़ जा बेटा सूली पर भली करेगें राम।

इस परीक्षा को देते पता चल रहा है कि घर वाले सब सिखाने पर क्यों तुले हुए थे।पहले स्कूल जाने की फांय फांय फिर पढ़ लिख लिये तो ब्याह की जल्दी मच गई, चौपाए हो गए ,घर गृहस्थी बस गई तो बालको को टिकटिकाते रहे कि आगे बढ़ो और आगे बढ़ो, वे भी अपनी अपनी राह पकड़ लिये, अपने घर बार में व्यस्त हो गए तो अब फिर दुबारा से सुई हम पर आकर अटक गई है कि आगे बढ़ो आगे, अब कितना आगे बढ़ें, बी ए एम ए ,पी एचडी सब क्लास तो पढ़ लिए, फिर घर गृहस्थी में जुते रहे, अब तीसरा पन आ गया, बाल चांदी हो गए, शरीर में आलस भर गया पर रसना अपना स्वाद खूब खोज लेती है। कुछ करें चाहे न करें, झेंदा तो भरना ही है। तुम्हारी भली चलाई, तुम तो कहते ही  रहोगे, पहले कहना सुनना माता पिता के हिस्से में था, घर बदला तो सास ससुर ने कमान संभाल ली । वे स्वर्ग सिधारे तो कहने वाले और बढ़ गए। अब जे बताओ यदि हमने पूरी ताकत लगाकर पृथ्वी के गोल गोल चक्कर लगा भी लिये तो तुम तो चंदा तारे तोड़ने और आकाश को छूने की बात करने लगोगे । अब वो तो हमसे होने से रहा। 

तो बहुत कर लिया, बहुत चल लिया, अब क्या चलते ही रहें, मंजिल कितनी दूर है बताता कोई नहीं ,बस जिसे देखो चलते रहो चलते रहो की तिकतिक लगाए हुए है। जैसे हम नही चले तो पूरी दुनिया रुक जाएगी, हवा नहीं चलेगी, सूरज नहीं निकलेगा। अरे भाई एक हमारे न चलने से क्या आफत आ जायेगी, अब नहीं चलेंगे, बहुत चल लिया । हम तो एक क्या आधा कदम भी नहीं चलते पर क्या करें हाईकमान का ऑर्डर आ गया कि जब तक सांस तब तक आस तो चले चलो, आगे बढ़ते रहो। मार कविता सुना दी.... बढ़े चलो बढ़े चलो वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो, सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ हो, तुम निडर डटे रहो। तो ऐसे चलें या वैसे, तेज चलें या धीमे , चलना तो पड़ेगा ही, चल ही रहे हैं क्योंकि चलना ही है। चलना ही जिंदगी है रुकना है मौत तेरी, ओ राह के मुसाफिर किस बात की है देरी।

रहिमन चुप हे बैठिए

 सफर जारी है...976

27.06.2022

रहिमन चुप हे बैठिए......

समय समय की बात है कि जो कभी फाखते उड़ाया करते थे, वे आज मुंह बन्द किए बैठे हैं और जो मरे पड़े थे, उनके आंगन में बहार ही बहार है। जिस छलनी में छप्पन छेद है वह भी चार बात कह कर चलती है और जो सबको लीड करते थे, वे कम्बल में मुंह छिपाए पड़े हैं। सब समय की बलिहार है। रहीम तो सब जाने माने है तभी लिख देते हैं रहिमन पक्ष श्राद्ध में कागा हंसा होय। जिन कौओ को कोई टका सेर नहीं पूछता, जिनकी कांव कांव से सब परेशान हो जाते हैं, कौए जैसी वृत्ति वालों की आलोचना करते हैं ,वही कौए श्राद्ध पक्ष में आदर के साथ बुलाकर खीर पूड़ी से जिमाए जाते हैं। काम सरे कछु और है काम परे कछु और का दौर है। मौर जो वर के सिर पर धरी जाती है, फेरे होने के बाद नदी में सिरा दी जाती है इससे माैर की उपयोगिता कम तो नहीं हो जाती।

आजकल जो घट रहा है , फिल्मी गीतों में तो बहुत पहले ही प्रतिध्वनित हो गया था ...रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलियुग आएगा, हंस चुगेगा दाना दुम का कौआ मोती खाएगा। तो ठीक है कौए को मोती खाने देते है पर सवाल ये है कि क्या कौए को मोती रास आयेंगे, जिंदगी भर तो विष्ठा खाता रहा, कीची कीची कौआ और दूध मलाई लला खाता रहा, अब एकदम से मोती से पकवान खाके कौए को कहीं अपच न हो जाए, पेट न फूल जाए, स्वाद स्वाद में कहीं ज्यादा खा गया तो लेने के देने न पड जाए। तो भाई इस काक प्रजाति को समझाना जरुरी है। बारह बरस बाद तो घूरे के दिन भी फिर जाते हैं फिर सत्य क्यो नहीं जीतेगा। अभी कंस, रावण और कौरवों का समय चल रहा है तो शांत बैठे रहिए। रहीम बार बार समझा कर हार गए कि रहिमन चुप हे बैठिए देख दिनन को फेर, जब नीके दिन आइए बनत न लागे देर। 

कितने कितने संदर्भ है जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि समय बड़ा बलवान है। पुरुष बली नहीं होत है समय बड़ो बलवान,भीलन लूटी गोपिका वही अर्जुन वही बाण। अर्जुन के पास तो कृष्ण का बल था और जब कृष्ण ने अपनी लीला का संवरण कर लिया तो उनके साथ ही अर्जुन का बल भी चला गया। अर्जुन और उनके वाण तो वही थे पर फिर भी धनुर्धारी अर्जुन का कुछ बस न चला और भीलो ने गोपिकाओ को लूट लिया।तो हम कितने भी समझदार और बलशाली क्यों न हों, समय पर किसी का बस नहीं चलता। समय की बलिहार है कि राजा को रंक और रंक को राजा बना दे। फिर हम तो मानुष हैं जब लीलाधारी भी समय के प्रभाव से नहीं बच सकें तो हम कौन खेत की मूली हैं। 

       राम जैसे बलशाली और मर्यादा पुरुषोत्तम की पत्नी को लंका का राजा बहरूपिया का वेश बना कर हर ले गया, राम वन में  सीते सीते पुकारते रहे, वन के जीव जंतुओं से उनका पता पूछते रहे हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी, तुम देखी सीता मृगनयनी। वो तो भला हो जो हनुमान जी मिल गए और समुद्र लांघ कर सीता का पता लगा लाए। और देखो दशरथ के ठोठा होकर भी चौदह वर्ष तक वन में भटकना पड़ा। दूसरे कृष्ण जी जो पैदा नहीं हुए उससे पहले ही शत्रु पैदा हो गए, साल भर के नहीं हुए तब तक तो कितने कितने राक्षस वेश बदल कर उन्हें मारने पहुंच गए। अब बताओ जन्मते ही उन्होंने कौन से दुष्कर्म कर दिए कि किसी की गगरी फोड़ दी। पांडवों ने कौरवों का क्या बिगाड़ा था कि वे युद्ध के बिना सुई की नोंक के बराबर जमीन देने को तैयार नहीं हुए, पांच गांव की कौन कहे। और देखो पांच पांच पति होते सोते द्रोपदी का चीर हरण होता रहा और पांचों पांडव सिर झुकाए बेबस से बैठे रहै। बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास किसी गलती के कारण थोड़े ही मिला था, बस समय खराब था, सूधे दिन नहीं चल रहे थे। और सुनो राजा नल पर विपदा आई, बुरे दिन आए तो खूंटी हार निगल गई, पक्षी उड़ गए, मछली पानी में चली गई और जब समय ने पलटा खाया तो खूंटी हार उगलने लगी, तीतर उड़ उड़ के आ गए, मछली पानी से बाहर आने को उतावली हो गईं।

 तो भैया रे, सब समय समय की बात है। जब दिना उल्टे आते हैं तो अपने भी पराए हो जाते हैं, सगे साथ छोड़ जाते हैं, अड़ोसी पडौसी बगले झांकते है और कोई सीधे मुंह बात नहीं करता। तो उस समय को उका जाओ, चुप्पी साध लो, चुप लगा जाओ, ये बुरे दिन खराब समय हमेशा रहने वाला नहीं है। बस बीत ही जाएगा। जब अच्छे दिन नहीं रहे तो भला बुरे दिन ही क्यों टिकेंगे। तो हम जैसे तो रहीम को याद कर सबर कर लेते हैं फिर नीके दिन आयेंगे बनत न लागे देर।

प्रेम किए दुःख होय

 सफर जारी है....975

26.06.2022

प्रेम किए दुःख होय......

ये ढाई आखर का शब्द प्यार/प्रेम न जाने कितनों कितनों की तकदीर बदल देता है, किसी की झोली में खुशियां ही खुशियां डाल देता है, उसे उत्साह से भर देता है और वह गाता डोलता है एक तू जो मिला सारी दुनिया मिली। जो कहीं किसी को उसका प्यार न मिले या प्यार में धोखा मिल गया तो वह दुख के सागर में डूब जाता है,रोता बिसूरता है तुम न जाने किस जहां में खो गए , उसके विछोह में वियोग में पगला जाता है।पता नहीं हम क्यों भूल जाते हैं कि प्रेम सौदा नहीं होता कि एक ने किया तो उसे प्रतिदान मिले ही मिले. अब प्यार किया या हो गया जैसा कि प्यार किया नहीं जाता हो जाता है,तो हो गया तो हो गया, उस पर किस का बस। अब ये जरूरी तो नहीं कि प्यार करो और उसका प्रतिदान भी मिले ही मिले। मिल जाएं तो सौभाग्य और न मिले तो क्या, प्यार थोड़े ही कम हो जाता है, फिर  प्यार शर्तों पर थोड़े ही किया जाता है कि ऐसा होगा तो ऐसा होगा, मेरे अनुसार चलो तो प्यार है और जो तुमने नेक अपने मन की कर ली तो प्यार बिला गया, उड़न छू हो गया।ये तय थोड़े ही हुआ था कि तुम एक पैसा दोगे वह दस लाख देगा। तुम दस करोड़ प्यार करो, वह एक भी न करे क्योंकि प्यार तुम कर रहे हो, वह नहीं।अब वे लम्हे जिन में बड़े बड़े वादे किए गए, साथ निभाने के दावे ठोके गए कि जब तक सूरज चांद रहेगा इन हाथों में हाथ रहेगा, गंगा जमुना में जब तक ये पानी रहे,मेरे सजना तेरी जिंदगानी रहे या ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे, छोड़ेंगे हम मगर तेरा साथ नहीं छोड़ेंगे जैसे गीतों नगमों की पंक्ति गुनगुनाई गईं। क्या वे वादे इतने कच्चे थे कि जरा सी ठें लगी और टूट गये। 63 का आंकड़ा 36में बदल गया, जरा सा माहौल क्या बदला, हवा का रुख तिरछा क्या हुआ, मन का सा क्या नहीं हुआ,सुर ही बदल गए, तुम तो दुर्वासा बन गए भाई, सब तहस नहस कर दिया, कोई मेल मुरब्बत नहीं बरती, अगला पिछला कोई क्षण याद नहीं आया, तुमने तो चुनरी और पटके में लगी गांठ कैंची से ही काट दी कि न बाबा आएगा न घंटा बाजेगा। सब भुला बिसरा दिया। बिलकुल महाजन बन गए, सब सूद के साथ वसूल लिया। एक प्रहार की जगह दस गुना प्रहार कर दिए फिर भी क्रोधाग्नि कम नहीं हुई बल्कि हर बार अगले के आने की आहट उसमें घी की आहुति का काम करती रही।

 नहीं भाई नहीं ,ये तो प्यार की परिभाषा नहीं हो सकती,ये सब तो प्रेम के दायरे में आता ही नहीं। प्यार के परिंदे तो बने पर उनके किस्से नहीं पढ़े क्या, लैला मजनू, शीरी फरहाद, पारो देवदास ये पुराने हो भी गए तो नए में से मिसाल चुन लेते। अरे इन मीरा, राधा, गोपी, शबरी का इतिहास ही जान लेते।प्रेम दीवानी तो मीरा भी थी, जब देखो तब श्याम रंग में डूबी रहती थी, गाती रहती थी ऐ री मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दरद न जाने कोय, घायल की गति घायल जाने के जिही लागी सोय। मीरा ने तो अपने प्रेम पात्र को मोल खरीद लिया, माई री मैंने लीनो गोविंदा मोल, कोई कहे मंहगो कोई कहे सस्तो लियो री तराजू तोल। श्याम सुंदर तो थे ही इतने मोहक कि गोपियां सांवरे के प्रेम में रंग गई, उद्धव ज्ञान की पोटरी लेकर आए गोपियों को समझाने, आयो घोष बड़ो व्योपारी तो साफ़ साफ़ कह दिया ऊधो मन नाहे दस बीस, एक हतो सो गयो श्याम संग को आराधे ईश। बेचारे उद्धव अपना सा मुंह लेकर लौट गए। गोपियों को इससे लेना देना कहां था कि श्याम उन्हें प्यार करते हैं या नहीं, तुम करो मत करो, हम तो करते हैं, इतना काफ़ी है। घनानंद अपनी तान अलग छेड़ते हैं अति सूधो सनेह को मारग है जामे नेक सयानप बांक नहीं, और अंत में उलाहना भी दे देते हैं तुम कौन सी पाटी पढ़े हो लला मन लेत हो देहु छटाक नहीं। अब इन सब की तो चर्चा करना ही बेकार है। ये नए युग की प्रीत है जिसमें युग युग से हम गीत मिलन के गाते रहे हैं, गाते रहेंगे की कोई गुंजाइश बाकी नहीं रही।

 अब नए जमाने के प्यार हैं जिसमें अपना अपना फायदा देखा जाता है कि जितना मिलेगा उतना ही प्यार करेंगे। और जो इसमें भावुक हो जाते हैं वे निरे बेवकूफ कहलाते हैं, जब देखो टसूबे बहाते रहते हैं, मिलने के लिए तड़फते रहते हैं और अगला उसे कुत्ते सा दुतकारता रहता है। अरे ये भावुकता छोड़ो, जब अगला तुम्हें कौड़ी के भाव नहीं पूछ रहा, सूखी घास भी नहीं डाल रहा तो तुम क्यों बार बार उसकी देहरी पर सिर फोड़ने चले आते हो और हर बार जलील होकर अपना सा मुंह लेकर लौटते हो। ये एकतरफा प्यार के किस्से  समझ से बिलकुल परे हैं। एक ऐंठ के मारे पैंठ को जाता है, बात बात पर लतियाता  है और दूसरा फिर भी वहीं सिर पटकता है। अरे भाई, जब अगला कान में रूई ठूंसे बैठा है तो काहे को सप्तम स्वर में रेंकते हो। फिर तुम्हें बार बार एक ही संवाद को सुनने में आनंद आता हो तो तुम्हारी मर्जी। भले ही ये एकतरफा प्यार हो पर प्यार करने वाला इसी में खुश है। उसे प्रेमास्पद से कोई शिकायत भी नहीं, वह उसे देखे, उसकी उपेक्षा करें, उससे दूरी बरते, कोई फरक ही नहीं पड़ता। वह तो मान कर चलता है प्रेम का कंटीला रास्ता तो उसने चुना है, स्वेच्छा से चुना है किसी ने जोर जबरदस्ती तो नहीं की।

  अब यदि प्रेमास्पद को आपने भगवान जी का दर्जा दे रखा है तो  ये भी याद रखो प्रभु तो तपस्या पूरी होने पर दर्शन देते हैं। और तपस्या पूरी होने का समय निर्धारित करना कम से कम तुम्हारे हाथ तो है नहीं , वे जब आएंगे तब आएंगे, तुम तो बस धैर्य बनाए रखो, तपस्या पूरी हो जाएगी तो दर्शन हो जाएंगे नहीं तो अगले जन्म में मिलेंगे, क्या परवाह है। शबरी ने लंबी प्रतीक्षा की कि राम आएंगे, राम आए। गोपियों को भी अंतत सांवरा मिल गया, तो तुम भी धीरज धरे रहो। वैसे एक बात बताओगे बंधु ,कभी रत्नावली की फटकार याद आती है क्या अस्थि चरम मय देह में तामें ऐसी प्रीत, जो होती भगवान में तर जाते भवभीत। जितना समय जितनी आस्था जितना भाव किसी व्यक्ति में लगाने की ठानी है ,उसका आधा भी भगवान में लगा देते , तो मन में शांति आ जाती। प्यार की ढैया अपनी जगह है और मान सम्मान अपनी जगह। उतना झुको जिससे पीठ में कूबड़ न निकल आए , कम से कम अपनी और अपनों की इज्जत तो बनी रहने दो।  ब्याह करो, गृहस्थी जोड़ो, लड़ो झगड़ो, चार कह सुन लो, मार झंझट है, प्यार का समय धरा किसके पास है, ये बड़े लोगों के चोचले होते होंगे, होता होगा कभी प्यार अंधा, अब तो प्यार कम सौदे अधिक होते हैं। अरे घर गृहस्थी से फुर्सत मिले तो आई लव यू की सोचें, मध्यवर्गीय तो दाल रोटी की व्यवस्था में ही उलझा रह जाता है। हां ,साथ रहते एक दूसरे की परवाह जरूर होती है चाहो तो उसे प्यार का नाम भले दे लो। तो प्यार की ढय्या तुम्हें ही मुबारक हो, हम तो ऐसे ही भले।

कर्ता के कछु और

 सफर जारी है....974

25.06.2022

कर्ता के कछु और......

यदि सब कुछ व्यक्ति के हाथ में होता तो संभवत दुख की परिकल्पना ही नहीं होती पर ऐसा हो कहां पाता है। कोई तन दुखी कोई मन दुखी, कोई धन बिन रहत उदास, थोड़े थोड़े सब दुखी एक सुखी राम के दास।हर के जीवन में कुछ न कुछ दुख हैं, चिंताएं हैं जिनके समाधान खोजे से भी नहीं मिलते। व्यक्ति सोचता कुछ और है और होता कुछ और है। कुछ दुख ऐसे होते हैं जिन्हें उघाड़ कर सबको दिखाया नहीं जा सकता पर वे मन को अंदर ही अंदर खोखला कर देते हैं । फिर रहीम याद आते हैं... रहिमन अंसुवा नयन ढरि जिय दुख प्रगट करेही,जाहि निकारो गेह ते कस न भेद कहि देही। 

क्यों बांटो किसी से अपना दुख , किसी को कह कर हल्के हो भी जाओगे तो भला क्या होगा, अगला दो की चार बना कर तीसरे के कान में कू कर देगा, तीसरा चौथे के और चौथा पांचवें के में। यानी जो बात आपके पेट में नहीं पची वह भला दूसरे के में  कैसे पचेगी। बिना कहे तो उसका पेट फूल के तोमडिया हो जाएगा, फिर कैसी होएगी। तो। हर को  अपने दुख तो खुद ही झेलने होते हैं पर जब गागर ऊपर तक भर जाती है तो न चाहते भी छलक ही जाती है। कभी कभी लगता है आंखों की प्यालियों में कटोरियों में अश्रु जल जब समा नहीं पाता तो वेग से गालों पर बहता जाता है, लाख रूमाल और नेपकिन से आंखें पोंछते रहो पर आंखों से बरसात तो बंद नहीं होती न। साथ साथ सुबक भी निकलती रहती है, आवाज भारी हो जाती है, आंखे डबडबाई सी रहती है, कुछ का कुछ मुंह से निकल जाता है पर इस सबसे दुःख थोड़े ही कम हो जाता है, हां दुख की अभिव्यक्ति भले हो जाती हो।

      कितने कितने दुख है इस जगत में, मनचाहा न मिलने का दुख, मिल जाए तो उसे सहेजे रहने का दुख, जरा  चूक हुई नहीं कि उसके खो जाने, बिल्ट जाने और बिछड़ जाने का दुख। और फिर जो बिछड़ जाता है ,उसे खोजते खोजते खोजते पूरी जिंदगी बीत जाती है लेकिन वह न जाने कहां लुप्त हो जाता है, हमसे बिछड़ जाता है। जो कभी अपने थे, वे पराए हो जाते हैं। फिर दुनिया समझा समझा कर हार जाए, मन नहीं मानता।  अतीत की गलियों में गोल गोल घूमता रहता है, समय न जाने कितना आगे बढ़ जाता है, कितना पानी बह जाता है पर हम वहीं के वहीं खड़े पुरानी ,सुंदर और मनभावन यादों में खोए रहते हैं। ये यादें ही तो मन दुखाती हैं, बड़ा तड़फाती हैं, बार बार आंखें डबडबा जाती हैं पर फिर खुद ही खुद को सांत्वना देनी होती है, मन को संभालना होता है, दिनचर्या पूरी करनी होती है, सामाजिकता निभानी होती है पर जैसे ही एकांत मिलता है कि यादें आपने घेरे में ले लेती हैं।

      किसी दूसरे को समझाना कितना सरल होता है, कैसे कैसे उदाहरण और नजीर दे दिए जाते हैं पर भगवान न करे किसी अपने को क्या ,दुश्मन को भी दुख की छाया भी  छू सके। अपने को क्षण भर अगले की स्थिति में रख कर देखो तो अहसास होगा कि दुख,बिछड़ने का दुख, अपने सबसे प्यारे वस्तु/ व्यक्ति के विमुख हो जाने और उससे अलग होने का दुख कैसा तोड़ता है, कितनी पीड़ा होती है, इसे तो भुक्त भोगी ही जान सकता है। घायल की गति घायल जाने के जिही लागी सोय। अगले व्यक्ति को उस दुख का अहसास तो तब होता जब वह उसका अंग बना होता। जब अपना दिमाग न चले तो इसी बात पर विश्वास करना होता है कि  मेरे मन कछु ओर है कर्ता के कुछ ओर। फिर ये कष्ट हमें ईश्वर की ओर से दिए गए हैं, तो भोगने तो होंगे ही चाहे कलप कलप के रो रो के भोगे या ईश्वर का प्रसाद मान सिर झुका स्वीकार लें। कुछ दुखों के समाधान नहीं हुआ करते, बस उन्हें भोगना ही होता है। तो ईश्वर जिन कष्टों को दूर नहीं कर सकता फिर चाहे वे अपने हो या अपनो के, उन्हें सहने की शक्ति दे। ये दिन भी बीत ही जायेंगे। जब वे दिन नहीं रहे तो भला ये ऐसे कितने दिन टिकेंगे। दुःख भरे दिन बीते रे भैया फिर सुख आए रे, रंग जीवन में नया छाए रे।

 सफर जारी है.….973

24.06.2022

हमने आंगन नहीं बुहारा......

झाड़ना बुहारना दैनिक क्रियाएं हैं।झाड़ू मारना मुहावरा  भले हो ,जिस किसी अर्थ में प्रयुक्त होता हो पर सच तो यह है कि झाड़ू और बुहारी के बिना किसी का काम नहीं चलता। नए घर में प्रवेश करते तीन वस्तुएं अनिवार्य रूप से सबसे पहले रखी जाती हैं पानी का बर्तन घड़ा, सुराही आदि, नमक और भगवान का विग्रह, उनकी तस्वीर अथवा प्रतिमा। तीनों के संदर्भ भी बहुत स्पष्ट हैं, घर की साफ सफैयत के लिए झाड़ू, खाने में सबसे जरूरी नमक शायद यह उस समय की कल्पना रही होगी जब नोन, तेल, लकड़ी जीवन जीने के लिए जरूरी रहे होंगे, और ईश्वर  तो सब का रखवाला है तो उसे तो किसी न किसी रूप में प्रतिष्ठित होना ही था। उच्च वर्ग में झाड़ू का स्थान वैक्यूम क्लीनर ने ले लिया। साधन भले ही बदलें हो पर साफ सफाई की संकल्पना तो शाश्वत है।

कुत्ता तक जहां बैठता है, पूंछ से उस जगह को झाड़ लेता है फिर हम तो मानुष हैं बिना साफ सफाई के कैसे रह सकते हैं। घर को धो ओ, झाड़ू पोंछे से साफ करो अब ये काम खुद करो या किसी सेवक सेविका से करवाओ पर घर साफ़ करना जरूरी है जहां काम करने जाते हो ,सफ़ाई तो वहां भी चाहिए। जगह के साथ साथ शरीर और वस्त्र की स्वच्छता आवश्यक है तभी तो रोज सवेरे उठते पहले स्नान करते हैं, साफ़ सुथरे वस्त्र पहनते हैं, रसोई को साफ़ कर भोजन बनाते हैं, हाथ धोकर खाना खाते हैं आदि आदि। ये आदत बहुत बचपन से ही डाल दी जाती है। तो सफ़ाई को लेकर हम सभी सतर्क रहते हैं फिर चाहे वह शारीरिक सफ़ाई हो या वस्तुओं और स्थान की।

तो जब सफ़ाई की आवश्यकता सिद्ध है तो मन को भी साफ़ करना आवश्यक होगा, ईश आराधना के लिए केवल तन ही नहीं, मन की शुद्धता स्वच्छता भी जरूरी है। तभी यह भजन गाए गुनगुनाया जाता है हमने आंगन नहीं बुहारा कैसे आयेंगे भगवान, कैसे आयेंगे भगवान। सच्चे मन से नहीं पुकारा कैसे आयेंगे भगवान। चंचल मन को नहीं संभाला कैसे आयेंगे भगवान। पर भगवान भक्त की सच्ची पुकार पर दौड़े चले आते हैं। गज , प्रहलाद और द्रौपदी की पुकार पर दौड़े चले आए , सब जानते हैं। भक्तों के मान की रक्षा प्रभु अवश्य करते हैं बशर्ते भक्त सच्चे मन से उन्हें पुकारे। भक्त की क्या,वह तो यहां तक कह देता है तूने मुझे बुलाया शेरा वालिए मैं आया मैं आया शेरा वालिए। या निर्मल मन हो तो रघुनायक शबरी के घर आते, सूर श्याम की बांह पकड़ कर साग विदुर घर खाते, हमने ये भी नहीं विचारा  कैसे आयेंगे भगवान। हम विचार ही तो नहीं करते कि बिना मन साफ़ हुए ईश्वर आएं तो कैसे आएं। हर कोने कल्मश कषाय की लगी हुई है ढेरी, नहीं ज्ञान की किरण कहीं भी हर कोठरी अंधेरी, आंगन चौबारा अंधियारा, कैसे आयेंगे भगवान। बस सारे दिन छल छंद में लगे रहते हैं फिर कहते हैं हमारी प्रार्थना तो प्रभु ने सुनी ही नहीं। बस एक बार अपने हृदय को निर्मल बना कर तो देखो कि भगवान तो कैसे मन से आपकी बात सुनते हैं। ह्रदय हमारा पिघल न पाया जब देखा दुखियारा, किसी पंथ भूले ने हमसे पाया नहीं सहारा, सूखी है करुणा की धारा कैसे आयेंगे भगवान। तो अपने मन को साफ़ सुथरा रखो, हर जीव के प्रति दया और करुणा रखो, फिर देखो भगवान आते ही नहीं, दौड़े चले आते हैं। और उन्हें खोजना कहां, वे तो तेरे अंदर ही हैं, बस ध्यान से देखना पड़ता है, कुटिलता छोड़नी होती है। याद है न कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूंढे वन मांही, ऐसे घट घट राम है दुनिया देखे नाही। अंतर के पट खोल देख ले ईश्वर पास मिलेगा, हर प्राणी में ही परमेश्वर का आभास मिलेगा। सच्चे मन से नहीं पुकारा कैसे आयेंगे भगवान। तो पुकारो सच्चे मन से, भगवान जी आएंगे, उनको आना ही पड़ेगा, वे रुक ही नहीं सकते।

तो प्रभु को पाना है, उन्हें अपने पास बुलाना है तो मन की, चित्त की गंदगी को बुहारना होगा। विचारों को शुद्ध करना होगा, लाग लपेट छोड़नी होगी, पारदर्शी होना होगा, कथनी करनी का अंतर मिटाना होगा। ऐसे थोड़े ही भगवान मिला करते हैं । घर के आंगन के साथ मन को भी बुहारना होता है। सबके प्रति शुद्ध भाव रखना होता है, सबको अपना मानना होता है, साधना करनी होती है, तब जाकर उनका नाम लेने में आनंद आता है। हरि बोल हरि बोल हरि बोल हरि बोल रे का कीर्तन तभी होता है,राधे राधे भी तभी जपा जाता है। तो बस मन के आंगन को बुहारो, नारियल सीक की झाड़ू लेकर जमी हुई काई को खुरच खुरच कर छुडाओ तब जाके भक्ति मे मन लगता है। तो मन के आंगन को बुहारना बहुत जरूरी है। हमने आंगन नहीं बुहारा कैसे आयेंगे भगवान, चंचल मन को नहिं संभाला कैसे आयेंगे भगवान।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...