Tuesday, July 19, 2022

अति सूधो स्नेह को मारग है

 सफर जारी है....944

26.05.2022

कहा सुना तो यही जाता है प्रेम स्नेह का बंधन सबसे बड़ा होता है।आप प्रेम से सबको जीत सकते हैं।प्रेम में इतनी ताकत होती है कि वह बड़े से बड़े कार्य करवा लेता है।प्रेम दीवानी मीरा का हाल किसी से छिपा नहीं है।प्रेम में दुख दरद भी मिलता है लेकिन प्रिय की प्राप्ति में ऐसे सैकड़ों दुख दरद न्यौछाबर किये जा सकते हैं।ए री मैं तो प्रेम दीवानी मेरो दरद न जाने कोय, घायल की गति घायल जाने के जिहि लागी सोय।बस लग्न गई तो लग गई फिर कोई परवाह नहीं, कितने भी कष्ट मुसीबतें आये, अगला पलट कर तक नहीं देखता, भेजते रहें राणा जी विष का प्याला, उसे भी गटक लिया जाता है।विष का प्याला राणा जी भेजा पीबत मीरा हांसी रे, पग घुघरू बांध मीरा नाची री।कहते रहो तुम कि ये सौदा लाभ का नहीं है पर जो प्रेम में बिक गया सो बिक गया।कोई कहे सस्तो कोई कहे महगों लियो री तराजू तोल, माई री मैंने लीनो गोविन्दो मोल।उधर गोपियों का भी यही हाल है, वे कृष्ण के प्यार में आकंठ डूबी है।मधुवन को हरे भरे देख कर आश्चर्यचकित हैं, प्रश्न कर बैठती हैं मधुवन तुम कत रहत हरे, विरह वियोग श्याम सुंदर के ठाड़े क्यों न जरे।उन्हें यमुना अत्यंत मलीन दीखती है।लखियत कालिंदी अति कारी।जब प्रिय दूर हो तो सारी की सारी कायनात उसी के विरह में डूबी लगती है।ब्रज वनिताएँ तो उस सांवले की एक झलक पाने को, उसकी वंशी की धुन पर सब छोड़ छाड़ कर पागलों की तरह दौड़ती हैं।

       ऊधो ज्ञान की पोटरी लेके उन्हेँ समझाने आये है।उनसे साफ साफ कह देती हैं ऊधो मन न भये दस बीस, एक हुतो तो गयो श्याम सङ्ग को आराधे ईश ।ऊधब के हाथ सांबरे ने प्रेम पाती भेजी है सो मोकू लिखो है का, मोकू लिखो है कहती बाबली हो जाती है प्रिय नहीं आये तो क्या उसकी चिठ्ठी तो आई है।लो आगई उनकी याद वो नहीं आये।प्रेम इतना शक्तिशाली होता है कि एक तू जो मिला सारी दुनिया मिली जैसे गीत गबबा देता है।रसखान तो कृष्ण प्रेम में इतने मगन हो गए कि हर जन्म में उनका साथ पाने को किसी भी योनि में जन्म लेने को तैयार हो गए मानुष हो तो वही रसखान बसो ब्रज गोकुल गांव के गवारिन, जो पशु हो तो कहा बस मेरो चरो नित नंद की धेनु मँझारन, जो खग हो तो बसेरो करो मिलि कालिंदी कूल कदम्ब की डारन, और पाहन हो तो वही गिरि को जो धरयो छत्र पुरन्दर धारन।इससे अधिक प्रेम की पराकाष्ठा क्या होगी कि बस उस प्रिय का साथ भर चाहिए, वह मुझे भले से न देखे पर मैं उसे दूर से ही निहारता रहूं।धन्य है ऐसा प्रेमजिसमें सब दिया ही दिया जाता है, लेने की कोई तमन्ना नहीं है।

       फिर घनानन्द को पढ़ते लगा कि प्रेम का मारग तो सरल सीधा सा है जामें नेक सयानप बांक नहीं।तहाँ साँच चले तजि आपुनपो झिझके कपटी जे निशांक नहीं,घनानन्द प्यारे सुजान सुनो यहां एक ते दूसरों आंक नहीं, तुम कौन धों पाटी पढ़े हो लला मन लेत हो देहु छटांक नहीं।प्रिय से प्रतिदान मिले न मिले कोई परवाह नहीं, मन भर लेकर भी छटांक भर की तमन्ना नहीं।प्रेम का गणित तो ऐसा ही होता है।उस प्रेम के आंक के अलावा कोई दूसरा आंकड़ा दिखता ही नहीं।सब देकर भी कभी कभी झोली खाली की खाली रह जाती है पर कोई अफसोस नहीं होता कि मुझे कुछ नहीं मिला।आप अपने प्रेम को निभाते ही रहते हैं।प्रेम प्रतिदान की आशा करता भी कहां है।प्रेमास्पद मिले न मिले पर चेतना में हमेशा बना रहता है, उसकी यादों और एक झलक के सहारे भी रहा जा सकता है।

       यदि प्रेम इतना सात्विक होता है, यदि प्रेम में इतनी शक्ति होती है यदि प्रेम इतना सच्चा होता है तो वह ये आजकल का कौन सा प्रेम है जो मनचाहा न मिलने पर न होने पर प्रिय को दिन रात कोसता है, उसके मरने की दुआ मांगता है उसे और उसके सम्बन्धियों को पानी पी पी कर कोसता है।कोसता ही नहीं ,सरेआम उसकी हत्या ही कर देता है ।उसके प्रेम के पात्र रोज बदल जाते हैं, आज इससे था कल उससे हो जाता है, स्थिरता कहीं नहीं होती।पहले एक के लिए दूसरी को छोड़ता है तो मन बदलने पर दूसरी को पाने के चक्कर में पहली को रास्ते से हटा देता है।ये प्यार का कौन सा रूप और प्रकार है जिसमें प्रेमास्पद रोज बदल जाते हैं।न तो इस प्रेम में अनन्यता दिखती है न एकनिष्ठता।बस अपने निजी स्वार्थ वश रोज पात्र बदल लिए जाते हैं घनानन्द तो कहते थे यहां एक ते दूसरों आंक नाम और आजकल का चलताऊ प्रेम यह सिद्ध करने लगा कि इसमें तो ढेरों ढेरों आंक है जो मर्जी चुनो पसन्द न आये  उसे छोड़ सकते हो और फिर अगला चुन सकते हो।अवसर अनेको हैं बस लेते जाओ, मन भर जाए तो बदल लो, सब बिकता है यहां, बोलो क्या क्या खरीदोगे।

       आज सब खरीद ही तो रहे हैं।एक बार में पसन्द कहां आ पाता है कभी रूप चाहिए तो कभी गुण फिर उस सबसे मन भर गया तो कुछ और की मांग उठ जाती है।अब ये मन ही तो है बेचारा ,बिना लगाम का घोड़ा जब जिधर चाहे मुंहउठाकर चल देता है।आज ये पसन्द तो इसे चख लो अब इससे मन भर गया तो दूसरे को टेस्ट कर लो।क्या हुआ, प्यार व्यार कुछ नहीं बस पात्र को कमोडिटी की तरह बदलते रहो।लिव इन रिलेशन शिप का जमाना है, जब तक मन करे रहो फिर पत्ता झाड़ दो।सुनते थे कि प्यार में शुचिता पवित्रता होती है, जो चुना वह जीवन की थाती होती है पर आजकल प्यार के जो संस्करण दिख रहे हैं वे तो इतने स्वार्थ परता से भरे हुए हैं कि बस प्रेम के सारे अर्थ ही बदल दिए गए।घनानन्द जी, आपने तो सही लिखा था कि अति सूधो स्नेह को मारग है जामे नेक सयानप बांक नहीं।पर अब इसके निहितार्थ बदल गए हैं, प्रेम की डुगडुगी बजती तो है पर उसमें गाम्भीर्य नहीं ,केवल खोखलापन बाकी है।तो बजाते रहो और जब मन भर जाए तो दूसरी डुगडुगी पीपनी खरीद लो।

परिवार पहली पाठशाला

 सफर जारी है....943

25.05.2022

शिक्षा के अभिकरण पढ़ते जाना कि परिवार बच्चे की प्रथम पाठशाला और मां पहली गुरु है।विद्यालय, समाज की  आदि इसके बाद शुरू होती है।अनौपचारिक शिक्षा का श्रीगणेश यहीं होता है और संस्कारों की पृष्ठभूमि भी यहीं तैयार होती है बल्कि कहें तो परिवार जिन मूल्यों को रोपित कर देता है, आगे के संसाधन उसे ही विकसित और पल्लवित करते हैं।सबसे जुड़ने का भाव, बड़ों को आदर और मान देने का भाव तो बालक यहीं से ग्रहण करता है।भजन भोजन भाषा और भाव की पीठ परिवार में रखी जाती है कि क्या खाना है कैसे खाना है और खाना ज्यों जरूरी है, अपने बड़ों को इष्ट के आगे हाथ जोड़ते पूजा करते देख वह भी यही सब दोहराता है, भाषा का संस्कार तो वह परिवार से ही पाता है कि बड़ों से कैसे विनम्रता से बोला जाता है या कैसे ध्यान पूर्वक उनकी बात सुनी जाती है, उनसे जबान नहीं लड़ाई जाती, उन्हें पलट कर जबाब नहीं दिया जाता, गलत बात की जिद करो तो आप पहले प्यार से समझाए बुझाये जाते हो और अगर जरूरी हो तो ठोके कूटे पीटे भी जाते हो।अब वे परिवारी जन हैं तो तुम्हें सही रास्ते पर लाने के लिए साम दाम दण्ड भेद अपनाएंगे ही,आप उनके बेहद अपने हो तो आप को सुधारना उनका कर्तव्य है।वे यह कह कर नहीं छूट सकते कि हमने तो अपना सा किया अब नहीं माने तो क्या करें।

वे स्कूल के टीचर जी नहीं है कि उन्हें नियत पाठ्यक्रम ही पढाना है और उतना ही पढाना है जितनी तनख्वाह मिलती है।वे एक बार को अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ सकते हैं कि मैंने कक्षा के सारे बच्चों को सुधारने का ठेका थोड़े ही लिया है।वह पढा भर देता है फिर विद्यार्थी उसे ग्रहण करे न करे उसकी क्षमता और रुचि ओर निर्भर है पर माता पिता परिवारीजन यह कह कर अपने दायित्व से मुक्ति नहीं पा सकते।आप को तो उन्होंने ही रचा बुना है, आप उनकी प्रतिकृति हो तो वे तुम्हें अपने से कहीं आगे ले जाना चाहते हैं।जो जो उन्हें उपलब्ध नहीं हो सका वह सब अपने बालक की झोली में भर देना चाहते हैं।आखिर आप उनके अंश हो, उनके आत्मज हो, उनका रक्त आपकी धमनियों में दौड़ता है।आप को लेकर उन्होंने ढेरों आशाएं पाल ली है।वे चाहते हैं कि आप उनकी कसौटी पर खरे जरूर उतरोगे।

जीवन मूल्य तो परिवार से ही मिला करते हैं, स्वाभिमान की नींव वहीं रखी जाती है मर जाऊं मांगू नहीं अपने तन मन के काज, परमारथ के कारने मोहे न आबत लाज का सूत्र वाक्य तो परिवार में ही पोषित होता है।सम्बन्धों की नींव तो वहीं रखी जाती है।सहोदर के रिश्ते तो वहीं जन्म लेते हैं।बांट कर खाना तो वहीं सीखते हैं।कितनी भी परेशानी हो विपत्ति हो पर साथ निभाने की कला तो परिवार ही सिखाता है।घर में मां बहिन चाची ताई का आदर करते हो तभी तो दुनिया की स्त्री का सम्मान कर पाते हो, घर के बूजुर्ग दादाजी नानाजी को मान देते हो तभी घर से बाहर वृद्धजनों में बाबा दादा के चेहरे तलाश पाते हो।जैसे संस्कार पा जाते हो वही व्यवहार करते हो।

तो क्या अब परिवार की भूमिका बदल गई है क्या उनके दायित्व क्षेत्र सीमित हो गए हैं क्या सारा का सारा दायित्व उन्हें मंहगे स्कूलों में भेजने भर का रह गया है।दो साल भी पूरे नहीं कर पाता तभी से उसके लिए प्ले ग्रुप खोजने शुरू हो जाते हैं कि कम से कम स्कूल जाना तो सीखेगा,चार बच्चों के बीच बैठना सीखेगा, साहचर्य का भाव विकसित होगा, जो पास है उसे बांटना सीखेगा।पर हम बिल्कुल भूल जाते हैं कि जो समय माता पिता और घर परिवार के साथ रहने का है, पारिवारिक सदस्यों से मजबूत बॉन्डिंग बनने का है, हम धीरे धीरे उससे दूर करते जा रहे हैं।बस उसे बड़ा और बड़ा बनाने की ऐसी धुन सवार है कि उसका बचपन छीनने पर तुल गए हैं।जो बालक अभी अपनी नेचुरल कॉल्स को तरीके से व्यक्त नहीं कर पाता उसे हमने विद्यालय भेजने की पूरी पूरी तैयारी कर ली है।जो समय जो उम्र उसमें मूल्यबोध जगाने और संस्कारित करने की है उस में हमने मोबाइल और टीवी में कार्टून देखने को अलॉट कर दिया है और बड़े इतराते से कहते हैं कि ये तो कार्टून देखे बिना रह ही नहीं सकता, बस मोबाइल देखते देखते कुछ खिला दो तो ठीक।बड़े गर्व के साथ बताते हैं कि मेरा बालक खुद से मोबाइल ऑपरेट कर लेता है।जो देना चाहिए उससे पहले उसे दूर रखते हैं और बाद में सिर धुन पछताते हैं किक्या करें, बहुत दिख करता है किसी की मानता ही नहीं।

      परिवार धीरे धीरे विघटित होते जा रहे हैं, कमाने का इतना दबाब है कि घर के चार सदस्य हैं तो सब कमाई में लगे हैं, चौबीस घण्टे की व्यस्तता है, बहुत जरूरी सब छूटा जा रहा है पर उस ओर किसी का ध्यान नहीं।बस पैसा और भरपूर पैसा हो तो सब खरीदा जा सकता है, भौतिक वस्तुओं के साथ साथ शिक्षादीक्षा सब खरीद सकते हो,डिग्री प्रमाणपत्र सब अरेंज किये जा सकते हैं बस जेब भरी हो और बैंक बैलेंस फुल हो।सर्वे गुणकांचनम आश्रयन्ति।संस्कार किस चिड़िया का नाम है, नैतिक शिक्षा की बात करना बेमानी है, सत्य ईमानदारी गई तेल लेने, चारों ओर झूठ और बेईमानी का साम्राज्य है, सबको कम समय में ज्यादा से ज्यादा चाहिए, शॉर्टकट चाहिए।बस किसी तरह सब झोली में भरा जा सका, इसके लिए कोई भी जुगाड़ लगाई जा सकती है, किसी भी हद तक जाया जा सकता है, मूल्यों की अनदेखी की जा सकती है, संस्कारों को तोड़ा मरोड़ा जा सकता है, बस जैसे भी हो अपना काम हो जाना चाहिए।

      बच्चे वही सीखते हैं जैसा देखते हैं।परिवार आज उनमें वे मूल्य विकसित नहीं कर पा रहा जिसकी दरकार है।सब एक दूसरे पर छोड़ रहे हैं, एक दूसरे कोआलोचित करने में लगे हैं, परिवार को लगता है ये स्कूल का काम है हम पैसा खर्च कर सकते हैं और स्कूल को लगता है जब तक घर परिवार का सहयोग नहीं तब तक अकेला चना क्या भाड़ फोड़ेगा।समाज ने अपने हाथ अलग खड़े कर लिए है।कहीं सामंजस्य नहीं दिख रहा और इस सबके मध्य सबसे अधिक मिट्टी पलीद बालक की हो रही है।वह जो इस सबके मूल में था,वही उपेक्षित हो गया, उसने अपने रास्ते खोज लिए हैं वह परिवार और विद्यालय से मिलने वाले पाथेय को गूगल की शरण में खोज रहा है, दिन भर मोबाइल मेंआंखे गढ़ायेबैठा है कि शायद यहीं कोई रास्ता मिल जाये।अब भी समय है परिवार को अपनी भूमिका तय कर लेनी चाहिए कि वही बालक की प्रथम पाठशाला है और उसे जग में लाने वाली मां प्रथम गुरु है।

अब क्या होगा

 सफर जारी है.…942

23.05.2022

अब क्या होगा

भविष्य को लेकर एक अकेली चिंता बहुत सारे सुखों पर भारी पड़ जाती है।आप लाख सिर झटकते रहें और कहते रहें कि सब ठीक होगा, अभी वर्तमान में रहो, उसे एन्जॉय करो पर मन में पड़ा खटका कहां सहज रहने देता है।कुछ न कुछ चलता ही रहता है।मन की चंचलता अपना प्रभाव दिखाती है औ समझदारी अपनी ओर खींचती हैं।दोनों में से जो प्रभावी हो जीत उसी के खाते में चली जाती है।लाख बार सुनते पढ़ते रहो कि वर्तमान में जीना सीखो, चार्वाक दर्शन अपनाओ, ऋणम कृत्वा घृतं पिबेत का सिद्धांत बना लो पर अपनी चिंता की प्रकृति को कहां ले जाओगे, उस पर विजय कैसे पाओगे।व्यक्ति ऊपर से लादा तो उतार फैंक सकता है पर बुनाबट ही ऐसी है तो उससे सहज छुटकारा पाना असंभव नहीं तो कठिन तो अवश्य होता है।

अब देखो कुत्ते को उसकी पूंछ को लम्बे समय तक सीधी कर पत्थर के नीचे रखो पर जैसे ही दबाब हटा, वह झट से अपने मूल रूप में आ जाती है।

तो बदलाब तो अंदर से आता है, जब तक चिंता बनी रहेगी और चिंतन की प्रवृत्ति विकसित नहीं होगी तब तक अब क्या होगा राम जी करते ही रहेंगे।अतीत पर एक बार को धूल भले से डाल भी दो पर जो होने वाला है, भविष्य है उसके विषय में तो सोचना होता ही है।जो गलतियां अनजाने में या जान बूझकर हो गई उनका दण्ड अब तक भोग रहे हैं तो आगे के लिए सतर्क होना जरूरी है।यदि अब भी नहीं सुधरें तो जो बचा खुचा है उससे भी हाथ धो बैठेंगे।तो सोचना तो होगा कि अब क्या करणीय है और किससे दूरी बरतनी है।सब पेट में नहीं भरा जा सकता तो अपनी प्राथमिकताएं तय करना जरूरी है, अपनी दिशा निर्धारित करना जरूरी है, अपनी आवश्यकताओं को सीमित करना जरूरी है।अब क्या होगा के स्थान पर अब क्या किया जा सकता है पर सोचना जरूरी है, जो पास है जिसे अर्जित करने में खून पसीना एक किया उसका सही वितरण जरूरी है।

तो जब तक नहीं सोचेंगे कि अब क्या होगा तब तक कुछ नहीं होने का।तो जो होना है वह होकर रहेगा, तुम उसमें क्या हथेली लगा लोगे पर जो भी हो उसके विषय में चिंतन अपेक्षित है।छत गिरासू हो तो यह सोच कर नहीं बैठा रहा जा सकता कि होय सो राम, अरे उसकी मरम्मत कराएंगे, बल्ली आदि से उसे टिकाने की व्यवस्था करेंगे, उसके उपाय सोचेंगे, वैकल्पिक व्यवस्था तैयार रखेंगे, कुछ तो करेंगे ही।हाथ पर हाथ धरे बैठे ये ही नहीं दुहराते रहेंगे कि हाय राम अब क्या होगा।जो होगा अचानक तो नहीं होगा, आप भी सब देख समझ रहे होंगे पर उस ओर से पीठ किये बैठे होंगे कि मुझे क्या जब दीवाल गिर जाएगी तब का तब देखा जाएगा।बस यही गलती हम हर बार दुहराते हैं।समय रहते चेतते नहीं, और बाद में दुनिया भर की रोना पीटना मचाते हैं कि हाय राम अब क्या होगा।होगा वह जिसकी आपने पूर्व भूमिका पूर्व पीठिका तैयार कर रखी है, जीवन भर जिम्मेदारियों से किनारा किये रहे, पीठ दिए बैठे रहे, सब दूसरा कर करा दे, हम तो बस परोस कर रखी को खाने आ जाएंगे और वह भी अहसान के साथ, बस तुम बहुत कह रहे हो तो खा लेते हैं।कुछ भी अचानक घटित नहीं होता, रोज थोड़ी थोड़ी टूटफूट होती है, रोज थोड़ा थोड़ा रिसाव होता है पर उसकी हम लगातार उपेक्षा करते रहते हैं,उसे इग्नोर करते हैं और जब बात बढ़ जाती है, फोड़ा फूट जाता है, छत ढह जाती है तब हम बुक्का फाड़ कररोते हैं हाय राम ये क्या हो गया, अब क्या होगा।

तो दिनप्रतिदिन सावधानी रखना जरूरी है, छोटी से छोटी बात का संज्ञान लेना जरूरी है, उसके प्रति आपकी प्रतिबद्धता कटिबद्धता जरूरी है, आपका चिंतन जरूरी है सही प्रयास किये जाने जरूरी है।खाली यह कहने से बात नहीं बनने की कि अब क्या होगा।

जी

 सफर जारी है...941

22.05.2022

बस सब जी का महिमा है साब,ये जी जो न करा ले थोड़ा है।नाम और सरनेम के साथ जोड़ दो तो आपको इज्जत के सबसे ऊंचे पायदान पर बिठा दे,आया जी, हांजी कह दो तो आपको तमीजदार सिद्धकर दे, जी में एक और जी लगा दो तो बहन और जिज्जी बना दे।दो जी के बीच जा लगा दो तो जीजाजी का प्यारा रिश्ता दे दे, जिस मर्जी संबोधन और रिश्तेदारी में जोड़ दो आपकी खूब नामबरी हो जाये।जी हां ये जी ही है जो कभी आपके जी को जी में ला देता है तो कभी जी का जंजाल बन जाता है।

जो जीभ कतरनी सी चलाती रहो तो तुम्हें कभी भी चारों खाने चित्त कर दें और किसी की जी हजूरी में लग जाओ तो तुम्हारी जिंदगी बदल कर रख दे।जी कारा लगाकर बोलो तो तुम्हारी ज से जयजयकार होती है।ज से मीठी मीठी गोल गोल घुमाबदार जकेबी है तो ज से जीना भी हराम हो जाता है।ज से जीवन में जीत मिलती है तो ज से हमारा जी कभी कभी खो भी जाता है और आप गाते डोलते हो जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी, अभी अभे यहीं था किधर गया जी।जी चाहे तो आपको बहुत मान दिला दी और ज्यादा ही जी जी करने लग जाय ओ तो अगले की नजर से ही गिरा दे कि देखो बिना रीढ़ का सा सारे दिन जी जी की पेपनी सी बजाता रहता है।सबको सिर पर ही चढाये रहता है।अब देखो छोटे बारे और सेवकों से जी लगाकर बोलने का कौन सा धर्म है पर नहीं साब आपने इतनी बात कह दी तो उनके श्रीमुख से प्रवचन शुरू हो जाएंगे अरे क्या हुआ जो उसे  नौकर जी कह दिया कि रिक्शा वाले को भैया जील संबोधित कर दिया ,क्यावह इंसान नहीं है, क्या वह हमारा जरखरीद गुलाम है जो आपके आगे हाथ जोड़े हरदमभीगी बिल्ली बन कर खड़ा रहे, आपकी चाकरी करता रहे, आपकी जी हजूरी बजाता रहे, आपके आगे पीछे डोलता रहे।अरे भाई उसकी भी इज्जत है।कभी अचानचक उसके घर पहुंच जाओ फिर देखो अपने घर का राजा है वह, उसका परिवार कैसे उसे इज्जत से नवाजता है, बालक पिताजी पिताजी कहते नहीं थकते तो पत्नी ऐसी आज्ञाकारिणी हैइतना सम्मान देती है हमारे ये के अलावा उसके पास कोई दूसरा संबोधन ही नहीं है।तो भाई जो तुम्हें जी कारे से पुकारता है उसे जीकारे से पुकारने वालो की संख्या भी कम नहीं है।

ये छोटा सा जी कितने कितनों का दिल जीत लेता है।देखन में छोटे लगे पर बड़े गहरे अर्थ छिपाए रखते है।कहने की टोन ही बता देती है कि ये आदर सम्मान वाला जी है या प्रश्वाचक या खिल्ली उड़ाने वाला या उलाहने वाला या स्वीकारोक्ति वाला।किसी की लंबी चौड़ी बात सुनकर आप उत्तेजित हुए बिना केवल जी कह आमने वाले को बहुत कुछ सोचने पर विवश कर देते हैं कि ये जी समझ आने के लिए है या इसका कुछ अन्य अर्थ निकलता है।सामने वाले को सोच में डाल आप उड़नछू हो जाते हैं।ये जी हां जी छोटा सा जी कितनो कितनो को दुविधा में डाल देता है कि इतने लंबे व्याख्यान के बाद इस छोटे से जी से क्या आंकलन किया जाये।तो पकड़े रहिये इस जी को ,जीकारे को, बड़ा काम का है ये।आपको बहुत सारी मुसीबतों से बचा ले जाता है।सुनते हो जी बहुत प्रचलित है जिसको सुनते ही पति महोदय चौंक जाते हैं कि इस जी के ब्याज से पता नहीं कौन सी नई मांग रख दी जाए और जी का जंजाल खड़ा होजाए।सुनते हो जी बडो बडो और अच्छों अच्छों की खाट खड़ी करने की सामर्थ्य रखता है।

तो ये है जी की महिमा।नाम के साथ लगे तो सम्मानीय बना दे और दुष्ट के नाम के साथ लगा दो तो लक्षणा व्यंजना का भाव दे दे।रावण जी कंस जी सूपनखा जी नहीं सुना न कभी, अब मां बेटे के नाम के आगे जी लगाकर बोले तो कैसा पराया सा लगता है।अरे अपनो बच्चों का पिताजी है पर तुम्हारा तो लाडेसर ही है न।जी जरूर लगाकर बोलो, जी कारे से बोलो पर किसी की इतनी जी हजूरी मत करो इतने बिछे बिछे मत रहो कि अपना सम्मान ही न रहे।तो चलते हैं जी, कल मिलते हैं जी, अपना ख्याल रखना जी।

सब धन धूरि समान

 सफर जारी है....940

21.05.2022

बात तो बिल्कुल सच्ची है पर दिमाग में बैठ जाये तब बात बने।सारा झगड़ा तो इसी धन को लेकर ही है, सारी इज्जत, सारे क्रिया कलाप,सारे उलाहने तायने,सारा परिश्रम इस धन को कमाने और फिर उससे भौतिक वस्तुओं की खरीद और संग्रह से है, अपने को ऊंचा दिखाने से है।धन संपत्ति ही तो आपको मान सम्मान दिलाते हैं, वे ही आपको ऊंचे आसन पर बैठाते हैं, एक उसी को कमाने के चक्कर में तो व्यक्ति घर बार छोड़ जगह- जगह भटकता है और जिसे कमाने के लिए इतनी हायतोबा की जाती है ,वह साथ नहीं जाता।मर्जी जितना खाते में शून्य के आंकड़े बढ़ते जाए पर जाना खाली हाथ ही होता है।सब यहीं का यहीं धरा रह जाता है।बिल्कुल वैसे ही नंग धड़ंग चले जाते हो जैसे इस दुनिया में आये थे।मुट्ठी बांधे आया तू हाथ पसारे जाएगा, जो भी तूने छीना बटोरा सब पड़ा यहीं रह जायेगा।सब जानते बूझते भी कि पैसों से कभी पेट नहीं भरता, और और कमाने की ललक बनी ही रहती है।

कहीं बाजार में मिलता होता संतोष तो पैसे देकर उसे खरीद लिया जाता।बड़े चर्चे सुने हैं इसके कि जिसे ये मिल जाए उसके तो बारे न्यारे हो जाते हैं ।संतोषी सदा सुखी पढा सुना तो खूब जाता है पर उसे गुनते नानी मरती है।बस पाठ्यक्रम में था तो पढ़ लिया ,रट्टा मार के इम्तहान में लिख आये, नम्बर मिल गए पास हो गए तो क्या अब उसे पकड़े बैठे रहें। दोहा तो अभी तक याद है हमें,कहो तो सुना देते हैं 'गोधन गजधन बाजिधन और रतन धन खानि, जब आबे संतोष धन सब धन धूरि समान'।पर धन धूल के समान हो सकता है ,यह न तो तब गले उतरा था न अब गले उतरता है कि धन को धूरि क्यों कहा गया।अरे धन से ही तो सारे काम सधते हैं,धन ही तो पुजता है इस कलियुग में फिर धन पर धूल कैसे डाली जा सकती है, उसे कैसे भूला बिसराया जा सकता है।वह है तो जीवन है।'जल ही जीवन है 'कहा जाता है पर जल भी तो पैसे से ही  खरीदा जाता है ।पूरेबीस रुपये में बिसलरी का बस एक बोतल पानी आता है इतनी गर्मी में भला उससे कहीं प्यास बुझती है।इससे तो पहले दिन ही अच्छे थे। कहीं भी ओक लगाकर तो कभी पस भरकर पानी पी लेते और खूब तृप्त हो जाते।प्याऊ पर ,कुए पर ,हेण्डपम्प /खेंचू से कैसा सीरा सीरा मीठा पानी मिलता कि पीते ही आत्मा तृप्त हो जाये।उस दिन बहुत प्यास लगी थी तो राह किनारे लाल लाल कपड़े से ढके घड़ों से दो चार गिलास पानी क्या पी लिया , साथियों ने ऐसे आड़े हाथों लिया, ऐसे धो धो के सुनाया कि क्या जरूरत थी इस पानी को पीने की, बस अब बीमार होने की तैयारी कर लो।भला हो जो कुछ नहीं हुआ।यदि उन्नीस बीस कुछ हो जाता तो मुफ्त के पानी के मत्थे ही सारा दोष मढ दिया जाता।तो बताओ जब पानी तक खरीद कर पीना पड़े तो धन से किनारा कैसे करें ,उसे धूल समान कैसे मान लें।

धूल से याद आया धूल की तो बहुत महिमा है, देश की रज में ही लोट लोट कर बड़े होते हैं,यह बहुत पवित्र है तभी तो माथे पर लगाई और कान्हा के द्वारा खाई जाती है।तेरे लाला ने माटी खाई जशोदा सुन माई और ब्रज की रज परम् पवित्र बास जहां राधे रानी को, भूल्यो चतुरानन यहां हर लियो मन त्रिपुरारी को।तो ब्रज की धूल तो छोटी /तुच्छ हो ही नहीं सकती।तो दोहे में धन को धूल समान क्यों कहा गया।अच्छा ये धूल रेत के लिए कही गई होगी जो उड़ उड़ के आंख में जा पड़ती हैं, कंकड़ सी ककराती है, घर भर को गन्दा कर देती है, जिसे हम धूल डालना कहते हैं ,जो किसी काम की नहीं होती, जिसे बिल्कुल निकृष्ट कोटि में रखा जाता है, जिस धूल से कोई काम नहीं सधता, धन उसके समान है और वह धन भी गोधन, गज धन और बाजि धन जैसा है।आज के युग में किसे गाय, हाथी ,घोड़ा चाहिए भला।गाय का गोबर, घोड़े हाथी की लीद से तमाम गन्दगी ही फैलती है न, दूध डेरी से लो, घोड़े से भी तेज इलेक्ट्रिक वाहन उपलब्ध हैं और आजकल भला हाथी पालने का साहस किसके पास है तो वह सवारी के लिए ही अच्छा लगता है।सोने जबाहरात हीरे मोती मूंगे जैसे रत्न रखकर क्या अपने को संकट में डालना है, अरे भाई इमिटेशन का मिलता है न सब मार्केट में तो वक्त जरूरत उसे पहन लो, क्यों चोर लुटेरों को दावत देते हो।तो गौ, गज, बाजि और रतन धन की तुम्हें जरूरत है नहीं, इन सबका विकल्प रुपय्या तुम्हारा प्रिय है पर उसका भी संचय करना ठीक नहीं।याद तो होगा ही पूत सपूत तो का धन संचय, पूत कपूत तो का धन संचय।लायक निकल गया तो वैसे ही ढेर लगा लेगा और कपूत की गिनती में रहा तो सब वैसे ही बारे न्यारा कर देगा।

तो संतोष को खोजो ,कहीं से भी खोज कर लाओ।फिर लगता है ये कहीं साईं की तरह मन के अंदर ही तो छिपा नहीं बैठा है ज्यों तिल माहि तेल है ज्यों चकमक में आगि, तेरा साईं तुज्झ में जागि सके तो जागि।जैसे पुहुपन में बास है,जैसे मृग की नाभि में कस्तूरी बसी है वैसे ही संतोष भी तेरे मन के अंदर ही छिपा बैठा है, बस उसे बाहर लाना बाकी है।तो सन्तोष कहीं किसी दुकान पर और बाजार में नहीं मिला करता,वह हम सबके पास है।जब आबे सन्तोष धन सब धन धूरि समान, संतोषी सदा सुखी।जब संतोष का भाव आ जाये तो कम में भी अगन मगन रहा जा सकता है, बहुत सा रेज सा पैसा नहीं चाहिए, बस दो टैम दाल रोटी का जुगाड़ हो जाये, तन ढकने को वस्त्र मिल जाये औऱ सिर छिपाने को जगह तो हमसे बड़ा राजा भला कौन होगा और ये भी न मिले तो भी खुला आसमान और धरती तो है ही न, जो जीवन देता है वह चुग्गा और पानी भी देगा, बस ये भाव बना रहे तो सब सध जाता है।बस दोहराना होता है, मनन करना होता है जब आबे सन्तोष धन सब धन धूरि समान।

भय बिनु होय न प्रीत

 सफर जारी है...939

20.05.2022

शिक्षा सिद्धांत में कब का बदलाब हो चुका है कि सिखाने में दण्ड की भूमिका उतनी प्रभावी नहीं होती जितनी पुरस्कार की फिर पुरस्कार चाहे भौतिक रूप में हो या प्रशंसा और प्रोत्साहन के रूप में।शारीरिक दण्ड तो सिरे से ही प्रतिबंधित कर दिया गया है तो अब इसे भी बदल दिया जाना चाहिए कि लठ के आगे तो भूत भागते हैं,कि भय के बिना प्रीति नहीं होती।पाठशालाएं अब आनंदशाला में बदल रही हैं और अध्यापक उनके लिए सहायक और मार्गदर्शक के रूप में है।निश्चित ही यह सुखद स्थिति होनी चाहिए और सब जगह अनुशासन पसरा होना चाहिए।पर वास्तव में ऐसा है नहीं।अब जब सबको यह विश्वास हो गया है कि हमारा कोई क्या बिगाड़ सकता है, हमें कोई छू के तो दिखादे सीधे उसकी शिकायत कर देंगे, उसे आरोपित कर नौकरी से ही बाहर करवा देंगे तब से अनुशासन हीनता और बढ़ी है।लोग उच्छ्रंखल और मनमौजी होते जा रहे हैं, वे परम् स्वतंत्र न सिर पर कोऊ के भाव से जीते हैं, उन्हें किसी का डर ही नहीं रहा।मुंह उठायेदेर सबेर चले आते हैं और जब मर्जी हाथ हिलाए चले जाते हैं, वे निरंकुश होते जा रहे हैं और आप लिहाज में ही मरे जा रहे हैं कि शायद अब मान जाए और सुधर जाए।पर वे पक्के ढीठ और बेशरम हैं, काली कामर ओढ़े बैठे हैं, उन्हें कोई लाज नहीं आती।बड़े जोर से चिल्ला चिल्ला कर गाते हैं जाने करी शरम,बाके फूटे करम, जाने ओढ़ी बेशर्माई ताने खाई दूध मलाई।तो बेशर्म बन दूसरे के हिस्से को हड़प खुश होते रहते हैं कि देखो हमने तो किया भी नहीं और कैसे मजे लूट रहे हैं।

तो याद आता है कि अनुशासन में कोई लिहाज विहाज नहीं चलता, जो अनुशासन तोड़े उसे तुम तोड़ो।सीधी अंगुली से घी न निकले तो टेढी करो, बरतनभले ही तोड़ना पड़े पर घी पूरा निकाल लो।जिन्हें प्यार मोहब्बत की भाषा समझ नहीं आती, उनके लिएनियम बदलना ही होता है।लठ के आगे तो भूत भी भागता है फिर सारे लिहाज और तमीज एक ओर उठा के रख देनी होती है कि करो या भागो।नहीं है बस का तो सिस्टम से बाहर निकलो।नहीं आता है तो सीखो।इस भुलाबे में मत बने रहना कि इतनी कट गई तो आगे भी कट जाएगी।कटेगी बटेगी कुछ नहीं, स्वयम के कटने पिटने ध्वस्त होने की नौबत आ जायेगी।मार बदनामी होगी सो अलग, कच्ची हांडी बार बार चूल्हे पर नहीं चढ़ाई जाती।जैसा करो वैसा भुगतो।जितना शक्कर डालोगे उतना ही मीठा होगा न कम न ज्यादा।लिहाज की ए एम सीका पीरियड समाप्त हो गया, अब ये रिन्यू भी नहीं हो सकती तो उत्पाद ही बदला जाएगा।अब लगताहै कि बड़े बूढ़े ही सही थे जब वे कहते थे कि दो हाथ की दूरी बनाए रखना बहुत जरूरी है, इतने मीठे मत बनो कि लोग हलुआ का गप्पा समझ कर खा जाएं।ये भी याद रखो कि जो अति का सीधा होता है वह जल्दी काटा जाता है।देखा है न वन में सट्ट सीधे पेड़ सबसे पहले काट लिए जाते हैं और टेढ़े मेढ़ों को ऐसे ही छोड़ दिया जाता है कि इनसे कौन उलझे।तभी तो उनकी हिम्मत बढ़ती जाती है और वे हर किसी से उलझने को तैयार खड़े रहते हैं।

बदलते जमाने और परिस्थितियों के अनुसार स्वयम को बदलना बहुत जरूरी है।ऐसे जितने भी भस्मासुर हैं जिन्हें अमर होने कावरदान मिला हुआ है सबको शिवजी जी चाल से मोहिनी रूप धर नृत्य करते करते स्वयम के सिर परहाथ रखने को बाध्य करना होगा तभी इस गन्द से मुक्ति मिलेगी।जब स्वर की कोमलता का कोई असर न हो तब रुक्ष और क्रुद्ध होना ही पड़ेगा।ये रुक्षता ये क्रोध आपकी सारी नमी अवश्य सोख लेगा पर अब व्यवस्था बनाये रखने और दुष्टों को दंड देने का सही समयहै।सुधरने के बहुत बहुत मौके दे लिये, अब कोई गुंजाइश बाकी नहीं रही, थप्पड़ घूंसे लतियाने का समय बीत गया, अब तो अंतिम वार करो, इस पार या उस पार।या तो सुधरो या रास्ता नापो।सच में भय के बिना प्रीत नहीं होती।भय तो बहुत जरूरी हो गया, प्रेम स्नेह सब गए तेल लेने।अब शस्त्र उठाओ अर्जुन, इनका एक ही उपाय है।ये और कोई भाषा नहीं समझते।समझते होते तो कृष्ण के सन्धि प्रस्ताव ले जाने पर पांच गांव देने पर चुपचाप सहमत हो जाते पर इन दुष्टों ने तो उद्घोष कर दिया कि बिना युद्ध के सुईं की नोंक के बराबर भी जमीन नहीं देंगे तो युद्ध जरूरी है पार्थ।और ये जो तुम्हें अपने रिश्तेदार सम्बन्धी दिखाई दे रहे हैं ये सब अन्याय के भागी हैं।तुम इन्हें पहली बार थोड़े ही मारोगे ये तो बहुत बार मारे जा चुके हैं पर रक्तबीज की तरह फिर फिर पैदा हो जाते हैं, इन्हें अब समूल नष्ट करो।ये रामायण काल में भी थे हर युग में होते हैं।याद करो राम तीन दिन तक जड़ समुद्र के आगे रास्ता देने को अनुनय विनय करते रहे पर कोई फायदा हुआ क्या, नहीं न।तब लक्ष्मण ने क्रोध में आकर समुद्र को सोखने को वाण उठाया और जैसे हीशर संधान करने वाले थे कि समुद्र मणियों से भरा थाल लेकर उपस्थित हो गया और समुद्र पार करने को पुल बनाने का मार्ग भी बता दिया कि नाथ नील नल कपि दोऊ भाई, लरिकाई जे आशीष पाई, तिनके परस किये गिरि भारी।और समुद्र पर पुल बनकर तैयार हुआ, सेना पार उतरी, युद्ध जीतकर कर सीता को लाया गया।

तो ये सारे के सारे प्रसंग यही संकेतित करते हैं यही सीख देते हैं कि भय के बिना प्रीत नहीं होती, बोले राम सकोप तब भय बिनु होय न प्रीत।तो दुष्टों के संहार के लिए शस्त्र उठाओ अर्जुन, इसमें कोई पाप नहीं लगता बल्कि अन्यायी के वध से तो संसार प्रसन्न ही होता है।जो बात से सुधरें उनके लिए बात, जो डांट से सुधरें उनके लिए डांट और जो इन दोनों से न सुधरें उनके लिए ठुकाई पिटाई धुनाई ही मुफीद होती है तभी कहा गया कि भय के आगे भूत भागता है।तो उठा लो शस्त्र अर्जुन और सारे के सारे दुर्जनों का नाश करो जो कामचोर हैं, अपमुरादी हैं परम् स्वतंत्र है, निरकुंश हैं, स्वेच्छाचारी हैं।इन्हें मारने में कोई पाप वाप नहीं लगता।उल्टे पुण्य ही मिलता है।अब पाप मिले या पुण्य, वाणी रुक्ष हो या कोमल, कोई परवाह नहीं।बस आगे बढ़ा कदम पीछे नहीं उठना चाहिए, याद रखो मित्र भय बिनु प्रीत नहीं होती।

संशय विहग उड़ावन हारी

 सफर जारी है....938

19.05.2022

संदेह और जिज्ञासा से ही किसी प्रश्न की शुरुआत होती है और जब प्रश्न का उत्तर मिल जाए, जिज्ञासा का शमन हो जाये तो समस्या का समाधान मिल जाता है।यह एक सामान्य प्रक्रिया है और हम सबके जीवन में कमोवेश घटित होती है।कुछ प्रश्नों के उत्तर बहुत सरलता से मिल जाते हैं, उसमें किसी तर्क वितर्क की आवश्यकता नहीं होती, संभवतः ये सूचनात्मक प्रश्न होते हैं, क्या, कौन ,कब ,कहां की श्रेणी से सम्बन्धित।तो जैसे ही जानकारी मिलती है, मन तृप्त हो जाता है।बालक, विद्यार्थी और बुजुर्ग की जिज्ञासाएं लगभग एक सी होती है ...मसलन ये क्या है, कौन है, कहां से आया है, कहां जाएगा, कब जाएगा, कितनी देर रुकेगा, खायेगा या नहीं खायेगा,खायेगा तो क्या खायेगा क्या पसन्द है क्या नापसन्द है, बस इतनी जानकारी उनके लिए पर्याप्त होती है।छोटा बच्चा काले पक्षी को देखकर पूछता है ये क्या है आप कोयल या कौआ बता देते हो, वह मान जाता है।दिमाग में एक बिम्ब बिठा लेता है काला पक्षी यानी कौआ या कोयल,फिर उनके आकार की तुलना से एक और सूचना स्टोर कर लेता है कोयल छोटी कौआ बड़ा, कोयल मीठा स्वर कौआ कांव कांव।अर्थात सूचनात्मक प्रश्नों के उत्तर में स्वीकारोक्ति जल्दी हो जाती है।इसमें कोई संदेह या भरम की गुंजायश भी नहीं होती, जैसा कह दिया जाता है कमोवेश मान लिया जाता है।

रामचरित मानस तुलसी ने लिखी और रामायण वाल्मीकि ने, यह विवाद और तर्क का विषय नहीं है पर जो लिखा गया, उससे विद्वानों की सहमति असहमति हो सकती है।वैसे भी अब विज्ञान अपने चरम पर है तो जिसे सिद्ध कर दिया जाए,जो तर्क की कसौटी पर कसा जा सके, उसे ही स्वीकारा जा सकता है,उसी की जय जय हो सकती है ,आस्था और  विश्वास गए तेल लेने।उनकी भला क्या औकात जो तर्क के दरबार मे  अंगद की तरह पैर जमा सकें।अप्रिय भले ही हो पर सत्य ही पुजना चाहिए तभी सत्यमेव जयते की डुगडुगी बज सकेगी ।अब कृष्ण जी युधिष्ठिर के अश्वत्थामा हतो कहते अपना पांचजन्य बजाने नहीं आते जिसकी शोर में नरो वा कुंजरो की आवाज दब जाए।अब तो सब खुले खजाने होता है, जो है वह है और वह सब के सामने आना जरूरी है।रचनाकार अपने आसपास जैसा देखता है, उसे कलम से उकेर भर देता है।जैसा वह अनुभव करता है ,जैसा उसे उचित लगता है, अपनी बात कह देता है।अब रचनाकार तो मर मुल्तान गये और हम आलोचक और व्याख्याकार वर्तमान सन्दर्भों में उनके लिखे को  इतना घोट पीस रहे हैं, इतने अर्थ और अनर्थ कर रहे हैं कि यदि वे उपस्थित होते तो सिर पकड़ कर बैठ गए होतेकि हाय राम, ये मैंने क्या लिख दिया।

        अब  तुलसी बाबा को ही ले लो जो पता नहीं किस धुन में लिख गए शूद्र गंवार ढोल पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी।मार विमर्श मचा हुआ है पर निष्कर्ष पर कोई नहीं पहुंच पा रहा है।कहने को तो लंबी लंबी चर्चाएं होती हैं, खूब द्रविड़ प्राणायाम किये जाते है पर परिणाम सिफर ही रहता है।अरे भाई जो गलती पर होगा ,उसे सुधारने के लिए छल बल ,साम दाम दण्ड भेद का प्रयोग किया ही जायेगा, किसी को पुचकारा जाएगा ,किसी को दुत्कारा जाएगा, अब इसका मतलब ये थोड़े ही हुआ कि हम उसके दुश्मन हो गए।घर में चार बालक हों तो माँ सब से उनककी प्रकृति के अनुसार व्यवहार करती है, कोई आंख दिखाने से ही चुप हो जाता है तो कोई लात घूंसे खाकर भी दीठ का दीठ बना रहता है।उसे कुटे पिटे बिना चैन ही नहीं आता।तो लंबी लंबी चर्चाएं भले करते रहो,अगले को सही गलत भले से ठहराते रहो उनकी व्याख्या को सही गलत भले ठहराते रहो, तुलसी बाबा तो उनका जबाब देने आने से रहे।तो खुद ही उलझो और खुद ही सुलझो।खूब तर्क गढो, गर्मागर्म चटपटी बहस करो और खुद से ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचे बिना उसे डिस्पर्स कर दो।सब तुम्हारी मर्जी।

        पर इसमें कोई शक शुभा नहीं है कि राम चरित की कथाएं बोध जगाती हैं, सुंदर हैं, अनेक संदेहों का निवारण करती है, जीवन जीने के सूत्र दे देती हैं।सिखाती हैं कि काहे का अभिमान करते हो, सीखो हनुमान से जो लंका को धू धू कर जला देते हैं पर प्रभु के पूछने पर मात्र इतना ही कहते हैंसो सब तव प्रताप रघुराई, नाथ न कछू मोरी प्रभुताई।राम कथा सुंदर करतारी, संशय विहग उड़ावन हारी।तो पढ़ते दुहराते रहिये राम कथा को, चर्चा परिचर्चा करते रहिए, इस सब ब्याज से भी आप उसी राम को याद करते हैं जो रघुकुल नायक है, जिनके नाम मात्र से भव सागर पार हो जाते हैं।राम का नाम बड़ा सुखदाई।चर्चा परिचर्चा का जो भी परिणाम हो पर हमें तो राम चर्चा सुनने को मिल ही गई न, तो हम तो अपने भाग्य सराहते हैं कि ऐसे सत्संग का सुयोग जल्दी जल्दी मिलता रहे।

सौभाग्य न सब दिन सोता है

 सफर जारी है....937

18.05.2022

शिक्षा के केंद्र रहे नालन्दा की भूमि अहर्निश प्रणम्य है और उस पर गया और बौद्ध गया जाने का यात्रा लाभ और वह भी बुद्ध पूर्णिमा के दिन मिल जाए तो यही लगता है कुछ पुण्य उदय हुए होंगे।कब से मन में था कि गया जाकर दोनों कुल के पितरों का पिंड दान कर सकें।ईश्वर ने ज्यादा प्रतीक्षा नहीं कर बाई।वैचारिक संगोष्ठी से मन तो वैसे

 ही उत्फुल्ल था और जब अलसुबह इस कार्यक्रम की जानकारी मिली तो पांचों घी में और सिर कढ़ाही में था।मारे उत्साह के रात भर नींद ही आंखों से कोसो दूर चली गई औरबस रात सपनों में बीत गई।

 पटना से गया लगभग135 किलोमीटर है ट्रेवलर में लद कर हम नवरत्न सफर पर चल दिये।एक से एक बढ़कर विद्वान और बिल्कुल मौलिक और अनछुए विषयों पर चर्चा इस यात्रा में खूब तड़का लगाया।गरम और नरम दल अपने अपने पक्ष को बखूबी रखते और जैसे ही बात का रुख किसी विवाद की तरफ मुड़ता, न्यायमूर्ति तुरन्त उसे एक नए विषय में बदल देते।पासंग मारने की तो जरूरत ही नहीं पड़ी।सुन्दरकांड की सारगर्भित व्याख्या,वरिष्ठ पत्रकार के चुभते सीधे सीधे सवाल, सहयोग परिषद के संरक्षक की संतुलित टिप्पणी, अपना अपना पक्ष रखते दो प्रमुख रचनाकारों की जुगलबंदी ने खूब समा बांधा।क्या नहीं था इस यात्रा में कहानी, कविता, गजल, शास्रीय संगीत, रवींद्रनाथ टैगोर के गीत वह भी सुर और ताल में, सच में बहुत यात्राएं की होंगी पर ये सफर कुछ हट के था।अपने अपने विषय के महारथी विद्वानों को सुनना काफी लाभदायक रहा।हम तो चुप्प ही श्रोता बने रहे।अब इतने लोग कहने वाले तो एक आध गम्भीर श्रोता भी तो जरूरी था।

 आयोजक भाई की निगाहें तो बिल्कुल सीसीटीवी की माफिक काम कर रही थीं कि कब किसको फल फलारी चाहिए कब किसका प्यास से तड़क रहा है और किसे कब चाय की तलब लग रही है,जब पेट में चूहे उपद्रव मचाने लगे तो गर्मागर्म पूड़ी आलू सब्जी और जलेबी की व्यवस्था हो गई।खा पी के निच्चू हो के सोचाचलो अब वो काम तो कर लें जिसके निमित्त आये हैं।बड़े विधिविधान से पूरी मंडली ने अपने अपने पितरों को विधि विधान से गया में स्थापित किया।और जब पंडित जी तीन पीढ़ियोंके नाम पूछ रहे थे और याद न आने पर ब्रह्मा विष्णु महेश या गंगा जमुना सरस्वती का नाम लेने की छूट दे देतातो लगा सच में हमारे पूर्वज देवी देवता ही तो हो गए हैं।कोई रिश्ता ऐसा नहीं था जिसका उल्लेख नहीं हुआ हो।रिश्तों की दृष्टि से कितने भरे पूरे हैं हम।और जिन नामों से इतनी चिपक है वह तो दूसरी पीढ़ी तक को याद नहीं रहता।सभी साथी बहुत ही विचारवान और तार्किक थे पर यहां सब आस्था और विश्वास के साथ पूजा सम्पादित कर रहे थे।मैं बार बार सभी के चेहरे पर पसरी शांति और आनन्द के भाव को चोर निगाहों से देख लेती।संकल्प तो एक लेकर आया था लेकिन उनके शूभ संकल्प ने सबको अपने रंग में भरंग लिया।सभी की चाह बलबती हो उठी और अंत में सभी ने गया में पिंड भर ही दिए।सच।ये ऐसा लगा मानो पितर साक्षात आकर हमें आशीर्वाद दे रहै हों।

 अगला पड़ाव बौद्ध गया था, निर्वाण पा बुद्ध तो हम सबके लिए पूजनीय हो गये हैं।कितनी शांति है उनके चेरेहरे पर जैसों सबको अपना सा बनने की सीख दे रहै होंबुद्धम शरणम गच्छामि।धम्मम शरणम गच्छामि,संघम शरणम गच्छामि केवल तीन सूत्र वाक्य ही नहीं, ये जीवन की सार्थकता है।पर बुद्धत्व सबके हिस्से तो नहीं आता फिर भी बोधि बृक्ष में नीचे बैठने से छूने से कुछ तो शांति मिलती ही है।ये सारे अवसर जिस के ब्याज से हाथ आये उसका उल्लेख किए बिना बात पूरी कैसे होगी भला।आजादी के अमृत महोत्सव के चलते स्वाधीन भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण के विविध आयाम विषयक संगोष्ठी में संस्कृति के वैश्विक रूप को तो उकेरा ही गया साथ ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओंपर सार्थक चर्चा थी।इसी क्रम में हनुमान चालीसा के अधिकृत विद्वान पूज्य प्रदीप भैया और सुंदरकांड पर अपनी व्याख्याओं से सबके संदेहों कक निवारण करने वाले आदरणीय मनोज जी से परिचय खाते में जुड़ गया।सच में इस शैक्षिक यात्रा के कई संदर्भ बहुत मौजूं हैं।बस मैं तो इतना ही कह सकती हूँ कि संतों की संगत सदैव सुखकारी होती है और सारे दुखों को स्नेहिल स्पर्श से ही हर लेती हैं।हम बथुआ को तो गेंहू के संग पानी लग गया, बस इतने में ही भर पाये।मिलते रहे ऐसे सौभाग्य, बस ऐसे क्षणों को तो साड़ी के पल्लू में घिर्र के बांधने कक मन होता है।

रिश्ते छीज रहे हैं

 सफर जारी है.....936

17.05.2022

अनाज साफ करते फटकन और आटा पिसाते छीजन  सुना था पर रिश्तों में भी सीलन और छीजन आ जाती है, रिश्ते धुंधुआते हैं,रिश्तों में काट फांस होती है, रिश्तों की बुनाबट में यदि फंदे ही गलत पड़ जाए तो सारी बुनाई ही गलत हो जाती है ।रिश्तों को सींचना होता है, उन्हें खाद पानी देना होता है,गुड़ाई करनी होती है, खर पतवार उखाड़ फेंकने होते हैं।कभी नरमाई तो कभी गरमाई से काम लेना होता है ।उन कोमल तंतुओं को बहुत संभाले रखना होता है जिनके कारण ये रिश्ते जुड़ते हैं,ये अनुभव भी कर लिया।

    रिश्ते जोड़ना एक बात है और उन्हें संभाले रखना दूसरी।जो रिश्ते मां की कोख से मिलते हैं सहोदरों के, उसमें भी संतुलन बनाये रखना होताहै तो फिर वे रिश्ते जो एक नए सम्बन्धके साथ मिलते हैं उन्हें साधे रखना तो और टेढी खीर है।ये मुंह फुलाये रिश्तों को निभाने में तो पूरी उम्र बीत जाती है पर उनके मुंह ही सीधे नहीं होते।किसी न किसी बात को लेकर रूठा मटकी चलती ही रहती है।कितना भी संभल कर चलो पर हड़का तो किसी भी बात पर जा सकता है।रिश्तों की गरिमा तार तार की जा सकते है और तो औरउसे दो फाड़ भी किया जा सकता है।रिश्ते की दुनिया केवल परिवार तक ही सीमित नहीं होती।आप चाहे जहां रिश्ते बना सकते हैं, उन्हें निभा सकते हैं बस शर्त एक ही होती है कि आप उनसे अपेक्षाएं न जोड़ें।रिश्तों में दरार आने की एक बड़ी वजह अपेक्षा है।इसलिए आप पड़ोसी धर्म और दोस्ती के रिश्ते अच्छी तरह निभा ले जाते हो क्योंकि कर के भूल जाते हो, बस इसलिए कर देते हो कि आपको करना अच्छा लगता है।सूद तो दूर की बात,मूल की भी इच्छा नहीं रखते।बस कर दिया सो कर दिया।

   याद करो आप किसी गरीब की बेटी की शादी में जितना मर्जी सहयोग कर दो पर उसे कभी जुबान पर नहीं लाते, उसका जिक्र भे नहीं करते क्योंकि आप उस अपनी मर्जी से करते हैं, करने का कोई दबाब नहीं होता।आपसे कोई कहता भी नहीं है, बस आपको उचित लगा और आपने कर दिया।तो सौ बातों की एक बात यह है कि रिश्ते वहां आसानी से निभ जाते हैं जहां मन में गुंजायश हो, उदारता हो, सामने वाले की परिस्थिति समझ आती हो।ये नहीं कि दस पैसे का किया और दासियों बार इसे गाते रहें, दस लोगों को सुनाते रहे।अरे सम्बाई नहीं तो मत करते।और जो तुम न करते तो कोई दूसरा करता,अगले का काम तो हो ही जाता।सच तो यह है कि दिलों में गुंजायश ही बाकी नहीं रही ।रिश्तों को ऐसा मोड़ तरोड जगह जगह से पिचका दिया कि बस क्या कहें।सारे संदर्भ अर्थ आधारित ही नहीं हुआ करते।व्यवहार बड़ी बात है तो रिश्तों को निभाना है तो खुटसयाने मत बनो।भाषा की गरिमा बनाये रखो।किसी पर चौबीस घण्टे लदे ही मत रहो।उसे व्यक्तिगत स्पेस दो।उसकी भी पसन्द नापसन्द हो सकती है।उसे भी कुछ अच्छा बुरा लग सकता है।उसकी भी इच्छा अनिच्छा हो सकती है।

   रिश्तों को खाद पानी देना जरूरी है।उन्हें पनपने के लिए स्पेस देना जरूरी है, कभी कभी ढील देना जरूरी है।कोई सम्बन्ध न रखना चाहे तो उससे दूरी भी जरूरी है।रिश्तों के ताने बाने ठीक से डालना जरूरी है।जो रिश्ते स्वार्थ आधारित होते हैं उनकी उम्र लंबी नहीं हुआ करती।वे जल्दी दम तोड़ देते हैं।यथार्थ में तो वे पहली चोट में ही टूट गए होते हैं पर बाहरी दिखाबे के लिए हम उन्हें आरोपित किये रहते हैं।मृतजीवी रिश्तों के मुख में गंगा जल की बूंदे टपकाते रहते हैं।चलो हम कम से कम रिश्तों को जीते तो हैं, लड़ते हैं तो क्या बाहरी के सामने तो सब एक हैं।चिंता है आने वाली पीढी की जब वे अकेले होंगे तो चाचा ताऊ के रिश्ते कहीं समाप्त न हो जाएं, यदि सब अच्छा ही चल रहा था तो घर के बूजुर्ग वृद्धाश्रम में कैसे पहुंच गए, इकलौते बालक को चचेरे फुयेरे तयेरे के अर्थ संन्दर्भक्यों पता नहीं रहते, जब बच्चों के पिता उसके सुख के लिए बिना सास का घर वर तलाशते हैं,उसे पट्टी पढ़ाते हैं कि तू अपना और अपने पति का देख, तुझे सास के कुनबे से क्या लेना देना।तो रिश्ते तो बिगड़ेंगे ही, अब तो सहेजे भी नहीं जा सकते।वे लगातार छीज रहे है और उन्हें छीजना भी चाहिए क्योंकि उसकी उचित परवरिश नहीं हो पाती, उसे बित्ते भर जमीन भी नहीं मिलती,बस सब पर एक ही बात हावी है कि हो सके तो रिसते छीजते रिश्तों को बनाने की एक कोशिश कर ली जाए।

बहुत जरूरी है प्रतिबद्धता

 सफर जारी है....936

16.05.2022


जीवन जैसा भी हो ,उसे जीना होता है।कुछ लोग जीते हैं और कुछ इसे काटते सा हैं।जब पूछो कैसे हो भाई तो घिसा पिटा सा एक ही जबाब मिलता है बस समय काट रहे हैं।और जो पूछो भाई क्या हुआ तो उनके पास मौसम से लेकर तबियत तक की इतनी शिकायतें होती हैं कि कई बार भरम हो जाता है ये मुसीबतों से घिरे हुए हैं या मुसीबतें इनसे घिरी हुई हैं।इन्हें झींकना बहुत पसंद है।छोटे छोटे ढेरों खुशी के अवसर आते हैं जिन्हें पकड़ा जा सकता है और हंसी खुशी जीया जा सकता है।पर नहीं, कुछ का स्वर तो हमेशा शिकायती और उलाहने तायने से भरा रहता है।उनके स्वर से खीझ सी टपकती रहती है।ऐसा लगता है दुनिया भर की कटाह इन पर ही पड़ गई है।जबकि सच तो यह है कि कम साधनों में भी खुशी खुशी जीया जा सकता है।खुशियां साधनों की मोहताज नहीं हुआ करती।हां ,आपका दृष्टिकोण जरूर मायने रखता है। अब आपने आदत ही बना ली हो कि हमें तो साब रोते पीटते ही जीना है तो उसमें भला कौन हथेली लगा सकता है। 

जो मिला, वह आंख तर नहीं आता और जो पास नहीं,उसकी कमी हमेशा खलती रहती हैं कि देखो, सब खूब आराम से हैं, बस हम ही मुसीबत के मारे हैं या यों कह लीजिए कि पराई थाली का भात हमेशा मीठा लगता है।और कहीं वह थाली उन्हें मिल जाये तो मीन मेख उसमें भी खोज लिए जाते हैं कि नेक ऐसा और होता।ये नेक उनका पीछा कभी नहीं छोड़ता सो वे किसी भी अवसर को एन्जॉय नहीं कर पाते। कुछ की तो दृष्टि अगले के सुख पर ही लगी रहती है कि उसे देखो कैसे हंस रहा है, ठहाके लगा रहा है, खूब मौज में है, उसकी तो पांचों घी में और सिर कढ़ाही में है।यानी तुम्हारी कुढ़ने की आदत है तो तुम किसी भी बहाने से कुढ़ना शुरू कर सकते हो।अब तुम्हें सबसे कटे कटे रहने की आदत है तो अगला इसमें क्या कर सकता है भला।उसे सबसे मिलना जुलना पसन्द  है,वह प्रसन्नचित्त रहता है और आपका सारा समय उसे खुश देख कुढ़ने में ही चला जाता है।सबका अपना अपना जीवन है, सबका जीने का तरीका अलग है।आपका अपना जीवन है।उसे आप कैसे जीते हैं ,यह आप पर निर्भर करता हैं।सुख दुख तो सबके साथ  हैं, थोड़ी बहुत ऊंच नीच भी सबके साथ लगी रहती है।कोई परम् सुखी नहीं है।सुना तो होगा कोई तन दुखी कोई मन दुखी कोई पल पल रहत उदास, थोड़े थोड़े सब दुखी और सुखी राम के दास ।अब कुछ सुख दुख, कठिनाई मुसीबत को जीवन का अनिवार्य हिस्सा मानते हैं और उसे इसी भाव से लेते हैं।उसे बहुत व्हेटेज नहीं देते।लो तुम आ गए, बैठ जाओ एक तरफ, पड़े रहो कोने में, अभी टैम नहीं है तुम्हें अटेंड करने का।वे बड़ी से बड़ी घटना सुखद हो या दुखद, सामान्य रूप से लेते हैं तो कुछ इसे तिल का ताड़ बना देते हैं।कुछ छोटे से छेद को वहीं का वहीं रफू कर देते हैं और कुछ उसे अंगुली से फाड़ और चौड़ा कर देते हैं।फिर उसे लेकर रोते झींकते रहते हैं।

जीवन जीने का सबका अपना अपना तरीका है।ये आप पर निर्भर करता है कि आप किसी परिस्थिति के प्रति कैसे रिएक्ट करते हैं, उसके समाधान सोचते हैं या समस्या को मेग्नीफाई करते हैं, बढा चढ़ा कर सबके सामने गाते हैं, उसका इतिहास बताना शुरू कर देते हैं।अब समस्या है ये तो सबको पता है पर उससे कैसे सिलटा जा सकता है उस ओर सोचना जरूरी है।जीवन को जीने के लिए आपकी  प्रतिबद्धता बहुत जरूरी है।आपके उसूल बहुत जरूरी हैं, आप किस तरह समस्या को लेते हैं ।उसे हउआ बनाकर या उसका विश्लेषण कर के।जो लोग छोटे छोटे स्वार्थों के वशीभूत हो जाते हैं, अकर्मण्य होते हैं, हमेशा दूसरों पर डिपेंडेंसी रखते हैं, केवल समस्या का बयान करते हैं ,करने के नाम इधर उधर रस्ता बदल लेते हैं ,उन्हें हर बाधा बड़ी ही लगती है।उनका समस्या के निदान से कोई सरोकार नहीं होता।बस हो हल्ला मचाकर लाइम लाइट में बने रहते हैं और जब सब सिलट जाए तो सबसे पहले आकर यश लूटते हैं कि हमने तो पैले ही कई साब।

तो दुनिया रंग बिरंगी है दोस्तो, आपका मनोबल बढाने वाले कम और धकेलने वालों की संख्या अधिक है।संभल कर रहिये और चलिए।जीवन को भरपूर जीने के लिए प्रतिबद्धता बहुत जरूरी है तो चाहे जो करो छोटा या बड़ा, उसके हर पहलू को समझो, नहीं आता तो सीखो,पूछो, सलाह लो, पर करो जरूर।चार बार गिरेंगे तो क्या फिर उठकर खड़े हो जाएंगे।ठोकरें भी तो सिखाती ही हैं।कभी न कभी तो सीख ही जायेंगे।बस, बढ़ना है आगे बढ़ना है और पूरी प्रतिबध्दता से बढ़ना है।आगे होय सो देखी जाएगी।सफर जारी है....936

16.05.2022

बहुत जरूरी है प्रतिबद्धता......

जीवन जैसा भी हो ,उसे जीना होता है।कुछ लोग जीते हैं और कुछ इसे काटते सा हैं।जब पूछो कैसे हो भाई तो घिसा पिटा सा एक ही जबाब मिलता है बस समय काट रहे हैं।और जो पूछो भाई क्या हुआ तो उनके पास मौसम से लेकर तबियत तक की इतनी शिकायतें होती हैं कि कई बार भरम हो जाता है ये मुसीबतों से घिरे हुए हैं या मुसीबतें इनसे घिरी हुई हैं।इन्हें झींकना बहुत पसंद है।छोटे छोटे ढेरों खुशी के अवसर आते हैं जिन्हें पकड़ा जा सकता है और हंसी खुशी जीया जा सकता है।पर नहीं, कुछ का स्वर तो हमेशा शिकायती और उलाहने तायने से भरा रहता है।उनके स्वर से खीझ सी टपकती रहती है।ऐसा लगता है दुनिया भर की कटाह इन पर ही पड़ गई है।जबकि सच तो यह है कि कम साधनों में भी खुशी खुशी जीया जा सकता है।खुशियां साधनों की मोहताज नहीं हुआ करती।हां ,आपका दृष्टिकोण जरूर मायने रखता है। अब आपने आदत ही बना ली हो कि हमें तो साब रोते पीटते ही जीना है तो उसमें भला कौन हथेली लगा सकता है। 

जो मिला, वह आंख तर नहीं आता और जो पास नहीं,उसकी कमी हमेशा खलती रहती हैं कि देखो, सब खूब आराम से हैं, बस हम ही मुसीबत के मारे हैं या यों कह लीजिए कि पराई थाली का भात हमेशा मीठा लगता है।और कहीं वह थाली उन्हें मिल जाये तो मीन मेख उसमें भी खोज लिए जाते हैं कि नेक ऐसा और होता।ये नेक उनका पीछा कभी नहीं छोड़ता सो वे किसी भी अवसर को एन्जॉय नहीं कर पाते। कुछ की तो दृष्टि अगले के सुख पर ही लगी रहती है कि उसे देखो कैसे हंस रहा है, ठहाके लगा रहा है, खूब मौज में है, उसकी तो पांचों घी में और सिर कढ़ाही में है।यानी तुम्हारी कुढ़ने की आदत है तो तुम किसी भी बहाने से कुढ़ना शुरू कर सकते हो।अब तुम्हें सबसे कटे कटे रहने की आदत है तो अगला इसमें क्या कर सकता है भला।उसे सबसे मिलना जुलना पसन्द  है,वह प्रसन्नचित्त रहता है और आपका सारा समय उसे खुश देख कुढ़ने में ही चला जाता है।सबका अपना अपना जीवन है, सबका जीने का तरीका अलग है।आपका अपना जीवन है।उसे आप कैसे जीते हैं ,यह आप पर निर्भर करता हैं।सुख दुख तो सबके साथ  हैं, थोड़ी बहुत ऊंच नीच भी सबके साथ लगी रहती है।कोई परम् सुखी नहीं है।सुना तो होगा कोई तन दुखी कोई मन दुखी कोई पल पल रहत उदास, थोड़े थोड़े सब दुखी और सुखी राम के दास ।अब कुछ सुख दुख, कठिनाई मुसीबत को जीवन का अनिवार्य हिस्सा मानते हैं और उसे इसी भाव से लेते हैं।उसे बहुत व्हेटेज नहीं देते।लो तुम आ गए, बैठ जाओ एक तरफ, पड़े रहो कोने में, अभी टैम नहीं है तुम्हें अटेंड करने का।वे बड़ी से बड़ी घटना सुखद हो या दुखद, सामान्य रूप से लेते हैं तो कुछ इसे तिल का ताड़ बना देते हैं।कुछ छोटे से छेद को वहीं का वहीं रफू कर देते हैं और कुछ उसे अंगुली से फाड़ और चौड़ा कर देते हैं।फिर उसे लेकर रोते झींकते रहते हैं।

जीवन जीने का सबका अपना अपना तरीका है।ये आप पर निर्भर करता है कि आप किसी परिस्थिति के प्रति कैसे रिएक्ट करते हैं, उसके समाधान सोचते हैं या समस्या को मेग्नीफाई करते हैं, बढा चढ़ा कर सबके सामने गाते हैं, उसका इतिहास बताना शुरू कर देते हैं।अब समस्या है ये तो सबको पता है पर उससे कैसे सिलटा जा सकता है उस ओर सोचना जरूरी है।जीवन को जीने के लिए आपकी  प्रतिबद्धता बहुत जरूरी है।आपके उसूल बहुत जरूरी हैं, आप किस तरह समस्या को लेते हैं ।उसे हउआ बनाकर या उसका विश्लेषण कर के।जो लोग छोटे छोटे स्वार्थों के वशीभूत हो जाते हैं, अकर्मण्य होते हैं, हमेशा दूसरों पर डिपेंडेंसी रखते हैं, केवल समस्या का बयान करते हैं ,करने के नाम इधर उधर रस्ता बदल लेते हैं ,उन्हें हर बाधा बड़ी ही लगती है।उनका समस्या के निदान से कोई सरोकार नहीं होता।बस हो हल्ला मचाकर लाइम लाइट में बने रहते हैं और जब सब सिलट जाए तो सबसे पहले आकर यश लूटते हैं कि हमने तो पैले ही कई साब।

तो दुनिया रंग बिरंगी है दोस्तो, आपका मनोबल बढाने वाले कम और धकेलने वालों की संख्या अधिक है।संभल कर रहिये और चलिए।जीवन को भरपूर जीने के लिए प्रतिबद्धता बहुत जरूरी है तो चाहे जो करो छोटा या बड़ा, उसके हर पहलू को समझो, नहीं आता तो सीखो,पूछो, सलाह लो, पर करो जरूर।चार बार गिरेंगे तो क्या फिर उठकर खड़े हो जाएंगे।ठोकरें भी तो सिखाती ही हैं।कभी न कभी तो सीख ही जायेंगे।बस, बढ़ना है आगे बढ़ना है और पूरी प्रतिबध्दता से बढ़ना है।आगे होय सो देखी जाएगी।

पाठशाला बोल रही है

 सफर जारी है....935

15.05.2022


 सब बोलते हैं, फूल खिलखिलाकर बहुत कुछ कह जाते हैं, रात्रि की नीरव चांदनी भी कुछ कुछ कह जाती है तो भला पाठशाला की दीवारें, खिड़कियां, खेल का मैदान, कक्षा कक्ष का बोर्ड कुछ नहीं कह सकता क्या।अरे भाई, अब वो दौर धीरे धीरे अतीत में बदल रहा है जब पूरे दो साल तक इन पाठशालाओं पर कोरोना का काला साया था, बिल्कुल नीरव और सुनसान हो गई थीं पाठशाला, कक्षा कक्ष सांय सांय भाँय भाँय करते थे, खेल के मैदान बच्चों की पदचाप को तरस गए थे, वह बड़ा सा प्रवेश द्वार बिल्कुल मौन हो गया था।बड़ी और भव्य बिल्डिंग अपनी जगह थी लेकिन उसमें पढ़ने वाले गायब थे, सब जैसे ऑन लाइन में सिमट कर रह जिक था।ब्लैक व्हाइट बोर्ड अपने स्थान पर थे पर उसका प्रयोग करने वाले अध्यापक घरों में कैद थे, बागबानी खूब खिल रही थी पर उसे देखने और ललचाती निगाहों से तोड़ने के लिए उत्सुक बालगोपाल नदारद थे।बड़ा सा घण्टा अपनी जगह टँगा हुआ था, लेकिन टन टन ध्वनि करने वाला चौकीदार घर में सोया पड़ा था।अब वहां किसी की उपस्थिति ही नहीं थी जिसे प्रार्थना सभा में, कक्षा में बुलाने और आधी पूरी छुट्टी के लिए घण्टी टनटनानी पड़े।सब बिल्कुल व्यवस्थित तरीके से मौजूद था पर वे नन्हे मुन्ने बाल गोपाल जिनके लिए ये सारा सरंजाम था, वे ही गायब थे।किसी भी शैक्षिक संस्था के मूल में तो विद्यार्थी ही होते हैं बाकी तो सब उनके सहयोग के लिए ही होता है फिर चाहे अध्यापक हों, प्रधान अध्यापक हों, प्रशासन हो,क्लेरिकल स्टाफ हो,चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हो बड़ा सा पुस्तकालय ,प्रयोगशालाएं और विहंगम क्रीड़ा स्थल।बस जब मूल ही गायब तो सब बेकार सा लगने लगता है।

विद्यार्थी विद्यालय की, संस्था की आत्मा है।उसे मूल में रखकर ही सारे सरंजाम किये जाते हैं तो जैसे ही अध्ययन अध्यापन ऑफ़ लाइन हुए, प्रत्यक्ष शिक्षण प्रारम्भ हुआ, सब बदल गया है।वे मनहूस से कक्षा कक्ष कैसे जीवंत से हो गए हैं, व्हाइट बोर्ड लिप पुत गये हैं, किताबें लगातार पढ़ी जा रही हैं, पुस्तकालय की शोभा लौट आई है।किताबें विद्यार्थियों के हाथों और आंखों की संस्पर्श पा कैसी निखर गई हैं। सूने पड़े वीरान छात्रावास फिर से आबाद हो गए हैं।अध्यापकों की जिजीविषा शक्ति जैसे दुगुनी तिगुनी चौगुनी हो गई हो।सभी की भागदौड़ शुरू हो गई है, हर तरफ अफरा तफरी है।सब जाग से गये हैं।जिसे देखो वही व्यस्त है।सब पेंडिंग काम शीघ्रता से निपटा रहे हैं।उबासी लेते कर्मचारी पूरी तरह सजग हो गए हैं।सबके मन में अपने अपने काम को अच्छी तरह से करने की ललक जाग गई है।इतने बड़े बड़े परिवर्तन हो रहे हैं और वजह बस एक ही है कि संस्था के जैसे प्राण लौट आये हैं।

सच में चार मंजिला अत्याधुनिक भवन कार्मिकों के अभाव में सूने पड़े रह जाते हैं।घर की शोभा घर वालों से ही होती है।जब तक घर में बर्तन न खटके तब तक घर घर सा लगता ही नहीं और जहां चार बर्तन होते हैं तो खटकना तो लाजिमी ही है।घर में लोग हैं तो घर गन्दा भी होगा,अफरा तफरी भी होगी, अव्यवस्था भी होगी, सफाई भी करनी होगी, खाने की व्यवस्था भी होगी, घर घर सा तभी लगता हो जब शोरगुल हो, कोई कुछ मांगे, आप कभी पुचकारे कभी डांटें, बिल्कुल सूमसाम सा और खूब खूब व्यवस्थित तो होटल हुआ करते हैं घर नहीं, संस्थाएं नहीं।जहां लोग होंगे वहीं सारी व्यवस्थाएं आवश्यक होंगी, वहीं कार्मिक अपेक्षित होंगे, वहीं अधिकारी को नियुक्त करने के प्रसंग होंगे, अधिकारी होंगे तो उनके लिए सहायक होंगे, चपरासी चौकीदार होंगे, गाड़ी होगी तो चालक चाहिए होगा।गन्दगी होगी तो सफाई कर्मी होंगे, बागबानी होगी तो माली होंगे।तो एक की आवश्यकता दूसरे से उपजती है।

होते रहे शिक्षण प्रशिक्षण, आते रहें नित नवीन अध्येता, पढ़ाते रहें अध्यापक, पढ़ी जाती रहें ये पुस्तकें पत्रिकाएं ग्रन्थ और समाचार पत्र, बने रहे ये अधिकारी तो मिलता रहे उनके सहायकों को काम।बस चलता रहे ये सिलसिला और बोलती बतराती रहें ये पाठशालाएं, हम जैसे तो इसी में भर पाएंगे।

जहां सुमति तहँ संपत्ति नाना

 सफर जारी है....934

14.05.2022

रामचरित मानस की एक चौपाई की अर्धाली भी यदि जीवन में उतार ली जाए, तो जीवन जीना आसान हो जाता है,जीवन में चमत्कारिक परिवर्तन हो जाता है और बहुत सी समस्याओं के समाधान स्वतः मिल जाते हैं।पर हम मूर्ख अनेको बार अखण्ड पाठ करते भी निसंग से रहते हैं।लो जी बस आपने कहा तो हमने पड़ लिया।अनेको बार पढ़ते दोहराते बहुत कुछ कंठस्थ भले हो जाए पर उसके भाव को समझने और अंगीकार करने करने में हम असमर्थ ही रहते हैं क्योंकि उसे अर्थ सहित कभीग्रहण ही नहीं किया जाता, बस संगीत की जोरदार ध्वनि के मध्य हम भी उन्हें मात्र उच्चरित करते रहते हैं।मंगल भवन अमंगल हारी, द्रवउ सुदशरथ अजिर बिहारी के सम्पुट का अर्थ भी नहीं जान पाते।

किसी भी घर, समाज और देश की उन्नति के लिए सुशासन बहुत जरूरी है, आपसी सद्भाव परस्पर सौहार्द और एक दूसरे के प्रति समझ आवश्यक है और यह समझ आती है सुमति से।सुमति के साथ ही कुमति जुड़ी हुई हैं।दोनों मनुष्य के ह्रदय में निवास करती हैं।कुमति सुमति सबके उर रहहीं, वेद पुराण निगम अस कहहीं।बस जिस क्षण जिसका प्राधान्य हो जावे, व्यक्ति उसी के अधीन हो जाता है।कैकई तो राम को भरत से बढ़कर मानती थी पर मन्थरा की कुटिलता ने उनके अंदर की कुमति को हवा दे दी, उनमें ऐसा जहर भर दिया, अपने पराये की ऐसी पट्टी पढा दी कि वह दशरथ से प्राणप्रिय राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास और भरत के लिए राजगद्दी मांग बैठी।औरस पुत्र भरत के लिए राजगद्दी की मांग तकतो ठीक था पर कुमति ने उन्हें राम के प्रति इतना विषाक्त कर दिया कि वे उन्हें चौदह वर्ष के वनवास पर भेजने के लिए तुल गई।अब ये बात अलग है कि इस जिद से केवल उनके हाथ पति का स्वर्गवास और पुत्र की घृणा ही आई।

तो जब जब कुमति का आधिपत्य होता है, कुछ न कुछ अनर्थ होता ही है।सो बार बार कहा गया बुद्धिमान बनो।पढने लिखने से समझ विकसित होती है इसलिए बार बार दोहराया जाता रहा कि चार अक्षर लिख पढ़ लो, लोगों में बैठने लायक हो जाओगे।मत पढो ज्यादा, अक्षर ज्ञान ही ले लो, गीता रामायण तो बांच सकोगे, वक्त जरूरत अपने को लिख बोलकर व्यक्त तो कर सकोगे, अपनी बात तो रख सकोगे पर अफसोस कि बड़ी बड़ी डिग्री और प्रमाणपत्र के पुलिंदे भी सामान्य समझ न जगा सके।समझ तो जब जगती तब ऐसी नीयत होती।यहां तो नीयत में ही खोट था सो कहने सुनने के लिए पट्टी और कॉपी पर सदा सच बोलो, झूठ मत बोलो, बड़ों का आदर करो, चोरी चकारी मत करो, आपस में मत लड़ो, मिलजुल कर रहो जैसे वाक्य खूब जमा जमा के सुंदर लेख में लिखते अवश्य रहे हों पर उनका रंचमात्र असर असली जीवन में न ला पाये।उस सबको तो बस पास फेल और अंकों तक ही सीमित कर दिया।जीवन उनके बिना भी दौड़ रहा हो तो उनकी वक़त भी क्या होती भला।ये तो भला हो उन ठोकरों का जिन्होंने जीवन का असली गणित सिखा दिया।बहुत भटकने के बाद जीवन जीने के असली सूत्र हाथ लगे कि जहां सुमति तहँ सम्पत्ति नाना, जहां कुमति तहँ विपत्ति निदाना।

       जो घर को स्वर्ग बनाना चाहते हो, सुखी रहना चाहते हो तो सुमति को जगाए रखो, दुर्बुद्धि से बचो, दूर रहो, उसकी तरफ भूल से भी मत देखो, दरवाजे खिड़की सब बन्द रखो, ये तो जरा सी सन्द में भी घुस आते हैं, बड़े लुभावने लगते हैं, मीठी मीठी चिकनी चुपड़ी बातें करते हैं, मिठबोले होते हैं मुख में राम बगल में छुरी रखते हैं, विष रस भरा कनक घट जैसे होते हैं ।इनसे जितनी दूरी बरतो उतना ही अच्छा।इन्हें तो पास भी मत फटकने दो।जैसे ही गलत सलत विचार आये उसे झटक दो।ये तो हर क्षण घात लगाए बैठे रहते हैं कि व्यक्ति जरा असावधान हो तो झपट्टा मारे, अपनी गिरफ्त में ले लें और जो एक बार इनके चंगुल में फंस गए तो सहज नहीं छूटते, फिर सहज मुक्ति नहीं मिला करती।कुमति का मार्ग बहुत आकर्षक और लुभावना है, जल्दी फंसा लेता है अपनी गिरफ्त में।तो ऐसों की संगत से  ही तोबा कर लो,दूर से ही हाथ जोड़ दो कि हम तो ऐसे ही भले, हमें ज्यादा चाहिए भी नहीं, इसी में आराम से गुजर बसर हो रही है।दोनों समय भरपेट खाते हैं, सिर पर छत और पांवों के नीचे जमीन है,सुख दुखमें साथ निभाने को अपने हैं, मिल बैठने को चार रिश्तेदार और मित्र है, शरीर ढकने को वस्त्र हैं, ओढ़ने बिछाने को सब व्यवस्था है, पैर में उपानह है सिर पर टोपी है, जीवन जीने को और क्या चाहिए भला।और फिर संतोष तो अंदर आता है। सन्तोषी सदा सुखी।बस ये सुमति बनी रहे, कुमति से बचाब हता रहे, बस प्रभु से यही प्रार्थना है।भूलें न कभी इस जीवन सूत्र को जहां सुमति तहँ संपति नाना, जहां कुमति तहँ विपत्ति निदाना। जीवन के इस मूलमंत्र को पकड़े रहें।बस नैया पार लग ही जाएगी।राधा रानी की कृपा से भवसागर पार हो ही जायेंगे।हमारो धन राधा श्री राधा श्री राधा, गोपाल धन राधा श्री राधा श्री राधा।

चुप हैं तो क्या

सफर जारी है...935

14.05.2022

अब भई अधिक बक बक करने की आदत नहीं है, शब्दों के खर्च के मामले में थोड़े सूम से हैं।करें भी क्या, बचपन से ये ही सिखाया पढाया गया कि बोलने से पहले सौ बार और लिखने से पहले हजार बार सोचो।शब्दों को सोच समझ कर खर्च करो।न ज्यादा न कम, बस जहां जितनी जरूरत हो उतना ही। सोच सोच के काम करने की ऐसी घुट्टी पिलाई गई कि अभी तक असर है।बहुतेरा सोचते हैं कि हम भी दुनियावी हो जाये ,बकबकी हो जाएं, जो मुंह में आये सो बोलते जाएं, न ये देखे कि क्या कहा जा रहा है,। किससे कहा जा रहा है और क्यों कहा जा रहा है।बस हमें तो कहना सिद्ध।न कह पाने का कैसा प्रेशर होता है, ये तो बस वही जानता है जो नहीं कह पाता और पेट पकड़े बैठा रहता है कि मौका मिले तो हल्का हो लें। अपने मन का गुबार निकाल लें, काहे को अपने दिल दिमाग पर भार रखे रहें।

          सो लोग दनदनाते आते हैं, शब्दों से पूरे लबालब और आते ही बिना क्रम के उगलना शुरू कर देते हैं, बीच बीच में उत्तेजित भी हो जाते हैं, शब्द कम क्रोध ज्यादा उगलते हैं,अपनी गलतियों पर उनकी नजर जाती हो न जाती हो पर अपने गलत सलत को किसी भी प्रकार से सिद्ध करने में लगे रहते हैं।पहले ऐसे लोगों से मिलने में बहुत कोफ्त होती थी, लगता था पूरा दिन ही बेकार चला गया।धीरे धीरे धैर्य आता जा रहा है अब सामने वाले की भाप निकलने तक बिल्कुल मौन बने रहते हैं और अगला जब कह कबा के खाली हो जाता है तब उसके हालचाल पूछना शुरू कर देते हैं।अब जब अगला क्रोध की ज्वाला में जल रहा हो तो आप जो मर्जी कहिये, वह उसे अपने मूड के अनुसार ही ग्रहण करेगा।तो ऐसे में चुप्पी लगाना ही बेहतर है।पहले तुम ही हल्के हो लो।वैसे भी जब दिमाग में इतना उल्टा सीधा भरा हो तो सामने वाले की सही बात भी गलत और भली भी बुरी लगती है।

          अपने को रिलीज करने के बाद जैसे ही उठ के चले कि हाथ पकड़ कर बैठा लिया ।इन सभी बातों का जबाब भी लेते जाओ।चुप थे तो इसलिए नहीं कि हमारे पास जबाब नहीं था या हमें बोलना नहीं आता था या तुम से डर लगता था या तुम जैसों से दबते थे या तुम्हारा सामना करने की हिम्मत नहीं थी या शब्दों का टोटा पड़ गया था या कि हम मुंह में दही जमाये बैठे थे कि तुमसे कमजोर पड़ते थे।बस सिखाया गया था अगला जब बोले तो उसे पूरी तरह सुनो, बीच में मत टोको, कितना भी तीखा कटु और बदतमीजी से बोले, बोलने दो क्योंकि हर व्यक्ति वही दे पाता है जो उसके पास होता है।कहने की तमीज बाजार में नहीं बिका करती जिसे खरीद कर पहना जा सके।ये तो परिवार से संस्कार से विरासत में मिलती है।जो मारे क्रोध के कांप रहा हो उससे अच्छे शब्दों और व्यवस्थित होने की मांग कैसे की जा सकती है भला।ये विशेषता तो शांत चित्त वालों की होती है।

          अगले को ये समझाना भी जरूरी हो जाता है कि सुनने वाला ईंट की मोटी दीवार नहीं है कि जब मन करा, भड़भड़ी में आये और सौ पचास चौबे ठोक के खिसक लिये ।बस अपने को रिलीज किया और हाथ झाड़ चल दिये कि अपना तो हो गया ।नहीं साहब इतनी आसानी से नहीं जा सकते आप, अब तो जबाब लेकर जाना होगा।खाली हाथ तो नहीं जाने देंगे भला।अब ये कोई बात थोड़े ही हुई कि इतना इतना दिया और बदले में खाली हाथ जाने दें।तो सुनो और तसल्ली से सुनो, आराम से सुनो, अब सब कह लिया तो खाली हो के सुनो कि जो अभी अभी विष रस को उड़ेल गए हो, उसे हमने छू आ भी नहीं है, हमारे काम का है भी नहीं, चाहो तो उसे पिछबाडे कचरे के ढेर में जाकर फैंक सकते हो, अकेले नहीं उठा पा रहे हो तो साथ में दो नौकर भेज देते हैं,आराम से घर पहुंचा आएंगे।अब सुनो, गलती को स्वीकारने में जो सुख है ,उसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते।गलती से भी गलती हो गई हो तो उसके लिए केवल तीन शब्द बोल लीजिये दोहरा लीजिये कि मुझे क्षमा करें, मुझसे गलती हो गई, आगे से ध्यान रखा जायेगा, बस बात समाप्त।ध्यान रखिएगा कि हर  बात का जबाब  बात से ही नहीं हुआ करता । कुछ के जबाब में चुप्पी में भी छिपे होते हैं।तो इन चुप्पियों को कम मत समझियेगा, उसके अर्थ और संदर्भ ग्रहण कीजियेगा। बड़े दिलकश होते हैं ये संदर्भ।

          सजायाफ्ता मुजरिम की तरह हाथ बांधे खड़े रहने की कोई जरूरत नहीं ,केवल गलती को स्वीकार कीजिये।उसे असत्य कथनों से पोषित मत कीजिये क्योंकि एक असत्य की रक्षा के लिए अनेक असत्य गढ़ने पड़ जाते हैं। आप अपने बुने जाल में स्वयम फंसते जाते हैं।फिर निकलना बहुत मुश्किल होता है।असत्य की गुजलकें बड़ी मोहक होती है,बड़ी जल्दी गिरफ्त में ले लेती है तो जितना हो उससे बच कर रहना सीखिए साब।काम करते हैं तो उन्नीस बीस होता ही है सो करेगा उसी से गलती भी हहोगी।जो हाथ बांध कर बैठे हैं ,जो करना ही नहीं चाहते, वे तो वैसे भी खुद मरे के समान हैं।बस केवल अपना समय नष्ट कर रहे हैं।दूसरों का तो क्या बिगाड़ पाएंगे पर हां, स्वयम को नष्ट जरूर कर लेंगे।तो उठिए, भाषाई समझ विकसित कीजिये, उसके संस्कार को बचाये रखिये, गिरना बहुत आसान होता है, सारी ताकत तो उठने में ही लगती है।तो इतने ऊंचे उठो कि जितना उठा गगन है।

क्यों नहीं लेते राम का नाम

 सफर जारी है...934

13.05.2022

        एक गीत के बोल सुबह से बहुत हावी हैं 'सुबह और शाम, काम ही काम'।अब हो सकता था कि शाम तक सब भूल भुला जाते पर दोपहर की खाने की छुट्टी में घर जाते मित्रों ने फिर दो पंक्तियां उछाल दीं... जिज्जी, काम से काम पे जा रहे हैं।वाह री औरत की जात,कहीं भी हो कितनी भी व्यस्तता हो पर घर हमेशा हावी रहता है कि अम्मा जी के भोजन का समय हो गया कि बच्चे स्कूल से आ गए होंगे कि भूखे होंगे कि पति को दवाई देनी है कि घर पर मेहमान आ गए होंगे।पता नहीं घर तो दोनों का होता है पर इन चिंताओं का कन्सर्न एक से ही ज्यादा क्यों होता है।शायद वह घर निर्मात्री होती है इसलिए या अधिक दायित्व शील होती है या पूरा आसमान अपने ऊपर टिका समझती है कि कहीं वह हटी तो छत भरभरा कर न गिर पड़े।अपने को धुरी मानने की भूल करती है या सच में परिवार की धुरी ही वह होती है, राम जाने।पर जब देखो काम और काम में अपने को आकंठ डुबोये रहती है।तो अपनी बिरादरी को इतने अधिक  कामों में व्यस्त देख गीत की मूल पंक्तियों  'सुबह और शाम काम ही काम क्यों नहीं लेते पिया प्यार का नाम' में ही बदलाब कर नई पंक्तियां गढ़ दीं। क्यों नहीं लेते बन्धु राम का नाम.अब प्यार व्यार तो हवा हुए, यह तीसरापन तो राम को याद करने का है।बहुत गुलछर्रे उड़ा लिये, फूली फूली चर ली, इस उस की चुगली में खूब समय बिता दिया।कबीर को पढा तो जरूर कि 'बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजा आपना मुझसे बुरा न कोय'।पर उसे गुन नहीं पाये।दूसरों की तरफ संकेत करते बिल्कुल भूल गए कि चार अंगुलियों का इशारा हमारी ओर ही है।

        भजन को केवल गाने के लिए गुनगुनाते रहे, उसके भाव को पकड़ ही नहीं पाये, भगवान के आगे घण्टरिया बजाते रहे पर कभी भक्ति में लीन नहीं हुए।भले ही दिखाने को नेत्र बन्द थे पर सच में तो सब देखते ही रहते थे।मुंह से राम राम बोलते और दिमाग में कुछ और ही चलता रहता।शायद इसे ही मुंह में राम बगल में छुरी कहते होंगे।'माला तो कर में फिरे जीभ फिरे मुख मांहि, मनवा तो चहुँ दिसि फिरे ये तो सुमरिन नाहि'।ऐसा ही तो सुमरिन करते रहे हम।सूरदास ने कम से कम स्वीकारा तो था कि 'प्रभु हों सब पतितन को टीको, और पतित सब दिना चार के हों तो जनमत ही को'।कम से कम ये भक्त कवि अपने विषय में स्पष्ट तो थे, अपनी कमियों को जानते थे तो थे।और जानते थे इसलिए उन बुराइयों से छुटकारा पाना चाहते थे।'अच्छा हूँ या बुरा हूँ जैसा भी हूँ तुम्हारा' कहते थे, प्रार्थना करते थे, अनुनय विनय करते थे, विनय के पद रचते थे, गोविंद को इतना चाहते थे कि उन्हें प्रेम के मोल खरीद ही लेते थे।याद है न प्रेम दीवानी मीरा घोषित कर देती है 'माई री मैंने लीनो गोविन्दो मोल, कोई कहे महंगों कोई कहे सस्तो लियो री तराजू तौल'।

        गोपियों के  पास तो एक ही मन था जो श्याम संग चला गया।स्पष्ट कह देती हैं गोपियाँ ' ऊधो मन न भये दस बीस, एक हुतो सो गयो श्याम संग को आराधे ईश'।पर यहां तो मन भौतिक वस्तुओं के पीछे ही डांव डांव डोलता है।कृष्ण के वियोग में यदि मधुवन हरे हैं तो उन्हें उलाहना सुनने को मिलता है 'मधुवन तुम कत रहत हरे, विरह वियोग श्याम सुंदर के ठाड़े क्यों न जरे'।पर यहां तो कृष्ण मिले न मिले ,मन उनके अभाव में व्याकुल हो कब रोता है, कब ह्रदय के अंदर से पुकार निकलती है।बस किसी तरह मन का सा हो जाये और मन का सा क्या है बस भौतिक संसाधनों की प्राप्ति।ईश्वर से मांगते भी क्या है बस ये मिल जाये वो मिल जाये।सारा सारा दिन इसी उठापटक में निकाल देते हैं ।ईश्वर से नेह लगाया ही कब, उसे मीरा राधा की तरह चाहा ही कब, कभी उसके विरह में इतने तड़पे ही नहीं कि उसे पाने में सब खोना पड़े।बस दिन रात उससे बहुत कुछ मांगा होगा कभी अपने लिए तो कभी अपनों के लिए।पर कभी ध्रुव की सी लगन नहीं लगी कि सब छोड़ 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय 'का अजपा जप करते, कुछ मालाएं जपी भी तो तुरंत उनका फल चाहा।निष्काम भक्ति करना नहीं आया।तीन चौथाई बीत गई, अब पसरत्ता समेटने की बारी है पर मन की चंचलता पर किसका बस है, वह तो निरंकुश है, कभी भी कहीं भी चला जाता है।खूब गीता पढ़ लो पर मन तो अभ्यास से सधता है।

        तो अर्थोपार्जन में ही लगे रहे, न किसी भूखे को खाना दिया न प्यासे को पानी।अब निर्लिप्त निरासक्त भाव से काम करने और हर क्षण प्रभु को भजने का अभ्यास डालना है।हर कदम पर राधे और श्याम निकले, बस हाथ भले ही काम करे पर जिव्हा राम ही राम जपे।बस प्रभु सुबह और शाम कर लिया बहुत काम, अब समय है काम के साथ साथ प्रभु को याद करने का, उसका  नाम लेने का।तो याद कर लो ये पंक्तियां.... 'सुबह और शाम, काम ही काम, क्यों नहीं लेते बन्धु राम का नाम, नाम ही तारे, नाम उबारे लेता चल प्रभु राम का नाम'।

मैया तो स्वर्ग से हू बढ़कर होय करे

 सफर जारी है.....933

11.05.2022

नेक टिक जा छोरा,सुनत नाय नेकऊ,अपनी अपनी ही दागे जा रयो है।अम्मा जी के आगे तो सबन ने सांप सूंघ जातो।  पीठ पे कस के दो थाप धर देती, ऐसो सन्न कर देती कि  सब हवा निकल जाती।अब देखो चींटी के हू पर निकर आये हैं।है तो नेकसो सो पर बड़ी फू फांय करे ।अपने आगे काऊ ए गिने ही नाय।कब ते समझा रये है महतारी बाप दोनों पर बा ढीठ के कान पे जू नाय रेंग रई।एक तो आजकल के बालक बड़े मनमौजी होय करें।जो मन में आ गई सो फिर करके ही दम लिंगे,फिर नाय सुन रये वे ब्रह्मा की हू,भले ही से तुम बकबो करो, कीकबो करो, बिन की सेहत पे रत्ती भर हू फर्क नाय पर रयो।सुने ही नाय फिर ।तुम भले ही बकबो करो।

    अब कल की बात ई ले लेयो ,वो का कहत ए ,हम्बे मदरस डे ।अब जे नयो चलन चलो है कि मैया की फोटो मोबाइल पे लगा देत ऐं और अखबारन में छाप लिंगे और मन गयो मदरस डे ।अब इन बाबरेन ने इत्त्ती ऊ सल नाय कि कि जो जन्म देबे, तुम्हें नौ महीना अपने पेट में धरे, तुम्हें पाले पोसे ,खुद गीले में सो के तुम्हें सूखे में सुलाबे, खुद भूखी रह के तुमारो पेट भरे ,तुमाई दिन रात कुसल मनाबे ,तुमारो चेहरा देख के जीबे, बो का तुम्हारे काजे साल में एक दिना पूजबे की वस्तु होयगी, तुम बाय पूजो चाये मत पूजो, बाके संग फोटो खींच के लगाबो चाहे मत लगाबो पर बाको मान जरूर राखो।बा ते उलटो सीधो मत बोलो, जबान दराजी मत करो, गाली गुपता मत देयो, चीख चीख के मत बोलो, शांति ते हू बात कही जा सके।हमें खूब सल है कि अब तुम बड़े है गए हो, अब तुम्हे मैया की जरूरत नाय रई, तुम सबरे काम कर सको।अब तो पैसा ई मैया बाप है, बस बाके पीछे दौड़ो भागो, मैया तो एक छोड़ दस मिल जांगी।मैया तो ना मिलो करे हां तुम अपनो काम निकारबे कू मतबल साधबे कू काऊ ए मैया बना ले ओ, बड़े प्यार ते बोलबो करो तो अलग बात है।जो अपनी मैया को सगो ना हो सको, जो मां जाए भैया ते सम्बन्ध नाय रखे वो कौन ए मान दे सके भला।मैया ए औलाद ते कछू नाय चहिये, बस वो बनो रहे राजी खुशी रहबो करे,अपने घर परिवार में अगन मगन बनो रहै इतने में ई आत्मा तृप्त है जाबे, मन भर जाबे बाको।बाने तो अपनो सब कुछ सारी ममता तुम पे लुटा दई,भगवान के आगे मन्नत मांगी ,देवी देवता मनाए तब जाके तुम गोदी में पाए ।अब बताओ तुम ते बढ़ कर बाको कौन है सके, तुम्हारे मोंह ते मैया सुनबे कू कैसी कैसी तरसी, तुम्हाये पहलो शब्द बोलबे पे कैसी खुश भई, सबन ने बताती डोली कि आज हमाये लाला ने मम मम कहबो सीख लयो है, अब वो सरक सरक के चले, दीवार पकड़ के खड़ो है जाबे।अब बा मैया ए तुम आईना दिखाबे डोलत  हो,बाए दुनिया भर की बात सुना के अपने कू तुम्मन खा समझबे लगो हो।नेक दिमाग ते सोचो कि कल कू तुमहू महतारी बाप बनोगे तो तुम्हें अच्छो लगेगो का कि तुमाई औलाद तुम्हें मारे पीटे कि तुम्हें अलंकार की भाषा से लजाबे कि तुम्हें मारे पीटे, कि तुम्हाये संग बुरो बर्ताब करे कि तुम्हें घर ते बाहर कर देबे कि तुम्हें बूढ़ेन के आश्रम में छोड़ आबे कि तुम्हें नाती पोतेन ते दूर रखें कि तुमते रोज लड़बो ही करे कि तुम्हें बात बात पे सुनाबो ई करे कि तुम्हारे तीतरे से बिखेरो करे।तो भैया जो बात तुम्हें अपने काजे पसन्द नाय वैसो दूसरे के सङ्ग चों कर रये हो।काहे कू अपनी राह में कांटे बो रये हो, ध्यान रखियो जैसो करोगे वैसो ही भरनो पडेगो।तो नेक अपनो जीवन सुधार लेयो, गुड़ मत देयो पर गुड़ की सी बात तो करो।हमेशा खिंचे बंधे से रहत हो,ऐंठ के मारे पैठ कू जात हो, तुम पे सीधी तरिया ना रहो जाबे।अरे धन्य भाग मानो अपने कि सिर पे मैया बाप को सायो है, भले ही वे सूखे ठूंठ है गए होय, छाया न दे पा रये होय पर तुम्हारो हित ही करिंगे,हित की सी ही कहेंगे।

    तो बालको, अब हू समय है कि सुधर जाओ, माता को साल में एक दिन ही नाय होय करे, बो तो हर पल दिल में बसी रये, तुम बई के अंश हो सो बाय कैसे भूल सको।अब निन्यानबे के फेर में पर गये हो सो बाबले है गए हो।जब जगोगे तो मन बडो धिक्कारेगो कि हाय राम हमने जे का कर दयो।बाद में पछताबे ते कछू ना होबे को।सो आज ते बल्कि अबही ते गांठ बांध लेयो कि जननी जन्मभूमि तो स्वर्ग ते हू ऊंची होय करे, बिनको सम्मान करबो चहिये।माताजिन को एक दिन नाय होबो करे ।जे तो दिन रात मन में ध्यान में बसी रये।बिन्हे याद थोड़े ही करनो परे, वो तो हमारे अंदर ही हैं, हमारी शिराओं में बाको खून ही बह रयो है, बाको दूध पीके ही तो हम बड़े भये हैं,बो तो हमारी नस नस में बसी है, सदा हमाये मन में रैत है।हमें समझाबे बताबे की कोई जरूरत नाये कि मैया स्वर्ग ते हू बड़ी होय करे, बाके वास्ते ये तन मन और प्राण है।

 सफर जारी है....932

10.05.2022

किसी से मिलने पर हम सबसे पहले उसका परिचय प्राप्त करते हैं मसलन उसका नाम क्या है, वह क्या करता है, कहां रहता है, कितना पढा है आदि आदि।ज्यादा ही घनिष्ठता हो तो उसके परिवार के विषय में जानकारी ले लेते हैं, नौकरी का मसला हो तो पढ़ाई लिखाई ,डिग्री सर्टीफिकेट ,अनुभव प्रमाणपत्र यानी बायोडेटा का संज्ञान लेते हैं,शादी विवाह का मसला हो तो उसकी नौकरी, उसकी कमाई ,उसके परिवार के विषय में जानने की उत्सुकता होती है, किसी से मित्रता करनी हो तो दूसरी तरह की जानकारी अपेक्षित होती है औऱ वैसे ही बहुत सामाजिक होने का शौक चर्रा रहा हो तो अगले के सामाजिक परिसर की जानकारी ले ली जाती है मसलन वह किन के साथ उठता बैठता है, संग साथ कैसा है, शराब जुए गुटखा आदि खाने की लत तो नहीं है आदि आदि. यानी परिचय के क्षेत्र अलग अलग हैं औऱ सामने वाला अपनी जरूरत के अनुसार उतनी ही जानकारी रखना चाहता है जितना आवश्यक हो।अब हम कोई महापुरुष तो हैं नहीं, न कवि, रचनाकार और लेखक हैं जिनकी जीवन शैली याद करने की बाध्यता हो।तो जहां जितना जरूरी होता है उतना ही परिचय लिया दिया जाता है और नहीं तो महादेवी की तरह टीप दिया जाता है 'परिचय इतना इतिहास यही, उमड़ी कल थी मिट आज चली'।

एक अध्यापक अपने विद्यार्थी के परिचय में शैक्षिक प्रगति को प्राथमिकता के स्तर पर रखता है,शेष बातों की जानकारी द्वितीयक होती है. सामान्यतया उसका सम्पर्क अपने पाल्य विद्यार्थी से छह से आठ घंटे का रहता है, इसके बाद दोनों की अपनी अपनी जिंदगी होती है. लेकिन आवासीय परिसर औऱ नवोदय विद्यालय के अध्यापक अपने पाल्यों के ऐसे अभिभावक होते हैं जो हर छोटी बड़ी गतिविधि पर आई वाच रखते हैं। उसकी उदासी ,उसकी प्रसन्नता सबसे अध्यापक का कंसर्न होता है.

पिछले तीन साढ़े तीन दशक में हजारों -हजारों विद्यार्थियों को पढ़ाते एक बात खूब अच्छी तरह समझ आ गई कि जिन विद्यार्थियों को आप कक्षा में पढ़ाते हैं ,उसके पूरे व्यक्तित्व पर उसके परिवार की छाप अवश्य होती है, उसके व्यवहार में शालीनता या उग्रता के बहुत से कारण तो उसके पारिवारिक परिवेश में ही मिल जाते हैं, उसकी संगत से बहुत सी बातें स्पष्ट हो जाती हैं। 

इस पुष्टि पर मुहर आज एक विद्यार्थी के परिवार से मिल कर औऱ हो गई है.श्री प्रेम कुमार हुगड़े मेरे प्राक्तन विद्यार्थी नीरज के पिता है. वे कर्नाटक बीदर के मूल निवासी हैं पर बाद में हैदराबाद में बस गये ।इक्कीस बरस पोरबंदर और पांच बरस आनन्द, गुजरात के नवोदय विद्यालय में हिंदी अध्यापक के पद से अभी दो बरस पूर्व ही सेवानिवृत्त हुए हैं । परिवार में हिंदी, तेलगु ,मराठी बोली जाती है,86 वर्ष की वयोवृद्ध दादी भले ही बेड रिडन हों पर ज़ब उन्हें व्हील चेयर पर पोता नीरज हम सबसे मिलाने लाया तो उनके चेहरे की प्रसन्नता देख कर बहुत खुशी हुई. माँ तो माँ होती है ।उसे इस बात का ख्याल बहुत रहता है कि अभ्यागत ने भोजन किया है या नहीं सो ज़ब काफी देर तक मैं प्रेम हुडगे जी से उनके नवोदय विद्यालय  के अनुभव पूछती रही,सामाजिक समस्याओं पर चर्चा करती रही कि इस पीढ़ी को किस तरह संस्कारित किया जाए, उनका विचार था कक्षा आठ तक नैतिक शिक्षा को अनिवार्य कर दिया जाए।बात आगे बढ़ती तब तक अम्मा जी ने निर्देश दे ही डाला....पहले इन लोगों को खाना खिलाओ ।

बाद में बातचीत कर लेना. बहुत ही स्नेह आदर के साथ बिलकुल रूचि का भोजन क्या जैसे प्रसाद पाया हो ।बस थोड़े में ही तृप्ति हो गई ।गृह स्वामी चाय ,काफी, ठंडा सबसे परहेज करते हैं।बेहद सात्विक हैं ।खानपान और आचार विचार दोनों में।शायद हमारा आज का अन्न पानी वहीं लिखा था।तभी ऐसे बानक बने।फिर सबको तिलक कर पान पुष्प दे विदा किया।  परिवार की समरसता, सामंजस्य, सौहर्द के हम मुरीद हुए।डेढ़ घंटा अविस्मरणीय समय के रूप में दर्ज हो गया। श्री हुडगे जी के विद्यालयी अनुभव अपनी स्मृतियों में संजोये हम अगले पड़ाव के लिए चल तो जरूर दिए हैं पर स्मृति मंजूषा में वे पल कैद हो गये हैं, एक आदर्श परिवार से मिलकर मन बहुत प्रसन्न है।

यात्रा- एक छोटा ब्रेक

 सफर जारी है.........931

08.05.2022

जहां से आप चले थे, उस प्रस्थान बिंदु को तीन साढ़े तीन दशक बाद लौट कर देखना आपको प्रसन्नता से भर देता है।यादों की रीलें एक के बाद एक लगातार खुलती जाती हैं, ये यादें आपको विगत में ले जाती हैं, कभी आप प्रसन्नता से झूम उठते हैं तो कभी पैंतीस वर्ष बाद भी उन स्थानों और व्यक्तियों को वैसा ही देखने का सपना पाले रहते हैं जैसा आपने उन्हें छोड़ा था जबकि तब से न जाने कितना पानी बह गया होता है, चेहरे की लालिमा वक्त के थपेड़ों से झुर्रियों में बदल गई होती हैं,कितने इस जहां से ही जा चुके होते हैं।एक और केवल एक दिन की यात्रा ने झोली को खुशियों से भर दिया है।बहुत से लोगों से मिलना जुलना हुआ, कितनी कितनी बातों का आदान प्रदान हुआ।भले ही शहर में चार मीनार, बिरला मंदिर, हुसैन सागर न घूमा हो, भले ही यहां से भौतिक रूप में कुछ न खरीदा हो पर जितना स्नेह और आदर लेकर लौट रही हूँ, उसे किसी तराजू से नहीं तौला जा सकता।

हां, मैं बात कर रही हूँ अपने एक दिवसीय हैदराबाद प्रवास की, पहले दिन पहुंचना और रास्ते भर पैंतीस साल पहले उस शहर में नौकरी जॉइन करने की यादों में खोया रहना कि देखें कितना बदल गया होगा मेरा शहर, एयरपोर्ट पर साथियों का भावभीना स्वागत आश्वस्त कर गया कि शहर को मेरी प्रतीक्षा है, एयरपोर्ट से होटल तक के दो घण्टे के सड़क सफर में रास्ते भर तेलुगु में लिखे साइन बोर्डों को पढ़ पढ़ कर यह तय करती रही कि पिछला सब याद तो है।शहर पूरी तरह बदल गया है, अब ठेठ प्रादेशिक पोशाक हाफ साड़ी के स्थान पर मॉडर्न पोशाक आधिपत्य जमा चुकी है।शहर को तो बदलना ही था ।अब वह एक आई टी हब में जो बदल चुका है।हुसैन सागर में बुद्ध की विशाल प्रतिमा को देख ऐसा लगा मानो वह मुझे बुला रही है कि इतने पास से होकर गुजर रही हो, तनिक रुको, बैठो बतराओ पर समय के अभाव ने मन मसोस कर जाने के लिए विवश कर दिया।होटल में रात बड़ी कसमसाहट में बीती कि कैसे सुबह हो और अपनी कर्मस्थली केंद्र को फिर से निगाहों में भर लूँ।

                   नौ बजे सरकारी जीप केंद्र पर पहुंच चुकी थी, सद्य निर्मित नये भवन में स्थान्तरित हुआ केंद्र सजा बना खूब इतरा रहा था और मैं बाबरी वहां पुराने भवन के चीकू के पेड़ को खोज रही थी।उत्साही स्टाफ चंदन तिलक से स्वागत में लगा हुआ था।सेमिनार में प्रतिभाग करने विद्वान पधार चुके थे।किताबों के आदान प्रदान के साथ परिचय सत्र प्रारम्भ हुआ।आजादी के अमृत महोत्सव पर दक्षिण के लोक काव्यों में राष्ट्रीय चेतना केंद्रित विषय रखा गया था।विषय प्रवर्तन के साथ गोष्ठी प्रारम्भ हुई, सुघड़ सूत्र संचालिका ने अपने सधे हुए वक्तव्य से सभागार के हर व्यक्ति को प्रभावित किया।लोककाव्यों के संचयन और संरक्षण को रेखांकित किया गया, राष्ट्रीय चेतना के ब्याज से जोश जगाती रचनाओं ने हाल को ऊर्जा से भर दिया।भोजनावकाश के बाद बहुभाषी कवि गोष्ठी थी।तेलुगु, तमिल, मलयालम ,कन्नड़ ,हिंदी ,ब्रज में प्रस्तुत रचनाओं ने सबको वाह वाह करने पर मजबूर कर दिया।घड़ी की सुइयां तेजी से खिसक रही थी पर आज समय जैसे ठहर गया था।अंतिम पड़ाव के रूप में हिंदी की सेवा साधना में लगे साधकों के साथ विमर्श बैठक थी।जानना जरूरी था कि दक्षिण प्रांत में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए कौन सी दिशाएं निर्धारित की जा सकती हैं, सरकारी और गैर सरकारी स्तर क्या क्या प्रयास किये जा सकते हैं।सबने अपने मनोगत व्यक्त किये।फिर से इस बात की पुष्टि हुई कि हिंदी की गति में बाधक रोड़े अपनो के द्वारा ही बिछाए गए हैं और मन बना लें तो उन्हें हटाया जा सकता है।

          हिंदी के कार्य में लगे शिक्षक बेहद उत्साही हैं, वे

 कार्य करना चाहते हैं, तय व्यवस्था के प्रति उनके मन में आक्रोश है पर वे अपने अपने स्तर भर खूब खूब कर रहे हैं।इसी क्रम में संस्थान के विद्यार्थी रहे नीरज हुडगे जो अब शोधार्थी हैं और सत्यनारायण जो अध्यापन कर रहे हैं से मिलना हुआ।दोनों बहुत दूर से दौड़े चले आये थे कि गुरुजी से मिलना होगा।सफर की पाठक मंजू शर्मा, मेरी सहयोगी अग्रजा शकुंतला जी और अनीताजी,प्रो सरराजु, प्रो एस एम इकबाल, डाक्टर ऋषभ, डा सुमन लता, अहिल्या मिश्रा,चारी जी,श्याम सुंदर, महेंद्र ठाकुर, सुरेश उरतृप्त सहित अनेक अनेक महत्वपूर्ण नामों की सूची है जिसे यहां उदधृत करना सम्भव नहीं हो पा रहा।सभी को ह्रदय की गहराइयों से नमन। सभी हिंदी विद्वान दिमाग के कम्प्यूटर में फीड हो गए हैं, विजिटिंग कार्ड और पते ले लिए गए हैं कि कौन जाने कब किससे कहां मुलाकात हो जाये।शीला वानोडे जी ने खूब रच पच कर सुस्वादु भोजन परोसा है, पूरनपोली की मिठास अभी तक मुंह में घुली हुई है।बस आज विद्यार्थी के परिवार से मिल दोपहर वापिसी है।कल से फिर वही दिनचर्या शुरू होगी।इस यात्रा ने मुझे अनुभव और स्नेह आदर की दृष्टि से बहुत बहुत समृद्ध किया है।तो आप भी करते रहिए छोटी छोटी यात्राएं और अपने को अनुभव सम्पन्न बनाते रहिये।ये छोटे छोटे ब्रेक जिंदगी की नीरसता एकरसता को तोड़ते हैं और आप फिर से गति पकड़ लेते हैं।

होकर भी न होना

 सफर जारी है....930

08.05.2022

         आपने अनुभव किया होगा कि कभी कभी आप होते तो हो पर आप नहीं होते,आपके अस्तित्व को नकार दिया जाता है, आप लोगों की निगाह में नहीं चढ़ पाते ,उनकी अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाते तो वे आपको अपने खाते से माइनस कर देते हैं। यानी उनके लिए आप होकर भी नहीं होते।आप भीड़ से घिरे होते हैं पर आप बेहद अकेलापन महसूसते हैं, इसके जस्ट बिपरीत भी होता है जब आप बिल्कुल अकेले हों फिर भी कुछ यादें, कुछ साथ ,कुछ बातें आपको भरापूरा रखती हैं। हाथ और झोली भले ही खाली हो पर आप खुशी के सागर में डूबते उतराते रहते हो, क्योंकि आप मन से बड़े समृद्ध होते हैं। और ऐसा आप अकेले के साथ ही नहीं होता,इस श्रेणी में बहुत से लोग आते हैं।वे मन के निश्छल, भोले भाले, सीधे सादे कहें तो बिल्कुल सिम्पलटन, छल कपट से दूर भले ही हो पर बेहद अव्यावहारिक होते हैं।बात बात पे सोचते बहुत हैं।नियमों और सिद्धांतों के पीछे लठ लेकर पड़े रहते हैं। इनकी समझ में दो दूनी चार का गणित ही आता है।दुनियादारी में निल बटा निल होते हैं।स्कूल की पढ़ाई में भले ही सौ में से नब्बे ले आते हों पर जीवन की पढ़ाई में कभी पास नहीं हो पाते।

        बार -बार ठगे जाते हैं पर अपने नियमों में कोई हीला हवाला बर्दाश्त नहीं करते।दुनिया ऐसों को शेखचिल्ली और लप्पू झनझन की कैटेगरी में रखती है।जो जरा मीठा बोल जाए, तमीज से पेश आ जाये उसके मुरीद हो जाते हैं,इनका बस चले तो ऐसों के पैर ही छू लें।जरा सी बात पर खुश हो जाते हैं और किसी की तिरछी निगाह और वक्र भृकुटि से इनके खून का दबाब बढ़ जाता है।अब लाख समझा लो कि भई दुनिया ऐसे ही चलती है पर इनके दिमाग में तो भूसा भरा होता है, बिल्कुल ठस्स दिमाग होते हैं।कोई समझाए बुझाए तो उलटा उसे ही ज्ञान देने लगते हैं कि देखो संत भी तो बिच्छू के काटने पर उसे बार -बार पानी से बाहर निकाल देते हैं कि जब ये अपनी दुष्टता नहीं छोड़ता तो मैं अपनी सज्जनता क्यों छोड़ूँ भला।अब संत कहते हैं तो ठीक ही कहते होंगे। पर बड़ा मुश्किल होता है विपरीत स्वभाव वालों के बीच जिंदगी बिताना ,जिमि दसनन महुँ जीभ बिचारी।विभीषण होते तो जाकर पूछ लेते कि उन्होंने कैसे जीवन जिया, सारे दुष्ट राक्षसों के मध्य अपनी शुचिता कैसे बरकरार रख पाए।रावण तो सगा भाई था कोई चचेरा तयेरा नहीं ,बिल्कुल मां जाया, एक ही कोख से पैदा थे दोनों पर स्वभाव बिल्कुल अलग, एक पूरब तो दूसरा पश्चिम।जब विभीषण ने समझाया दूत अवध्य होता है या श्री राम की भार्या को वापिस लौटाने में ही भलाई है तो भरे दरबार में लात मार कर  निकाल दिया। वो तो भला हो राम जी का कि उन्होंने ह्रदय से लगा लिया, लंका का राज ही दे दिया पर जगत में तो घर का भेदी लंका ढाए प्रसिद्ध हो ही गया।

         जब दांतों के मध्य जीभ जैसी स्थिति हो, चारों ओर हउआ ही हउआ हों तो बहुत सावधानी रखनी होती है।कभी कभी आप परिस्थिति को जानते समझते तो अच्छी तरह हैं पर ......मारीच को खूब पता था कि मिठबोला भांजा रावण अपनी गलत मंशा के लिए उसे सोने का मृग बनने का ऑफर दे रहा है पर वह बेबस था तो सोच लिया जब दोनों तरफ से मरना ही है तो राम जी के हाथों मरना ज्यादा उचित होगा कम से कम मुक्ति तो हो जाएगी।उसने तो इसीलिए हा राम हा राम उचारा था।उसकी तो मुक्ति हो गई पर हा राम सुर के सारे संदर्भ ही बदल गए और रावण साधु का वेश धर भिक्षा मांगने के ब्याज से सीता को हर ले गया।

       तो जो हो वही बने रहो, अपनी मूल प्रकृति को छोड़ो मत।कभी कभी हो के भी मत हो ओ, कोई बात नहीं, नान विजिविल होना अदृश्य होना भी अच्छा है।अरे किसी को नहीं दिखते तो क्या पर हो सत्य तो यही है न।और तुम्हें कौन किसी से प्रमाणपत्र लेना है।अपने में मस्त रहो, कोई बोले तो ठीक न बोले तो ठीक, कोई खुश तो अच्छी बात, नहीं खुश तो अपनी बला से।सबको खुश रखने का कोई ठेका नहीं लिया और ले भी लेते तो सबको खुश किया भी नहीं जा सकता था।जब महादेव पार्वती नहीं कर पाए तो हम कौन खेत की मूली है।तो करते रहो ,चलते रहो ।रुको मत, जो रुक गया ठहर गया वो गया।हो तो सही ,अब किसी को नहीं दिख

जरा याद करो तुम उनको

 सफर जारी है....929

07.05.2022

किसी परिवार में जन्म लेना ,माता पिता के लाड़ और सहोदरों के बीच पलना बढ़ा होना औऱ तीसरा पन आते आते माता पिता भाई बहिनों से एक एक कर बिछड़ते जाना बहुत सालता है, जो अभी इस भौतिक संसार में हैं ,उनसे भी मिलना नहीं हो पाता ।कहीं भौगोलिक दूरी आड़े आ जाती है तो कहीं मनों में खिंचाब पैदा हो जाता है । दूसरे घर की सदस्यता लेते ही आप की भूमिका में परिवर्तन आ जाता है। आप किसी घर के लाडले सदस्य पापा की परी और माँ के आंचल तले लुका छिपी खेलने वानी छोटी गुड़िया ही नहीं रह जाते, भैया और दीदी की छुटकी से अलग आपका अस्तित्व गहराता है।आपकी निजता, आपकी अस्मिता नए परिवार के साथ बंध जाती है. आपकी भूमिका में बदलाब आता है। नए परिवार के प्रति दायित्व शील हो जाते हैं,आपकी जीवन डोर बिल्कुल अनजान एक नये से परिवार से जुड़ जाती है ,अपनों के दायरे में कुछ नये अपने जुड़ते जाते हैं,परिकर में विस्तार होता है पर जन्मदाता परिवार की जड़ों से आप कटते  नहीं है बल्कि दोनों को बराबर खाद पानी देने की कोशिश में लगे रहते हैं। वे मन में गहरे धंसे होते हैं तो हमेशा दिल में बसे ही रहते हैं फिर भले ही गाहे बगाहे ही मिलना क्यों न हो।

      ये अलग बात है कि अपने को यहां वहां की व्यस्तताओं में फंसाये हम उन भावों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देते।उन हवाओं को अपने आसपास भी फटकने नहीं देते जो उन भूले बिसरे दिनों की याद दिलाये जिन्हें हमने कहीं गहराईयों में गाड़ रखा है, ऐसे सीलन भरे कोनों में छिपा दिया है कि वहीँ सब गल सड़ जाए ताकि उचित हवा पानी धूप मिलते वे रक्त संबंध ,वे सहोदर भाव ,वे बचपन में खेल खेल में रूठना मटकना औऱ फिर सारे गिले शिकवे भूल गले लग जाना जैसे दबे छिपे भाव अपना सिर न उठाने लगे। फिर तो बड़ी गड़बड़ हो जाएगी.और जो कहीं ऐसा हो गया तो ये छितराये से भाव सारे रिश्तों पर भारी पड़ जाएंगे, इनकी अवधि लंबी तो है ही साथ ही गहरी भी है। फिर तो  बड़ी आफत मच जाएगी. बड़ी उलझनें पैदा हो जाएगी,डर है कि नये रिश्तों में कहीं खिंचाब न आ जाये ,कहीं रस्सा कसी न होने लगे । तो बेहतर है जो जहां हैं उसे वहीं बने रहने दिया जाए हैं ,जैसा चल रहा है चलने दें। यथास्थिति बनी रहने दी जाए.

पर सोचो और खूब सोचो, गहराई से सोचो, दिमाग लगाओ कि घर तुम्हारे अकेले का थोड़े ही छूटा है ।अगले को भी  नया परिवार मिला है, तो उसे भी नए माहौल में सामनजस्य बिठाना होगा, उसे भी अपना विगत एक किनारे कर नये रिश्तों में रचना पचना सीखना होगा।नये को याद करना होगा, पुराने को भुलाना होगा. तभी तो बात बनेगी, तभी तो नया परिवार बनेगा, तभी तो रिश्ते गहरे होंगे, उनमें मजबूती आएगी, रंग निखर कर आएगा, तभी तो आपसी सौमनस्य बढ़ेगा, तभी तो गाड़ी आगे बढ़ पाएगी.तो सबको अपने अपने सम्बन्धों के सम्बन्धियों के विषय में सोचना ही होगा,तभी तो गाड़ी आगे बढ़ पाएगी। 

तो मिल बैठ कर रास्ते निकलते हैं ।यूं मुँह फुलाये बैठे रहने से कुछ नहीं होने वाला।अरे लड़ कौन रहा है भाई, बात कही जा रही है और बात कहने का अधिकार तो सबके पास है।ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मसला है।तो सबमें रचो बसो जरूर पर अपने उस बाग को भी झांक कर देखना, उसकी देखभाल करना, उसे दबाई दारू दिलवा कर,उसके सुख दुख पूछकर, जो बन सके सहयोग कर आप कोई अहसान नहीं थोप रहे होते हो, बल्कि अपने भूले बिसरे कर्तव्यों को ही निभा रहे होते हो।इसके लिए तुम्हारी प्रतिबद्धता होना बहुत जरूरी है।इन छोटे छोटे कामो से काम को कर आप अपने जिम्मेदारी का ही निर्वाह कर रहे होते हो।तो जो अपने हैं उन्हें भुला बिसरा मत दो, जो भुला दिए गए हैं ,उनकी खोज खबर लो,उनके पास जाओ, उनसे बोलो बतराओ ।जरा याद करो तुम उनको जो तुम्हारे ही हैं पर वक्त की धूल ने उन्हें भुला बिसरा दिया है।मन पछ्तैहै अवसर बीते न हो जाये कहीं।

कौन कह रहा बनजारों सा

 सफर जारी है......928

06.05.2022

वे जो जीवन भर इधर से उधर किसी न किसी काम से घूमते रहते हैँ, बनजारे कहलाते हैँ. ऐसों के लिए ही कहा गया होगा कि इनके पैर में चक्कर है, कभी एक जगह टिक कर नहीं बैठ पाते. आज यहां तो कल वहां.बनजारे ऐसा करते हैँ तो कोइई नई बात नहीं है क्योंकि उनका पूरा का पूरा जीवन संसार के सब जीवधारियों के लिए होता है. वह सबका होता है औऱ सब उसके होते हैँ. कविता की पंक्तियाँ याद कीजिये जरा... कौन कह रहा बनजारों सा ये जीवन बेकार है, मैं सबका हूँ सब मेरे हैँ सबसे मुझको प्यार है.कोई निश्चित घर द्वार नहीं, जहां बैठ गये वहीँ घर हो गया. चाँद औऱ तारों की छत है दिशा दिशा दीवार है सारा आँगन मेरी धरती पूरब पश्चिम द्वार हैँ. इतने मिठबोले हैँ कि सबसे संबंध गाँठ लेते हैँ. सबको अपनी परिधि में ले आते हैँ या उनके दायरे में फिट हो जाते हैँ. कोई ईगो नहीं पालते. जो मिल गया उसी में खुश. दरअसल उनके पास दुःखी होने का समय ही नहीं है. ज़ब कभी समय मिले तो भी कोई कारण नहीं खोज पाते कि चलो इस बात पर बहस कर लें कि किसी भी बात पर रायता फैला दें कि अगले की बेबात पर ही टांग खिंचाई कर दें कि फूफा की तरह रूठ कर ही बैठ जाएं औऱ तब तक नहीं माने ज़ब तक अगला नाक नहीं रगड दें, अगले की आपकी देहरी के चककर लगाते चप्पल न घिस जाए कि अगला अपनी शान अपनी पगड़ी आपके चरणों में न रख दे. न जी, ये बनजारे इन सब बातों से कोसों दूर होते हैँ. उन्हें तो आदमी छोडो जीव जंतुओं से भी स्नेह हो जाता है. भोजन करने बैठते हैँ अभ्यागत के साथ साथ  चिड़िया चीटी, कौआ, गाय, कुत्ता सब का भाग निकाल देते हैँ. सबके सर पर वरद हस्त रख देते हैँ, सबकी पीठ 

सहला देते हैँ. उन्हें कोई पराया नहीं लगता, सब उनके अपने हैँ. जिस घर में जन्म लेते हैँ उनके प्रति अपने दायित्व तो जरूर निभाते हैँ पर गलत सलत में हाँ में हाँ नहीं मिलाते. अपनी समबाई सा खूब समझाते हैँ कहते हैँऔऱ जो न माने तो उसके भाग्य पर छोड़ देते हैँ कि न माने तो कर ले मन की सी, फिर मत रोइयो कि अब का करूं.अब बनजारे ऐसा करें तो एक बार को समझ भी आता है कि आगे नाथ न पीछे पगहा, कहाँ ले जायेगा बेचारा जोड़ जोड़ के, सब यहीँ तो रह जाना है. औऱ जिनके आगे पीछे हैँ जो आस औलाद वाले हैँ उन्हें जे सोच लेनी चहिये कि पूत सपूत तो का धन संचय औऱ पूत कपूत तो का धन संचय. ढंग को निकल गयो तो इतने रेज को कमायेगो कि घर भर देगो,अपने परिवार के साथ साथ 🥰औऱ दस कू पाल लेयगो औऱ जो भगवान ने बिगार ही दई तो धरे भये ही ए उड़ाय डालेगो.

 तो कान खोल के सुन लेयो अपनो धर्म मत बिगाडो.जो बन पड़े जरूर कर देयो. जितनो तिहारो दायित्व है बाये जरूर निभाओ पर अपने पराये में ऐसो भेद मत कर दीयों कि कल कू पछताते फिरो कि जे तो हमसे गनती है गयी, हमें ऐसो नाय करनो चहिये तो भैया मरे पीछे खूब रोबो करो साँप निकलबे पीछे खूब लकीर पीटबो करो, बा ते कछु नाय होत.गिरधर कह गये कि नाय बिना बिचारे जो करे सो पाछे पछताय, काम बिगाड़े आपनो औऱ जग में होत हंसाय, जग में होत हंसाय चित्त में चैन न पाबे.तो भैया हम जे न कह रहे कि तुम सब घर बार छोड़ z

अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है

 सफर जारी है....927

05.05.2022

बस एक बार सोच लो, दृढ़ संकल्प ले लो कि मुझे यह कार्य पूरा करना है तो सब सब हो सकता है, यहां तक कि शारीरिक अक्षमता भी आड़े नहीं आती।इस यात्रा प्रवास में ऊर्जा से भरपूर कितने व्यक्तित्व संपर्क में आये कि जिनकी कार्यनिष्ठा देखकर दंग हो गई।बिना थके निरन्तर चलने वाले इन मनस्वियों को दिल की गहराई से बधाई।तब लगा कि मन की दृढ़ता पास हो तो कैसे साधनों के अभाव में भी खुश रहा जा सकता है।जो बांट कर खाते हैं उनके पास अभाव फटकता भी नहीं है।बड़े बड़े तूफानों को भी ऐसे झेलते हैं कि मानो कुछ हुआ ही नहीं हो।कैसी भी विपत्ति आ जाए विचलित हुए बिना शांत बने रहते हैं, किसी को प्यार से समझाते हैं किसी को डांट देते है किसी के प्रति तटस्थ हो जाते हैं कुछ को छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं।वे जो मर्जी तरीका अपनाते हो पर स्वयम को कभी परेशान नहीं करते।वे जानते हैं बहुत रोने धोने चीखने चिल्लाने से दूसरों से उलझने से अपनी मन शांति भंग करने से भी परिस्थितियों को नहीं बदला जा सकता तो जितना श्रम इस सब1में लगाओ उससे तो अच्छा ही है कि इतनी देर में अपनी शक्ति का संचय कर दूसरे कार्य में लग जाओ ।

         सिक्किम प्रवास में देखा कि कर्मठ छुकी चौबीस घण्टे में अड़तालीस घण्टो काकाम निबटाती है, सबकी सहायता को सदैव उद्यत रहती है, सब काम अपने ऊपर ले लेती है, सेवाभावी सबको आदर सत्कार देती है।इसलिए नहीं कि उस पर किसी का कर्जा है या करना उसकी मजबूरी है।वह ये सब करती है क्योंकि उसे ये सब करना अच्छा लगता है।इतने घण्टों के श्रम के बाद भी चेहरा प्रफुल्लित रहता है क्योंकि वह काम को झुंझला के नहीं करती, अपना फर्ज दायित्व समझ के करती है।काम का कितना भी दबाव क्यों न हो,मन की शांतिको भंग नहीं करती।बस अगन मगन सी लगी ही रहती है।एक छुकी ही क्यों, अभी तो औरों को जानना समझना बाकी है जो अपनी धुन के पक्के हैं और बिना किसी शिकवे शिकायत के अपने काम में लगे रहते हैं।सच  जीवन में सफलता भी उनके कदम चूमती है जो एकला चलो के सूत्र को पकड़ लेते हैं।एक बार सबका आवाहन जरूर करते हैं,कहते भी हैं साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला तक जाएगा मिल कर बोझ उठाना, साथी हाथ बढाना साथी रे।पर जब कोई साथ नहीं हो तब भी अकेले चल देते हैं।वे अपनी राह खुद बनाते हैं, बनी बनाई पगडंडियों पर चलना उन्हें नहीं भाता।वे हमेशा लीड करते हैं, फॉलोअर नहीं बना करते।

         ऐसों से जब मुलाकात होती है बात होती है तो आपको भी विश्वास हो जाता है कि अकेला चना भी भाड़ फोड़ सकता है।साधनों की कमी और दूसरों का सहयोग उतना मायने नहीं रखता जितना आपकेमन की दृढ़ता, आपका कार्य के प्रति समपर्ण, आपका जोश मायने रखता है।पर जोश में होश नहीं खोने होते, सुविचारित होना होता है, योजना बनानी होती है ,काम की निरंतरता बनाये रखने होती है,अपनी शक्ति को तौलना और बटोरना होता है, लक्ष्य पर एकाग्र चित्त हो निशाना साधने में निपुण होना होता है।समस्या आपकी है तो समाधान भी खुद से खोजने होते हैं,हमेशा दूसरों के आगे रोना धोना नहीं होता।तो चलिए आप भी उठिए, संकल्प लीजिये, शक्ति संचय कीजिये, अपने साहस को तौलिए,अपनी क्षमताओं पर विश्वास रखिये और श्रीगणेश कर दीजिए।बाधाएं आएंगी, बिघ्न डराएंगे, विरोधी शोर मचाएंगे पर तुम्हें लक्ष्य से डिगना नहीं है।बस शांत भाव से अपना काम करते रहिए, करते रहिए, एक न एक दिन सफलता आपके कदम अवश्य चूमेगी।

         तो सिद्ध करना जरूरी है कि अकेला चना भी भाड़ फोड़ सकता है।बस लगे रहने होता है तो दोस्तो लगे रहिये चलते रहिये निरन्तरता बनाए रखिये, भाड़ को फोड़ने को आप अकेले चने ही काफी है।

ओटन लगे कपास

 सफर जारी है....926

04.05.2022

ये ओटना क्या होता है और कपास किस चिड़िया का नाम है।और बने रहो विलायती बाबू ,कभी कपास ओटी हो तो जानोगे।बस रेडीमेड जब सब कुछ उपलब्ध है तो किसी को कुछ और जानने की जरूरत भी कहाँ रही।पानी बोतलों में ,चीनी पैकिटों में, सब्जी कटी हुई और अंकुरित तक सब बड़े बड़े मॉल में मिल जाती हो तो लोगों को भला कैसे पता चलेगा कि इनकी उपज कहां होती है और ये हम तक कितनी प्रक्रियाओं से गुजर तक पहुंचती है।वैसे भी सबको आम खाने से मतलब होता है गिनने के चक्कर में कौन पड़े।अब जीवन की आपाधापी ,भागदौड़ और व्यस्तता इतनी अधिक बढ़ गई है कि किसी को किसी से कोई लेना देना नहीं है।कोई कुछ जानना समझना नहीं चाहता,  बस कैसे भी उसका काम हो जाना चाहिए।उसे शब्दों के फेर में पड़ना पसन्द भी नहीं।और तुम हो कि उसे रोज मुहावरेदार भाषा सुना सुना के पकाए जा रहे हो।कभी कहते हो दो और दो हमेशा चार नहीं होते तो कभी कहते फिरते हो चार दिन की चांदनी है।अरे भाई बिजली की ऐसी ऐसी व्यवस्थाएं है कि रात भी जगमगाती रहती है तो फिर चांदनी को चार दिन में क्यों बांधते हो।और बिजली गुल हो जाये तो हमारे पास ढेरो ढेरों वैकल्पिक व्यवस्थाएं हैं।प्यासा कुए के पास जाता है क्यों जाए भई,उसके पास इतनी पावर है कि बेचारा कुआ खुद उसके पास  दौड़ा चला आता है।एक और एक ग्यारह नहीं होते,अब तो अकेला ही हजार के बराबर होता है।आज किसी को किसी की दरकार कहां रही, सब अपने में भरे पूरे है।अब लँगोटिये यार नहीं हुआ करते, उनके लिए कोई और उपमा खोजो।आदमी आसमान पर पहुंच गया और तुम अभी तक भाड़ ही झोंकने में लगे रहे।कम से कम भाड़ में जाओ को अब तो सिलेबस से बाहर करो।पता नहीं कहां कहां से चुन चुन के मुहावरे और कहावते जबरन कोर्स में रख दिये गए कि उनके साथ द्रविड़ प्राणायाम करते रहो।

लाठी की बड़ी महिमा गाई गई लाठी में गुण बहुत है सदा राखिये संग, गहरे नद नाली परत सदा निभाबे संग, सदा निभाबे संग मार कुत्ता को भगाबे।अरे इतनी सुंदर सुंदर स्टाइलिश सुनहरे मूठ वाली छड़ी आ गई है अब कौन लाठी रखता है भला।वे दिन हवा हुए जब मुख्य दरवाजे के पीछे एक मोटा डंडा रखा रहता था कि चोर आ जाए कि घर में कुत्ता घुस आए तो उसे मार कर भगा दो और चोर को पीट पीट कर अधमरा कर दो।अब कुत्ते तो घर के बिस्तर पर सोते हैं उन्हें दुत्कारा नहीं जाता बल्कि गोद में लेकर सारा दिन स्वीट स्वीट नामों से पुकारा जाता है, तुम्हें एक बार को रोटी मिले न मिले पर उसे खूब दुलराया जाता है।तो अब धोबी का कुत्ता घर का न घाट का कहना बन्द करो।उसके तो दिन बहुर गए हैं।बारह बरस बाद तो घूरे के दिन भी बदल जाते हैं फिर वह तो आखिर कुत्ता मेरा सोना मेरा बबुआ है।रही बात चोर की, वे बहुत एडवांस हो गए हैं, उन्होंने चोरी के नये नये तरीके ईजाद कर लिये हैं।बन्द घरों सब माल गायब हो जाता है और तुम्हें कानों कान खबर भी नहीं होती।ऊंची दुकान फीकी पकवान अब आउटडेटेड हो चुका है, अब तो लोग फीके पकवान के लिए ब्रांडेड दुकानों पर ही जाते है, सब सुगर फ्री की डिमांड करते हैं।क्या करें खून में चीनी का स्तर इतना बढ़ गया है कि सब उससे दूरी बरतने लगे हैं।अब ये लेवल तो बढ़ना ही था।भरपूर सुविधाओं ने हमें महाआलसी जो बना दिया है।साइकिल से जाने में भले ही नाक नीची होती हो पर जिम में उसे चलाने के लिए मोटर गाड़ी में बैठकर जाते हैं।एक और देखो चोर चोर मौसेरे भाई। अरे वे मौसेरे ही क्यों ,चचेरे तये रे फुफेरे ममेरे क्यों नहीं जो सकते।चोरों में तो भाई बंदी चलती ही है।अब कहेंगे नानी के आगे ननसाल की बात मत करे लाली, ननसाल ही क्यों दादी के आगे ददिहाल की क्योंनहीं कर सकते।वे दिन लद गए जब साले सलहज जब कभी के मेहमान हुआ करते थे, आज वे गृहस्थी के जरूरी अंग हो गए हैं।तो बदलते माहौल में अपने मुहावरों को भी अपडेट करना जरूरी है।नौ सौ चूहे खाके बिल्ली हज को ही क्यों जाए,वह तीर्थ यात्रा पर चारों धाम भी तो जा सकती है।और इतनी बातें हमें अगला एक मुहावरे पर ही सुना गया कि उस दिन मुंह से निकल गई अरे भाई आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास, तो ओटन और कपास के बहाने हमारी क्लास ले डाली, ऐसे धो धो के सुनाया, ऐसे धोबीपाट मारे कि अभी तक कोमा में है।सोच रहे हैं कि अब अपने भाषायी व्यवहार से मुहावरों को ऐसे गायबकर देना चाहिए जैसे गधे के सिर से सींग।लो इतनी सावधानी बरतते एक मुहावरा और आ गया ।भाई तेरे हाथ जोड़े ,हमें तो बशख दो।कान में ऐंठा दे लयो कि अब नाय बोलिंगे साब।चन्दना तो चुप ई भलो।

सो भाई इन घिसे पिटेमुहावरों के पीछे लठ्ठ लेकर मत पड़े रहो, अब इनसे उबरो, नए ईजाद करो।जमाना बहुत बदल गया है अब सोलहवीं शताब्दी नहीं, इक्कीसवीं सदी में जी रहे हो।

सबका मालिक एक

 सफर जारी है....925

02.05.2022

दुनिया में दो ही सम्बन्ध सर्वोपरि हैं मालिक और मजदूर का, स्वामी और सेवक का, बड़े और छोटे का, ताकतवर और कमजोर का,संपन्नता और गरीबी का।एक इसलिए श्रेष्ठ ठहरता है क्योंकि दूसरा हीन है, एक ताकतवर इसलिए है क्योंकि दूसरा कमजोर है, शोषक इसलिए है क्योंकि कोई शोषित है, उत्तीर्ण का महत्व अनुत्तीर्ण के परिप्रेक्ष्य में ही है।यदि सब एक से हो जाते तो कोई किसी पर शासन कैसे कर पाता, कोई किसी से बड़ा कैसे ठहर पाता।कल मजदूर दिवस पर श्रम के बोझ से दबे बेबस मजदूरों के चित्र, कविता, आलेख की खूब खूब प्रदर्शनी लगी।कभी बाल मजदूरी की बात की जाती रही तो कभी श्रमिकों के अधिकार पर खूब कलम दौड़ी, उनके इतिहास रेखांकित किये जाते रहे,उनके प्रति सहानुभूति और संवेदनाओं का बाजार खूब गर्म होता रहा, चर्चाओं में मजदूर ही मजदूर समाया रहा,मालिक मजदूरों के आगे उसके श्रम का दशांश देते भी अपनी मूंछों को मरोड़ मरोड़ ताव देते रहे कि देखो इन्हें हम ही तो पाल रहे हैं, हम न होते तो कब के मर खप गए होते,कीड़े मकोड़े की तरह जीवन बिता रहे होते।

         बार बार मंथन चलता रहा कि सबका मालिक एक और सबका साईं एक कहते हम रोज किसे स्मरण करते हैं, यदि ये मिल मालिक हम मजदूरों के माई बाप हैं तो इनका भी तो कोई मालिक होता होगा, हम इनकी चाकरी करते हैं तो ये भी तो किसी की चाकरी करते ही होंगे, जैसे मालिक हमें दुत्कारते हैं, ज्यादा काम लेकर कम मजदूरी देते हैं और कभी कभी तो वह भी डकार जाते हैं, कितनी उपेक्षा से हमें देखते हैं, अपने को राजा और हमें प्रजा समझते हैं तो क्या कोई इनका मालिक नहीं होता होगा, कि क्या कोई इनकी मेहनत की कमाई नहीं डकार लेता होगा ,कि क्या कोई इन्हें दुत्कारता फटकारता नहीं होगा ,कि क्या कोई इनसे भी बड़ा नहीं होता होगा,कि  क्या ये भी किसी के चाकर नहीं होते होंगे, कि क्या इनका भी कोई मालिक नहीं होता होगा।जरूर से होता होगा तभी देनहार के नैन नीचे झुके रहते हैं और एक हाथ से दिया दूसरे हाथ को भी पता नहीं चलता।देनहार कोई और है भेजत है दिन रैन, लोग भरम हमरो करें ताते नीचे नैन।सबको देने वाला बादशाह अकबर भी अल्लाह से हाथ फैला कर मांगता ही है और उसे मांगते देख सहायता मांगने आया व्यक्ति लौट जाता है कि जब ये ही मंगता है तो भला मुझे क्या देगा, एक मंगता दूसरे मंगते को भला क्या दे सकता है।तो मांगना ही है तो उससे ही मांगो जो सबको देता है, सबका दाता है।दाता एक राम भिखारी सारी दुनिया कि राम एक देवता दुखियारी सारी दुनिया।ज्ञान का प्रकाश जब अंदर जगायेगा, प्यारे श्री राम के तू दर्शन पायेगा, जोत से जिसकी है उजियारी सारी दुनिया।दाता एक राम भिखारी सारी दुनिया।

तो जो ये बार बार कहा जाता है कि दुनिया में सब बराबर है, कि कोई छोटा बड़ा नहीं है,कि सब में एक ही परमात्मा का अंश है , कि वही सबकी रक्षा करता है ,कि जब कोई दुशासन किसी द्रोपदी का चीर हरण करता है तो कान्हा स्वयम उसका चीर बढाने आ जाते हैं ,कि किसी गज को जब ग्राह पकड़ लेता है तो राम उसे बचाने स्वयम आ जाते हैं ,कि होलिका बुआ प्रह्लाद को जलाकर मारने के लिए आग की लपटों के बीच उसे गोदी में लेकर बैठती तो है पर उल्टा हो जाता है वह स्वाहा हो जाती है और प्रह्लाद बच जाता है,कि जब प्रह्लाद को ऊंचे पहाड़ों से धकेला जाता है, पानी में फेंक दिया जाता है पर कोई उसे बचा लेता है क्योंकि उसे सब जगह यहां तक कि खम्भे में भी हरि दिखते हैं और प्रह्लाद के विश्वास की रक्षा के लिए हिरण्यकशिपु के वध के लिए प्रभु स्वयम नृसिंह के रूप में प्रगट हो जाते हैं, कि हिरण्यकशिपु को मिले वरदान कि न दिन में न रात में न भीतर न बाहर न देवता से न दानव से न अस्त्र से शस्त्र से वह मारा जा सकता है तो दोनों बखत मिले आधे नर और आधे सिंह के रूप में बीच देहरी पर न अस्त्र से न शस्त्र से बल्कि नाखूनों से उसके शरीर को फाड़ देते हैं। मीरा को मारने को राणा विष का प्याला भेजते हैं और प्रेम दीवानी मीरा उसे अमृत समझ पी जाती है ,उसका बालबांका भी नहीं होता,कि विष का प्याला राणा जी भेजा पीबत मीरा हांसी रे, पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे।

        सब निश्चिन्त रहो कि जो हमारा मालिक है जिसके हम मजदूर कहे जाते हैं, वह भी किसी का मजदूर ही है, उसका भी कोई मालिक जरूर है।जैसा आचरण वह हमारे साथ करता है ,अगले के साथ वैसा करने को कोई पैदा हो ही जाता है।कोई अपनी खीझ हम पर उतारता है तो वह भी किसी की खीझ का शिकार निश्चित ही बनता है।तो अपने अकेले को श्रमिक मजदूर मानते लजाने की कोई जरूरत नहीं, सब के सब मजदूर ही हैं, सब श्रम ही करते हैं फिर चाहे हाथ पैर का हो या दिमाग का, शारीरिक हो या मानसिक बौद्धिक हो, बिना श्रम के भला किसको मिला करता है।जो बार बार दूसरों को देख ये सोचे बैठे हो देखो उसके तो बड़े मजे हैं, कैसे बैठा बैठा रोटी तोड़ रहा है, उसके अपने कर्म हैं, कभी कर आया होगा तो फल आज मिल रहा होगा क्योंकि किये बिना तो किसी को कुछ नहीं मिला करता।तो ये मजदूर दिवस श्रमिक दिवस हम सबका साझा दिवस है क्योंकि मूलतः तो हम सभी श्रमिक ही हैं और हम सबका मालिक भी एक ही है।सबका मालिक एक।

जो सापेक्ष हो वह सत्य कैसा

 सफर जारी है...924

02.05.2022

 अक्सर सोचती हूँ कि आखिर सच की परिभाषा है क्या, न्याय किसे कहते हैं, योग्यता अयोग्यता का क्या पैमाना है।जो बात एक संदर्भ में ठीक होती है, वह संदर्भ बदलते ही गलत कैसे हो जाती है।संवेदना है तो जीव मात्र के लिए होनी चाहिए, पर उसमें भी अपने पराये का भेद कहां से आ जाता है ।अपना काला कलूटा तीन फुटी भी दुनिया का सबसे स्मार्ट बन्दा लगता है तो जिसे दूसरा कहते हैं उसके गोरे रंग और छह फुटे शरीर को भी नजर अंदाज क्यों कर दिया जाता है।अपनों के घेरे में आने वाले के सौ खून भी माफ और इस घेरे से बाहर के व्यक्ति की सामान्य सी भूल भी तिल का ताड़ कैसे बना ली जाती है।अपनों की आंख में झलकते पानी की चंद बूंदें भी संज्ञान में आ जाती हैं तो अगले के झर झर बहते आंसुओं को नौटंकी कैसे कह दिया जाता है।कैसे एक के चेहरे की हल्की सी मलिनता नोटिस ले ली जाती है तो अगले का ह्रदय विदीर्ण कर देने वाला रोदन भी कैसे अनसुना कर दिया जाता है।एक की धीमी सी फुसफुसाहट भी समझ आ जाती है तो दूसरे के स्पष्ट कथन भी क्यों नजर अंदाज कर दिए जाते हैं।

 ये अपने तुपने का घेरा दिन प्रतिदिन संकीर्ण होता जा रहा है।बातें भले ही वसुधैव कुटुम्बकम की दोहराई जाती रहें पर सत्य और असत्य को परिभाषित करते हमारा सरोकार केवल और केवल अपने पराये के भेद पर आधारित होता है।इन अपनों की भी अनेक अनेक श्रेणियां है।ये थोड़ा सा अपना है ये वाला ज्यादा अपना है।ये पहले घेरे में आता है तुम अंतिम वाले में।रक्त सम्बन्ध सिर चढ़ कर बोलता है या घुटने तो भैया पेट को ही नवते हैं तो इस न्याय के अनुसार सबके घुटने पेट को ही नवने चाहिए, इस पर कोई आपत्ति और सवाल भी नहीं उठाए जाने चाहिए पर ऐसा होता कब है।जो जो अपनों के लिए सच और न्याय पूर्ण होता है वह दूसरों के लिए कैसे बदल जाता है।अब बेटा बेटी तो एक भाव हैं, हर माता पिता को अपने बेटा बेटी में दुनिया भर की अच्छाई नजर आती ही है, उसके दोषों पर दृष्टि जाने का रेखांकित करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।पर जैसे ही ये सन्दर्भ बदल ते हैं हमारे सोच की दिशा भी बदल जाती है, शक की सुईं दूसरे कहे जाने वाले पर चली जाती है, हमारे सोचने का ढंग ही बदल जाता है, हम तटस्थ नहीं रह पाते ।शायद तभी नीर क्षीर विवेकी न्यायाधीश की व्यवस्था की जाती है, सरपंच के रूप में अलगू जैसे पंच चुने जाते हैं जो सारी मित्रता को परे रख जो उचित है वही कहते हैं, इसमें मेरा तेरा नहीं देखते।यदि गलत है तो गलत है।रानी वरुणा के अपने सुख के लिए गरीबों की झोंपड़ी जलाने पर राजा न्याय सुना देते हैं कि जब तक रानी अपने स्वयम के श्रम से कमाई से गरीबों की झोपड़ी नहीं बनबा देती उनका महल में प्रवेश वर्जित है।

 तो न्याय की परिभाषा अपने परायों के मध्य नहीं रची जा सकती कि जो मेरा है वह सब सच और जो दूसरे का है वह सौ प्रतिशत, सोलह आने गलत, इसमें कोई शक सुभा की गुंजायश ही नहीं।अपने ने कहा है तो उसे आंख मूंद कर स्वीकार कर लो और अपने की सीमा रेखा से घेरे से बाहर का हो उसे भाड़ में जाने दो, धूल डालो ससुरे पर, हमें क्या लेना देना, मेरा तो हो गया न, अब तेली की तीनों मरे और ऊपर से टूट टे लाट, हमें क्या लेना देना हमारा तो हो गया न, ऐसे सबके लिए सोचते रहे तो पड़ गया पूरा।खजाना नहीं खाला हो जाएगा, फिर हम क्या ठनठन गोपाल बन कर नहीं बैठे रहेंगे।ये सूमता अर्थ की ही नहीं, भाव की भी है आखिर हम दूसरों के लिए क्यों सोचे, अभी तो हम अपनों से ही निबट पाए और तुम और पाँय पो रहे हो।अरे भाई घर में दीया जला कर ही चौराहे पर जलाया जाता है।घर फूंक तमाशा क्यों देखे भला।हमें कोई कबीर नहीं बनना,तुलसी कहते होंगे काहू की बेटी सों बेटा न ब्याहब और मांग के खायबो मसीत को सोइबो उनका सिद्धांत होगा, हम तो अपने के दायरे में ही खुश है।हम तो छोटी बुद्धि के ही भले, हमें नहीं बनना उदार चेता, हमें क्या लेना देना विश्वमय और ईशमय से।बस हम तो येन केन प्रकारेण अपनों की रक्षा करते रहें, उनके रक्षा कवच बने रहें इतना ही बहुत है जी।अब तुम्हें सोचने का रोग है तो सोचते रहो,तुम्हारी मर्जी।तो दुनिया सदैव से ऐसे ही चलती है ऐसे ही चलती रहेगी।वशुधैव कुटुम्बकम की बड़ी बातें नोटिस बोर्डों पर बोल्ड अक्षरों में चस्पा कर जरूर दी जाएंगी, पर हम तो ऐसे ही चलेंगे।न बदले थे न बदलेंगे।केवल अपना स्वार्थ देखेंगे।बोलेंगे भी तो उतना ही बोलेंगे जिससे हमारा काम सधता हो।न हम सुधरे हैं न सुधरेंगे।सत्य सदा से  सापेक्ष ही हुआ करता है, वह निरपेक्ष हो ही नहीं सकता।अब तुम्हें अपनी मटर अलग भुनाने हो तो तुम्हारी मर्जी, अकेले बैठे अपनी नई मनु स्मृति लिखते रहो, किसने रोका है और कौन रोक सकता है भला।

जागे फिर न डसैहों........

 सफर जारी है......923

01.05.2022

भक्त अपने प्रभु से भांति भांति से निवेदन करता है।कभी रूठ जाता है तो कभी तायने उलाहने देता है।और जब कैसे भी नहीं सुनाई होती तो पहले स्तुति अभ्यर्थना करता है, रोता गाता है, अपने को दीन हीन बताता है कि तुम दयाल दीन हों तुम दाता मैं भिखारी या मैं सब पतितन को टीको, और पतित सब दिना चार के मैं तो जनमत ही को या अब लों नसानी अब न नसैहो, राम कृपा भव निसा सिरानी जागे फिर न डसै हों या गर्भ में उल्टा लटका खूब पुकारता है कि बस प्रभु एक बार इस नरक से मुक्ति दे दो फिर जीवन भर आपको याद करूंगा पर जगत में आते ही माया बांध लेती है, नाते रिश्तों के बंधन में जकड़ जाता है और गर्भ में प्रभु से किया वायदा भूल जाता है ठीक वैसे ही जैसे मुसीबत में तो राम याद आते हैं और जैसे ही विपत टली तो हम अगन मगन हो जाते हैं, फिर कोई कहां याद रहता है भला।ऐसा नहीं होता तो कबीर को क्या पड़ी थी जो वे दुख में सुमिरन सब करे लिख लिख कर काले कागज करते रहते।जब ज्ञान होता तो पश्चाताप करने लगते कि प्रभु जी गलती हो गई, बस एक बार बस इस बार नैया पार लगा दो फिर तेरी डोर कभी नहीं छोड़ूंगा कि प्रभु जी मेरी नैया पार लगा दो, भवसागर में फंसी है नैया इसको बाहर निकालो।उस समय तो जाने कौन कौन से नाम याद नहीं आ जाते।विघ्नहर्ता गणेश से लेकर जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जै कपीश तिहुँ लोक उजागर, कभी जै शिव जै शिव, भोले बाबा, जै माता दी, राम राम, कृष्ण कृष्ण सब जुबान पर भाग भाग के आ जाते हैं, उस क्षण केवल और केवल बस एक सहारा दीखता है मेरा कोई न सहारा बिन तेरे, नन्द लाल संबरिया मेरे, प्रभु आ जाओ प्रभु आ जाओ बस मुझको दरस दिखा जाओ की रट लग जाती है।

भगवान जी बच के रहना इन भक्तन ते, जिनको कोई ठिकाना नाये, अबही तुम्हारी विरुदावली गाएंगे  कि दुर्योधन की मेवा त्यागी साग विदुर घर खायो, जब जब भीर पड़ी भक्तन पर नङ्गे पांव हि भाजो।जे तो तुम्हें ऐसे ही नचाएंगे। सुनी तो होगी कि परमपिता ए छछिया भरि छाछ पे ब्रज गोपिन ने परमपिता हू ए नाच नचा दयो कि पहले नाच के दिखा तब माखन मिलेगो।इनकी बातन में मत आ जइयो प्रभु जे तो पल में तोला पल में मासा हैं।अबही आंसू बहा रये हैं और अगले ही खन सुख पा के तुम्हें बिसार दें।कुंती ए सब पतो हतो ताई ते तो कह दई सुख के माथे सिल परे जो भगवद नाम भुलाय, और बलिहारी जा दुक्ख कू जो पल पल नाम रटाय।तो प्रभु जी तुम तो इन भक्तन ए एक न एक विपत्ति में अटकाये ही रहो करो, इन्हें सल हू तो पड़नी चहिये कि बिना प्रभु जी के जे कितनो अकेलो है।और सब तो चार दिना के साथी है जैसे ही हंस उडो,चोला छूटो सबे घर ते बाहर निकारबे की जल्दी मच जाबे कि मुर्दा है, जाहे जल्दी ते जल्दी फूंको पजारो।वो तेरो प्यारो सो बेटा हत काये चार जनन के संग काठी में बांध के कंधा पर धर के राम राम सत्य कहतो सूधो मरघट में जाके तोय फूकेगो पजारेगो तेरी कपाल क्रिया करेगो और इतने ते हू पेट न भरे, राख ठंडी होत खेम अस्थिन ने बीन बान के एक घड़ा कलश में धरि के लाल कपड़ा बांध के गंगा जी में प्रवाहित कर आयगो।तेरहीं कर के सालाना श्राद्ध कर आबेगो और अपनी दुनिया में अगन मगन है जायेगो, बहुत याद आबेगी तो फोटू पे माला चढ़ा देगो।और तेरी तिरिया दरवाजे तक रोती पीटती आबेगी संगी साथी श्मशान तक चले जाबिंगे पर साथ में कोई न जा सके। जे दौलत इकठ्ठी करबे में लगो परो काये कछू संग नाय जायेगो।जब हंसा अकेलो उड़ जायेगो, संग तेरे नहि कोई जायेगो।बस प्रभु जी को नाम ही जाए तबही तो बीमार होते खेम कहो करे कि राम राम रटो भैया।तब तो बड़े भाव ते भजन गावेगो इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले, गोविंद नाम लेके मेरे प्राण तन से निकले,मेरे मुख में गंगाजल हो उसमें भी तुलसी दल हो।जब प्राण कंठ आये कोई रोग न सताए मुख से राम राम गाये।पर कहां सम्भव हो पाताहै ये सब, मरणासन्न को भी वेंटीलेटर पर धर कृत्रिम सांस देते रहते है शायद बच जाए।बीमारी में कहां राम रटे जाते हैं।तो बस जब तक सांस है तब तक हर सांस पे उसका सुमिरन होता रहे।

इन भक्तन की बातों में मत आ जइयो प्रभु, जे बड़े बनाऊ हैं।अबही जो टसूबे बहा रये हत काये, तुम्हें सिमर रहे हत काये जैसे ही बिपत टली सब भूल भाल जाएंगे।जे तो सब कहबे की बात है कि अब लों नसानी अब न नसेहो, राम कृपा भव निशा सिरानी जागे फिर न डसेहो।ऐसे तो कही ही जाए प्रभु अपनो काम निकारबे कू।पर जे सच नाय।तो इनते पहले त्रिवाचा भरवाबो बहुत जरूली है कि बोल लाला सांची सांची कह प्रभु के नाम ए रटेगो कि नाय।पर हमारे प्रभु तो बड़े भोलेभाले हते नेक लोटा भर जल ते ही खुश हो जाबे तभी तो बिन्हे भोले भंडारी कहो करे और वो छलिया तो राधे राधे कहबे ते ही चलो आबे कि राधे राधे कहो चले आएंगे बिहारी, आएंगे बिहारी चले आएंगे बिहारी।राधा मेरी चन्दा चकोर हैं बिहारी कि राधे राधे कहो।तो सब मिल के बोलो राधे राधे श्याम मिला दे इतने ते ही तर जाओगे।तुम चाहे जितने मर्जी दुष्ट है जाबो पर प्रभु जी तो समदर्शी हते।सो गाते रहो प्रभु जी मेरे अवगुण चित न धरो, समदर्शी प्रभु नाम तिहारो चाहे तो पार करो।एक लोहा पारस में राखत एक घर बधिक परो, जे दुविधा पारस नहीं जानत कंचन करत खरो कि प्रभुजी मेरे अवगुण चित न धरो।एक नदिया इक नार कहावत मैलो नीर बहो, जब मिलि एक वरण भई सुरसरि नाम परो कि प्र

ठोकरें भी सिखाती हैं........

 सफर जारी है...922

30.04.2022

जीवन का हर अनुभव आपको समृद्ध बनाता हैं खासतौर पर जब आपको ठोकर लगती है, आप गिरते हैं, चोटिल होते हैं और माता पिता गुरु की सीख को याद करते हुए धूल झाड़ कर उठ खड़े होते हैं।बचपन में गिर जाने पर फिसल जाने पर बड़ों dvaaraa कह दिया जाता चींटी मर गई यानी गिरने से तुम्हारा नहीं अगले का ही नुकसान हुआ है, गिर गिर कर ही खड़े होना सीखते हैं और हम बच्चे कपड़ों की धूल झाड़ उठ कर खड़े हो जाते और आगे बढ़ जाते।गिरने पर रोते तभी तक थे जब तक कोई उठाने वाला और पीठ सहलाने वाला सामने हो कि कोई बात नहीं, ऐसे तो गिरते ही रहते हैं।चलो उठो धूल झाड़ो आगे बढ़ जाओ।संभल कर चलना सीखो।फिर बड़े होते ये आदत में शुमार हो गया कि जीवन में इन घटनाओं से सबक लेते आगे बढ़ जाओ, वहीं चिपके मत रह जाओ।ये ठोकरें आपको सिखाने के लिए, नए पाठ पढ़ाने को ही आती हैं।तब से गिरते पड़ते नये नये चरित्रों से टकराते रोज सीख ही तो रहे हैं।इतनी जिंदगी बीत गई पर अभी तक आधे सबक भी याद नहीं हो पाए।जब तक पुराने सबको को दुहरा दुहरा कर पक्का करें तब तक एक नये सबक से साबका पड़ जाता है।

          हर तीसरा सामने वाले को बेबकूफ और खुद को बेहद अक्लमंद और तुम्मन खां समझे बैठा है।ऐसे ऐसे व्यक्तित्वों से दुनिया भरी पड़ी है कि बस पूछो ही मत।अब दो दिन पहले की ही बात ले लो कि ऐसे अड़ियल टट्टू से पाला पड़ गया कि कुछ पूछो ही मत।बात पूरी बता के दे नहीं और पूछने पर हर बार इधर से उधर सरका दें,कि आज कल में हो जाएगा, बस मैम आप बिलकुल चिंता मत कीजिये।हम हैं न, सब कर लेंगे ।बस आप निश्चिन्त रहें।पर जिसके पास दायित्व हो वह भला निश्चिन्त बैठ कैसे सकता है।तो जब बादल बिल्कुल ही सिर पर घिर आये तो घबराहट और बैचेनी बढ़ने लगी कि अब तो मूसलाधार के आसार हैं पर न कहीं छये की व्यवस्था है और न ही छाता रेनकोट दिख रहे हैं।और अगले ने सम्पर्क के सारे साधन बन्द कर रखे हैं।चौबीस घण्टे पहले तो अलर्ट हो ही जाना चाहिए और यहां तो सोता पड़े हुए हैं, सब सूमसाम से।लग ही नहीं रहा कि कुछ बड़ा आयोजन होने को है।खैर चुप्पी इसलिए साध ली कि कभी कभी अगला बड़े बड़े सरप्राइज चुपके से देता है और आपको अचंभित कर देता है।आप सोचते ही रह जाते हो कि अरे हमने तो सोची जे कछू नाय करेगो पर जाने तो सब चमाचम कर दयो।काहू ए सल हू नाय परी और सब रज की तज कर दयो।सोचे तो यही बैठे थे पर सारे अरमानों पर पानी फिर गया जब मिस्टर सो एन्ड सो अंतिम क्षण पर व्यस्तताओं का रोना रोते प्रकट हुए और जब व्यवस्थाओं का जायजा लिया तो पता चला कि सरप्राइज तो था ,कार्यक्रम वैश्विक के स्थान पर वन मैन शो में बदल दिया गया था।पर्चे में जिन्हें होना चाहिए था वे सिरे से गायब थे और अपनों को रेवड़ियों का बांट बखरा कर दिया गया था।अच्छा तो अब समझ आया कि इतनी टालमटोल इसलिए की जा रही थी और हम थे कि आंखें मूंदे विश्वास किये बैठे थे कि अगला कह रहा है तो सब हो ही गया होगा, सब कर लिया होगा।खैर आनन फानन में युद्ध स्तर से सब व्यवस्थित किया गया ।

          तो एक सबक और मिला कि अपना काम और साझे के काम में अंतर होता है।किसी के भरोसे आंख मूंद कर काम छोड़ कर नहीं बैठा जा सकता।संयुक्त साझेदारी में आपकी भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है, आपको हर समय सावधान होना होता है।हर घड़ी सीसीटीवी कैमरे की तरह चुस्त और सावधान होना होता है।सारी गतिविधियों पर आई वाच रखनी होती है।अगले को बार बार झकझोरना होता है और इतने पर भी अगला मक्कड़ किये बैठा रहे, इधर से उधर करता रहे तो भविष्य के लिए साझे के काम में हाथ डालने से बचना चाहिए। ये जिंदगी रोज नया पाठ पढ़ाती है, रोज लगती ठोकर चेताती है कि बहुत आंख खोलकर,सर्पिल घुमावदार रास्तों की जटिलता समझ कर चलना आपके हित में है।तो ठोकरों से सबक लेना जरूरी है दोस्तो ।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...