Wednesday, August 17, 2022

पहले करो तो सही

 सफर जारी है....९७२

२३.०६.२०२२

पहले करो तो सही.....

कल अध्यापिकाओं के एक बड़े वर्ग से संवाद करते पाया कि आपका कार्य और व्यवहार आपको बहुत कुछ दिलाता है। बस करना होता है। लेकिन मुश्किल यह है कि हर व्यक्ति को चाहिए पहले,करने की बात बाद में। कैसे पूरा का पूरा तंत्र एक इस पहल के कारण बदल सकता है, इसकी शुरुआत कैसे हजारों लाखों के मानस को बदलने में सहायक होती है। बस आगे आओ तो सही, करने की सोचो तो सही, बोलना सीखो तो सही, अपने को लोगों से जोड़ो तो सही ।

छोटे छोटे प्रयास ही बड़े रंग ले आते हैं, बस उन्हें अमल में लाना होता है। आपको प्रभु ने एक विशेष कार्य के लिए चुना है तब आप अध्यापन क्षेत्र में आए हैं। इसे प्रभु की कृपा समझो कि इतने इतने विद्यार्थियों से जुड़ने का अवसर आपको मिला, आप चाहते तो इस अवसर का भरपूर लाभ उठा सकते हैं, अपनी बात को एक बड़े समूह तक पहुंचा सकते थे, आप इतने इतने विद्यार्थियों के जीवन को बदल सकते थे, उनमें जीवन के प्रति उत्साह भर सकते थे, उन्हें रचनात्मक बन सकते थे, उन्हें सही आकार दे सकते थे पर ये सब तब करते जब आपने स्वयं को नियोजित किया होता, कुछ सोचा होता, जब अपने कार्य को इस दृष्टि से देखा होता, उसके इतने पहलुओं पर सोचा होता, अपने को इस योग्य समझा होता, अपने को व्यवस्थित किया होता पर आपने ऐसा सोचा कब। आप तो बस ये मानते रहे कि मुझे तो जैसे तैसे बस दस से पांच तक नौकरी करनी है, उतना ही करना है जिससे काम भर चल जाए, बस कक्षा में गए, उसी पुराने ढर्रे पर किताब खोली, पाठ पढ़ाया, काले सफेद पट पर चाक या मार्कर से कुछ लिखा, प्रश्नों के उत्तर किताब के पाठ से प्रश्नों के उत्तर लिखवा दिए और आपकी छुट्टी हो गई। जरा दिल पर हाथ रख के सोचिए कि क्या बस इतना ही काम था आपका कि कक्षा में आए, एक महत्वपूर्ण अवसर को यांत्रिक से कार्य के साथ बिता दिया और हाथ झाड़ कर चल दिए कि चलो आज का दिन तो बीता, बस सारी दृष्टि अवकाश, यात्रा, सुविधा पर गड़ाए रहे। इसका दशांश भी आपने अपने कार्य को दिया होता, पढ़ाने जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम को पूजा मानना होता, उसे पवित्रता से ग्रहण किया होता, अपने कार्य दायित्व के प्रति गंभीर रहे होते तो आज सब कुछ बदला बदला सा होता, आपको मानसिक संतोष मिला होता, आप अपने को दायित्वशील मान रहे होते, समाज को दिशा दे रहे होते पर नहीं इस दृष्टि से सोचा ही कब गाया। एक बड़े लक्ष्य को भूलकर हम छोटे छोटे स्वार्थों में लिप्त हो गए, तेरा मेरा करने में व्यस्त हो गए और एक महत्वपूर्ण कार्य दायित्व को भुला बैठे।

मेरा इस अध्यापन क्षेत्र में जुड़े सभी दायित्वशील साधकों से अपील है कि वे अध्यापन की गंभीरता को समझें, अपने कार्य को केवल यांत्रिक न समझें कि केवल कक्षा में गए, पाठ पढ़ाया और छुट्टी हो गई। नहीं भाई नहीं, ये तो शुरुआत थी, इसके माध्यम से तो आप समाज और देश को बदलने की कड़ी में जुड़ गए हैं, आपको प्रभु ने एक बड़ा अवसर दिया है। इसका भरपूर लाभ उठाओ। आपको तो पढ़ाने का एक अस्त्र शस्त्र दिया गया है तो उसका सही प्रयोग करें, पढ़ाना केवल पढ़ाना भर नहीं है, यह तो आपकी बात जन जन तक पहुंचाने का माध्यम है तो उठो, जागो और काम पर लग जाओ, बहुत समय खो दिया, जो क्षण शेष है उसे पकड़िए। बस आज इतना ही।

करो योग रहो निरोग

 सफर जारी है..... ९७०

२२.०६.२०२२

करो योग रहो निरोग......

योग कर्मसु कौशलम अर्थात कर्मों में कुशलता योग कही जाती हैं, इस आधार पर तो जो भी छोटा बड़ा काम हाथ में लिया जाए, उसे लगन और निष्ठा पूर्वक संपन्न करना भी योग ही हुआ। पर काम को चुनना और फिर उसे समय से पूरा करना चुनौती पूर्ण होता है। बिना सोचे समझे उत्साह उत्साह में बहुत से कामो को हाथ में ले तो लिया जाता हैं लेकिन कुछ समय बाद ये उत्साह ठंडा पड़ जाता हैं, काम से विरक्ति होने लगती हैं, काम बोझ लगने लगता है। फिर उस काम को बीच मैं छोड़ एक और काम को हाथ में लेते हैं और कुछ समय बाद उस काम का हश्र भी पहले जैसा हो जाता है। ऐसे लोग शायद याद नहीं रख पाते कि आधी छोड़ पूरी को धाबे, पूरी गहै न आधी पाबे। जिनकी स्थिर मति नहीं होती, चित्त बैचेन रहता हैं, पल में तोला पल मैं माशा हो जाते हैं, वे किसी भी काम के साथ न्याय नहीं कर पाते।

योग कुछ शारीरिक व्यायाम भर नहीं है, योग केवल प्राणायाम भी नहीं है। योग एक जीवन पद्धति है। समत्वम योगम उच्चयते, जीवन में समत्व योग कहलाता है। कैसे आता है जीवन में समत्व और संतुलन, कौन होता है योगी। जो जागते हुए सोता है वह है योगी। अब सोते हुए तो सोया ही जा सकता है पर योगी हर पल सजग रहता है, वह कर्मयोग में निरत रहता है, निरंतर चिंतन करता है सोते जागते उठते बैठते बस अपने को लक्ष्य में केंद्रित रखता है। जब कभी ऐसे कर्मयोगियों से मिलना होता है, मन बहुत प्रसन्न हो जाता है, लगता है जब ये कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं कर सकते। फिर मन कठिनाइयां गिनाने लगता है अरे इतना तो काम होता है, समय की बड़ी किल्लत है, जो हाथ में है, वही पूरा नहीं हो पा रहा तो नया क्या ओढ़े। तो हम तो ऐसे ही ठीक है, बस हम से तो इतना ही हो जाए, उसी मैं भर पाएंगे। बस एक यही सोच आगे बढ़ने से रोक देता है। वहीं के वहीं जड़ हो जाते है।

योग को मात्र पढ़ना और रटना नहीं होता, उसे करना होता है, व्यवहार में लाना होता है, स्थिर मति होना होता है, चंचल चित्त को वश में करना होता है, अपने को साधना होता है, शरीर को स्वस्थ रखना होता है पर हम हैं कि पतंजलि के योग सूत्र को रटे जा रहे हैं, गीता के अध्याय पर अध्याय पढ़े जा रहे हैं पर अंदर कुछ नहीं उतर रहा, पानी में रह कर भी मीन की तरह प्यासे हैं क्योंकि हम चिकने घड़े जो हो गए हैं, खाल मोटी काली भैंस की तरह कड़ी हो गई है, कोई असर ही नहीं पड़ता। बस जीवन भर इधर से उधर दौड़ते रहते हैं बिना किसी लक्ष्य को निर्धारित किए, हमें सब चाहिए तो पर प्रयास आधे भी नहीं कर पाते और जो थोड़े बहुत किए भी जाते हैं, वे भी आधे अधूरे मन से, तो जल के बीच खड़े भी सूखे के सूखे रह जाते हैं। योग करने के लिए ठठकरम तो खूब करवा लो, मेट्स आ जाएगी, टीवी लग जाएगी, योजना बना लेंगे, दुनिया भर का ढिंढोरा पीट लेंगे पर करने की बारी आई तो जमाने भर का आलस आ जाएगा, बहाने खोज लिए जाएंगे, न करने का सारा दोष आंगन पर मढ़ दिया जाएगा, व्यवस्था को कोसा और आलोचित किया जाएगा लेकिन फली के दो टूक करेंगे नहीं, बस गाते रोते रहेंगे, बकर बकर करते रहेंगे।

योग करने से होता है, कहने से नहीं। योग जीवन शैली है। वह आपके हर कार्य में झलकता है। उसे कहना नहीं होता, बताने की जरूरत नहीं पड़ती कि हम योग करते हैं। वह तो आपके दिन प्रतिदिन के आचरण में झलकता है, बात करने के तरीके से प्रदर्शित होता है, आप हमेशा हड़बड़ी में नहीं रहते, धैर्य पूर्वक दमदार आवाज में अपनी बात रखते हैं, आपको बेवजह चीखना चिल्लाना नहीं होता। विनम्रता पूर्वक भी सच रखा जा सकता है, उसके लिए उदंड और असभ्य होने की जरूरत नहीं होती। शांत चित्त होकर और धैर्य बनाए रखते हुए आप अधिक मजबूत हों जाते हैं।

तो करते रहिए योग,योगा नहीं। मनाए चाहे मत मनाए योग दिवस के आयोजन को पर मन से उसे करते रहिए। योग के लिए बहुत शोशेबाजी कि जरूरत नहीं होती, बस उसे करना होता है नियमित। तो करते रहिए योग और बने रहें निरोग।

पिता दिवस के ब्याज से

 सफऱ जारी है....970

21.06.2022

पिता दिवस के ब्याज से .........

ये सारे दिवस पिछले कुछ सालों की उपज है. हमारे समय में तो पिताजी  एक गरिमा पूर्ण व्यक्तित्व हुआ करते थे जिनके आगे बोलने की हिम्मत ही नहीं होती थी. बस वे हैं, हम सबका ख्याल रखते हैं, ज्यादातर बातें तो माँ के माध्यम ही उन तक पहुंचती थी औऱ बातें भी क्या होती थी

कभी स्कूल की फीस, कॉपी किताब या पिताजी के साथ रिश्तेदारी में जाने की जिद. इससे अधिक कोई मांग जेहन में आती ही नहीं थी. छोटी छोटी खुशियों में ही जिंदगी जी लेते थे. आज लोगों की बड़ी बड़ी कथा कविता पढ़ते हैं तो लगता है काश हम भी ऐसे रचनाकार होते. जो मन में था पिता सब समझ जाते, कभी जिद करने रूठने मटकने फूं फा करने की नौबत ही नहीं आई. यदि मांग जायज है तो कहने की नौबत ही नहीं आती थी औऱ गलत है तो कितना भी फ़ैल जाओ, पूरी नहीं होती थी. नहीं का मतलब नहीं ही था. औऱ वैसे सच बताएं तो ऐसा कोइ अभाव कभी लगा ही नहीं जिसके लिए जिद की जाए. पढ़ाई लिखाई का सब सामान बिना कहे ही मिल जाता, स्कूल की ड्रेस बनबा दी जाती, रोज के औऱ धराउ के कपड़े होते ही थे. रोज मौसम की फल फलारी, मूंगफली, भुने अनाज आते ही थे. अब औऱ क्या चाहिए था जिसके लिए जिद करते. नंबर से सबको रिश्तेदारी में भी ले जाते. मेला तमाशा खूब दिखाने ले जाते. घर क्या था, स्वर्ग था. ज़ब दफ्तर से लौटते तो काफी दूर से ही सीटी की आवाज से हम बच्चे दौड़ पड़ते कि पिताजी आ रहे हैं.

ज़ब अपने घर के हो गये तो हमेशा यही कहते रहे जाओ बेटा अपने घर खुश रहो. बस एक बार उन्होंने बहुत मन से कहा बेटा दो चार दिन रुक के जाना, पता नहीं क्या हुआ मुझे तुरंत मना कर दिया औऱ इस बात का मलाल मन में ही रह गया.पिता होते ही होंगे गौरवशाली,अपनी संतान की छोटी से छोटी जरूरत का ध्यान रखने वाले, खुद कष्ट सहकर बच्चों के लिए सब सुविधा जुटाने वाले. सच कहती हूँ एक व्यक्ति की तनख्वाह में छह बच्चों का पालन पोषण जिसमें किसी बच्चे को कभी अभाव लगा ही नहीं, कैसे सम्भव हुआ आज ये खुद अनसुलझी पहेली है.

पिता होना यानी दायित्व शील होना, लड़कियों के लिए घर वर तलाशना, उन्हें संस्कारित करना, दूसरे के घर जाके निभाव कर सके, ऐसी शिक्षा देना. चिंताए तो बहुत होगी उन्हें पर चेहरे पर म्लानता नहीं दिखी, बड़ी बड़ी चिंताओं को हँस कर उड़ा देते थे. सारी रिश्तेदारी के निभाव को पहले नंबर पर रखा जाता. हम बच्चे कभी कभी चिड़चिड़ करते तो प्यार से समझा दिया जाता बेटा ये सब अपने ही हैं, ऐसा नहीं कहते, जो है मिल बाँट कर खालो, इतना ही है औऱ इसी में काम चलाना है, बस उनका इतना कहना ही हमारे लिए ब्रह्म वाक्य हो जाता. अब पिताजी ने कह दी तो कह दी.

आज ज़ब बच्चों को पिता से जुबान दराजी करते देखती हूँ, तायने उलाहने मारते देखती हूँ, आलोचना करते देखती हूँ तब लगता है क्या पिता से ऐसा भी कहा जा सकता है. वे तो पिता है हमारे जन्मदाता हैं उनसे तो हमारा जीवन है, वे हमें पालते पोसते हैं, दुनिया की मुसीबतों से लोहा लेना सिखाते हैं. फिर उनके प्रति ही बच्चों के मन में वैर कैसे पल जाता है, वे उन्हें आलोचित कैसे कर लेते हैं, उनमें भाषाई उदंडता कहाँ से घुस आती है, वे उनके लिए असभ्य औऱ गंदे विशेषनों का प्रयोग कैसे कर पाते हैं. पुत्र पुत्री तो पिता के आत्मज आत्मजा हुआ करते हैं न, फिर वे उनसे कैसे कंस का सा क्रूर व्यवहार कर पाते हैं, ये गलत आदतें उनमें कहाँ से प्रत्यारोपित हो जाती हैं. वे पिता को पिता का सा मान क्यों नहीं दे पाते. मान तो मन से होता है किसी के कहने भर से उपजा नहीं करता औऱ किसी के मना करने से समाप्त नहीं हो जाता. तो बच्चे बच्चे होते हैं औऱ पिता पिता.उनमें एक फासला होता है जैसे गुरु शिष्य में एक हाथ की दूरी होती है. वास्तव में ये दूरी नहीं, ये बड़ों के प्रति मान है. बस ये मान बना रहे, भाषा के संस्कार बचे रहें, हम पिता को तो क्या दें पाएंगे पर अपनी संतान के प्रति अपने दायित्वों का निर्वाह कर पाएं यही बड़ी बात होगी , यही पिता का सच्चा मान होगा

अंधरा के गैया, राम रखवैया

 सफर जारी है....969

20.06.2025

अंधरा के गैया, राम रखवैया .....

कहावतें किसी भी भाषा/बोली में हों, अपना पुरजोर असर दिखाती हैं।बात को सशक्त ढंग से प्रस्तुत कर देती हैं फिर भी कोई भैस का भैया उसे न समझ पाए तो ये उसकी नासमझी का सूचक है।मांस भक्षण से ही जाति ही

भृष्ट होती हो तो मक्खी ही क्यों ,फिर तो खूब डट कर चिकन बिरियानी खाओ।।प्याज के छिलके पर भला क्या मुसलमान बनना।ये कहावते कोई आजकल में नहीं रची गई, न जाने कब से चली आ रही है।तो मुहावरे ,कहावतें और लोकोक्ति प्रयोग में जो जितना अधिक समृद्ध होगा, उसकी भाषा की तीक्ष्णता, मारक शक्ति उतनी ही प्रबल और धारदार होगी।कैसे सीखे जाते हैं इतने इतने प्रयोग।कक्षा में पढ़ते पढ़ाते मुहावरे भले वाक्य में प्रयोग कर लें, पर लोकोक्ति और कहावतों के प्रयोग करने में तो छठी का दूध याद आ जाता था।

कहावतें क्या थी, पूरे वाक्य थे, उसे समझाने के लिए एक वाक्य पहले और एक बाद में जोड़ना होता था।जितने कक्षा में विद्यार्थी उतने ही वाक्य बनाने को कहा जाता पर सब एक दूसरे की चोरी करते थे । किताब में लिखे , अध्यापिका द्वारा बोले और बनाये गए वाक्य ही हमारे खजाने होते।घर पर मां खूब सहायता करती नये नये वाक्य बनाना सिखाने में।जिस दिन नये मुहावरे, लोकोक्ति कहावतें सुनते,सारा दिन उसके प्रयोग में लगे रहते।सच बताएं तो जो स्कूल में सिखाया जाता, घर पर उसे इतनी इतनी बार दोहराते कि बस सब याद हो जाता।बात उन दिनों की है जब कक्षा में और दोस्तों में सबसे आगे रहने का नया नया शौक चर्राया था।अपनी प्रशंसा सुनकर फूले नहीं समाते थे।और जो कहीं कुछ गलती हो गई,डांट वांट पड़ गई तो मुंह सुजा कर बैठ गए कि आंखों से गंगा जमुना बहनी शुरू हो जाती।मां बार बार समझाती हर बार सफलता मिले ही मिले, यह जरूरी नहीं होता।बस अपनी मेहनत किये जाओ, हार भी स्वीकारो और जीत भी।हार से सीख लो कि अगली बार इससे भी अच्छा करेंगे।

तो जीवन में चूहा भाग बिल्ली आई का खेल चलता रहा, अब भी चल रहा है।घुड़दौड़ के खेल में शामिल होना आता नहीं।आता क्या नहीं, कभी अपने को इतना योग्य समझ ही नहीं पाए कि बड़े लोगों संग दौड़ सकें।बस जो सहज मिल जाता है, वह सिरमाथे।सिखाया भी यही गया सहज मिले सो दूध सम मांग मिले सो पान, कह कबीर वह रक्त सम जामे खींचा तान।मिल जाए तो ठीक न मिले तो गम नहीं।जिसके संसारी सहयोगी नहीं होते ,उसके राम जी होते हैं।जिसका कोई नहीं, वह राम भरोसे हैं।यही विश्वास बहुत से दुखों से मुक्ति दिला देता है।जो भजे हरि को सदा, वह परम पद पावेगा।अंधरा के गैया, राम रखवैया।तो अंधा और कुछ करे न करे पर राम को तो भज ही सकता हैIतुम उसे भजते रहो,वह तुम्हारे दुख सुखों की परवाह करेगा।पर विश्वास  रखना जरूरी है।और मजे की बात तो यह है कि जो सहज और सरल है ,उसे ईश्वर पर बड़ा भरोसा है।अपना सा जितना मर्जी कर ले, पर बाद में राम पर ही सब छोड़ देता है जैसी राम जी की मर्जी।भगवान चाहेंगे तो सब ठीक होगा।ये भाव जैसे जैसे प्रबल होता जाता है, मन में शांति आती जाती है।जो होगा ठीक होगा।वैसे भी आप रो झींक कर क्या कर लेते हैं, बस मन तन से कमजोर ही होते जाते हैं।तो बने रहिये इन मुहावरों कहावतों और लोकोक्तियों के साथ, क्या पता कब कौन सी कहावत डूबते का सहारा बन जाये।जब मित्र ने मुझे कहा अंधरा के गैया राम रखबैया, तो मन में कौंधा काहे परेशान होती हो, ईश्वर तेरे साथ है, जब आंधरे की गैया का रखबैया वह काली कमली वाला है तो तेरा क्यों नहीं होगा।तो भजते रहो रटते रहो,नैया तो पार राम जी ही लगाएंगे।

सारे जग से न्यारी अम्मा

 सफर जारी है.....968

19.06.2022

सारे जग से न्यारी अम्मा......

उन महिलाओं को सौभाग्यशाली कहा जाता हैं जिनके ऊपर माता पिता और सास ससुर दोनों की छत्रछाया होती है।जनश्रुति है कि  ऐसी महिला जो पीहर और ससुराल दोनों की छत्रछाया से भरी पूरी हो, के बालों में बांधा गया रिबन/ फीता बांध लेने से बायठा ठीक हो जाता है।जब तक मां पिता सास ससुर दोनों जीवित थे, अडोसी पड़ोसी कितनी कितनी बार अपने हाथ दर्द को उस रिबन को बांध दूर करते रहे हैं।इसी प्रकार चिक चली जाने पर विशन पाँय पैदा हुआ व्यक्ति यदि लात मार दे और लात खाने वाला पीछे मुड़कर न देखे तो चिक ठीक हो जाती है।इन घटनाओं के वैज्ञानिक सन्दर्भ से तो परिचय नहीं है पर इतना निश्चित है जिनके दोनों घर भरे पूरे होते हैं, जिन्हें दोनों घर का लाड़ प्यार मिलता है, वे निश्चित ही भाग्यशाली होते हैं।तो जब तक दो दो माता पिता का सान्निध्य मिलता रहा, चिंता फिक्र जैसे शब्दों से साबका नहीं पड़ा.बस नौकरी और बाहर बास के काम में व्यस्त रह आये क्योंकि उस घर में  मां और इस घर में सास सब संभाल लेती थी।वे थीं तो मेरे खाने पीने की चिंता भी उनके जिम्मे थी।देर सवेर आने पर डांट में उनकी चिंता झलकती थी।पहले पिता, फिर ससुर ,फिर मां और फिर सासु मां सभी उस पथ के पथिक बन गए जहां से कोई वापस नहीं लौटा करता।श्मशान तक विदा करने सब आते हैं पर उसके बाद जाने वाले किस दुनिया के बाशिंदे बन जाते हैं, यह अभी तक रहस्य ही है।

कल सासु मां की पुण्य तिथि थी, अचेतन में तो बार बार कौंध रहा था कि इतना अनमनापन  क्यों है पर कार्यालयी व्यस्तता दिन भर हावी रही और बिस्तर पर लेटते ही जैसे तीन वर्ष पहले की उनके विछोह की घटनाएं मस्तिष्क को झकझोरती रही।उनकी बीमारी, कोरोना काल और घर में बंद अडोस पड़ोस नाते रिश्तेदार।वृद्ध होते शरीर कमजोर होता जाता है और रोग शरीर में घर बनाने लगते हैं या कहें कि शरीर को छोड़ने का कोई बहाना भी तो चाहिए।तो बड़ों की छत्रछाया की अंतिम कड़ी अम्मा जी भी तीन वर्ष पूर्व संसार को छोड़ बैकुण्ठ धाम जा बसी हैं।वहीं से अपने घर परिवार को देख सिहा लेती होंगी क्योंकि बच्चों में तो उनकी जान बसती थी।सच तो यही है कि वे परिवार का आधार स्तम्भ थी,रीढ़ थीं घर परिवार की।उनके जाते ही सब बिखर गया सा लगता है।और सब तो समेट बांध भी लो पर मन सहेजना थोड़ा मुश्किल होता है।ऊपर से तो सब सहज सामान्य से दिखते हैं पर यादों के पिटारे पर किसी का बस तो नहीं हुआ करता न, वे तो बिना चित्र के भी मन में अंकित रहती हैं।बस तिथि उन यादों का संकेतक बन जाती हैं ।अम्मा जी, आपको शत शत नमन।आप जहां भी हैं, बस परिवार पर अपना आशीष बनाये रखें।आप थीं तो कभी सोचा ही नहीं कि एक दिन आपसे बिछुड़ना भी होगा।बस अब तो तस्वीर की शोभा बन गई हो।पर रहती हम सबके  दिलों में ही हैं आप।

मां कहीं नहीं जाती, वह अपने बच्चों के आसपास ही बनी रहती है गर्म दुशाला सी, वक्त जरूरत सबको अपने आँचल में समेट लेती है।सो हम बालक उस गर्माहट को आज भी अनुभव करते हैं।आपकी तीसरी पुण्यतिथि पर शत शत नमन।ईश्वर हम परिवारी जनों को शक्ति दे कि हम आपके बताये मार्ग पर चल सके, परिवार में जोड़क की भूमिका निभा सके।हम सबकी थी प्यारी अम्मा, सारे जग से न्यारी अम्मा ।

मास्टरनी/बहनजी

 सफर जारी है....966

17.06.2022

 मास्टरनी/बहनजी ....

सफर जारी है में संख्या 66 जब किसी अंक के साथ जुड़ती है तो नए खण्ड की शुरुआत होती है।तो मन खूब खुश है कि इस यात्रा के दस महत्वपूर्ण पडाव पूरे हुए और आषाढ़स्य प्रथम दिवस से एकादश सोपान प्रारम्भ हो रहा है।पर दूसरे क्षण एक विचार उपजता है ये गिनती क्यों, ये गिनना किसलिए ,अरे जब तक अंगुलियां कीबोर्ड पर दौड़ रही हैं, और दिमाग में विचार आये जा रहे हैं,पेज काले करते चलो।जब पांच फुटी काया मुठ्ठी भर राख में सिमट जाएगी तब सब समाप्त होना ही है।पर मन को खुश होने को आंकड़े चाहिए न।मन की भली चलाई वो तो हरिनाम भी माला के मनके गिन गिन कर जपता है।ज्यादा सयाना जो है।अब करे भी क्या मास्टर बुद्धि है और वह भी भाषा का ,उसमें भी हिंदी का।मास्टर तो वैसे ही दलिदरी होता है, बस उसके हिस्से विद्यार्थियों की मुंह भर नमस्ते ही आती है और भोले भंडारी को देखो इसमें ही कैसा फूला फूला डोलता है मानो कुबेर का खजाना मिल गया हो।उसकी शिष्य सम्पदा सबसे बड़ा कोष है।तो उसी की जुबानी सुनो हिंदी मास्टरनी की कहानी।

तो क्या हुआ जो मैं मास्टरनी /बहिनजी हूँ।अरे लोग शराबी, जुआरी ,पापी, चोर, डाकू ,भगोड़े, आलसी और जन क्या क्या होने में नहीं शरमाते । तो मैं क्यों शर्माऊ,अरे भाई ,मास्टरनी है तो क्या हुआ।अब छोटो को पढाओ प्राथमिक में पढाओ ,माध्यमिक में पढाओ या यूनिवर्सिटी में पढ़ा आओ, क्या फर्क पड़ता है, पढाना तो पढाना है।तो तुमको क्या लगता है पढाना काम नहीं है,पचपन साठ विद्यार्थियों को संभालना हंसी ठठ्ठा है क्या, तुम पे तो अपने जाये दो ही नहीं संभलते, उन्हें बिस्तर छोड़ते ही स्कूल पठा देते हो।खुद तो अपने बालक को किटकिन्ना भी नहीं सीखा पाते और मास्टरनी में रोज सौ दोष खोजते हो।और फिर तुम्हें तो परकटी अंग्रेजी मैम ही ज्यादा पसंद है जिनकी गिटर पिटर भले ही पल्ले पड़े न पड़े पर ये भरम तो बना रहता है कि हमाई औलाद भी ऐसी अंग्रेजी मैम जैसी गिटर पिटर करना सीख जाएगी।

हम तो हिंदी वाली मास्टरनी है,बहनजी नुमा है,विलायती मैम नहीं हैं । हिंदी पढ़ाती हैं हिंदी।हिंदी के नाम सुनते ही चेहरा क्यों उतर गया, क्या ये भाषा नहीं है।जितने मर्जी विषय हों,पढ़े तो सब भाषा के माध्यम से ही जाते हैं।बिना भाषा के भला कैसी पढाई। विषयों को पढ़ने के लिए आधार रूप जो भाषा है, उसे तो मैं ही सिखाती हूँ न।जो कहीं मैं ही उनकी नींव पक्की नहीं करूं तो फिर कैसे पटर पटर बोलोगे।भाषा सीखे बिना आगे बढ़ा ही नहीं जा सकता।जिसकी जो भाषा है ,उसे वही अच्छी लगती है।मेरी भाषा हिंदी, मेरा गौरव हिंदी।उसे बोलकर तो मेरा सिर उन्नत होता है।यूं ही नहीं सीखी जाती कोई भाषा, उसे बोलना, सुनना, पढ़ना, लिखना सीखना होता है।उस की संस्कृति समझनी होती है।उसके शब्दों को याद करना होता है, उसके अर्थ समझने होते हैं ,उन्हें प्रयोग करना होता है, उनसे नई नई कविता कहानी रचनी होती हैं,उसके सम्प्रेषण में दक्ष होना होता है, उसका खूब खूब प्रयोग करना होता है तब जाकर कहीं शब्दों से दोस्ती होती है,शब्द अपने से लगते हैं, फिर तो वे तुम्हारे हाथ के लट्टू हो जाते हैं, मर्जी चाहे जैसे घुमा दो।

तो मैं हिंदी पढ़ाती हूँ हिंदी, पूरे होशोहवाश में और सौ प्रतिशत गौरव बोध के साथ, पर्वतों जंगलों नदियों सबसे कहती हूँ ....सुनो सुनो सुनो, मैं हूँ हिंदी की मास्टरनी, मैं सबको जोड़ती चलती हूँ।कश्मीर से कन्याकुमारी तक मैं घूम घूम आती हूँ, अपने को समृद्ध कर आती हूँ।हर प्रांत मुझे पसंद करता है, मेरे स्वागत में पलक पाबड़े बिछाए रहता है।मैं कबीर, सूर,तुलसी, रहीम, रसखान, मीरा के पदों में बिगुल सी बजती हूँ, कान्हा की बांसुरी हूँ।मैं हिंदी हूँ, मुझमें रम के तो देखो, कैसा आनन्द आएगा।बस मधुर मधुर लोरी सुनते कब सपनों की दुनिया में पहुंच जाओगे, पता भी नहीं चलेगा।

तो आओ मेरे पास, चलो मेरी कक्षा में, वहां तुम्हें सब मिलेंगे...... तेलगू ,तमिल ,कन्नड़, मलयालम, कोंकणी, मराठी, असमी,पंजाबी, गुजराती, सिंधी, ये सब मेरी बहने हैं, मुझसे बहनापा रखती है क्योंकि मैं मास्टरनी जो हूँ हिंदी की।हां, मुझे बहुत अच्छा लगता है जब कोई कहता है देखो, देखो, वो आ गई हिंदी की मास्टरनी। सीधे पल्ले की साड़ी पहने माथे पे बड़ी सी बिंदी लगाए हाथों में छमाछम चूड़ियां और पैरों में झनाझन बजती पायल के साथ हिंदी मास्टरनी/बहनजी का खिताब मुझे उल्लास से भर देता है।हाँ हूँ मैं मास्टरनी हिंदी की और जिंदगी भर वही बनी रहना चाहती हूँ।

फेर मत कहियों पैले चों नाय बताई

 सफर जारी है....963

14.06.2022

फेर मत कहियों पैले चों नाय बताई.........

सुनी तो होयगी कि दान की बछिया के दांत नाय देखे जात ।अब दान तो दान ठहरो ,आदमी अपनी सिद्धा आस्था के कारन देत ए ।कोई जबरदस्ती थोड़े ई है दे दे नाय दे, बाकी मज्जी । वहां तुमाई हेकड़ी को कोई काम नाय कि हमकू जे चहिये वो चहिये,जे अच्छो नाय वो अच्छो नाय।ऐसो वैसो नाय पसन्द  तो  अपनी अंटी ढीली करो, जेब खाली करो।दूसरन  के ऊपर चों लदे भये हो। तुमे नाय चाहिए तो और काऊ ए दे दिनगे ,तुमी थोड़े रह गए हो कि नाक भौंह ऊ सिकोड़ो ,नखरा दिखाओ ,तायने उलाहने मारो, ऐंठ के मारे पैंठ कू जाओ और अगलो तुम्हाई चिरौरी करतो रहे। फिर तुम कौन घर के दामाद लगत हो जाय पहले तो कलेजे को टूक निकार के देयो, डला भर के लदाय देयो तो हू पेट नाय भरे। छोरा ब्याहबे आबिन्गे और ऐन मौका पे ऐसी अनकटोंटी मांग धर दिनगे कि बेटी बारे के होश उड़ जाबे।कि के तो कार देयो दरबज्जे पे कि  बारात लौट जाबेगी ।वो तो जे कहो कि अब छोरिन ने समझ आ गई है कि जाको पेट इत्ते पे ना भरो तो का जरूरी है कि जे मांग आखिरी होय ।जो कैते कि एक बार कुत्ता के मोंह खून लग जाए तो वह फिर माने नाय।फिर तो वह आदमखोर है जात है।जे तो भली भई कि अब लरकी उ साफ साफ कह देत है हमें नाय जानो ऐसे लालची के साथ, हम तो बिन ब्याह भले,ऐसे लालची के संग बंध के हमें अपनो जीवन नाय बिगाडनो।मान लेयो जा टैम महतारी2बाप ने कज्ज लेके कहूँ ते इंतजाम करहू दयो तो जे तो जीवन भर माँगेगो, मंगता है जे तो, हम कहां ते जाको मोंह बन्द करिंगे ।हम तो ऐसे ही भले अब बारात लौटे तो भले ही से लौट जाए पर बाप ए जों अपमानित होत तो नाय देखो जात, आखिर कू तो बाप है हमाये। 

और दूसरी बात सुनो जब हाट बाजार में एक के साथ एक फ्री मिलो करे तो कैसे झट सीना ले लेत हो,बहस तो नाय करत, चुप सीना धर लेत हो, और जे कह के  मन में तसल्ली कर लेत हो कि इन दामन में का बुरो है।जितनो जेब अलाउ करे ,उतनो ही तो करत हो खर्चा, फिर बामे एक की जगह दो मिल जाए तो मन कैसे हरखा जात है, बांछे खिल जात है, मन कैसो फूल सो हल्को हो जात है, बार बार जे कह के अपई पीठ ठोक लेत हैं देखो कैसो बेबकूफ बनाओ,पैसा एक को दयो और सामान दो ले आये।मूरख हो तुम तो निरे,को दे देगो तुम्हें एक के भाव दो।जो मिल जाए बाए जेब में धर के चलते बनो।तुम्हें कछू करनो नाय परि रयो, जो मिल जाए बामे शुकुर मनाओ।काहे कू

 नाक भौंहन ने सिकोड़े से रहत हो, अगलो भलमनसाहत में किये जा रहो है और तुम्हाई आंख तर नाय आ रयो।जब देखो तब काऊ न काऊ बात ए मुद्दा बना लेत हो।नेक सोचो जो मिल रयो है बापे तुमाओ कछू अधिकार नाय।वो तो अगले की भलमनसाहत और सदाशयता हती, बड़प्पन हतो,परिवार के संस्कार हते, सबते मिल जुल के रहनो चाती, तो चुप ई सब करत रहत है कि छोड़ो सब अपने ई है।अब अगलो हू जो बांट हिस्सा पे उतर आए, अपनो तुपनो करे तो कैसी होयगी।सब घमण्ड धरो रह जायेगो। सो ज्यादा भिनभिनाओ मत।अगले कू टिनटिनाओ मत,चौबीस घण्टा पैना से मत मारो करो।बाय हू ए दो घड़ी चैन लगन दयो।अगलो कछू ना कह रयो तो तुम्हें तो इतनी समझ होनी चहिए है कि मीठे गन्ना ए इतनो मत निचोड़ो कि फफ्फस के अलावा कछू नाये बचे। रहनो तो तबऊ पडेगो तो ज्यादा अच्छो है अगले को हू नेक ख्याल रखनो जरूली है।फिर कल कू मती कहियो कि पैले चों न बताई ।

अब बार बार नाय किंगे एक ई बात ए।बहुतेरो समझा लयो।समझ में भर गई होय तो कर लेयो नाय तो तिहाई मज्जी।हमारो तो कहने को काम हतो तो भैया हमने तो कह दई अब तुम जानो और तुमाओ काम।अब नाय किंगे साहब बिल्कुल हू।

सम्बन्धों के मायाजाल

 सफरनामा.......964

15.06.2022

सम्बन्धों के मायाजाल.......

बड़े मोहक होते हैं ये रिश्ते, ये नेह के बन्धन, ऐसे बांधते हैं, ऐसे लपेटे में लेते हैं कि गर्भ में उल्टे लटके जो बड़े बड़े वायदे भगवान जी किये थे कि बस एक बार इससे बाहर निकालो फिर तुम्हारा गुणगान करूंगा, क्षणभर भी तुम्हें नहीं भूलूंगा।पर जैसे ही धरती का स्पर्श हुआ, मां की स्नेहिल गोद और पिता का वटवृक्ष सा साया मिला, भाई बहिनों का स्नेह मिला, बाबा दादी ताऊ ताई चाचा चाची नाना नानी मामा मौसी ने दुलराया, ये संसार ऐसा भाया ऐसा भाया कि बस यहीं के हो के रह गए। फिर तो जो जो वायदे कर आये थे, उसका छटांक भर भी याद नहीं रहा।,सब का सब कपूर सा उड़नछू हो गया।

      बस वह प्यारा सा घर ही दुनिया बन गया।स्कूल गये तो नये नये दोस्त बने,पर समय के बहाब में सहपाठी पीछे छूटते चले गये, मास्टर मास्टरनी भी स्कूल से कॉलेज में प्रवेश लेते वक्त की धुंध में न जाने कहाँ खो गये।अडोस पड़ोस के न जाने कितने कितने रिश्ते थे जिनसे इतना लगाव हो गया था कि इनके बिना कैसे रह सकेंगे।बचपन की सखियां जिनकी गलबाहीं डाल पैया पैया स्कूल जाते थे ,सब पीछे रह गए।नये नये सम्बन्ध जुड़ते चले जाते और पिछले न जाने किन गलियों में विलोप हो जाते।फिर एक दिन दीदी की शादी हो गई, उनका घर दूसरा हो गया तो बड़ी कोफ्त होती कि घर तो ये है दीदी का पर सब ये क्यों कहते रहते हैं ...चलो लड़की अपने घर में खुश है। तो इस घर में वे कौन सी दुखी थी।यहां तो सब अपने थे।जन्म के साथी थे।

      दो दीदी की शादी और घर में भाभी आने के बाद ये तो पक्का हो गया कि लड़की की जात में जन्मे हो बेटा तो ये घर तो छोड़ना ही पड़ेगा चाहे पिनपिनाओ या भुनभुनाओ।ये गलियां ये चौबारा यहां आना न दोबारा हम तो भये परदेशी कि तेरा यहां कोई नहीं गाने की धुन पर डोली में बैठ चल दिये बाबुल के घर से ससुराल को।फिर सब पीछे छूटता रहा, समय समय पर जाते रहे पर सच तो यह था कि अब पराये तो हो ही गये थे। जमे हुए पौधे की जड़े एकदम तो दूसरी जगह नहीं जम जाती ,कुछ समय तो लगता ही है।फिर वही  घर अपना हो जाता है।तो जैसे जैसे आगे बढ़ते जाते हैं, कुछ नए रिश्ते जुड़ते हैं, कुछ पिछले पक्के होते जाते हैं।जिन्हें खाद पानी न मिले, वे मुरझा जाते हैं और एक दिन दम ही तोड़ देते है।तो कुछ टूटे, कुछ से छद्म आवरण हट गया जैसे बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है।कुछ मतलब के थे सो काम निकलते ही मानो किसी गुफा में जाकर छिप गये।लंबी दूरी तक वही साथ चल सके जो दिल से जुड़े थे, मानस में कहीं गहरे पैठे थे।

      कितनी कितनी तह और परतें होती हैं रिश्तों और सम्बन्धों की, इस यात्रा में कितने कितने पड़ाव आते हैं, कितने साथ जुड़ते हैं,कितने बीच में छूट जाते हैं या छोड़ दिये जाते हैं।रक्त के रिश्ते, कोख के रिश्ते, परिवार के रिश्ते, ससुराल के रिश्ते,सामाजिक सम्बन्ध, दोस्ती के सूत्र, नौकरी के साथी ,ओहदे/ पद के सम्बन्ध, आभासी जगत के सम्बंध, काम काज से जुड़े परिचित अपरिचित सभी संपर्कों और सूत्रों में स्वयम को बेलाग रखना है तो थोड़ा कठिन पर यदि ये निभाव आ जाये तो जीना आसान हो जाता है।व्यक्ति से व्यक्ति का सम्बंध जुड़ा रहे, वह स्थिति सर्वश्रेष्ठ होती है।घर परिवार तो अपना होता है। वहां आप मानो न मानो पर पक्की मुहर लगी होती है।निभाना तो उन्हें होता है जिन्हें आप स्वयम चुनते हैं। और जब चुना तो निभाव की जिम्मेदारी भी आपकी ही होती है।कितने कितने लोगों के मध्य रहते आप अकेले होते हैं और अकेले होते भी हरि भाव में भरे पूरे होते हैं।जो अपने हैं वे तो हैं ही, पर जिनका साथ मिला ,उनमें भी अपनापन खोज सके तो कैसा अच्छा हो।सब नाते मतलब के ही नहीं हुआ करते।कुछ को यूं भी सहेजा जाता है।तो आये अकेले थे पर जुड़ते जुड़ते कारवां बन गया और जाएंगे जब तो अकेले ही जाना है, बाकी यहीं का यहीं छूट जाना है।जितना निभे निभाते चलो, साथ तो किसी को भी नहीं जाना होता।

जो दिल खोजा आपना

 सफर जारी है...965

16.06.2022

जो दिल खोजा आपना.......

आत्ममंथन तो कबीर बरगे लोग करते हैं जिन्हें अपनी और दुनियां की चिंता एक साथ होती है।जो कभी बीच बाजार लाठी लेकर खड़े हो जाते है, सबको नसीहत देते हैं तो कभी डांट फटकारते हैं।कबीरा खड़ा बाजार में लिए लुकाठी हाथ जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ, अब अपने घर को कोई क्यों फूंके भला तो कबीर अकेले के अकेले खड़े रह जाते हैं लेकिन अकेले ही भीड़ पर भारी पड़ते है, एक एक को चुन चुन के निशाना बनाते हैं, छूट किसी को नहीं है।कांकर पाथर जोड़ के मस्जिद लई बनाए, तापर मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय कहते हैं तो माला फेरने वालो को भी नहीं बख्शते।माला तो कर में फिरे जीभ फिरे मुख मांहि, मनवा तो चहुँ दिशि फिरे ये तो सुमिरन नाहि या बकरी पाती खात है ताकी मोटी खाल, जे जन बकरी खात हैं तिनको कौन हवाल।दैनन्दिन जीवन में कबीर इतने हाबी रहते हैं कि दुनिया से मन उचट जाए तो कबीर याद आते हैं, सुख दुख हो तो कबीर मानस पर छा जाते हैं।जीवन की नश्वरता देखनी हो तो कबीर पोथी खुल जाती है।राम को भजना हो तो कबीर, जीवन की उलटवासी में कबीर ,भजन गायें तो कबीर,दोहों में कबीर,सबद में कबीर, निर्गुनी गाने हो तो कबीर ,पूरा जगत सियाराम मय सब जग जानी की तर्ज पर कबीरमय हो गया है।

और हो भी क्यों न, कबीर हैं ही इतने सशक्त व्यक्तित्व, उनसे ही तो सीखा कि जन्म भले ही जिस परिवार में, उन्नति और तरीके के रास्ते खोजे जा सकते हैं, काम कोई छोटा बड़ा नहीं हुआ करता।रैदास जूते गांठते और कबीर जुलाहागीरी करते कपड़े बुनते उसी में से जीवन का सच ग्रहण कर लेते हैं।दास कबीर जतन ते ओढ़ी ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया, बीनी रे बीनी चदरिया।जो मर्जी माता पिता हो उन्हें क्या करना, नीरू नीमा हों तो भले विधवा ब्राह्मणी की संतान हो तो ठीक।व्यक्ति के कर्म उसे छोटा बड़ा बनाते हैं ।हां जब अपना परिवार बसाया तो कमाल कमाली को सुयोग्य बनाया, लोई के साथ सद्गृहस्थ बने रहे, परिवार को छोड़ के ज्ञान के लिए बोध पाने के लिए इधर उधर नहीं भटके।रैदास ने तो कठौती में ही गंगा प्रकट कर दी और एक किवदन्ती बन गई कि जो मन चंगा तो कठौती बीच गंगा।

कबीर को पढ़ना नहीं गुनना और जीना होता है फिर वे बात बात पर बिना प्रयास के प्रकट होते रहते हैं।हरि भक्ति की बात हो तो प्रेम की रीत बता देते हैं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहि, प्रेम गली।अति सांकरी जामे दोउ न समाय।भजो तो मन से भजो ये माला फेरने, तिलक छापे लगाने, जोगिया वस्त्र पहनने, बार बार नहाने से भगवान मिला करते तो अब तक तो सबको मिल जाते।तुम्हारी तो भजन करने की रीत ही न्यारी है दुख में भजते हो सुख में भुला देते हो, जो हमेशा भजो, उसके ध्यान में बने बने रहो तो दुख होय ही क्यों।दुख में सुमिरन सब करें दुख में करे न कोय, जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे होय।जीवन की नश्वरता समझ लोगे तो सब अभिमान चूर हो जॉयेगा, रोज इतनो को श्मशान जाते देखते हो फिर भी समझ नहीं पाते।पत्ते से ही ज्ञान ले लो पत्ता टूटा डाल से ले गई पवन उडाय, अब के बिछड़े कब मिले दूर पड़ेंगे जाय।तो मिल जुल के रहो, काहे ऐंठे से रहते हो मुंह फुलाते पड़े रहते हो, कुछ साथ नहीं जाना।जिनसे रूठे मटके रहते हो उनसे मिलने के लिए भी तरस जाओगे।

तो बाबलो ,कम से कम कबीर जयन्ती पर तो उनका स्मरण कर लो।उनके दोहे ही बांच लो, निर्गुनिया गा लो...दो पल का है डेरा अकेले जाना है, ये है जोगी वाला फेरा, अकेले जाना है।संतो भाई, आई ज्ञान की आंधी, भरम की टाटी सबे उड़ाने माया रहे न बांधी ही याद कर लो।अरे उन जैसे बड़े नहीं बन सकते तो उनके अनुयायी ही बन लो।कुछ भी करो पर उनके दो चार दोहे तो जीवन में उतार ही लो।तभी नैया पार लगेगी।

Tuesday, July 19, 2022

हंसते रहो मुस्कराते रहो

 सफर जारी है.....962

13.06.2022

खुशियां पैसों की मोहताज नहीं हुआ करती।अरे हंसने मुस्कराने में कौन पैसा लगता है।वैसे भी सब बिकाऊ ही नहीं हुआ करता।जिन्हें खुश रहना आता है वे अभाव में भी के प्रसन्न रहने के अवसर खोज लेते हैं।याद आती है उस राजा की कहानी जो बीमार हो जाता है और वैद्य जी उसके रोग का इलाज एक खुश मिजाज व्यक्ति की कमीज पहनना बताते है।खुश व्यक्ति की खोज शुरू होती है और आश्चर्य की बात तो यह निकली कि जो सदा प्रसन्न और मस्त रहता था उसके पास कमीज तो छोड़ो, फ़टे चिथड़े भी नहीं थे।वह नङ्गे वदन ही मस्त था।यदि सुख और प्रसन्नता वस्तु में होते तो अमीर तो कभी दुखी ही नहीं होते।पर सारे भौतिक संसाधनों के बाद वे बीमार दुखी और अप्रसन्न है।आरामदेह विस्तरों पर एसी कमरों में भी उन्हें नींद नहीं आती, खाने के लिए बहुत कुछ है उनके पास लेकिन भूख गायब है।जो थोड़ा बहुत खाते हैं उसे पचाने के लिए मुठ्ठी भर गोलियां फांकनी पड़ती है।वर्जिश व्यायाम की ढेरों मशीनें  खरीद कर घर में ही जिम तो तैयार कर लिया गया  है पर कसरत का समय ही नहीं मिलता।

भूख नींद कोई भोजन और विस्तर पर निर्भरथोड़े ही हुआ करती है।भूख में तो किवाड़ भी पापड़ लगते हैं और नींद ठौर नहीं देखा करती।जब आती है तो पत्थर पर भी आ जाती है, गर्मी सर्दी में भी आ जाती है।जिन्हें खुश रहने की आदत होती है वह हंसने मुस्कराने की कोई भी वजह खोज लेते हैं और जो रोतड़े हैं उन्हें सब कुछ होते सोते भी रोने झींकने से फुर्सत नहीं मिला करती।वे भरे गिलास पानी और परसी थाली में भी कोई न कोई नुस्ख निकाल लेते हैं।जो पास है वह आंख तर नहीं आता और पराई थाली का भात सदैव मीठा लगता है।दुखी होने के ऐसे ऐसे कारण खोज लाते हैं जिनके सिर पैर ही नहीं होते।अपना आत्मविश्लेषण करें न करें पर दूसरों के काम में नुक्ताचीनी निकालते रहते है।धीरे धीरे यह वृत्ति उनके स्वभाव का अंग बन जाती है।

          अरे भाई हंसो ,खिलखिलाओ ,ठहाके लगाओ देखो मन प्रसन्न रहता है या नहीं।दुख कष्ट तो अपने रास्ते जाता है पर उसी के विषय में सोच सोच कर हम स्वयम को खूब परेशान कर लेते हैं।बिल्कुल भूल जाते हैं धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा फल तो ऋतु पर होय।और यदि हमारे रोज शोक मनाने,रोते झींकते रहने से यदि दुख वाकई में कम होते हों या मन को तसल्ली मिलती हो तो खूब रोओ,खीझो, झींको, किसी को क्या परवाह।बस तुम आप ही धीरे धीरे मन से कमजोर होते जाओगे, अच्छा सोच ही नहीं पाओगे।तो निर्भर तुम पर करता है कि तुम बड़े से बड़े दुख को कष्ट को हंसते मुस्कराते झेल जाओ या उसे पानी छिड़क छिड़क कर और बोझिल कर लो, विकल्प तुम्हारा है।जिंदगी मिली है तो उसमें फूल और कांटे दोनों होंगे ही।और जो तुम्हें ये लगता है देखो सामने वाला कितने आराम से है तो उसके कष्टों से आपका साबका नहीं पड़ा।आप किसी के लिए अपने मन में कुछ भीसोचने के लिए स्वतंत्र हैं पर वह सब सच और यथार्थ हो, यह आवश्यक नहीं होता।तो अपनी खीझ, गुस्सा ,झींकना ,हमेशा तनाव में बने रहना,चौबीस घण्टे टेन्स रहना को छोड़ो भाई, चीजें अपने आप बदलती हैं, समस्याएं उतनी बड़ी भी नहीं होती जितना हम अनुमान लगा बैठते हैं।और मान लो है भी तो मुंह सुजाये बैठे रहने से कौन कम हो जाएगी।उपाय खोजो, चिंतन करो, रास्ते निकालो ।हंसी खुशी रहो।जानते हो ये हंसना मुस्कराना समस्याओं की विकरालता को कम कर देता है और हम आसानी से उसके समाधान खोज पाते हैं।

साँच को आंच कहां

 सफर जारी है....961

12.06.2022

बड़ी बड़ी बातें पुस्तकों की शोभा होती हैं लेकिन जब जीवन का यथार्थ बनती हैं तो भरी सर्दी में पसीने छूट जाते हैं।सत्य की औकात पता चलती है जब राहगीर भी व्यंग्य कस देता है देखो ये बड़े सत्यवादी बनने चले हैं ।अरे भाई तब सतयुग था तो हरिश्चन्द्र की वक़त थी, अब जहां चोर चोर मौसेरे भाई हों ,सब आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हों तब सत्य का उद्घोष करना मजाक सा लगता है।एक तरफ पहरेदार को जागते रहो की ड्यूटी पर लगा दो और दूसरी तरफ चोरों को घर का रास्ता दिखा दो।कक्षा में सच्चा बालक की कहानी पढाओ और जब बालक सच बोले तो उसे कहो सच के जमाने लद गये, अब ऐसा नहीं होता।दूध में पानी मिलाए बिना घोसी का काम नहीं चलता, सौ में दस झूठ मिलाना तो सामान्य बात है।जब सोना ही चौबीस कैरट शुद्ध नहीं होता तो बाकी का क्या।

सदा सत्य बोलो की खुश्कत और इमला तो खूब लिखवाई जाती रही, पाठ के प्रश्न उत्तर रटाये जाते रहे, सही लिखने पर झोली भर अंक दिए जाते रहे लेकिन जैसे ही उसे व्यवहार में लाना शुरू किया ,सबकी नजर ही बदल गई।अब कहा जाने लगा किताबी पढाई और जीवन जीने के अंतर को पाटा नहीं जा सकता।नियम हमेशा दूसरे के लिए होते हैं और अपवाद अपने और अपनों के लिए।क्यों भाई ये कौन सा गणित है।अभी तो सिखाया था दो और दो चार होते हैं और अब पार्टी बदलते ही दो और दो पांच कैसे हो गए, काली कामर पर दूसरा रंग नहीं चढ़ता पर यहां तो सब रंग चढ़े जा रहे हैं।कल जब तक बेटी ब्याहनी थी ,नियम आदर्श कुछ और थे और अब घर में बहू के लिए सब नियम पलटा खा गए।ये तो कोई बात नहीं हुई मित्रो।ये तो सरासर चालबाजी है।अब ऐसे कितने दिनों तक बात को मूंद कर रखोगे, कभी न कभी तो भंडाफोड़ हो ही जायेगा।याद रखो

काठ की हांडी चूल्हे पर बार बार नहीं चढ़ा करती।अरे भाई सच को कब तक परदों में छिपाए रखोगे।सच तो सूर्य सा दीप्त होता है।सारे अंधकार को चीर कर सामने आ जाता है।वह किसी के रोके नहीं रुकता।

लाख कहते रहो तुम कि अब जमाना बदल गया है पर कान खोल के सुन लो बाबू, नैतिक मूल्य तो शाश्वत होते हैं, उन्हें

अदला बदला नहीं जा सकता।अरे झूठ के पैर नहीं होते तो नहीं होते, वह क्या और कैसे टिकेगा सत्य के आगे।हां, इतना सच है कि सत्य हारे न हारे पर परेशान बहुत होता है।अधैर्यशाली जल्दी साहस छोड़ देते हैं, जल्दी से पाली बदल लेते हैं और मोहक असत्य की टीम में जा खड़े होते हैं । सत्य को दुत्कारते और धता बताने लगते हैं।अब चमकना है तो तपना  होता है, सोना आग में तप कर ही कुंदन बनता है।जब निखरना है तो मुसीबत से भय क्यों खाते हो, जल्दी से हाथ पैर क्यों छोड़ देते हो, हाय हाय क्यों करने लगते हो।ऐसे क्या मोम के बने हो जो जरा सी गर्मी पाते ही पिघल जाओगे।मजबूत बनो, कठिनाइयों से भागो मत, उन्हें फेस करना सीखो, उनका सामना करो, रास्ते खोजो, उपाय सोचो।ये क्या कि जरा सी मुसीबत आई नहीं कि फें फें रोना शुरू कर दिया, हाथ फैलाये सहायता मांगने चल दिये नहीं तो काम बीच में ही छोड़ के भाग आये कि हमसे नहीं होगा भाई, हमारे बूते का नहीं है।अरे दूसरा तीसरा जो भी करेगा उसके क्या चार हाथ पैर होंगे, उसके पास दिन में चौबीस घण्टे से अधिक का समय होगा।नहीं न, वह भी तुम्हारे जैसा मानुस ही होगा।बस फर्क इतना है कि तुमने हथियार डाल दिये हैं और अगले ने हौसला छोड़ा नहीं है।

सच की ताकत आजमा कर तो देखो पर सच निखालिस सच होना चाहिए, कोई मेल मिलावट नहीं, कोई धोखाधड़ी नहीं, कोई बेईमानी नहीं।बस सच्चे मन से शुद्ध मन से अपना काम किये जाओ, देर सबेर सफलता मिलेगी जरूर।।     

       आज मिलने आये युवा प्राध्यापको की आंखों में भविष्य के सपने बहुत साफ दिखे। बस उनकी लगन धीमी न पड़ जाए।वे थोडे कष्ट मुसीबत आते ही हाय हाय न करने लगे, अपने लक्ष्य से दूर न हो जाये, सत्य पर डटना जरूरी है।पूरी कायनात आपको डिगाने में सारी शक्ति लगा देगी।देखना है उनके साहस को, शक्ति को, धैर्य को, लगन को कि वे कितनी दृढ़ता से सब अलाय बलाय का सामना करते हैं।बस आंच कभी नहीं होती।सत्य परेशान हो सकता है पर अंततः विजयी होता ही है।

बड़े न बोले बोल

 सफर जारी है....960

11.06.2022

बड़े न बोले बोल

अक्सर हम व्यक्ति को उसकी पढ़ाई लिखाई, उसके पद ओहदे, उसके मान सम्मान, उसकी धनसंपदा से तौलते हैं।उसके गुणों पर हमारी दृष्टि कम ही जाती है।जबकि गिरधर की कुण्डलिया कहती है गुन के गाहक सहस नर बिन गुन लहै न कोय।गुणों को कहना नहीं पड़ता, वह तो आपके व्यवहार, स्वभाव और व्यक्तित्व से स्वयम ही परिलक्षित हो जाते हैं।जो वास्तव में बड़े होते हैं, वे बड़े बड़े काम चुपचाप कर जाते हैं, उसका ढिंढोरा नहीं पीटते।आत्म प्रचार और प्रदर्शन में उनकी रुचि नहीं होती।वे जैसे हैं उसी रूप में उपस्थित हो जाते हैं।छद्म नहीं ओढ़ते।उनकी सादगी, सरलता, तरलता आपको ऐसे बांध लेती है कि बस आप उसके स्नेह के मुरीद हो जाते हैं।

सद्गृहस्थ होना सबसे बड़ा गुण है।वह अपने दायित्वों से दूर नहीं भागता,बल्कि निष्ठा से उनका पालन करता है।स्वयम उपार्जित धन से सभी आश्रितों की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।उसकी निष्ठा केवल पारिवारिक सदस्यो तक ही सीमित नहीं हुआ करती, बल्कि अडोस पड़ोस के साथ पशु पक्षी आगन्तुक सभी उसकी पारिवारिक परिधि में आते हैं।वह सभी के लिए स्नेहिल होता है।भोजन को भाव से पकाता है और उसे मिल बांटकर खाता है।गाय ,कुत्ते, पक्षी, भिक्षुक, अभ्यागत का अंश प्रतिदिन निकाला ही जाता है।भोजन और भजन में भाव बहुत प्रभावी है।जैसा खाओगे अन्न वैसा होगा मन में भोजन की गुणवत्ता से अधिक प्रभावी भाव है।भोजन जिस भाव से पकाया और परोस कर खिलाया जाता है, खाने में वैसा ही आनन्द आता है।और यदि भोजन प्रभु को अर्पित कर उसे प्रसादी समझ कर ग्रहण किया जाय तो उसका स्वाद कई गुना बढ़ जाता है।

जीवन की भाग दौड में सबसे जरूरी भोजन ही उपेक्षित हो रहा है।उसे इतनी भगदड़ में खाया जाता है कि जैसे सारी देरी इसी के कारण हो रही हो।हम सारी ऊर्जा जिस धन के अर्जन में लगा देते हैं, उस ऊर्जा के पुनः संचयन के लिए भोजन बहुत जरूरी है, पौष्टिक भोजन जरूरी है और उसे तरीके से ग्रहण किया जाना भी।आप कितने भी अधिक व्यस्त हों, आपको घरेलू कामकाज निबटाने का समय नहीं मिलता हो, तो उसके लिए आप सहायक की खूब मदद लेते रहिये लेकिन भोजन जिस भाव से आप बनाते और परोस कर खिलाते हो, उस भाव को अनदेखा नहीं किया जा सकता।क्यों बार बार मां के हाथ के खाने के स्वाद को याद करते हम उसका विकल्प नहीं खोज पाते ,रेस्तरां आपको घर जैसा खाने का प्रलोभन देते हैं जिससे आप उस के प्रति आकर्षित हो खिंचे चले जाते हो।कहां से आता है भोजन में स्वाद, क्या केवल तेल मसाले और मंहगे उत्पाद उसे स्वादिष्ट बना पाते हैं। ये उसके आवश्यक घटक भले ही से हो, पर भोजन में स्वाद तो भाव का प्रधान होता है।और कहीं वह भोजन प्रभु का भोग हो, उसे प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाए तो और सोने में सुहागा।

जीवन में सद्गुणी व्यक्तियों से मिलना आपको बहुत सम्पन्न बना देता है।आप बड़भागी होते हैं जब ऐसे संत स्वभावी लोगों से आप मिल सके, उनके सान्निध्य में कुछ समय बिता सकें, उनकी सकारात्मक ऊर्जा से अपने को चार्ज कर सकें और जीवन जीने के कुछ टिप्स ले सकें।कुछ सीख सकें कि काम शांति और सहजता से ज्यादा आसानी से निपटाये जा सकते हैं, धैर्य बनाये रखना जरूरी होता है, बात को दृढ़ता और विनम्रता से भी रखा जा सकता है।कोई जरूरी नहीं कि आप हमेशा सप्तम स्वर में चिड़चिड़ाहट और कड़वाहट के साथ ही बोलें।उच्च ओहदे के साथ साथ आपके व्यवहार की समरसता, आपका सौहार्द ,आपकी विनम्रता सामने वाले को सहज रखती है।मैं भाग्यशाली हूँ कि मेरे परिकर में मेरे इष्ट मित्रों में ऐसे व्यक्तित्वों चरित्रों की संख्या अच्छी खासी हैं जिनसे मिलकर मन प्रसन्न हो जाता हैं, मैं स्वयम को ऊर्जस्वित और चार्ज अनुभव करती हूँ।ऐसों से कुछ क्षणों की मुलाकात रास्ते की थकान को उड़नछू कर देती है ।ऐसे सत्पुरुष तो बिना दिए ही बहुत कुछ दे देते हैं और कहीं आपको उनके हाथों प्रसाद पाने का सौभाग्य और मिल जाए तो अपने को बड़भागी मानना तो बनता है।हम आप जब किसी के प्रति बहुत दयार्द्र होते होंगे तो अधिकतम अपनी जेब ढीली कर बाजार से कुछ खरीद लेते होंगे पर अगले को भोजन समय होने पर घर से बना कर लाया भोजन प्रेमभाव से खिलाना तो हम सबके बूते का नहीं ही हुआ करता।ऐसे सज्जनों से मुलाकातें हमें बहुत कुछ सिखाती हैं बशर्ते सीखने का मानस तो हो।बने रहें ये प्रकाश स्तम्भ जिंदगी में, इनके प्रकाश से हम भी दिपपदिपाते रहेंगे।रहीम बहुत याद आते हैं... बड़े बड़ाई न करें बड़े न बोलें बोल, रहिमन हीरा कब कहे लाख टका मेरो मोल।

ऊर्जा और उत्साह के स्रोत हैं त्योहार

 सफर जारी है.....959

10.06.2022

मनुष्य उत्सव धर्मी है।सात वार में आठ त्योहार मनाने वाले हम भारतीयों का मानस त्योहार का नाम सुनते ही कैसा हरिया जाता है।फिर चाहे वे राष्ट्रीय हों, सामाजिक हों, सांस्कृतिक हों या आयातित हों।हमें तो इसी ब्याज में स्वादिष्ट सुस्वादु पकवान खाने बनाने को मिल जाते हैं और एक के साथ फ्री की तर्ज पर आध्यात्मिक और नैतिक प्रसंग, सन्दर्भ और कथाएं भी थोक के भाव मिल जाती हैं।हर बरस इन कथाओं को दोहराते हम अपने को समृद्ध और जागरूक करते रहते हैं।कथा के अंत में जोड़ी गई टिप्पणी जैसो भगवान ने बाको करो, बाकी लाज राखी, ऐसो सबको होय, के भाव से सबके सुखी स्वस्थ और प्रसन्न रहने की दुआ और प्रार्थना करते रहते हैं।अभी अभी इसी जेठ माह में वट मावस मनाई ,आज गंगा दशहराऔर कल निर्जला एकादशी का पर्व है।सुराही, घड़े, पंखे और मौसमी फलों आम खरबूज तरबूजों के बाजार सज गए हैं।

नदियां हमारा जीवन हैं, वे पूज्य हैं, हम भारतीय गंग जमुनी सभ्यता के पोषक हैं।गंगा अवतरण की कथा से हम परिचित हैं कि भगीरथ कठोर तप कर गंगा को धरती पर लाये क्योंकि राजा सगर के साठ हजार पुरुखों को तारने के लिए यह जरूरी था।वे तप के बल पर गंगा को धरती पर लाने में सफल तो हुए पर वेगवती गंगा की तेज धार यदि सीधे धरती पर गिरती तो सब पाताल चले जाते, कोई बचता ही कहाँ तो आशुतोष, देवाधिदेव भोलेनाथ से प्रार्थना की गई प्रभु आप संभालो, भोले भंडारी तो नीलकण्ठ हैं, अपने भक्तों के लिए कालकूट विष भी गटक जाते हैं, सिर पर अर्ध चन्द्र धारण करते हैं, तन पर भभूत रमाये रहते हैं सर्पों की माला कंठ में पड़ी रहती हैं,नंदी उनकी सेवा में रहता है चूहा पुत्र गणेश है वाहन है तो मयूर दूसरे पुत्र कार्तिकेय का, पत्नी गौरा शेर पर विराजती हैं, शिव परिवार तो अपने अनोखे पन के लिए ही जाना जाता है तो महादेव गंगा को भी सिर पर धारण कर लेते हैं और जटाजूट की एक लट खोल देते हैं कि गंगा भगीरथ के पीछे पीछे  होकर गुजरे कि सबका कल्याण हो सके।गंगा को पृथ्वी पर लाने का प्रयास ही उन्हें भगीरथ बना देता है और वे एक मिसाल बन जाते हैं। भगीरथ प्रयास,भीष्म प्रतिज्ञा तो जनमानस के आदर्श हैं।

               नदियों में स्नान करने से पूर्व उनकी पूजा आराधना की जाती है, उन्हें स्वच्छ बनाये रखने की प्रतिबद्धता हमें याद रही होती तो आज नदी को जानो जैसे प्रकल्पों का आयोजन करने की जरूरत नहीं पड़ती।हम प्रकृति का दोहन करने में इतने मशगूल हो गए कि यह भी याद नहीं रहा कि कम से कम उस डाल को तो नहीं काटे जिस पर बैठे हैं।वह प्रकृति जो हमें जीवन भर कुछ न कुछ देती रहती है उसके प्रति भी हम कृतघ्न हो गए, परिणाम हमारे सामने हैं।हम कविता ही भुला बैठे....प्रकृति हमें देती है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखें।सूरज हमें रोशनी देता, हवा नया जीवन देती है, भूख मिटाने को हम सबकी धरती पर खेती होती है, दूसरों का भी हित हो जिसमें हम कुछ ऐसा करना सीखें, हम भी तो कुछ देना सीखें।खूब पढ़ते पढ़ाते रहे कि नदियां अपना जल नहीं पीती, पेड़ अपना फल नहीं खाते,संत तो परोपकारी होते हैं, वे अपना जीवन परार्थ में ही लगा देते हैं।दधीचि से लेकर शिवि तक की दीर्घ परम्परा है हमारी।हम याद क्यों नहीं रख पाते, सब भूलभाल कैसे जाते हैं।

               तब लगता है ये वार तोहार याद दिलाने के सूचक ही तो नहीं है।हम इनके ब्याज से ही सही,अपनी समृद्ध परंपरा को पूजें।हम प्रकृति पूजक बने रहें, उनका अंधाधुंध दोहन न करें।जंगल बचे ही कहाँ अब, नदियों को हम पहले ही प्रदूषित कर चुके, वायु तक शुद्ध नहीं बची, पानी बोतल में समा गया, अब कितना और गिरेंगे हम।सब कुछ नाश करने पर तुल गए क्या।तालाब हमने पाट दिए, नदियां हमने दूषित कर दी, जंगल काट दिए,पर्यावरण संतुलन को बिगाड़ने के दोषी हम हैं तो आखिर कब सुधरेंगे हम।आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या छोड़ा हमने, पीने को पानी नहीं होगा और सांस लेने को शुद्ध हवा तो कैसे बचेगा उनका जीवन।कैसे भी जिस किसी ब्याज से बात समझ आ जाएं, समझ लेनी चाहिए।अभी कम से कम सचेतक तो हैं जो हमें हर पल जागरूक कर रहे हैं, कर्तव्यों के प्रति आगाह कर रहे हैं, अभी भी चेत जाओ, ये समय भी खो दिया तो केवल और केवल पश्चाताप शेष रह जॉयेगा, सिर धुनना शेष रह जॉयेगा, कुछ हाथ नहीं आएगा।

               तो पर्व के महत्व को समझो, अपनी सांस्कृतिक परम्पराओ को जानो कि आखिर मौसमी फलों को दान देने उन्हें खाने, गेहूं की कौमुरी बनाने के संदर्भ क्या केवल मुंह के स्वाद बढ़ाने के लिए हैं या इनके सन्दर्भ और भी हैं।ये दशहरा मात्र खरबूज तरबूज का नहीं, नदियां स्नान करने लायक बची रहें, ये कवायद जरूरी है।हम बाथ टबों में इतने मशगूल न हो जाएं कि जल के प्राकृतिक स्रोतों को ही भुला बैठें।जाग मुसाफिर जाग, अब जागन की बार।

असल परीक्षा तो अब है

 सफर जारी है...958

09.06.2022

पढ़ते पढ़ाते परीक्षा देते लगता था कि इससे बड़ा और कोई काम हो ही नहीं सकता और जब रिजल्ट निकलता और कहीं पास हो जाते तो सोचते हमने जग जीत लिया।कुछ अंको की बढ़त रिजल्ट कार्ड को शोभनीय बना देती और पहला दूसरा स्थान पाने पर बहुत विशेष बन जाते।मैया बलैया लेते नहीं थकती थीं और पिता कम से कम सौ पचास लोगों के मध्य इस समाचार को कह कबा नहीं लेते तब तक उनकी रोटी नहीं पचती थी।जब ये किताबी पढ़ाई खत्म हुई और बी ए एम ए, बीएड एमएड पीएचडी सब कर करा ली तो बड़े खुश हुए कि चलो ये परीक्षा का दौर तो गुजरा।पढ़ लिख कर तैयार हुए तो जीवन की सबसे जरूरी बात चाई माई कर दी गई क्योंकि सीखे गए ज्ञान की असली परीक्षा तो अभी बाकी थी।वो रात भर रट्टा मार मार कर कॉपी भर लिखने की परीक्षा से पिंड छूटा तो लगने लगा था कि चलो अब परीक्षा से छुट्टी हुई।हमें क्या पता था कि इससे बड़ी परीक्षा तो अभी बाकी है।वहां कम से कम तीन घण्टे लिख लिखा कर हाथ में रिजल्ट कार्ड आते छुट्टी तो मिल जाती थी पर इस परीक्षा में न तो रट्टा काम आता था और नकल की तो रत्ती भर गुंजायश न थी।और मजे की बात कि कोई अंक नहीं कोई रिजल्ट नहीं, बस बात बात पे ताने उलाहने कि ये भी  नहीं आता, वह भी नहीं आता।।समझ ही नहीं आता था कि ये कौन से प्रश्न हैं जो रोज नए नए तरीके सेआ खड़े होते हैं।स्कूल कालेज की परीक्षा में एक प्रश्न भी आउट आव सिलेबस आ जाता तो विद्यार्थी मार हंगामा मचा देते कि पेपर आउट ऑफ सिलेबस आया है और परीक्षार्थियों के भविष्य को ध्यान रखते अंकों में विशेष ढील दे दी जाती, सब पास कर दिए जाते, गेंहू के साथ खतुआ बथुआ को भी पानी लग जाता।

तब साल में दो छोटी आंतरिक परीक्षा और एक वार्षिक परीक्षा होती उसी में दादी नानी सब याद आ जाती और अब तो रोज ही परीक्षा सी होती, सारे के सारे प्रश्न आउट ऑफ सिलेबस, हंगामा तो दूर की बात, चूं भी नहीं  कर सकते थे और सारे प्रश्नों के उत्तर में बड़ा सा गोला मिलता।बहुत कोफ्त होती एक तो इतने कठिन कठिन प्रश्न हल करने को दे दिए जाते और उस पर कोई छूट भी नहीं मिलती।असफल होने पर ऐसी बेइज्जती होती और वह भी सरे आम कि बस बार बार स्कूली परीक्षा को याद कर रो लिया करते।समझ ही नहीं आता था कि ये पढाई नई थी कि हम ही घबराहट में सब भूले जा रहे थे, प्रश्नों का उत्तर देते हकलाते लगते।रोज रोज की असफलता से सारा आत्मविश्वास चुक सा गया लगता था।उन परीक्षाओं से उबरते तो क्या पर धीरे धीरे आदत में आ गया कि भाई अब फर्स्ट सेकंड आने के सपने छोड़ो, अब तो सप्लीमेंट्री और ग्रेस मार्क्स के भी लाले पड़ गए।हमेशा भय सा लगा रहता पता नहीं अब कौन सा नया प्रश्न पूछ लिया जाए।सारी हुशियारी धरी की धरी रह गई।माता पिता ये समझ ही नहीं सके कि इस घर का हीरा उस घर में कोयला कैसे सिद्ध हुआ।जिस प्रतिभा पर उन्हें बड़ा नाज था, जिसकी होशियारी की मिसाल दी जाती थी, अब वह औसत विद्यार्थी की श्रेणी में भी क्यों नहीं रखा जा सका।क्या पढाई बदल गई या परीक्षा के तरीके, अब सफलता इतनी दूर कैसे हो गई कि उसे छूने के लिए कई कई कोस लगातार दौड़ना पड़ता है फिर भी मिल पाने की कोई गारंटी नहीं हुआ करती।इन परीक्षाओं से उबरे तो सामाजिक और कार्यस्थल की परीक्षाएं मुंह बाएं खड़ी थी।लगता है पूरा का पूरा जीवन परीक्षाओं से भरा हुआ है।हर दिन कुछ नए प्रश्नों के साथ परीक्षा शुरू होती है,पढ़ने और दोहराने का अवसर नहीं है, बस एक समय विशेष में जो सीख लिया,वही खजाना काम आ रहा है, बहुत कुछ सिलेबस बदल गया है, अब उसकी किताबें भी नहीं मिलती, बहुत से ऐसे प्रश्न हैं जो अनुत्तरित ही रह जाते हैं, पहले का सा समय तो रहा नहीं कि दौड़े छूटे जन्मदाताओं के पास प्रश्न लेकर पहुंच गए और जब तक संतोषजनक उत्तर नहीं मिला उनसे दिमाग मारते रहे।अब स्वयम से ही सारे प्रश्नों के उत्तर खोजने होते है,कोई मार्गदर्शक भी नजर नहीं आता जो सही रास्ते सुझा सके।फिर गुरुजी की तलाश में चल निकलते हैं पर सारे प्रश्नों के समाधान तब भी नहीं मिलते।तो बस अभी तक पढाई और परीक्षा में व्यस्त हैं पहले किताबें पढ़ते थे अब लोगों के चेहरे पढ़ते हैं।पहले परीक्षाएं एक निश्चित समय और अंतराल पर होती थी अब कभी भी हो जाती हैं, कोई निर्धारित शेड्यूल नहीं है।बस अभी लिखते लिखते वाक्य भी पूरा न हो और परीक्षा की घड़ी आ जाए, कौन जानता है।तो हर क्षण परीक्षा देने का मानस बनाये रखो।

जीवन ही एक परीक्षा है, कठिन सरल सभी प्रकार के प्रश्न हैं तो तैयारी तो पूरी रखनी होती है, अब पास फेल की चिंता रही भी नहीं ।बस परीक्षा दे देंगे और दूसरी परीक्षा की तैयारी में जुट जाएंगे।जो परिणाम होगा, स्वीकार लेंगे।अपना सा कर देंगे, जो आता है लिख देंगे, बाकी परिणाम विधाता पर छोड़ देते हैं।अब सब अपने हाथ तो नहीं हुआ करता न।

रही किनारे बैठि

 सफर जारी है....957

08.06.2022

जो बाहर ही बाहर से सतह  छूकर लौट आते हैं, उनके हाथ मोती नहीं लगा करते।वे बाहरी टीमटाम से ही काम चला लेते हैं।बस उतना ही करते हैं जितने से काम चल जाए।पढ़ते भी उतना ही हैं कि बस पास भर हो जाएं।अगली कक्षा में चढ़ जाएं और बस इतने नम्बर आ जाएं कि कहीं चार पैसे कमाने का जुगाड़ हो जाए।इन्हें ज्ञान व्यान से कोई लेना देना नहीं होता।बस किसी तरह काम भर चल जाए।इसलिए वे गहरी समझ भी नहीं रखते, बस थोड़ा थोड़ा सबमें से ले लेते हैं।अपना कुछ नहीं होता, कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा।जिंदगी तो उनकी भी पार लग ही जाती है जो अधकचरे और अधभरे होते हैं ।बस इतना है कि वे छलकते खूब है, बजते भी टनाटन हैं पर गम्भीरता को अपने पास फटकने भी नहीं देते।उससे तो दूर की राम राम भली।काहे को इतना दिमाग मारे तो चुप्प ही खोल में सिमटे पड़े रहते हैं।बस जब भूख प्यास लगी, बाहर मुंह निकाला, खाया पीया और फिर अपने कुँए में जाकर बन्द हो गये।उनका आसमान कुआ ही है।वे कूपमण्डूक ही बने रहना चाहते हैं।उनके लक्ष्य ही बहुत छोटे होते हैं बस वे पूरे हो जाए, फिर उन्हें कोई चिंता नहीं।दुनिया जाए भाड़ में तान लंबी सोइये।उनके जाने सब भाड़ चूल्हे में जाए, उन्हें कोई परवाह नहीं।वे अपनी दुनिया में अगन मगन हैं।।                       अधजल गगरी छलकत जाए, थोथा चना बाजे घना जैसी कहावतें खासतौर पर उनके लिए ही बनी होती है।बस वे फूली फूली चरने के आदी होते हैं।करेंगे धरेंगे कुछ  नहीं पर लाभ और क्रेडिट पूरा का पूरा चाहिए।बस चाहिए सो चाहिए, मुंह से निकल गई सो निकल गई।

            जो गहरे उतरते हैं विषय में या पानी में, कुछ न कुछ लेकर ही लौटते हैं।फिर जिन्हें कुछ प्राप्त करने की धुन सवार होती है वे कठिनाइयों की परवाह कब करते हैं, वे दिनरात नहीं देखते, बस जी तोड़ मेहनत करते हैं और लक्ष्य को पाकर ही रहते हैं।लक्ष्य निश्चित करते हैं और उसे पाने के लिए प्रयत्नशील भी होते हैं।मुश्किल तो उनकी है जिन्होंने अपने जीवन के लिए कोई स्वप्न ही नहीं बुने और बुने भी तो शेखचिल्ली से जिन्हें व्यावहारिकता की कसौटी पर नहीं परखा, अपनी शक्ति नहीं तौली, अपने साधन नहीं देखे, उतनी मेहनत नहीं कर पाए जितनी अपेक्षित थी।उन्होंने असफलता का ठीकरा भी दूसरों के सिर फोड़ दिया।वे खुद डूबे तो डूबे पर अपने साथ सनम को भी ले डूबे।

            अब समझ आता है कबीर ने ऐसे ही नहीं लिख दिया होगा...जिन खोजा तिन पाईया गहरे पानी पैठि, हों बूडी डूबन डरी रही किनारे पैठि।जो चाह रखते हैं ,उन्हें अपनी बाजुओं पर गजब का विश्वास होता है।वे कोई दांव खाली नहीं जाने देते ।हर कदम सुनियोजित तरीके से उठाते हैं, शत प्रतिशत देते हैं, बाद के लिए कुछ नहीं छोड़ते, सब आज और अभी कर डालते हैं, कल भला किसने देखा है।उन्हें कबीर कभी भूलते ही नहीं.... काल करे सो आज कर आज करे सो अब्ब, पल में परलै होयगी बहुरि करेगो कब्ब।जो ठान लिया सो ठान लिया, फिर चाहे जितने मर्जी आंधी तूफान आते रहें, वे निरन्तर चलते रहते हैं,कोई बाधा उन्हें नहीं रोक पाती।अकेले ही चलते रहते हैं और देर सबेर मंजिल तक पहुंच ही जाते हैं।मंजिल को तो वे पड़ाव भर मानते हैं ,कुछ देर विश्राम करते हैं, शक्ति संजोते और बटोरते हैं और फिर यात्रा शुरू कर देते हैं।आते रहें आंधी तूफान, कड़कती रहें बिजलियाँ, बरसते रहे ओले, होती रहे झमाझम बरसात, वे नहीं रुकते, चलते और बढ़ते ही जाते हैं आगे और आगे।साथी मिलें तो ठीक नहीं तो एकला चलो रे।चरैवेति चरैवेति उनके जीवन का मूलमंत्र होता है।

            तो आप भी गहरे जाकर खोज लाइये उन मोतियों को जिनसे जीवन की सार्थकता होती है, डरिये मत गहरे जाने से, सारा तत्व माल तो वहीं छिपा है।और जो आज भी किनारे किनारे डर कर बैठे रहे तो कुछ नहीं होने का।चूहे की मौत मारे जाओगे।तो उठो ,जागो ,संकल्पशील बनो,बात को समझो, जो अभी भी नहीं चेते तो अवसर निकल जॉयेगा, फिर पछताने से कुछ नहीं होने का।बस हाथ मलते रह जाओगे।मन पछितैहे अवसर बीते।सो भाई मेरे, किनारे बैठ कर शेख चिल्ली के से स्वप्न मत बुनते रहो, आगे बढ़ो, हिम्मत रखो, तुम कर सकते हो, तुम्हारे अंदर अपार क्षमता है।तुम चाहो तो दुनिया को गोल गोलघुमा दो।पर चाहो तब न।जब चाहोगे तो सब संभव हो जाएगा।बस संकल्प शक्ति कमजोर नहीं पड़नी चाहिए, बाकी तो सब सध जाता है।

दीरघ दाघ निदाघ

 सफर जारी है....956

07.06.2022

जेठ की गर्मी और उस पर भी नौतपा,ऐसी प्रचंड गर्मी कि छांह भी छांह की चाह रखती है।अब जेठ से बड़ा ओहदा और किसका होगा ,रिश्तों में भी और माह में भी।ज्येष्ठ तो ज्येष्ठ है, ससुर का प्रतिनिधित्व करता है।परिवार को साथ लेकर चलता है, सबको नेह की डोर से बांधे रखता है।घर भर के बच्चों का ताऊ और बड़ा पापा है।जहां चाचा के पास सब छोटी बड़ी बातें शेयर की जा सकती हैं वहीं जेठ जी से थोड़ा पर्दा बना रहता है, वे तो बच्चों को डराने के काम ज्यादा आते हैं।कुछ गड़बड़ की तो बस ताऊजी कान खींच देंगे।सो रिश्तों की गर्माहट मौसम पर भी असर दिखा रही है।ऐसा नहीं है कि पहले गर्मी नहीं पड़ती थी कि लू नहीं चलती थी कि अंधड़ तूफान नहीं आते थे कि सबके सब सीरे में बैठे रहते थे।नहीं भाई नहीं, गर्मी तब भी थी।मौसम का चक्र है , तपेंगे नहीं तो सरसेंगे कैसे, जेठ तपेगा तभी तो आषाढ़ में बारिश का पहला लोंदा गिरेगा, मिट्टी की खुशबू नथुनों में भरेगी, धरती खूब प्यासी होगी तभी दो तीन बारिश का पानी ऐसे ही सोख जायेगी।

सो पहले तपना होता है खूब ,पसीना बहता है तभी हवा सीरी लगती है।अब गर्मी है  तो दिन भी पहाड़ सा लम्बा है और  रातें भी गर्म हैं । इतनी गर्म कि किसी को चैन नहीं पड़ रहा है,बस सब हाय हाय कर रहे हैं।जो सुविधा सम्पन्न हैं वे एसी कूलर की हवा का आनन्द ले रहे हैं और जिन्हें बिजली ही मयस्सर नहीं ,वे हाथ पंखे बीजना से बयार कर सीरे हो लेते हैं, नीम पीपल की घनी छाँब ही उनका आसरा है।पानी  छिड़क छिड़क कर घर आंगन द्वारी ठंडी रखते हैं, डेले की बर्फ को कूट काट कर उसी में चीनी बुरक चुस्की का स्वाद ले लेते हैं।क्या करें कम से कम कुछ देर को ठंडक तो मिल जाती है। इतनी गर्मी में सबके दिमाग भी बहुत गर्म हो गए हैं।क्या मानुस क्या पशु पक्षी सभी जीभ निकाले पानी पानी कर रहे हैं।ऐसी गर्मी को लक्ष्य करते लिखा गया होगा.... कहलाने एकत वसत अहि मयूर मृग बाघ, जगत तपोवन सो कियो दीरघ दाघ निदाघ।इतनी प्रचंड गर्मी कि पशु पक्षी सब आपसी शत्रुता भुलाकर जहां छाँब का टुकड़ा मिल जाता है, जो कोना मिल जाता है उसी में मिल बैठ जाते हैं, बस जान बची रहे,लड़ा भिड़ा तो बाद में भी जा सकता है।सर्प और मोर का वैर जग जाहिर है पर वैर तो तभी तक है जब तक जिंदा हैं, हिरन को बाघ भला कहीं जिंदा छोड़ता है, उसका बस चले तो देखते ही फाड़ कर रख दे।पर जब अपनी जान पर खतरा मंडरा रहा हो तब अपनी जान बचाने की पड़ती है।सो भला हो उस प्रचंड गर्मी का, उस दीरघ दाघ निदाघ का जिसने जगत को तपोवन सा बना दिया है। आपसी शत्रुता को भुला दिया है।

तो ये सच है कि दुख माँजता है, सब वैर भाव भुला देता है, समझदार बना देता है, जब खुद के हाथ झुलसते हैं ,सिर पर बेभाव के झंडे पड़ते हैं ,पीड़ा का अहसास होता है तब समझ आता है कि मार का दर्द एक सा होता है। आग सबको समान रूप से झुलसाती है, वह अमीर गरीब को नहीं देखती, उसका धर्म है जलाना। दुख की अनुभूति समान होती है पर पता नही क्यों हम अपने और दूसरे के कष्ट में अंतर कर बैठते हैं।अपना दुख दुख और दूसरे का मक्कड़ लगता है, बहानेबाजी लगता है।धूप तो सबको एक सा ही तपाती होगी, बस किसी के पास धूप से बचने का साधन है तो आड़ हो जाती है और जो इससे वंचित है वे सूर्य के प्रखर ताप को नङ्गे सिर सीधे झेलते हैं।धूप के मारे सुन्न काले हो जाते हैं।

यह भी देखा कि बहुत सुविधाओं में रहते रहते धूप ताप सहने की शक्ति कम हो जाती है।कल घर परिवार में भागवत कलश यात्रा में टीकाटीक दुपहरिया में  जहां महिलाएं, किशोरी ,तरुणी के झुंड के झुंड सिर पर कलश धरे आनन्द और उत्साह में भरे नङ्गे पैर उछलते कूदते च

ले जा रहे थे , वहीं हम जैसे पोच गर्मी के मारे बाबले हुए जा रहे थे।उनकी क्षमता उत्साह के आगे तो हम बहुत बौने सिद्ध हो रहे थे।धूप ताप तो सबके लिए बराबर था पर सब उसे अपने अपने स्वभाव और प्रकृति के संदर्भ में ग्रहण कर रहे थे ।दिमागी करतब करते भले ही सयाने बन लें पर सच में सर्दी गर्मी सहने की शक्ति तुलनात्मक रूप में शून्य थी। 

       भरी दोपहरी में चलते बस एक ही दोहा मानस में उछल कूद कर रहा है.... बैठि रहि अति सघन वन पैठि सदन तन मांहि, देख दुपहरी जेठ की छाँहो चाहति छाँह।

हे प्रभो मुझे बता दो

 सफर जारी है....955

06.06.2022

सुनते सुनाते कितना कुछ कान में जाता है और कहीं वह सब हृदयंगम हो जाए तो जीवन में कैसा बदलाब आ जाता है।फिर आप कैसे निश्चिन्त हो जाते हो, आप को किसी से भय नहीं लगता।बस सारे दिन एक ही भाव प्रधान रहता है प्रभुजी हैं न, मुझे किस बात की चिंता, वे सब संभाल लेंगे।और जब आप को यह प्रतीति होने लगती है कि ईश्वर हर क्षण मेरे साथ है,वह मुझे हर पल देख रहा है तो कुछ गलत करने का विचार तक मन में नहीं आता।हजार आँखो से देख रहा है तुझे देखने वाला, छोटी से छोटी गलती भी उसकी निगाह में आ जाती है हम भले ही उसे इस उस पर डाल अपने को दोषमुक्त सिद्ध करने की कोशिश करते रहें।जब ईश्वर में इतनी प्रगाढ़ आस्था होती है तो गलत करते शर्म आती है, संकोच भी होता है कि अरे प्रभु के सामने क्या मुंह लेकर जाऊंगा। आप हर क्षण ईश्वर से बस एक ही प्रार्थना करते हैं बस प्रभु मुझे माया के बंधनों से बचा लो।मैं तो महा अज्ञानी हूँ, कुछ जानता नहीं, बस तुम्हारी शरण आना चाहता हूँ, हे प्रभु मुझे बता दो चरणों में कैसे आऊँ।

            कितना सुंदर भजन है, बस जो ध्यान से सुनो तो उसी में खो जाओ।बाल गोपाल पाठशाला की बालिका खुशी कितने भाव में डूब कर गाती है कि बस सुनते ही जाओ सुनते ही जाओ,फिर भी मन न भरे।अक्सर इस भजन को सुनते भावमग्न हो जाती हूँ,कहीं खो जाती हूँ।भजन के बोल हैं.... हे प्रभु मुझे बता दो चरणों में कैसे आऊँ, माया के बंधनों से छुटकार कैसे पाऊं, है प्रभु मुझे बता दो।अब प्रभु जी हैं कि कुछ बता के ही नहीं देते।भजन के बोल सुनते लगता है कि भक्त ने कलेजा निकाल के रख दिया हो।बस एक और एक ही इच्छा बलबती है, प्रभु चरणों में ध्यान लग जाए और माया में बन्धनों से मुक्ति मिल जाए।मुक्त ही तो नहीं हो पाते माया के बंधनों से।।मुक्ति तो खुद प्रभु से प्रार्थना करती हैं ....मुक्ति कहे गोपाल से मेरी मुक्ति बताय,ब्रज रज उड़ि मस्तक लगे तो मुक्ति मुक्त हो जाए अर्थात जब मुक्ति को भी मुक्त होने के लिए ब्रज रजकी धूल चाहिए तो फिर हमें तो उन्हीं गलियों में चलना ही होगा जहां ब्रजराज बसते हैं चलो सखी वहां चालिए चालिए जहां बसै ब्रजराज, गोरस बेचे हरि मिले एक पंथ दो काज।वृन्दावन के राजा दोउ श्याम राधिके रानी, करम धरम जहां बटत जेबरी मुक्ति भरे तहाँ पानी।तो माया के बंधनों से छुटकार पाने का बस एक ही तरीका है कि ब्रज के बसैया के रंग में रंग जाओ, बस सीता राम जपो राधे कृष्ण भजो।

            नही आता पूजा पाठ, नहीं आती पूजा की कोई विधि तो कोई बात नहीं।वाल्मीकि तो मरा  मरा जप कर ही राम के चरित लिखने सा बड़ा काम कर गए। प्रभु कृपा ने मूर्ख वरदराज से अभिज्ञान शाकुन्तल और रघुवंश जैसा ग्रन्थ लिखा दिया।बस मन साफ और शुद्ध हो और कड़ी मेहनत हो ।प्रभु की कृपा भयउ सब काजू।बस उसका वरद हस्त बना रहे।उसकी कृपा भर हो जाए।तभी भक्त कह उठता है.....ना जानू कोई पूजन अज्ञानी हूँ मैं भगवन,करना कृपा दयालु बन्धन से छूट जाऊं।इस आवागमन के बंधन से मुक्त हो जाऊं, है तो कठिन पर प्रभु की कृपा हो जाये,तो सध जाता है।माया के बंधनों से छुटकार भी मिल जाता है और प्रभु तक पहुंचने का मार्ग भी सुलभ हो जाता है।

            कहां पतितों का शिरोमणि मैं और कहां पतित को उबारने वाले भगवन, प्रभुजी हों सब पतितन को टीको, और पतित सब दिना चार के ,मैं तो जनमत ही को।अपने विषय में भान तो हो कम से कम कि हम कितने पानी में है, अच्छे हैं बुरे हैं,सरल हैं सीधे हैं, खुटसयाने हैं ,परोपकारी हैं, कंजूस है, परमार्थी हैं, कैसे हैं हम।आखिर करुण स्वरों में प्रार्थना कर बैठता है, देखिए क्या शब्दावली चुनता है मानुष।कैसा रोता गिड़गिड़ाता है  ...मैं हूँ पतित स्वामी तुम हो पतित पावन,अवगुण भरा ह्रदय है इसे कैसे मैं दिखाऊँ।माया के बंधनों से छुटकार कैसे पाऊं।हे प्रभु मुझे बता दो चरणों में कैसे आऊँ।

और फिर जैसे भी हैं प्रभु तुम्हारे हैं, पार लगाओ नैया, मेरे कृष्ण कन्हैया, तुम्हें छोड़कर कहां जाएंगे भला, और कौन है तुम्हारे सिवा, बनवारी रे जीने का सहारा तेरा नाम रे, मुझे दुनिया वालों से क्या काम रे। अच्छा हूँ या बुरा हूँ जैसा भी हूँ तुम्हारा,ठुकराओ न मुझे अब चरणों में सिर झुकाऊं, माया के बंधनों से छुटकार कैसे पाऊं।है प्रभु मुझे बता दो चरणों में कैसे आऊँ।तो प्रभु तुम्हारी शरण हैं,बस अपने चरणों में आने का मारग बता दो, माया के बंधन काटो प्रभु, अब तो सुन लो प्रभु।एक भक्त की है अरजी, आगे तुम्हारी मरजी, ठुकराओ या गले लगालो, बस तुमसे कह रहे हैं, तुम हो प्रभु जी अपने तारो या ठुकरादो, jaayen कहां hm भगवन, अपने गले लगा लो।

ज्यादा संयम बरतो तो कायर कहलाते हो

 सफर जारी है....954

05.06.2022

धैर्य, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय निग्रह, मेधा, विद्या, सत्य पालन, अक्रोध धर्म के दस लक्षण जरूर बताये गए हैं पर इन सबकी भी एक सीमा है।धैर्य जब चुक जाए तो आदमी बुरी बिखर जाता है फिर सबकी धैर्य शक्ति और क्षमता अलग अलग होती है।इसलिए धैर्य का एक ही पैरामीटर सबके लिए फिक्स नहीं किया जा सकता।अब कृष्ण तो भगवान थे फिर भी शिशुपाल की सौ गालियों के बाद उन्हें सुदर्शन चक्र चलाना ही पड़ गया फिर हम तो मूढ़ मानव है, हममें इतना धैर्य कहां से होगा, फिर भी सामर्थ्यानुकूल धैर्य बनाये रखते हैं लेकिन कोफ्त तब होती है जब अगला आपके धैर्य को आपकी कमजोरी समझ कायर के विशेषण से नवाज देता है ।क्षमा तो हमेशा बड़े ही करते हैं और छोटे दिनप्रतिदिन उत्पाती होते जाते हैं क्योंकि उन्होंने पढ़ रखा है क्षमा बड़ेन को चाहिए छोटन को उत्पात, कहा रहीम हरि को घट्यो जो भृगु मारी लात।इच्छाओं का दमन भी आवश्यकता से अधिक करना शुरू कर दो तो मन ही मर जाता है फिर किसी बात की इच्छा ही नहीं होती तो जब कभी तो आजादी उन्हें भी मिलनी चाहिए।चोरी ,राम राम राम ,उससे तो बिल्कुल तोबा कर ली है पर व्यवहार में उसका थोड़ा बहुत अंशः स्वतः आ जाता है ।वस्तुओं की चोरी के लिए दण्ड भले ही निर्धारित कर रखा हो कि व्यवहार की चोरी के लिए कोई दण्ड निर्धारित नहीं है, कहो कुछ करो कुछ।  कुछ तो ऐसे जन्मजात चोर हैं कि जब तक सब्जी की ठेल से थोड़ा बहुत धनिया मिर्च, गोलगप्पे वाले से दो चार दोने पानी और नपे दूध के ऊपर थोड़ा सा दूध नहीं डलवा लेते लगता ही नहीं कि खरीददारी की है।

      शौच को बिल्कुल अशौच बना कर रख दिया, शौचाते शर्म लगती है पर फ्रेश होते गर्दन ऊंची हो जाती है। धोने की  जरूरत भी कहां रह गई, ये नेपकिन के पैक के पैक जो शौचालय में रख दिये गए हैं।साबुन के विकल्प भी खोज लिए गए हैं।काहे की शुचिता शेष रही, नहाओ चाहे मत नहाओ, बस टीम टाम कर क्रीम पाउडर की  पोलिश लगा सेंट और डियो छिड़क लिए जाते हैं।कपड़े धोने से बचाब को मोटी मोटी फटी उधड़ी जीन्स पहनना फैशन में शामिल हो गया।पानी की तो इतनी बचत कर ली गई कि भोजन से पहले हाथ धोने के बजाए उसे भी न जाने क्या चुपड़ कर रिप्लेस कर दिया गया।इन्द्रिय निग्रह की बात तो करो ही मत, आंखें अच्छा अच्छा देखने के चक्कर में, कान मधुर सुनने के चक्कर में और जिव्हा सुस्वादु भोजन की लिप्सा में ऐसी बुरी फंसी है कि बस कुछ पूछो ही मत।मेधा का स्थान चतुराई और सा विद्या या विमुक्तये का स्थान अर्थकरी विद्या ने ले लिया है।बस ज्ञानी वही है, समझदार वही है जो चार पांच अंकों की सैलरी पाता हो ,बाकी तो सब भाड़ झोंकते हैं।खूब पढ़े लिखे ढेरों उपाधि पाये इन सेठों धनाढ्यों के आगे पानी भरते हैं।दस बारह वर्ष में मोटी मोटी पुस्तकें पढ़ रात रात भर जग कर  जो  चिकित्सक बनते हैं ,उन्हें किसी अनपढ़ के क्लीनिक और  नर्सिंग होम में अपनी सेवाएं बेचनी होती है, उनसे गवर्न होना होता है, काहे के विद्यावान रह गए वे।सिस्टम ही तो लचर है।

      सत्य की बात करते ऐसे लगता है जैसे किसी दूसरे की सीमा में जा घुसे हों।सब अकबकाई नजरों से ऐसे देखते हैं जैसे बाबले गांव में ऊंट आ गया हो।सत्य बोलना तो दूर उसके नाम और प्रसंग भर से ही उबकाई लेने लगते हैं जैसे दाल में कंकड़ आ गया हो,मुंह का स्वाद खराब हो गया हो।अब कितना संयम रखें, संयम रखते रखते यह हाल हो गया कि अब सामने वाला सत्य को भी झूठ की तराजू पर तौलने लगा।चुप रहो चुप रहो सुनते ऐसे चुपा गए कि अब जुबान ही तालू से चिपक गई है।बस सब एक ही बात कहे जा रहे हैं कि कैसी भी स्थिति परिस्थिति हो ,संयम मत खोना।यहां संयमी होते होते पानी सिर से ऊपर बह गया, लोग कायर,कमजोर की श्रेणी में रखने लगे और तुम अभी तक संयम संयम की रट लगाए हुए हो।आखिर कब तक जज्ब करें अपने को।बहुत हुआ ,बस अब अक्रोध की सीमा पार हो गई, अब तो फूटेंगे ही।काहे को निर्बल और कायर कहलाये, चूड़ियां थोड़े ही पहन रखी है पर सच तो यही है कि हम चूड़ियों बिछुए के साथ ही भरे पूरे हैं।चूड़ियों के शील को नहीं उतार फैंका जा सकता, वे शील और सौभाग्य की सूचक हैं ,डरपोक और कायर होने की नहीं।तो इन्हीं चूड़ी बिछुओं के साथ दो दो हाथ करने की तैयारी है।अब मुहावरे तो तुम बदलो अपने कि हाथों में चूड़ियां पहनने से कोई कमजोर नहीं होता बल्कि दूसरे की शक्ति भी उसमें आ जाती है।तो अब ज्यादा संयमी होने के बंधन उठा कर रख दिये गए, इन्हें तिलांजलि दे दी गई अब दो दो हाथ करने की तैयारी पूरी है।

बिना बात के काहू ते मत अटको

 सफर जारी है.....954

04.05.2022

काहू ते कितनो हू वैर होय, लड़ाई झगड़ा हे जाय, बोलचाल बन्द हे जाबे पर मिले पीछे राम राम जरूर करो, नाराजगी अपनी जगह होय और शिष्टाचार अपने ठीया।जे ही छोटी छोटी बात तो आदमी ए बडो बनाबे।और देख भैया चौबीस घण्टा मुंह फुला के रहबो ठीक नाय, कछू बात है गई,चार बता सुना देयो चार सुन लेयो पर दिल में धर के मत बैठे रह्यो, अरे कह कबा के वई की वई खतम कर देयो।ऐसो कितनो समय लिखा के लाये हो कि सबन ते लड़ भिड़ के फूल के बैठे रहो।कछु न जाओ करे संग में। खाली हाथ ही जानो है सो भैया सबन ते बोल बतराते रहो करो।जाते लगे हमारी नाय बन रई तो चुप लगा गए।पर रोज रोज को रोबो झींकबो, लड़बो भिड़बो ठीक नाय होय करे लाला। अरे काहू ने दो बात बढ़ती कह लई तो का तुम ते चिपट गई, धूल डालो बापे और आगे कू बढ़ लेयो।जाने कही सबरो दोष तो वई ए लगो करे।तुम तो झाड़ झूड के आगे चल देयो।कहां तक रखे रहोगे इन बातन ने दिमाग में।

हां, एक फायदा तो है जाबे कि बातन ते अगले आदमी को स्वभाव पतो चल जाबे।सुनी तो होयगी तुमने दमड़ी की हाडी तो गई2

 पर कुत्ता की जात तो पता चल गई।तो एक बार कू अपनो नुकसान करके हू बात समझ आ जाबे, दूसरे को स्वभाव पतो चल जाबे तो इन दामन में सौदा चोखो ही समझो।कम ते कम हमें पतो तो चल गयो कि अगलो कितने पानी में है, हमें ले के बाकी का सोच है।तो मुँहबादी करबे ते ज्यादा अच्छो हे चुप लगा जाओ, अपने काम ते काम रखो।बकन देयो अगले ने, कह कबा के अपनी गन्दगी ए बाहर निकाल के चुप है जायेगो ससुरो।हम चों अपनी जबान गन्दी करें।इतनी तो सबन ने सल है कि जापे जो होय वोही तो सामने वाले ए परोसेगो।खट्टो मीठो, तीखो, चरपरो, कड़बो।तो जे मान लेयो कि अगले के मन में इतनी घृणा भरी परी है कि अच्छे बोल निकले ही नाय।जब मुंह खोले विष भरे वचन ही बोले।ऐसेन के मोड़े ते कभहू ढंग की बात नाय निकरे।तो आदमी ए समझबो जरूरी है।बाकी जात समझबो जरूरी ऐ।अरे वा जात पान्त की बात नाय कर रई,कबीरा ने कही काय--जात पांत पूछें नहिं कोई, हरि को भजे सो हरि को होई।फिर सबके  खून को रंग तो एक ही होय करे, सबको जन्म हू समान तरीका ते होय, तो कोऊ काहू जात को होय हमें बाते कछू लेनो देनो नाय।बामे इंसान कछू नाय कर सके, जा घर में जन्म मिल गयो, वो ही बाको स्वर्ग दाखिल है।मैया बाप तो भगवान ते हू बड़े होय करें।कहत नाय का पहले घर की मैया ए पूजो तब पहाड़न वाली ए पूजिबे जानो चाहिये।जे नाय की घर की मैया ए तो बूढ़ेन के आश्रम में छोड़ आये और खुद चल दए वैष्णो देवी, अरे पहले बाय देखो जो तुम्हें जा जगत में लाई है, कैसे कैसे कष्ट सहे हैं तुम्हे बडो करिबे में तुम्हाई नींद सोई जांगी है, खुद चाये भूखी रह गई होयगी पर तुम्हारो झेन्दा जरूर से भर दीयो होगो।तो बाको मान करोपहले तब कहीं जइयो।जा बात ए तो गांठ बांध लेयो कि जो अपने जन्मदाता को सगो ना भयो वो कौन को होयगो।

 सो आदमी ए समझबो बहुत जरूरी है, बाको स्वभाव बोली भाषा से सब पतो चल जाबे कि कितनो गहरो है।एक बार कूअपनी गांठ का पैसा जरूर चलो जाबे पर सामने वाले की की असलियत तो जान जाओगे।इन दामन में जे सौदा बुरो नाय। एक बार काहू के स्वभाव ए जान जाओ तो फिर दुख न होय करे।फिर हम बाय ज्यादा भाव नाय देबे, कहतो रह, बकबो कर, हमाये ऊपर रत्ती भर हू असर नाय होय, जे तो है ही ऐसो।जाके मुंह लगबे ते कछू फायदा नाय, अपनो ही टैम खोटो करनो है।काठ की हांडी चूल्हे पर बार बार नाय चढो करे ,मौका बार बार नाय दयो जात , आदमी ए रोज रोज नाय परखो जात, एक कनी ते ई पतो चल जाबे कि खिचड़ी पकी है कि नाय।तो जब अगले की पोल पट्टी पतो चल जाए, आंखिन पे बंधी अज्ञान की पट्टी खुल जाए ,अगले ए समझ जाओ तो फिर रोज रोज काय क्लेश मत पालो, ऐसेंन ते अटको ई मत, अपनो रास्ता बदल लेयो।अपनी अक्कल बेच के काम मत करियो, सुनो सबकी पर करो बाये जो तुम्हें ठीक लगे, अपनी आत्मा की बात जरूल ते सुनो। लगे। अपने मन के अंदर झांको, बहुत सी गलत बातन ते छुटकारो मिल जाये करे।जे बात समझ आ गई तो आधी से ज्यादा काय क्लेश तो वैसे ही दूर है जाबे और जे मान लेओ कि तबहू कोई औगार लग जाए तो बाए राम पे छोड़ देयो।बिनकी शरण में चले जाओ, गात बजात रहो मेरी लाज तेरे हाथ, अब तू ही पत रखियो भगवन, अपनी सी खूब कर लई, अब नाय सिपट रई, तुम्हीं संभालियो प्रभु जी।

 तो सौ बातन की एक बात है पहले तो काहू ते अटको मत, सबन ते रामा श्यामा करो, राजी ते बोलो, और फिर भी अगलो नाय माने तो बाके हाल पे छोड़ देयो पर अपनो मुंह मत खराब करो उल्टी सीधी बक के, सब राम जी पार लगात है।

पर्दा उठने वाला है

 सफर जारी है......953

03.06.2022

 पारी खत्म हुई समझो ,सारे बानक ऐसे ही बन रहे हैं,हाथ से सब छूटता सा जा रहा है, जिस क्षण को पकड़ो, सहेजने की कोशिश करो, हाथों से रेत की माफिक फिसल जाता है।धीरे धीरे सब पीछे छूटता जा रहा है। दृश्यो की रील एक एक कर सामने खुलती है और छटा दिखाकर लुप्त हो जाती है।साथी एक एक कर पीछे छूटते जा रहा है।चित्त की स्थिरता को ग्रहण सा लग गया है , समय पंख लगा कर उड़ता जा रहा है, अंधेरे घिरते जा रहे हैं, नजर धुंधलाती जा रही है, लगता है अब कुछ भी हाथ में नहीं रहा।पता नहीं चलता कि लोग बदल रहे हैं, माहौल बदल रहा है या मन ही ठहर सा गया है।चारों ओर सन्नाटा, उदासी, उमस घुमस सी पसरी हुई है।बहुत कोफ्त हो रही है, मन ही तो पगला सा गया है।ध्यान ही तो चूक गया है, उसे रास्ते पर लाने के प्रयास किये  तो जरूर जा रहे हैं पर अब स्थितियां बिखर सी गई हैं।एक को पकड़ो तो दूसरा हाथ से खिसक जाता है।किस किस को पकड़ो, सब भागने की तैयारी में हैं, बस मौके की तलाश में हैं।अवसर मिले तो खिसक लें।जाने सबको क्यों लगता है कि वे साथ खड़े अहसान कर रहे हैं,काम अपने हिस्से का करते हैं और अहसान अगले पर पटकते हैं।

 उनके स्वर की तल्खी बता रही है कि वे निर्द्वन्द हो गए हैं, परम् स्वतंत्र न सिर पर कोऊ सा स्वेच्छाचारिता भाव उनकी नस नस में समा गया है।अब वे बोलते नहीं, फटते से हैं, शब्द उछल उछल कर बाहर आते हैं।उनका अपने शब्दों पर नियंत्रण ही नहीं है।वे छुट्टे सांड की तरह जहां मर्जी भाग लेते हैं, फिर खोल में दुपक जाते हैं।सारे के सारे समीकरण ही गड़बड़ा गए हैं।एक को पकड़ो तो दूसरा छूट जाता है।इस अकड़ पकड़ के दौर में सब चूहा भाग बिल्ली आई का खेल खेल रहे हैं।बस अब  खेल खत्म हुआ ही समझो क्योंकि अब दूसरा दौर शुरू होने को है। 

सच तो ये है अब नये खेल की पारी शुरू होने वाली है, इस अंक की कथावस्तु समाप्त हुई समझो, अब पर्दा डलने ही वाला है, नये अंक की पटकथा लिखी जा चुकी है, पात्रों की स्क्रीनिंग चल रही है, ये तो भूमिका समझो,बस कुछ ही देर में अंक परिवर्तन होने को है, बस पर्दा उठा ही समझो,शतरंज की बिसात बिछकर तैयार है ,सब गोट अपने स्थान पर रखी जा चुकी है। खेल शुरू होने ही वाला है।अब के खिलाड़ी खूब छंटे हुए और पक्के हैं।किसी के भप्पे में नहीं आने वाले।तो अब के हम दर्शक बने रहते हैं, दूर बैठ कर खेल देखने और खिलाड़ियों को हूट करने का अपना अलग आनन्द है।आप खिलाड़ी जो नहीं है, बस दर्शक दीर्घा में बैठे हैं।जिधर पलड़ा भारी होगा, उधर ही चले जायेंगे, हमें तो जीतने वाले का साथ देना है।अब के भूमिका बदल चुकी है।अब करना बरना नहीं, जबानी जमा खर्च करना है।तो पर्दा बस उठने ही वाला है फिर आराम से बैठकर तेल और तेल की धार देखो।चाहे तो कमेंट भी कर सकते हैं।बल्कि अब कमेंट ही करना है, काम बाम तो बहुत सिलटा लिए ,अब हमीं थोड़े करते रहेंगे, बहुत फूली फूली चर लिये, अब बंधो कुर्सी से, जिम्मेदारी से।अब मांग हमारी है पूर्ति तुम करोगे कहीं से भी करो, हमें क्या, हमें तो बस चाहिए।ही चाहिए।बड़े इतराते से फिरते थे, मैं ये मैं वो करते थकते नहीं थे।बस अब सब तुम्हारा है।तुम जानो तुम्हारा काम जाने।तो तैयार रहना दोस्त, पर्दा उठने वाला है।

जागते रहो

 सफर जारी है....952

02.06.2022

आंख  खोलकर पड़े रहना जागना नहीं कह लाता।जब तक किसी काम में चेतना केंद्रित न हो जाए तब तक सोया और जागा व्यक्ति समान ही होता है।कुछ सोते हुए भी जगे से रहते हैं अर्थात नींद में भी चिंतन करते रहते हैं तो कुछ जागे होकर भी सोए रहते हैं।जिनके दिमाग सोए रहते हैं फिर भले ही आंख भट्टा सी क्यों न खुली रहे, उनसे बहुत जरूरी  सा कुछ न कुछ रोज ही छूट जाता है।अब वे करें भी क्या ,इंसान की सीमा है, सब तो पेट नें भरा नहीं जा सकता ।तो प्राथमिकता तय करना जरूरी है। फिर ध्यान आता है जो आधी को छोड़ पूरी को धाबते हैं, उन्हें पूरी तो छोड़ो,आधी भी प्राप्त नहीं हुआ करती और वे खिसियाने से खम्भा नोंचते से रह जाते हैं।।कुछ ऐसे भाग्यशाली होते हैं कि दोनों हाथों में तो लड्डू होते ही हैं , मन ही मन भी लड्डू फूटते रहते हैं।और यहां ऐसे दलिदर पैदा हुए कि सब करते धरते भी रायता फैल ही जाता है, फिर उसे बटोरते से रहो।समय अलग बर्बाद हो और हाथ में आये निल बटा सन्नाटा।सब भाग्य की बात है, किस्मत के हेठे न होते तो करते धरते भी आलोचना के शिकार क्यों होते।

एक वे लाटसाहब हैं जो करेंगे धरेंगे कुछ नहीं, पर रौब ऐसा गाठेंगे कि सारी जायदाद इनकी बपौती है।और आश्चर्य इस बात का है कि सब जानते बूझते लोग उनका हुक्का सा भरते रहते हैं, बड़ी परवाह है उनकी नाराजगी की, उनके माथे पर नेक सिलवट आ जाएं तो सब को सांप सूंघ जाता है, फिर उनकी चिरौरी में लग जाते हैं।ये सारा माहौल देख कर लगता है कि बेशर्म बने रहने में फायदा है।करो धेला भर मत और रौब गांठो सो अलग।सच ही लिखा कहा होगा जो अति का सीधा होता है वह अपना नाश कराता है, देखो मीठे गन्ने को कोल्हू में पेरा जाता है।देखा है न गन्ने का रस निकालते हुए, कैसे मोड़ तरोड कर मशीन में लगाता जाता है, अंत में जब बिल्कुल जब छूँछ रह जाता है तो उसके बीच भी नींबू लगा फिर मशीन में लगा लेता है और बूंद बूंद रस निचोड़ लेता है, बिल्कुल अंतिम सांस तक।वन में टेढ़े मेढे पेड़ छोड़ दिये जाते हैं और सीधे सट्ट पर झट आरी चल जाती है।तो क्या सीधा होना और गम्भीरता से कार्य करना अपराध की श्रेणी में आता है।और यदि यही सच है तो फिर बदमाश होना, काम से बचने के उपाय खोजना, फूली फूली  चरने वाले,बिना हाथ हिलाए यूं ही मुफ्त में क्रेडिट लेने वाले लोग अधिक अच्छे होते है।सबको वैसा ही हो जाना चाहिए।पर कहीं ऐसा हो गया तो सब बंटाधार ही हो जायेगा।

            नहीं नहीं, ऐसे नहीं चलेगा, अभी कम से कम इतना संतोष तो है कि हम गलत नहीं कर रहे।कहीं सब खरबूजो को देखकर आप से खरबूजे भी रंग बदलने लगे तो फिर उनमें और आप में भला फर्क ही क्या रह जायेगा,फिर तो आप कहने के हकदार भी कहाँ रहेंगे, और अंतरात्मा अलग कचोटेगी सो अलग।क्या एक दिन भी सपनों में भी सो सकोगे, मन चीत्कार नहीं करेगा कि अरे बन्धु,ये अनर्थ तुम कैसे कर सकते हो, रोज तो याद करते हो कि बिना काम किये खाने वाले को अपच हो जाती है, निष्क्रियता व्यक्ति को बिल्कुल जड़ बना देती है।यदि वे तुम्हें देख कर नहीं बदल सकते तो तुम अपने सच के रास्ते से कैसे विरत हो सकते हो, क्या तुम्हारा अंतर तुम्हें धिक्कारेगा नहीं, क्या तुम चैन की नींद सो पाओगे, क्या अपने बड़ों से आंखें मिला पाओगे, क्या तुम खुद को माफ कर पाओगे, क्या अपनी ही नजरों में नहीं गिर जाओगे।अरे जो हो नहीं सकते वैसा सोचते ही क्यों हो।क्या हुआ जो सब काम अपने पेट में नहीं भर पाये, क्या हुआ जो आपसे कुछ कुछ बहुत जरूरी छूट गया, क्या हुआ जो अगले ने आपकी कमियों की ओर इंगित किया, क्या हुआ जो अपनो की श्रेणी में आते थे वे विश्वासघाती निकले, क्या हुआ जो आप ऊंचे ऊंचे लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सके।फिर दोबारा से कोशिश करेंगे, गिरेंगे तो क्या धूल झाड़ कर फिर उठ खड़े होंगे।काम तो बिगड़ा पर अगले का पता तो चल गया।कुछ लोगों में व्यवहारिक समझदारी जल्दी आ जाती है तो कई की अक्ल दाढ़ देरी से निकलती है, कुछ जल्दी सीख जाते हैं तो कुछ गिर गिर कर चोट खा खा कर सीखते हैं।

            नेक हमसे सिलबिल्ले और सीरे धीरे लोग देर से जागते हैं,जब सब प्रसाद बंट जाता  है ,तब पहुंचते हैं और ठनठन गोपाल रह जाते हैं।उनने शायद पिछारी रोटी खाई होती है, तो अक्ल दाढ़ जरा देर से आती है।वे सिस्टम का पार्ट नहीं बन जाते, इसलिए हमेशा हाशिये पर धकेल दिए जाते हैं।तो जागने और समय पर जागने के फर्क को समझना जरूरी है, अपने को अद्यतन करना जरूरी है, जागे तभी सवेरा से सबक लेना जरूरी है।

संकल्प ही कर्तव्य का मूल है

 सफर जारी है.....951

01.06.2022

जो बाजी जीतते हैं, सामान्य से इतर कुछ बड़े काम कर जाते हैं, घर परिवार बाहर कार्य स्थल के साथ साथ समाज में भी अपने को सिद्ध कर पाते हैं, अपनी उपलब्धियों का परचम लहरा पाते हैं, विनीत और मृदुभाषी होते हैं, सबसे हिलमिल कर रह पाते हैं जिनके संपर्क दायरे विस्तृत होते हैं जो भीड़ में अलग पहचान जाते हैं, वे किसी अलग दुनिया से नहीं आते।वे भी हम सबकी तरह दो हाथ पैर के स्वामी होते हैं,उनके पास भी वही चौबीस घण्टे का सीमित समय होता है पर उनके पास समय प्रबन्धन और लगन का विशेष गुण जरूर होता है जिससे वे सफलता के शिखर पर पहुंचते हैं।

कल एक सप्तति आयोजन में प्रतिभाग करने का संयोग बना।देश आजादी के पिचहत्तर वर्ष पूरे होने की खुशी में अमृत महोत्सव मना रहा है यानी उपलब्धियों के क्षण हमें सदैव गौरवान्वित करते हैं, हमें उन्हें सेलीब्रेट करते हैं।जीवन के सत्तर वर्ष की उपलब्धि का जश्न सप्तति का अवसर है।साहित्यकार और रंगकर्मी का जीवन केवल परिवार के लिए ही नहीं हुआ करता, उसकी परिधि में समाज, विद्यार्थीऔर शोधार्थी सभी सिमट आते हैं।उसका व्यक्तित्व बरगद सा विशाल होता जाता है।उसकी जड़े गहरे जमती जाती है।उसके पास सब को देने के लिए कुछ न कुछ जरूरी होता है।वह दोनों हाथों से बांटता है फिर भी कोष खाली होने के बजाए बढ़ता और बढ़ता ही जाता है।व्यये कृते वर्धते एव नित्यं विद्या धनम सर्व धनम प्रधानम।ज्ञान का कोष कभी खाली नहीं होता चाहे से जितना मर्जी बांटो। सच तो ये ज्ञान पुस्तकीय सूचना भर नहीं है, अनुभव सम्पन्नता आपको बड़ा बनाती है,आप स्वयम करके सीखते है।रोजाना के अनुभवों और seekh को उसमें जोड़ते जाते हैं, प्रतिदिन एक नया पाठ उसमें सम्मिलित होता जाता है।आप गहरे कुए जैसे होतेजिसके पानी का स्रोत कभी सूखता नहीं है।

      कई कई बार हम इतने सामाजिक हो जाते हैं कि परिवार कहीं बहुत पीछे छूट जाता हैं और हम शिखर पर अकेले रह जाते हैं।पर कल के आयोजन की एक विशिष्टता यह भी रही कि पूरा परिवार इस आयोजन में सहभागी था और जब साहित्यकार ने अपना रचना कर्म तीसरी पीढ़ी को हस्तांरित किया तो सभी रोमांचित हो गए यानी पुत्र के साथ पौत्र भी दादा से साहित्य संस्कारों की विरासत प्राप्त कर रहा था।एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मूल्यों का हस्तांतरण सदैव सुखद ही होता है।सामाजिक परिवेश की बड़ी भूमिका होती है और हमारे द्वारा तैयार विद्यार्थी शोधार्थी हमारी मेहनत का प्रतिफल होते हैं ।इन आयोजनो से ये संदेश भी जाता है कि उम्र केवल आंकड़े भर नहीं होती, उसमें आपका अनुभव भी सम्मिलित होता हैं, आप केवल संचय ही नहीं करते जाते ,बल्कि समानांतर बांटना भी सीखते हैं।आचार्य अच्युतन साहित्यकार के साथ साथ रंगकर्मी और सफल अभिनेता भी है।जिंदगी के पारी उन्होंने सावधानी से खेली इसलिए सफल ता उनके कदम चूमती है।सप्त ति तो मात्र एक पड़ाव है, हम सबकी शुभकामना है कि वे शतायु हों।

      केरल हिंदी परिषद के संरक्षक आदरणीय बालकृष्णन नायर,उनके पुत्र श्रीजू, आचार्य मूसा, श्री रघुराम जी,कालीकट विश्वविद्यालय हिंदी विभाग के अध्यक्ष आचार्य प्रमोद कोपवृत जी, शशिधरन जी, तमाम हिंदी सेवी, रंगकर्मी और हिंदी अध्येताओं से मिलकर मन बहुत प्रसन्न है।प्रो गोपीनाथन जी से रूबरू मुलाकात न होने का दुख साल रहा है पर अगली बार अवश्य मिलेंगे।हिन्दी का भविष्य निश्चित ही उज्ज्वल है।वह अपने प्रयोक्ताओं के मध्य खूब फल फूल रही है।नई पीढ़ी को सीखने का जो थोड़ा बहुत संकोच है वह अवरोध भी जल्दी दूर होगा।दरअसल हिंदी हिंदी कहने से हिंदी नहीं सीखी जाती, उसे सीखने और सिखाने का जज्बा और संकल्प भी मायने रखता है।जशना ने सही कहा कि वे यूट्यूब चैनल के माध्यम से हिंदी सिखातीहैं और स्पोकन हिंदी को सीखने के लिए डॉक्टर इंजीनियर और बैंककर्मी उनके विद्यार्थी हैं।हम मिल कर आगे बढ़ेंगे तो भाषा भी निश्चित तौर से आगे बढ़ेगी।और भाषा के सीखने सिखाने का प्रश्न केवल विद्यार्थी और शिक्षक से ही नहीं जुड़ा है,विविध क्षेत्रों में काम कर रहे फिर चाहे वे रंगकर्मी हों या अन्य, हिंदी को सीखना उतना ही जरूरी है जितना किसी अध्यापक को।तो नवीकरण कार्यक्रमों की परिधि में इन्हें भी शामिल करना बहुत जरूरी है।किसी भी भाषा को प्राथमिक स्तर से सिखाया जाए, विधिवत सिखाया जाए तो उसे जल्दी और आसानी से सीखा जा सकता है।तो इसे भी योजना का भाग बना लेना होगा।

      संकल्प से सब सध जाता है तो हम सब सबसे पहले संकल्प के धनी हो बाकी तो सब साथ में मिल ही जाता है।

सेवनीय महावट

 सफर जारी है....950

1.06.2022

जेठ मास की मावस वट मावस है, इस दिन सावित्री की कहानी दोहराई जाती है किस तरह वह अपनी प्रत्युपन्न मति से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण छुड़ा लेती है।विवाह से पूर्व ही नारद जी से उसे पता चल गया था कि सत्यवान की आयु बहुत कम है,वह चाहती तो विवाह से इंकार कर सकती थी, स्वयंवर ही तो था मद्र देश के राजा अश्वपति की कन्या का,उसके लिए वर की क्या कमी थी भला, दूसरा पति चुन सकती थी पर नहीं जो एक बार चुन लिया सो चुन लिया।अब होय सो राम।जो होगा देखा जाएगा।सास ससुर अंधे, उनका राज्य भी शत्रुओं ने छीन लिया।बिल्कुल निर्धन, इकलौता लड़का है  सत्यवान तो माता पिता की सेवा तो करनी ही है।दायित्व छोड़ कर कहीं भागा नहीं जा सकता था।सब जानते बूझते चुना, चुना तो चुना फिर ये नहीं कि बीच रास्ते छोड़ कर भागें।निभाया और पूरी शिद्दत से निभाया।यमराज ने तीन वरदान दिए तो उन्हें भी ऐसी चतुराई से मांगा कि एवमस्तु कह यमराज भी अपने वचन से बंध गये।उन्हें सत्यवान का जीवन लौटाना पड़ा।और बस सावित्री का नाम अमर हो गया। महिलाएं सालाना वट बरगद की पूजा करती हैं, जीवन साथी की लंबी आयु मांगती है।

         हर बार इस विषय को उठाते आलोचित तो बहुत होती हूँ ,घर परिवार समाज सखी सहेलियों को लगता है कि आज के घोर वैज्ञानिक और तकनीक के युग में ये कैसी महनीया हैं जो हमें इस कथा के ब्याज से फिर से सत्यवान सावित्री के युग में ले जा रही हैं।आज जब बराबरी का युग है तो एक ही क्यों पिदे,बीमार है तो डॉक्टर हैं न, सेवा सुश्रुषा के लिए नर्से हैं सेविका हैं।अब इतना भी क्या कि अगला बीमार है तो उसके लिए हम जान दे देंगे, उसे मौत के मुंह से निकाल कर लाने को मृत्यु के देवता के आगे हाथ पैर जोड़ेंगे।ठीक है भाई हमें भी उसका जीवन प्यारा है तो बड़े से बड़े डाक्टर को दिखा तो रहे हैं।अब ठीक तो व्यक्ति दवाई से ही होगा, अब खुद भी खाना पीना छोड़ के पूजा पाठ में लगे रहो, दुआ मांगो प्रार्थना करो और उससे सब ठीक हो जाएगा, हमारी समझ में तो नहीं भरता भाई।

         भर भी नहीं सकता क्योंकि अब सब भौतिकता के दबाब में जीते हैं।दवा से बढ़कर दुआ का असर होता है, इसे सुना ही नहीं, चरितार्थ होते भी देखा है।मनचीता मिल जाए इसलिए दर दर भटकते देखा है, पूजा पाठ जप करते देखा है।कहा तो यहां तक जाता है कि जो बात दवा से नही होती वो बात दुआ से होती है ,जब मुर्शिद कामिल मिलता है तो बात खुदा से होती है।ये स्नेह और सेवाभाव ही होता होगा जिसके चलते पत्नी अपने सुहाग के लिए और मां परिवार के लिए न जाने कितने व्रत उपवास पूजा पाठ तीर्थ में व्यस्त रहती है।और ये सब एकतरफा नहीं है। दूसरे पक्ष को भी परिवार के लिए सब करते देखा है, पाया है ।जब घर की धुरी बीमार हो जाए तो वे कैसे अकेले असहाय से हो जाते हैं।सच्चे मन से बार बार मनाते हैं कि सब जल्दी से ठीक हो जाए।बड़बड़िये तो जरूर होते हैं ,जल्दी तुनक भी जाते हैं पर अगले के लिए सोचते भी खूब हैं भले ही उसकी अभिव्यक्ति के सही तरीके न जानते हों।

         बचपन से देखते आ रहे हैं मैया को तीन दिन के इस कठिन व्रत का  पारण करते।पहले दिन एक टैम अलोना भोजन, दूसरे दिन अयाचित और तीसरे दिन निर्जल उपवास रखते, पिता को भी खूब चिंतित होते देखा है उन दिनों, हम सबको निर्देशित करना कि आज अपना काम अपने आप करो, मां को परेशान मत करना वह उपवास में है।और इतने कठिन समय में भी मां को पूरी दिनचर्या उसी शिद्दत से निभाते देखा है।रोज शाम पूजा कक्ष के साथ पीपल और तुलसी चौरा पर दीपक जलाते, कहीं सुन भर लिया था कि दीपक जोत से घर का अंधकार दूर होता है, कष्ट कटते हैं ।बस जब तक जिंदा रहीं, हाथ पैर चलते दीपक जलाने में कोई नागा नहीं हुई।पहले बरगद पूजने बल्केश्वर घाट जाती रहीं और अशक्त होते बरगद की डाली को पूजती रहीं।

         कहती थी देखो बरगद कितनों को छाया देता है आश्रय देता है, जमीन की जड़ को जो पकड़ता है तो छोड़ता नहीं बल्कि जटाओं को भी मिट्टी को सौंप देता है।सो वट जैसे व्यक्तियों के पास सदा जाओ, बैठो उनका मार्गदर्शन लो, वे हमेशा उपकार करते हैं।सावित्री हम सबके लिए आइकन है ,रोल मॉडल है वह आज भी पूज्य इसलिए हैं कि उसने मूल्यों को नहीं छोड़ा, जो उचित समझा किया, दोनों परिवार को अपना माना,दोनों का सुख चैन चाहा।बहुत कुछ सीखना है उनसे।अब तुम्हें ये सब मखौल लगता है तो लगता रहै पर अपना सच तो यही है मूल्य जहां से भी मिले अवश्य ग्रहण किये जाने चाहिए।ये हमारे आधे अंग के लिए सेवा और श्रद्धा भाव है, यह बहुत निजता का प्रश्न है, आप स्वीकारें या मखौल बनाए आपकी मर्जी पर इससे न तो वट वृक्ष की गरिमा में रंच मात्र अंतर आएगा और न सावित्री का कद छोटा हो जाएगा।

हाल और राल

 सफर जारी है....949

30.05.2022

 हां भाई हां,ये तीन यानी ननिहाल, ददिहाल और ससुराल बड़े जरूरी है जिंदगी में। बिल्कुल एकल परिवार में रहो तब भी जन्मदाता और सहोदर तो होते ही हैं।।दुनिया में आये हो तो जन्मदाता होंगे ही, आकाश से तो  टपके नहीं होंगे, जन्मदाता हैं तो उनके भाई ,बहिन, माता ,पिता भी होंगे।ये हैं तो ददिहाल और  ननिहाल भी होगी।अब तुम वहां जाओ न जाओ, ये अलग बात है। सहोदर हैं तो बहनापा भाईचारा निभाना भी आ ही गया होगा ।मौसेरे, ममेरे, चचेरे ,तयेरे, फुफेरे रिश्ते तो जन्म के साथी हैं, इनसे दूरी भले ही रखे रहो पर इन्हें नकार तो नहीं सकते।सम्बन्ध निभ जाए तो सोने में सुहागा और दूरी बनाए रखो तब भी सम्बन्धों का अस्तित्व तो अपनी जगह बना ही रहता है।रिश्तों की जड़ में कितना भी मठा डालो, ये तार तो मरे पीछे भी जुड़े रहते हैं।इन सम्बन्धों को निभाने की कला सबको नहीं आती।अरे जो निजी सम्बन्धों को ही नहीं निभा पाते ,वे अन्य सम्बन्धों को कैसे पोसेंगे भला। 

 सम्बन्धों को निभाना भी एक कला है।कुछ इसमें बड़े कुशल होते हैं।अपना भी नुकसान नहीं करते और सब से व्यवहार भी बनाये रखते हैं।दरअसल सम्बन्ध वे ही निभते हैं जिनमें आप अपेक्षा नहीं जोड़ते।बस जो बन पड़े, उतना कर भर देते हैं।हर व्यक्ति अलग परिवेश में पलता बड़ा होता है तो उसका व्यक्तित्व भी अलग तरह से शेप लेता है।आप के लिए जो बातें बिल्कुल महत्वहीन होती हैं ,हो सकता है अगला उन्हें पहली प्राथमिकता पर रखता हो।तो कई कई बार अगले को जानना समझना बहुत जरूरी होता है, उसके व्यवहार को समझना होता है, उसे क्या अच्छा बुरा लग जायेगा पता लगाना होता है।फिर यदि कोई अपना है तो उसकी छोटी -छोटी बातों को नजरअंदाज भी करना सीखना होता है। ,रूठे सुजन मनाइए जो रूठे सौ बार, रहिमन फिरि फिरि पोइए टूटे मुक्ता हार।कितनी कितनी बार सम्बन्धों को सहेजना होता है ,देखना होता है कि उनमें गांठ न पड़ जाए और जो गांठ पड़ गई तो गांठ गठीले बन्धनो को निभाना बड़ी टेढी खीर होता है। रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय, टूटे से फिर न जुड़े जुड़े गांठ पड़ी जाए।

 रिश्तों में निभाव में स्वभाव और प्रकृति बड़ी भूमिका निभाते हैं।विपरीत स्वभाव वाले के साथ आपके रिश्ते लम्बे नहीं चला करते।रहीम ने पहले ही सावधान किया कि कहो रहीम कैसे निभे बेर केर को संग, वे डोलत रस आपने उनके फाटत अंग।प्रेम से परोसी मोटे अनाज की रोटी भी स्वाद लगती है और बेमन से परोसी मैदा की पूरी भी मन को प्रसन्न नहीं कर पाती।रहिमन रहिला की भली जो परसे चित लाय, परसत मन मैलो करे सो मैदा जर जाय।सच ही सम्बन्धों का निभाव हर किसी के बस का होता भी नहीं।ऐसे तिर्यक का तो बिल्कुल भी नहीं जो व्यवहार का क ख ग भी नहीं जानते, बस हर समय मुंह सुजाये रहते हैं।

 अब जो व्यक्ति  अपने इन सगे रिश्तों को ही नहीं निभा पाते, वे नए रिश्तों में कैसे सामंजस्य बिठा पाएंगे।सम्बन्धों के निभाव की नींव तो घर से ही पड़ती है।यदि वहीं आंकड़े गलत बिछ गये,फंदे ही गलत डल गए तो आगे की बुनाबट सही कैसे होगी।घर परिवार बसाते नये घर से सम्बन्ध जुड़ता है ,घरवाली/ घरवाला मिलते हैं,ससुराली रिश्ते जुड़ते हैं, सास ससुर, साले सलहज, साली साडू के सम्बंध फ्री में मिलते हैं,तो चार दिन की चांदनी तक तो सब निभ जाता है लेकिन लम्बे समय तक इसे वे ही निभा पाते हैं जो समझदार होते हैं और सम्बन्धों की गरिमा समझते हैं।अरे अब तो रिश्तों की दृष्टि से और संपन्न हो गए, एक छोड़ दो दो घर हो गए, दोनों हाथों में लड्डू पा गए और क्या चाहिए भला।छेमचन्द की बात याद कर लिया करो छेम गए ससुराल दिना छह में आये, और छेम के आ गए छह मेहमान छेम कहीं गये न आये।तो आते जाते रहिये सम्बन्धियों के यहां, बोलते बतियाते रहिये उनसे, चिठ्ठी पत्री डालते रहिये, राजी खुशी मनाते रहिये उनकी।कुल मिलाकर निभाते रहिये इन सम्बन्धों को, सम्बन्धियों को ।बड़े भाग्यशाली होते हैं वे जिनके पास सम्बन्धों का अकूत खजाना होता है।

कहना सुनना भी सीखो

 सफर जारी है......948

29.05.2022

सारी डिग्री ,उपाधि ,प्रमाणपत्र, पुरस्कार, शील्ड धरे के धरे रह गए जब जीवन के खुरदरे यथार्थ से सामना हुआ।जब सीख रहे थे तो छोटी छोटी उपलब्धियों पर बहुत गर्वित हो लेते थे देखो हमने कैसा तीर मार लिया, हम फर्स्ट आ गए, हमें इनाम मिला, हमारी प्रशंसा हुई और हम फूल के कुप्पा हो जाते कि बस हमने सारा जग जीत लिया।अब क्या है ,ये पहुंचे वो पहुंचे।बस मंजिल नजदीक ही दिखती थी लेकिन जब से चलना शुरू किया तब से चल ही रहे हैं, ढेरों टेढ़े मेढ़े मोड़ हैं ,घुमावदार रास्ते हैं ,वक्र हैं ,दंशनाए हैं,कहीं फूल हैं कहीं कांटे है, जगह जगह काई जमी है,फिसलन है,सब एक दूसरे को टँगड़ी मार आगे निकले जा रहे हैं।सबको भागने की पड़ी है, यहां कोई किसी के लिए नहीं रुकता।रुकना तो छोड़ो, आप गिर कर घायल हो जाए, भीड़ आपके ऊपर से गुजर जाएगी पर कोई संज्ञान नहीं लेगा।दया ,सहानुभूति, श्रद्धा ,त्याग, बलिदान सब पुस्तकों में ही अच्छे लगते हैं।वास्तविक जीवन में ये सब एक तरफ सरका दिए जाते हैं ।बस सबको एक ही चिंता लगी रहती है किसी तरह मेरा काम हो जाए ,दूसरा गिरे तो गिरे, मरे तो मरे मुझे क्या।अपना हो जाना चाहिए बस।

जीवन में मंजिल का तो नहीं पता कि कब आती है पर छोटे छोटे पड़ाव निश्चित ही आते हैं,जो भी छोटी छोटी खुशियां हैं उन्हें वहीं उसी क्षण मना लेना होता है।फिर तो उठी पैंठ आठवें दिन ही जुरती है।सुख और खुशियां अकेले नहीं आती ,वे अपने साथ दुख ,कष्ट ,मुसीबत की औगार भी साथ लाती हैं, एक आंख हंसती है तो दूसरी खून के आंसू रोती है।न दुख स्थायी होता है न सुख, बस सब आते जाते रहते हैं।यहां कुछ भी टिकाऊ नहीं है,न कुछ लेकर आये थे न कुछ लेकर जाना है, बस मुठ्ठी बांधे आये थे और हाथ पसारे जाना है। अंत में बस व्यवहार भर रह जाना है ।तो उसे करते तो सावधानी बरती ही जा सकती है।कहना आ जाये तो आधी समस्याए कम हो जाए।पर सब कुछ सीखा हमने पर आनुपातिक बोलना ही नहीं सीख पाये।कभी ज्यादा शब्द लगा दिये जो पैबंद से थेगदी से अलग दिखते हैं तो कभी उनमें इतना गैप छोड़ देते हैं कि वे अलग थलग कोनो में पड़े रहते हैं, किसी का किसी से कोई लेना देना नहीं होता।बस सब अपनी मस्ती में इठलाते रहते हैं ,हमें क्या के भाव में दुपके से  पड़े रहते हैं।जो कहना आ जाए तो आधी समस्याएं दूर हो जाएं।पर न कहने में महारथ हासिल है न सुनने में।बस दलिदरी से कुछ भी निरर्थक प्रलाप करते रहते हैं।बोलने से अवकाश मिले तो कान में कुछ जाए, कुछ समझ आये।इतनी तो तमीज ही नहीं सीखी कि जब दो बात कर रहे हों तो बीच में अपनी मटर नहीं भुनानी चाहिए।पहले बात तो समझ लो, तुम्हारा सम्बन्ध उस बात से है भी या नहीं।

कायदा तो ये कहता है जब तक पूछा न जाए, सलाह मांगी न जाए तब तक मुंह बंद रखो और जो पूछा जाए तो तमीज से जबाब दो।इतना चीख के क्यों बोलते हो, सब बहरे थोड़े ही हैं।स्वर कोमल रखा जा सकता है ,हो सके तो पिच भी धीरे रखो, ध्यान रखो तुम अपना पक्ष रख रहे हो, कोई युद्ध लड़ने नहीं जा रहे।और जो एक बार सुनना आ जाए तो बात जल्दी समझ आती है और उसी त्वरा से आप जबाब दे पाओगे।थोड़ा ठहर ठहर कर बोलो, उच्चारण की शुद्धता पर ध्यान दो ,शब्दों के अर्थ समझ कर प्रयोग करो, तसल्ली से अपनी बात रखो,दूसरे को सुनने समझने का अवसर दो।तुम तो बोलते हो ऐसा लगता है धड़धड़ मेघ गरज रहे हों कि लपालप बिजली चमक रही हो कि तड़तड़ातड़ ओले गिर रहे हों।स्वर इतना कर्कश क्यों कर लेते हो।सहज भाव से बोलो, कर्णप्रिय बोलो, सब सुनेंगे।सब सुनने के लिए ही बैठे हैं।बात वजनी होनी चाहिए, उसका कुछ अर्थ होना चाहिए।अनर्गल बोलों ही क्यों।शब्द बिना बात के खर्च क्यों करें।हम तो मितव्ययी हैं भाई तो जहां दस शब्द चाहिए पांच से काम निकालते थे, करते क्या, कहने को तो बहुत कुछ था पर सिखाया यही गया कि तौल मोल के बोलो।शब्दों को हिसाब से खर्च करो। वैसे भी शब्द को ब्रह्म कहा गया तो उसे पूजो, मनाओ, तब जाकर उसे अगले को सौंपो ,सामने वाला भी खुश और तुम भी खुश।तो नहीं आता तो सीखो कहना और सुनना, सच जिंदगी जीना बहुत आसान हो जायेगा।

लागी छूटे न

 सफर जारी है....947

28.05.2022

लगन तो लगन है, जिस किसी से और जिस किसी में भी लग जाए बस एक बार तो फिर नहीं छूटती।ये लगन जो ईश्वर से लग जाए तो भवसागर ही पार करा देती है।दिन रात भजन के बोल दिमाग में गूंजते रहते हैं लगन तुमसे लगा बैठे जो होगा देखा जाएगा, तुम्हें अपना बना बैठे जो होगा देखा जाएगा।और जो सांसारिकता में लग जाए तो लागी छूटती नहीं है।फिर तो गदही में भी परी के दर्शन होते हैं।ऐसे थोड़े ही कहन बनी होगी दिल लगा गधी से तो परी क्या चीज है।बस ये जी का लगना ही तो जी का जंजाल है।जी ही तो नहीं लगता पढाई लिखाई में।और कहीं प्यार व्यार के चक्कर में पड़ जाए तो बस सब वारे न्यारे करा देता है।ये जी ही दिल, जिगर ,मन ,मनुआ कहा जाता है।कभी कभी ये खो जाता है तो कभी आपके बस में नहीं रहता।और आप उसे खोजते पगलाते से इधर से उधर घूमते हो 'जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी, अभी अभी यहीं था किधर गया जी'।

        देखने में कैसा छोटा सा लगता है जी, और बड़े बड़ों की नींद हराम कर देता है।क्या करे जी ही तो नहीं लगता नहीं तो आदमी हम भी काम के होते आज।इस जी ने तो ऐसी की तैसी कर के रख दी।क्या क्या तायने सुनबा देता है, भरे बाजार इज्जत उछाल देता है।जिंदगी भर तो मास्टरनी की डांट खाते रहे कि एक ये हैं महारानी इनका पड़ने में दीदा ही नहीं लगता, बस खेल खूब खिलबा लो।इधर उधर की बातें बनबा लो पर पढ़ने की मत कहो।इधर मास्टरनी टिर्राती और घर आओ तो मैया बापू हाय तौबा मचाते रहते अरे क्या होगा इस लड़की का, लंबी ऊंची तो खूब हो गई पर घर के कामकाज में  बिल्कुल जी नहीं लगता इसका, जब देखो दौड़ी छूटी बस्ता इधर उधर फैंक सहेलियों से बतराने निकल जायेगी।अब क्या करें दोस्तों से बात करने में बड़ा दिल लगता।और इसके बड़े ठोस कारण थे कि सहेलियों के   पास दुनिया जहान की बातें थी, सूरज की चन्दा की हवा की धूप की, इस मोहल्ले की उस मोहल्ले की, इस की उसकी सबकी।अब बातों में जी लगता था तो लगता था क्या करें।एक बार को खाना न मिले तो चलेगा ,बातों से पेट भर लेंगे पर अकेले बिल्कुल सूमसाम बैठना तब न पसन्द था न अब है । जी जिसमें लग जाता है, उसकी जी हजूरी करते पेट नहीं भरता।और जिससे उखड़ जाए उसकी सूरत भी नहीं देखना चाहता।बस कुछ दिल में बस जाते हैं और कुछ से दूरी बढ़ जाती है।

        लगन लगी मीरा को, राधा को, गोपियों को, शबरी को, विदुर को, गज को बस सबका कल्याण हो गया, दुनिया ही बदल गई, नाम अमर हो गया, साहित्य में दर्ज हो गई।'ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन वह तो गली गली हरि गुण गाने लगी, महलों में पली बन के जोगन चली मीरा रानी दीवानी कहाने लगी'।राधे तो कृष्ण की ऐसी आराध्या शक्ति बनी कि कृष्ण मय हो गई।गोपियों को तो कुछ होश ही नहीं रहा, सब बाबली सी पूछने लगी मोकू लिखो है का मोकू लिखो है का।हनुमान को लगन लगी तो वे राम भक्त बन गए, ध्रुव को लगी तो पांच वर्ष की आयु में ईश्वर को पाने चल दिये, प्रह्लाद को हरि नाम का ऐसा चस्का लग गया कि वे अन्य साथियों को भी हरि कथा सुनाने लगे, वाल्मीकि को लगन लगी तो मरा मरा कह कर ही तर गए,वज्र बुद्धि के कालीदास महाकवि बन गए, तुलसी को पत्नी रत्नाबली की बात 'अस्थि चरम मय देह में तामे ऐसी प्रीत जो होती भगवान में तर जाती भवभीत 'इतनी अधिक लग गई कि रामचरितमानस ही रच गई।सिद्धार्थ को लगी तो बुद्धत्व प्राप्त हो गया।तो जीवन में कुछ लगना जरूरी है, सपनों का जगना जरूरी है, उत्कट लालसा जरूरी है।बस एक बार जो लगन लग जाये तो सब सध जाता है फिर साधन हो न हो, कोई फर्क नहीं पड़ता।बस व्यक्ति लक्ष्य तक पहुंच ही जाता है।

        कुछ को प्यार बांधता है तो कुछ को किसी का व्यवहार ही इतना अखर जाता है कि व्यक्ति खट्टा खा जाता है।मन फिर गया तो फिर गया, फिर उसकी ओर रुख तक नहीं करता।और कहीं दिल लग गया तो इतना सेंटी हो जाता है कि गाता डोलता है 'जिस गली में तेरा घर न हो बालमा उस गली से हमें तो गुजरना नहीं, जो डगर तेरे द्वारे पे जाती न हो उस डगर से हमें तो गुजरना नहीं'।जो जी लग गया तो ऐसा लग जाता है कि पूरी दुनिया छोड़ बैठते है और मन उचट गया तो बाबाजी बन बैठते हैं।दुनिया छोड़ने की बात करने लगते हैं।कैसा होता है ये लगना एक पल में जिंदगी बदल देता है।बस चाह जग गई तो जग गई, लगन लग गई तो लग गई फिर तो लागी छूटे न का रिकार्ड बजता रहता है।'एक तू जो मिला सारी दुनिया मिली'का राग अलापना शुरू हो जाता है और जो कहीं जी उचट गया तो पानी पी पी के उसकी सात पुश्तों को कोसते हैं।कभी जिसके साथ जीने मरने की कसमें खाई थी ,उससे लगन छूटी टूटी तो उसी के मरने के सपने संजोते हैं, उसके दुनिया छोड़ने पर घी के दीये जलाते हैं।कैसा होता है ये लगना जो पल में तोला पल में माशा कर देता है, अपनों को पराया बना देता है।कल तक जिस एक के लिए दुनिया छोड़ी थी ,आज उसी को दुनिया से रुसख्त करने के ख्वाब बुनने लगता  है और आगे ऐसे बढ़ जाता है जैसे बटोही।

        तो बस ये लगन लगी रहे,लागी छूटे न।

लाज शरम क्यों नहीं आती

 सफर जारी है.....946

27.05.2022

आप भी कमाल की बातें करते हैं, अरे उन्होंने पढ़ रखा होगा, उन्हें याद होगा कि जिसने करी शरम उसके फूटे करम और जिसने ओढ़ी बेशर्माई, उसने खाई दूध मलाई।सो जिनकी खाल गैंडे सी  मोटी होती है ,उन्हें सुईं की चुभन महसूस ही नहीं होती।तेज से तेज पिन की नोंक भी भोंथरी हो जाती है।जान बूझ कर रोज एक कांड करना उनकी फितरत में शामिल है जिससे वे चर्चा में बने रहते हैं ।उनका सिद्धांत है पहले खूब ऊधम काटो,फिर उस पर   लीपा पोती कर दो।अकर्मण्यता की भी हद होती है भाई,काम न करने के सौ बहाने और वजह गिनाने के हजार कारण तो ऐसे लोग जेब में रखे घूमते हैं।सौ दिन चले अढाई कोस इन पर पूरी तरह चरितार्थ होता है।।एक पैरा की टिप्पणी लिखने में कम से कम चार पांच घण्टे तो चाहिए ही चाहिए और फिर उस लिखे के क्रियान्वयन में एक दो दिन  तो लगने ही है। पूरे सिस्टम में नकार जो घुली हुई है।अधिकांश की फितरत एक सी है बस किसी तरह काम से बचा जाए, उससे कन्नी काटी जाए।चोर चोर मौसेरे भाई हैं, सो नित नई नई चालें चलते हैं कि बस हाथ तक नहीं सरकाना पड़े।काले को सफेद करने की फुल प्रूफ योजना बनाते हैं और मान कर चलते हैं कि उनके इस स्याह सफेद की जानकारी किसी को नहीं होगी।खूब चतुराई बरतते कोई न कोई ऐसा सबूत छूट ही जाता है जिससे कलई खुल जाती है और सब पानी सा साफ हो जाता है।उन्हें ये भी गुमान है कि उनकी काली करतूतें किसी सीसीटीवी में कैद नहीं हो पायेगी,। उन्होंने कच्ची गोलियां थोड़े ही खेली हैं।पर वे बिल्कुल भूल गए हैं कि अगले ने कच्ची गोलियां नहीं खेली है, बाल भी धूप में सफेद नहीं किये हैं।उनकी आंखे सीसीटीवी से भी तेज हैं।चोर की दाढ़ी में तिनका इन्हें दिख जाता है।ये गर्दन तक कीचड़ में फंसे सच का सामना कर ही नहीं पाते, दो चार चोट में मुंह खोल देते हैं, सब सच उगल देते हैं।वो तो ये  इस लिहाज में मरे जा रहे हैं कि सब अपने ही हैं, काहे को थुक्का फजीहत करो।पर उनके हौसले दिन प्रतिदिन बुलन्द होते जा रहे हैं। समझदार के लिए इशारा काफी होता है पर अगला निरा मूर्ख हो, अपना भला बुरा न सोच पाये, ज्यादा ही ख़ुट सयाना हो तो क्या किया जा सकता है, एक दिन ये करम ही ले डूबेंगे।न्याय की लाठी बडी बेआवाज होती है।अचानचक पड़ती है, बेभाव की पड़ती है, इतनी दनादन तड़ातड़ पड़ती है कि आप संभल भी नहीं पाते

       ऐसा नहीं कि उन्हें पता न हो कि जो काम किये बिना खाता है, उसे अपच हो जाती है कि चोरी का सारा माल मोरी में चला जाता है कि ऊपर वाले की लाठी बेआवाज होती है कि भगवान के यहां देर है अंधेर नहीं कि पाप का घड़ा लबालब भरने पर ही फूटता है।पर वे अभी गहरी नींद और तन्द्रा में हैं। उन्हें किसी का कोई भय नहीं रहा, अपने आगे किसी को कुछ मानते नहीं, अभिमान की पराकाष्ठा है पर शायद उन्हें याद नहीं रहा कि अहंकार तो अति बलशाली रावण का भी नहीं रहा, उसे नेस्तनाबूद होना ही पड़ा तो तुम्हारी क्या हस्ती है।बस अपने दिन पूरे हुए ही समझो, बत्ती बुझने से पहले लौ बड़ी फड़फड़ाती है, बड़ी जोर से चमकती है और फिर हमेशा के लिए बुझ जाती है।     

           उन्हें बड़ा गुमान है कि हमारा कोई भला क्या बिगाड़ पायेगा,हमारी पीठ भारी है। वे नहीं जानते कि जिस भीत पर वे टिके हुए हैं , वह निरी बालू की भीत है।एक धक्के में ही ढह जाएगी।उन्हें अपने ज्ञानी ध्यानी होने का बहुत गुमान है, वे इतने भरे हुए हैं कि उन्हें कुछ सुनाई ही नहीं देता। सुनें तो तब जब कानों से रुई हटे।वे स्याह को सफेद करने की कला में माहिर हैं। उन्हें ये बोध ही नहीं कि परम् सत्ता तो कोई और है ,उसकी मर्जी के बिना तो पत्ता भी नहीं हिलता।बस दुष्टों का अंत जब नजदीक होता है तो बुद्धि घास चरने चली जाती है।कुछ सुनाई ही नहीं देता, बस सरपट दौड़ता है और ठोकर खाकर धड़ाम सीना गिर पड़ता है।उसकी नियति ही यही है।वे अपने को परम ज्ञानी मान बैठे हैं।हिरण्यकशिपु की तरह खुद को ही भगवान घोषित किया हुआ है।ईश्वर को वे मानते नहीं, परम् नास्तिक जो है।बस उनके जीवन में प्रह्लाद आना शेष है।जो स्वयम को सर्वेसर्वा मान बैठा हो, वह भला ईश्वर और उसके नामित  प्रतिनिधि को कैसे स्वीकारेगा,उसकी हेठी नहीं हो जाएगी।तो अभी उन्हें फूली फूली चरने दो, उन्हें इस गलत फहमी में बने रहने दो कि उनकी पांचों घी में और सिर कढ़ाही में है।उनका किया बहुत जल्द सामने आने वाला है।फिर सिर धुन धुन पछतायेंगे पर क्या फ़ायदा।सांप के जाए पीछे लकीर पीटने से भला मिलता ही क्या है, बस ठेंगा ही न।तो वे अभी नासमझ है, उनके पाप के घड़े भरने में थोड़ा और वक्त बाकी है तो थमे रहिये ।जिन्हें अब शरम नहीं आती, वे इतने शर्मिंदा होने वाले हैं कि शरम को भी शरम आ जायेगी और उसे छिपने के लिए कोई ठौर ठिकाना भी नहीं मिलेगा। कह सुन कर अपना मुंह क्यों गन्दा करें, उनका पतन तो निश्चित है।बेशर्मों को ऐसी शरम आएगी कि मुंह छिपाने को जगह तक नहीं मिलेगी।तुमने कहना समझाना था सो कह दिया, अब तो बैठ के तेल और तेल की धार देखिए।आप तो चुप्प बैठ के तमाशा देखने की तैयारी करो।घड़े फूटने ही वाले हैं।

परखिये चारी

 सफर जारी है.....945

26.05.2022

                इस चौपाई को पढ़ते अनुसुइया और सीता का प्रसंग याद आता है कि माता पुत्री को उपदेश दे रही है कि धीरज ,धर्म, मित्र अरु नारी, आपत काल परखिये चारी।अर्थात आपत्ति काल में ही इन चार साथियों की परख होती है ,उनकी विश्वसनीयता सिद्ध होती है कि वे विपत में पड़े  व्यक्ति का साथ देते हैं या उन्हें मुसीबत में छोड़कर पतली गली से निकल जाते हैं और अगला रोता कलपता गाता रहता है 'सुख के सब साथी दुख में न कोय',कबीर भी याद दिलाते हैं जब व्यक्ति ईश्वर तक को केवल सुख में ही याद करता है ,दुख में भुला देता है तो बेचारे मानुस को क्या पड़ी है कि वह एक साधारण से मनुष्य का विपत काल में साथ दे और अपने को आफत में डाले।हालांकि उसे धर्मानुसार नियमानुसार ऐसा करना चाहिए पर कौन मानता है नियमों को। 

      धीरज ,धर्म ,मित्र और नारी की परख विपदा के समय होती है, यह सार्वकालिक और सार्वभौमिक सच है ।पर जब बिना सन्दर्भ के इस चौपाई को अकेले उदधृत किया जाता है तो बार -बार ध्यान प्रथम अर्धाली के अंतिम  पद नारी पर चला जाता है।पहले तीन तक तो शत प्रतिशत सहमति बनती है पर नारी के स्थान पर लगता है कि जीवन साथी होना चाहिए था।ये ठीक वैसा ही मसला है जैसे आदि काल से दिए जा रहे आशीर्वाद 'पुत्रवती भव 'को 'संतति वान भव' में बदलने की मुहिम हो। सौभाग्य तो दोनों का होता है भले ही स्त्री के संदर्भ में यह सौभाग्यवती भव ,सदा सुहागन रहो या सौभाग्यकांक्षिणी के रूप में हो।सौभाग्य की आकांक्षा क्या केवल स्त्री को ही होती है ,अगला सौभागशाली होने में कोई रुचि नहीं रखता क्या, उसे इसमें गौरव की अनुभूति नहीं होती क्या '।फिर इस आशीर्वाद में ये पक्षपात क्यों।वे आयुष्मान और चिरंजीवी हैं तो ये भी आयुष्मती विशेषण से युक्त हैं, वे आत्मज हैं तो ये आत्मजा हैं ।वे वृषभानुजा हैं तो ये हलधर के वीर हैं,दोनों की जोड़ी तभी तो जमती है।चिरजीवो जोरी जुरै क्यों न स्नेह गम्भीर  ऐसे ही थोड़े रच दिया होगा।फिर आपत काल तो दोनों में से किसी पर भी आ सकता है, वह लिंग भेद देखकर थोड़े ही आएगा।आपात काल किसी एक वर्ग के लिए आरक्षित तो नहीं होता न।फिर ऐसे कष्टकारी समय में ये परीक्षा अकेली आधी आबादी की ही क्यो निर्धारित हुई होगी। इसके दायित्व से शेष पचास प्रतिशत को क्यों और कैसे मुक्त रखा गया होगा।

        ये बात आसानी से पचती नहीं है कि जब गृहस्थी की  गाड़ी के दोनों पहिये हैं तो एक पहिये  के पंचर होने ,कमजोर पड़ जाने पर ,कम पढ़े लिखे होने पर ,जड़ बुद्धि होने पर, अधिक होशियार न होने पर दूसरे को समर्थ होना ही चाहिए, इसमें कोई दो मत नहीं है।फिर इसमें लिंग भेद की बात कहां से घुस आई नारी ही को रेखांकित क्यों किया गया।चौपाई तो यूं भी हो सकती थी धीरज, धरम ,मित्र और नर नारी, आपत काल परखिये चारी।दोनों एक दूसरे के प्रति पूर्णतः समर्पित हो, घर तो तभी चलता है।एक को बिल्कुल मुक्त छोड़ दो और दूसरे के कंधे पर भारी जुआ रख दो तो ये तो बेइंसाफी हो जाएगी न।एक जल्दी थकेगा और दूसरा आराम तलब होकर केवल आदेश ही देता रहेगा तब तो चल गई गृहस्थी।पर यह भी उतना ही बड़ा सच है कि अधिकांश परिवार ऐसे ही एक पहिये पर दौड़ रहे हैं।जो जितना स्किल्ड है जिसे अपने कंधों पर सारा बोझ लादने की पुरानी आदत है ,लद्दू घोड़ा बना रहता है और अगला तिक तिक चाबुक चलाता रहता है।वह सारा वजन लादे हुए चलता तो है पर बीच बीच में कभी चिढ़ चिढ़ा जाता है,भड़कता है, कह कबा कर रिलीज होता है , फिर बैल की तरह बोझा उठा के चल देता है कि आखिर करना तो उसे ही है।पता नहीं वह ये क्यों माने बैठा है कि आसमान उसके कंधों पर ही टिका है।जैसे ही वह सांस लेने के लिए रुका, आसमान नीचे गिर पड़ेगा।जो जितना स्किल्ड है जितना कार्य कुशल है ,उतना ही अधिक कार्य में व्यस्त है क्योंकि उसे काम से बचना नहीं आता।और जो इस सब जंजाल से मुक्त है कि हमें तो करना आता ही नहीं, दरअसल कभी किया ही नहीं, ऐसे ही निठ गई।अब तीसरे पन में क्या खाक मुसलमा होंगे।ऐसे कौन से तीस चालीस बरस शेष हैं, बहुत जीयेंगे तो दस बरस और, अब इतनी कट गई तो ये भी निभ ही जाएगी।कौन आफत मोल ले।।        कह तो सच ही रहे हैं कि जब तुलसी बाबा ने लिख दई तो उसे ही प्रमाण मानो, काहे को अपनी अक्कल लगा रहे हो।

बस अगले के ऊपर ही जिम्मा डाले रहो और खुद पतली गली से निकल जाओ,अपने ऊपर आंच की छोड़ो लपट तक मत आने दो, साफ बच जाओ ।

रही बात धीरज/धैर्य की, विपत्ति आने पर सबसे पहले  धैर्य ही जबाब देता है कि अब कैसे होयगी।मुसीबत है पहाड़ सी और उससे निपटने को साधन है राई से, न जन शक्ति है न धन शक्ति,और मुसीबत आने पर बुद्धि वैसे ही ठस्स हो जाती है।तो मुसीबत में कठिनाई में विपत्ति में धैर्य बना रहे तो आधी समस्या दूर हो जाती है।धर्म तो अच्छे अच्छों का छूट जाता है, उसके दस लक्षणों में से एक भी याद नहीं रहता जबकि धर्म का पहला लक्षण धैर्य ही है।याद तो होगा ही धृति क्षमा दमोस्तेयं शौचं इन्द्रिय निग्रह, धी विद्या सत्यम अक्रोध दशकम धर्मम लक्षणम।रही बात मित्र की तो सच्चा मित्र आपत्ति काले न जहाति, गुह्यं गुह्यति गुणान प्रकटी करोति के सिद्धांत पर अडिग रहता है।कृष्ण सुदामा सी मित्रता रखता है।देता इस तरह है कि सीधे हाथ से दे तो बाएं को भी खबर न हो।तो धैर्य ,धर्म ,मित्र के साथ जीवन सहचर का जोड़ लगा दें तो बात अच्छे से हजम हो जाएगी।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...