Wednesday, August 17, 2022

देव शयन को चले गये हैं

 सफर जारी है....992

13.07.2022 

देव शयन को चले गये  हैं......

हां हां भाई, देवता क्यों नहीं सो सकते,जब सबको काम के बाद आराम चाहिए तो देवता तो हम सबसे ज्यादा काम करते हैं, तो क्या वे थकते नहीं होगें, उन्हें भी तो कुछ दिनों के लिए आराम चाहिए या नहीं। हम सबकी विपत्ति में वे सहायता करते हैं, उनके नाम जप से हमें बडी शांति मिलती है। ये तो भलमनसाहत समझो कि वे रोज रोज नहीं सोते, रात्रि जागरण करते हैं तभी तो हम चैन से सो पाते हैं। अब ये अलग बात है कि हम घर और मंदिर में स्थापित भगवान के विग्रह को विधिवत सुलाने का उपक्रम करते हैं , पर्दा लगा देते हैं और सुबह प्रभाती गाकर, घंटी घंटे बजाकर उन्हें विधिवत जगाते हैं। पर सोचो यदि भगवान भी रात में खर्राटे मारकर सोते तो हमारी समस्याओं को भला कौन सुनता और दूर करता।

कल आषाढ़ मास की ग्यारस को हरिशयनी एकादशी हो गई और देवता विधिवत शयनकक्ष में भेज दिए गए हैं। वे भगवान हैं तो चार मास में ही अपनी नींद पूरी कर लेते है और सोचो कहीं कुंभकर्ण जैसे छह महीने सोते तो कैसी बीतती। आषाढ़,सावन, भादों और आश्विन (क्वार) चार महीने बारिश के हैं,बारिश के कारण सब जगह कीचड़ और गंदगी रहती है, संत महात्मा इस अवधि में एक ही स्थान पर बैठकर भजन कीर्तन करते हैं। ये चातुर्मास जैन धर्मालंबियो के लिए भी बड़े महत्त्वपूर्ण हैं।

आषाढ़ के चारों सोमवार शीतला मैया को समर्पित हैं तो श्रावण के सोमवार महादेव को, आगरा शिव की नगरी है, राजेश्वर, बल्केश्वर, कैलाश और पृथ्वीनाथ मंदिर में भोले बाबा प्रतिष्ठित हैं, सावन की रिमझिम फुआरों के बीच परिक्रमार्थी नगर परिक्रमा करते हैं, कांवर चढ़ाते है, हर हर महादेव से पूरा परिकर गुंजायमान होता है। फिर आता है भाद्रपद... नागपंचमी, जन्माष्टमी,सलूने राखी, गाज जैसे स्थानीय पर्वों से घर परिवार में चहल पहल बनी रहती है। आश्विन मास पूर्वजों को याद करने, उनका श्राद्ध करने का है और महालया अर्थात शक्ति की उपासना को समर्पित है। दशहरे के बाद शरद पूर्णिमा और फिर कार्तिक मास की शुरुआत हो जाती है यानी करवा चौथ, अहोई अष्टमी,प्रकाश का त्योहार दीपावली, अन्नकूट का त्योहार गोवर्धन और भाई बहिन के स्नेह का त्योहार भाईदूज यानी यम द्वितीया। कार्तिक माह की एकादशी को देवताओं के जागरण का समय हो जाता है देवउठनी एकादशी ,जिसे देवोत्थान/देवठान भी कहा जाता है जागो रे देवा उठो रे देवा आंगुलिया चटकाओ देवा के मंगल गीत गवते हैं।

तो ये है देव शयन से देव जागरण की यात्रा। अब इस बीच इतने इतने त्योहार आते हैं , दुःख हो या सुख, हम जैसों का तो भगवान् ही सहारा है।हम तो भगवान का ही  स्मरण करते हैं। उन्हें छोड़कर और कहां जाएंगे भला। हमारा तो एक दिन काम न चले उनके बिना, वे सो गये गुदगुदे बिस्तर पर खराटे मार के तो हम जैसों की तो भट्टा बैठ जायेगा। हमारा उनके बिन और है ही कौन। न भाई हम तो बिलकुल नहीं जाने देंगे उन्हें सोने के लिए और वे भी पूरमपट चार महीने। भला ऐसे कहीं होता है क्या कि भक्त पुकारते रहें और तुम ऐसी गहरी नींद सो जाओ कि कान पे जूं भी न रेंगे। तो सुनो  देवता तुम्हें सोनो ही है तो सांकेतिक रुप से भले ही सो जाओ घंटा दो घंटा कू  पर वे अपने भक्तों के लिए तो आपको सोते हुए भी जागना पड़ेगा। भक्तों को इनके बिन कल नहीं पड़ती और भगवान कौन भक्तों को अधर में डाल चैन से सो पाते हैं। तो आग है दोनों तरफ बराबर लगी हुईं। भगवान एक बार को सोने का मन बनाये भी तो ये भक्त मंडली उन्हे कब सोने देगी। दूसरों की क्या कहे जब से सुना है कि भगवान चार महीने को सोने चले गये हैं, हमारो तो हालत पतली हो गई कि अब अपना दुखड़ा किससे कहेंगे, किसे सुनाएंगे, कौन हमें ढाढस बंधाएगा।

तो देवता जी तुम्हाई नाय चल रही साब, राजी राजी मान लेयो तो ठीक नहीं तो जबरदस्ती करनी पड़ेगी। तो सोने को कार्यक्रम ए रद्द कर देयो , इतने काम फैले पड़े हैं और इन्हें देखो कि फरमान जारी कर दिया कि चार महीने को सोने जा रहे हैं। घर की खेती समझ रखी है क्या। और क्या जाना जाना लगा रखा है। हाथ छुड़ाए जात हो निबल जान के मोय,हृदय ते जब जाओगे सबल बदूगी तोय।

जाने बिगाड़ी, वो ही बनाबेगो

 सफर जारी है.......991

12.07.2022

जाने बिगाड़ी, वो ही बनाबेगो.......

अब का होयगो राम जी, अब कैसे होएगी, मोये तो कछु समझ न आ रयो । बिट्टन को डकराते देख अम्मा बोली...चों हारी हारी सी बात कर रई है लली , सब राम जी संभालिंगे। बिगड़ी बे ई बनाबत हैं। नेक भगवान को ऊ नाम ले लो कर, सबन के आगे हाथ फैलात है, भगवान के आगे इतने हाथ जोड़ती तो तोय कछु न कछु उपाय जरुर सूझ जातो। भला आदमी की इतनी औकात कहां ते होएगी, वो तो निमित बन जात है पर बाय मदद करबे की प्रेरणा तो  भगवान जी ही देवें। बाके मज्जी के बिना तो पत्ता हू नाय हिले, तू का बात कर रई है बिट्टन। इन मानुस के बस को कछु नाने,  जिन्हें तो बस बेसिर पैर की हांकबे की आदत है। कछु करे चाए नाय करे पर जबान कतरनी सी खूब चलबा लेयो। कोई कोई होत ही ऐसो है कि करबे कू सींक हू नाय सरकाई जाएगी और  बात आकाश पाताल की करिंगे। एक और मुसीबत हते ऐसेन के संग के अपने आगे काहू ए कच्छू नाय समझे। बस अपनी ही सेर रखनी बिन्हे, जब देखो तब अपनी ही पेलबे में लगे रिंगे। मैंने जे करो मैंने वो करो, ऐसेन को मैं तो सिर चढ़ के बोले। अपने आगे काहू ए कछु नाय समझे। कोई समझाबे की कोशिश करें तो बा ते अटक लड़ाई मोल लेबे कू तैयार बैठे रह। बातन में बिनते कोई जीत नाय सके। बात तो ऐसी करिंगे कि आकाश में हू थेगड़ी लगा आंगे पर काऊ काम की आस मत लगा बैठियो। बस जे तो बातन के ही शेर हैं। सो बहना मेरी ऐसेन से तो बच के ही रहो। जाई में भलाई है। और तू तो खूब समझदार है, पूरी गिरिस्थी पार लगा लाई , अब नेक दुख से ऐसी गैली बाबली हे गई कि हरेक के आगे अपनो रोनो लेके बैठ जात है। लोग रो के, सहानुभूति सी दिखाए के तेरे मन की थाह ले रए हैं, और तू पेट की ऐसी भोली है कि सबन के आगे कच्चो चिठ्ठा खोल के बैठ जाएगी। जे तो हमेहु सल है कि तो पे भारी विपत ओखा परी है पर दुख अपने रस्ता ही जायेगो। ऐसे घबराएगी तो कैसे होएगी। और सुन, ऐरे गैरेन की बातन में चो आ जात है, नेक काहू ने जूठे कू कई और तू सांचे कू आस लगा के बैठ जाएगी और कई म्हा ते सहायता नाय मिली तो रोएगी बिलखेगी बिना बात कू परेशान होएगी। अरे कहबो एक बात है और करिबो दूसरी। नेक अपनो दिमाग हू तो लगानो चहिए कि काऊ ने झूठ मूठ कू सहायता करिबे की बात कह दई तो बाके ही भरोसे बैठे रह गए। ऐसे तो कही ही जात है पर जाको जे मतबल थोड़े ही होत है कि अगलो बंध गयो, बाने कही चों, अब तो बाय करनी ही करनी पड़ेगी। ऐसे नाय होय करे।

तो बिट्टन हमाई मान, भगवान ते लौ लगा, बिनते ही दिन रात कहो कर कि भगवान तुमने ई बिगाड़ी है, अब तुम्ही बनाओगे। हमने तो तुम पे छोड़ दईं है। तुम्हे लगे कि सहायता करनी चहिए तो कर दीयो नाय तो जैसे राखोगे रह लिंगे। हमाई काय, हम तो तिहारे भरोसे हैं। हमाई मैय्या एक भजन गाओ कतती... पकड़ लेयो हाथ बनवारी नहीं तो डूब जाईएंगे, हमारो कछु न बिगड़ेगो तिहाई बात जायेगी। तो बिट्टन रानी, दुख होय चाए सुक्ख बस भगवान जी में जी लगाए राखो, अपनी पतवार अपनी डोर बिन्हें सौंप देओ और तुम  ते जो बन पड़े जितनो हो सके, जितनी सामर्थ्य होय उतनो कर देओ । बाकी वे जाने बिनको काम जाने। तो हमने तो बाके हाथ डोर सौंप दई है। और बिट्टन रानी तू सुखी रहबो चाहे तो तोय ऊ जे ही करनो चहिए। जाने बिगाड़ी है वो ही बनाएगो।

डाकिया डाक लाया

 सफर जारी है...९९०

११.०७.२०२२

डाकिया डाक लाया ......

चिठिया हो तो सब कोई बांचे भाग्य न बांचो जाए पर अब तो बांचने को चिठ्ठी पत्री ही नहीं आती , डाकिया ही नहीं आता, तो चिठ्ठी कहां से आती जिसे बांचा जा सकता था।, भाग्य बांचना तो दूर की बात है । चिठ्ठी आए न आए पर फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, ट्विटर पर संदेश थोक के भाव आते हैं। आश्चर्य तो इस बात का है कि वे भी चोरी के हैं, खुद नहीं लिखे जाते इसलिए दूसरों के घर से आई मिठाई की माफिक इधर से उधर फारवर्ड कर दिए जाते हैं। यही सोच कर खुश होते रहते हैं कि आज हमने इतने अधिक संदेश फॉरवर्ड कर दिए यानी अपनी गांठ से कुछ नहीं गया और वाहवाही भी मिल गई। टेक्नोलॉजी ने लाल रंग के डाक बक्सौ लेटर बाक्स और डाकिए की छुट्टी कर दी। डाकिए बेचारे का कोई अता पता नहीं तो उस पर निबंध कौन लिखे। निबंध की तो छोड़ो, चिठ्ठी पत्री तक कोई नहीं लिखता कि उन्हे पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय और लिफाफे की जानकारी हो। जब लिफाफा ही नहीं जानते तो उस पर टिकट चिपकाने का संदर्भ तो और नहीं जानते होंगे। पोस्टकार्ड का प्रयोग मरे गिरे के समाचार के लिए होता था कि कोना फटा देखकर दूर से ही पता चल जाए कि कहीं कुछ गड़बड़ है। ऐसे पोस्टकार्ड सूचना पढ़ने के बाद घर से बहर ही रख दिए जाते , उनका प्रवेश घर के अन्दर नहीं था। अब इन पोस्ट कार्डों की जगह फोन ने ले ली है और कहीं कहीं तो फोन से संदेश देकर, लिखकर उसे सार्वजनिक कर दिया जाया है कि जिसकी मर्जी हो पढ़े और सांत्वना बधाने और सामाजिकता निभाने चला आए नहीं तो कोई बात नहीं।

        मौत के अवसर पर भी शोक प्रकट करने आये लोगों को चाय पानी बिस्किता की व्यवस्था का भला क्या औचित्य, पर अब सब बदल सा गया है। ब्याह शादी,जन्मोत्सव के निमंत्रण पत्र को छपवाने की आवश्यकता पर अब प्रश्नचिह्न लगने लगा है अरे जब सब वर्चुअल ही भेजना है तो कार्ड को भी वर्चुअल ही डिजायन कर उसे सार्वजनिक कर दो, प्रेस वाले के चक्कर काटने की जरुरत अब नहीं रही। चिठ्ठी न कोई संदेश, चिट्ठियां हो तो सब कोई बांचे, डाकिया डाक लाया, कबूतर जा जा जा मेरे प्यार की पहली चिठ्ठी साजन को दे आ , संदेशे आते हैं जैसे गाने बहुत पीछे छूट गये। अब इनकी आवश्यकता ही कहां रही। ये सब तो पिछले जमाने की यादें जैसी हैं। हालांकि ये दौर बीत चुका है लेकिन पाती की आवश्यकता तो आज भी अनुभव की जा रही है, न की जा रही होती तो राजस्थान से पाती लिखो की जबरदस्त मुहिम क्यों छेड़ी जाती। बिटिया तो आज भी अपने माता पिता को, माता पिता अपने बाल गोपालों को, भाई अपनी बहिन को बहिनें अपने भाइयों को और हम सभी पाती तो लिखते ही हैं फिर भले ही तकनीक ने उसके मोड बदल दिए हों। क्या वाकई फोन और आधुनिक उपकरणों ने पाती की जगह ले ली है या इन की तुरत फुरत सुविधा और यातायात के तेजी से बदलते साधनों ने पाती लिखने की आवश्यकता को लगभग खत्म सा कर दिया है। पहले सात समंदर पार से गुड़ियों के बाजार से गुड़िया लाने और पापा जल्दी आए जाने जैसे गाने का अब कोई औचित्य रहा नहीं। जैसी मर्जी गुड़िया चाहो ऑनलाइन मंगा सकते हो और सात समंदर पार बैठे पापा भैया से वीडियो काल से बात कर सकते हो, अब दूर रहा ही कौन जिसे चिठ्ठी पत्री लिखने की नौबत आ पड़े। अब तो सब आपके हाथ में जो छोटा सा फोन सेल नाम का यंत्र है उससे दुनिया मुठ्ठी में कर सकते हो।

        चिठ्ठी पत्री की जो शुरुआत यहां सब ठीक है आशा है वहां भी सब कुशल से होती थी, जो संबोधन और अभिवादन दिए जाते थे, वे तो सब हवा हवाई हो गए, अब तो पिता भी डीयर फादर हो गए, पति पत्नी हाय हनी और डार्लिंग में सिमट गए, आपका आज्ञाकारी, विनीत पूछ दबा कर भाग गए।अनौपचारिकता रही ही कहां। वे ज़माने लद गए जब केवल अपनी बात ही नहीं लिखी जाती थी, आस पड़ोस की दादी चाची ताई मौसी जैसे रिश्तों की कुशलता बताने और पूछने का रिवाज था। अरे ये तो छोड़ो, मानुष की बात थी, घर के गाय कुत्ते घोड़े भैंस तोता भी चिठ्ठी के विषय होते थे। पर ये सब पुरानी बात और नोस्टोलीजिया कह कर छोड़ दिया जायेगा। अब इन्हें कौन समझाए कि तकनीक मोड भर बदलती है, विषय वस्तु तो आप क्रिएट करते हो, भावनाओं पर किसी का पहरा कहां होता है, कोई भी नई खोज उन्हें थोड़े ही रोक सकती है। सच तो यह है कि अब आप के इतने इतने आभासी मित्र हो गए हैं, इतनों इतनों से जानपहचान हो गई है, आपको किसी दूसरे की जरुरत ही महसूस नहीं होती। पर ध्यान रखिएगा कि अपने तो अपने होते हैं बाकी सब सपने होते हैं। तो मिलते रहिए अपनो से, लिखते रहिए उन्हें चिठ्ठी पत्री, लेते रहिए उनकी राजी खुशी। कहीं दुनियावी भीड़ में आपके सारे रिश्ते अपनी पहचान न खो दें। आप आभासी दुनिया में मस्त रह आएं और वे रिश्ते आपके संबंधी कहीं भीड़ में बिल्ट जाए और फिर खोजे से भी न मिलें। जो चीजें आउट ऑफ साइट हो जाती है वो आउट आफ माइंड भी हो जाती है। वैसे भी आपने इन्हें दूर के रिश्ते मान लिया है, ममेरे,तयेरे, मौसेरे, चचेरे, फुफेरे रिश्तों को कजिन में निबटा दिया है। आपके सब से कनसर्न ही खत्म होते जा रहे हैं। आप ग्लोबल होने की बात जरुर करते हों पर दिल पर हाथ रख कर सोचिएगा करा आप अपनों के कितने करीब हैं, ऐसा न हो कि आधी छोड़ पूरी को धाबे, आधी मिले न पूरी पावे का हाल हो जाए। तो जुड़े रहिए अपनो से, अपने के अपनो से लिखते रहिए उन्हें चिठ्ठी पत्री, खोलते रहिए अपने मन और लेते रहिए उनकी राजी खुशी।

ये छोटे छोटे पड़ाव बहुत सुखद है

 सफर जारी है....९८९

१०.०७.२०२२

ये छोटे छोटे पड़ाव बहुत सुखद है........

बालकों का परदेश से घर आना जितना सुखद होता है चाहे वह एक छोटा अंतराल ही क्यों न हो, वापिसी उतनी ही कारूनिक होती है. घर जो खुशियों से भर उठता है, दीवारें, खिड़कियां छत से रसोई आंगन बाग बगीचे सब उदासी से भर उठते हैं, और तो और आस पड़ोस की गहमा गहमी हल्की पड़ जाती है। कल तक जो चेहरे उमग रहे थे वह एमपी अंसुवाए से हो जातें हैं, आंखों के कटोरे छलछलाने को आतुर होते है, पर उन्हें डपट दिया जाता है बाबरे हो रहे हो क्या, बालक नौकरी पर जा रहे हैं, उसे ढाढस बंधाओ, ये क्या बचपना कर रहे हो। उसके जाने की तैयारी में सहयोग करो। कोई ज़रूरी चीज छूट न जाए, वो तो बालक हैं, नई जगह देखने के उत्साह में कई बार छोटी छोटे ज़रूरी चीजें नजर अंदाज़ कर जाते हैं। घर से दूर जाना उन्हें भी उतना ही सालता है, घर उनका भी छूटता है, बचपन की यादें उन्हे भी परी लोक में ले जाती है, बारे बहिनों की शरारतें उनके मन मस्तिष्क को भी आलोदित करती हैं पर जाना तो है ही। फिर पूरा विश्व हर अपना घर है। उदार चरितानाम तु वसुधैव कुटुंबकम् का पाठ भी तो आपने ही पढ़ाया था कि सारा जहां अपना ही है। सब जगह घूमो देखो वहां की तकनीक सीखो, जी जो जहां से अच्छा मिले, उसे लेते चलो। वह भी ज़रूरी है। सब अपने ही हैं। छोटे चित्त के मत बनो, ये मेरा ये पराया ऐसा तो छोटे चित्त वाले सौंपते है। बंजारों की तरह बनो। सबको देना सीखो, बांटना सीखो, सुगंध सीमित दायरे में बंध कर नहीं रह सकती, उसे सबको सुवासित करना होता है।

खुला आसमान, विस्तृत धारती, ऊंची ऊंचे पर्वतो की चोटियां , नीलए समुंदर, दिगदीगंत सब तुम्हारे  ही है । तो सब को देखो, सबका आनंद लो, तो जब जितने समय जहां हो वहां पूरी तरह रहो, वहां के हो रहो। जैसा देश वैसा भेष रखो। बस फिर तो लौटना ही है। सबको लौटना ही होता है भला अपना देश गांव किसे प्यारा नहीं होता। यात्रा में वापिसी निश्चित होती है जैसे उड़ जहाज को पंछी फिर जहाज पे आबे, मेरो मन कहां अनत सुख पाबे। सूर ऐसे ही थोड़े लिख गए हैं। यात्रा यात्रा होती है, जीवन भी तो एक यात्रा है। मंजिल तक पहुंचने के बीच अनेक पड़ाव होते हैं जहां कुछ देर रुका जाता है, आनंद लिया जाता है, सबसे मिला जुला जाता है, यात्रा के प्रसंग सुनाए जाते हैं, भावनाएं अनुभूतियां कही, बांटी और शेयर की जाती हैं,पीपीएल फोटो शोटो लिए जाते हैं, खाया पिया घूमा सूमा जाता है। कहने को सब किया जाता है पर बहुत कुछ ऐसा फिर भी रह जाता है, बिटबीन द लाइंस मिसिग रह जाता है जिसे शब्दों में नहीं बांधा जा सक्ता। ढेर सामान की पोटली बांध दो फिर भी कितना कुछ छूट जाता है। हजार लाख बार सीने से लगा लेने, पुचकार लेने के बाद भी मन कहां भरता है माता पिता का, वह तो पीछे पीछे सरपट दौड़ लगाता है। जातें हैं तभी तो वापिसी होती है। तो बालक बच्चे आते जातें रहें, जहां रहें खुशियां उनके आसपास मंडराती रहें। मन भारी है पर कोई नहीं हंसी खुशी विदा करते हैं सी आफ करते हैं। ईश्वर तुम्हें स्वस्थ और प्रसन्न रखे। कहा भए जो बीछुरे तो मन मो मन साथ, गुड़ी उड़ी आकाश में तऊ उडावक हाथ ।

मानुष से भले पशु

 सफर जारी है.....९८८

०९.०७.२०२२

मानुष से भले पशु.....

सा विद्या या विमुक्तये, विद्या हमें ज्ञानवान बनाती है, पशुता से दूर रखती है, हमें सच्चे अर्थों में मानव बनाती है। विवेक और बुद्धि हमें पशुता से बचाए रखते हैं, पाशाविकता से दूर रखते हैं,हममें मानवीयता का विकास करते हैं, मानुष और पशु के बीच रेखा खींचनी हो तो सबसे पहले पढ़ाई की बात की जाती है,व्यवहारिकता की बात हो तो कहा जाता है कि मनुष्य होते सोते इतनी तमीज भी नहीं कि बात कैसे की जाती है, यदि कोई ज़्यादा ही कांय कांय करें तो कह दिया जाता है कि निरे पशु हो क्या, कोई खाना खाते समय चपर चपर आवाज़ करे तो उसे भी टोक दिया जाता है कि मानुस की तरह रहा कर ।तो इसका सीधा सीधा अर्थ यही निकलता है न कि मानुष और पशु में भेद होता है, मानुस पशु से श्रेष्ठ है, यह श्रेष्ठता विवेक के कारण है। हमें जीवन में पशुता से उठ कर मानवता तक जाना है, निरंतर प्रगतिशील होना है तभी हमारा मानव होना सार्थक होगा।

              अब सच यह है तो मुहावरे, लोकोक्ति और व्यंजना में पशुओं के आचरण को क्यों मानक मान लिया जाता है ?कुछ नमूने देखो जरा.... कुत्ता तक बैठता है तो पूंछ से जगह झाड़ कर बैठता है, गाय सा सीधापन हर मां अपनी बेटी पर आरोपित कर लेती है, कोयल की कूक की मधुरता का कोई सानी नहीं, कुत्ते की स्वामीभक्ति से भला किसको इंकार होगा , शेर सा वीर बालक सबको चाहिए ही पर बलि का बकरा बनने ,बकरी की मिमियाहट, बकरी से क्यों मिमियाते हो,बिल्ली की खिसआहट, खिसआनी बिल्ली खंभा नोचे, बंदर की घुड़की से भला कौन डरता है,कुत्ते का भों भों भौंकना, भैंस सी मोटी खाल, तोते सी रतंत विद्या, कौए की कांव कांव, चूहे की कुतराहट, भैंस की डकराहट, मेढक की टर्राहट, गधे की रेंकाहट , रंगा सियार, सांप सी टेढ़ी चाल , गधे सी बेवकूफी, उल्लू की सी मूर्खता, मेढकी का जुकाम, चील के झपट्टे और चील के घोंसले में मांस रखने से सबको परहेज है , बन्दर बांट कोई नहीं चाहता,पर मां बच्चे के लिए गाय सी रंभाती है, न्याय सबको नीर क्षीर विवेकी हंस सा चाहिए, प्रसन्नता में मन मयूर सा नाच उठता है, चीते की सी तत्परता भला किसे पसंद नहीं, बैल की श्रम शीलता, चींटी सी निरंतरता , चूहे का शेर का जाल काटना यानी जहां काम आबे सुई कहा करे तरवार, कबूतरों का शांति दूत बनना और एकता के साथ जाल लेकर उड़ जाना भला किसको पसंद नहीं आता। कभी कभी तीतर के हाथ बटेर भी लग जाती है और ऊंट पहाड़ तले आ जाता है तो कभी ऊंट के मुंह में जीरा रख दिया जाता है।

बचपन से इन पशु पक्षियों के मध्य ही तो मानुष रहता है , चिड़िया उड़ कौआ उड़ खेलता है, गाय हमारी माता है, हमको सब कुछ आता है। गाय , कुत्ता, बिल्ली,घोड़ा, ऊंट , हाथी जैसे पालतू पशुओं पर निबंध लिखता है,उनकी उपयोगिता जानता है, घोड़े की शक्ति से परिचित होता यह भी सीख लेता है कि घास और चने में बहुत शक्ति होती है ,गाय घास भूसा चरी खली खाकर पौष्टिक दूध देती है । ऊंट, घोड़ा, भैंसा गाडी में जोते जाते हैं, गधे बोझा ढोते हैं तो हाथी ऊंट की सवारी की जाती है, घोड़ी के अभाव में दूल्हे राजा की बारात की शोभा नहीं होती। चूहा गणेश का वाहन है तो मोर कार्तिकेय का, वृषभ नंदी शिव का तो शेर दुर्गा का, लक्ष्मी उलूक पर विराजती हैं तो माता सरस्वती हंस पर। मृत्यू के देवता यमराज को भैसे की सवारी रास आती है तो कन्हाई को धौरी श्यामा गाय पसंद है। 

इन पशुओं से नाते रिश्ते भी जोड़ लिए गए हैं गाय माता तुल्य है, वह अमृत तुल्य दुग्ध का पान कराती है बिल्ली मौसी है तो बन्दर मामा। फिर पशु तो मनुष्य के सबसे अधिक नजदीक हैं। कभी कभी तो  पशु की अन्य जीवो के प्रति ममता मानवों के लिए मिसाल बन जाती हैं। कैसे कहें कि पढ़ने से ही मानवता आती है। पशु तो बिना पढ़ाई के भी सहृदय होते हैं, बिना छेड़े वह भी नहीं काटते। अपनी रक्षा के लिए भौंकते जरुर हैं। अब प्राण रक्षा तो उनका भी धर्म है। तो सच यह नहीं कि पशुओं में पाशविकता होती है और ऐसा है भी तो वह उनका स्वभाव है। पर मनुष्य विवेक शील होकर ,विद्यावान होकर भी यदि पशु जैसा आचरण करें तो उसे किस श्रेणी में रखा जाए। पशु पशु होकर भी मानव के साथ मित्रता निभाने का बूता रखता है पर मनुष्य अपना सारा विवेक खो पशुवत आचरण करता है, इससे बड़ा दुर्भाग्य मानव जाति का क्या होगा।

पढ़े और बड़े लोग

 सफर जारी है.....९८७

०८.०७.२०२२

पढ़े और बड़े लोग.......

हां हां, वे बहुत बड़े हैं, बहुत पढ़े लिखे हैं, जो भी उपाधि होती हैं उन्होने सब ले रखी हैं, एम ए बी ए सब कर रखा है पीएच डी और डी लिट भी कर रखा है, बहुत सारे इनाम और मेडल भी जीत रखे हैं , इनके ड्राइंग रूम में बहुत से प्रशस्ति पत्र , शील्ड भी सजी हुई है। घर में एक विशाल पुस्तकालय है जिसमें दुनिया भर के बड़े बड़े ग्रंथ हैं, कोश हैं, इनसाइकलोपीडिया है, सूक्ति, मुहावरे कोश हैं। उनके यहां बुद्धिजीवियों का हमेशा जमावड़ा लगा रहता है। वे बड़े बड़े कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि और अध्यक्ष होते हैं, उनके गले मालाओं से लदे रहते हैं, ढेरो ऑटोग्राफ देते वे जनसमूह में बहुत प्रशंसनीय और बहुचर्चित हैं।

      तो ऐसे पढ़े लिखे महानुभाव से कल भेंट का अवसर मिला, मन बल्लियों उछल रहा था कि आज तो बिल्ली के भाग से छींका फूट गया, हमें भी इतने बड़े और बहुपठित महापुरुष से मिलने का सौभाग्य मिल रहा है, कल को हम भी  बहुत ठसके से सब को बता पाएंगे कि हम भी अमुक अमुक से फलाने ढिकाने से मिल चुके हैं, उनके मिलने वालों की सूची में हमारा नाम भी दर्ज होने जा रहा है। खैर हम वहां पहुंचे, बाहर आगंतुकों के लिए बने कक्ष में बिठा दिए गए, लम्बे इंतजार के बाद एक व्यक्ति ने सभी के एपोयंटमेंट चेक किए और सबके विजिटिंग कार्ड मांगें। हम भौंचक्के से देख रहे थे कि एक पढ़े लिखे को दूसरे पढ़े लिखे से मिलने के लिए पूर्व में समय लेना पड़ता है। रही विजिटिंग  कार्ड की बात तो वह तो हमने कभी छपवाया ही नहीं था, सोचा था जब साक्षात जा ही रहे हैं तो चेहरा वे देख लेंगे और नाम हम बता देंगे पर नियम तो नियम है, उससे तो छूट मिलने से रही। सो एक पर्ची पर हमने अपना नाम लिख दिया, फिर कहा गया आप कहां से है, क्या करते हैं, अपना पद नाम भी लिख दें। यानी यदि हम कहीं काम नहीं करते, हमारा कोई पद नहीं है तो हम बड़े लोगों से मिलने के योग्य ही नहीं ठहरते। मरता क्या न करता।अंत में उस पर्ची पर प्राथमिक शिक्षक पदनाम लिख दिया और पर्ची उन्हें थमा दी।

      सब के नम्बर आ गए, लोग जाएं और घंटे घंटे भर बाद बाहर निकलें। हमारा नंबर जब दोपहर तक नहीं आया तो बड़ी कोफ़्त हुई कि हम क्या ऐसे गए बीते हैं कि सुबह से आये बैठे हैं और अगले ने अभी तक कोई नोटिस ही नहीं लिया, अरे ऐसे काहे के बड़े हैं जो अगले के समय का ध्यान ही नहीं रखे। आखिरी कोशिश और कर लेते हैं सोच कर उनके निजी सचिव से फिर पूछा कि क्या मैं अंदर जा सकता हूं। मैं बस मिलने चला आया, मुझे कोई विशेष काम नहीं है। सचिव के जबाब की प्रतीक्षा किए बिना ही अंदर चले आये। बड़े साहब पढ़े लिखे महानुभाव अपने मित्रों के साथ गपशप में मशगूल थे। हा हा ठी ठी का माहौल था। हमें देखकर चौंके आपका परिचय, वे कुछ बोलें उससे पहले ही हम शुरू हो गए कि मैं प्राथमिक पाठशाला में पढ़ाता हूं ,बस आप की बहुत चर्चा सुनी तो मिलने चला आया। इतना कहते ही पासे पलट गए, वे क्रोध में आ गए और अपने निजी सचिव को बुलाकर कहने लगे क्या इन्होंने मिलने का समय लिया था, सचिव की घिग्घी बंध गई , वह कुछ कहते,इससे पहले ही हमने कमान संभाल ली। जी, मुझे काफी देर हो गई तो मैं स्वयं चला आया। देखना चाहता था बहुत अधिक पढ़े लिखे कैसे होते हैं, मेरा कद तो बहुत छोटा है आपके सामने। इतनी मोटी मोटी पुस्तकें ग्रंथालय में हैं निश्चित ही आपने इनका अध्ययन अवश्य किया होगा। क्या आपने समय की महत्ता के विषय में नहीं पढ़ा। एक व्यक्ति कोसों दूर से आपके पास केवल मिलने चला आता है और आप उसे पहले से समय न लेने के कारण, विजिटिंग कार्ड न होने के कारण अंदर नहीं बुलाते। उसके समय की कीमत आप नहीं समझेंगे क्योंकि आपने पढ़ा भले ही हो पर आप गुने बिलकुल भी नहीं हैं। पढ़े लिखे और बड़े व्यक्ति की पहली पहचान यह होती है कि वह सामने वाले का सम्मान करता है, उसके समय की कीमत समझता है। वह थोथी बातों में समय नहीं लगाता, व्यवहार कुशल होता है, आगंतुक से धा पा के मिलता है। व्यक्ति किताबें रखने से बडा नहीं होता, आचरण की शुचिता से बडा होता है। माफ कीजिएगा श्रीमान जी, आज मेरा भ्रम टूट गया कि पढ़े लिखे होना ही बड़प्पन की पहचान है। पुस्तक स्थित विद्या यदि समय पर काम नहीं आती तो वह काहे की विद्या। विद्या तो व्यक्ति को विवेकशील बनाती है, विनयी बनाती है, शिष्टाचारी बनाती है, व्यवहार कुशल बनाती है। सबको समान समझने का निर्देश देती है। धिक है आपकी विद्या पर , आपके पढ़े लिखे होने पर।

      तो पढ़ो कम गुनो ज्यादा, रहो सादा करो वादा, बनो शिष्टाचारी तो कहलाओगे सदाचारी और व्यवहारी।

प्यार मनुहार की दावतें

 सफर जारी है....९८६

०७.०७.२०२२

प्यार मनुहार की दावतें.....

तो सुनो किस्सा हमाए गांव की दावत को। छोरा को ब्याह हतो, माड़े की दावत चल रई, अब माड़ो जानत हो कि नाय, छोरा के मामा भात लाए करे बा दिना माड़ो गाड़ो जाय, दामाद  नाय तो फूफा गमला में एक बांस गाड़ो करें, बापे पत्ता छा के सजायो जाय, बाके नीचे ही ब्याह के सबरे काम होय करे। जे वरनी को गीत तो खूब सुनो होयगो....मडये के बीच लाडो ने केस सुखाए, बाबा चतुर वर ढूढो सुघढ वर ढूंढो दादी लेंगी कन्यादान, लाडो ने केस सुखाए। माड़ो मंडप ते कहबे, ब्याह तो मंडप में छये में ही पढ़ो जाबे, फेरा, कन्यादान सब रीत वहीं होबे। कछु सल राखो करो। पर तिहारी हू गनती नाने, आज को माने इन बातन ने, झट सीना कोरट मैरिज कर लेबे और महतारी बाप हू करे तो ऊ दस बारह दिना के ब्याह चार घंटा में निबट जाबे। पहले की तो बात ही और हती, कम से कम पांच दिना की तो लगुन ही निकलती कबहू कबहू तो सात दिना के ग्यारह दिना की हू हो जाती। घर में पीसना होतो,हल्दी फोड़ी पीसी जाती खल्लड मूसली ते ,सूप में कलाबा बांध के गेंहू फटके जाते, हथलगुन बनती, खीकड़ी बताशे कौमुरी मेंहदी बांटी जाती,  थापे धरे जाते, रतजगा होतो , ढोला गबते ....चिड़ी तोय चामरिया भावे, घर में सुंदर नार बलम तोय पर नारी भाबे दुपट्टा रेशमी।बैयर बानी खोइया करती खूब हंसी मजाक चलतो, गाली गबती, ढोलक पुजती। अब काऊ पे टैम ही नाय तो सब गड्डमद्द है गयो, बस दो घंटा में सब निबट जाबे। और का कहते बाय लेडीज संगीत बामे कोई गीत न गाबे बस सबरी डेक बजा के उल्टो सीधो डांस करे।

             का कह रए और कितकू भटक गए, अब जे  दिमाग ही तो है कभी कितकू चलो जाए और कबहू कितकू। तो हम तुमकू ज्योनार को किस्सा सुना रये। पत्तल बिछ गई है, कुल्लड़ सकोरा भोलुआ धर दए हैं। तुमने पत्तल पे पानी छिड़क लयो है , काऊ लंग ते शोर उठ रयो है भईया पत्तल बदल देयो, कुल्लड़ तो चुचा रयो है, सकोरा की किनोर झड़ रई है, हमकू तो न्यो सो दे दे। अब परसवैय्या आ गए, कासीफल को हरी अमिया डाल के साग बनो है, आलू को लपटेबा साग है, अब झोल आ गयो साब, सन्नाटो ऊ परसो जा रयो है। अब दही बूरा को नम्बर लग गयो, सकोरा में ताजो गाड़ो गाड़ो दही भर दयो और खोंच भर के बूरा डाल दयो है।  बूंदी के लडुआ, रसगुल्ला, रबड़ी मीठो धरो जा रयो हैं। अब गरमा गरम पूरी कचौरी को नम्बर लग गयो है। जेमो साब की पुकार लग गई है, पत्तल के भोजन में से पांच कौर निकाल के बापे जल छिड़क के मोंह में हाथ देनो शुरू हे गयो है। अब दुबारा परसवाई शुरू हे गई है। अब सुनो परोसबे और खबवैया के बीच को वार्तालाप रायतो रायतो.... नाय तो, पूरी.....रख दूरी ,जे पूरी लियात है हर पोत, जा किचोरी लिया एक नरम गरम सी, दही बूरो.... भोलुआ भर दे पूरो , रबड़ी....धर जा सबरी। पूरी कौन खाए जब रबड़ी जैसो तर माल सामने होय, रबड़ी झिक पेट खा लई तो अब लडुआ और गुलाब जामुन को नम्बर लग गयो और जा पाछे सन्नाटो पीयो जा रयो है धकापेल। अब पंगत उठ रई है, पत्तल दोना सकोरा समेटे जा रये हैं। अब दूसरी खेप तैयार ठाढी है। सांझ तक जे ही रेलमपेल मची रहेगी। फिर दूसरे दिना बारात की तैयारी शुरू हे जाएगी। ब्याह वाले घर में निरो काम होय करे, शहरन की तरह बाप महतारी ए हाथ बांधे बाबूजी मैम बने घूमबे की फुरसत नाय होय करो। पूरो गांव ब्याह के कामन में हाथ बंटाए करे।

              तो ऐसी होत करे, हमाए बिरज के गांव की दावत, घूम जइयो कबहू टैम होय तो। पर तुम पे टैम कहां होयगो, टैम की ई तो किल्लत है। कित्तो सारो काम फैलो परो है, बाय समेटे कि तुमायो किस्सा सुने। तुम पे तो कछु काम नाय, रोज एक नयो किस्सा सुनाबे बैठ जाओ, तिहाई भली चलाई। हमाए तो आफिस को टैम भयो जा रयो है, सो बाकी को कल सुनाइयो, भली। जैसे हम तो ठाले बैठे हते, हम पे कोई काम नाय, अरे बाबरो सबते मिलबो जुलबो चहिए, सब ते बात करो, बाकी सुनो अपनी सुनाओ, मन हल्को हे जाबे और कछु नाने, राम राम सबन कू।

मोकू लायो है कहा

 सफर जारी है....९७५

०६.०७.२०२२

मोकू लायो है कहा ......

उद्धव जब कृष्ण की पाती लेकर आते हैं तो गोपिकाएं जानना चाहती हैं कि कृष्ण ने उनके लिए क्या लिख भेजा है

मोकू लिखो है का कहती वे सभी उस पत्र में अपना नाम देखने की उत्सुक हैं वे सांवरे के प्रेम में पगी हैं लेकिन ज्ञान बाबरी नहीं हैं, उन्होने तो केवल प्रेम का ढाई आखर ही पढ़ा है। बाकी कुछ नहीं जानती। बेचारे उद्धव महाज्ञानी होने का दंभ पाले बैठे थे कि गोपिकाओं को ज्ञान दे कर आयेंगे। यहां तो संदर्भ ही उलट पलट गया, पूरी पाती खींच तान में फट गई, और गोपियों चिंदी चिंदी कागज ले उसे ही हृदय से लगाए बैठी है कि कृष्ण ने उन के लिए कुछ भेजा है, इससे बडा सौभाग्य उनका और क्या होगा। निर्गुण की उपासना करने की सलाह देते उद्धव को कह देती है हमारे पास तो एक ही मन था जो हम कृष्ण को दे चुके हैं, अब दूसरा मन कहां से लाएं। ऊधो मन नाही दस बीस , एक हतो सो गयो श्याम संग को आराधे ईश।

सोचो वहां तो उद्धव आए थे तभी गोपियों को इतना सुख मिला कि कम से कम हमारे प्रिय के पास से कोई आया तो है, उससे ही खबर मिल जाएगी प्रिय की। पूरे माहौल में विरह ही विरह घुला हुआ है लखियत कालिंदी अति कारी या मधुवन तुम कत रहत हरे, विरह वियोग श्याम सुंदर के ठाढे क्यों न जरे। जब प्यारे कन्हैया के आने की खबर और खबर लाने वाले दूत का आगमन इतना उत्साह भर देता है तो यदि सचमुच में प्यारा कान्हा आ जाए तो सब जैसे जी उठते हैं और दुनियां भर की मांओ के लिए तो उनका लाला ही कन्हैया होता है। उसके आने की खबर से ही उसकी बीमारी उड़नछू हो जाती है, मन उत्साह से भरा भरा रहता है और प्यार छलका छलका पड़ता है और कहीं वह सपना सचमुच पूरा हो जाए , आपका लाडेसर भले ही एक सप्ताह को आपके पास चला आए तो परिवार में कैसी खुशी की लहर सी दौड़ जाती है, लगता है जेठ की तपती धूप  अचानक ही सावन की हरियाली में बदल गई हो, जो पौधे धूप से झुलस से गए थे, एकदम सरसा गये। मन और तन कैसा फूल सा हल्का हो जता है।तो हमारा कान्हा भी माता पिता दाऊ भैया और सारे ब्रज वासियों से मिलने चला आया है। बड़े बड़े सूटकेस जादू के पिटारे हैं , खुलते दर खुलते जा रहे हैं, एक से एक करामाती वस्तुएं निकलती जा रही हैं, पर कोई नहीं कह रहा कि माेकू लायो है का, मोकू लायो है का, जो जो उनके लिए लाया गया, सबने सिर माथे लगाया है। लाला आया है यह बडी बात है, लाना तो सेकंडरी है। छोटा सबकी पसंद का ध्यान रख कर कुछ कुछ जरुर लाया है। सबकी रुचि इन सबसे अधिक बातों में है, कितनी कितनी बातें हैं जो सोच के रखी थीं हजार बारह सौ दिन कम थोड़े ही होते हैं, इतने दिनों की बातों को रोज का रोज लिखा गया होता तो अब तक तो ग्रंथ के ग्रंथ तैयार हो गए होते और कहीं भावनाओं के रेखाचित्र उकेरे गए होते तो कितने कितने चित्रों के बंडल होते जिन्हें सुरक्षित रखने को अभिलेखागार भी छोटे पड़ जाते। पर अब सब भूले जा रहे हैं अब उसे जी भर के देखें कि बात करें कि उसकी पसंद का सब बना बना के खिला दें कि नए देश की बातें पूछें कि उसकी सृजन शीलता के नमूने देखें कि समय को पकड़ें। समय तो यू ही भागा जा रहा है, लाला को भी ढेर सारे काम निबटाने हैं। सब जैसे गड्डमड हुआ जा रहा है।

सदा से ही  कम बोलने वाले पिता का मौन मुखर हो गया है । बडेला का प्यार लुटाने का तरीका अलग है , बहन का स्नेह है, बुआ का दुलार है, मौसी का लाड है और मां , उसका तो कहना ही क्या। उसकी तो आंखें भी बोलती है, ध्यान लगा कर बात सुनते भी वह कितने कितने स्वप्न बुनती  हर पल को संजो कर रखने के यत्न में लगी है। लाडेसर ज्याडा ही लड़ैता है तो कई कई बार उसे ममा बॉय का उपनाम भी मिल जाता है। अब पिटपुछने कितने बड़े हो जाएं, मां के लिए तो गोलू मोलू ही बने रहते हैं,मां की गोद का दायरा कम थोड़े ही हो जाता है। सो एक एक मिनट क्या एक एक सैकंड का महत्व है। एक लंबे अंतराल में कितना कुछ घट गया, घर की बुजुर्ग अम्मा का साया छिन गया, कोरोना की विभीषिका से तो कोई अछूता नहीं रहा। सब समय निकल ही गया। अब कुछ उबरे हैं। घर में उत्सव सा माहौल है, दीवारें भी बोलती सी लगती हैं, हवा अचानक से शीतल हो गई है, उमस गर्मी बैचेनी सब भूल भाल गए हैं, बस इसअवसर के एक एक पल को पूरी तरह जीने का मन है। तो जीते है इन पलों को पूरे शिद्दत से।

आलस वैरी तन बसै

 सफर जारी है.....९८४

०५.०७.२०२२

आलस वैरी तन बसै......

जो भी छोटा बडा काम करना हो, उसे कल पर वे लोग छोड़ते हैं जो अपने कमफर्ट जोन से बाहर ही नहीं निकलना चाहते। वे जैसा है सब वैसा ही रहने देते हैं पर स्थितियों को लेकर हमेशा रोते झींकते रहते हैं कि काश हम ये कर लेते वो कर लेते और फिर सारा दोष परिस्थिति या व्यक्ति अथवा वस्तु पर डाल दिन भर उसे ही आलोचित करते रहते हैं। मसलन नाच न जाने आंगन टेढ़ा या बाबा आबे तो घंटा बाजे को अपने जीवन का ध्येय वाक्य बना लेते हैं। उन्हें चाहिए तो सब पर वे स्वयं को रंचमात्र भी कष्ट नहीं देना चाहते। उनके मानस में यह बात अच्छी तरह बैठ गई होती है कि अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम, दास मलूका कह गये सब के दाता राम। वे तो उस दाताराम को भी चेलेंज कर देते हैं जब हमें ही करने को उठना पड़ा, तो तुम्हारी क्या उपयोगिता रह जाएगी। हम तो नौकरी के लिए आवेदन तक नहीं देंगे, अब दाताराम हैं तो हमें घर बैठे नौकरी देंगे, अपॉयंटमेंट लेटर हमारे घर चल कर आएगा, कोई सहायक हमें कुर्सी पर बिठा देगा। और फिर हम दाताराम को भूल भुला कर अपने को सर्वेश्वर मांगने लगेंगे कि देखो हमें तो बैठे बिठाए नौकरी मिल गई, क्या करें स्कूल प्रबंधन को हमारी बहुत जरुरत थी, माने ही नहीं वे, जबरन कुर्सी पर बैठा दिया।

यानी वे कहते भले हो सबके दाताराम पर वे अर्धाली पर ही जोर देते हैं अजगर करे न चाकरी। ये दोहा उन्हें इतना रट जाता है कि कबीर तो इनके स्वप्न में भी नहीं आते। कबीर को पढ़ा और गुना होता तो जानते कि आज करे सो काल कर काल करे सो अब, पल में परलै होएगी बहुरि करेगो कब। वे सब काम कल पर छोड़ देते हैं कि कल की कल देखी जायेगी, आज तो आनंद करें।और मजे की बात है कि कल कभी आता ही नहीं ।कल आज बनते ही कल में बदल जाता है। इस कल की बड़ी महिमा है, इसने अच्छे अच्छों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। इस कल के चक्कर में सब काम कल पर छोड़ दिए जाते हैं और ये बदमाश कभी आता ही नहीं, रोज़ कल की गुंजायस शेष रह जाती है। आलसियों के पास बहानों की लम्बी सूची तैयार रहती है कि आज मन नहीं है, कल देखेंगे। अरे छोड़ो कौन करे, ऐसे ही ठीक है। यानी कुछ कुछ कह कर अपने मन को तसल्ली देते रहते हैं कर के ही क्या हो जायेगा, जो कर लेते हैं उन्हें भी तो अंत में मरना ही होता है फिर ज़माने को क्या याद रह जाता है, तो हम तो बिना करे ही ठीक हैं। कोई अपनी दिन रात की मेहनत से अब्बल रहे, तो उसकी आलोचना करते डोलते हैं अरे हमें सब पता है बास की चमचागिरी की होगी, रिश्वत खिलाई होगी, तरक्की ऐसे ही थोड़े ही मिलती है। मतलब यह है कि खुद कुछ करेगें नहीं और दूसरों में दोष खोज खोज कर , उनकी आलोचना कर अपने मन को तसल्ली देते रहते हैं कि हम तो ऐसे ही भले। और वे करें भी क्यों, भाग्य के इतने धनी हैं कि कोई न कोई बकरा  बलि देने को उन्हें मिल ही जाता है और जो किसी ने इनकी हुक्म उदूली की तो उसे बेइज्जत कर अपने जीवन से ही बाहर फैंक देते हैं। कठोर और असंवेदनशील तो इतने अधिक होते हैं कि अगला इनकी देहरी पर सौ बार नाक रगड़े, अनकिए की माफी मांगता रहे, आंसू बहाता रहे पर इनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता, वे उसे अपने जीवन से दूध में पड़ी मक्खी सा निकाल फैंकते है। यानी जो उनके अनुरूप नहीं चलेगा वह आउट आफ साइट हो जायेगा।

इन महा आलसियों के किस्से बड़े रोचक हैं। उन्हें करने की आदत तो होती नहीं, सो पिछले किए को भुनाते रहे हैं। मसलन पहले तो मैं ये कर लेता था वो कर लेता था, बस अब इच्छा ही नहीं होती करने की। करने को तो आज भी कर लें पर बिना हाथ हिलाए ही यदि सब किया कराया मिल जाए तो इन दामों में क्या बुरा है। बस हम नहीं बदलेंगे, ऐसे थे और ऐसे रहेंगे। 

आपके आस पास भी ऐसे आलसी जरुर होंगे। उनसे अपने को बचा के रखिएगा। वे आलसी हैं तो हुआ करें, अपनी करनी को वे भुगते, बिना साफ सफ़ाई के गंदगी में उनको रहना रास आता है तो आए, अगले को भला क्या परेशानी होगी। वे जैसे हैं वैसे बने रहें, अपने आलस का फल भोगे, उन्हें भोगना ही होगा, वे इससे बच ही नहीं सकते। पर अपने अकर्मण्यता के छीटें दूसरों पर डालने से बाज आएं। बहुत फूली फूली चर ली उन्होंने, अब कोई बलि का बकरा नहीं बनेगा। आलस उनका, अकर्मण्यता उनकी, काम न करने का फैसला उनका, कमफर्ट जोन से बाहर आना वे नहीं चाहते,यथास्थितिवाद में वे बने रहना चाहते हैं तो ठीक है वे रहें और उसका परिणाम भुगते। उन्हें यही जीवन शैली रास आती है तो आया करे, लोगों को क्या परवाह। अरे परवाह तो अपनो को होती है। वे बार बार सुभाषित, उदाहरण और कहानी इसलिए ही सुनाते हैं कि शायद रोज रोज कहने से कुछ बदल जाए, अगले की समझ में भर जाए क्योंकि रसरी आबत जात से पत्थर पर भी निशान पड़ जाता है फिर वे तो मनुष्य हैं, शायद कहीं संवेदना,अच्छाई, समझ दुपक के बैठी हो और किसी बात का मारक प्रहार हो जाए और अगला सोते से जग जाए। किस किस को सुधारोगे, यहां तो हर शाख में उल्लू बैठा है और फिर ये भी नहीं भूलना चाहिए कि लंका में सब बाबन गज के ही होते हैं तो बात कह भले ही दो पर सुधार की कोई उम्मीद मत रखो। अपना काम करो और आगे बढ़ जाओ बस।

 सफर जारी है.....९८३

०४.०७.२०२२

हाशिए भी ज़रूरी हैं.....

जो परिधि से बाहर हैं, वे हाशिए पर ही हैं । पेज तक पर लिखते हाशिया छोड़ दिया जाता है। हाशिए अक्सर उपेक्षित ही रह जाते हैं, वे पेज की शोभा बढ़ाने के लिए होते हैं, अनुच्छेद परिवर्तित करना हो तो हाशिए के बाद भी कुछ स्पेस छोड़ दिया जाता है। रूलदार कागज हो तो हाशिए अनिवार्य रूप से होते ही हैं पर सादा कागज पर भी स्केल से हाशिए खींच लिए जाते हैं। दरअसल हाशिए पृष्ठ की शोभा को द्विगुणित करते हैं। तो हाशिए हाशिए होते हैं, वे मूल पृष्ठ नहीं होते, हां पृष्ठ का ज़रूरी हिस्सा अवश्य कहे जाते हैं।अब ये अलग संदर्भ है कि कुछ जरुरी नोट्स सदैव से हाशिए पर ही लिए जाते हैं । बहुत कुछ छूटा भी हाशिए पर ही लिखा जाता है। जांचक भी सुझाव और अंक उसी पर टीप देता है। तो इसका एक अर्थ यह भी हुआ कि हाशिए कभी कभी मुख्य पृष्ठ से महत्वपूर्ण हो सकते हैं। हां, उन पर मूल विषय वस्तु सुंदर सुंदर सुडौल अक्षरों में नहीं लिखी जाती। जो भी टीपा जाता है दरअसल वह मूल को अधिक व्यवस्थित करने के लिए तो बहुत महत्वपूर्ण होता है पर वह मूल नहीं होता।l

मूल ज्यादा बड़ा है या उसे सुडौल सुव्यवस्थित सुघड़ बनाने वाला हाशिया। कहीं कहीं तो मूल लिखे में इतनी काटपीट होती है कि सब हाशिए में ही सुधार सुधार कर लिख दिया जाता है और उस लिखे को फिर दूसरे नए पेज पर उतारना होता है ठीक वैसे ही जैसे संतान को जन्म तो जननी ही देती है पर कई बार उसे सर्वश्रेष्ठ सर्वोत्तम बनाने और सर्वोच्च आसन पर बैठाने का कार्य जननी के अभाव /अनुपस्थिति में पालिता करती है फिर भी पालिता जननी पद तो नहीं ही पाती न, जिन्दगी भर हाशिए पर ही बनी रहती है। दोनों एक दूसरे के पर्याय नहीं हुआ करते।हाशिए का वजूद परिधि के आगे सदैव बौना ही रहता है। यदि ऐसा है भी तो क्या, परिधि हाशिए भले ही क्षितिज की तरहआपस में कभी न मिले पर अपने अपने वजूद के साथ अस्तित्व में सदा ही बने रहते हैं। 

तो घर,परिवार,समाज,कार्यस्थल हर जगह हाशिए जैसे लोग बहुत ज़रूरी होते हैं, वे होते हैं पर नहीं होते। दिखते नहीं है पर बीम की तरह संभाले सब रहते हैं। स्तंभ की तरह सदैव खड़े रहते हैं। हाशिए हमेशा सजग होते हैं। उन्हें दौड़ के सब संभालना जो होता है। परिधि पर सूक्ष्म दृष्टि गढ़ाए रहते हैं, सबका अवलोकन करते रहते हैं , जहां गलत होता दिखा, सही करने दौड़ते हैं। वे अभ्यासी हैं। ज़िंदगी भर परिधि को आकार ही तो देते रहते हैं। उनका क्या, वे तो परिधि के चारों ओर ओट किए रहते हैं और इसी में खुश हो लेते हैं। दुनियां भले ही उन्हें महत्व दे न दे, पर वे अपने में भरे पूरे रहते हैं। क्या फर्क पड़ता हैं उन्हें इस उस की चकल्लस से, कौन उन्हें इन उन से प्रमाण चाहिए। सो हाशिए हाशिए ही बने रहें, इतना ही काफी है।

सांझ घिर आई है, सपेरो समेटो

 सफर जारी है.......९८२

०३.०७.२०२२

सांझ घिर आई है, सपेरो समेटो ......

वक्त कैसे उड़ा जा रहा है जैसे मुठ्ठी से रेत फिसल रही हो या पैर के नीचे से बालू खिसक रही हो यानी हम नदी के तट पर हैं। हां जीवन भी तो नदी ही है, इस तट से उस तट जाने में ही समय निकल जाता है, नाव पुरानी हो, और तूफान तेज हो तो नाव बहुत झटखोले खाती है पर खिवैया काली कमली वाला हो तब पार लग जाती है। कितने जतन से मानुष छोटे छोटे सामान  संजोता है,तिनका तिनका जोड़ घोंसला बनाता है पर समय बीतते कैसे सब एक बिंदु में सिमट जाता है। जीवन भर जोड़े बटोरे सामानों से, बुने गए रिश्ते नातों से कैसी चिपक सी हो जाती है, घर भले ही सामान से लदे फदे होते हों लेकिन मन खाली खाली से हो जाते हैं। ये तीसरा पहर होता है जब सांझ की आहट होती है, बच्चे अपनी अपनी मंजिल पर पहुंच चुके होते हैं और घर के बड़े बूढ़े चोला छोड़ चुके होते हैं । जिस मोड़ से दो की गृहस्थी ने विस्तार पाया था, अपने कर्तव्य पूरे कर फिर दो के दो ही रह जाते हैं । वर्षों के जोड़े सामान से लगाव सा हो जाता है, जानते हैं कि इन चूल्हा चक्की,सिल बटना, खल्लड मूसली,सूप छलनी, मशीन, सिलाई, क्रोशिया , बडी बडी बाबा आदम के जमाने की कढ़ाही, परात, कटोरदान, अचार की बोट मर्तबान का कोई उपयोग नहीं होना है, इनके विकल्प आ चुके हैं फिर भी उन्हें घर से बाहर करते जी कैसा कच्चा कच्चा सा हो आता है। सब जानते हैं कि जन्म के साथी तक लम्बे समय तक साथ नहीं रह पाते, कोई कभी तो कभी कोई बिछुड़ता चलता है फिर वस्तुओं से लगाव और चिपक का कोई मायने नहीं होता पर चिपक है तो है, लगाव है तो है, उसका क्या किया जाय।पुरानी आदतें कोई ऐसे ही थोड़े छूटती हैं फिर ये तो बरसों बरते गए सामान हैं।

 घर में साफ सफैयत करते, लिपाई पुताई  और रंग रोगन करते  उन सामानों को लंबे समय तक इधर से उधर सरकाया तो जा सकता है, उनकी जगह बदल बदल कर रखा जा सकता है पर उन्हें एकदम बाहर नहीं किया जा सकता। हालांकि बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि इनका अब कोई प्रयोग नहीं करेगा, नई नई डिजाइनों के इतने अच्छे अच्छे सामान आ गए हैं फिर भी उन्हें हटाते कुछ दरक सा जाता है। भले ही से ये नोस्टोलोजिया हो पर है तो है। हम जैसे मन कड़ा करके कितने कितने सामानों का बारा न्यारा कर देते हैं, पसंदीदा पुस्तकों को उठा पुस्तकालय में दे आते हैं, पुराने पेपरों को बेदरदी से दो टुकड़े कर देते हैं पर डायरियों को हटाते मन नहीं मानता। अब इतना साहस क्या कम है कि चार दिनों में चार अलमारियों को बिलकुल खाली कर दिया।इतने बहादुर तो बन ही गए ।ऐसे ऐसे भी भरे पड़े हैं जो बीस पच्चीस साल पुराने कागजातों को हाथ ही न लगाने दें, अपने आप से तो बिलकुल ही न कहें। अब ये अलग बात है कि तुम दुपका चोरी नजर बचा के इधर से उधर कर दो। 

 सच तो ये है कि घर और सामान ही नहीं बिखरता और भी बहुत कुछ बिखरता है जिसे कोई नाम नहीं दे पाते। बिखरे को समेटना सपेटना होता है। दरअसल ये फैलारा केवल भौतिक वस्तुओं भर का ही नहीं है, इसमें नाते रिश्ते, संबंध और सबसे अधिक मन है। मन जिसने अपने को हजार लाख टुकड़ों में बांट रखा है अचानक कैसे एक बिंदु में केंद्रित हो जाता है। शायद इसे ही समेटना सपेरना कहते होंगे। जितना जल्दी खुद को सब ओर से विलग कर उस परम पिता में केंद्रित हो जाएं, गीता के कर्मयोग को निभा सकें, सब करते सरते भी जल में कमल वत रह सकें, उतना ही अच्छा।बस ईश्वर इतनी शक्ति दें। इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमजोर हो न, हम चलें नेक रस्ते पर हमसे भूल कर भी कोई भूल हो न। हम न सोचें हमें क्या मिला है,हम ये सोचें किया क्या है अर्पण।बस इस प्रार्थना के बोलों को दोहराते रहेंऔर अन्याय और बुराई से बचे रहें, कर्तव्य पथ पर चलते रहें।

नेह की बारिश

 सफर जारी है.....९८१

०२.०७.२०२२

नेह की बारिश.....

जीवन में बहुत भागदौड़  है, सब बहुत ही व्यस्त हैं इतने व्यस्त कि जिस दो टाइम के भोजन के लिए सारे दिन इतनी भागदौड करते है , उसे खाने के लिए भी समय कम पड़ जाता है, भागते भागते खाना खाया जाता है, खाया क्या जाता है उसे जैसे तैसे निगल लिया जाता है,  उसे चबाया तक नहीं जाता। सच में सबके पास इतने इतने काम हैं, इतनी इतनी व्यस्तता है कि बस कुछ पूछो ही मत। किसी से राजी खुशी पूछने के लिए दो मिनट बात करो तो उसे लगता है मेरा समय नष्ट हुआ जा रहा है, सबको जल्दी है, किसी के पास टाइम नहीं। जीवन के लिए केवल और केवल कमाई ही सबसे जरुरी रह गई है, बाकी तो सब बहुत पीछे छूट गया है। और एक पगलैट हम हैं कि मिलने जुलने वालों से उनके नाते रिश्तेदारों के बारे में ही पूछते रहते हैं और अगला मुंह बिचका के ऐसे चल देता है जैसे कुछ कड़वी चीज मुंह में चली गई हो।

लोग अपनी व्यस्तता में परिवार के लोगों को ही याद नहीं रख पाते और हम उनसे नातेदार रिश्तेदार की बात पूछने का साहस कर बैठते हैं तो उनका नाक सिकोड़ना और मुंह बिचकाना तो बनता है न। इतना इतना काम है इतनी इतनी व्यस्तता है कि नाते रिश्तेदारी और सगे संबंधियों से मिलने, उनके यहां जाने के लिए समय का टोटा ही टोटा है। घर के जरुरी काम ही नहीं निबट पाते और इन्हें देखो ये अटरम सटरम नाते रिश्तेदारो में उलझे पड़े हैं। अरे, अपने निजी ही नहीं सपेरे जाते, फिर ये फलाने ढिकाने के चक्कर में कौन पड़े।ब्याह शादी उत्सव आयोजन की तो बात छोड़ो, हारी बीमारी में देखने जाने तक का समय नहीं है। अब मरे गिरे में शोक प्रकट करने के लिए जाना तो जरूरी है। अब ये चाहे दबाब की स्थिति हो या थोड़ी बहुत संवेदना शेष रही हो या सामाजिकता का तकाजा हो, कहा नहीं जा सकता। काम का कितना तो दबांब रहता है सबके पास, कितनी कितनी व्यस्तता है, सांस तक लेने की फुरसत नहीं है। बस व्यापार और नौकरी में ऐसे उलझे पड़े हैं कि पूछो ही मत। सब इस पेट के रगड़े झगड़े हैं, इसी की करामात है जो न करवा दे थोड़ा है। वैसे कभी अपने आप से पूछा है कि क्या वाकई पेट को इतने की मांग है, क्या इतना सब खा लिया जाता है, क्या खाने की भूख सुरसा की तरह मुंह फाड़ती जा रही है या हमारे शौक और सब कुछ पेट में ठूंसने की वृत्ति ने इस मोड़ पर ला दिया है। इस तरह से  चलता रहा तो आने वाली पीढ़ी तो इतनी व्यस्तता में नाते रिश्तेदारी सब भूल जायेगी। सगे बुआ मामा चाचा ताऊ के बच्चों को तो कजिन केटेगरी में वैसे ही रख दिया गया है और अन्य रिश्तों से दूर के कह कर कन्नी काट ली गई है। 

कैसा समाज तैयार कर रहे हैं हम अपने बच्चों के लिए, किस तरह के संस्कार के बीज बो रहे हैं, उन्हें अकेलापन विरासत में क्यों सौंप रहे हैं। क्या हम बिलकुल भूल गए उस राजा की कहानी को जो धन का और सोने का इतना लालची हो गया, इतना मुरीद हो गया कि यह वरदान मांग बैठा कि वह जिस भी वस्तु व्यक्ति को छूए, वह सब सोना हो जाए, मुसीबत तो तब हुई जब खाने के बरतन के साथ भोज्य सामग्री भी सोने की हो गई और जब बेटी को छूआ तो जीती जागती बेटी भी सोने की मूरत में बदल गई। राजा बहुत रोया पर क्या किया जा सकता था। राजा ने खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी, मूर्ख की तरह उसी डाल को काट दिया जिस पर बैठे थे। कमोवेश हम भी तो यही कर रहे हैं, अपनी रिश्तेदारी को ही नहीं जानते, अपने ददिहाल ननिहाल तक नहीं पता। आखिर इतने अकेले होकर हम खुश रह पाएंगे। आज जो धीरे धीरे सभी से कटते अपनी परिधि को हम दिन प्रतिदिन छोटा दर छोटा करते जा रहे हैं, इसका परिणाम भी सोचा है हमने। हमने तो यही पढ़ा था कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है, उसे सबसे मिलजुल कर रहना पसंद है। डर है कि सबसे कटता कहीं वह बिलकुल अकेला ही न पड़ जाए और जब चेते तब तक बहुत देर हो चुकी हो।

पढाई लिखाई के नाम पर तो हम वैसे ही हम अपने बच्चों को एकांतवास दे चुके हैं, न किसी रिश्तेदार से मुलाकात है न किसी परिचित को जानते हैं, बस हमने उन्हें एक ही सपना दिया है कि खूब पढ़ो और ऊंची नौकरी करो। इससे इतर कुछ और सोचने ही नहीं दिया गया। बस परिणाम आज हमारे सामने है। नाते रिश्तेदारों से दूर पैसों के तिलिस्म में अपने बच्चों को फंसा कर माता पिता ही कौन सुखी हैं। जीवन में सब जरुरी है। तो सब साथ साथ चलने दीजिए न , नाते रिश्तेदारी के स्नेहिल संबंधों से उसे मत काटिए, उसे सबके साथ बढ़ने दीजिए, सब में मिलने जुलने दीजिए। इससे इसका व्यक्तित्व और निखरेगा। नेह की बारिश बहुत जरुरी है, उसे भीगने दीजिए, सरसने दीजिए। उसे बांटना सीखने दीजिए, उदार बनाइए, जितना परिकर बढ़ेगा,उसके स्वभाव में शील, धैर्य, सामंजस्य विकसित होगा। पालक आप हैं आप ही तय कीजिए कि आखिर आप उसे किस रूप में विकसित करना चाहते हैं।

मिसफिटिया ही भले

 सफर जारी है....978

29.06.2022

 मिसफिटिया ही भले.....

अब इस नई व्यवस्था में हम जैसे तो फिट बैठने से रहे, कारण एक आध हो तो बताएं, लंबी लिस्ट है। देखो भाई बड़े बड़े क्लबों में जाने की तमीज और कल्चर हम एडॉप्ट नहीं कर पाए,तंबोला हमें आता नहीं, फैशन में जीरो और सजने संवरने में डबल जीरो, बात घुमा फिरा के कहने में कोई उपाधि ले नहीं पाए, इतने बड़े हो गए पर ये कला सीख ही नहीं पाए, दो टूक कह देते हैं बिना किसी लाग लपेट के  सो सबके बुरे हैं। इसी कारण बिरादरी में छेक दिए जाते हैं। दूध में से मक्खी की तरह अलग कर दिए जाते हैं ।मक्खन लगाना आता नहीं तो अधिकारी वैसे ही पसंद नही करते । नखरे  सधते नहीं हमसे, गुस्सा करें और डांटे बांटे तो पिच्च से हंसी छूट जाती है। भाषा की दृष्टि से वैसे ही गंवार है क्योंकि पढ़े लिखों जैसे गिटर पिटर करना नहीं आता। लते कपड़े ओढ़ने पहनने का सबूर है नहीं, कुछ भी लटका कर चल देते हैं, मैचिंग आती है न रंगों का बोध है। बस काले सफेद दुप्पटे और ब्लाउज में ही जिंदगी गुजर गई, ईस्टमैन कलर का जमाना तब था नहीं, अब बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम की तर्ज पर कुछ रंग चुने भी तो वे दो चार रंगो में सीमित हैं लाल हरा नीला पीला। अब अंग्रेजी कलर जानते नहीं।

फैशन की एबीसीडी पढ़नी आई नहीं, बस मुंह धोकर बालो में तेल चुपड लिया, घिर्र के बांध लिए, बालों का स्टाइल आता नहीं, केश सज्जा का डिप्लोमा किया नहीं। क्या करें जब स्कूल जाते कस के दो चोटी बांधने का रिवाज जो था और स्कूल छूटा तो पोनीटेल पर आकर गाडी अटक गई। मेकअप बाक्स आया भी तो क्रीम पावडर के अलावा कुछ समझ ही नहीं आया। फिर क्रीम पाउडर से भी कुट्टी कर ली, बालों की चिकनाई ही चेहरे पर मल ली और बहुत हुआ तो आंखों में काजल लगाया, बिंदी चिपकाई और खरामा खरामा चल देते हैं काम पर या रिश्तेदारी में, ब्याह बरात में, अब क्या हर जगह के लिए अलग अलग तैयार थोड़े ही हुआ जाएगा। अब जो हैं सो हैं, अब क्या खाक मुसलमा होंगे ।सो ज्यादा फैशनेबल और सो कॉल्ड बड़े लोगों के बीच बैठना पड़ जाए तो बडी घुटन महसूस होती है,लगता है छुट्टी की घंटी कब बजेगी, कब मुक्त होंगे जी।

तो बताओ ऐसा ऐरा गैरा पिछड़ा फिसड्डी बाबला सा प्राणी बदलते जमाने के साथ कदम ताल कैसे करे, आज के माहौल में कैसे फिट बैठे । दुनियां मॉडर्न किचिन तक पहुंच गई और हम अभी चौका बासन परात चकला बेलन चिमटाफूंकनी में ही उलझे पड़े हैं, घरों में केसरोल का लेटेस्ट मॉडल आ गया और हम ब्याह के कटोरादान में ही अटके पड़े हैं। अलाने फलाने की रिश्तेदारी में जाने को उतावले रहते हैं, सो घर परिवार अड़ोस पड़ोस इष्ट मित्रो सहेली वाहेली के मध्य  झुनझुने से बजते रहते हैं। बाबा आदम के जमाने के कहलाते हैं। बड़े कहें तो कहें ,छोटे बारे भी चलते फिरते हाथ साफ कर लेते हैं। अब क्या करें ये सब नहीं आता तो नहीं आता।

       तो इष्ट मित्रों ने सुझाया कि  ये सब सीखना बहुत जरुरी है आज के जमाने में , जमाने के साथ मिलकर चलो नहीं तो पिछड़ जाओगी। अंदर से आवाज आई  पिछड़ी तो हो ही और क्या पिछड़ोगी। ज्यादा ही नजदीक वालों ने सुझाया जो जो नहीं आता उसकी कोचिंग ले लो। सब सीख जाओगी। सीखते तो तब जब मन बनाया होता। हमें तो इसी फक्कड़ पन में आनंद आता है। कुछ लीपने पोतने की जरुरत तो नहीं पड़ती। पहले पोतें फिर घंटा भर तक घिस घिस के छुड़ाए तो लीपापोती करो ही क्यों। फिर दूसरी बोली छोड़ फ़ैशन को, पर्सनल्टी डेवलपमेंट की क्लास ज्वाइन कर लें, स्मार्टनेस तो भी आ जायेगी। अरे तो क्या स्मार्ट बनने का भी प्रशिक्षण होता है । फिर कल को कहोगी कि हाइट कम है हाई हील पहन लो, ऐसे कपड़े पहनो वैसा हेयर स्टाइल बनाओ। न भैया हम से नहीं होगा। हम तो बिना स्मार्ट ही भले।

       तो अब अनफिट हैं तो भले मिसफिट हैं तो भले, हम नाय बदल रए, हम तो ऐसे ही हैं, इतनी गुजर गई तो नेक और रही है वो ऊ गुजर जायेगी राम जी सब भली करिंगे।

मिसफिटिया ही भले

 सफर जारी है....978

29.06.2022

 मिसफिटिया ही भले.....

अब इस नई व्यवस्था में हम जैसे तो फिट बैठने से रहे, कारण एक आध हो तो बताएं, लंबी लिस्ट है। देखो भाई बड़े बड़े क्लबों में जाने की तमीज और कल्चर हम एडॉप्ट नहीं कर पाए,तंबोला हमें आता नहीं, फैशन में जीरो और सजने संवरने में डबल जीरो, बात घुमा फिरा के कहने में कोई उपाधि ले नहीं पाए, इतने बड़े हो गए पर ये कला सीख ही नहीं पाए, दो टूक कह देते हैं बिना किसी लाग लपेट के  सो सबके बुरे हैं। इसी कारण बिरादरी में छेक दिए जाते हैं। दूध में से मक्खी की तरह अलग कर दिए जाते हैं ।मक्खन लगाना आता नहीं तो अधिकारी वैसे ही पसंद नही करते । नखरे  सधते नहीं हमसे, गुस्सा करें और डांटे बांटे तो पिच्च से हंसी छूट जाती है। भाषा की दृष्टि से वैसे ही गंवार है क्योंकि पढ़े लिखों जैसे गिटर पिटर करना नहीं आता। लते कपड़े ओढ़ने पहनने का सबूर है नहीं, कुछ भी लटका कर चल देते हैं, मैचिंग आती है न रंगों का बोध है। बस काले सफेद दुप्पटे और ब्लाउज में ही जिंदगी गुजर गई, ईस्टमैन कलर का जमाना तब था नहीं, अब बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम की तर्ज पर कुछ रंग चुने भी तो वे दो चार रंगो में सीमित हैं लाल हरा नीला पीला। अब अंग्रेजी कलर जानते नहीं।

फैशन की एबीसीडी पढ़नी आई नहीं, बस मुंह धोकर बालो में तेल चुपड लिया, घिर्र के बांध लिए, बालों का स्टाइल आता नहीं, केश सज्जा का डिप्लोमा किया नहीं। क्या करें जब स्कूल जाते कस के दो चोटी बांधने का रिवाज जो था और स्कूल छूटा तो पोनीटेल पर आकर गाडी अटक गई। मेकअप बाक्स आया भी तो क्रीम पावडर के अलावा कुछ समझ ही नहीं आया। फिर क्रीम पाउडर से भी कुट्टी कर ली, बालों की चिकनाई ही चेहरे पर मल ली और बहुत हुआ तो आंखों में काजल लगाया, बिंदी चिपकाई और खरामा खरामा चल देते हैं काम पर या रिश्तेदारी में, ब्याह बरात में, अब क्या हर जगह के लिए अलग अलग तैयार थोड़े ही हुआ जाएगा। अब जो हैं सो हैं, अब क्या खाक मुसलमा होंगे ।सो ज्यादा फैशनेबल और सो कॉल्ड बड़े लोगों के बीच बैठना पड़ जाए तो बडी घुटन महसूस होती है,लगता है छुट्टी की घंटी कब बजेगी, कब मुक्त होंगे जी।

तो बताओ ऐसा ऐरा गैरा पिछड़ा फिसड्डी बाबला सा प्राणी बदलते जमाने के साथ कदम ताल कैसे करे, आज के माहौल में कैसे फिट बैठे । दुनियां मॉडर्न किचिन तक पहुंच गई और हम अभी चौका बासन परात चकला बेलन चिमटाफूंकनी में ही उलझे पड़े हैं, घरों में केसरोल का लेटेस्ट मॉडल आ गया और हम ब्याह के कटोरादान में ही अटके पड़े हैं। अलाने फलाने की रिश्तेदारी में जाने को उतावले रहते हैं, सो घर परिवार अड़ोस पड़ोस इष्ट मित्रो सहेली वाहेली के मध्य  झुनझुने से बजते रहते हैं। बाबा आदम के जमाने के कहलाते हैं। बड़े कहें तो कहें ,छोटे बारे भी चलते फिरते हाथ साफ कर लेते हैं। अब क्या करें ये सब नहीं आता तो नहीं आता।

       तो इष्ट मित्रों ने सुझाया कि  ये सब सीखना बहुत जरुरी है आज के जमाने में , जमाने के साथ मिलकर चलो नहीं तो पिछड़ जाओगी। अंदर से आवाज आई  पिछड़ी तो हो ही और क्या पिछड़ोगी। ज्यादा ही नजदीक वालों ने सुझाया जो जो नहीं आता उसकी कोचिंग ले लो। सब सीख जाओगी। सीखते तो तब जब मन बनाया होता। हमें तो इसी फक्कड़ पन में आनंद आता है। कुछ लीपने पोतने की जरुरत तो नहीं पड़ती। पहले पोतें फिर घंटा भर तक घिस घिस के छुड़ाए तो लीपापोती करो ही क्यों। फिर दूसरी बोली छोड़ फ़ैशन को, पर्सनल्टी डेवलपमेंट की क्लास ज्वाइन कर लें, स्मार्टनेस तो भी आ जायेगी। अरे तो क्या स्मार्ट बनने का भी प्रशिक्षण होता है । फिर कल को कहोगी कि हाइट कम है हाई हील पहन लो, ऐसे कपड़े पहनो वैसा हेयर स्टाइल बनाओ। न भैया हम से नहीं होगा। हम तो बिना स्मार्ट ही भले।

       तो अब अनफिट हैं तो भले मिसफिट हैं तो भले, हम नाय बदल रए, हम तो ऐसे ही हैं, इतनी गुजर गई तो नेक और रही है वो ऊ गुजर जायेगी राम जी सब भली करिंगे।

 सफर जारी है....977

28.06.2022

चलते चलो चलते चलो.....

हां तो चल ही तो रहे हैं जब से होश संभाला है। कितना तो चल लिये , जितना रास्ता नाप आए उसका दूना आगे दिखता है। जाने कितनी लंबी सड़क है कि कहीं ओर छोर दिखाई ही नहीं देता। बस सब एक ही राग अलाप रहे हैं चलते चलो चलते चलो, चरैवति चरैवति । अरे कोई बताएगा क्या कि कुल कितने किलोमीटर की यात्रा तय करनी है, कब तक चलते रहना है, मंजिल कब आयेगी, आयेगी भी कि नहीं या छोटे छोटे पड़ावों में ही संतोष खोजना होगा। अब ये सब कोई बताएं भी कैसे, सब हमारी तरह यात्री ही हैं कोई दस कदम आगे तो कोई दस कदम पीछे, सब भागे ही जा रहे हैं, सबको जल्दी है पर पता किसी को नहीं कि आखिर जाना कहां है। मार धकापेल मची हुई है। सब हाय हाय कर रहें हैं।

       दुनिया में आए नहीं कि स्कूल जाओ स्कूल जाओ  की रट शुरू गई, अरे न मन भर कर सो पाए न खेल पाए बस जब देखो स्कूल का काम कर लिया की डांट फटकार, उससे निबटो तो घर पर भी पढ़ो, पढ़ाई नहीं जी का जंजाल हो गई, खैर स्कूल कालेज की पढ़ाई पूरी हुई तो सोचा अब आराम करेंगे, सब क्लास तो पढ़ ली पर नहीं ये तो किताब की पढ़ाई थी, असली पढ़ाई तो अब शुरू होनी थी। जिंदगी जीने की पढ़ाई। स्कूली पढ़ाई में परीक्षा टाइम टेबिल /स्कीम पहले लिखवा दी जाती, सिलेबस निश्चित था ही,जरुरी प्रश्नो का संकेत कर दिया जाता, फिर गैस पेपर और पिछले वर्ष के सॉल्व्ड पेपर बाजार में मिल जाते थे सो अंदाजा हो जाता कि परीक्षा में कैसा पेपर आएगा। पर जिंदगी की परीक्षा में तो सब कुछ अनिश्चित था न कोई निर्धारित सिलेबस न कोई महत्वपूर्ण प्रश्नों की चर्चा, न गैस और सॉल्व्ड पेपर, बस चढ़ जा बेटा सूली पर भली करेगें राम।

इस परीक्षा को देते पता चल रहा है कि घर वाले सब सिखाने पर क्यों तुले हुए थे।पहले स्कूल जाने की फांय फांय फिर पढ़ लिख लिये तो ब्याह की जल्दी मच गई, चौपाए हो गए ,घर गृहस्थी बस गई तो बालको को टिकटिकाते रहे कि आगे बढ़ो और आगे बढ़ो, वे भी अपनी अपनी राह पकड़ लिये, अपने घर बार में व्यस्त हो गए तो अब फिर दुबारा से सुई हम पर आकर अटक गई है कि आगे बढ़ो आगे, अब कितना आगे बढ़ें, बी ए एम ए ,पी एचडी सब क्लास तो पढ़ लिए, फिर घर गृहस्थी में जुते रहे, अब तीसरा पन आ गया, बाल चांदी हो गए, शरीर में आलस भर गया पर रसना अपना स्वाद खूब खोज लेती है। कुछ करें चाहे न करें, झेंदा तो भरना ही है। तुम्हारी भली चलाई, तुम तो कहते ही  रहोगे, पहले कहना सुनना माता पिता के हिस्से में था, घर बदला तो सास ससुर ने कमान संभाल ली । वे स्वर्ग सिधारे तो कहने वाले और बढ़ गए। अब जे बताओ यदि हमने पूरी ताकत लगाकर पृथ्वी के गोल गोल चक्कर लगा भी लिये तो तुम तो चंदा तारे तोड़ने और आकाश को छूने की बात करने लगोगे । अब वो तो हमसे होने से रहा। 

तो बहुत कर लिया, बहुत चल लिया, अब क्या चलते ही रहें, मंजिल कितनी दूर है बताता कोई नहीं ,बस जिसे देखो चलते रहो चलते रहो की तिकतिक लगाए हुए है। जैसे हम नही चले तो पूरी दुनिया रुक जाएगी, हवा नहीं चलेगी, सूरज नहीं निकलेगा। अरे भाई एक हमारे न चलने से क्या आफत आ जायेगी, अब नहीं चलेंगे, बहुत चल लिया । हम तो एक क्या आधा कदम भी नहीं चलते पर क्या करें हाईकमान का ऑर्डर आ गया कि जब तक सांस तब तक आस तो चले चलो, आगे बढ़ते रहो। मार कविता सुना दी.... बढ़े चलो बढ़े चलो वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो, सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ हो, तुम निडर डटे रहो। तो ऐसे चलें या वैसे, तेज चलें या धीमे , चलना तो पड़ेगा ही, चल ही रहे हैं क्योंकि चलना ही है। चलना ही जिंदगी है रुकना है मौत तेरी, ओ राह के मुसाफिर किस बात की है देरी।

रहिमन चुप हे बैठिए

 सफर जारी है...976

27.06.2022

रहिमन चुप हे बैठिए......

समय समय की बात है कि जो कभी फाखते उड़ाया करते थे, वे आज मुंह बन्द किए बैठे हैं और जो मरे पड़े थे, उनके आंगन में बहार ही बहार है। जिस छलनी में छप्पन छेद है वह भी चार बात कह कर चलती है और जो सबको लीड करते थे, वे कम्बल में मुंह छिपाए पड़े हैं। सब समय की बलिहार है। रहीम तो सब जाने माने है तभी लिख देते हैं रहिमन पक्ष श्राद्ध में कागा हंसा होय। जिन कौओ को कोई टका सेर नहीं पूछता, जिनकी कांव कांव से सब परेशान हो जाते हैं, कौए जैसी वृत्ति वालों की आलोचना करते हैं ,वही कौए श्राद्ध पक्ष में आदर के साथ बुलाकर खीर पूड़ी से जिमाए जाते हैं। काम सरे कछु और है काम परे कछु और का दौर है। मौर जो वर के सिर पर धरी जाती है, फेरे होने के बाद नदी में सिरा दी जाती है इससे माैर की उपयोगिता कम तो नहीं हो जाती।

आजकल जो घट रहा है , फिल्मी गीतों में तो बहुत पहले ही प्रतिध्वनित हो गया था ...रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलियुग आएगा, हंस चुगेगा दाना दुम का कौआ मोती खाएगा। तो ठीक है कौए को मोती खाने देते है पर सवाल ये है कि क्या कौए को मोती रास आयेंगे, जिंदगी भर तो विष्ठा खाता रहा, कीची कीची कौआ और दूध मलाई लला खाता रहा, अब एकदम से मोती से पकवान खाके कौए को कहीं अपच न हो जाए, पेट न फूल जाए, स्वाद स्वाद में कहीं ज्यादा खा गया तो लेने के देने न पड जाए। तो भाई इस काक प्रजाति को समझाना जरुरी है। बारह बरस बाद तो घूरे के दिन भी फिर जाते हैं फिर सत्य क्यो नहीं जीतेगा। अभी कंस, रावण और कौरवों का समय चल रहा है तो शांत बैठे रहिए। रहीम बार बार समझा कर हार गए कि रहिमन चुप हे बैठिए देख दिनन को फेर, जब नीके दिन आइए बनत न लागे देर। 

कितने कितने संदर्भ है जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि समय बड़ा बलवान है। पुरुष बली नहीं होत है समय बड़ो बलवान,भीलन लूटी गोपिका वही अर्जुन वही बाण। अर्जुन के पास तो कृष्ण का बल था और जब कृष्ण ने अपनी लीला का संवरण कर लिया तो उनके साथ ही अर्जुन का बल भी चला गया। अर्जुन और उनके वाण तो वही थे पर फिर भी धनुर्धारी अर्जुन का कुछ बस न चला और भीलो ने गोपिकाओ को लूट लिया।तो हम कितने भी समझदार और बलशाली क्यों न हों, समय पर किसी का बस नहीं चलता। समय की बलिहार है कि राजा को रंक और रंक को राजा बना दे। फिर हम तो मानुष हैं जब लीलाधारी भी समय के प्रभाव से नहीं बच सकें तो हम कौन खेत की मूली हैं। 

       राम जैसे बलशाली और मर्यादा पुरुषोत्तम की पत्नी को लंका का राजा बहरूपिया का वेश बना कर हर ले गया, राम वन में  सीते सीते पुकारते रहे, वन के जीव जंतुओं से उनका पता पूछते रहे हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी, तुम देखी सीता मृगनयनी। वो तो भला हो जो हनुमान जी मिल गए और समुद्र लांघ कर सीता का पता लगा लाए। और देखो दशरथ के ठोठा होकर भी चौदह वर्ष तक वन में भटकना पड़ा। दूसरे कृष्ण जी जो पैदा नहीं हुए उससे पहले ही शत्रु पैदा हो गए, साल भर के नहीं हुए तब तक तो कितने कितने राक्षस वेश बदल कर उन्हें मारने पहुंच गए। अब बताओ जन्मते ही उन्होंने कौन से दुष्कर्म कर दिए कि किसी की गगरी फोड़ दी। पांडवों ने कौरवों का क्या बिगाड़ा था कि वे युद्ध के बिना सुई की नोंक के बराबर जमीन देने को तैयार नहीं हुए, पांच गांव की कौन कहे। और देखो पांच पांच पति होते सोते द्रोपदी का चीर हरण होता रहा और पांचों पांडव सिर झुकाए बेबस से बैठे रहै। बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास किसी गलती के कारण थोड़े ही मिला था, बस समय खराब था, सूधे दिन नहीं चल रहे थे। और सुनो राजा नल पर विपदा आई, बुरे दिन आए तो खूंटी हार निगल गई, पक्षी उड़ गए, मछली पानी में चली गई और जब समय ने पलटा खाया तो खूंटी हार उगलने लगी, तीतर उड़ उड़ के आ गए, मछली पानी से बाहर आने को उतावली हो गईं।

 तो भैया रे, सब समय समय की बात है। जब दिना उल्टे आते हैं तो अपने भी पराए हो जाते हैं, सगे साथ छोड़ जाते हैं, अड़ोसी पडौसी बगले झांकते है और कोई सीधे मुंह बात नहीं करता। तो उस समय को उका जाओ, चुप्पी साध लो, चुप लगा जाओ, ये बुरे दिन खराब समय हमेशा रहने वाला नहीं है। बस बीत ही जाएगा। जब अच्छे दिन नहीं रहे तो भला बुरे दिन ही क्यों टिकेंगे। तो हम जैसे तो रहीम को याद कर सबर कर लेते हैं फिर नीके दिन आयेंगे बनत न लागे देर।

प्रेम किए दुःख होय

 सफर जारी है....975

26.06.2022

प्रेम किए दुःख होय......

ये ढाई आखर का शब्द प्यार/प्रेम न जाने कितनों कितनों की तकदीर बदल देता है, किसी की झोली में खुशियां ही खुशियां डाल देता है, उसे उत्साह से भर देता है और वह गाता डोलता है एक तू जो मिला सारी दुनिया मिली। जो कहीं किसी को उसका प्यार न मिले या प्यार में धोखा मिल गया तो वह दुख के सागर में डूब जाता है,रोता बिसूरता है तुम न जाने किस जहां में खो गए , उसके विछोह में वियोग में पगला जाता है।पता नहीं हम क्यों भूल जाते हैं कि प्रेम सौदा नहीं होता कि एक ने किया तो उसे प्रतिदान मिले ही मिले. अब प्यार किया या हो गया जैसा कि प्यार किया नहीं जाता हो जाता है,तो हो गया तो हो गया, उस पर किस का बस। अब ये जरूरी तो नहीं कि प्यार करो और उसका प्रतिदान भी मिले ही मिले। मिल जाएं तो सौभाग्य और न मिले तो क्या, प्यार थोड़े ही कम हो जाता है, फिर  प्यार शर्तों पर थोड़े ही किया जाता है कि ऐसा होगा तो ऐसा होगा, मेरे अनुसार चलो तो प्यार है और जो तुमने नेक अपने मन की कर ली तो प्यार बिला गया, उड़न छू हो गया।ये तय थोड़े ही हुआ था कि तुम एक पैसा दोगे वह दस लाख देगा। तुम दस करोड़ प्यार करो, वह एक भी न करे क्योंकि प्यार तुम कर रहे हो, वह नहीं।अब वे लम्हे जिन में बड़े बड़े वादे किए गए, साथ निभाने के दावे ठोके गए कि जब तक सूरज चांद रहेगा इन हाथों में हाथ रहेगा, गंगा जमुना में जब तक ये पानी रहे,मेरे सजना तेरी जिंदगानी रहे या ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे, छोड़ेंगे हम मगर तेरा साथ नहीं छोड़ेंगे जैसे गीतों नगमों की पंक्ति गुनगुनाई गईं। क्या वे वादे इतने कच्चे थे कि जरा सी ठें लगी और टूट गये। 63 का आंकड़ा 36में बदल गया, जरा सा माहौल क्या बदला, हवा का रुख तिरछा क्या हुआ, मन का सा क्या नहीं हुआ,सुर ही बदल गए, तुम तो दुर्वासा बन गए भाई, सब तहस नहस कर दिया, कोई मेल मुरब्बत नहीं बरती, अगला पिछला कोई क्षण याद नहीं आया, तुमने तो चुनरी और पटके में लगी गांठ कैंची से ही काट दी कि न बाबा आएगा न घंटा बाजेगा। सब भुला बिसरा दिया। बिलकुल महाजन बन गए, सब सूद के साथ वसूल लिया। एक प्रहार की जगह दस गुना प्रहार कर दिए फिर भी क्रोधाग्नि कम नहीं हुई बल्कि हर बार अगले के आने की आहट उसमें घी की आहुति का काम करती रही।

 नहीं भाई नहीं ,ये तो प्यार की परिभाषा नहीं हो सकती,ये सब तो प्रेम के दायरे में आता ही नहीं। प्यार के परिंदे तो बने पर उनके किस्से नहीं पढ़े क्या, लैला मजनू, शीरी फरहाद, पारो देवदास ये पुराने हो भी गए तो नए में से मिसाल चुन लेते। अरे इन मीरा, राधा, गोपी, शबरी का इतिहास ही जान लेते।प्रेम दीवानी तो मीरा भी थी, जब देखो तब श्याम रंग में डूबी रहती थी, गाती रहती थी ऐ री मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दरद न जाने कोय, घायल की गति घायल जाने के जिही लागी सोय। मीरा ने तो अपने प्रेम पात्र को मोल खरीद लिया, माई री मैंने लीनो गोविंदा मोल, कोई कहे मंहगो कोई कहे सस्तो लियो री तराजू तोल। श्याम सुंदर तो थे ही इतने मोहक कि गोपियां सांवरे के प्रेम में रंग गई, उद्धव ज्ञान की पोटरी लेकर आए गोपियों को समझाने, आयो घोष बड़ो व्योपारी तो साफ़ साफ़ कह दिया ऊधो मन नाहे दस बीस, एक हतो सो गयो श्याम संग को आराधे ईश। बेचारे उद्धव अपना सा मुंह लेकर लौट गए। गोपियों को इससे लेना देना कहां था कि श्याम उन्हें प्यार करते हैं या नहीं, तुम करो मत करो, हम तो करते हैं, इतना काफ़ी है। घनानंद अपनी तान अलग छेड़ते हैं अति सूधो सनेह को मारग है जामे नेक सयानप बांक नहीं, और अंत में उलाहना भी दे देते हैं तुम कौन सी पाटी पढ़े हो लला मन लेत हो देहु छटाक नहीं। अब इन सब की तो चर्चा करना ही बेकार है। ये नए युग की प्रीत है जिसमें युग युग से हम गीत मिलन के गाते रहे हैं, गाते रहेंगे की कोई गुंजाइश बाकी नहीं रही।

 अब नए जमाने के प्यार हैं जिसमें अपना अपना फायदा देखा जाता है कि जितना मिलेगा उतना ही प्यार करेंगे। और जो इसमें भावुक हो जाते हैं वे निरे बेवकूफ कहलाते हैं, जब देखो टसूबे बहाते रहते हैं, मिलने के लिए तड़फते रहते हैं और अगला उसे कुत्ते सा दुतकारता रहता है। अरे ये भावुकता छोड़ो, जब अगला तुम्हें कौड़ी के भाव नहीं पूछ रहा, सूखी घास भी नहीं डाल रहा तो तुम क्यों बार बार उसकी देहरी पर सिर फोड़ने चले आते हो और हर बार जलील होकर अपना सा मुंह लेकर लौटते हो। ये एकतरफा प्यार के किस्से  समझ से बिलकुल परे हैं। एक ऐंठ के मारे पैंठ को जाता है, बात बात पर लतियाता  है और दूसरा फिर भी वहीं सिर पटकता है। अरे भाई, जब अगला कान में रूई ठूंसे बैठा है तो काहे को सप्तम स्वर में रेंकते हो। फिर तुम्हें बार बार एक ही संवाद को सुनने में आनंद आता हो तो तुम्हारी मर्जी। भले ही ये एकतरफा प्यार हो पर प्यार करने वाला इसी में खुश है। उसे प्रेमास्पद से कोई शिकायत भी नहीं, वह उसे देखे, उसकी उपेक्षा करें, उससे दूरी बरते, कोई फरक ही नहीं पड़ता। वह तो मान कर चलता है प्रेम का कंटीला रास्ता तो उसने चुना है, स्वेच्छा से चुना है किसी ने जोर जबरदस्ती तो नहीं की।

  अब यदि प्रेमास्पद को आपने भगवान जी का दर्जा दे रखा है तो  ये भी याद रखो प्रभु तो तपस्या पूरी होने पर दर्शन देते हैं। और तपस्या पूरी होने का समय निर्धारित करना कम से कम तुम्हारे हाथ तो है नहीं , वे जब आएंगे तब आएंगे, तुम तो बस धैर्य बनाए रखो, तपस्या पूरी हो जाएगी तो दर्शन हो जाएंगे नहीं तो अगले जन्म में मिलेंगे, क्या परवाह है। शबरी ने लंबी प्रतीक्षा की कि राम आएंगे, राम आए। गोपियों को भी अंतत सांवरा मिल गया, तो तुम भी धीरज धरे रहो। वैसे एक बात बताओगे बंधु ,कभी रत्नावली की फटकार याद आती है क्या अस्थि चरम मय देह में तामें ऐसी प्रीत, जो होती भगवान में तर जाते भवभीत। जितना समय जितनी आस्था जितना भाव किसी व्यक्ति में लगाने की ठानी है ,उसका आधा भी भगवान में लगा देते , तो मन में शांति आ जाती। प्यार की ढैया अपनी जगह है और मान सम्मान अपनी जगह। उतना झुको जिससे पीठ में कूबड़ न निकल आए , कम से कम अपनी और अपनों की इज्जत तो बनी रहने दो।  ब्याह करो, गृहस्थी जोड़ो, लड़ो झगड़ो, चार कह सुन लो, मार झंझट है, प्यार का समय धरा किसके पास है, ये बड़े लोगों के चोचले होते होंगे, होता होगा कभी प्यार अंधा, अब तो प्यार कम सौदे अधिक होते हैं। अरे घर गृहस्थी से फुर्सत मिले तो आई लव यू की सोचें, मध्यवर्गीय तो दाल रोटी की व्यवस्था में ही उलझा रह जाता है। हां ,साथ रहते एक दूसरे की परवाह जरूर होती है चाहो तो उसे प्यार का नाम भले दे लो। तो प्यार की ढय्या तुम्हें ही मुबारक हो, हम तो ऐसे ही भले।

कर्ता के कछु और

 सफर जारी है....974

25.06.2022

कर्ता के कछु और......

यदि सब कुछ व्यक्ति के हाथ में होता तो संभवत दुख की परिकल्पना ही नहीं होती पर ऐसा हो कहां पाता है। कोई तन दुखी कोई मन दुखी, कोई धन बिन रहत उदास, थोड़े थोड़े सब दुखी एक सुखी राम के दास।हर के जीवन में कुछ न कुछ दुख हैं, चिंताएं हैं जिनके समाधान खोजे से भी नहीं मिलते। व्यक्ति सोचता कुछ और है और होता कुछ और है। कुछ दुख ऐसे होते हैं जिन्हें उघाड़ कर सबको दिखाया नहीं जा सकता पर वे मन को अंदर ही अंदर खोखला कर देते हैं । फिर रहीम याद आते हैं... रहिमन अंसुवा नयन ढरि जिय दुख प्रगट करेही,जाहि निकारो गेह ते कस न भेद कहि देही। 

क्यों बांटो किसी से अपना दुख , किसी को कह कर हल्के हो भी जाओगे तो भला क्या होगा, अगला दो की चार बना कर तीसरे के कान में कू कर देगा, तीसरा चौथे के और चौथा पांचवें के में। यानी जो बात आपके पेट में नहीं पची वह भला दूसरे के में  कैसे पचेगी। बिना कहे तो उसका पेट फूल के तोमडिया हो जाएगा, फिर कैसी होएगी। तो। हर को  अपने दुख तो खुद ही झेलने होते हैं पर जब गागर ऊपर तक भर जाती है तो न चाहते भी छलक ही जाती है। कभी कभी लगता है आंखों की प्यालियों में कटोरियों में अश्रु जल जब समा नहीं पाता तो वेग से गालों पर बहता जाता है, लाख रूमाल और नेपकिन से आंखें पोंछते रहो पर आंखों से बरसात तो बंद नहीं होती न। साथ साथ सुबक भी निकलती रहती है, आवाज भारी हो जाती है, आंखे डबडबाई सी रहती है, कुछ का कुछ मुंह से निकल जाता है पर इस सबसे दुःख थोड़े ही कम हो जाता है, हां दुख की अभिव्यक्ति भले हो जाती हो।

      कितने कितने दुख है इस जगत में, मनचाहा न मिलने का दुख, मिल जाए तो उसे सहेजे रहने का दुख, जरा  चूक हुई नहीं कि उसके खो जाने, बिल्ट जाने और बिछड़ जाने का दुख। और फिर जो बिछड़ जाता है ,उसे खोजते खोजते खोजते पूरी जिंदगी बीत जाती है लेकिन वह न जाने कहां लुप्त हो जाता है, हमसे बिछड़ जाता है। जो कभी अपने थे, वे पराए हो जाते हैं। फिर दुनिया समझा समझा कर हार जाए, मन नहीं मानता।  अतीत की गलियों में गोल गोल घूमता रहता है, समय न जाने कितना आगे बढ़ जाता है, कितना पानी बह जाता है पर हम वहीं के वहीं खड़े पुरानी ,सुंदर और मनभावन यादों में खोए रहते हैं। ये यादें ही तो मन दुखाती हैं, बड़ा तड़फाती हैं, बार बार आंखें डबडबा जाती हैं पर फिर खुद ही खुद को सांत्वना देनी होती है, मन को संभालना होता है, दिनचर्या पूरी करनी होती है, सामाजिकता निभानी होती है पर जैसे ही एकांत मिलता है कि यादें आपने घेरे में ले लेती हैं।

      किसी दूसरे को समझाना कितना सरल होता है, कैसे कैसे उदाहरण और नजीर दे दिए जाते हैं पर भगवान न करे किसी अपने को क्या ,दुश्मन को भी दुख की छाया भी  छू सके। अपने को क्षण भर अगले की स्थिति में रख कर देखो तो अहसास होगा कि दुख,बिछड़ने का दुख, अपने सबसे प्यारे वस्तु/ व्यक्ति के विमुख हो जाने और उससे अलग होने का दुख कैसा तोड़ता है, कितनी पीड़ा होती है, इसे तो भुक्त भोगी ही जान सकता है। घायल की गति घायल जाने के जिही लागी सोय। अगले व्यक्ति को उस दुख का अहसास तो तब होता जब वह उसका अंग बना होता। जब अपना दिमाग न चले तो इसी बात पर विश्वास करना होता है कि  मेरे मन कछु ओर है कर्ता के कुछ ओर। फिर ये कष्ट हमें ईश्वर की ओर से दिए गए हैं, तो भोगने तो होंगे ही चाहे कलप कलप के रो रो के भोगे या ईश्वर का प्रसाद मान सिर झुका स्वीकार लें। कुछ दुखों के समाधान नहीं हुआ करते, बस उन्हें भोगना ही होता है। तो ईश्वर जिन कष्टों को दूर नहीं कर सकता फिर चाहे वे अपने हो या अपनो के, उन्हें सहने की शक्ति दे। ये दिन भी बीत ही जायेंगे। जब वे दिन नहीं रहे तो भला ये ऐसे कितने दिन टिकेंगे। दुःख भरे दिन बीते रे भैया फिर सुख आए रे, रंग जीवन में नया छाए रे।

 सफर जारी है.….973

24.06.2022

हमने आंगन नहीं बुहारा......

झाड़ना बुहारना दैनिक क्रियाएं हैं।झाड़ू मारना मुहावरा  भले हो ,जिस किसी अर्थ में प्रयुक्त होता हो पर सच तो यह है कि झाड़ू और बुहारी के बिना किसी का काम नहीं चलता। नए घर में प्रवेश करते तीन वस्तुएं अनिवार्य रूप से सबसे पहले रखी जाती हैं पानी का बर्तन घड़ा, सुराही आदि, नमक और भगवान का विग्रह, उनकी तस्वीर अथवा प्रतिमा। तीनों के संदर्भ भी बहुत स्पष्ट हैं, घर की साफ सफैयत के लिए झाड़ू, खाने में सबसे जरूरी नमक शायद यह उस समय की कल्पना रही होगी जब नोन, तेल, लकड़ी जीवन जीने के लिए जरूरी रहे होंगे, और ईश्वर  तो सब का रखवाला है तो उसे तो किसी न किसी रूप में प्रतिष्ठित होना ही था। उच्च वर्ग में झाड़ू का स्थान वैक्यूम क्लीनर ने ले लिया। साधन भले ही बदलें हो पर साफ सफाई की संकल्पना तो शाश्वत है।

कुत्ता तक जहां बैठता है, पूंछ से उस जगह को झाड़ लेता है फिर हम तो मानुष हैं बिना साफ सफाई के कैसे रह सकते हैं। घर को धो ओ, झाड़ू पोंछे से साफ करो अब ये काम खुद करो या किसी सेवक सेविका से करवाओ पर घर साफ़ करना जरूरी है जहां काम करने जाते हो ,सफ़ाई तो वहां भी चाहिए। जगह के साथ साथ शरीर और वस्त्र की स्वच्छता आवश्यक है तभी तो रोज सवेरे उठते पहले स्नान करते हैं, साफ़ सुथरे वस्त्र पहनते हैं, रसोई को साफ़ कर भोजन बनाते हैं, हाथ धोकर खाना खाते हैं आदि आदि। ये आदत बहुत बचपन से ही डाल दी जाती है। तो सफ़ाई को लेकर हम सभी सतर्क रहते हैं फिर चाहे वह शारीरिक सफ़ाई हो या वस्तुओं और स्थान की।

तो जब सफ़ाई की आवश्यकता सिद्ध है तो मन को भी साफ़ करना आवश्यक होगा, ईश आराधना के लिए केवल तन ही नहीं, मन की शुद्धता स्वच्छता भी जरूरी है। तभी यह भजन गाए गुनगुनाया जाता है हमने आंगन नहीं बुहारा कैसे आयेंगे भगवान, कैसे आयेंगे भगवान। सच्चे मन से नहीं पुकारा कैसे आयेंगे भगवान। चंचल मन को नहीं संभाला कैसे आयेंगे भगवान। पर भगवान भक्त की सच्ची पुकार पर दौड़े चले आते हैं। गज , प्रहलाद और द्रौपदी की पुकार पर दौड़े चले आए , सब जानते हैं। भक्तों के मान की रक्षा प्रभु अवश्य करते हैं बशर्ते भक्त सच्चे मन से उन्हें पुकारे। भक्त की क्या,वह तो यहां तक कह देता है तूने मुझे बुलाया शेरा वालिए मैं आया मैं आया शेरा वालिए। या निर्मल मन हो तो रघुनायक शबरी के घर आते, सूर श्याम की बांह पकड़ कर साग विदुर घर खाते, हमने ये भी नहीं विचारा  कैसे आयेंगे भगवान। हम विचार ही तो नहीं करते कि बिना मन साफ़ हुए ईश्वर आएं तो कैसे आएं। हर कोने कल्मश कषाय की लगी हुई है ढेरी, नहीं ज्ञान की किरण कहीं भी हर कोठरी अंधेरी, आंगन चौबारा अंधियारा, कैसे आयेंगे भगवान। बस सारे दिन छल छंद में लगे रहते हैं फिर कहते हैं हमारी प्रार्थना तो प्रभु ने सुनी ही नहीं। बस एक बार अपने हृदय को निर्मल बना कर तो देखो कि भगवान तो कैसे मन से आपकी बात सुनते हैं। ह्रदय हमारा पिघल न पाया जब देखा दुखियारा, किसी पंथ भूले ने हमसे पाया नहीं सहारा, सूखी है करुणा की धारा कैसे आयेंगे भगवान। तो अपने मन को साफ़ सुथरा रखो, हर जीव के प्रति दया और करुणा रखो, फिर देखो भगवान आते ही नहीं, दौड़े चले आते हैं। और उन्हें खोजना कहां, वे तो तेरे अंदर ही हैं, बस ध्यान से देखना पड़ता है, कुटिलता छोड़नी होती है। याद है न कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूंढे वन मांही, ऐसे घट घट राम है दुनिया देखे नाही। अंतर के पट खोल देख ले ईश्वर पास मिलेगा, हर प्राणी में ही परमेश्वर का आभास मिलेगा। सच्चे मन से नहीं पुकारा कैसे आयेंगे भगवान। तो पुकारो सच्चे मन से, भगवान जी आएंगे, उनको आना ही पड़ेगा, वे रुक ही नहीं सकते।

तो प्रभु को पाना है, उन्हें अपने पास बुलाना है तो मन की, चित्त की गंदगी को बुहारना होगा। विचारों को शुद्ध करना होगा, लाग लपेट छोड़नी होगी, पारदर्शी होना होगा, कथनी करनी का अंतर मिटाना होगा। ऐसे थोड़े ही भगवान मिला करते हैं । घर के आंगन के साथ मन को भी बुहारना होता है। सबके प्रति शुद्ध भाव रखना होता है, सबको अपना मानना होता है, साधना करनी होती है, तब जाकर उनका नाम लेने में आनंद आता है। हरि बोल हरि बोल हरि बोल हरि बोल रे का कीर्तन तभी होता है,राधे राधे भी तभी जपा जाता है। तो बस मन के आंगन को बुहारो, नारियल सीक की झाड़ू लेकर जमी हुई काई को खुरच खुरच कर छुडाओ तब जाके भक्ति मे मन लगता है। तो मन के आंगन को बुहारना बहुत जरूरी है। हमने आंगन नहीं बुहारा कैसे आयेंगे भगवान, चंचल मन को नहिं संभाला कैसे आयेंगे भगवान।

पहले करो तो सही

 सफर जारी है....९७२

२३.०६.२०२२

पहले करो तो सही.....

कल अध्यापिकाओं के एक बड़े वर्ग से संवाद करते पाया कि आपका कार्य और व्यवहार आपको बहुत कुछ दिलाता है। बस करना होता है। लेकिन मुश्किल यह है कि हर व्यक्ति को चाहिए पहले,करने की बात बाद में। कैसे पूरा का पूरा तंत्र एक इस पहल के कारण बदल सकता है, इसकी शुरुआत कैसे हजारों लाखों के मानस को बदलने में सहायक होती है। बस आगे आओ तो सही, करने की सोचो तो सही, बोलना सीखो तो सही, अपने को लोगों से जोड़ो तो सही ।

छोटे छोटे प्रयास ही बड़े रंग ले आते हैं, बस उन्हें अमल में लाना होता है। आपको प्रभु ने एक विशेष कार्य के लिए चुना है तब आप अध्यापन क्षेत्र में आए हैं। इसे प्रभु की कृपा समझो कि इतने इतने विद्यार्थियों से जुड़ने का अवसर आपको मिला, आप चाहते तो इस अवसर का भरपूर लाभ उठा सकते हैं, अपनी बात को एक बड़े समूह तक पहुंचा सकते थे, आप इतने इतने विद्यार्थियों के जीवन को बदल सकते थे, उनमें जीवन के प्रति उत्साह भर सकते थे, उन्हें रचनात्मक बन सकते थे, उन्हें सही आकार दे सकते थे पर ये सब तब करते जब आपने स्वयं को नियोजित किया होता, कुछ सोचा होता, जब अपने कार्य को इस दृष्टि से देखा होता, उसके इतने पहलुओं पर सोचा होता, अपने को इस योग्य समझा होता, अपने को व्यवस्थित किया होता पर आपने ऐसा सोचा कब। आप तो बस ये मानते रहे कि मुझे तो जैसे तैसे बस दस से पांच तक नौकरी करनी है, उतना ही करना है जिससे काम भर चल जाए, बस कक्षा में गए, उसी पुराने ढर्रे पर किताब खोली, पाठ पढ़ाया, काले सफेद पट पर चाक या मार्कर से कुछ लिखा, प्रश्नों के उत्तर किताब के पाठ से प्रश्नों के उत्तर लिखवा दिए और आपकी छुट्टी हो गई। जरा दिल पर हाथ रख के सोचिए कि क्या बस इतना ही काम था आपका कि कक्षा में आए, एक महत्वपूर्ण अवसर को यांत्रिक से कार्य के साथ बिता दिया और हाथ झाड़ कर चल दिए कि चलो आज का दिन तो बीता, बस सारी दृष्टि अवकाश, यात्रा, सुविधा पर गड़ाए रहे। इसका दशांश भी आपने अपने कार्य को दिया होता, पढ़ाने जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम को पूजा मानना होता, उसे पवित्रता से ग्रहण किया होता, अपने कार्य दायित्व के प्रति गंभीर रहे होते तो आज सब कुछ बदला बदला सा होता, आपको मानसिक संतोष मिला होता, आप अपने को दायित्वशील मान रहे होते, समाज को दिशा दे रहे होते पर नहीं इस दृष्टि से सोचा ही कब गाया। एक बड़े लक्ष्य को भूलकर हम छोटे छोटे स्वार्थों में लिप्त हो गए, तेरा मेरा करने में व्यस्त हो गए और एक महत्वपूर्ण कार्य दायित्व को भुला बैठे।

मेरा इस अध्यापन क्षेत्र में जुड़े सभी दायित्वशील साधकों से अपील है कि वे अध्यापन की गंभीरता को समझें, अपने कार्य को केवल यांत्रिक न समझें कि केवल कक्षा में गए, पाठ पढ़ाया और छुट्टी हो गई। नहीं भाई नहीं, ये तो शुरुआत थी, इसके माध्यम से तो आप समाज और देश को बदलने की कड़ी में जुड़ गए हैं, आपको प्रभु ने एक बड़ा अवसर दिया है। इसका भरपूर लाभ उठाओ। आपको तो पढ़ाने का एक अस्त्र शस्त्र दिया गया है तो उसका सही प्रयोग करें, पढ़ाना केवल पढ़ाना भर नहीं है, यह तो आपकी बात जन जन तक पहुंचाने का माध्यम है तो उठो, जागो और काम पर लग जाओ, बहुत समय खो दिया, जो क्षण शेष है उसे पकड़िए। बस आज इतना ही।

करो योग रहो निरोग

 सफर जारी है..... ९७०

२२.०६.२०२२

करो योग रहो निरोग......

योग कर्मसु कौशलम अर्थात कर्मों में कुशलता योग कही जाती हैं, इस आधार पर तो जो भी छोटा बड़ा काम हाथ में लिया जाए, उसे लगन और निष्ठा पूर्वक संपन्न करना भी योग ही हुआ। पर काम को चुनना और फिर उसे समय से पूरा करना चुनौती पूर्ण होता है। बिना सोचे समझे उत्साह उत्साह में बहुत से कामो को हाथ में ले तो लिया जाता हैं लेकिन कुछ समय बाद ये उत्साह ठंडा पड़ जाता हैं, काम से विरक्ति होने लगती हैं, काम बोझ लगने लगता है। फिर उस काम को बीच मैं छोड़ एक और काम को हाथ में लेते हैं और कुछ समय बाद उस काम का हश्र भी पहले जैसा हो जाता है। ऐसे लोग शायद याद नहीं रख पाते कि आधी छोड़ पूरी को धाबे, पूरी गहै न आधी पाबे। जिनकी स्थिर मति नहीं होती, चित्त बैचेन रहता हैं, पल में तोला पल मैं माशा हो जाते हैं, वे किसी भी काम के साथ न्याय नहीं कर पाते।

योग कुछ शारीरिक व्यायाम भर नहीं है, योग केवल प्राणायाम भी नहीं है। योग एक जीवन पद्धति है। समत्वम योगम उच्चयते, जीवन में समत्व योग कहलाता है। कैसे आता है जीवन में समत्व और संतुलन, कौन होता है योगी। जो जागते हुए सोता है वह है योगी। अब सोते हुए तो सोया ही जा सकता है पर योगी हर पल सजग रहता है, वह कर्मयोग में निरत रहता है, निरंतर चिंतन करता है सोते जागते उठते बैठते बस अपने को लक्ष्य में केंद्रित रखता है। जब कभी ऐसे कर्मयोगियों से मिलना होता है, मन बहुत प्रसन्न हो जाता है, लगता है जब ये कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं कर सकते। फिर मन कठिनाइयां गिनाने लगता है अरे इतना तो काम होता है, समय की बड़ी किल्लत है, जो हाथ में है, वही पूरा नहीं हो पा रहा तो नया क्या ओढ़े। तो हम तो ऐसे ही ठीक है, बस हम से तो इतना ही हो जाए, उसी मैं भर पाएंगे। बस एक यही सोच आगे बढ़ने से रोक देता है। वहीं के वहीं जड़ हो जाते है।

योग को मात्र पढ़ना और रटना नहीं होता, उसे करना होता है, व्यवहार में लाना होता है, स्थिर मति होना होता है, चंचल चित्त को वश में करना होता है, अपने को साधना होता है, शरीर को स्वस्थ रखना होता है पर हम हैं कि पतंजलि के योग सूत्र को रटे जा रहे हैं, गीता के अध्याय पर अध्याय पढ़े जा रहे हैं पर अंदर कुछ नहीं उतर रहा, पानी में रह कर भी मीन की तरह प्यासे हैं क्योंकि हम चिकने घड़े जो हो गए हैं, खाल मोटी काली भैंस की तरह कड़ी हो गई है, कोई असर ही नहीं पड़ता। बस जीवन भर इधर से उधर दौड़ते रहते हैं बिना किसी लक्ष्य को निर्धारित किए, हमें सब चाहिए तो पर प्रयास आधे भी नहीं कर पाते और जो थोड़े बहुत किए भी जाते हैं, वे भी आधे अधूरे मन से, तो जल के बीच खड़े भी सूखे के सूखे रह जाते हैं। योग करने के लिए ठठकरम तो खूब करवा लो, मेट्स आ जाएगी, टीवी लग जाएगी, योजना बना लेंगे, दुनिया भर का ढिंढोरा पीट लेंगे पर करने की बारी आई तो जमाने भर का आलस आ जाएगा, बहाने खोज लिए जाएंगे, न करने का सारा दोष आंगन पर मढ़ दिया जाएगा, व्यवस्था को कोसा और आलोचित किया जाएगा लेकिन फली के दो टूक करेंगे नहीं, बस गाते रोते रहेंगे, बकर बकर करते रहेंगे।

योग करने से होता है, कहने से नहीं। योग जीवन शैली है। वह आपके हर कार्य में झलकता है। उसे कहना नहीं होता, बताने की जरूरत नहीं पड़ती कि हम योग करते हैं। वह तो आपके दिन प्रतिदिन के आचरण में झलकता है, बात करने के तरीके से प्रदर्शित होता है, आप हमेशा हड़बड़ी में नहीं रहते, धैर्य पूर्वक दमदार आवाज में अपनी बात रखते हैं, आपको बेवजह चीखना चिल्लाना नहीं होता। विनम्रता पूर्वक भी सच रखा जा सकता है, उसके लिए उदंड और असभ्य होने की जरूरत नहीं होती। शांत चित्त होकर और धैर्य बनाए रखते हुए आप अधिक मजबूत हों जाते हैं।

तो करते रहिए योग,योगा नहीं। मनाए चाहे मत मनाए योग दिवस के आयोजन को पर मन से उसे करते रहिए। योग के लिए बहुत शोशेबाजी कि जरूरत नहीं होती, बस उसे करना होता है नियमित। तो करते रहिए योग और बने रहें निरोग।

पिता दिवस के ब्याज से

 सफऱ जारी है....970

21.06.2022

पिता दिवस के ब्याज से .........

ये सारे दिवस पिछले कुछ सालों की उपज है. हमारे समय में तो पिताजी  एक गरिमा पूर्ण व्यक्तित्व हुआ करते थे जिनके आगे बोलने की हिम्मत ही नहीं होती थी. बस वे हैं, हम सबका ख्याल रखते हैं, ज्यादातर बातें तो माँ के माध्यम ही उन तक पहुंचती थी औऱ बातें भी क्या होती थी

कभी स्कूल की फीस, कॉपी किताब या पिताजी के साथ रिश्तेदारी में जाने की जिद. इससे अधिक कोई मांग जेहन में आती ही नहीं थी. छोटी छोटी खुशियों में ही जिंदगी जी लेते थे. आज लोगों की बड़ी बड़ी कथा कविता पढ़ते हैं तो लगता है काश हम भी ऐसे रचनाकार होते. जो मन में था पिता सब समझ जाते, कभी जिद करने रूठने मटकने फूं फा करने की नौबत ही नहीं आई. यदि मांग जायज है तो कहने की नौबत ही नहीं आती थी औऱ गलत है तो कितना भी फ़ैल जाओ, पूरी नहीं होती थी. नहीं का मतलब नहीं ही था. औऱ वैसे सच बताएं तो ऐसा कोइ अभाव कभी लगा ही नहीं जिसके लिए जिद की जाए. पढ़ाई लिखाई का सब सामान बिना कहे ही मिल जाता, स्कूल की ड्रेस बनबा दी जाती, रोज के औऱ धराउ के कपड़े होते ही थे. रोज मौसम की फल फलारी, मूंगफली, भुने अनाज आते ही थे. अब औऱ क्या चाहिए था जिसके लिए जिद करते. नंबर से सबको रिश्तेदारी में भी ले जाते. मेला तमाशा खूब दिखाने ले जाते. घर क्या था, स्वर्ग था. ज़ब दफ्तर से लौटते तो काफी दूर से ही सीटी की आवाज से हम बच्चे दौड़ पड़ते कि पिताजी आ रहे हैं.

ज़ब अपने घर के हो गये तो हमेशा यही कहते रहे जाओ बेटा अपने घर खुश रहो. बस एक बार उन्होंने बहुत मन से कहा बेटा दो चार दिन रुक के जाना, पता नहीं क्या हुआ मुझे तुरंत मना कर दिया औऱ इस बात का मलाल मन में ही रह गया.पिता होते ही होंगे गौरवशाली,अपनी संतान की छोटी से छोटी जरूरत का ध्यान रखने वाले, खुद कष्ट सहकर बच्चों के लिए सब सुविधा जुटाने वाले. सच कहती हूँ एक व्यक्ति की तनख्वाह में छह बच्चों का पालन पोषण जिसमें किसी बच्चे को कभी अभाव लगा ही नहीं, कैसे सम्भव हुआ आज ये खुद अनसुलझी पहेली है.

पिता होना यानी दायित्व शील होना, लड़कियों के लिए घर वर तलाशना, उन्हें संस्कारित करना, दूसरे के घर जाके निभाव कर सके, ऐसी शिक्षा देना. चिंताए तो बहुत होगी उन्हें पर चेहरे पर म्लानता नहीं दिखी, बड़ी बड़ी चिंताओं को हँस कर उड़ा देते थे. सारी रिश्तेदारी के निभाव को पहले नंबर पर रखा जाता. हम बच्चे कभी कभी चिड़चिड़ करते तो प्यार से समझा दिया जाता बेटा ये सब अपने ही हैं, ऐसा नहीं कहते, जो है मिल बाँट कर खालो, इतना ही है औऱ इसी में काम चलाना है, बस उनका इतना कहना ही हमारे लिए ब्रह्म वाक्य हो जाता. अब पिताजी ने कह दी तो कह दी.

आज ज़ब बच्चों को पिता से जुबान दराजी करते देखती हूँ, तायने उलाहने मारते देखती हूँ, आलोचना करते देखती हूँ तब लगता है क्या पिता से ऐसा भी कहा जा सकता है. वे तो पिता है हमारे जन्मदाता हैं उनसे तो हमारा जीवन है, वे हमें पालते पोसते हैं, दुनिया की मुसीबतों से लोहा लेना सिखाते हैं. फिर उनके प्रति ही बच्चों के मन में वैर कैसे पल जाता है, वे उन्हें आलोचित कैसे कर लेते हैं, उनमें भाषाई उदंडता कहाँ से घुस आती है, वे उनके लिए असभ्य औऱ गंदे विशेषनों का प्रयोग कैसे कर पाते हैं. पुत्र पुत्री तो पिता के आत्मज आत्मजा हुआ करते हैं न, फिर वे उनसे कैसे कंस का सा क्रूर व्यवहार कर पाते हैं, ये गलत आदतें उनमें कहाँ से प्रत्यारोपित हो जाती हैं. वे पिता को पिता का सा मान क्यों नहीं दे पाते. मान तो मन से होता है किसी के कहने भर से उपजा नहीं करता औऱ किसी के मना करने से समाप्त नहीं हो जाता. तो बच्चे बच्चे होते हैं औऱ पिता पिता.उनमें एक फासला होता है जैसे गुरु शिष्य में एक हाथ की दूरी होती है. वास्तव में ये दूरी नहीं, ये बड़ों के प्रति मान है. बस ये मान बना रहे, भाषा के संस्कार बचे रहें, हम पिता को तो क्या दें पाएंगे पर अपनी संतान के प्रति अपने दायित्वों का निर्वाह कर पाएं यही बड़ी बात होगी , यही पिता का सच्चा मान होगा

अंधरा के गैया, राम रखवैया

 सफर जारी है....969

20.06.2025

अंधरा के गैया, राम रखवैया .....

कहावतें किसी भी भाषा/बोली में हों, अपना पुरजोर असर दिखाती हैं।बात को सशक्त ढंग से प्रस्तुत कर देती हैं फिर भी कोई भैस का भैया उसे न समझ पाए तो ये उसकी नासमझी का सूचक है।मांस भक्षण से ही जाति ही

भृष्ट होती हो तो मक्खी ही क्यों ,फिर तो खूब डट कर चिकन बिरियानी खाओ।।प्याज के छिलके पर भला क्या मुसलमान बनना।ये कहावते कोई आजकल में नहीं रची गई, न जाने कब से चली आ रही है।तो मुहावरे ,कहावतें और लोकोक्ति प्रयोग में जो जितना अधिक समृद्ध होगा, उसकी भाषा की तीक्ष्णता, मारक शक्ति उतनी ही प्रबल और धारदार होगी।कैसे सीखे जाते हैं इतने इतने प्रयोग।कक्षा में पढ़ते पढ़ाते मुहावरे भले वाक्य में प्रयोग कर लें, पर लोकोक्ति और कहावतों के प्रयोग करने में तो छठी का दूध याद आ जाता था।

कहावतें क्या थी, पूरे वाक्य थे, उसे समझाने के लिए एक वाक्य पहले और एक बाद में जोड़ना होता था।जितने कक्षा में विद्यार्थी उतने ही वाक्य बनाने को कहा जाता पर सब एक दूसरे की चोरी करते थे । किताब में लिखे , अध्यापिका द्वारा बोले और बनाये गए वाक्य ही हमारे खजाने होते।घर पर मां खूब सहायता करती नये नये वाक्य बनाना सिखाने में।जिस दिन नये मुहावरे, लोकोक्ति कहावतें सुनते,सारा दिन उसके प्रयोग में लगे रहते।सच बताएं तो जो स्कूल में सिखाया जाता, घर पर उसे इतनी इतनी बार दोहराते कि बस सब याद हो जाता।बात उन दिनों की है जब कक्षा में और दोस्तों में सबसे आगे रहने का नया नया शौक चर्राया था।अपनी प्रशंसा सुनकर फूले नहीं समाते थे।और जो कहीं कुछ गलती हो गई,डांट वांट पड़ गई तो मुंह सुजा कर बैठ गए कि आंखों से गंगा जमुना बहनी शुरू हो जाती।मां बार बार समझाती हर बार सफलता मिले ही मिले, यह जरूरी नहीं होता।बस अपनी मेहनत किये जाओ, हार भी स्वीकारो और जीत भी।हार से सीख लो कि अगली बार इससे भी अच्छा करेंगे।

तो जीवन में चूहा भाग बिल्ली आई का खेल चलता रहा, अब भी चल रहा है।घुड़दौड़ के खेल में शामिल होना आता नहीं।आता क्या नहीं, कभी अपने को इतना योग्य समझ ही नहीं पाए कि बड़े लोगों संग दौड़ सकें।बस जो सहज मिल जाता है, वह सिरमाथे।सिखाया भी यही गया सहज मिले सो दूध सम मांग मिले सो पान, कह कबीर वह रक्त सम जामे खींचा तान।मिल जाए तो ठीक न मिले तो गम नहीं।जिसके संसारी सहयोगी नहीं होते ,उसके राम जी होते हैं।जिसका कोई नहीं, वह राम भरोसे हैं।यही विश्वास बहुत से दुखों से मुक्ति दिला देता है।जो भजे हरि को सदा, वह परम पद पावेगा।अंधरा के गैया, राम रखवैया।तो अंधा और कुछ करे न करे पर राम को तो भज ही सकता हैIतुम उसे भजते रहो,वह तुम्हारे दुख सुखों की परवाह करेगा।पर विश्वास  रखना जरूरी है।और मजे की बात तो यह है कि जो सहज और सरल है ,उसे ईश्वर पर बड़ा भरोसा है।अपना सा जितना मर्जी कर ले, पर बाद में राम पर ही सब छोड़ देता है जैसी राम जी की मर्जी।भगवान चाहेंगे तो सब ठीक होगा।ये भाव जैसे जैसे प्रबल होता जाता है, मन में शांति आती जाती है।जो होगा ठीक होगा।वैसे भी आप रो झींक कर क्या कर लेते हैं, बस मन तन से कमजोर ही होते जाते हैं।तो बने रहिये इन मुहावरों कहावतों और लोकोक्तियों के साथ, क्या पता कब कौन सी कहावत डूबते का सहारा बन जाये।जब मित्र ने मुझे कहा अंधरा के गैया राम रखबैया, तो मन में कौंधा काहे परेशान होती हो, ईश्वर तेरे साथ है, जब आंधरे की गैया का रखबैया वह काली कमली वाला है तो तेरा क्यों नहीं होगा।तो भजते रहो रटते रहो,नैया तो पार राम जी ही लगाएंगे।

सारे जग से न्यारी अम्मा

 सफर जारी है.....968

19.06.2022

सारे जग से न्यारी अम्मा......

उन महिलाओं को सौभाग्यशाली कहा जाता हैं जिनके ऊपर माता पिता और सास ससुर दोनों की छत्रछाया होती है।जनश्रुति है कि  ऐसी महिला जो पीहर और ससुराल दोनों की छत्रछाया से भरी पूरी हो, के बालों में बांधा गया रिबन/ फीता बांध लेने से बायठा ठीक हो जाता है।जब तक मां पिता सास ससुर दोनों जीवित थे, अडोसी पड़ोसी कितनी कितनी बार अपने हाथ दर्द को उस रिबन को बांध दूर करते रहे हैं।इसी प्रकार चिक चली जाने पर विशन पाँय पैदा हुआ व्यक्ति यदि लात मार दे और लात खाने वाला पीछे मुड़कर न देखे तो चिक ठीक हो जाती है।इन घटनाओं के वैज्ञानिक सन्दर्भ से तो परिचय नहीं है पर इतना निश्चित है जिनके दोनों घर भरे पूरे होते हैं, जिन्हें दोनों घर का लाड़ प्यार मिलता है, वे निश्चित ही भाग्यशाली होते हैं।तो जब तक दो दो माता पिता का सान्निध्य मिलता रहा, चिंता फिक्र जैसे शब्दों से साबका नहीं पड़ा.बस नौकरी और बाहर बास के काम में व्यस्त रह आये क्योंकि उस घर में  मां और इस घर में सास सब संभाल लेती थी।वे थीं तो मेरे खाने पीने की चिंता भी उनके जिम्मे थी।देर सवेर आने पर डांट में उनकी चिंता झलकती थी।पहले पिता, फिर ससुर ,फिर मां और फिर सासु मां सभी उस पथ के पथिक बन गए जहां से कोई वापस नहीं लौटा करता।श्मशान तक विदा करने सब आते हैं पर उसके बाद जाने वाले किस दुनिया के बाशिंदे बन जाते हैं, यह अभी तक रहस्य ही है।

कल सासु मां की पुण्य तिथि थी, अचेतन में तो बार बार कौंध रहा था कि इतना अनमनापन  क्यों है पर कार्यालयी व्यस्तता दिन भर हावी रही और बिस्तर पर लेटते ही जैसे तीन वर्ष पहले की उनके विछोह की घटनाएं मस्तिष्क को झकझोरती रही।उनकी बीमारी, कोरोना काल और घर में बंद अडोस पड़ोस नाते रिश्तेदार।वृद्ध होते शरीर कमजोर होता जाता है और रोग शरीर में घर बनाने लगते हैं या कहें कि शरीर को छोड़ने का कोई बहाना भी तो चाहिए।तो बड़ों की छत्रछाया की अंतिम कड़ी अम्मा जी भी तीन वर्ष पूर्व संसार को छोड़ बैकुण्ठ धाम जा बसी हैं।वहीं से अपने घर परिवार को देख सिहा लेती होंगी क्योंकि बच्चों में तो उनकी जान बसती थी।सच तो यही है कि वे परिवार का आधार स्तम्भ थी,रीढ़ थीं घर परिवार की।उनके जाते ही सब बिखर गया सा लगता है।और सब तो समेट बांध भी लो पर मन सहेजना थोड़ा मुश्किल होता है।ऊपर से तो सब सहज सामान्य से दिखते हैं पर यादों के पिटारे पर किसी का बस तो नहीं हुआ करता न, वे तो बिना चित्र के भी मन में अंकित रहती हैं।बस तिथि उन यादों का संकेतक बन जाती हैं ।अम्मा जी, आपको शत शत नमन।आप जहां भी हैं, बस परिवार पर अपना आशीष बनाये रखें।आप थीं तो कभी सोचा ही नहीं कि एक दिन आपसे बिछुड़ना भी होगा।बस अब तो तस्वीर की शोभा बन गई हो।पर रहती हम सबके  दिलों में ही हैं आप।

मां कहीं नहीं जाती, वह अपने बच्चों के आसपास ही बनी रहती है गर्म दुशाला सी, वक्त जरूरत सबको अपने आँचल में समेट लेती है।सो हम बालक उस गर्माहट को आज भी अनुभव करते हैं।आपकी तीसरी पुण्यतिथि पर शत शत नमन।ईश्वर हम परिवारी जनों को शक्ति दे कि हम आपके बताये मार्ग पर चल सके, परिवार में जोड़क की भूमिका निभा सके।हम सबकी थी प्यारी अम्मा, सारे जग से न्यारी अम्मा ।

मास्टरनी/बहनजी

 सफर जारी है....966

17.06.2022

 मास्टरनी/बहनजी ....

सफर जारी है में संख्या 66 जब किसी अंक के साथ जुड़ती है तो नए खण्ड की शुरुआत होती है।तो मन खूब खुश है कि इस यात्रा के दस महत्वपूर्ण पडाव पूरे हुए और आषाढ़स्य प्रथम दिवस से एकादश सोपान प्रारम्भ हो रहा है।पर दूसरे क्षण एक विचार उपजता है ये गिनती क्यों, ये गिनना किसलिए ,अरे जब तक अंगुलियां कीबोर्ड पर दौड़ रही हैं, और दिमाग में विचार आये जा रहे हैं,पेज काले करते चलो।जब पांच फुटी काया मुठ्ठी भर राख में सिमट जाएगी तब सब समाप्त होना ही है।पर मन को खुश होने को आंकड़े चाहिए न।मन की भली चलाई वो तो हरिनाम भी माला के मनके गिन गिन कर जपता है।ज्यादा सयाना जो है।अब करे भी क्या मास्टर बुद्धि है और वह भी भाषा का ,उसमें भी हिंदी का।मास्टर तो वैसे ही दलिदरी होता है, बस उसके हिस्से विद्यार्थियों की मुंह भर नमस्ते ही आती है और भोले भंडारी को देखो इसमें ही कैसा फूला फूला डोलता है मानो कुबेर का खजाना मिल गया हो।उसकी शिष्य सम्पदा सबसे बड़ा कोष है।तो उसी की जुबानी सुनो हिंदी मास्टरनी की कहानी।

तो क्या हुआ जो मैं मास्टरनी /बहिनजी हूँ।अरे लोग शराबी, जुआरी ,पापी, चोर, डाकू ,भगोड़े, आलसी और जन क्या क्या होने में नहीं शरमाते । तो मैं क्यों शर्माऊ,अरे भाई ,मास्टरनी है तो क्या हुआ।अब छोटो को पढाओ प्राथमिक में पढाओ ,माध्यमिक में पढाओ या यूनिवर्सिटी में पढ़ा आओ, क्या फर्क पड़ता है, पढाना तो पढाना है।तो तुमको क्या लगता है पढाना काम नहीं है,पचपन साठ विद्यार्थियों को संभालना हंसी ठठ्ठा है क्या, तुम पे तो अपने जाये दो ही नहीं संभलते, उन्हें बिस्तर छोड़ते ही स्कूल पठा देते हो।खुद तो अपने बालक को किटकिन्ना भी नहीं सीखा पाते और मास्टरनी में रोज सौ दोष खोजते हो।और फिर तुम्हें तो परकटी अंग्रेजी मैम ही ज्यादा पसंद है जिनकी गिटर पिटर भले ही पल्ले पड़े न पड़े पर ये भरम तो बना रहता है कि हमाई औलाद भी ऐसी अंग्रेजी मैम जैसी गिटर पिटर करना सीख जाएगी।

हम तो हिंदी वाली मास्टरनी है,बहनजी नुमा है,विलायती मैम नहीं हैं । हिंदी पढ़ाती हैं हिंदी।हिंदी के नाम सुनते ही चेहरा क्यों उतर गया, क्या ये भाषा नहीं है।जितने मर्जी विषय हों,पढ़े तो सब भाषा के माध्यम से ही जाते हैं।बिना भाषा के भला कैसी पढाई। विषयों को पढ़ने के लिए आधार रूप जो भाषा है, उसे तो मैं ही सिखाती हूँ न।जो कहीं मैं ही उनकी नींव पक्की नहीं करूं तो फिर कैसे पटर पटर बोलोगे।भाषा सीखे बिना आगे बढ़ा ही नहीं जा सकता।जिसकी जो भाषा है ,उसे वही अच्छी लगती है।मेरी भाषा हिंदी, मेरा गौरव हिंदी।उसे बोलकर तो मेरा सिर उन्नत होता है।यूं ही नहीं सीखी जाती कोई भाषा, उसे बोलना, सुनना, पढ़ना, लिखना सीखना होता है।उस की संस्कृति समझनी होती है।उसके शब्दों को याद करना होता है, उसके अर्थ समझने होते हैं ,उन्हें प्रयोग करना होता है, उनसे नई नई कविता कहानी रचनी होती हैं,उसके सम्प्रेषण में दक्ष होना होता है, उसका खूब खूब प्रयोग करना होता है तब जाकर कहीं शब्दों से दोस्ती होती है,शब्द अपने से लगते हैं, फिर तो वे तुम्हारे हाथ के लट्टू हो जाते हैं, मर्जी चाहे जैसे घुमा दो।

तो मैं हिंदी पढ़ाती हूँ हिंदी, पूरे होशोहवाश में और सौ प्रतिशत गौरव बोध के साथ, पर्वतों जंगलों नदियों सबसे कहती हूँ ....सुनो सुनो सुनो, मैं हूँ हिंदी की मास्टरनी, मैं सबको जोड़ती चलती हूँ।कश्मीर से कन्याकुमारी तक मैं घूम घूम आती हूँ, अपने को समृद्ध कर आती हूँ।हर प्रांत मुझे पसंद करता है, मेरे स्वागत में पलक पाबड़े बिछाए रहता है।मैं कबीर, सूर,तुलसी, रहीम, रसखान, मीरा के पदों में बिगुल सी बजती हूँ, कान्हा की बांसुरी हूँ।मैं हिंदी हूँ, मुझमें रम के तो देखो, कैसा आनन्द आएगा।बस मधुर मधुर लोरी सुनते कब सपनों की दुनिया में पहुंच जाओगे, पता भी नहीं चलेगा।

तो आओ मेरे पास, चलो मेरी कक्षा में, वहां तुम्हें सब मिलेंगे...... तेलगू ,तमिल ,कन्नड़, मलयालम, कोंकणी, मराठी, असमी,पंजाबी, गुजराती, सिंधी, ये सब मेरी बहने हैं, मुझसे बहनापा रखती है क्योंकि मैं मास्टरनी जो हूँ हिंदी की।हां, मुझे बहुत अच्छा लगता है जब कोई कहता है देखो, देखो, वो आ गई हिंदी की मास्टरनी। सीधे पल्ले की साड़ी पहने माथे पे बड़ी सी बिंदी लगाए हाथों में छमाछम चूड़ियां और पैरों में झनाझन बजती पायल के साथ हिंदी मास्टरनी/बहनजी का खिताब मुझे उल्लास से भर देता है।हाँ हूँ मैं मास्टरनी हिंदी की और जिंदगी भर वही बनी रहना चाहती हूँ।

फेर मत कहियों पैले चों नाय बताई

 सफर जारी है....963

14.06.2022

फेर मत कहियों पैले चों नाय बताई.........

सुनी तो होयगी कि दान की बछिया के दांत नाय देखे जात ।अब दान तो दान ठहरो ,आदमी अपनी सिद्धा आस्था के कारन देत ए ।कोई जबरदस्ती थोड़े ई है दे दे नाय दे, बाकी मज्जी । वहां तुमाई हेकड़ी को कोई काम नाय कि हमकू जे चहिये वो चहिये,जे अच्छो नाय वो अच्छो नाय।ऐसो वैसो नाय पसन्द  तो  अपनी अंटी ढीली करो, जेब खाली करो।दूसरन  के ऊपर चों लदे भये हो। तुमे नाय चाहिए तो और काऊ ए दे दिनगे ,तुमी थोड़े रह गए हो कि नाक भौंह ऊ सिकोड़ो ,नखरा दिखाओ ,तायने उलाहने मारो, ऐंठ के मारे पैंठ कू जाओ और अगलो तुम्हाई चिरौरी करतो रहे। फिर तुम कौन घर के दामाद लगत हो जाय पहले तो कलेजे को टूक निकार के देयो, डला भर के लदाय देयो तो हू पेट नाय भरे। छोरा ब्याहबे आबिन्गे और ऐन मौका पे ऐसी अनकटोंटी मांग धर दिनगे कि बेटी बारे के होश उड़ जाबे।कि के तो कार देयो दरबज्जे पे कि  बारात लौट जाबेगी ।वो तो जे कहो कि अब छोरिन ने समझ आ गई है कि जाको पेट इत्ते पे ना भरो तो का जरूरी है कि जे मांग आखिरी होय ।जो कैते कि एक बार कुत्ता के मोंह खून लग जाए तो वह फिर माने नाय।फिर तो वह आदमखोर है जात है।जे तो भली भई कि अब लरकी उ साफ साफ कह देत है हमें नाय जानो ऐसे लालची के साथ, हम तो बिन ब्याह भले,ऐसे लालची के संग बंध के हमें अपनो जीवन नाय बिगाडनो।मान लेयो जा टैम महतारी2बाप ने कज्ज लेके कहूँ ते इंतजाम करहू दयो तो जे तो जीवन भर माँगेगो, मंगता है जे तो, हम कहां ते जाको मोंह बन्द करिंगे ।हम तो ऐसे ही भले अब बारात लौटे तो भले ही से लौट जाए पर बाप ए जों अपमानित होत तो नाय देखो जात, आखिर कू तो बाप है हमाये। 

और दूसरी बात सुनो जब हाट बाजार में एक के साथ एक फ्री मिलो करे तो कैसे झट सीना ले लेत हो,बहस तो नाय करत, चुप सीना धर लेत हो, और जे कह के  मन में तसल्ली कर लेत हो कि इन दामन में का बुरो है।जितनो जेब अलाउ करे ,उतनो ही तो करत हो खर्चा, फिर बामे एक की जगह दो मिल जाए तो मन कैसे हरखा जात है, बांछे खिल जात है, मन कैसो फूल सो हल्को हो जात है, बार बार जे कह के अपई पीठ ठोक लेत हैं देखो कैसो बेबकूफ बनाओ,पैसा एक को दयो और सामान दो ले आये।मूरख हो तुम तो निरे,को दे देगो तुम्हें एक के भाव दो।जो मिल जाए बाए जेब में धर के चलते बनो।तुम्हें कछू करनो नाय परि रयो, जो मिल जाए बामे शुकुर मनाओ।काहे कू

 नाक भौंहन ने सिकोड़े से रहत हो, अगलो भलमनसाहत में किये जा रहो है और तुम्हाई आंख तर नाय आ रयो।जब देखो तब काऊ न काऊ बात ए मुद्दा बना लेत हो।नेक सोचो जो मिल रयो है बापे तुमाओ कछू अधिकार नाय।वो तो अगले की भलमनसाहत और सदाशयता हती, बड़प्पन हतो,परिवार के संस्कार हते, सबते मिल जुल के रहनो चाती, तो चुप ई सब करत रहत है कि छोड़ो सब अपने ई है।अब अगलो हू जो बांट हिस्सा पे उतर आए, अपनो तुपनो करे तो कैसी होयगी।सब घमण्ड धरो रह जायेगो। सो ज्यादा भिनभिनाओ मत।अगले कू टिनटिनाओ मत,चौबीस घण्टा पैना से मत मारो करो।बाय हू ए दो घड़ी चैन लगन दयो।अगलो कछू ना कह रयो तो तुम्हें तो इतनी समझ होनी चहिए है कि मीठे गन्ना ए इतनो मत निचोड़ो कि फफ्फस के अलावा कछू नाये बचे। रहनो तो तबऊ पडेगो तो ज्यादा अच्छो है अगले को हू नेक ख्याल रखनो जरूली है।फिर कल कू मती कहियो कि पैले चों न बताई ।

अब बार बार नाय किंगे एक ई बात ए।बहुतेरो समझा लयो।समझ में भर गई होय तो कर लेयो नाय तो तिहाई मज्जी।हमारो तो कहने को काम हतो तो भैया हमने तो कह दई अब तुम जानो और तुमाओ काम।अब नाय किंगे साहब बिल्कुल हू।

सम्बन्धों के मायाजाल

 सफरनामा.......964

15.06.2022

सम्बन्धों के मायाजाल.......

बड़े मोहक होते हैं ये रिश्ते, ये नेह के बन्धन, ऐसे बांधते हैं, ऐसे लपेटे में लेते हैं कि गर्भ में उल्टे लटके जो बड़े बड़े वायदे भगवान जी किये थे कि बस एक बार इससे बाहर निकालो फिर तुम्हारा गुणगान करूंगा, क्षणभर भी तुम्हें नहीं भूलूंगा।पर जैसे ही धरती का स्पर्श हुआ, मां की स्नेहिल गोद और पिता का वटवृक्ष सा साया मिला, भाई बहिनों का स्नेह मिला, बाबा दादी ताऊ ताई चाचा चाची नाना नानी मामा मौसी ने दुलराया, ये संसार ऐसा भाया ऐसा भाया कि बस यहीं के हो के रह गए। फिर तो जो जो वायदे कर आये थे, उसका छटांक भर भी याद नहीं रहा।,सब का सब कपूर सा उड़नछू हो गया।

      बस वह प्यारा सा घर ही दुनिया बन गया।स्कूल गये तो नये नये दोस्त बने,पर समय के बहाब में सहपाठी पीछे छूटते चले गये, मास्टर मास्टरनी भी स्कूल से कॉलेज में प्रवेश लेते वक्त की धुंध में न जाने कहाँ खो गये।अडोस पड़ोस के न जाने कितने कितने रिश्ते थे जिनसे इतना लगाव हो गया था कि इनके बिना कैसे रह सकेंगे।बचपन की सखियां जिनकी गलबाहीं डाल पैया पैया स्कूल जाते थे ,सब पीछे रह गए।नये नये सम्बन्ध जुड़ते चले जाते और पिछले न जाने किन गलियों में विलोप हो जाते।फिर एक दिन दीदी की शादी हो गई, उनका घर दूसरा हो गया तो बड़ी कोफ्त होती कि घर तो ये है दीदी का पर सब ये क्यों कहते रहते हैं ...चलो लड़की अपने घर में खुश है। तो इस घर में वे कौन सी दुखी थी।यहां तो सब अपने थे।जन्म के साथी थे।

      दो दीदी की शादी और घर में भाभी आने के बाद ये तो पक्का हो गया कि लड़की की जात में जन्मे हो बेटा तो ये घर तो छोड़ना ही पड़ेगा चाहे पिनपिनाओ या भुनभुनाओ।ये गलियां ये चौबारा यहां आना न दोबारा हम तो भये परदेशी कि तेरा यहां कोई नहीं गाने की धुन पर डोली में बैठ चल दिये बाबुल के घर से ससुराल को।फिर सब पीछे छूटता रहा, समय समय पर जाते रहे पर सच तो यह था कि अब पराये तो हो ही गये थे। जमे हुए पौधे की जड़े एकदम तो दूसरी जगह नहीं जम जाती ,कुछ समय तो लगता ही है।फिर वही  घर अपना हो जाता है।तो जैसे जैसे आगे बढ़ते जाते हैं, कुछ नए रिश्ते जुड़ते हैं, कुछ पिछले पक्के होते जाते हैं।जिन्हें खाद पानी न मिले, वे मुरझा जाते हैं और एक दिन दम ही तोड़ देते है।तो कुछ टूटे, कुछ से छद्म आवरण हट गया जैसे बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है।कुछ मतलब के थे सो काम निकलते ही मानो किसी गुफा में जाकर छिप गये।लंबी दूरी तक वही साथ चल सके जो दिल से जुड़े थे, मानस में कहीं गहरे पैठे थे।

      कितनी कितनी तह और परतें होती हैं रिश्तों और सम्बन्धों की, इस यात्रा में कितने कितने पड़ाव आते हैं, कितने साथ जुड़ते हैं,कितने बीच में छूट जाते हैं या छोड़ दिये जाते हैं।रक्त के रिश्ते, कोख के रिश्ते, परिवार के रिश्ते, ससुराल के रिश्ते,सामाजिक सम्बन्ध, दोस्ती के सूत्र, नौकरी के साथी ,ओहदे/ पद के सम्बन्ध, आभासी जगत के सम्बंध, काम काज से जुड़े परिचित अपरिचित सभी संपर्कों और सूत्रों में स्वयम को बेलाग रखना है तो थोड़ा कठिन पर यदि ये निभाव आ जाये तो जीना आसान हो जाता है।व्यक्ति से व्यक्ति का सम्बंध जुड़ा रहे, वह स्थिति सर्वश्रेष्ठ होती है।घर परिवार तो अपना होता है। वहां आप मानो न मानो पर पक्की मुहर लगी होती है।निभाना तो उन्हें होता है जिन्हें आप स्वयम चुनते हैं। और जब चुना तो निभाव की जिम्मेदारी भी आपकी ही होती है।कितने कितने लोगों के मध्य रहते आप अकेले होते हैं और अकेले होते भी हरि भाव में भरे पूरे होते हैं।जो अपने हैं वे तो हैं ही, पर जिनका साथ मिला ,उनमें भी अपनापन खोज सके तो कैसा अच्छा हो।सब नाते मतलब के ही नहीं हुआ करते।कुछ को यूं भी सहेजा जाता है।तो आये अकेले थे पर जुड़ते जुड़ते कारवां बन गया और जाएंगे जब तो अकेले ही जाना है, बाकी यहीं का यहीं छूट जाना है।जितना निभे निभाते चलो, साथ तो किसी को भी नहीं जाना होता।

जो दिल खोजा आपना

 सफर जारी है...965

16.06.2022

जो दिल खोजा आपना.......

आत्ममंथन तो कबीर बरगे लोग करते हैं जिन्हें अपनी और दुनियां की चिंता एक साथ होती है।जो कभी बीच बाजार लाठी लेकर खड़े हो जाते है, सबको नसीहत देते हैं तो कभी डांट फटकारते हैं।कबीरा खड़ा बाजार में लिए लुकाठी हाथ जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ, अब अपने घर को कोई क्यों फूंके भला तो कबीर अकेले के अकेले खड़े रह जाते हैं लेकिन अकेले ही भीड़ पर भारी पड़ते है, एक एक को चुन चुन के निशाना बनाते हैं, छूट किसी को नहीं है।कांकर पाथर जोड़ के मस्जिद लई बनाए, तापर मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय कहते हैं तो माला फेरने वालो को भी नहीं बख्शते।माला तो कर में फिरे जीभ फिरे मुख मांहि, मनवा तो चहुँ दिशि फिरे ये तो सुमिरन नाहि या बकरी पाती खात है ताकी मोटी खाल, जे जन बकरी खात हैं तिनको कौन हवाल।दैनन्दिन जीवन में कबीर इतने हाबी रहते हैं कि दुनिया से मन उचट जाए तो कबीर याद आते हैं, सुख दुख हो तो कबीर मानस पर छा जाते हैं।जीवन की नश्वरता देखनी हो तो कबीर पोथी खुल जाती है।राम को भजना हो तो कबीर, जीवन की उलटवासी में कबीर ,भजन गायें तो कबीर,दोहों में कबीर,सबद में कबीर, निर्गुनी गाने हो तो कबीर ,पूरा जगत सियाराम मय सब जग जानी की तर्ज पर कबीरमय हो गया है।

और हो भी क्यों न, कबीर हैं ही इतने सशक्त व्यक्तित्व, उनसे ही तो सीखा कि जन्म भले ही जिस परिवार में, उन्नति और तरीके के रास्ते खोजे जा सकते हैं, काम कोई छोटा बड़ा नहीं हुआ करता।रैदास जूते गांठते और कबीर जुलाहागीरी करते कपड़े बुनते उसी में से जीवन का सच ग्रहण कर लेते हैं।दास कबीर जतन ते ओढ़ी ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया, बीनी रे बीनी चदरिया।जो मर्जी माता पिता हो उन्हें क्या करना, नीरू नीमा हों तो भले विधवा ब्राह्मणी की संतान हो तो ठीक।व्यक्ति के कर्म उसे छोटा बड़ा बनाते हैं ।हां जब अपना परिवार बसाया तो कमाल कमाली को सुयोग्य बनाया, लोई के साथ सद्गृहस्थ बने रहे, परिवार को छोड़ के ज्ञान के लिए बोध पाने के लिए इधर उधर नहीं भटके।रैदास ने तो कठौती में ही गंगा प्रकट कर दी और एक किवदन्ती बन गई कि जो मन चंगा तो कठौती बीच गंगा।

कबीर को पढ़ना नहीं गुनना और जीना होता है फिर वे बात बात पर बिना प्रयास के प्रकट होते रहते हैं।हरि भक्ति की बात हो तो प्रेम की रीत बता देते हैं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहि, प्रेम गली।अति सांकरी जामे दोउ न समाय।भजो तो मन से भजो ये माला फेरने, तिलक छापे लगाने, जोगिया वस्त्र पहनने, बार बार नहाने से भगवान मिला करते तो अब तक तो सबको मिल जाते।तुम्हारी तो भजन करने की रीत ही न्यारी है दुख में भजते हो सुख में भुला देते हो, जो हमेशा भजो, उसके ध्यान में बने बने रहो तो दुख होय ही क्यों।दुख में सुमिरन सब करें दुख में करे न कोय, जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे होय।जीवन की नश्वरता समझ लोगे तो सब अभिमान चूर हो जॉयेगा, रोज इतनो को श्मशान जाते देखते हो फिर भी समझ नहीं पाते।पत्ते से ही ज्ञान ले लो पत्ता टूटा डाल से ले गई पवन उडाय, अब के बिछड़े कब मिले दूर पड़ेंगे जाय।तो मिल जुल के रहो, काहे ऐंठे से रहते हो मुंह फुलाते पड़े रहते हो, कुछ साथ नहीं जाना।जिनसे रूठे मटके रहते हो उनसे मिलने के लिए भी तरस जाओगे।

तो बाबलो ,कम से कम कबीर जयन्ती पर तो उनका स्मरण कर लो।उनके दोहे ही बांच लो, निर्गुनिया गा लो...दो पल का है डेरा अकेले जाना है, ये है जोगी वाला फेरा, अकेले जाना है।संतो भाई, आई ज्ञान की आंधी, भरम की टाटी सबे उड़ाने माया रहे न बांधी ही याद कर लो।अरे उन जैसे बड़े नहीं बन सकते तो उनके अनुयायी ही बन लो।कुछ भी करो पर उनके दो चार दोहे तो जीवन में उतार ही लो।तभी नैया पार लगेगी।

Tuesday, July 19, 2022

हंसते रहो मुस्कराते रहो

 सफर जारी है.....962

13.06.2022

खुशियां पैसों की मोहताज नहीं हुआ करती।अरे हंसने मुस्कराने में कौन पैसा लगता है।वैसे भी सब बिकाऊ ही नहीं हुआ करता।जिन्हें खुश रहना आता है वे अभाव में भी के प्रसन्न रहने के अवसर खोज लेते हैं।याद आती है उस राजा की कहानी जो बीमार हो जाता है और वैद्य जी उसके रोग का इलाज एक खुश मिजाज व्यक्ति की कमीज पहनना बताते है।खुश व्यक्ति की खोज शुरू होती है और आश्चर्य की बात तो यह निकली कि जो सदा प्रसन्न और मस्त रहता था उसके पास कमीज तो छोड़ो, फ़टे चिथड़े भी नहीं थे।वह नङ्गे वदन ही मस्त था।यदि सुख और प्रसन्नता वस्तु में होते तो अमीर तो कभी दुखी ही नहीं होते।पर सारे भौतिक संसाधनों के बाद वे बीमार दुखी और अप्रसन्न है।आरामदेह विस्तरों पर एसी कमरों में भी उन्हें नींद नहीं आती, खाने के लिए बहुत कुछ है उनके पास लेकिन भूख गायब है।जो थोड़ा बहुत खाते हैं उसे पचाने के लिए मुठ्ठी भर गोलियां फांकनी पड़ती है।वर्जिश व्यायाम की ढेरों मशीनें  खरीद कर घर में ही जिम तो तैयार कर लिया गया  है पर कसरत का समय ही नहीं मिलता।

भूख नींद कोई भोजन और विस्तर पर निर्भरथोड़े ही हुआ करती है।भूख में तो किवाड़ भी पापड़ लगते हैं और नींद ठौर नहीं देखा करती।जब आती है तो पत्थर पर भी आ जाती है, गर्मी सर्दी में भी आ जाती है।जिन्हें खुश रहने की आदत होती है वह हंसने मुस्कराने की कोई भी वजह खोज लेते हैं और जो रोतड़े हैं उन्हें सब कुछ होते सोते भी रोने झींकने से फुर्सत नहीं मिला करती।वे भरे गिलास पानी और परसी थाली में भी कोई न कोई नुस्ख निकाल लेते हैं।जो पास है वह आंख तर नहीं आता और पराई थाली का भात सदैव मीठा लगता है।दुखी होने के ऐसे ऐसे कारण खोज लाते हैं जिनके सिर पैर ही नहीं होते।अपना आत्मविश्लेषण करें न करें पर दूसरों के काम में नुक्ताचीनी निकालते रहते है।धीरे धीरे यह वृत्ति उनके स्वभाव का अंग बन जाती है।

          अरे भाई हंसो ,खिलखिलाओ ,ठहाके लगाओ देखो मन प्रसन्न रहता है या नहीं।दुख कष्ट तो अपने रास्ते जाता है पर उसी के विषय में सोच सोच कर हम स्वयम को खूब परेशान कर लेते हैं।बिल्कुल भूल जाते हैं धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा फल तो ऋतु पर होय।और यदि हमारे रोज शोक मनाने,रोते झींकते रहने से यदि दुख वाकई में कम होते हों या मन को तसल्ली मिलती हो तो खूब रोओ,खीझो, झींको, किसी को क्या परवाह।बस तुम आप ही धीरे धीरे मन से कमजोर होते जाओगे, अच्छा सोच ही नहीं पाओगे।तो निर्भर तुम पर करता है कि तुम बड़े से बड़े दुख को कष्ट को हंसते मुस्कराते झेल जाओ या उसे पानी छिड़क छिड़क कर और बोझिल कर लो, विकल्प तुम्हारा है।जिंदगी मिली है तो उसमें फूल और कांटे दोनों होंगे ही।और जो तुम्हें ये लगता है देखो सामने वाला कितने आराम से है तो उसके कष्टों से आपका साबका नहीं पड़ा।आप किसी के लिए अपने मन में कुछ भीसोचने के लिए स्वतंत्र हैं पर वह सब सच और यथार्थ हो, यह आवश्यक नहीं होता।तो अपनी खीझ, गुस्सा ,झींकना ,हमेशा तनाव में बने रहना,चौबीस घण्टे टेन्स रहना को छोड़ो भाई, चीजें अपने आप बदलती हैं, समस्याएं उतनी बड़ी भी नहीं होती जितना हम अनुमान लगा बैठते हैं।और मान लो है भी तो मुंह सुजाये बैठे रहने से कौन कम हो जाएगी।उपाय खोजो, चिंतन करो, रास्ते निकालो ।हंसी खुशी रहो।जानते हो ये हंसना मुस्कराना समस्याओं की विकरालता को कम कर देता है और हम आसानी से उसके समाधान खोज पाते हैं।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...