सफर जारी है....992
13.07.2022
देव शयन को चले गये हैं......
हां हां भाई, देवता क्यों नहीं सो सकते,जब सबको काम के बाद आराम चाहिए तो देवता तो हम सबसे ज्यादा काम करते हैं, तो क्या वे थकते नहीं होगें, उन्हें भी तो कुछ दिनों के लिए आराम चाहिए या नहीं। हम सबकी विपत्ति में वे सहायता करते हैं, उनके नाम जप से हमें बडी शांति मिलती है। ये तो भलमनसाहत समझो कि वे रोज रोज नहीं सोते, रात्रि जागरण करते हैं तभी तो हम चैन से सो पाते हैं। अब ये अलग बात है कि हम घर और मंदिर में स्थापित भगवान के विग्रह को विधिवत सुलाने का उपक्रम करते हैं , पर्दा लगा देते हैं और सुबह प्रभाती गाकर, घंटी घंटे बजाकर उन्हें विधिवत जगाते हैं। पर सोचो यदि भगवान भी रात में खर्राटे मारकर सोते तो हमारी समस्याओं को भला कौन सुनता और दूर करता।
कल आषाढ़ मास की ग्यारस को हरिशयनी एकादशी हो गई और देवता विधिवत शयनकक्ष में भेज दिए गए हैं। वे भगवान हैं तो चार मास में ही अपनी नींद पूरी कर लेते है और सोचो कहीं कुंभकर्ण जैसे छह महीने सोते तो कैसी बीतती। आषाढ़,सावन, भादों और आश्विन (क्वार) चार महीने बारिश के हैं,बारिश के कारण सब जगह कीचड़ और गंदगी रहती है, संत महात्मा इस अवधि में एक ही स्थान पर बैठकर भजन कीर्तन करते हैं। ये चातुर्मास जैन धर्मालंबियो के लिए भी बड़े महत्त्वपूर्ण हैं।
आषाढ़ के चारों सोमवार शीतला मैया को समर्पित हैं तो श्रावण के सोमवार महादेव को, आगरा शिव की नगरी है, राजेश्वर, बल्केश्वर, कैलाश और पृथ्वीनाथ मंदिर में भोले बाबा प्रतिष्ठित हैं, सावन की रिमझिम फुआरों के बीच परिक्रमार्थी नगर परिक्रमा करते हैं, कांवर चढ़ाते है, हर हर महादेव से पूरा परिकर गुंजायमान होता है। फिर आता है भाद्रपद... नागपंचमी, जन्माष्टमी,सलूने राखी, गाज जैसे स्थानीय पर्वों से घर परिवार में चहल पहल बनी रहती है। आश्विन मास पूर्वजों को याद करने, उनका श्राद्ध करने का है और महालया अर्थात शक्ति की उपासना को समर्पित है। दशहरे के बाद शरद पूर्णिमा और फिर कार्तिक मास की शुरुआत हो जाती है यानी करवा चौथ, अहोई अष्टमी,प्रकाश का त्योहार दीपावली, अन्नकूट का त्योहार गोवर्धन और भाई बहिन के स्नेह का त्योहार भाईदूज यानी यम द्वितीया। कार्तिक माह की एकादशी को देवताओं के जागरण का समय हो जाता है देवउठनी एकादशी ,जिसे देवोत्थान/देवठान भी कहा जाता है जागो रे देवा उठो रे देवा आंगुलिया चटकाओ देवा के मंगल गीत गवते हैं।
तो ये है देव शयन से देव जागरण की यात्रा। अब इस बीच इतने इतने त्योहार आते हैं , दुःख हो या सुख, हम जैसों का तो भगवान् ही सहारा है।हम तो भगवान का ही स्मरण करते हैं। उन्हें छोड़कर और कहां जाएंगे भला। हमारा तो एक दिन काम न चले उनके बिना, वे सो गये गुदगुदे बिस्तर पर खराटे मार के तो हम जैसों की तो भट्टा बैठ जायेगा। हमारा उनके बिन और है ही कौन। न भाई हम तो बिलकुल नहीं जाने देंगे उन्हें सोने के लिए और वे भी पूरमपट चार महीने। भला ऐसे कहीं होता है क्या कि भक्त पुकारते रहें और तुम ऐसी गहरी नींद सो जाओ कि कान पे जूं भी न रेंगे। तो सुनो देवता तुम्हें सोनो ही है तो सांकेतिक रुप से भले ही सो जाओ घंटा दो घंटा कू पर वे अपने भक्तों के लिए तो आपको सोते हुए भी जागना पड़ेगा। भक्तों को इनके बिन कल नहीं पड़ती और भगवान कौन भक्तों को अधर में डाल चैन से सो पाते हैं। तो आग है दोनों तरफ बराबर लगी हुईं। भगवान एक बार को सोने का मन बनाये भी तो ये भक्त मंडली उन्हे कब सोने देगी। दूसरों की क्या कहे जब से सुना है कि भगवान चार महीने को सोने चले गये हैं, हमारो तो हालत पतली हो गई कि अब अपना दुखड़ा किससे कहेंगे, किसे सुनाएंगे, कौन हमें ढाढस बंधाएगा।
तो देवता जी तुम्हाई नाय चल रही साब, राजी राजी मान लेयो तो ठीक नहीं तो जबरदस्ती करनी पड़ेगी। तो सोने को कार्यक्रम ए रद्द कर देयो , इतने काम फैले पड़े हैं और इन्हें देखो कि फरमान जारी कर दिया कि चार महीने को सोने जा रहे हैं। घर की खेती समझ रखी है क्या। और क्या जाना जाना लगा रखा है। हाथ छुड़ाए जात हो निबल जान के मोय,हृदय ते जब जाओगे सबल बदूगी तोय।